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	<title>अंतरिक्ष &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/अंतरिक्ष/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "अंतरिक्ष"</description>
	<pubDate>Sat, 06 Sep 2008 16:55:24 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 17:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</guid>
<description><![CDATA[नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल
सब कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल<br />
सब कर्मचारी थे परेशान<br />
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम<br />
धरती पर बढते पापों की वजह से<br />
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे<br />
अपने बुरे कर्मों का फल</p>
<p>आखिर सबने की न्यायपति से गुहार<br />
‘‘अब जगह बहुत कम<br />
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा<br />
कौन अब स्वर्ग जाता है<br />
पूरा पडा खाली<br />
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ<br />
खाली करा लो एक दो तल<br />
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ<br />
श्रेणियां बना दो<br />
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो<br />
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’</p>
<p>न्यायपति ने बैठक की आहूत<br />
जिसमें पहुंचे धरती से भी<br />
नरक में जगह न मिलने की<br />
वजह से बेदखल भूत<br />
न्यायपति ने कहा<br />
पहले तो यह बताओ<br />
ब्लोगर कौनसा जीव है<br />
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है<br />
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है<br />
उसमें इसका नाम नहीं है<br />
उसका कर्म पाप है या पुण्य<br />
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है<br />
कैसे तय करें फल या कुफल’’<br />
धरती से आये एक भूत ने कहा<br />
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं<br />
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं<br />
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से<br />
पोस्ट लिखते हैं<br />
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं<br />
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे<br />
जब उनमें कामना होती<br />
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं<br />
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल<br />
पर श्रेणियां बना लेते हैं<br />
मैं पता करता हूं क्या<br />
कोई वह कोई पाप.पुण्य की<br />
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’</p>
<p>न्यायपतिपति ने कहा<br />
‘‘ठीक है पता कर आओ<br />
पाप की श्रेणियों का<br />
फिर से तय करो मापदंड<br />
कुछ लोग स्वर्ग में जायें<br />
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल<br />
जैसा तुमने सुनाया उससे तो<br />
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो<br />
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’</p>
<p>वह भूत चला गया तो<br />
दूसरा भूत बोला<br />
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज<br />
वह एक ब्लोगर था<br />
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर<br />
विचरण कर रहा था<br />
और वह सोते हुए भी वहां<br />
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया<br />
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया<br />
इतने में आयी आपकी पुकार<br />
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी<br />
अब तो यह अपना काम कर गया<br />
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया<br />
यह अब वहीं जायेगा<br />
आप का कहा तो ब्लोग पर<br />
लगाई कमेन्ट की तरह है<br />
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते<br />
और यह डीलीट करेगा नही<br />
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये<br />
यहां का हाल देखने में रहा सफल<br />
अब लिखेगा पोस्ट<br />
हमें बना देगा भूत से घोस्ट<br />
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’ </p>
<p>न्यायपति  ने हैरान होकर कहा<br />
‘‘पहले क्यों नहीं बताया<br />
तुम्हारी वजह से ही<br />
हमें चलाने में वह रहा सफल’</p>
<p>भूत ने कहा<br />
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में<br />
सबसे निपटने की तरीके हैं<br />
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में<br />
कुछ नहीं कहा<br />
हम तो उतना ही चलें<br />
जितनी भरी चाबी अपने<br />
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं<br />
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है<br />
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो<br />
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है<br />
धरती पर<br />
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’<br />
..........................................</p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वायेजर : सूदूर अंतरिक्ष का एकाकी यात्री ]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/03/12/voyager/</link>
<pubDate>Mon, 12 Mar 2007 13:02:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/03/12/voyager/</guid>
<description><![CDATA[वायेजर कार्यक्रम मे दो मानवरहित वैज्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वायेजर कार्यक्रम मे दो मानवरहित वैज्ञानिक शोध यान वायेजर १ और वायेजर २ शामील है। इन दोनो अंतरिक्ष यानो १९७७ मे १९७० के दशक के अंत की अनुकूल ग्रहीय दशा का लाभ लेने के लिये प्रक्षेपित किया गया था। इन दोनो यानो को तो ऐसे गुरू और शनि के अध्यन के लिये भेजा गया था, लेकिन दोनो यान सौर मंडल के बाहरी हिस्से के अध्यन का अभियान जारी रखे हुये है। ये अपने अभियान मे अग्रसर है और भविष्य मे सौर मंडल से बाहर चले जायेंगे।</p>
<p align="center"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/thumb/f/fc/Voyagerlogo.jpg/800px-Voyagerlogo.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/thumb/f/fc/Voyagerlogo.jpg/800px-Voyagerlogo.jpg" border="1" height="275" width="400" /></a></p>
<p><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/58/Voyager_Path.jpg/715px-Voyager_Path.jpg"></p>
<p style="text-align:center;"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/58/Voyager_Path.jpg/715px-Voyager_Path.jpg" border="1" height="300" width="355" /></p>
<p></a></p>
<p align="center"><strong>वायेजर का पथ</strong></p>
<p>दोनो अभियानो ने गैस के महाकाय पिंडो (गुरू, शनि, युरेनस, नेपच्युन) के बारे बडी़ मात्रा मे आंकड़े जमा किये है। इस आंकड़ो मे से काफी ज्यादा सुचनाये इसके पहले अज्ञात थी। इसके अलावा इन यानो का पथ इस तरह से अभिकल्पित किया गया है कि यह प्लुटो के बाद के किसी कल्पित  ग्रह का पता लगा सके।<br />
वायेजर असल मे १९६० के दशक के अंत मे और १९७० के दशक की शुरुवात मे बनाये गये <strong>महा सैर(Grand Tour)</strong> नामके एक कार्यक्रम का संक्षिप्त रूप है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत दो शोध यानो को बाहरी ग्रहो के पास से गुजरना था, लेकिन बजट की कमी से इस कार्यक्रम को छोटा कर दिया गया। लेकिन वायेजर कार्यक्रम ने इस महासैर कार्यक्रम के प्लुटो को छोड़कर बाकि सभी उद्देश्यो को पूरा किया। प्लुटो उस समय एक ग्रह माना जाता था।<br />
१९९० के दशक मे वायेजर १ <strong>पायोनीयर १०</strong> को पिछे छोड़कर अंतरिक्ष मे सबसे दूरी पर स्थित मानव निर्मित पिंड बन गया था। वायेजर १ यह रिकार्ड अगले कई दशको तक बनाये रखेगा। हाल ही मे छोड़ा गया <strong>न्यु हारीजोंस</strong> यान इसे पिछे नही छोड़ पायेगा क्योंकि उसकी गति वायेजर १ से काम है। वायेजर १ और पायोनीयर १० दोनो मानव निर्मित एक दूसरे से सबसे ज्यादा दूरी पर स्थित पिंड भी है क्योंकि ये सूर्य की दो विपरित दिशाओ मे यात्रा कर रहे हैं।</p>
<p align="center">&#160;</p>
<p><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/2/29/Voyager_spacecraft.jpg/725px-Voyager_spacecraft.jpg"></p>
<p style="text-align:center;"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/2/29/Voyager_spacecraft.jpg/725px-Voyager_spacecraft.jpg" border="1" height="300" width="360" /></p>
<p></a></p>
<p align="center">
<strong>वायेजर यान</strong></p>
<p>इन दोनो यानो से एक नियमित अंतराल के बाद संपर्क साधा जाता रहा है। यानो के रेडीयोधर्मिक उर्जा श्रोत अभी भी बिजली निर्माण कर रहे है। आशा है कि ये यान सौरमंडल के सबसे बाहरी हिस्से हिलीयोपास की खोज कर पाने मे सफल होंगे। २००३ के अंत मे वायेजर १ ने ऐसे संकेत भेजने शुरू कर दिये थे जिससे यह प्रतित होता है कि उसने टर्मिनेशन शाक को पार कर लिया है। लेकिन इस खोज पर विवाद है। अब यह माना जाता है कि वायेजर १ ने टर्मीनेशन शाक को दिसंबर २००४ मे पार किया है।</p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/4/4f/Voyager_1_entering_heliosheath_region.jpg/800px-Voyager_1_entering_heliosheath_region.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/4/4f/Voyager_1_entering_heliosheath_region.jpg/800px-Voyager_1_entering_heliosheath_region.jpg" border="1" height="270" width="400" /></a></p>
<p align="center"><strong>वायेजर यान हेलीयोसीथ हिस्से मे प्रवेश करते हुये</strong></p>
<p><strong>वायेजर यानो की संरचना</strong><br />
ये यान तीन अक्षो वाले यान है जो पृथ्वी की तरफ अपने एंटीना को रखने के लिये खगोलिय निर्देशीत अक्ष नियंत्रण प्रणाली का उपयोग करते है। मुख्य अभियान के वैज्ञानिक यंत्रो की संख्या १० थी जिसमे से ५ अभी भी काम कर रहे है।<br />
फ़्लाईट डाटा सबसीस्टम (FDS) और ८ ट्रेकोवाला डीजीटल टेप रिकार्डर(DTR) आकंड़े जमा करने का कार्य कर रहे हैं। FDS यह हर उपकरण को निर्देश देने और नियंत्रण का कार्य करता है। वह इन उपकरणो से आंकड़े प्राप्त कर पृथ्वी की ओर प्रसारण के लिये तैयार करता है। DTR इन आंकड़ो को प्लाज्मा वेव सबसीस्टम (PWS) के रूप मे रीकार्ड करता है जिसे हर छः महीने बाद पृथ्वी पर भेजा जाता है।<br />
तस्वीरे लेने के लिये इन यानो मे दो कैमरे लगे हुये है। इन कैमरो मे चक्र के आकार मे ८ फिल्टर लगे हुये है। एक कैमरा का लेंस २०० मीमी का है जबकि दूसरे कैमरे का लेंस १५०० मीमी का है। ये कैमरे बाकि यंत्रो की तरह स्वचालित नही है, इन्हे FDS द्वारा प्राप्त आंकड़ो के आधार पर एक कम्प्युटर संचालित करता है।</p>
<p>यान के नियंत्रण के लिये एक कम्प्युटर लगा हुआ है जिसे कम्प्युतर कमांड सबसीस्टम (CCS) कहते है। CCS कुछ निश्चीत प्रक्रियाये जैसे निर्देशो का पालन, पथ प्रदर्शन , एंटीना की स्थिती बदलने जैसे कार्य करता है।</p>
<p>बिजली निर्माण के लिये यान मे दो रेडीयोधर्मिक विद्युत निर्माण ईकाईयां लगी हुयी है जो की प्लुटोनियम का प्रयोग करती है। यान के प्रक्षेपण के समय ये ३० वोल्ट की ४०० वाट उर्जा का उत्पादन करते थे। अगस्त २००६ मे वायजर १ की उर्जा निर्माण क्षमता गीरकर २९० वाट और वायेजर २ की क्षमता गीरकर २९१ वाट रह गयी है।</p>
<p>बिजली निर्माण की क्षमता मे लगातार होती जा रही कमी के कारण इन यानो के उपकरणो को एक के बाद एक बंद करना पढा़ है। ऐसी उम्मीद है कि २०२० तक सभी उपकरण बंद हो जायेंगे। लेकिन इससे यान रूकेंगे नही, पृथ्वी पर आंकड़े भेजना बंद कर देंगे लेकिन यान अपनी मृत अवस्था मे अपनी अनंत यात्रा जारी रखेंगे।</p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/e/e8/Outersolarsystemprobes_2006.jpg/800px-Outersolarsystemprobes_2006.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/e/e8/Outersolarsystemprobes_2006.jpg/800px-Outersolarsystemprobes_2006.jpg" border="1" height="225" width="400" /></a></p>
<p align="center"><strong>विभिन्न यानो की वर्तमान स्थिती(अक्टूबर २००६)</strong></p>
<p>वायजर १ और वायेजर २ मे एक सोने का रिकार्ड रखा हुआ है जो पृथ्वी की तस्वीरे और आवाज रखे है। इसके साथे मे रीकार्ड को बजाने के लिये संकेत भी बनाये हुयी है। पृथ्वी की दिशा दर्शाता हुआ एक मानचित्र भी रखा हुआ है। यह किसी अन्य बुद्धीमान सभ्यता द्वारा इस यान को पाने कि स्थिती मे उनके लिये पृथ्वी से मित्रता का संदेश है।</p>
<p>अगले अंक मे वायेजर १  !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किसी श्याम विवर द्वारा एक तारे को चीरना ]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/15/blackhole/</link>
<pubDate>Mon, 15 Jan 2007 01:55:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/15/blackhole/</guid>
<description><![CDATA[
किसी श्याम विवर द्वारा एक तारे को चीर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img border="1" width="520" src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0402/bhstar_chandra.jpg" height="347" style="width:520px;height:347px;" /></p>
<p align="center"><strong>किसी श्याम विवर द्वारा एक तारे को चीरना (x किरण उत्सर्जन  द्वारा पाये गये सबुत)</strong> </p>
<p>किसी तारे को कौन चीर सकता है ? एक श्याम विवर ।</p>
<p>एक महाकाय श्याम विवर किसी पास से गुजरते तारे को चीर सकता है। श्याम विवर के गुरुत्व से उस बल तारे से इतनी तेजी से गैसो का प्रवाह निकलेगा की तारा उपर चित्र मे दिखाये अनुसार खिंच जायेगा। गैस का यह प्रवाह श्याम विवर मे समाना शुरु हो जायेगा। श्याम विवर मे गिरती हुयी ये गैसे x किरणो का उत्सर्जन करना शुरू कर देंगी यह उत्सर्जन एक विस्फोट की शक्ल मे हो सकता है।एक ऐसा ही xकिरणो का विस्फोटेक आकाशगंगा RX J1242-11 के मध्य मे पाया गया है। उपर दिया गया चित्र एक कलाकार की कल्पना से है। इस तरह की घटना काफी कम होती है लगभग १०००० साल मे एक।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मंदाकिनी की बहन ( NGC 3370)]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/12/ngc3370/</link>
<pubDate>Fri, 12 Jan 2007 04:46:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/12/ngc3370/</guid>
<description><![CDATA[
हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकीनी के आकार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0505/ngc3370_hst_c1.jpg" border="1" height="542" width="643" /></p>
<p>हमारी अपनी <a href="http://www.anzwers.org/free/universe/galaxy.html" target="_blank">आकाशगंगा मंदाकीनी </a>के आकार और प्रकार की आकाशगंगा NGC ३३७० हमसे लगभग १००० लाख प्रकाशवर्ष दूर है। इसे सिंह तारामंडल मे देखा जा सकता है। यह तस्वीर ह<a href="http://hubblesite.org/newscenter/archive/releases/2003/24" target="_blank">ब्बल दूरबीन </a>से ली गयी है। इस खूबसूरत तस्वीर मे इस आकाशगंगा की घुमावदार सरंचना स्पष्ट रूप से दिखायी दे रही है। तस्वीर के पृष्ठभाग मे और भी कई आकाशगंगाये दिखाई दे रही है। इस आकाशगंगा मे कई पल्सर तारे है जिन्हे सेफिड भी कहते है। इन तारो से हमे इस <a href="http://csep10.phys.utk.edu/astr162/lect/cosmology/cosmicd.html" target="_blank">आकाशगंगा से हमारी दूरी</a> की गणना करने मे मदद मिलती है। इस आकाशगंगा मे कुछ मरते हुये तारे भी है जिनमे से एक है सुपरनोवा Ia। सुपरनोवा के अध्यन से ब्रम्हांड के कई रहस्यो जैसे <a href="http://www.astro.ucla.edu/~wright/cosmolog.htm" target="_blank">ब्रम्हांड </a>के विस्तार की गति और परिमाण पर से परदा हटने की संभावना है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र की मरम्मत]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/11/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Thu, 11 Jan 2007 05:57:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/11/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%95/</guid>
<description><![CDATA[
अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन(International Spac]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0612/trussnauts_sts116.jpg" alt="अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र की मरम्मत" align="absmiddle" border="1" height="480" width="640" /></p>
<p>अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन(International Space Station-ISS)पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली मानव निर्मित सबसे बडी वस्तु होगी। यह केन्द्र इतना बडा है कि इसे एक बार मे प्रक्षेपित नही किया जा सकता। इसे टुकडो टुकडो मे बनाया जा रहा है। इन टुकडो को संयुक्त राज्य अमरिका के अंतरिक्ष शटल और रुस के सोयुज यानो से ले जाकर अंतरिक्ष मे जोडा जाता है। इस केन्द्र के आधार और आकार के लिये ट्रस(Truss) की आवश्यकता होती है जो लगभग १५ मिटर लंबे और १०,००० किलोग्राम वजन के होते है। इस तस्वीर मे अंतरिक्ष यात्री राबर्ट एल करबीम (अमरीका)[Robert L. Curbeam (USA)] और  क्रिस्टर फुगलसंग (स्वीडन)[Fuglesang (Sweden)] एक नये ट्रस को अंतरिक्ष केन्द्र मे लगा रहे है। साथ मे उन्होने बिजली केन्द्र[power grid] की मरम्मत भी की।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिल्ली की आंखे]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/08/catseye/</link>
<pubDate>Mon, 08 Jan 2007 10:28:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/08/catseye/</guid>
<description><![CDATA[
तिन हजार प्रकाश वर्ष दूर ,एक मरते हुये ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0611/catseye_hst.jpg" height="480" width="640" /></p>
<p>तिन हजार प्रकाश वर्ष दूर ,एक मरते हुये तारे मे विस्फोट हुआ और गैस के चमकीले बादल तारे से बाहर फेंके गये। हब्बल दूरबीन से लिये गये बिल्ली की आंख के आकार की इस निहारीका(Cat's Eye Nebula) के चित्र से इस जटिल ग्रहीय निहारीका(planetary nebulae) के बारे मे ज्यादा सुचना मिली है। इस निहारीका का विवरण इतना जटिल है कि विज्ञानीयो को इसके केन्द्र मे स्थित चमकिले पिंड पर युग्म तारे(Binary Star)होने का शक हो रहा है।</p>
<p>ग्रहीय निहारीका छोटी दूरबीन से गोल और एक  एक बहुत बडे ग्रह के जैसे दिखायी देती है लेकिन ग्रहीय निहारीका के लिये ग्रह शब्द का प्रयोग गलत है। क्योंकि एक ग्रहीय निहारीका तारो से बनी होती है गैस और धुल जो ढके हुये होते है। यह गैस और धुल इन्ही तारो के द्वारा उतसर्जित होते है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['चील निहारिका' मे सितारो का जन्म]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/06/egle/</link>
<pubDate>Sat, 06 Jan 2007 10:15:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/06/egle/</guid>
<description><![CDATA[
सितारो का जन्म कहां होता है ? सितारो की]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0610/eagleend_hst_big.jpg" border="1" height="600" width="615" /></p>
<p>सितारो का जन्म कहां होता है ? सितारो की जन्मस्थली को EGGs(evaporating gaseous globules) कहा जाता है। ये EGGs कुछ और नही सुदूर अंतरिक्ष मे हायड्रोजन गैस के संघनित क्षेत्र होते है ,जो गुरुत्वाकर्षण के कारण घनीभूत होकर सितारो मे तब्दिल हो जाते है। यह चित्र चील के आकार की एक निहारिका (Eagle Nebula (M16))का है। गर्म और चमकीले तारो से आनेवाला प्रकाश इस क्षेत्र(Eggs) को और गर्म करता है जिससे नये तारो का जन्म होता है। यह चित्र हब्बल दूरबीन से लीया गया है।</p>
<p>निहारिका (Nebula)-&#62; अंतरिक्ष मे धूल, गैस और प्लाज्मा का बादल।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमारे सबसे नजदिक का तारा: प्राक्सीमा सेंटारी]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/02/proxima/</link>
<pubDate>Tue, 02 Jan 2007 07:29:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/02/proxima/</guid>
<description><![CDATA[
हमारे सबसे नजदिक का तारा कौन सा है ? सु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0207/proximacen1_aao.jpg" height="434" width="625" /></p>
<p>हमारे सबसे नजदिक का तारा कौन सा है ? सुर्य ! लेकिन सुर्य के सबसे नजदिक का तारा ?<br />
यह है प्राक्शीमा सेंटारी, जो की <a href="http://homepage.sunrise.ch/homepage/schatzer/Alpha-Centauri.html" target="_blank">अल्फा सेंटारी तारा समुह</a>  के तिन तारो मे से एक है और हमारे सबसे नजदिक है। यह तस्वीर के केन्द्र मे दिखायी दे रहा छोटा लाल तारा है, जो काफी धुंधला है। इसे सिर्फ दूरबीन से देखा जा सकता है। इसकी खोज १९१५ मे हुयी थी। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी के हर तरह के तारे इस तस्वीर मे दिखायी दे रहे है। अल्फा सेण्टारी तारा समुह का सबसे चमकीला तारा अल्फा सेंटारी हमारे सुर्य के जैसा ही है, और आकाश मे दिखायी देने वाले तारो मे तिसरा सबसे ज्यादा चमकीला तारा है।</p>
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