<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>आत्मा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/आत्मा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "आत्मा"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 03:30:20 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सच्ची दोस्ती]]></title>
<link>http://ulatvasi.wordpress.com/2008/03/25/sacchi-dosti/</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 12:12:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://ulatvasi.wordpress.com/2008/03/25/sacchi-dosti/</guid>
<description><![CDATA[दोस्ती की कोई  निश्चित परिभाषा नहीं है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दोस्ती की कोई  निश्चित परिभाषा नहीं है। आज तक मनोवैज्ञानिक भी इस बारे में किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं। एक विचार यह है कि दोस्ती आत्मा के स्तर पर होती है। बच्चों में बड़ी जल्दी दोस्ती हो जाती है क्योंकि वे निश्छल होते हैं, लेकिन बड़ों में समझदारी आ जाती है, इसलिए उनकी दोस्ती भी नकली होती है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि एक जैसी रुचि रखने वाले या एक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से दोस्ती हो जाती है। पर इसे मित्रता कहना ठीक नहीं होगा। यह साहचर्य से उपजा संबंध है जिसमें वह निश्छलता या एक-दूसरे के लिए मर मिटने का भाव नहीं होता। बल्कि कई बार उलटा होता है। एक क्षेत्र के लोग साथ रहते हुए भी प्रतिद्वंद्विता की भावना से ग्रस्त रहते हैं। साथ रहते हुए भी वे एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने की चाह रखते हैं। ऐसे में वह गर्मजोशी कैसे आ सकती है, जो सच्ची दोस्ती में जरूरी मानी जाती है। इसलिए अलग-अलग क्षेत्र के लोगों की दोस्ती में अधिक ऊष्मा होती है। इसलिए ज्यादा संभावना इस बात की है कि एक राजनेता का सबसे अच्छा दोस्त कोई लेखक हो या कोई डॉक्टर किसी इंजीनियर को सबसे करीबी मानता हो ।<br />
<h5><a href="http://navbharattimes.com" target="_blank"><b>संजय कुंदन</b></a></h5>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ॐ शक्ति है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 15:34:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=819</guid>
<description><![CDATA[ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है<br />
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है<br />
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है<br />
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में<br />
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है<br />
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है<br />
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है<br />
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में<br />
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है<br />
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है<br />
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है<br />
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है</font></p>
<p><font color="#000000">ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है<br />
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मूर्ति पूजा से भी होता है ध्यान जैसा लाभ ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/26/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a7/</link>
<pubDate>Thu, 25 Oct 2007 13:58:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/26/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a7/</guid>
<description><![CDATA[
इस देश में आध्यात्म को लेकर दो धाराएं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
इस देश में आध्यात्म को लेकर दो धाराएं सदैव रहीं हैं. एक तो निर्गुण और निराकार ईश्वर की आराधना की प्रवर्तक रही हैं दूसरी  सगुण और साकार की उपासक. मतलब यह कि इतिहास इस  विषय सा जुडे  विवाद पर पहले भी बहुत बहस हो चुकी है पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल सका-और कभी  निकलना भी नहीं है. सगुण और साकार भक्ति के उपासक भगवान  की मूर्तियों बनाकर उसकी पूजा करते हैं और निर्गुण और निराकार ध्यान, ज्ञान और नाम की चर्चा कर भक्ति भाव का प्रदर्शन करते रहे हैं. देखा जाये तो भारतीय आध्यात्म की यही विशेषता रही हैं उसने दोनों धाराओं को अपने अन्दर समेटा है. श्रीगीता पढने वाले इसे तरह की बहस में नहीं पड़ते क्योंकि उसमें सब कुछ स्पष्ट कर दिया है और निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार की भक्ति को मान्यता देते हुए हृदय में शुद्ध भावना  स्थापित करने  का संदेश दिया गया है. विगत समय में दोनों विचारधाराओं के विद्वानों के मध्य तीव्र मतभेद रहे हैं पर समय के साथ इस देश के आध्यात्म ने दोनों को आत्मसात कर लिया.  अब योग और ध्यान से निर्गुण और निराकार की उपासना करने वाले भी  मंदिरों मे जाते हैं क्योंकि मूतियों के सामने जाकर प्रार्थना और ध्यान करने से भी मन को शांति मिलती है. मूर्तियों का स्वरूप हमारे अन्दर ऐसी  तरंगें उत्पन्न करता है जिससे मन में सुख का अनुभव होता है. </p>
<p>         कुछ विद्वानों का मत है कि मूर्तियों की पूजा भी एक तरह से ध्यान का ही रूप है क्योंकि उनको देखने से कुछ देर  के लिए हमारा ध्यान सांसरिक  वस्तुओं से हट जाता है और इससे मन को शांति मिलती है. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि अगर शुद्ध हृदय से पूजा की जाये तो प्रतिमा में भी भगवान् है. होता यह है कि कुछ लोग केवल मूर्ति की पूजा करते हैं पर ध्यान कहीं होता है और मूंह में मन्त्र और मन में दुनिया का तंत्र  होता है और इसलिये वह अपने मन में शांति का अनुभव नहीं कर पाते. देखा जाये तो सभी देवी देवताओं की तस्वीरे इसलिये आकर्षक बनाईं जातीं हैं ताकि वह आदमी जिसे निरंकार का ध्यान लगाने में सहजता का अनुभव नहीं होता वह पहले साकार को अपने मन में धारण कर ध्यान लगाएं. हमारे देश में सहिष्णुता का भाव हमेशा रहा है इसलिये कभी मूर्तियों के स्वरूप को लेकर  विवाद नहीं रहा है पर विश्व के जिन भागों में यह पहले हुआ करती थी वहां लोग अपने देवी-देवताओं की मूर्तियों को लेकर झगड़ते थे और इसी कारण उन जगहों पर मूर्ति पूजाओं को वर्जित करने वाली विचारधाराओं को बढावा मिला. भारत में कभी इस तरह भक्त आपस में नहीं लड़े कि हम अमुक भगवान् की मूर्ति को मानेंगे और अमुक को नहीं. सभी मूर्तियों की पूजा को साकार से निराकार की उपासना करने का एक जरिया माना गया. यही कारण है कि यहां कभी मूर्तियों को लेकर झगड़े नहीं  हुए. हालांकि अब तमाम  तरह के ढोंग और पाखंड हो गये हैं और कई लोगों ने मूर्ति पूजाओं की आड़ मे अपने व्यवसाय बना लिए हैं, और अपने देश के अधिकतर भक्तजन जो इन स्थानों पर जाते हैं और निष्काम भक्ति  भाव से दर्शन कर लौट जाते हैं और इन पाखंडों में रूचि नहीं लेते पर जिनके स्वार्थ हैं और जिन्हें अपनी  भक्ति का पाखण्ड करना है वही मूर्तियों को लेकर तमाम  तरह के प्रचार करते हैं पर उनके लिए ज्यादा समर्थन नहीं होता. </p>
<p>          जो लोग निरंकार ईश्वर की उपासना नहीं कर पाते उन्हें श्रद्धा भाव से भगवान् की मूर्तियों  पर ही शुद्ध भाव से नमन करना चाहिए क्योंकि उससे भी मन को संतोष मिलता है उन्हें इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि वह मूर्ति किसी धातु या पत्थर की बनी है. उसके आकर्षण को अपने मन में धारण करना चाहिऐ, ऐसा करने से भी मन में प्रफुलता का भाव पैदा होता है. मूर्ति पूजा साकार से निराकार की तरफ जाने का मार्ग है और जो लोग निरंकार की उपासना करने में असहज अनुभव करते  हैं और जीवन में तनाव अधिक महसूस करते हैं उन्हें किसी इष्ट की मूर्ति के समक्ष नमन करना चाहिए और हो सके तो आरती भी करना चाहिए. यह उपाय  भी  ध्यान जैसा लाभ प्रदान करता है अगर शुद्ध हृदय से किया जाये.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[राम मिथक हैं तो सत्य कौन है- चिंतन ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/25/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Mon, 24 Sep 2007 14:29:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/25/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</guid>
<description><![CDATA[राम अगर मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है? शा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">राम अगर मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है? शायद इस बात का उत्तर वह लोग भी नहीं दे सकते जो राम को मिथक मानते हुए भी उन्हें मानने को तैयार हैं। एक तरफ वह लोग हैं जो कहते हैं कि राम एक कल्पना हैं दूसरी तरफ वह हैं जो उनके आस्तित्त्व को सत्य मानते हैं। इन दोनों के बीच वह लोग भी जो कहते हैं कि अगर वह मिथक भी हैं तो हम उन्हें मानेंगे-क्योंकि उन्हें लगता है कि भगवान श्री राम के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना तो कठिन है पर राम को काल्पनिक बताने वालों का सामना कराने के लिए यही एक तर्क है।</p>
<p>मैं प्रतिदिन इस विषय पर चल रही बहस को देख रहा हूँ, और तब मुझे आश्चर्य होता है कि राम को हृदय नायक मानने वाले इस देश में राम के विषय में सही ढंग से तर्क प्रस्तुत नहीं किये जा रहे है और जो मैंने या प्रश्न किया है कि राम अगर मिथक है तो सत्य कौन हैं तो इसके पीछे मेरा ध्येय केवल यही है कि मैं जिस धर्म को मानता हूँ और जिस तरह समझ पाया हूँ उसे लेकर अपनी बात कह सकूं। प्रश्न का जवाब भी मैं देता हूँ कि हम राम के अस्तित्त्व का प्रमाण किसे दें? जो माँग रहे हैं पहले वह यह तो साबित करें कि वह स्वयं मिथक या कल्पना नहीं हैं? चक्कर में डाल देने वाली इस बात में कोई चुनौती नहीं है बल्कि सीधा विज्ञान हैं जो हमारे धर्म ग्रंथों में मौजूद हैं। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं सही हूँ और मुझे अपनी गलती मानने में कोई झिझक भी नहीं है।</p>
<p>पहले तो यह जानना जरूरी हैं कि हम क्या हैं? इस शरीर को लेकर हम यह कहते हैं 'हम हैं'। पर आंखों का काम है देखना वह देखती हैं, कानों का काम सुनना है वह सुनते और नाक का काम हैं सांस लेना और सूंघना वह भी करती है। मुख से भोजन को ग्रहण करने से लेकर उसके कचडे में परिवर्तित होकर देह से निष्कासन तक सारा काम शरीर में मौजूद इन्द्रियां करती हैं, अत: एक बात तो रही कि हम यह इन्द्रियां नहीं हैं। पांच तत्वों से बने इस शरीर में 'मन, बुद्धि और अहंकार' यह तीन प्रकार की प्रकृतियां होती हैं जिनके सहारे इस धरती पर समस्त देहधारी जीव अपने साथ मौजूद इन्द्रियों के समूह को लेकर विचरण करते हैं। मतलब एक चक्र है जो घूम रहा है और कहते हैं कि इसे हम घुमा रहे हैं। पंच तत्वों के समूह में स्थापित होने के बाद तीनों प्रकृतियां उस पर शासन करती हैं। मैं तो नहीं ढूँढ पाया कि हम कौन हैं पर रामजी के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाला पहले इन सब से अलग होकर देख ले तो अपने आप जवाब मिल जाएगा कि राम मिथक थे या सत्य ।</p>
<p>इस धरती पर कुछ भी स्थिर नहीं है, सारा जगत चलायमान है इसलिये इसे मिथ्या और माया के स्वरूप भी कहा जाता है क्योंकि जो हम अपने को समझ रहे हैं वह हैं नहीं और जो हैं उसे जानते नहीं। चलते। फिरते और उठते-बैठते बस यही अहसास कि हम कर रहे हैं पर कर तो रहे हैं पर कर रही है यह देह अपने अन्दर मौजूद इन्द्रियों और प्रकृतियों की सहायता से वह भी उनके वशीभूत होकर। अब पलट कर हम सवाल करेंगे कि पूछ कौन रहा है और जवाब कौन दे?</p>
<p>अब रहा भौतिक प्रमाणों का सवाल। यह धरती कई करोड़ वर्ष से अस्तित्त्व में हैं इसके स्वरूप में परिवर्तन आते रहे हैं। हम ज्यादा दूर क्यों जाएँ अपने ही देश में देख ले ऐसे ढ़ेर सारे महल आज भी दिख जाते हैं जिनमें बैठे राजाओं ने अपने राज्य पर शासन किया और आज वह खँडहर हो गए। जिस समय वहाँ राजा रहते थे और वहाँ परिंदा भी नहीं आ सकता था वहां आज श्वान, गाय और भैसों का भी विचरण आसान हो गया है-और ऐसे महल पचास से पांच सो वर्ष से ज्यादा पुराने भी नहीं होंगे। आशय यह है कि इस धरती के स्वरूप में परिवर्तन आते हैं और मोहन-जोडदो और हडप्पा सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि विकसित सभ्यता तब भी थी। अब कोई लोग अगर रामजी के होने के अस्तित्व के लिए भौतिक प्रमाण मांग रहे हैं तो उसे अज्ञानता के अलावा और क्या कहा जा सकता है? इस तरह देश के लोगों की भावानाओं को ठेस पहुंचाना भी किसी ज्ञान का प्रमाण नहीं माना जा सकता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बहस और तर्क तो विद्वानों को करना चाहिए ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 11:40:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95/</guid>
<description><![CDATA[
 
बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चाहिए। विद्वान का मतलब यह कि जिस विषय पर बहस हो उसमें उसने कहीं न कहीं शिक्षा और उपाधि प्राप्त की हो या उसने उस विषय को इस तरह पढा हो कि उसे उसके संबंध में हर तथ्य और तत्व का ज्ञान हो गया हो। हमारे देश में हर समय किसी न किसी विषय पर बहस चलती रहती है और उसमें भाग लेने वाले हर विषय पर अपने विचार देते हैं जैसे कि उस विषय का उनको बहुत ज्ञान हो और प्रचार माध्यमों में उनका नाम गूंजता रहता है। उनकी राय का मतलब यह नहीं है कि वह उस विषय में पारंगत हैं। उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलने का कारण यह होता है कि वह अपने किसी अन्य कारण से चर्चित होते हैं, न कि उस विषय के विद्वान होने के की वजह से ।</p>
<p>स्वतंत्रता के बाद इस देश में सभी संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों की कार्यशैली का एक तयशुदा खाका बन गया है जिससे बाहर आकर कोई न तो सोचना चाहता है और न उसके पास ऐसे अवसर हैं। धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य, राजनीति, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में बहुत लोग सक्रिय हैं पर प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता है जिसके पास या तो कोई पद है या वह उन्हें विज्ञापन देने वाला धनपति है या लोगों की दृष्टि में चढ़ा कोई खिलाडी या अभिनेता है-यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि उसे उस विषय का ज्ञान हो जिस पर वह बोल रहा हो। इसी कारण सभी प्रकार की बहस बिना किसी परिणाम पर समाप्त हो जाती हैं या वर्षों तक चलती रहती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों का विस्तार हुआ है और बहस भी बढने लगी है और कभी-कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों को लोगों की दृष्टि में अपना प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने के लिए विषयों की जरूरत है तो उनमें अपना नाम छपाने के लिए उन्हें यह अवसर सहजता से प्रदान करते हैं।</p>
<p>अन्य विषयों पर बहस होती है तो आम आदमी कम ही ध्यान देता है पर अगर धर्म पर बहस चल रही है तो वह खिंचा चला आता है। धर्म में भी अगर भगवान् राम श्री और श्री कृष्ण का नाम आ रहा तो बस चलता-फिरता आदमी रूक कर उसे सुनने, देखने और पढने के लिए तैयार हो जाता है। मैं कुछ लोगों की इस बात से सहमत हूँ कि भगवान श्री राम और श्री कृष्ण इस देश में सभी लोगों के श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं। लोग उनके प्रति इतने संवेदनशील होते हैं कि उनकी निन्दा या आलोचना से उन्हें ठेस पहुँचती हैं। इसके बावजूद कुछ लोग प्रचार की खातिर ऐसा करते हैं और उसमें सफल भी रहते हैं।</p>
<p>धर्म के संबंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया पर इसके बावजूद इन्हें श्रद्धा भाव से पढने वालों की कमीं नहीं है। यह अलग बात है कि कोई कम तो कोई ज्यादा पढता है। फिर कुछ पढने वाले हैं तो ऐसे हैं जो इसमें ऐसी पंक्तियों को ढूंढते हैं जिसे उनकी आलोचना करने का अवसर मिले। वह पंक्तिया किस काल और संदर्भ में कही गयी हैं और इस समय क्या भारतीय समाज उसे आधिकारिक रुप से मानता है या नहीं, इस बात में उन्स्की रूचि नहीं होती। मुझे तो आश्चर्य तो तब होता है कि ऐसे लोग अच्छी बातों की चर्चा क्यों नहीं करते-जाहिर है कि उनका उद्देश्य ही वही होता है किसी तरह नकारात्मक विचारधारा का प्रतिपादन करें। मजे की बात तो यह है कि जो उनका प्रतिवाद करने के लिए मैदान में आते हैं वह भी कोई बडे ज्ञानी या ध्यानी नहीं होते हैं केवल भावनाओं पर ठेस की आड़ लेकर वह भी अपने ही लोगों में छबि बनाते हैं-मन में तो यह बात होती है कि सामने वाला और वाद करे तो प्रतिवाद कर अपनी इमेज बनाऊं।</p>
<p>मतलब यह कि धर्म मे विषय में ज्ञान का किसी से कोई वास्ता नहीं दिखता। एक मजेदार बात और है कि अगर किसी ने कोई संवेदनशील बयान दिया है प्रचार माध्यम भी उसके समकक्ष व्यक्ति से प्रतिक्रिया लेने जाते हैं बिना यह जाने कि उसे उस विषय का कितना ज्ञान है। भारत के प्राचीन ग्रंथों के कई प्रसिद्ध विद्वान है जो इस विषय के जानकार हैं पर उनसे प्रतिक्रिया नहीं लेने जाता जबकि उनके जवाब ज्यादा सटीक होते, पर उससे समाचारों का वजन नही बढ़ता यह भी तय है क्योंकि लोगों के दिमाग में भी यही बात होती है कि प्रतिक्रिया देने का हक केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा से संपन्न लोगों को ही है पंडितों (यहाँ मेरा आशय उस विषय से संबधित ज्ञानियों और विद्वानों से है जो हर वर्ग और जाति में होते हैं) को नहीं। वाद, प्रतिवाद और प्रचार के यह धुरी समाज कोई नयी चेतना जगाने की बजाय लोगों की भावनाओं का दोहन या व्यापार करने के उद्देश्य पर ही केंद्रित है।</p>
<p>इसलिये जब ऐसे मामले उठते हैं तब समझदार लोग इसमें रूचि कम लेते हैं और असली भक्त तो बिल्कुल नहीं। इसे उनकी उदासीनता कहा जाता है पर मैं नहीं मानता क्योंकि प्रचार की आधुनिक तकनीकी ने अगर उसके व्यवसाय से लगे लोगों को तमाम तरह की सुविधाएँ प्रदान की हैं तो लोगों में भी चेतना आ गयी है और वह जान गए हैं कि इस तरह के वाद,प्रतिवाद और प्रचार में कोई दम नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उसका दरबार कोई दुआओं की दुकान नहीं है ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/07/%e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%86%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81/</link>
<pubDate>Thu, 06 Sep 2007 17:14:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/07/%e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%86%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81/</guid>
<description><![CDATA[लोहे लंगर से बनी ट्रक,बस, कार और
मोटर सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लोहे लंगर से बनी ट्रक,बस, कार और<br />
मोटर साइकिल के झुंड खडे<br />
खरीदे थे जिन्होंने यह सब<br />
सर्वशक्तिमान के दरबार के द्वार<br />
पहले दीदार के लिए आकर टिकाये<br />
नियमित रुप से आने वाले<br />
सर्वशक्तिमान के दीदार करने वाले<br />
होते परेशान अन्दर कैसे जाये</p>
<p>कहा ऐक भक्त ने<br />
'यार, इस लोहे लंगर के सामान को<br />
ज़रा दूर खड़ा किया करो<br />
पैदल आने वालों का भी ख़्याल किया करो<br />
ताकि हर भक्त आराम से आयेऔर जाये '</p>
<p>उनके मलिक चिल्लाने लगे<br />
'हमारी मेहनत की कमाई से<br />
खरीदे गये हैं यह सामान<br />
दुआ देंगे इनको सर्वशक्तिमान<br />
हम पर उनकी बहुत कृपा है<br />
इसलिये मिली यह सवारी है<br />
तुम हो ढोंगी इसलिये<br />
तुम्हारी दुनिया अंधियारी है<br />
जब नहीं होती तुम पर कृपा<br />
तो क्यों पैदल चले आये'</p>
<p>भक्त ने कहा<br />
'कृपा है तभी तो अमन और चैन से<br />
हम जीवन बिताते है<br />
इसलिये तो अपने पाँव पर आते हैं<br />
मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कब्ज जैसे<br />
रोग हम से दूर ही नजर आते हैं<br />
उस पर है पूरा भरोसा<br />
हमारी रखेगा हर समय<br />
उसका भरोसा कोई पैट्रोल नहीं है<br />
जो लोहे लंगर के सामान मे भरवाते हैं<br />
उसकी दरबार में है सब जीव समान हैं<br />
अपने भक्तो पर मुक्त कंठ से हाथ रखते हैं<br />
उनका दरबार कोई दुआओं की दुकान नहीं है<br />
जो गारंटी कार्ड लेने आये'<br />
------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[माया और मय के खेल में सिद्ध भी फेल हो जाएँ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/08/07/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/</link>
<pubDate>Mon, 06 Aug 2007 17:00:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/08/07/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/</guid>
<description><![CDATA[

शादी-ब्याह में लोग
दूल्हा-दुल्हन की ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>शादी-ब्याह में लोग<br />
दूल्हा-दुल्हन की जोडी को<br />
राम-सिया जैसी बताएं<br />
पर उनके बारातियों जैसी<br />
मर्यादा नहीं निभाएं<br />
शराब पीकर करते हैं<br />
भरे बाजार करते हैं डांस<br />
सड़क पर जाम लगाएं</p>
<p>आत्मा के मिलन का तो नाम है<br />
लगती है नीलामी दूल्हे की<br />
मांग होती है<br />
टीवी, फ्रिज, मोटर साइकिल<br />
और गैस चूल्हे की<br />
राजा दशरथ जैसे नहीं है<br />
पर मांगें ऎसी कि<br />
बडे-बडे अमीर भी शरमाएं</p>
<p>मर्यादा, संस्कार और कुल की<br />
बातें होती हैं बड़ी-बड़ी<br />
पर लेनदेन की बात पर<br />
सब अपनी औकात बताएं</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
ज्यों-ज्यों चलते हैं धर्म की राह<br />
त्यों-त्यों अधर्म सामने आता है<br />
सिद्धांतों और आदर्शों के झंडे तले ही<br />
पाखण्ड सरेआम रचा जाता है<br />
शराब के नशे में अमर्यादित होकर<br />
करते हैं मर्यादा की बात<br />
शादी के सौदे में लाखों का लेनदेन कर<br />
करते हैं भगवान् की मर्जी बात<br />
माया और मय का खेल ही ऐसा कि<br />
बडे-बडे सिद्ध भी फेल हो जाएँ<br />
-----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उद्धरेदात्मनात्मानं]]></title>
<link>http://samskrtam.wordpress.com/2005/10/31/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%82-2/</link>
<pubDate>Mon, 31 Oct 2005 21:09:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>Karthik</dc:creator>
<guid>http://samskrtam.wordpress.com/2005/10/31/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%82-2/</guid>
<description><![CDATA[उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।<br />
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥<br />
&#8212; भगवद्गीता ६-५<br />
uddharedātmanātmānaṁ nātmānamavasādayet&#124;<br />
ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ&#124;&#124;<br />
&#8212; bhagavadgītā 6-5</p>
<p>&#34;One should lift oneself by one&#39;s own efforts and should not degrade oneself;<br />
For one&#39;s own self is one&#39;s friend, and one&#39;s own self is one&#39;s enemy.&#34;</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
