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	<title>आकाश &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/आकाश/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "आकाश"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 11:47:44 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[वह मतलब निकालकर होशियार कहलाये-हिंदी कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=75</link>
<pubDate>Sun, 31 Aug 2008 08:06:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.hi.wordpress.com/2008/08/31/matlab-nikale-so-hoshiyar/</guid>
<description><![CDATA[जिनको माना था सरताज
वह असलियत में सिया]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिनको माना था सरताज<br />
वह असलियत में सियार निकल आये<br />
भरोसा किया था जिन पर<br />
वह मतलब निकालकर होशियार कहलाये<br />
उनके लिये लड़ते हुए थकेहारे<br />
सब कुछ गंवा दिया<br />
इसलिये हम कसूरवार कहलाये<br />
...............................................</p>
<p>अपनी जिंदगी के राज किसको बतायें<br />
अपने गमों से बचने के लिये सब मजाक बनायें<br />
टूटे बिखरे मन के लोगों का समूह है चारों तरफ<br />
किसके आसरे अपना जहां टिकायें<br />
बेहतर है खुद ही अपने पीर बन जायें<br />
आकाश में बैठे सर्वशक्तिमान को किसने देखा<br />
और कौन समझ पाया<br />
फिर जब दूसरे बन जाते है पहुंचे हुए<br />
तो हम खुद क्यों पीछे रह जायें</strong><br />
..................................... </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://zeedipak.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विश्वास की कभी जंग नहीं होती-हिंदी शायरी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=452</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 16:08:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/08/03/a-hindi-poem-2/</guid>
<description><![CDATA[चेले ने पूछा गुरू से
‘भारी मानसिक युद्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चेले ने पूछा गुरू से<br />
‘भारी मानसिक युद्ध में फंसा हूं<br />
कोई उपाय बताईये<br />
जंग है विश्वास की<br />
उससे मुझे पार लगाईये<br />
एक का निभाता हूं<br />
दूसरे का किसी हालत में तोड़ना होगा विश्वास<br />
इधर जाऊं समझ में नही आता<br />
रास्ता कोई आप ही बताईये<br />
आपके उपदेश पर ही है विश्वास’</p>
<p>गुरू ने कहा<br />
‘किस माया के चक्कर में पड़े हो<br />
उसके हैं तीन रूप धन, शक्ति और प्रतिष्ठा<br />
पहले उसका स्वरूप  बताओ<br />
विश्वास की कभी जंग नहीं होती<br />
हमारी बुद्धि की गली ही तंग होती<br />
तभी हालत ऐसी आती है<br />
सत्य की कोई परीक्षा नहीं है<br />
जिस पर विश्वास है वह निभाएगा भी<br />
पर माया में ही ऐसा होता है<br />
इसलिये जहां माया मोल तोल में भारी हो<br />
वहीं पहुंच जाओ<br />
चाहे जितना माया का ढेर उठा लाओ<br />
नैतिकता का मानदंड कोई<br />
किसी किताब में नहीं लिखा<br />
आज के लोगों में  हमें भी कहीं वह नहीं दिखा<br />
हम तो ठहरे निष्काम<br />
हमें समझ में नहीं आता माया का काम<br />
जिधर ले जाए  वहीं होता विश्वास<br />
जिसे नहीं मिलती वही होता निराश<br />
जमाने को लगी है हवा ऐसी<br />
धन और प्रतिष्ठा में<br />
आदमी की बुद्धि का हो गया निवास<br />
सत्य की राह पर चलते हो तो<br />
अधिक सोचना नहीं<br />
पर माया के रास्ते जाओ तो<br />
कर लेना पहले कम और अधिक का आभास<br />
रास्ते दो ही है इस दुनियां में<br />
एक है सत्य का<br />
दूसरा माया का<br />
इस नियम  पर करना विश्वास<br />
........................................................................</strong><br />
<blockquote><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुनी सुनी गलिया सुना सुना आकाश…]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=30</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 20:01:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://meredilne.hi.wordpress.com/2008/06/24/suni-suni-galia-suna-suna-akash/</guid>
<description><![CDATA[सुनी सुनी गलिया सुना सुना आकाश,
चाँद त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सुनी सुनी गलिया सुना सुना आकाश,<br />
चाँद तारे सबको भेजा यार के पास,<br />
चाँद तारो की छाव में प्यारी नींद आए,<br />
हो हर सपना पुरा यार का मेरे,<br />
दुआ दिल से मेरे बस येही आए,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=802</link>
<pubDate>Mon, 18 Feb 2008 13:01:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/18/halke-halke-aamsoon-toote-hain/</guid>
<description><![CDATA[हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से<br />
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से<br />
इतनी दूरी क्यों है, यह मजबूरी क्यों है<br />
इसका जवाब दो तुम इसका जवाब दो<br />
यह जुदाई क्यों है यह रुसवाई क्यों है<br />
इसका जवाब दो मुझे इसका जवाब दो</font></p>
<p><font color="#000000">यह दिल मेरा तेरी मोहब्बत चाहता है<br />
वह दिल तेरा मेरी मोहब्बत चाहता है<br />
इस मुश्किल से थोड़ी राहत चाहता है</font></p>
<p><font color="#000000">हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से<br />
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से</font></p>
<p><font color="#000000">ख़ाहिश है तू मेरी, जन्नत है तू मेरी<br />
इस दुनिया में सबसे सुन्दर है तू ही<br />
नीले आकाश में जैसे उड़ता बादल है<br />
नील आँखों में जैसे सजता काजल है<br />
कुछ यूँ मेरे दिल के अन्दर है तू ही<br />
मेरी सजनी तू नील समन्दर है तू ही</font></p>
<p><font color="#000000">हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से<br />
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से</font></p>
<p><font color="#000000">तुम मेरे जीवन में फिर आ जाओ<br />
तुम मुझे एक बार अपना कह जाओ<br />
फिर जो बोलोगे तुम हम कर जायेंगे<br />
फिर तुम बोलोगे तो हम मर जायेंगे<br />
पर ऐसी ज़िन्दगी हम न जी पायेंगे<br />
तन्हा साँसें ले‍गें हम तन्हा मर जायेंगे</font></p>
<p><font color="#000000">हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से<br />
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से<br />
इतनी दूरी क्यों है, यह मजबूरी क्यों है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह यादें तो ऐसी हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=766</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 16:22:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/13/yah-yaadein-to-aisii-hain/</guid>
<description><![CDATA[यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं<br />
जब तक अंधेरे में चलते रहे<br />
तब तक हम दोनों साथ नहीं<br />
जहाँ उजालों की ओर मुड़े<br />
फिर से मेरे दिल पर आयीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें वह तो नहीं<br />
जिनको काग़ज़ पर लिखकर मिटा दें<br />
यह वह लम्हे तो नहीं<br />
जिनको कहानियाँ समझकर भुला दें</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं<br />
जब तक अंधेरे में चलते रहे<br />
तब तक हम दोनों साथ नहीं<br />
जहाँ उजालों की ओर मुड़े<br />
फिर से मेरे दिल पर छायीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह वह चाँद तो नहीं<br />
जिनको काले बादलों की शालें उढ़ा दें<br />
यह वह पंक्षी तो नहीं<br />
जिनको दिल-क़ैद के पिंजड़े से उड़ा दें</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं<br />
जब तक अंधेरे में चलते रहे<br />
तब तक हम दोनों साथ नहीं<br />
जहाँ उजालों की ओर मुड़े<br />
फिर से मेरे दिल पर आयीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह वह फ़िज़ा की हवाएँ हैं<br />
आठों पहर जो दिल में आएँ-जाएँ<br />
यह बिन बादलों के<br />
आकाश के घट से पानी छलकाएँ</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उल्टे सूरज की आग जम गयी]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/14/%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Fri, 14 Sep 2007 20:54:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/14/ulte-suraj-kii-aag-jam-gayii/</guid>
<description><![CDATA[सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक
तो सूरज की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक<br />
तो सूरज की आग<br />
सर्दियों के सर्द बादलों को ग़ुबार कर देगी<br />
बहने लगेगा बदन में जमा हुआ लहू<br />
और झपकने लगेंगी एक टुक अपलक पलकें<br />
लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं</font></p>
<p><font color="#000000">दिन दोपहर तो चढ़ा पर बादल नहीं छटे<br />
कोहरा नहीं पिघला<br />
उल्टे सूरज की आग जम गयी,<br />
ठिठुर गयी...<br />
सर्द हवा ने बुझा दिया दिन का सूरज<br />
उतरने लगा शाम के आगोश में दिन</font></p>
<p><font color="#000000">आज शफ़क़ न गुलाबी न जाफ़रानी थी<br />
बस नीला स्लेटी आकाश<br />
अजीब उदासियों के साथ बैठा रहा<br />
न जाने किसके इन्तिज़ार में...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>

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