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	<title>अनुगूँज &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/अनुगूँज/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "अनुगूँज"</description>
	<pubDate>Wed, 22 May 2013 10:45:05 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भूखे को नही दें रोटी , भूत के लिये खोलें तिजोरी-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/29/bhookh-aur-bhoot-hindi-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 29 Aug 2007 14:26:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/29/bhookh-aur-bhoot-hindi-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[बरसात का दिन, रात थी अंधियारी गांव से दूर ऐक झौंपडी में गरीब का चूल्हा नही जल पाया घर में थी गरीबी क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बरसात का दिन, रात थी अंधियारी<br />
गांव से दूर ऐक झौंपडी में<br />
गरीब का चूल्हा नही जल पाया<br />
घर में थी गरीबी की बीमारी<br />
भूख से बिलबिलाते बच्चे और<br />
पत्नी भी परेशानी से हारी<br />
देख नही पा रहा था<br />
आखिर चल पडा वह उसी साहुकार के घर<br />
जिसने हमेशा भारी सूद के साथ<br />
जोर जबरदस्ती वसूल की रकम सारी<br />
जिसकी वजह से छोडा था गांव<br />
और उसके परिवार सहित मरने की<br />
झूठी खबर सुनकर भूल गयी थी जनता सारी</strong></p>
<p><strong>बरसात में भीगे सफ़ेद कपडे उस पर<br />
जमी थी धूल ढेर सारी<br />
आंखें थीं पथराईं गाल पर बह्ते आंसु<br />
साहुकार के घर तक पहुचते-पहुंचते<br />
चेहरा हो गया ऐकदम भूत जैसा<br />
रात के अंधियारे में देखकर उसे<br />
सब घबडा गये वहां के नौकर<br />
भागते-भागते मालिक को देते गये खबर सारी</strong></p>
<p><strong>जब तक वह संभलता पहुंच गया उसके पास<br />
ताकतवर बना गरीब अपने भूत की बलिहारी<br />
जिसकी आवाज थी, बंद मन था भारी<br />
उसने मांगने के लिये हाथ एसे उठाये<br />
जैसे हो कोई भिखारी<br />
साहुकार कांप रहा था<br />
भागा अंदर और अल्मारी से<br />
निकाल लाया नोटों की गड्ढी<br />
और आकर उसके हाथ में दी<br />
कागज पर अंगूठा लगाने के<br />
इंतजार  में वह खडा रहा<br />
कांपते हुए साहुकार ने कहा<br />
&#8221;और भी दूं&#8217;<br />
तेज बरसात की आवाज में उसने नहीं सुना<br />
बस स्वीकरोक्ति में अपना सिर हिलाया<br />
साहुकार फ़िर अंदर गया और गड्ढी ले आया<br />
और उसके हाथ में दी<br />
उसने हाथ में लेते हुए<br />
अंगूठे के निशान के लिये किया इशारा<br />
साहुकार था डर का मारा बोला<br />
&#8216;महाराज उसकी कोई जरूरत नहीं है<br />
आप मेरी जान बख्श दो, चाहे ले लो दौलत सारी&#8217;<br />
वह लौट पडा वापस यह सोचकर कि<br />
मेरी परेशानी से साहुकार द्रवित है<br />
इसलिये दिखाई है कृपा ढेर सारी</strong></p>
<p><strong>साहुकार का ऐक समझदार नौकर<br />
पूरा दृश्य देख रहा था<br />
वह उस गरीब के पीछे आया<br />
और उससे कहा<br />
&#8216;मैं जानता हूं तुम भूत नहीं हो<br />
बरसात की वजह से तुम्हें काम<br />
नहीं मिलता होगा इसलिये कर्जा मांगने आये हो<br />
अपने हाल की वजह से भूत की तरह छाये हो<br />
कभी तुमने सोचा भी नहीं होगा<br />
आज इतने पैसे पाये हो<br />
कल तुम छोड् देना अपना घर<br />
वरना टूट पडेगा साहुकार का कहर्<br />
कल फ़ैल जायेगी पूरे गांवों में खबर सारी<br />
मैं भी तुम्हारी तरह गरीब हूं<br />
इसलिये करता हूं तरफ़दारी&#8217;<br />
उस गरीब के समझ में आयी पूरी बात<br />
और भूल गया वह अपनी भूख और प्यास<br />
और नोटों की गड्ढी की तरफ़ देखते हुए बोला<br />
&#8216;कितनी अजीब बात है<br />
भूखे को रोटी नहीं देते और<br />
भूत के लिये तिजोरी खोल देते<br />
जिंदे को जीवन भर सताएं<br />
मरों से मांगें जान की बख्शीश्<br />
गरीब से करें सूद पर सूद वसूल<br />
उसके  भूत के आगे भूल जायें पहले<br />
अंगूठे लगवाने का उसूल<br />
कल छोड जाउंगा अपना घर<br />
भूतों पर यकीन नही था मेरा<br />
पर अपने इंसान होने की  बात भी जाउंगा भूल<br />
नहीं करूंगा फ़िर जिंदगी सारी<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अँधेरे में तीर कहाँ तक चलेंगे]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/12/%e0%a4%85%e0%a4%81%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Sun, 12 Aug 2007 09:19:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[   अंधेरे में चलाते हैं वह तीर जहाँ दाल का पानी भी नहीं मिलता कागजों में बंट जाती है खीर गरीबी का इल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a>  </p>
<p>अंधेरे में चलाते हैं वह तीर</p>
<p>जहाँ दाल का पानी भी नहीं मिलता</p>
<p>कागजों में बंट जाती है खीर</p>
<p>गरीबी का इलाज करते हैं</p>
<p>ऐसे शल्य-चिकित्सक</p>
<p>जो नहीं जानते इसकी पीर</p>
<p>आकर्षक योजनाओं का रथ</p>
<p>भ्रष्टाचार के पहियों पर</p>
<p>धीरे-धीरे रेंगता हुआ चलता है</p>
<p>जिसको अवसर मिलता है</p>
<p>वही फुर्ती से कमीशन</p>
<p>लूटकर चलता बनता है</p>
<p>बोरी में बंद गेहूं, दाल और चावल</p>
<p>बिचोलियों के भोजन में</p>
<p>बन जाता है मटन-पनीर</p>
<p>बेरोजगारी का इलाज</p>
<p>वह लोग करते हैं</p>
<p>जो ऊपरी कमाई के कहलाते हैं वीर</p>
<p>प्रतिवेदन में लिखे होते हैं दावे</p>
<p>हजारों अनाम पेट भर जाने के</p>
<p>जाने-पहचाने नाम वाले</p>
<p>मुख होते हैं मोहताज दाने-दाने के</p>
<p>पता नहीं कब तक चलेंगे</p>
<p>इस तरह अंधेरे में तीर</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<p>नारे लगते-लगते विकास के</p>
<p>इस देश में आशाओं और आकांक्षाओं</p>
<p>के दीप जलने लगे हैं</p>
<p>फाइलों में ऊंची विकास दर के</p>
<p>आंकडे अब सितारों की तरह</p>
<p>चमकने लगे हैं</p>
<p>टीवी चैनलों और अखबारों में</p>
<p>विकास की बातें करने वालों के</p>
<p>चेहरे रोज चमकने लगे हैं</p>
<p>पर सड़कों पर पडे गड्ढे</p>
<p>चहुँ और फैले गंदगी के ढ़ेर</p>
<p>और रोजगार के लिए भटकते</p>
<p>हुए युवकों का हुजूम</p>
<p>जो एक कटु सत्य की तरह</p>
<p>सामने खडा है</p>
<p>उससे क्यों डरने लगे हैं</p>
<p>विकास के आंकडे और सच</p>
<p>अलग-अलग क्यों लगने लगे हैं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[  सबसे अलग होकर लिख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/07/%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96/</link>
<pubDate>Tue, 07 Aug 2007 17:46:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[    तू लिख जमकर लिख समाज में झगडा न होता हो तो कराने के लिए लिख शांति की बात लिखेगा तो तेरी रचना कौन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a>   </p>
<p>तू लिख जमकर लिख<br />
समाज में झगडा न होता हो तो<br />
कराने के लिए लिख<br />
शांति की बात लिखेगा<br />
तो तेरी रचना कौन पढेगा</p>
<p>जहां द्वंद्व न होता वहां होता लिख<br />
जहाँ कत्ल होता हो आदर्श का<br />
उससे मुहँ फेर<br />
बेईमानों के स्वर्ग की<br />
गाथा लिख<br />
ईमान की बात लिखेगा<br />
तो तेरी ख़बर कौन पढेगा</p>
<p>अमीरी पर कस खाली फब्तियां<br />
जहाँ मौका मिले<br />
अमीरों की स्तुति कर<br />
गरीबों का हमदर्द दिख<br />
भले ही कुछ न लिख<br />
गरीबी को सहारा देने की<br />
बात अगर करेगा<br />
तो तेरी संपादकीय कौन पढेगा<br />
रोटी को तरसते लोगों की बात पर<br />
लोगों का दिल भर आता है<br />
तू उनके जजबातों पर ख़ूब लिख<br />
फोटो से भर दे अपने पृष्ठ<br />
भूख बिकने की चीज है ख़ूब लिख<br />
किसी भूखे को रोटी मिलने पर लिखेगा<br />
तो तेरी बात कौन सुनेगा</p>
<p>पर यह सब लिख कर<br />
एक दिन ही पढे जाओगे<br />
अगले दिन अपना लिखा ही<br />
तुम भूल जाओगे<br />
फिर कौन तुम्हे पढेगा<br />
झगडे से बडी उम्र<br />
शांति की होती है<br />
गरीब की भूख से<br />
लडाई तो अनंत है<br />
पर जीवन का<br />
स्वरूप भी बेअंत है<br />
तू सबसे अलग हटकर लिख<br />
सब झगडे पर लिखें<br />
तू शांति पर लिख<br />
लोग भूख पर लिखें<br />
तू  भक्ति पर लिख<br />
सब आतंक पर लिखें<br />
तू अपनी आस्था पर लिख<br />
सब बेईमानी पर लिख<br />
तू अपने विश्वास पर लिख<br />
जब लड़ते-लड़ते<br />
थक जाएगा ज़माना<br />
क्योंकि मुट्ठी हमेशा<br />
भींचे रहना कठिन है<br />
हाथ कभी तो खोलेंगे ही लोग<br />
तब हर कोई तुम्हारा लिखा पढेगा<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अनुगूँज 22: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा - पाँच बातें]]></title>
<link>http://hemjyotsana.wordpress.com/2007/08/07/mera-america-maye-bharat/</link>
<pubDate>Tue, 07 Aug 2007 09:09:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>Hem Jyotsana "Deep"</dc:creator>
<guid>http://hemjyotsana.wordpress.com/2007/08/07/mera-america-maye-bharat/</guid>
<description><![CDATA[मेरा अमरीका मय भारत &#8212;&#8212;&#8212;-&gt; 1 सुबह के 11 बजे जब में उठी तो आदत से मजबूर बोली रामू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[मेरा अमरीका मय भारत &#8212;&#8212;&#8212;-&gt; 1 सुबह के 11 बजे जब में उठी तो आदत से मजबूर बोली रामू]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[झुग्गी-झौंपडी की जगह महल का चित्र]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/05/%e0%a4%9d%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%9d%e0%a5%8c%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%b2-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 11:52:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/05/%e0%a4%9d%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%9d%e0%a5%8c%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%b2-%e0%a4%95/</guid>
<description><![CDATA[   स्कूल में बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए ड्राइंग के शिक्षक ने चित्रकार प्रतियोगिता का आयोजन किय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a>  </p>
<p>स्कूल में बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए ड्राइंग के शिक्षक ने चित्रकार प्रतियोगिता का आयोजन किया। उन्होने सब विधार्थियों को झुग्गी-झौंपडी का चित्र बनाने का निर्देश दिया।</p>
<p>सब बच्चे बडे उत्साह से अपने कार्य में जुट गये, पर एक बच्चा परेशान चुपचाप बैठा था और चित्र नहीं बना पा रहा था। टीचर ने जब उसे डांटा तो वह रुआंसा हो गया और बोला-&#8221;सर, मुझे चित्र नहीं बनाना आता।</p>
<p>टीचर ने कहा-&#8221;कोशिश करो, अभी नहीं तो बाद में बन जाएगा।&#8221;</p>
<p>वह बच्चा बोला-&#8221;आप मुझे मारेंगे तो नहीं।&#8221;</p>
<p>टीचर ने कहा-&#8221;नहीं!तुम जैसा भी बनाओ। मैं तुम्हें नहीं मारूंगा।&#8221;</p>
<p>उस बच्चे ने चित्र बना दिया। प्रतियोगिता समाप्त हो गयी। सबने अपनी कापी टीचर को सौंप दीं। सबने अच्छे चित्र बनाए थे। रंग-बिरंगी कलम से उन चित्रों में उनके निवासी भी चित्रित किये गये थे। पर उस बच्चे ने आडी-तिरछी लाइनें खींचकर एक मकान बना दिया और उस पर लिख दिया &#8216;मेरा आलीशान महल&#8217; और उससे बहुत दूर गड्ढेनुमा गोला खींचकर लिख दिया &#8216;झुग्गी-झौंपडी&#8217;।</p>
<p>टीचर ने प्रसन्न होकर उसे ही पुरस्कार दिया। अन्य टीचरों ने जब यह देखा -सूना तो उनसे आपति जताई। तब उन्होने उत्तर दिया -&#8221; तुम जानते हो न! पूत के पाँव पलने में ही नजर आते हैं। उसने झुग्गी-झौपडी को गड्ढे में डालकर किसी तरह अपना आलीशान महल बना लिया। आख़िर उसमें वह सभी गुण दिख रहे हैं जिससे लगता है कि आगे वह ऐसा ही करेगा। अगर कहीं झुग्गी-झौंपडी बनाने वाला ठेकेदार बन गया तो&#8230;&#8230;अपने लिए कितना बडा महल बनाएगा और कितनी तो इसके पास गाडियां होंगी। और कुछ नहीं तो तब इसकी वजह से समाज में कितना सम्मान होगा कि मैंने कितने बडे ठेकेदार को पढ़ाया है।&#8221;</p>
<p>बाकी टीचर उनका मुहँ ताक रहे थे । कुछ ने तो उनकी दूरदर्शिता की सराहना भी की।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मन के भाव की भाषा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 08:19:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[तुम्हारे मुख से निकले कुछ प्रशंसा के कुछ शब्द किस तरह लुभा जाते हैं जो तुम्हे करते हैं नापसंद वही तु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तुम्हारे मुख से निकले कुछ<br />
प्रशंसा के कुछ शब्द<br />
किस तरह लुभा जाते हैं<br />
जो तुम्हे करते हैं नापसंद<br />
वही तुम्हारे प्रशंसक हो जाते हैं</p>
<p>जुबान का खेल है यह जिन्दगी<br />
कर्ण प्रिय और कटु शब्दों से<br />
ही रास्ते तय हो पाते हैं<br />
जो उगलते हैं जहर अपने लफ्जों से<br />
वह अपने को धुप में खडे पाते हैं<br />
जिनकी बातों में है मिठास<br />
वही दोस्ती और प्यार का<br />
इम्तहान पास कर<br />
सुख की छाया में बैठ पाते हैं</p>
<p>जिन्होंने नहीं सीखा लफ्जों में<br />
प्यार का अमृत घोलना<br />
रूखा है जिनका बोलना<br />
वह हमेशा रास्ते भटक जाते हैं<br />
उनके हमसफर भी अपने<br />
हमदर्द नहीं बन पाते हैं<br />
चुनते हैं भाषा से शब्दों को<br />
फूल की तरह<br />
लुटाते हैं लोगों पर अपनों की तरह<br />
गैरों से भी वह हमदर्दी पाते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिन्दगी में चलते रहना ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/03/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Fri, 03 Aug 2007 17:09:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[थका हुआ शरीर उदास मन सूनी आँखें और कांपती जुबान पूछते है पता वह सुख और ख़ुशी का ओढ़े हैं लिबास स्वार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center">थका हुआ शरीर उदास मन</p>
<p align="center">सूनी आँखें और कांपती जुबान</p>
<p align="center">पूछते है पता वह सुख और ख़ुशी का</p>
<p align="center">ओढ़े हैं लिबास स्वार्थों का</p>
<p align="center">बैठने और सोने को माना है आराम</p>
<p align="center">हवा में उड़ने की चाह</p>
<p align="center">एक-एक कदम चलना</p>
<p align="center">प्रतीक माना बेबसी का</p>
<p align="center">आकाश की तरफ देख उसे छूने की चाह</p>
<p align="center">जिस पर सदा जीवन टिका है</p>
<p align="center">यकीन नहीं उस जमीन का</p>
<p align="center">भ्रम में जिए जा रहे हैं</p>
<p align="center">सुख के लिए दुःख के</p>
<p align="center">रास्ते जा रहे हैं</p>
<p align="center">क्षय करते हैं बदन का</p>
<p align="center">पर ठानी है जिसने</p>
<p align="center">एक-एक कदम</p>
<p align="center">जीवन-पथ पर आगे बढाने की</p>
<p align="center">अपने हाथ से युध्द लड़ने की</p>
<p align="center">सोने की तरह निखरने के लिए</p>
<p align="center">अपने उर्जा से उत्पन्न</p>
<p align="center">अग्नी में जलने की</p>
<p align="center">चहकता है उसका मन</p>
<p align="center">तना रहता है बदन</p>
<p align="center">बनता है घर ख़ुशी का</p>
<p align="center">उनके क़दमों पर सुख और आनन्द</p>
<p align="center">बिछ्ता है कालीन की तरह</p>
<p align="center">वह नहीं थामते कभी दामन</p>
<p align="center">बेबसी का</p>
<p align="center">उनके लिए</p>
<p align="center">चलना नाम है जिन्दगी का</p>
<p align="center">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अनुगूँज 22: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा - पाँच बातें]]></title>
<link>http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/08/02/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%81%e0%a4%9c-22-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 02 Aug 2007 07:06:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>Prem Piyush</dc:creator>
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<description><![CDATA[हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा &#8211; पाँच बातें । यह बीस-सुत्री कार्यक्रम जैसे स्टाईल में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:14px;color:#000099;"><a href="http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/" target="_blank">हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा &#8211; पाँच बातें</a> । यह बीस-सुत्री कार्यक्रम जैसे स्टाईल में सजाकर पाँच बातें लिखना भी कसरत सा है, फिर भी चलो कोशिश करते है &#8211; बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ ना ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">आलोक जी, वैसे हम अमेरिका नईखे गईले । पर सपने देखने को मौका देने के लिए धन्यवाद , वैसे अपना भी कभी-कभी ऐसा ही मन होता है । लो मैनें आँखे बंद कर ली ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">अभी हमारा हिन्दुस्तान, उफ्फ् इंडिया, अमेरिका या और कुछ लग रहा है पता नहीं । पर बड़ा मस्त सीन बना है जनाब । अब हमें जो दिख रहा है वही बक रहा हूँ ।<img src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" alt="kshargram Anugunj" align="right" border="0" height="79" hspace="5" vspace="5" width="163" /></span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">1. मेरे पास बैठी है मेरी पाँचवी गर्लफ्रेंड &#8211; मिनी । उसका मैं सातवां बाय-फ्रेंड हूँ । कहती है &#8211; &#8221; व्हाई टू राईट फार अनुगूँज स्टफ , क्या मिलेगा उसमें तुम्हें ।  कौन केयर करता है &#8211; व्वाट यू राईट और नाट । कम हनी &#8211; लेट्स गो फार पार्टी ।&#8221; सबको पता है कि हमलोग शादी कभी नहीं कर सकते । अभी हमलोग लिभ-इन हैं । शादी, 40 साल का होऊँगा, तब देखा जाएगा । पर- हमारे पर-दादाजी स्वर्ग से देखकर सोचते होंगे &#8211; क्या एक ही पर-दादी के साथ जीवन काटा था उन्होंने, इर्ष्या से जल-भुन गये होंगे ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">2. हमारी अब अपनी कंपनी है &#8211; पहले हमलोग सर्विस प्रोभाईडर कंपनी हुआ करते थे । अब हमारी अपनी प्रोड्क्टस है । ब्लाग-नेटवर्किंग पर हमारी बिरादरी का साफ्टवेयर <em>Narad Version 10.5</em> हमने ब्लागर को बेचा है । साफ्टवेयर में हमारी कंपनी के बारे में सुना तो <a href="http://www.hindini.com" target="_blank">स्वामीजी</a> अपने प्राईवेट जेट लेकर सीधे झुमरीतिलैया आ बसे हैं । साफ्टवेयर सर्भिसिंग करते-करते गराज के मिस्तरी जैसे हमारी हाथ साफ हो चुकी है । यह अमेरिका वाले इंडिया में अभी बस हार्डवेयर प्रोभाडर कंपनी जैसे है ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">3. अरे भाई मजाक नहीं कर रहा हूँ  &#8211;  हजारों मोबाइल के टावर लगे है &#8211; पुरा हाई टेक है । झुग्गी &#8211; झोपड़ी में लैपटाप हैं । अब भी झुग्गी ही भोट-बैंक है भाई । सबकी आदर है यहाँ । बिजली के तार और हजारों किलोमीटर लाईन, &#8211; कोई जरुरत नाहीं । सबके &#8211; सब बन गये हैं सोलर पावर । उर्जामंत्री जी सुर्य भगवान के पक्के पुजारी है । हिन्दुस्तान के दिनों में बिजली के तारों की चोरी से परेशान, उन्ही को स्वपन में सोलर पावर का आईडिया दिखा है । वैसे सड़क की हालत कागजों पर अब भी एकदम झकास है &#8211; वास्तविकता की चिंता हमें नहीं हैं &#8211; हमारी तो आदत हमेशा से ही ऐसी थी । अब हमलोगों की सड़क यात्रा में फिजीकल फिटनेस हो जाता है ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">4. सड़क यात्रा से याद पड़ा, वैसे भी कौन किसके घर जाता है । हमारी पड़ोस की चाचीजी और उनकी सारी पड़ोसिनें चाट कंफ्रेस करती है ।  फिर जब किसी को कुछ मौका आता है याद दिलाने का तो पिछला चाट कट-पेस्ट करती है । वैसे उनका आजकल चैट का टापिक है &#8211;  यादव जी के बेटे की शादी लेकर । अमुक यादव जी की बेटे की शादी , झा जी के बेटी से हो रही है । लगे हाथ कह दू कि आजकल जात-पात वाली बात नहीं है । लेकिन प्राबलम एक ही है &#8211; वे कहते है लड़के ने कभी धोती पहनी ही नहीं और लड़की ने साड़ी । एक और प्रश्न यहाँ भी है कि पंडित जी मोबाईल से मंत्र नहीं पढ़ सकते हैं क्या ? ज्यादातर औरतें कंफ्रेस में तो अच्छी बातें बोलती है पर, एक दुसरी की चुगली प्राइवेट मैसेज देकर कर लेती है ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#000099;">5. बहुत लिख लिया भैया, भुख भी लगी है । अपने को तो सैंडबीच के ममेरे भाई &#8216;पावबीच&#8217; से काम तो चलता नहीं सो कुछ पराठे के लिए एस एम एस बगल के होटल वाले को करता हूँ । वैसे &#8216;पावबीच&#8217; के बारे में क्या बोलुँ मैं &#8211;  दरअसल आजकल सुबह में मेरी मिनी दो पाँवरोटी &#8211; उफ्फ्, दो पावरोटी के बीच में टमाटर &#8211; हरा धनिया डालकर खाती है । कहती है कैलोरी कम होता है उसमें । अपने को तो सत्तु घोलकर मिलता नहीं सो हम भी हेल्थ ड्रिंक में सत्तु फ्लेवर डालकर पीते हैं । जब मुझे मन होता है खीर खाने का तो उसे सुपर मार्केट से खरीद लाता हूँ &#8211; नानीजी का, पैकेट में बिकता है । आई मिन नानीजी खीर बेचती नहीं । डब्बे पर कंपनी का नाम लिखा रहता है &#8211; नानीजी ।</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चमत्कार का व्यापार होता है यहाँ ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/07/16/%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9/</link>
<pubDate>Mon, 16 Jul 2007 17:19:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[(यह व्यंग्य रचना काल्पनिक तथा किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है ) देखो वही अपनी जिन्दगी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>(<strong>यह व्यंग्य रचना काल्पनिक तथा किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है )</strong><br />
देखो वही अपनी जिन्दगी में चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठा है, ऐसे बहुत कम लोग दिखाई देंगे जो अपनी जिन्दगी में किसी चमत्कार की आशा में चुप बैठता हो।<br />
बेटा या बेटी मैट्रिक क्या पास करते हैं माता-पिता उसके इंजीनियर, डोक्टर ,कलेक्टर और एस।पी।होने की आशा संजोये रखने लगते हैं। सब लोगों की बात मैं नहीं कह सकता पर अधिकतर लोग उसके विवाह के सपने देखते हैं । बेटा है तो सोचते हैं इतना दहेज़ मिल जाएगा कि रिश्तेदार,मित्र,आस-पडोस और समाज भी क्या कहेगा ? यार उनका लड़का भी क्या हीरा है? अगर बेटी है तो लोग सोचते हैं कि उसकी कहें नौकरी लग जाये तो हो सकता है कि बिना दान-दहेज़ के उसकी शादी हो जाये तो लोग कहें देखो अपनी लडकी को इतना लायक बनाया कि उसकी बिना दहेज़ की शादी हो गयी।</p>
<p>केवल यही नहीं लोगों के मन में अधिक और अधिक धन कमाने की प्रवृति स्वाभाविक रुप से होती है जो सौ रूपये रोज कमा रहा है वह हजार के , जो हजार कमा रहा है वह लाख और जो लाख रोज कमा रहा है &#8212;&#8211;अब यह फेह्स्त बहुत लंबी हो जायेगी। मेरी बात पर यकीन नहीं हो तो बाबाओं और फकीरों के यहां लगने वाली भीड़ को देखिए &#8212;-सायकिल वाले से लेकर कार वाले तक वहां तक पहुंचते हैं। गरीब का तो समझ में आता है पर अमीर लोग भी वहाँ पहुंच जाते हैं -कहा जाता है कि पैसे से सारे काम हो जाते हैं, फिर भी अमीरों का वहां देखकर गरीबों को समझ में नहीं आता कि जब पैसे वाले भी सुखी नहीं है तो कौन खुश रह सकता है? फिर भी लाईन में लगा रहता है जबकि अपने सामने देख रहा है कि पैसे वाले को उस जगह बिना लाईन के वहां प्रवेश मिल रहा है -उल्टे वह सोचता है कि वह सिद्ध बाबा कोई चमत्कार कर दे तो मैं भी ऐसे ही दर्शन करूंगा। मतलब चमत्कार!बस चमत्का किसी भी तरह से होना चाहिए.</p>
<p>एक तरफ लोग हैं कि चमत्कार के लिए मरे जा रहे हैं, पर कोई स्वयं चमत्कार नहीं करना चाहता है । अरे, भाई तुम जब तक स्वयं चमत्कार नहीं करोगे तब तक कोई और तुम्हारे लिए चमत्कार क्यों करेगा?</p>
<p>तुम कभी सोचते हो कि अपनी थाली से रोटी निकालकर किसी बेजुबान पशु को दें-जब तुम उसे रोटी दोगे तो वह उसके लिए चमत्कार जैसा है। क्या कभी तुम किसी गरीब मजदूर के घर जाकर उसके बच्चे को नए वस्त्र देते हो? उसके लिए यह चमत्कार जैसा नहीं होगा?<br />
फिर भी नही समझते तो मैं तुमसे सवाल करता हूँ कि क्या तुमने कभी ऐसे चमत्कार देखे हैं जिस पर हम जैसा कोई फ्लाप लेखक कहानी लिखकर सुपर हिट हो गया हो। अगर आपने कुछ ऐसे चमत्कार देखे हैं तो मेरे इस ब्लोग में कमेन्ट में रख दें , मुझे बड़ी ख़ुशी होगी । क्योंकि मुझे लगता है अब इस देश में चमत्कार होते नहीं दिखते जो कर सकते हैं वह स्वयं ही इनके चक्कर में घूम रहे हैं, अगर आपने इस तरह का कोई चमत्कार कह तो फिर मुझे आपके चमत्कार की उम्मीद करने पर कोई आपत्ति नहीं है।</p>
<p>।१।क्या आपने सुना है कि कोई बूढा हो चूका अभिनेता अब निर्माता बनकर अपने बेटे की बजाय किसी बाहर के लड़के को अपनी फिल्म का हीरो के रुप में ले रहा हो या कोई निर्माता किसी पुराने अभिनेता के बेटे की जगह किसी गाँव से लड़का लाकर उसे हीरो बना रहा है। ऐसा भी नहीं होता कि कोई निर्माता अपनी फिल्म के लिए बस कंडक्टर को हीरो बना रहा हो , यह हो भी कैसे सकता है आजकल कोई निर्माता भला बस में सफ़र करता है ? मैं देख रहा हूँ कि बिचारे लड़के गली-मुहल्लों में खाली -पीली एक्टिंग करते फिर रहे हैं कि शायद कोई निर्माता उन्हें देखकर अपनी फिल्म के लिए अनुबंधित कर ले। उन पर तरस आता है</p>
<p>।२।क्या आपने सुना है कि किसी राजनीतिक पार्टी के नेता ने अपने बेटे-बेटी, पत्नी, बहु और दामाद के अलावा परिवार के बाहर के आदमी को पार्टी के अध्यक्ष पद या मुख्यमंत्री पद के लिए नियुक्त करनातो दूर ऐसा करने का सोचा भी है?<br />
३।क्या आपने सूना है कि किसी बडे संत या धर्मं स्थान के प्रमुख ने अपने बेटे के अलावा अपने किसी अन्य शिष्य को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया हो<br />
।४।क्या आपने सुना है कि भारतीय क्रिकेट चयन समिति का कोई मेंबर किसी गली मुहल्ले में जाकर किसी खिलाड़ी का चयन करके लाया हो और उसे टेस्ट मैच खिलाया हो।<br />
४। क्या आपने सूना है कि किसी निज-पत्रक लेखक को कोई पुरस्कार मिला है। हालांकि मैं यह उम्मीद तो कर्ता हूँ कि कभी न कभी तो किसी को मिलेगा पर मुझे&#8230; कभी नही।<br />
नहीं सुना तो भूल जाओ और सुना है तो यह चमत्कार सबके साथ नही होता-वैसे कोई कहे कि किसी के साथ हुआ है तो झूठ बोल रहा है क्योंकि वह चमत्कार प्रायोजित ही हो ससकता है ।सो मेरे दोस्तो भूल जाओ अब यहाँ चमत्कार नही होते ।खेलो, ख़ूब खेलो, नाचो, ख़ूब नाचू, भजो और ख़ूब भजो पर चमत्कार की उम्मीद नहीं करना। थी जिन्दगी में खुश रह पाओगे । वरना पूरी जिन्दगी चमत्कारी बाबाओं के पीछे लगते कट जायेगी। चमत्कार का भी व्यापार होने लगा है सो बचकर रहना।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[देवराज इन्द्र ने कहा- चलते रहो, चलते रहो ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/07/13/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 13:52:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[देवराज इंद्र द्वारा राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को उपदेश के रुप में संस्कृत में दिए गये श्लोक का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><font size="2">देवराज इंद्र द्वारा राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को उपदेश के रुप में संस्कृत में दिए गये श्लोक का हिंदी में अर्थ )</font></strong></p>
<ol>
<li>
<p align="left">श्रम से थककर चूर हुए बिना किसी को धन संपदा प्राप्त नहीं होती। बैठे-बिठाये पुरुष को पाप धर दबोच लेता है। इंद्र उसी का मित्र है, जो चलता रहता है-थककर, निराश होकर बैठ नहीं जाता। इसीलिये चलते रहो।</p>
</li>
<li>
<p align="left">जो व्यक्ति चलता रहता है उसकी पिंडलियाँ (जांघें) फल देतीं हैं (अन्य लोगों से उसको सेवा प्राप्त होती हैं)। उसकी आत्मा वृद्धिगंत होकर आरोगयादी फल की भागी होती है तथा धर्मार्थ प्रभासादी तीर्थों में सतत चलने वाले के अपराध और पाप थककर सो जाते हैं, अंतत: चलते रहो।</p>
</li>
<li>
<p align="left">बैठने वाले की किस्मत बैठ जाती है और चलने वाले का भाग्य उतरोत्तर चमकने लग जाता है। अत: चलते रहो।</p>
</li>
<li>
<p align="left">सोने वाला पुरुष मानो कलियुग में सोता है, अंगडाई लेने वाला व्यक्ति द्वापर में और उठकर खड़ा हुआ व्यक्ति त्रेता में पहुंच जाता है। आशा और उत्साह के साथ अपने निश्चित मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के सामने सतयुग उपस्थित हो जाता है, अंतत: चलते रहो।</p>
</li>
<li>
<p align="left">उठकर कमर कसकर चल पड़ने वाले पुरुष को ही मधु मिलता है। निरन्तर चलता हुआ व्यक्ति ही फलों का आनन्द प्राप्त करता है;सूर्यदेव को देखो सतत चलते रहते हैं, क्षणभर भी आलस्य नहीं करते। इसलिये जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक मार्ग के पथिक को चाहिए कि बाधाओं से संघर्ष करता हुआ चलता ही रहे,आगे बढ़ता ही रहे।</p>
</li>
</ol>
<p align="center"><strong>(&#8216;कल्याण&#8217; से साभार )</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भय कोई सोने का सिंहासन नहीं होता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/07/07/%e0%a4%ad%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sat, 07 Jul 2007 11:29:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/07/07/%e0%a4%ad%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[एक भय है जो भयभीत पर शासन करता है जो जितना होता है ज्यादा भयग्रस्त उतनी ही निर्भयता की बात जोर से कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.hindiblogs.com"><img src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>एक भय है<br />
जो भयभीत पर<br />
शासन करता है<br />
जो जितना होता है<br />
ज्यादा भयग्रस्त<br />
उतनी ही निर्भयता की<br />
बात जोर से करता है<br />
जो जितनी निर्भयता की<br />
बात करे<br />
समझो उतना ही डरता है</p>
<p>खोने की कोई जिसे आशंका नहीं<br />
वह हर संकट का सामना<br />
सहजता से करता है</p>
<p>भय का शत्रु है संघर्ष का भाव<br />
जीवन की आत्मा है संघर्ष<br />
जो आगे बढकर जिंदा रहने की<br />
दृढ-इच्छा से ही आता है<br />
जिन्हें &#8216;आराम&#8217; की चाह है<br />
भय की चादर ढँक लेती है<br />
सुख सुविधाओं का मोह<br />
उन्हें डरपोक बना दिया करता है</p>
<p>तुम चाहो या नहीं<br />
जिन्दा रहने के लिए<br />
अनवरत संघर्ष करना होगा<br />
भय कोई सोने का सिंहासन नहीं<br />
जिस पर तुम चेन से बैठ सको<br />
&#8216;संघर्ष&#8217;की मशाल ही कर सकती है<br />
तुम्हारे जीवन में प्रकाश<br />
जिसके अंतर्मन में भय नहीं<br />
वही इंसानों की तरह<br />
अपना जीवन जिया करता है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भयभीत पर उसका भय ही करता है शासन-chintan]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/28/bhaybheet-par-bhay-hi-karta-hai-shasan/</link>
<pubDate>Thu, 28 Jun 2007 15:54:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/28/bhaybheet-par-bhay-hi-karta-hai-shasan/</guid>
<description><![CDATA[मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है&#8217;भय&#8217;! सभी व्यक्ति किसी न किसी से डरते हैं। मनुष्य पर कोई शासन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><span></span><span>मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है&#8217;भय&#8217;! सभी व्यक्ति किसी न किसी से डरते हैं। मनुष्य पर कोई शासन करता है तो उसके अन्दर मौजूद &#8216;भय का भाव&#8217;!इसीलिये शासन करने वाले उसे हथियार की तरह उपयोग में लाते हैं। </span></p>
<p align="left"><span>           </span></p>
<p align="left"><span> पूरा यहाँ पढ़ें </span><span><a href="http://dpkraj.blogspot.com/2007/06/blog-post_26.html">भयभीत पर उसका भय ही करता है शासन-चिन्तन</a> </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मुख, मुखौटा और सिंहासन-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/21/mukh-aur-mukahuta-hindi-poem/</link>
<pubDate>Thu, 21 Jun 2007 04:11:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मुखों की बैठक में सिंहासन पर मुखोटा रखने का मसला उठा था सबके चेहरे थे दागदार चुनाव के जुए में लोगों]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center">मुखों की बैठक में सिंहासन पर<br />
मुखोटा रखने का मसला उठा था<br />
सबके चेहरे थे दागदार</p>
<p align="center">चुनाव के जुए में<br />
लोगों को भरमाने के लिए<br />
सुन्दर चेहरा जरूरी था
</p>
<p align="center"> please klick here</p>
<p align="center"><a href="http://anantraj.blogspot.com/2007/06/blog-post_17.html">मुख, मुखौटा और सिंहासन</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिन्तन और ज्ञान ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/18/%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Mon, 18 Jun 2007 15:20:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                अपनी इच्छाओं और आशाओं की सतत पूर्ती को ही मनुष्य वास्तविक सुख समझता है -उसे लगता है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>                अपनी इच्छाओं और आशाओं की सतत पूर्ती को ही मनुष्य वास्तविक सुख समझता है -उसे लगता है कि उसकी आत्मा केवल पाने से ही सन्तुष्ट होती है ।<br />
                इच्छाओं और आशाओं की पूर्ती का यह खेल जीवन भर चलता है पर आदमी कभी सुख नहीं ले पाता । एक इच्छा पूरी होती है दूसरी उत्पन्न हो जाती है । जब बहुत गर्मी पड़ती थी तब हमें याद है कि पंखा बहुत गर्म हवा देता था तब कुछ लोगों के पास ही कूलर होता था पर आदमी उस गरमी को झेल कर भी अपने सारे काम करता था । धीरे कूलर का फैशन चला फिर टीवी और फिर बायिक और अब कार की सुविधा आसानी से उपलब्ध है । कहते हैं विकास हो गया । पूरी दुनियां एक दुसरे के करीब आ गयी है । पर क्या सुख आ पाया, क्या गरीब का शौषण ख़त्म हो गया ? यह प्रश्न हैं जो हमारे अन्दर उठते हैं । इन प्रश्नों का उत्तर हम खोजने की बजाय केवल तथाकथित विकास पर खुश होकर रह जाते हैं ।</p>
<p>                   अगर हम आज की सुख सुविधाओं को देखे तो उसने शारीरिक रुप से राहत हमें जरूर दीं है उसका लाभ उठाकर जहां हमें अपने अन्दर चिन्तन, मनन और आत्ममंथन की क्षमता विक्सित करना चाहिऐ थी । हुआ इसका उल्टा हे और हमें जो आराम मिल तो उसमे इतना खो गये कि हमने सोचना और विचार करना कम कर दिया और हालत यह कि आज की नई पीढी को जो अपने संस्कारों और संस्कृति का ज्ञान देना चाहिए वह नहीं दे रहे और परिणाम यह सामने आ रहा है कि उसकी बुध्दी में ज्ञान प्राप्त करने की तीक्ष्ण भाव तो है पर उस ज्ञान को स्थापित करने और उसका उपयोग करने के लिए जो चिन्तन चाहिऐ वह उसमें नहीं है .</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िन्दगी के बदलते रंग ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/15/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Fri, 15 Jun 2007 16:57:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/15/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97/</guid>
<description><![CDATA[उनके इन्तजार में गुजारे कयी बरस जिन्हें कभी हमारी याद न आयी जब वह आये हमारे घर  उनका बदल रुप देखकर ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p class="post-body">
<p align="center">उनके इन्तजार में गुजारे कयी बरस</p>
<p align="center">जिन्हें कभी हमारी याद न आयी</p>
<p align="center">जब वह आये हमारे घर</p>
<p align="center"> उनका बदल रुप देखकर लगा कि</p>
<p align="center">इससे तो इन्तजार ही अच्छा था</p>
<p align="center">उनका चेहरा देखकर यूँ लगा</p>
<p align="center">इससे तो उनका ख़्याल में ही</p>
<p align="center">रहना अच्छा था</p>
<p align="center">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p align="center">वह कहते हैं हमसे हमसे बात करो</p>
<p align="center">उनके मुख से निकले शब्द</p>
<p align="center">तो ही हम कोई जवाब दें</p>
<p align="center">वह श्रृंगार रस में अपने शब्द</p>
<p align="center">नहलाने का दावा करें</p>
<p align="center">पर हमें लगते हैं वीभत्स</p>
<p align="center">उनके अलंकारों में होती है</p>
<p align="center">तलवार जैसी धार</p>
<p align="center">भारी-भरकम , लंबे वाक्य और</p>
<p align="center">उबा देने वाले व्याख्या</p>
<p align="center">सब तर्कहीन और अर्थहीन</p>
<p align="center">कुछ समझें तो बोलें हम</p>
<p align="center">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p align="center">सपना टूटने का इतना गम नहीं होता</p>
<p align="center">जितना सच के कठोर होने का</p>
<p align="center">इसलिये कहते हैं कि सच के साथ</p>
<p align="center">जीवन गुजारना सीखो</p>
<p align="center">सपने तो चाहे जैसे जब देखो</p>
<p align="center">पर जीवन से परे ही समझो</p>
<p align="center">सबके सपने साकार होते तो</p>
<p align="center">इन्सान देवता बन गया होता</p>
<p align="center">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी कभी भटकता है मन मेरा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/08/%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Fri, 08 Jun 2007 16:09:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/06/08/%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[कभी मन उदास हो जाता है लगता है कहीं बैठकर उसे बहलाऊँ उसे मैं सहलाऊँ शरीर थकान से भरा लगता है सोचता ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कभी मन उदास हो जाता है<br />
लगता है कहीं बैठकर<br />
उसे बहलाऊँ<br />
उसे मैं सहलाऊँ<br />
शरीर थकान से भरा लगता है<br />
सोचता हूँ उसे आराम दिलाऊँ<br />
आह भरता हूँ कि<br />
कोइ मुझे सहलाए<br />
कोइ अपने शब्दों से<br />
मुझे तसल्ली दिलाये<br />
कोइ पूछे दर्द मेरा<br />
कोई मेरे खालीपन में<br />
बहार बन कर छाये<br />
आकाश की तरफ आंख उठाकर<br />
देखता हूँ एकटक<br />
फिर सोचता हूँ कोई मेरे लिए<br />
अपने मन के दरवाजे क्यों खोलेगा<br />
मैंने किसे सहलाया है<br />
मैंने किसे बहलाया है<br />
अगर किसी के लिए<br />
कुछ किया भी होगा<br />
तो अपने स्वार्थों की पूर्ती लिए<br />
मैं उठ कर खड़ा होता हूँ<br />
चल पडता हूँ उस दलदल में<br />
जहाँ से निकला आया था<br />
सोचता हूँ जाऊं तो कहॉ जाऊं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
वहीं चलकर जाता हूँ<br />
जहां मन ले जाता है<br />
कोई उम्मीद नहीं है<br />
कोई अरमान नहीं है<br />
फिर भी चला जाता हूँ<br />
मन को वश में करने की सारी<br />
कोशिशें होती हैं बेकार<br />
जितना करता हूँ<br />
उतना उसका गुलाम हो जाता हूँ<br />
इधर-उधर देखता हूँ तो<br />
लगता है कि फिर भी ठीक हू<br />
कम से कम<br />
मैं अपने मन से लड़ तो पाता हूँ<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जल बिन सब सून-भाई मेरे सुन और गुन ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/29/%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%94/</link>
<pubDate>Tue, 29 May 2007 16:51:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                               जळ बिन सब सून -यह सबने सुना है पर शायद हमारे लोग सुनते हैं तो बस सुनन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="color:#777;" class="postBody">                               जळ बिन सब सून -यह सबने सुना है पर शायद हमारे लोग सुनते हैं तो बस सुनने के लिए है और फिर भूल जाते हैं। अब गर्मी बढने लगी है और जल संकट कयी इलाकों में अपनी दस्तक दे चूका है और कयी जगह वह आने की तैयारी में है। अभी गर्मी की शुरूआत है जैसे-जैसे बढती जायेगी वैसे ही भू-जलस्तर कम होगा और साथ यह भी कि लोगों की खपत भी बढती जायेगी । जब मैं अपने देश में जळ की खपत का आंकलन करता हूँ तो लगता है कि पीने, कपडे धोने या नहाने से अधिक अन्य चीजों को धोने में ज्यादा खर्च किया जाता है।</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">                      लोगों ने अपने घरों और दुकानों के बाहर पेड-पौधे को काटकर सीमेंट और लोहे के बुत खडे कर दिए हैं और सुबह शाम उन पर छिड़काव करते हैं। दम्ब्रीक्रत सड़क पर पानी डालते हैं, इतना नहीं जानते कि पानी उसे हानि पहुँचाता है। एक सज्जन सड़क पर पानी फैंक रहे थे मैंने उनसे कहा -&#8221;जनाब आप इस जल संकट के दिन है आप इसे सड़क पर क्यों फैला रहे हैं?&#8221;</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">                      वह बाले_&#8221;क्या करे सड़क पर धुल जमा है, और फिर थोडा ठंडक हो जायेगी । पानी का क्या है? हमारी तो अपनी बोरिंग है।</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">               मैंने कहा -&#8221; आपकी बोरिंग है पर पानी तो आपके हाथ में नहीं है। वह तो नीचे बह रहा है। अगर स्टॉक खत्म हो गया तो आपको भी परेशानी होगी। और यह पानी दंबर की सड़क को काटता है। वैसे ही सड़कें बड़ी मुशिकल से बन पाती हैं।</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">                   वह बोले-&#8221;क्या करना ? सड़क भी बन जायेगी ।</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">               मतलब यह कि हम नहीं सुधरेंगे । जब पानी नहीं मिलता तो रोने लगते हैं- कराहते हैं। घर में बोरिंग है पर बाकी पूरा इलाका सीमेंट और पत्थर से ढका है अन्दर कहीं पानी और हवा जाने का रास्ता नहीं है। पानी का मनमाना उपयोग करने की ऎसी आदत हो गयी है कि न गर्मी दिखती है न सर्दी । अब जल संकट का भी यह हाल है कि अब केई जगह सर्दी में भी अपना उग्र रुप दिखाता है। जल जीवन है पर सुनकर अनसुना करने की प्रवृति ने इस देश को पानी के लिए तरसाना शुरू कर दिया है जिसके बारे में पूरी दुनिया में कहा जाता था कि भारत में दूध की नदियाँ बहती हैं। हां, इतना जरूर है दूध में पानी की मात्रा अच्छी मिल जाती ही।</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">              इलेक्ट्रोनिक सामानों के उपयोग ने पानी के दोहन और उपभोग को बढावा दिया है तो प्रकर्ति का भी भारी शोषण हुआ है, और संकट की भनक सबको है पर जिनके पास पानी नहीं है वह सरकार को कोसकर अपना मन हल्का कर लेते हैं और जिनके पास है वह मदांध हो रहे हैं। अपनी कारों और स्कूटरों को वह भी सडकों पर धोते हैं , पानी का नाजायज उपयोग और सड़क की क्षति दोनों अपराध एक साथ करने में किसे संकोच हो रहा है। हम नहीं सुधरेंगे पर हमारा दर्शन कहता है जब जब इस धरती पर बोझ बढता है तो भगवान उसे हल्का करते हैं।</p>
<p style="color:#777;" class="postBody">                प्रसिध्द अर्थशास्त्री मोल्थ्स का भी यही कहना है जब इन्सान अपने पर नियंत्रण नहीं करता है तो प्रकृति उस पर नियंत्रण करती है। यह जल संकट इसी तरह हमारे ही लापरवाही और अज्ञान का परिणाम है।</p>
<form method="post" action="/post-delete.do" name="deletePost"></form>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बुरी आदतों से राहत नहीं मिलती ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/27/%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%a4-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Sun, 27 May 2007 10:04:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                        हम सारा दिन किसी न किसी काम में लगे रहने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अपने जी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                        हम सारा दिन किसी न किसी काम में लगे रहने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अपने जीवनयापन के लिए ऐसा करना जरूरी है । इसके आलावा अपने मन को भी कहीं न कहीं लगाना होता है और इसके विकल्प के रुप में काम करते रहना आ वश्यक लगता है । इस प्रयास में हम कई ऐसे काम करते हैं जो आख़िर स्वयं के लिए तकलीफदेह साबित होते हैं-जैसे किसी की अनावश्यक निंदा करना या किसी और व्यक्ति का धन, वैभव और प्रतिष्ठा देखकर उसके बारे में चिन्तन करना। यह सब नहीं करते तो कोई व्यसन पाल लेते हैं जैसे तंबाकू खाना और सिगरेट पीना । कुछ लोग तो शाम को थकावट मिटाने के नाम पर अपने बीबी-बच्चों के सामने ही शराब पीने लगते हैं , इस बात की चिन्ता किये बिना कि इससे उन पर क्या दुष्प्रभाव पडेगा? ऐसा नहीं है कि यह आदतें केवल पुरुष ही पालते हैं -कई महिलाओं में भी ऎसी आदतें होती हैं &#8211; अंतर बस इतना होता है कि महिलाएं छिपकर ऐसे व्यसन करती है ताकि समाज में उनकी बदनामी ना हो पर अपने बच्चों से वह भी छिप पातीं-और अंतत: उन पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है । हम यह सोचते हैं कि इन व्यसनों से मानसिक तनाव कम होता है पर यह हमारा भ्रम होता है , चिकित्सा वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सुख क्षणिक है और कालांतर में यह आदमी की मानसिक शक्ति को हानि पहुँचाता है और वह डरपोक, शक्की और भुलक्कड़ होता जाता है।</p>
<p>                 कुछ तो इतने भयकर रुप से मनोरोगी हो जाते हैं न तो उन्हें स्वयं और न ही परिवार वाले इसे समझ पते है और कहीं इसे उम्र का तकाजा और कहीं इसे स्वभाव तो इसे तात्कालिक स्थिति मानकर टाल दिया जाता है। इस उपेक्षा का यह नतीजा यह होता है लोग धीरे धीरे संपर्क या तो कम करने लगते है या फिर समाप्त ही कर देते हैं। पराए लोग तो छोड़ें अपने ही लोग कन्नी काटने लगते है और कहते हैं उसे तो कोई काम नहीं वह तो केवल शराब पीता है चर्सी है , सारा दिन तंबाकू खाता है या सिगरेट पीता है,उससे बात करने का कोई फायदा नहीं है।इस तरह समाज में हमारा रुत्वा कम होता जाता है और हमारी मनोदशा और खराब होने लगती है और ऐसा लगता है कि हमने जिनके लिए इतना किया या कर रहे हैं वह हमारा सम्मान नही कर रहे हैं और हम क्रोध के वशीभूत होते जाते है यानी अपनी बीमारी और मानसिक तनाव बढाते हैं , पर न कोई हमें समझता है और न हम समझते है यह हो क्या रहा है , यह सब हमारे व्यसन की वजह से होता है।व्यसनों के उपयोग में फंसा आदमी जब भी तनाव में होता है उसके सहारे अपने को बचाना चाहता है क्षणिक रुप से यह अच्छा लगता है पर बाद में फिर वैसी हालत ही हो जाती है  कभी कभी उससे भी बदतर।</p>
<p>               व्यसन के उपयोग से जितनी जल्दी तनाव खत्म होता है उसका प्रभाव घटते ही उससे ज्यादा तेजी से बढने लगता है । मैं अपने आसपास जब युवकों को व्यसनों में फंसा देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वह अपना जीवन आगे कैसे तय करेंगे। एक बार मेरी पहचान का एक युवक सिगरेट पी रहा था , तब बातचीत करते हुए उससे पूछा -&#8221; तुम सिगरेट क्यों पीते हो ?&#8221;</p>
<p align="center">उसका जवाब था कि -&#8221;इससे टेंशन कम होता है ।&#8221;</p>
<p align="center">मैंने पूछा-&#8221;तुम्हें कैसा टेंशन है , और अभी तो तुम्हारी शादी को केवल एक महीना हुआ है ।&#8221;</p>
<p align="center">वह हंसकर बोला-&#8221; अपना टेंशन किसी को नहीं बताना इसीलिये तो सिगरेट पी रहा हूँ।</p>
<p align="center">मैंने पूछा-&#8221;तुम्हारे पापा भी सिगरेट पीते हैं?&#8221;</p>
<p align="center">वह बोला-&#8221;हाँ, मैंने तो उनके पैकेट से ही तो सिगरेट निकालकर पीना सीखा है।</p>
<p align="left">                              फिर थोडी देर चुप रहने के बाद वह बोला -&#8221; पर साहब, कहते हैं कि सिगरेट पीने से टेंशन कम होता है पर शुरू में लगता था पर अब नहीं लगता।</p>
<p align="left">               फिर पीते क्यों हो?&#8221;मैंने पूछा</p>
<p align="left">                वह बोला-&#8221; अब तो यह मेरी आदत बन गयी है और नहीं पीता हूँ तो दिमाग ही काम नहीं करता। बहुत सोचता हूँ कि यह आदत छोड़ दूं पर मुश्किल लगता है।</p>
<p>मुझे उसकी बेबसी पर दुःख हो रहा था तो उसके पिताजी पर गुस्सा भी आ रहा था जिनकी वजह से उसे यह आदत पडी। इस तरह एक नही कई लोग है जो अपने बच्चों में भी ऎसी आदतें भर देते है जो उनके जीवन के लिए तकलीफदेह होती हैं। शेष अगले अनके में</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक भक्त की कलम से ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/26/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 26 May 2007 08:24:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                    हर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                    हर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है और कोई नही । जब आदमी बच्चा होता है तब उसके माता पिता जिस इष्ट की आराधना करते हैं, धीरे धीरे वह उसके मन में दाखिल होकर उसका स्वामी हो जाता है। हां, अपने कामकाज और अन्य कारणों से आदमी उसके प्रति उदासीन हो जाता है पर जब उसकी कोई उसकी चर्चा करता है तो उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है-और अगर कोई उसकी निंदा करे तो उसे गुस्सा आ जाता है।</p>
<p>              चूंकि अधिकांश लोग इस संसार में ही ज्यादा मन लगाते हैं तो अपने इष्ट की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं और उनकी मन स्थिति कमजोर हो जाती है और अगर उसे कोई यह कहे के अमुक आदमी ने तुम्हारे इष्ट का अपमान किया है तू वह उत्तेजित हो जाते है । अब कुछ नाराज होकर तथाकथित रुप से शाब्दिक रुप से अपने क्रोध का प्रदर्शन कर रह जाते हैं तो कुछ अपनी शार्रीरिक शक्ति का उपयोग करने लग जाते हैं। भारत का आदमी धर्म के बारे में बहुत संवेदनशील है और यहां इसी वजह से धर्म के ठेकेदार ज्यादा ही है जो गाहे-बगाहे अपने स्वार्थों के लिए ऐसे फसाद कराते रहते हैं जिससे उनका प्रभाव न केवल अपने समाज में बल्कि दुसरे समाजों में भी बना रहे ।</p>
<p>                     यही कारण है कि विश्व में आध्यात्मिक गुरू कहलाने के बावजूद हमारे देश के लोगों की छबि रूढ़ वादी और अंधविश्वास के कारण अच्छी नहीं बनी है। जो मेरा इष्ट है वही तुम्हारा भी इष्ट है यह हम सब मानते हैं, फिर आख़िर यह झगडा क्यों होता है? केवल इसीलिये हे न कि उसके स्वरूप हम अलग देखते हैं। हम दावा करते हैं कि हम अपने इष्ट को मानते है पर हम उस इष्ट को अपने हृदय में धारण कितना करते हैं यह कभी सोचा ही नहीं । नाम लेकर नामा बटोरने चल पड़ते है और सोचते हैं कि हो गया हमारा जीवन धन्य !</p>
<p>                  हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए हैं कुछ को अवतार कहा जाता है तो कुछ को संत । यहां बता दें के हमारे समाज में संत और अवतार का दर्जा समान माना जाता है। क्योंकि संतों को गुरुओं के रुप में मान्यता मिलती है और कहा जता है कि गुरू ही गोविन्द के दर्शन कराते हैं इसीलिये वह बडे हैं। अवतारी पुरुष भी गुरू का सम्मान करना ही धर्म और भक्ती का एक हिस्सा मानते हैं-और यह बातें वही समझ पा ता है जो अपने इष्ट और गुरू को धारण करे। हमारे देश में कई गुरूओं के कई चेले मिल जाएंगे और अपने गुरुओं और इष्ट का बखान करेंगे जैसे आध्यात्म की बात न करके वाक्युध्दु कर रहे हौं ।</p>
<p>               अपनी भक्ती अपने मन में रखने की बात होती है लोग चिल्लाकर उसका बखान करते है और होता यह कि कई जगह तो इस बात पर बात-बात में सामुहिक झगडा हो जाता है किसका इष्ट बड़ा है। मैं अपने इष्ट और गुरू के बारे में मानता हूँ कि कोई उनके अपमान करने की ताकत ही नहीं रखता ! वजह साफ है कि मैं जानता हूँ कि मेरे इष्ट और गुरू मेरे मन में है कोई उन्हें देख ही नहीं सकता तो अपमान क्या खाक करेगा। अगर कोई व्यक्ति मुझसे आकर कहे कि अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे गुरू और इष्ट का अपमान किया है तो मेरे अन्दर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी -क्योंकि मैं समझता हूँ कि उस व्यक्ति के मन में कुछ ऐसा है जो वह अपना स्वार्थ सिध्द करना चाहता है-अगर सच्चा भक्त होता तो वहाँ से उठकर चल देता जहाँ निंदा रह रही थी। वह मुझसे अगर यह कहेगा कि तुम्हारा और मेरा इष्ट और गुरू है एक है और चलकर उस निंदक से लड़ते हैं तो भी मैं उसकी बात पर ध्यान नही दूंगा क्योंकि जिस इष्ट को मैंने धारण किया है उसके चरित्र से सीखा है कि आदमी को सहज भाव का त्याग नहीं करना चाहिए और युध्द अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि कुशलता से जीते जाते है और कभी कभी तो एसी कुशलता दिखानी चाहिए कि बिना हिंसा के ही युध्द जीत लिया जाये।</p>
<p>               मेरे गुरू ने मुझे सिखाया है कि दुष्ट लोग ही संतों और दुसरे के इष्ट पर आक्षेप करते हैं और वह लोग अपने पापों का बोझ इतना बड़ा लेते हैं कि एक दिन खुद उसके तले दबकर भारी तकलीफ में आ जाते हैं। कुल मिलाकर भक्ती बाहर दिखने की चीज नहीं है वह तो अपने मन में धारण करने के लिए है क्योंकि उससे हमारे विचार और भाव शुध्द रहते है। हमारे इष्ट और गुरू का कोई अपमान भी कर सकता है यह मानने का मतलब ही यही है कि हमारे भक्ति-भाव में कहीं कोई कमी है जो हम उत्तेजित हो जाते हैं। अपमान एक खराब शब्द है तो उससे हम सुने ही क्यों ? जितने भी गुरू हुए हैं वह यही कहते हैं कि बुरा मत कहों, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो -क्या हमें अपने इष्ट और गुरुओं की बात नहीं माननी चाहिए ।</p>
<p>                    मैं अपने जैसे भक्तों से मुखातिब हूँ जो बडे भावुक होते हैं और उम्मीद हैं वह मेरी बात समझ ही गये होंगें &#8211; भले ही उनके गुरू और इष्ट का स्वरूप अलग हो पर हैं तो भक्त ही न ! जो भक्ती के अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं देते और कुछ लोग उनकी इस तल्लीनता में भंग डालने के लिए ऐसे मसले लाते है जिससे उनकी भक्ती और समाज की शांति में खलल पडे। ऐसे भक्तो को मेरा प्रणाम इस सलाह के साथ कि वह अपने भक्ती में तल्लीन रहें किसी की बातों में न आयें ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[पुस्तकों का संग्रह, ज्ञान का प्रमाण नहीं ]]></title>
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<pubDate>Fri, 25 May 2007 14:18:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                        जब सामान्य आदमी के मन में हलचल होती है वह उसे शांत करने के लिए किसी ज्ञानी क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.hindiblogs.com"><img src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>                        जब सामान्य आदमी के मन में हलचल होती है वह उसे शांत करने के लिए किसी ज्ञानी की तलाश करता है ताकि वह अपनी जिज्ञासा को शांत कर सहज हो सके। वह उन ज्ञानियों के पास जाता है जिनके पास ज्ञान के पुस्तकों का भण्डार हैं और उन्हें अलौकिक शक्तियों द्वारा रचित होने का प्रचार किया जाता है। सामान्य आदमी चुंकि अपने सांसरिक कार्यों में व्यस्त रहता है तो उसके बुध्दी भी वही तक रहती है और सोच का दायरा भी अपने परिवार और समाज इर्द-गिर्द रहता है उसे लगता है जिनके पास ऎसी ज्ञान की पुस्तकें है उनके पास ज्ञान भी जरूर होगा। पर जिनके पास तथाकथित रुप से अलौकिक पुस्तकों का भण्डार है उनके पास कोई बहुद बड़ा ज्ञान है यह जरूरी नहीं है, हमारे आध्यात्म-दर्शन के मतानुसार पुस्तकों को खरीदा जा सकता है पर ज्ञान को नहीं।</p>
<p>                       कई लोगों ने ऎसी पुस्तकों का संचय इसीलिये भी किया है कि वह समाज में उसे पढ़कर अपने ज्ञानी होने का प्रमाण पेश कर सकें , और कहीं कहीं उन्हें समाज की ठेकेदारी भी मिल जाती है और वह सौम्य और गंभीर चेहरा बनाकर लोगों के सामने आते है और अपने ज्ञान का प्रदर्शन कर चलते जाते हैं। बदले में पाते हैं नाम, नामा और समान। उनके हाव-भाव देखकर ऐसा लगता है कि उनके पास ज्ञान का कोई खजाना है , पर यह उनका अभिनय होता है लोग उनकी बातों में आ जाते हैं और और धर्म और भक्ती का वही आशय स्वीकार कर लेते हैं जो वह बताते हैं। अपनी बुध्दी एक तरह से उनके पास गिरवी रख देते हैं और ऐसे लोग जब कभी उनका इस्तेमाल करते हैं। कहीं तो कहीं ऐसे लोग अशांति फैलाने वाले तत्वों को प्रोत्साहन देते हैं ताकि समाज उनके पास शांति की याचना लेकर आये और फिर वह दिखा सकें कि वह वाकई ज्ञानी हैं।</p>
<p>                ज्ञान कोई ऎसी वस्तु नहीं है जो किसी दुकान से खरीदा जा सके , न ही ज्ञान कोई ऎसी प्रवृति है जो किसी में न हो , हाँ बस यह कि अपने अन्दर उसके लिए चेतना लाना जरूरी है। जिनके पास सभी अलौकिक पुस्तकें हैं उनके पास ज्ञान भी है यह सोचना बेकार है क्योंकि ज्ञान का मतलब केवल उसे पढ़ना,सुनना, सुनाना और समझना-समझाना ही नहीं उसे धारण करना भी जरूरी है। ज्ञान का मतलब है कि हम उसे अपनाएँ भी वरना वह तो एक अक्षर ज्ञान से अधिक महत्व नहीं रखता।</p>
<p>               जिस तरह वाणिज्य,कला,और विज्ञान की उपाधि के बाद कुछ लोग अपने व्यवसाय् में लग जाते हैं और उनको मिली उपाधि उस शिक्षा के उपयोग न होने के कारण श्रीहीन हो जाती है पर जो उसके उस ज्ञान से संबंधित व्यवसाय से जुड़ जाते हैं उसका व्यवाहरिक अनुभव उन्हें उस क्षेत्र का विद्वान् या ज्ञानी बना देता है। वैसे ही जो ज्ञान की पुस्तकों का संग्रह करते हैं और अपना ज्ञान लोगों में बांटने का कम करते है उनका पहले आचरण भी देखना चाहिऐ कि वह उस पर अमल करते हैं या नहीं। अगर वह उन पुस्तकों से मिली शिक्षा पर अमल करते हैं तो वह वाकई ज्ञानी है और नहीं करते तो इसका मतलब यह कि उन्हें अक्षर ज्ञान है और उसका प्रभाव भी केवल सतही होता है। इसीलिये जब हम किसी को गुरू बनायें या किसी से किसी खास विषय पर ज्ञान प्राप्त कराने जाये तो यह देखना चाहिऐ कि वह वाकई ज्ञानी है या नहीं, कहीं केवल अभिनय तो नहीं कर रहा है इस देश में ज्ञान के नाम पर भ्रम बेचने वालों ली कमी नहीं है।शेष अगले अंक में</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[हिंदू धर्म में ज्ञान के साथ विज्ञान भी मौजूद है ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/23/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%82-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 23 May 2007 14:21:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                           पिछले कयी दिनों से देश में धर्म को लेकर अनेक तरह के विचार व्यक्त किये जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.hindiblogs.com"><img src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>                           पिछले कयी दिनों से देश में धर्म को लेकर अनेक तरह के विचार व्यक्त किये जा रहे हैं। एक खास बात जो सामने आ रही है युवा वर्ग में धर्म के प्रति रुझान बढ रहा है । इसका मुख्य कारण यह है कि आजकल घरों में उनको ऐसा धार्मिक माहौल नहीं मिल रहा जैसे पहले वाली पीढ़ी को मिलता था, इसके अलावा उन्हें बाल्यावस्था में ही ऐसे भौतिक साधन मिल रहे हैं जिनसे अमेरिकी अब अपने यहां बोरियत अनुभव करने लगे हैं , उनसे उकताने के बाद जब युवक और युवतियां कहीं अध्यात्म पर चर्चा सुनते है तो उन्हें नवीन भाव का अनुभव होता है ।</p>
<p>                हालांकि आज के अनेक धर्म गुरू केवल अपनी स्वार्थ सिध्दी के कारण ही इस क्षेत्र मैं हैं , उनका उद्देश्य केवल अर्थोपाजन करना ही है न कि धार्मिक परंपराओं को बढ़ाने के लिए प्रयास करना -यही कारण है कि जितने भी धर्म गुरू हैं वह करोड़ों में खेल रहे हैं , फिर भी किया क्या जाये ? युवक-युवतियों को अपनी उकताहट दूर करने तथा मन में शांति के लिए उनके पास इन संतों के प्रवचन सुनने का अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। मैं देश में चल रहे माहौल को जब देखता हूँ जिसमें हिदू धर्म के प्रति लोगों के मन में तमाम विचार आते हैं पर उनका कोई निराकरण करने वाला कोई नहीं है।</p>
<p>                     धर्म के नाम पर भ्रम और भक्ती के नाम पर अंधविश्वास को जिस तरह बेचा जा रहा है, वह चिंता का विषय है । विरोध करने पर आदमी को नास्तिक और तर्क देने पर कडी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। हिंदू धर्म की को पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देखती है पर अपने ही देश में धर्म के ठेकेदोरों ने लोगों की बुध्दी का दोहन केवल अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर कर इसको बदनाम कर दिया। हिंदू धर्म के तमाम ग्रंथ हैं और उनमें कुछ ऎसी तमाम बातें है जो उस समय ठीक थीं जिस समय वह कहीं और लिखी गयी थीं, समय के साथ लोग उनसे बिना कहे दूर होते गये। पर जीवन के आर्थिक, सामाजिक , स्वास्थ्य और विज्ञान की दृष्टि से जितना हमारे ग्रंथों में हैं उतना किसी अन्य धर्म में नहीं है। हाँ, इस धर्म को बदनाम करने के लिए इसके विरोधी केवल उन बातों को ही दोहराते हैं जो किन्हीं खास घटनाओं या हालतों में लिखीं गयी थीं और आज अप्रासंगिक हो गयी हैं और लोग उन्हें अब दोहराते ही नहीं है। अब आप लोग कहेंगे कि इतनी सारी पुस्तकों के कारण ही हिंदु धर्म के प्रति भ्रांति फैली है तो मैं आपको बता दूं कि सारे ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत गीता में है। जिसने गीता पढ़ ली और उससे ज्यादा समझ ली उसे कुछ और पढने की जरूरत ही नहीं है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई संत या सन्यासी नहीं हूँ न बनूंगा क्योंकि गीता पढने वाला कभी सन्यास नही लेता ।</p>
<p>                वैसे भी आजकल केवल धर्म का ज्ञान होना इतना जरूरी नहीं जितना धर्म के व्यापार के लिए अच्छे प्रबंधक साथ में न रखना । इस पर ज्यादा प्रकाश विस्तार से मैं बाद में डालूँगा , आज मैं ज्ञान सहित विज्ञान वाले इस ग्रंथ में जो भृकुटी पर ध्यान रखने की बात कही गयी है वह कितनी महत्वपूर्ण है-उसे बताना चाहूंगा । शायद भारत में भी कभी इस बात की चर्चा नही हुई कि हिंदु धर्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है जो इतने सारे आक्रमणों के बावजूद यह बचा रहा है। अगर लोगों को यह लगता है कि हिंदू कर्म कान्ड भी धर्म का हिस्सा हैं तो मैं आपको बता दूं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहीं भी कर्मकांड के महत्व की स्थापना नहीं की । उन्होने गीता में ध्यान के सिध्दांत की जो स्थापना की वह आज के युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ध्यान वह शक्ति है जो हमें मानसिक और शारीरिक रुप से मजबूत करती है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।</p>
<p>              मैं अपने हिसाब से ध्यान की व्याख्या करता हूँ । अब तो अनेक पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं हिंदूं की असली शक्ति उनके ध्यान में है, और ज्ञान का केंद्र श्रीमदभागवत गीता में है । ध्यान क्या है पहले इस बात को समझ लें । हम सोते हैं और नींद लग जाती है तो लगता है आराम मिल गया पर आजकल की व्यस्त जिन्दगी में तमाम तरह के ऐसे तनाव हैं जो पहले नहीं थे । पहले आदमी सीमित दायरे में रहते हुए शुध्द चीजों का सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे और उनकी चिताएँ भी सीमित थीं इसीलिये उनका ध्यान नींद में भी लग जाता था । शुध्द वातावरण का सेवन करने के कारण उन्हें न तो ध्यान की जरूरत महसूस हुई और न गीता के ज्ञान को समझने की। हालांकि मैं अपने देश के पूर्वजों का आभारी हूँ कि उन्होने धार्मिक भावनाओं से सुनते-सुनाते इसे अपनी आगे आने वाली पीढी को विरासत में सौंपते रहे ।</p>
<p>                आज हमारे कार्य के स्वरूप और क्षेत्र में व्यापक रुप से विस्तार हुआ है और हम अपने मस्तिष्क के नसों को इतनी हानि पहुंचा चुके होते हैं कि हमें रात की नींद ही काफी नहीं लगती और हम बराबर तनाव महसूस करते हैं । रात में हम सोते हैं तब भी हमारा मस्तिष्क बराबर कार्य करता है और वह दिन भर की घटनाओं से प्रभावित रहता है। ध्यान हमेशा ही जाग्रत अवस्था में ही लगता है । ध्यान का मतलब है अपने दिमाग की सर्विस या ओवेर्हालिंग । जिस तरह स्कूटर कार मोटर सायकिल फ्रिज पंखा एसी और कूलर की सर्विस कराते हैं वैसे ही हमें खुद अपने दिमाग की भी करनी होगी। एक तरह से हमें अपना मनोचिकित्सक स्वयं ही बनना होगा।</p>
<p>                  जिस बात का जिक्र मैंने शुरू में नहीं किया वह यह कि मुझे याद है जब चार वर्ष पूर्व किसी अखबार में पढा था कि एक अमेरिकी विज्ञानिक का मत है कि हिंदूओं कि सबसे बड़ी ताकत है ध्यान । फिर भी भारत के प्रचार माध्यमों ने इसे वह स्थान नहीं दिया जो देना चाहिए था । यहां मैं ध्यान की विधि बताना ठीक समझता हूँ । सुबह नींद से उठकर कहीं खुले में शांत स्थान पर बैठ जाएँ और पहले थोडा पेट को पिच्काये ताकी हमारे शरीर में से वायू विकार निकल जाएँ और फिर नाक पर दोनों ओर उंगली रखकर एक तरफ से बंद कर सांस लें और दूसरी तरफ से छोड़ें। ऐसा कम से कम बीस बार करें और दोनों तरफ से सांस लेने और छोड़ने का प्रयास करें । उसके बाद बीस बार अपने श्री मुख से ॐ शब्द का जाप करे और फिर बीस बार ही मन में जाप करें और धीरे अपने ध्यान को भृकुटी पर स्थापित करें। जो विचार आते हैं उन्हें आने दीजिए क्योंकि वह मस्तिष्क में मौजूद विकार हीं हैं जो उस समय भस्म हो रहे होते हैं। यह आप समझ लीजिये । धीरे धीरे अपने ध्यान को शून्य में जाने दीजिए-न जा रहा है तो बांसुरी वाले के स्वरूप को वहन स्थापित करिये -धीरे स्वयं ही आपको ताजगी का अहसास होने लगेगा । अपने ध्यान पर जमें रहें उसे भृकुटी पर जमे रहने दीजिए । ऐसा नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जाता है आप जब भी तनाव और थकान अनुभव करे कहीं भी बैठकर यह करें। शुरूआत में यह सब थोडा कठिन और महत्वहीन लगेगा पर आप तय कर लीजिये कि मैं अपने को खुश रखने के लिए यह सब करूंगा ।</p>
<p>              कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर यह मेरा किया हुआ अनुभव है। अगर मैं यह ध्यान न करूं तो इस तरह कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकता जिस तरह कर रहा हूँ। कम्प्युटर, टीवी और मोबाइल से जिस तरह की किरणें उठती है उससे हमारे दिमाग को हानि पहूंचती है यह भी वही वैज्ञानिक बताते हैं जिन्होंने इसे बनाया है। शरीर को होने वाली हानि तो दिखती है पर दिमाग को होने वाली का पता नहीं लगता। ध्यान वह दवा है जो इसका इलाज करने की ताक़त की रखता है। ध्यान पर ऐसे अनेक प्रयोग किये गये हैं जिनसे पता लगता है वह आदमी के मन में एक स्फूर्ति पैदा करता है। शेष अगले अंकों में।</p>
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<title><![CDATA[अपने अन्दर है आध्यात्म शक्ति का केंद्र ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/20/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sun, 20 May 2007 18:29:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                            अक्सर लोग यह कहते हैं कि हमें धर्म की जरूरत क्यों है? हम अपना काम अच्छी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                            अक्सर लोग यह कहते हैं कि हमें धर्म की जरूरत क्यों है? हम अपना काम अच्छी तरह करें तो क्या जरूरत है कि भगवान के किसी स्वरूप की आराधना करें -हम किसी को दुःख न दें, अवसर पडे तो किसी की मदद करें, और न कर सकें तो किसी की हानि न करे और कुछ न करें तो केवल अपना कर्म मेहनत, लगन तथा निष्ठा से करते रहें।</p>
<p>                       अपने आप में यह विचार बहुत अच्छा है ,पर ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि हमारे इस देह में एक मन है जो बहुत चंचल है और वह हमारे विचारो के साथ देह को भी घुमाने की भी क्षमता रखता है और उस पर बिना आध्यत्मिक शक्ति के नियंत्रण नहीं किया जा सकता है-जिसका केंद्र हमारे अन्दर ही स्थित है । मन से ज्यादा शक्तिशाली है हमारी आत्मा जिसे जानना जरूर है हम उस जानने कि विधा को आध्यात्मिकता कहते हैं। हम अपने मन और देह को सदैव सांसरिक कार्यों में लगाए रहते हैं, इसमें कोई दोष नहीं है पर जो एकरसता की वजह से उब होती है उसे हम समझ नहीं पाते। हम जो मनोरंजन के लिए साधन लाते हैं- जैसे टीवी देखना, क्रिकेट मैच देखना, कोई मनोरंजन किताब पढ़ते है और कभी कहीं पर्यटन करने चले जाते हैं-इससे कुछ देर तक हमारे मन को राहत मिलती है पर फिर जैसे ही नियमित कार्यों में लग जाते हैं पर हमें जल्द ही यह लगने लगता है कि हमारे मन में अभी खालीपन है । फिर तनाव धीरे धीरे हम पर छाने लगता है। इस तनाव को कभी &#8220;मूड खराब होने&#8221; या &#8220;थकावट है&#8221; कहकर व्यक्त करते है और यह समझ नहीं पाते कि हम कह क्या रहे हैं और सोच क्या रहे हैं -यह तनाव हमारी आत्मा  का होता है जो हम समझ नहीं पाते । यह आत्मा इस देह और मन में अपने अस्तित्व के अहसास के लिए तरसती है। वह चाहता हैं कि कुछ देर वह उस निरंकार, निर्गुण और शाश्वत सत्य स्वरूप परमपिता परमात्मा का इस देह में स्मरण इस देह और मन से करे जो उसने धारण कर रखी है। इसीलिये सांसरिक कार्य लगन, मेहनत, और निष्ठा से करते हुए भी अपने अध्यात्म से जुडना चाहिए।</p>
<p>             अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अध्यात्म का अर्थ है धार्मिक कर्मकांड , और दिखने और दिखाने के लिए धार्मिक जगहों पर जाना और अपनी रीती से आराधना करना । यह धर्म नहीं भ्रम है। इसका आध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। यह एक तरह की सांसारिकता है। जब हम इस रास्ते पर चलते हैं तो फिर हमें देहधारी तथाकथित भगवानों की शरण में जाना पड़ता है और वह अपने लिए हमारे देह, धन और मन को शौषण करने लगते हैं , चूंकि हम मानकर चलते हैं यही धर्म है तो बुध्दी अपना काम करना बंद कर देती है। जब हमें सत्य का पता लगता है तो भारी दु:ख पहुँचता है ।</p>
<p>                   अध्यात्मिक ज्ञान कोई बहुत विस्तृत नहीं है। प्रात: योगासन , प्राणायाम और ध्यान करने के बाद गायत्री मन्त्र,महा म्रत्युन्जय मंत्र और शांति पाठ करना चाहिऐ और उस समय अपना ध्यान इस संसार से हटाकर ॐ की तरफ लगाना चाहिए और धीरे धीरे उसे निरंकार और निर्गुण परमात्मा में लगाना चाहिऐ । हो सके तो श्रीमद्भागवत गीता का पाठ श्रध्दा के साथ ज्ञान प्राप्त करने के लिए करना चाहिए। इसके बाद भी दिन में कभी अवसर मिले तो बैठकर आँखें बंदकर ध्यान लगाना चाहिए। ध्यान में अपने मन की दृष्टि नाक के ऊपर भृकुटी पर रखना चाहिए। आप कहेंगे जिस ज्ञान को इतने बडे ज्ञान को बरसों से बडे बडे ज्ञानी लंबे चौड़े प्रवचनों में भी नहीं समझा पाए वह इतना छोटा कैसे हो सकता है तो यह बात साफ बता दूं कि वह लोग प्रवचनों को सत्संग की दृष्टि से करते है जिसमें तमाम की तरह कथाएं भी आती हैं और मैं कोई संत नहीं हू एक सामान्य इन्सान हूँ। अपनों से इस तरह की चर्चा करते रहने से आनन्द आता है और किसी अन्य के यहां अपने मन की बात कहने के लिए जाने की जरूरत नहीं पड़ती। शेष अगले अंकों में।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[नन्दीग्राम और क्रिकेट:संवेनाओं को संभाल कर रखो ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/03/25/%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a4%b8%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sun, 25 Mar 2007 08:56:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[Tमानवीय संवेनाओं पर अब कई तरह के व्यापार चल रहें हैं। uanhxzke dk fddzsV ls D;k laca/k gS\ bldk lh/k]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Tमानवीय संवेनाओं पर अब कई तरह के व्यापार चल रहें हैं।</p>
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<p align="left">&#160;</p>
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<title><![CDATA[सब जानते थे इस टीम को हारना ही था  ]]></title>
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<pubDate>Sat, 24 Mar 2007 15:44:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[blogयह हर कोइ जानता था कि सभी क्रिकेटर अनफिट हीं पर कोइ बोलने के लिए तैयार नहीं था।  Hkkjr fo&#8217;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>blogयह हर कोइ जानता था कि सभी क्रिकेटर अनफिट हीं पर कोइ बोलने के लिए तैयार नहीं था।</p>
<p><span style="font-size:14pt;font-family:'DevLys 040';"><font size="4"><span> </span></font></span><span style="font-size:14pt;font-family:'DevLys 040';"><font size="4">Hkkjr fo&#8217;o di esa Jhyadk ls gkj x;kA eq&#62;s bl gkj ij fo&#8217;ks&#8221;k vk&#8217;p;Z ugha gqvkA gka] Hkkjr esa yksxksa dh ftl rjg bl ekeys ij izfrfdz;k gqbZ og vuisf{kr FkhA esjk ekuuk Fkk fd yksx le&#62;nkj gSa&#38;og bl lR; dks <span> </span>tkurs gSa fd fdzdsV vc lkekU; vkneh ds fy;s dsoy ns[kdj Hkwy tkus ds fy;s jgk gS&#38;D;ksafd fdzdsV dsoy eSnku ij gh ugha oju~ eSnku ds ckgj Hkh [ksyk tkrk gSA ,d&#38;,d ju vkSj ,d&#38;,d xsan ij lV~Vk yxrk gS vkSj dgha u dgha rkj muds bl rjg tqM+s gq, gS fd og bl [ksy dks izHkkfor djrs gh gSAa</font></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-size:14pt;font-family:'DevLys 040';"><font size="4">vc tjk gkj ij gksus okyh izfrfdz;k ij ppkZ dj ysaA tks yksx bl ij izfrfdz;k ns jgs gSa mUgsa irk gh ugha fdzdsV [ksy D;k gksrk gS&#38;og rks bls dsoy cSV cYys ls [ksys tkus okyk [ksy ekurs gSa tks dksbZ Hkh [ksy ldrk gSaA QhfYMx vksj jfuax fcVohu ds fy;s 'kkjhfjd rFkk ekufld fQVusl dh Hkh t:jr gksrh gS&#38;;g ckr dksbZ ugha a le&#62; jgkA mudh D;k ckr djsa Hkkjr ds HkwriwoZ fdzdsV   f[kykM+h ftUgsa desaVªh djus dk volj izkIr gksrk gS og Hkh bls ugha tkur ;k Hkwy tkus dk ukVd djrs gSAA tSls dfiy nso] v#.kyky] fuf[ky pkSiM+k] efuanj flag] enuyky rFkk ;&#8217;kiky &#8216;kekZ Hkh &#8216;kk;n fQVusl dk eryc Hkwy x;s gSA eSa bu lcdk iz&#8217;kald gwA eq&#62;s nq[k bl ckr dk gS fd ;k rks ;g fQVusl dk eryc Hkwy x;s gS ;k /kuktZu ds pDdj esa vutku curs jgs gSA gdhdr ;g fd bl Vhe ds lHkh f[kykm+h­jkgqy nzfoM+ Jhlar rFkk vfuy dqacys dks NksM+dj&#38;vufQV gSaA lfpu rsanqydj dks vufQV gq, rhu o"kZ ls vf/kd le; gks x;k gS&#38;ij etky gS tks fdlh esa gdhdr c;ku djus dh fgEer gksA egk'k;] ju cukus vkSj cky QSaduk gh fdzdsV ugha gSA fQVusl ds vykok mlesa thrus ds Hkkouk gksuk Hkh t:jh gS] tks Hkkjrh; f[kykfM+;ksa esa fn[kkbZ ugha nsrhA</font></span></p>
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<title><![CDATA[अनुगूंज १८ : धर्म का मेरे जीवन में महत्त्व]]></title>
<link>http://pasand.wordpress.com/2006/04/12/duty-is-religion/</link>
<pubDate>Wed, 12 Apr 2006 08:10:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
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<description><![CDATA[धर्म का मेरे जीवन में बहुत महत्त्व है। मैं समझती हूं यदि किसी के जीवन में धर्म नहीं है तो जीवन जीना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogger.com/"><img src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" border="0" alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" vspace="5" align="right" /></a> धर्म का मेरे जीवन में बहुत महत्त्व है। मैं समझती हूं यदि किसी के जीवन में धर्म नहीं है तो जीवन जीना असंभव सा ही है, पर मुझे नहीं लगता कि संसार में कोई भी जीव अधर्मी है।<br />
धर्म शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है- एक तो कर्त्तव्यों के लिए और दूसरा धर्मिता(आन्तरिक नैसर्गिक गुण) के लिए। इन्हीं दोनों विचारों की प्रगति और विकास के चरमोत्कर्ष की अवस्था में आज कहलाने वाले धर्म अस्तित्व में आए।<br />
कर्त्तव्य ही धर्म है कर्त्तव्य पालन करना और कराना हमने प्रकृति से सीखा है।<br />
प्रकृति स्वयं नियमों में बंधी है, नियम यानि अनुशासन। नियम भी पंचतत्त्वों के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं।<br />
धर्मिता भी नैसर्गिक है। जड़-चेतन दोनों में है जो सूक्ष्म अंतर का कारण है।<br />
प्रकृति, जो स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है, हमारी पहली गुरु है।उसने हमें जन्म दिया है उसी ने हमारी विचार-शक्ति को गहन बनाया है। विचारों का चर्मोत्कर्ष भावों को जन्म देता है, यही से शुरु होती है हमारी धर्मिक बहस।<br />
किसी भी धर्म का उदभव एक समय या एक व्यक्ति या एक स्थान पर नहीं हुआ है। हजारों-हजार वर्षों तक अनुभवों की टुकड़ियों को मिलाकर धर्म वितान बने हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। व्यक्ति, समुदाय, समाज और राज्य सभी धर्म के बंधन में बंधे हैं। देश(स्थान), काल और परिस्थिति के अनुसार मांग पर विभिन्न धर्मों का अभ्युदय हुआ । जब धर्म प्रस्थापित हुए, तब उनको पूर्ण मान्यता थी क्योंकि उस समय वह माक़ूल थे, आज जैसे (स्वार्थवश मुड़े-तुड़े) नहीं। जैसे जैसे भौतिक संसाधन बढ़ते गये मानव मस्तिष्क सुखों की चाहना के इर्द-गिर्द घूमने लगा और नैतिकता (धर्म) से ध्यान हटाने लगा जिसके परिणामस्वरुप धर्म की आत्मा तो दब गयी है और बाहरी (कुरीतियां, आडम्बर, नाटकीयता और गुटबंदी) खोल ही दिखायी देने लगा है।</p>
<p>हरेक धर्म समाज के नैतिक पतन (परिस्थिति) के दौर में फलाफूला है। पतित विचारों के वातावरण में धर्म (नैतिक कर्त्तव्य) ही बुराइयां दूर करने में समर्थ होते हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि सामान्य परिस्थितियों में नैतिक व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। यही नैतिकता का पाठ युगांतर से धर्म की गद्दी पर बैठा हुआ है और समय समय पर गद्दी संभालने वाले इसका दुरुपयोग भी करते रहे हैं। जीवन के हर बिंदु पर हमने जो बुराइयां बढ़ायीं है वही सब धर्म के परिप्रेक्ष्य में भी लागू होती हैं। यदि समाज में किसी भी बिंदु पर नकारात्मकता ना होती तो फिर धर्म का भी अस्तित्त्व ऎसा ना होता, जो एक असंभव सी बात है।<br />
बात आज के दौर की करते हैं। आज भौतिक-विज्ञान का युग है। सर्वत्र पदार्थों और रसायनों को प्रधानता दी जा रही है। सारे सुख भौतिक रुप में ढू़ढे़ जा रहे हैं।भावनात्मक सुखों के लिए भी भौतिक साधनों की ओर ताकते हैं! यही विरोधाभास धर्म को प्रश्न बना देता है, जबकि उसमें संपूर्ण जीवन की समस्याओं के उत्तर छिपे हैं। ज़रुरत बस सूक्ष्मताओं को प्रकाशित करने की है।<br />
इस प्रकार धर्म नियमों का पुलिंदा है जो हमें जीवन की यात्रा में आने वाली हर बीमारी से बचाता है और बीमार होने पर इलाज भी करता है। नियमों को व्यापकतम अर्थ में समझने पर धर्म का अर्थ पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है।<br />
मनुष्य का मस्तिष्क अत्याधिक विकसित है, वह अपनी स्पर्धा में स्वयं हार जाता है, अपने बनाए नियमों को ही ग़लत साबित करने की फिराक़ में रहता है , क्या करे प्रकृति ही ऎसी विकसित हुई है शक्ति को ही प्रमुख मानता है, सत्ता की लालसा में जीता है, फिर धर्म भी इसी सोच का शिकार हुए हैं।जब किसी भी धर्म का प्रादुर्भाव हुआ तो वह एक अनिवार्य रुप था परंतु परिवर्तन के अभाव मे( कारण चाहे अज्ञानता हो या स्वार्थ) उनका जीवन में महत्त्व ही संदेह के घेरे में घिर गया है, पालन की तो फिर बात ही दूर हो जाती है। धर्म बनाए भी मनुष्य ने हैं और विकृत भी वही करता आया है।<br />
धर्म को पालन करने का तरीक़ा उस का क्रियारुप है। जिसमें रीति-रिवाज़ संस्कृति, कला, मोहकता, संवेदनाओं और मनोविज्ञान से जुड़े पक्ष है, जिनका महत्त्व तो कभी कम नहीं हो सकता हां अनुसंधान और विकास के अभाव में विकृति यहां भी बहुत है। समय और ज्ञानवृद्धि के साथ साथ बदलाव की आवश्यकता वहां भी है, जिसकी पूर्ति जन-जागरण से ही संभव है।<br />
समग्र और अतिव्यापक दृष्टिकोण से देखें तो धर्म का महत्त्व लेशमात्र भी कम नहीं हुआ है, बल्कि और ज़्यादा ज़रुरी हो गया लगता है, हां धर्म को संकीर्णता और कठोरता से परे होना चाहिए। विभिन्नता में एकता के साथ सभी धर्मों में अनुसंधान होने चाहिए ताकि प्राचीन विचार संपदा का सदुपयोग हो नाकि स्वस्थ समाज अविश्वास करने लगे।<br />
धर्म डरने या डराने के लिए नहीं बल्कि जीवन में सुख-शांति और त्याग-प्रेम अपनाने के लिए हैं बशर्ते विकार रुपी वायरस से निजात पा लिया जाए। इसप्रकार हर धर्म स्वीकारणीय और नितांत महत्त्वपूर्ण हैं। जनजागरण और अज्ञानता का समूल नाश धर्मों को नए रुप में पुनः स्थापित कर सकते हैं।<br />
अंत में स्वरचित पंक्तियों के साथ धर्म का जीवन में आज भी पूरा महत्त्व समझती हूं।<br />
धर्म की दीवार ना बने,<br />
धर्म की तलवार ना चले,<br />
ओ धर्म के ठेकेदारों!<br />
धर्म का अधिकार ना रहे,<br />
धर्म कर्त्तव्य ही रहे,<br />
मानवता जिसका मंतव्य रहे।</p>
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