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	<title>आपबीती &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/आपबीती/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "आपबीती"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 03:46:09 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[वेजीतेरियन विथ...???]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/10/23/%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a5/</link>
<pubDate>Tue, 23 Oct 2007 16:07:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[&#8220;यू आर ए वेजीतेरीयन!!!&#8221;
&#8220;ओ याsss&#8221;
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"यू आर ए वेजीतेरीयन!!!"</p>
<p>"ओ याsss"</p>
<p>"वेजीतेरियन विथ फिश?"</p>
<p>"नो...डोन्ट टेक फिश आल्सो."<em>(भाई, ये कैसा वेजीटेरियन होता है?)</em></p>
<p>"वेजीतेरियन वोथ एग..???"</p>
<p>"नो नो...डोन्ट टेक एग आइदर.<em>"(नही जी...अन्डे का ही तो मुर्गा बनता है)</em></p>
<p>"ओsss.. यू दोन्त तेक मिल्क...?"</p>
<p>"फाइन विथ मिल्क एन्ड मिल्क प्राडक्ट्स.."</p>
<p>"यू आल्सो डान्ट ईट फ्लावर्स? "</p>
<p>व्हाट?????</p>
<p>बहुत मुश्किल है भाई...कैसे समझाऊं!</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[अजनबी..तुम जाने पहचाने से लगते हो]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/04/19/ajanabi/</link>
<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 11:35:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/04/19/ajanabi/</guid>
<description><![CDATA[कैसा महसूस होता है जब कोई धीरे धीरे इत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कैसा महसूस होता है जब कोई धीरे धीरे इतना करीब आ जाता है कि पता भी नही चलता और वो जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है।</p>
<p>अजनबी, कल जब तुम मेरी जिन्दगी में आये थे, तो तुम्हारे लिये मैं और मेरे लिये तुम कितने नये नये थे।...अनेक आशंकाओं, पर उत्साह से मन भरा हुआ था। उत्साह आज भी है, पर आशंकाएं विश्वास में बदल चुकी हैं। और साथ में हैं, तुम्हारे संग बिताये पल, चाहे वो सिनेमाघरों की अंधेरी सीटे हों या बिडला मंदिर के प्रांगण से दिखता विहंगम दृश्य। ट्रेफिक में फँसा हुआ आटो अथवा रविवार को अबिड्स में पटरी लगने वाली की दुकानों पर किताबों को देखते हुए चहलकदमी। हर समय, हर जगह तुम मेरे साथ थे और तुमसे अपनेपन का रिश्ता जुडता गया ।</p>
<p>अब इससे पहले कि आप मुझे तरह तरह की बधाइयां देने लगें और मेरी <a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/04/10/shadi/" target="_blank">पिछली पोस्ट</a> की तरह कुछ गलतफहमियां पैदा हो जायें, मैं स्पष्ट कर दूं कि ये पंक्तियाँ समर्पित हैं, इस प्यारे से शहर हैदराबाद को जहाँ रहते हुए मुझे हाल ही में एक साल बीत गया&#124;  ऐसा भी नही है कि एक साल में मैने इस शहर की खूब खाक छानी है या खूब घूमा हूँ, कुछ परिचित रास्तों को छोड दें, तो ज्यादतर हिस्से से वाकिफ भी नही हूँ, पर फिर भी...बात है भाई।</p>
<p>बावजूद इसके कि मैं अब भी तेलुगु के २-४ वाक्य भी ठीक से नही बोल पाता, आज तक एक भी तेलुगु फिल्म नही देखी, तेलुगु का कोई गाना ठीक से नही गा पाता और सानिया मिर्जा के अलावा किसी हैदराबादी लडकी को नही जानता। बावजूद इसके कि अभी तक चारमीनार नही देख पाया हूँ  ना ही गोलकुंडा का किला और मारडपल्ली, कूकटपल्ली और चीकटपल्ली(ये सब जगहों के नाम हैं) भी मेरे पल्ले नही पडते । बावजूद इसके कि इन १२ महीनों में से नौ महीने अनगिनत होटलों की चौखटों पर सर  पटक पटक कर नाक भौं सिकोडते हुए रसम चावल इडली डोसे खाये हैं,  पिछले एक साल में ये शहर इतना करीब आ गया कि अब अपना दूसरा घर जैसा लगने लगा है।</p>
<p>अजनबी..तुम वाकई जाने पहचाने से लगने लगे हो यार !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अहमदाबाद ब्लागर भेंटवार्ता (गुजरात प्रवास भाग - ३)]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/03/06/gujarat-3/</link>
<pubDate>Tue, 06 Mar 2007 07:50:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/03/06/gujarat-3/</guid>
<description><![CDATA[भुज और सूरत के बाद अपनी अगली मंजिल थी अ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/02/19/gujarat-1/" target="_blank">भुज </a>और <a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/02/21/100/" target="_blank">सूरत </a>के बाद अपनी अगली मंजिल थी अहमदाबाद । दो बार अहमदाबाद होकर गुजर चुका था, भुज जाते वक्त और सूरत जाते वक्त लेकिन रुकना नही हुआ था । हाँ भुज जाते वक्त <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/" target="_blank">पंकज </a>जी को फोन लगाया था और अगली बार आने का वादा किया था, दो-तीन बार चैट पर भी ।</p>
<p>पहुंचने के दूसरे दिन(शनिवार को) सोंचा कि रविवार(११ फरवरी) को ये शिखर वार्ता संपन्न कर ही दी जाये । पहले सोंचा कि क्या पता भाई लोग रविवार को अपना कोई कार्यक्रम बनाये बैठे हों और हम दाल भात में मूसलचंद पहुंच जायें, शनिवार को ही पंकज जी को फोन किया और पूँछा कि आफिस खोलते हैं या नही रविवार को, उन्होने फोन पे स्वागत किया, लंच के पहले आफिस में होंगे बताया, और घर पे खाने का निमंत्रण हाथ के हाथ सरका दिया, जिसके लिये हमने फोन पर ही थोडी ना नुकुर भी कर दी । रविवार को फिर फोन लगाया, पता लिया तथा कैसे पहुंचना है पूँछा । उन्होने हमे हमारे होटल से 'उठा' लेने का (बोले तो पिक करने का) प्रस्ताव रखा, जिसे हमने हमारे 'शर्मीले' स्वभाव की वजह से मना कर दिया । वैस इतना शर्माता नही हूँ...बस सोंचा कि अकेले जायेंगे तो इसी बहाने अहमदाबद देख लिया जायेगा थोडा ।</p>
<p>रविवार को होटल से निकला, पहले सोंचा बस से चलते हैं...बैठा, दो स्टाप आगे जाकर जाने क्यों, फिर उतर गया और आटो ले लिया । बाद में लगा, अच्छा किया, नही तो लंच नही, चाय के समय आफिस पहुँच पाता। खैर ढूंढ-ढांढ कर आफिस पहुंचे, <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/" target="_blank">संजय </a>जी बगलगीर होकर मिले, आसन(कुर्सी) ग्रहण करवाया गया, पंकज जी मिले, <a href="http://khushikibaat.wordpress.com/" target="_blank">खुशी </a>जी और <a href="http://abhijitc.wordpress.com/" target="_blank">अभिजीत </a>जी से मिला ।</p>
<p>बातचीत शुरू हुई, संजय जी मेरे बारे में नेट पर थोडा खंगाल चुके थे, पर ज्यादा कुछ मिला नही था, फोटो भी नही,  सो अपना परिचय दिया, क्या करता हूं, क्यों करता हूं, कहाँ करता हूं टाइप । मैं पिछले २० दिन से बाहर था सो ब्लागजगत की हलचलों से बेखबर था बताया गया कि बडा हल्ला हो रहा है आजकल और कई पत्रकार बंधु कूदे हुए हैं ब्लागिंग के मैदान पर । तभी सागर जी गूगल टाक पर दिखे, जिन्होने की इसका नामकरण किया, "ब्लागर मीट इन कर्णावती"  और बैंगानी बंधुओं से ताकीद की कि हमें क्या खिलाया-पिलाया जा रहा है।</p>
<p>फिर चर्चा ज्यादातर ब्लागिंग पर केन्द्रित रही, लोग क्या, क्यों, कैसा, कैसे लिखते हैं, कुछ लोग लिखते-लिखते क्यों इतना सेन्टिया जाते हैं और कुछ सेन्टी होकर क्यों लिखते हैं,  जो चिट्ठाकार लडते हैं वो कैसे दोस्त बन जाते हैं, जब लडते हैं तो चिट्ठे से लडते हैं या चिट्ठाकार से । सुनील दीपक जी कितना घूमते हैं, रवि जी कैसे किसी को भी कुछ लिखने से मना नही करते , जीतू जी कैसे कैसे आइडिये फेंकते रहते हैं, फुरसतिया जी इतना लम्बा कैसे लिख लेते हैं,  एडसेन्स से कमाई कैसे संभव है, या क्या दिक्कत है , परिचर्चा पर जाना आजकल कम क्यों हो गया है आदि आदि।</p>
<p>क्रिकेट मैच भी था उस दिन सो हमे नेट पर लाइव मेच भी दिखाया गया, निरंतर का नया अंक आ गया है ये बताया गया । ये भी पता चला कि आज <strike>संजय</strike> पंकज जी की शादी की सालगिरह भी है, सो हमने उसकी भी बधाई टिकाई (ये भी सोंचा कि खाली हाथ आ गये, कुछ लेकर आना था) ।फिर लंच का आफर, मैने फिर थोडी ना ना की, पर मैं एक अकेली जान और इधर और ये दो-दो, चलने नही दी गई । वास्ता दिया गया कि घर पर खाना बन गया है, दिन में बासी बचा तो शाम को इन्हे ही खिलाया जायेगा  और हमें गाडी में डाल दिया गया । निकलने के पहले फोटो सेशन हुआ, जिसमे कि पंकज जी इतने गमगीन क्यों नजर आ रहे हैं हम बता देते हैं । दरअसल इनकी चिंता ये थी कि <a href="http://itsme.wordpress.com/2006/07/04/blogger-meet-serve-chilled/" target="_blank">दिल्ली ब्लागर मीट</a> में भी इन्होने यही शर्ट पहनी थी जो आज पहनी हुई थी, और ये कह रहे थे कि लोग क्या कहेंगे, पंकज हमेशा एक ही शर्ट में फोटो क्यों खिंचाता है । बडे भैया के खूब समझाने पर राजी हुए फोटू खिंचवाने को :)</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/03/nitin.jpg" title="nitin.jpg"><img src="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/03/nitin.jpg" alt="nitin.jpg" border="4" /></a></p>
<p>घर पहुंचे, भाभियों से मिले, और परिवार के(या कहें हिन्दी के) सबसे छोटे ब्लागर से मिले । २० दिन बाद घर का खाना नसीब हुआ था, सो हम अब तक की लाज शरम छोड कर टूट पडे...। खाने के बाद की चर्चा महंगाई, राजनीति, क्रिकेट, समाचार, सूरत, असाम, चूरू होते हुए पता नही कहाँ कहाँ होकर निकली कि अचानक फोन टनटना गया । वैसे भी काफी वक्त हो गया था, सो हमने बैंगानी परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए विदा ली । लौटते में हमे आइ. आइ एम. अहमदाबाद दिखाया गया जहाँ से आटो पकड के हम ये जा वो जा हुए....।</p>
<p>इति श्री गुजरात यात्रा समाप्तम</p>
<p>फोटो साभार <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=155" target="_blank">जोगलिखी</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरे जवाब - लाक/फ्रीज़ किये जायें]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/03/03/savaal/</link>
<pubDate>Sat, 03 Mar 2007 12:57:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/03/03/savaal/</guid>
<description><![CDATA[सागर जी ने जब थोक में अपने शिकार बनाये ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सागर जी ने जब थोक में अपने <a target="_blank" href="http://nahar.wordpress.com/2007/02/24/fivequistions/">शिकार बनाये </a>थे तो मुझे भी लपेटे मे ले लिया था...८ सवाल पूँछे हैं जबकि चलन ५ का ही है । इंजिनियरिंग की परीक्षा में हमारे यहाँ ८ प्रश्न आते थे पेपर में, जिनमें से किन्ही ५ का उत्तर हमें देना होता था। प्रति प्रश्न २० नम्बर और उस १०० में से भी पास होने के लिये मात्र ३३ नम्बर की जरूरत होती थी । आदत कुछ-कुछ अभी भी वैसी ही पडी हुई है सो उसी हिसाब से प्रश्न पत्र हल करते हैं..३३ का लक्ष्य रख कर, इधर उधर ताका-झांकी करते हुए.. :)</p>
<p><strong>पहला सवाल: </strong> आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?</p>
<p>प्रश्नकर्ता के चिट्ठे से ही चेंपता हूं...</p>
<p><em>"इस  प्रश्न में दो की सीमाओं में बंधना मुझे मंजूर नहीं और वैसे भी दो का चयन करना बहुत मुश्किल है।"..</em>डान की भाषा में कहूँ तो मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है....काफी पहले <a href="http://saptrang.wordpress.com/2005/08/31/%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a5%8c%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a5%a7/">पढने का शौक</a> नाम से एक लेख लिखा था..उसकी दूसरी किस्त आज भी इंतजार कर रही है, लेकिन पास होने लायक जवाब वहाँ मिल ही जायेगा ।</p>
<p>फिर भी ये बता सकता हूँ कि किस तरह की पुस्तकें पढना पसंद करता हूँ । गीताप्रेस, गोरखपुर का तमाम साहित्य मुझे बहुत प्रिय है,  डोमेनिक लेपायर की सभी पुस्तकें जिनमें उन्होने ऐतिहासिक घटनाओं का काफी शोधपरक चित्रण किया है मुझे काफी अच्छी लगी (Freedom at Midnight, Paris is Burning, Oh!Jerusalam आदि)।  आत्मकथाएं मुझे बहुत अच्छी लगती हैं..(हाल ही में पढी स्टीव वा की "Out of My Comfort Zone") , और सुरेन्द्र मोहन पाठक के तमाम जासूसी उपन्यास।</p>
<p>फिल्में....हल्की फुल्की फिल्में देखना पसंद करता हूँ..बहुत भारी ना हों..मनोरंजन करें..ना कि उदास कर दें...वैसे संजीव कुमार-जया भादुडी की "कोशिश" मुझे बहुत पसंद है..दोनो के अभिनय की वजह से....अमोल पालेकर-उत्पल दत्त की फिल्में, फारुख शेख दीप्ती नवल की २-३ फिल्में ।वैसे इस मुद्दे पर अनुगूंज में एक चर्चा हो चुकी है कि <a target="_blank" href="http://saptrang.blogspot.com/2005_11_01_archive.html">हम फिल्में क्यो देखते </a>हैं । थोडे जवाब वहाँ भी मिल जायेंगे।</p>
<p><strong>दूसरा </strong> इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)</p>
<p>पहले चिट्ठा पढना - पढने का तो शौक है ना...और कुछ दिमाग चलाना भी नही होता, और इतनी अच्छी अच्छी सामग्री मिलती है ।</p>
<p>फ़िर टिप्पणी पढना। वजह ? किसी क्रिया की कितनी, और किस किस तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, जानने में बहुत मजा अता है, और मेरी सोंच-समझ के दायरे को बढाती है, दिमाग की खिडकियाँ खोलती हैं...</p>
<p>टिप्पणी करना - तीसरे नम्बर पर है...कई बार कई चिट्ठे बहुत अच्छे लगते हैं, पर समझ नही आता कि क्या लिखूँ, कई बार ऐसा हुआ है कि ’टिप्पणी करे” पर क्लिक किया, बहुत देर सोंचा कि क्या लिखूं, और फिर बन्द कर दिया । सोंचता हूं कि सिर्फ यह लिख देना कि "बहुत अच्छा लिखा", लिखने वाले के साथ अन्याय होगा।</p>
<p>और फिर चिट्ठा लिखना, हाथ पैर हिलाने पडते हैं, दिमाग चलाना पडता है । समय भी निकालना पडता है । कई बार हुआ है कि घूमते फिरते कोई विचार आया है लिखने को, लेकिन शाम तक गायब । वैसे ये क्रम इसलिये भी ठीक ही है कि अपनी चिट्ठाकारी का भी यही क्रम रहा है, पहले चिट्ठे और टिप्पणियां पढना शुरू की, फिर टिप्पणी करना..और फिर खुद का चिट्ठा बनाया ।</p>
<p><strong>तीसरा </strong>आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?</p>
<p>अगर समय इजाजत देता है तो लगभग हर चिट्ठा पढता हूँ, लेकिन पसंद पूँछी जाये तो पहले नम्बर पर संस्मरणात्मक चिट्ठे आते हैं । कई लोगों को पढ कर लगता है कि खुद की जिन्दगी पढ रहे हैं, ये तो अपने साथ भी हुआ था (या अपने साथ भी <em>नही</em> हुआ था ;) ) या इस तरह की खामी/खूबी वाले सिर्फ हम ही नही हैं । उसके बाद हास्य व्यंग्य आते हैं । और साथ ही सम सामयिक मुद्दों पर लिखे चिट्ठे । भारी कविताएं बिल्कुल हजम नही होती...उलझ कर रह जाता हूँ । तकनीकी चिट्ठे कई बार कमाल की जानकारी दे जाते हैं ।</p>
<p><strong>चौथा </strong>चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है?</p>
<p>व्यापार, व्यवसाय पर कोई फर्क नही लेकिन खुद पर बहुत फर्क पडा है । दुनिया को, घटनाओं को देखने का नजरिया बदला है । अपनी सोंच का दायरा बढा है । पहचान का दायरा बढा है । मुझे मालूम है कि हिन्दुस्तान/दुनिया के अनेक शहरों में मेरे जानने वाले रहते हैं...कभी मिला नही तो क्या हुआ। साथ ही यह भी कि जिन्दगी में बहुत कुछ देखना और करना बाकी है ।</p>
<p><strong>अंतिम सवाल…. </strong>. आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?</p>
<p>सबसे मिलना चाहूँगा..क्योंकि ऐसा कोई भी नही है जिससे ना मिलना चाहूँ :)</p>
<p>सागर जी से <a target="_blank" href="http://saptrang.blogspot.com/2006/05/blog-post_28.html">हैदराबाद </a>में और बैंगानी परिवार से अहमदाबाद में(<em>विवरण लिखना बकाया है</em>) मिल चुका हूँ । और भी जिन जिन शहरों में जाने का मौका मिलेगा वहाँ के चिट्ठाकारों से जरूर मिलूंगा । वैसे अभी हैदराबाद के ही सारे लोगों से नही मिल पाया हूँ ...</p>
<p>तो सागर जी ..८ में से ५ के जवाब हमने दे दिये....पास हम हमेशा होते आये हैं..इस बार भी हो जायेंगे ये हमें अच्छे से मालूम है. टाप करने की अपनी कोई इच्छा है नही :) कभी रही भी नही । और हाँ अगर पास ना किया.....तो जाओगे कहाँ..एक ही शहर के बाशिन्दे हैं.. निपट लेंगे.. :D</p>
<p>मैं आगे किसी को <em>टैग</em> नही कर पा रहा हूँ क्योंकि मेरी जानकारी में लगभग सारे सक्रिय चिट्ठाकार लपेटे में आ चुके हैं और हम "शिकार का शिकार नही करेंगे :D " </p>
<p>************************************************* </p>
<p>आप सब को होली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें...</p>
<p>आपकी होली  रंगीली, सजीली, छबीली, तडकीली- भडकीली, रसीली, लाल-गुलाबी-नीली-पीली, सूखी-गीली हो ऐसी हमारी कामना, मनोकामना, मंगलकामना है...</p>
<p>चलते चलते होली का एक <em>रसिया</em> (इस बार घर ना जा सकने की वजह से खुद ने मन ही मन गा लिये.. </p>
<p><strong>होरी खेलूँगी श्याम संग जाय,<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥१॥</strong></p>
<p class="snap_preview"><strong>फागुन आयो…फागुन आयो…फागुन आयो री<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री</strong></p>
<p><strong>वो भिजवे मेरी सुरंग चुनरिया,<br />
मैं भिजवूं वाकी पाग ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥२॥</strong></p>
<p><strong>चोवा चंदन और अरगजा,<br />
रंग की पडत फुहार ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥३॥</strong></p>
<p><strong>सास निगोडी रहे चाहे जावे,<br />
मेरो हियडो भर्यो अनुराग ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥४॥</strong></p>
<p><strong>आनंद घन जेसो सुघर स्याम सों,<br />
मेरो रहियो भाग सुहाग ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥५॥</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मिली कुछ किताबें...]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/27/got-some-hindi-books/</link>
<pubDate>Tue, 27 Feb 2007 12:07:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/27/got-some-hindi-books/</guid>
<description><![CDATA[पिछले काफी समय से मेरा हिन्दी पुस्तके]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले काफी समय से मेरा हिन्दी पुस्तकें पढना काफी कम होता जा रहा है । जब तक कालेज में थे,  कालेज लाइब्रेरी में काफी साहित्य था हिन्दी में और कभी कभार पढते भी  थी..पर उस अनुपात में नही जिसमें अंग्रेजी की पुस्तकें ।और खरीदी तो बिल्कुल भी नही ।एक कारण अनुपलब्धता भी है..अधिकांश जगहों पर आपको हिन्दी पुस्तकें ना के बराबर मिलेंगी, अखबारों में बामुश्किल किसी किताब का जिक्र/समीक्षा होती है । इंडिया टुडे/आउट्लुक वगैरा में जरूर नियमित समीक्षाएं छपती हैं पर उनमें से अधिकतर इतनी साहित्यिक होती हैं कि बस ।</p>
<p>सो काफी दिनों से में हिन्दी पुस्तकें पढने और खरीदने की सोंच रहा था । एक कारण विभिन्न चिट्ठों पर हिन्दी की कई पुस्तकों का जिक्र भी रहा...जिस भी पुस्तक का जिक्र होता...लगता, कि अरे ये तो पढी ही नही है । हिन्दी चिट्ठे पढने के बाद ही लगा कि मैने कितने कम हिन्दी लेखकों को पढा है । प्रेमचन्द, शरतचन्द्र आदि तो स्कूल में पढ लिये थे पर उनके बाद कुच्छ नही । (सिवाय सुरेन्द्र मोहन पाठक के जिन्हे इन्जिनीयरिंग के समय खूब पढा :)  )</p>
<p>सो इस बार गुजरात निकलते वक्त सोंचा हुआ था कि स्टेशन पर किसी बुक स्टाल से पुस्तकें जरूर लेनी है । अहमदाबाद के लिये निकलते समय रायपुर स्टेशन पर बहुत देर किताब की दुकान पर खडे रहने के बाद मनोहर श्याम जोशी की 'कसप' खरीदी । २४ घण्टॆ बाद अहमदाबाद उतरते समय किताब २० पृष्ठ और बाकी थी । वो भी अगले १-२ दिन में खत्म कर दिये । अगले २० दिन काफी व्यस्त रहे सो कुछ पता ही नही चला और एक बार फिर अपने आप को हैदराबाद में पाया । लग रहा था कि फिर थोडा इन्तजार करना पडेगा ।</p>
<p>लेकिन कहते हैं ना जहां चाह वहाँ राह।</p>
<p>हैदराबाद में हर रविवार को <a href="http://www.hyderabad-india.net/areas/abids.html" target="_blank"><em>अबिड्स </em></a>में पटरी(फुट्पाथ) पर पुरानी किताबों का बाजार लगता है, ठीक ठीक वैसा ही जैसा दरियागंज में लगता है । अधिकतर नई बेस्ट्सेलर्स के पायरेटेड संस्करण, भारी तादाद में पुराने अंग्रेजी उपन्यास..(इतना <em>पल्प</em>...२० रुपये में किताबों के सजिल्द संस्करण..पर ना कभी किताब का नाम सुना होगा ना लेखक का) , बच्चों की किताबें..पुरानी पत्रिकाएं..काफी कुछ मिल जाता है ।हर १-२ रविवार छोड कर, मुझे कुछ घन्टे यहाँ वक्त बिताने में काफी मजा आता है...चाहे अपने काम की किताब मिले या ना मिले अथवा कुछ खरीदी हो ना हो लेकिन सिर्फ घूमने, किताबों को उलटने पलटने में ही काफी अच्छा वक्त गुजर जाता है । पर हिन्दी पुस्तकें यहाँ भी नदारद ...कई बार तलाश किया किया पर सिवाय रानू /राजभारती के पुराने सामाजिक उपन्यासों के सिवा कुछ नही मिलता ।</p>
<p>पिछले के पिछले रविवार कुछ हाथ आया..एक दुकान से गुजर रहा था कि कुछ किताबों पर नजर पडी, देखा ...भीष्म साहनी, अचार्य चतुरसेन जैसे कुछ नाम लिखे हुए थे । रुका तो देखा उसके पास अधिकतर हिन्दी और उर्दू की पुस्तकें थीं । अगला आधा घंटा अपना वहीं बीता..और जब चले वापस तो ये १० किताबें अपने हाथ में थी</p>
<p>खामोशी के आंचल में - अमृता प्रीतम<br />
वैशाली की नगरवधू - आचार्य चतुरसेन<br />
बगुला के पंख - आचार्य चतुरसेन<br />
श्री कांत - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय<br />
शेष प्रश्न -  शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय<br />
दो व्यंग नाटक - शरद जोशी<br />
सुरंगमा - शिवानी<br />
प्रेरक प्रसंग (दो भाग) - गीताप्रेस<br />
वांड्चू एवं अन्य कहानियां - भीष्म साहनी</p>
<p>और जरा सोंचिये, कितने दाम चुकाये हमने इन किताबों के...? मात्र १००/- रुपये !!! अपना तो संडे वसूल हो गया भई...आजकल इन्हे ही पढ रहा हूं, अगला एक महीना बडे आराम से कटेगा । :)</p>
<p>पर किस्मत का ताला यहीं बन्द नही होता ना अपना, कूछ दिन पहले ओर्कुट पे घूमते हुए <a href="http://www.orkut.com/Community.aspx?cmm=23370962" target="_blank">हिन्दी ई-पुस्तक</a> समूह से ई-स्निप्स की <a href="http://www.esnips.com/web/hindisahitya" target="_blank">ये कडी</a> हाथ लग गयी , जिसके बारे में बाद में रवि रतलामी जी ने <a href="http://rachanakar.blogspot.com/2007/02/hindi-sahitya-e-book.html" target="_blank">रचनाकार</a> पर लिख ही दिया है , अतः और कुछ लिखने की जरूरत नही है । यहाँ भी छोटा मोटा खजाना ही रखा है । बस अगर आप कम्प्यूटर में आँख गडाये पढ सकते हों तो निश्चय ही मस्त जगह है ।</p>
<p>पुनश्च: - सागर जी, आपका दिया <a href="http://nahar.wordpress.com/2007/02/24/fivequistions/">पर्चा </a>हल करने में थोडी देर लगेगी, पर जल्द ही हाजिर होंगे जवाब लेकर :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गुजरात प्रवास - भाग-२]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/21/gujarat-2/</link>
<pubDate>Wed, 21 Feb 2007 16:40:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[भुज के बाद अपना अगला पडाव था सूरत । यान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/02/19/gujarat-1/" target="_blank">भुज के बाद</a> अपना अगला पडाव था सूरत । याने गुजरात के पश्चिमी कोने से हमें दक्षिणी छोर की ओर जाना था । सूरत भारत का हीरा कटिंग और कपडा उद्योग का केन्द्र माना जाता है, पर सूरत शहर हमारी मंजिल नही थी । हमें जाना था सूरत के आदिवासी इलाके में । सूरत जिले में कुल १४ तालुका (या मंडल) हैं जिनमें से १० आदिवासी बहुल हैं जिनकी कि जनसंख्या का करीबन ८५-९०% हिस्सा आदिवासी है । आदिवासी विकास विभाग के दो कार्यालय हैं इस इलाके में, मांडवी और सोनगढ जहां कि हमे जाना था ।</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/path-ahead.jpg" title="यूँ ही चला चल राही"><img src="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/path-ahead.jpg" alt="यूँ ही चला चल राही" border="3" height="300" width="400" /></a></p>
<p><strong>(य़ूं ही चला चल राही - सूरत-मांडवी)</strong></p>
<p>पहले मांडवी । सूरत से करीब ६० किलोमीटर दूर है, तापी नदी के किनारे बसा हुआ छोटा सा कस्बा है और तालुका मुख्यालय है। इस इलाके में शकर की करीबन १० मिलें हैं, और सूरत से लेकर मांडवी तक का पूरा रास्ता आपको गन्नों के खेतों से अटा हुआ दिखाई देगा । अब तक मैं यही समझता था कि गन्ना सिर्फ़ महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में ही होता है, पर यहाँ गन्ने की इतनी खेती देख कर अपने अज्ञानता का अहसास हुआ ।</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/sugarcane.jpg" title="गन्ना और मक्का"><img src="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/sugarcane.jpg" alt="गन्ना और मक्का" align="middle" border="3" height="300" width="400" /></a></p>
<p><strong>(गन्ने और मक्का की मिश्रित फसल । गन्ने का खेत अभी तैयार किया गया है, बडे पौधे मक्का के हैं जिसे चारे के लिये जल्द ही काट लिया जायेगा) </strong></p>
<p>मांडवी के वन विभाग विश्राम गृह (जहां हम रुके थे) से काकरापाडा परमाणु बिजली घर की चिम्नियाँ दिखाई देती हैं, एवं थोडे ही ऊपर कांकरापाडा बांध बना हुआ है । इलाके की विसंगति ये है कि जहाँ जहाँ कांकरपाडा की नहर है, वहाँ खूब फसल होती है अर किसान समद्ध हैं, पर जहाँ नहर नही पहुँची, वहाँ किसानों को एक फसल के भी लाले हो जाते हैं..और ये अंतर आपको २०-२५ इलोमीटर के फासले पर ही मिल जायेगा । मेरे साथी मोहसिन जी इससे पहले दाहोद-पंचमहल के आदिवासी क्षेत्र का दौरा कर चुके थे, अतः दोनों जगहों की तुलना करने से अपने आपको नही रोक पा रहे थे । दाहोद की तुलना में ये इलाका काफी समृद्ध और विकसित है । चाहे वो कृषि हो, पशुधन या शिक्षा । गाँवों के स्कूलों की तारीफ़ करनी होगी, चहे कितना भी छोटा स्कूल क्यं ना हो, साफ सुथरा, पेड पौधों से सुसज्जित और सुंदर होगा ।</p>
<p>ज्यादातर गाँवों में हर परिवार से १-२ लोग सूरत जाते हैं...काम या तो हीरा कटिंग, या किसी मिल में मजदूरी । शकर मिलों में यहाँ के लोगों को नही रखते...बाहर से मजदूर बुलाये जाते हैं..लगभग यही समस्या हमने भुज में भी देखी थी । सूरत जाने वाले मजदूर ८-१५ दिन में घर आते हैं एक बार... । युवाओं में शिक्षा का स्तर कमोबेश ठीक ही है, लेकिन समस्या ये है कि पढे लिखे लडके, याने जवान पीढी खेती/पशुपालन नही करना चाहती ।गाँव में जाइये..किसी भी युवा लडके से पूँछिये..<br />
"भाई, क्या करते हो ?..."<br />
"कुछ नही ।"<br />
"अरे..कुछ तो करते होंगे..."<br />
"हाँ ,खेती करते हैं ।"</p>
<p>यह वार्तालाप एक दो नही हर जगह पर हुआ । मुख्य फसलें, जहाँ पानी है वहाँ गन्ना और चावल, जहाँ पानी नही वहाँ ज्वार । थोडी बहुत तुवर, मूंगफली, मक्का आदि भी होती है ।कुछ जगहों पर सब्जी भी उगाई जाती है । व्यारा तालुका के अंतापुर गाँव की तस्वीर है । जानकर आश्चर्य हुआ के ये भिंडी निर्यात के लिये छाँटी जा रही है...</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/export-quality.jpg" title="export-quality.jpg"><img src="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/export-quality.jpg" alt="export-quality.jpg" align="middle" border="3" height="300" width="400" /></a></p>
<p>अपनी जिन्दगी का अहला विस्थापित गाँव हमने देखा, निजर तालुका में, जो कि सोनगढ में आता है । गाँव का नाम,  हाथनूर । विस्थापित हुए, उकाई बाँध के चलते । उकाई बाँध तापी नदी पर ही बना है और महाराष्ट्र गुजरात की सीमा तक फ़ैला हुआ है । करीबन सन ७० में यह बाँध बना था, जिसके चलते ये लोग विस्थापित हुए । ३७ साल बाद भी लोग इस बात को भूले नही है । हाथनूर पहले महाराष्ट्र में आता था, और १९६० में, बाँध निर्माण की योजना के समय गुजरात में चला गया । आज भी लोगों से पूंछिये 'काम करने कहाँ जाते हो'..जवाब मिलेगा गुजरात ।आधा आधा किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए गाँव, बोली में हल्का सा मराठी का घालमेल । समस्या ये कि बाँध तो बना, पर बाँध का फायदा इन्हे नही मिला, नहरें तो सारी निचले इलाके में हैं । उकाई बाँध पर बिजली संयंत्र भी है। और पास ही में एक कागज मिल भी है ।</p>
<p>और आखिर में बात दूध डेरियों की । इनके बिना गुजरात का वर्णन अधूरा ही होगा ना । हर गाँव में आपको दूध मंडली मिल जायेगी, जिसे की दूध सहकारी भी बोला जाता है । पूरे गाँव का दूध यह मंडली इकट्ठा करती है, इसका अपना भवन एवं कार्यालय होता है । यह दूध इकट्ठा करके निकटतम प्रशीतन केन्द्र पर भिजवा दिया जाता है । हर किसान की अपनी एक डायरी होती है जिसमे कि दूध की मात्रा व वसा के हिसाब से रोज का भुगतान दर्ज किया जाता है, जो महीने के आखिर में मिलता है । हालांकि अधिकतर जगहों पर हमें वसा नापने के यंत्र नही मिले...इस स्थिती में यह नपाई प्रशीतन केन्द्र पर दूध पहँचाए जाने के समय होती है । प्रशीतन केन्द्र पर दिन में एक बार जिला दुग्ध सहकारी (District Milk Cooperative) की गाडी आती है (सूरत में सुमूल) और दूध ले जाती है । पशुधन किसी भी किसान की अर्थव्यस्था की रीढ होता है । लेकिन नस्ल (अधिकतर गाय भैंसों की) बहुत अच्छी नही थी । कहने को सब्सीडी मिलती है सरकार से (करीब ६०००/- की), भैंस खरीदने के लिये, लेकिन इसी सब्सीडी के चलते १५०००/- की भैस काश्तकार के २५ से ३० हजार में पड जाती है..इतने लोचा हो जाता है बीच में ।फिर भी कहूंगा कि कम से कम मेरे गृह राज्य राजस्थान से यहाँ पशु/दूध की स्थिति बहुत बेहतर है । बस यही बात समझने की कोशिश करता रहा कि ये सहकारी आंदोलन, जो गुजरात मे इतना सफल हुआ, भारत के अन्य राज्यों में क्यों नही चल पाया ?</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/sunset.jpg" title="sunset.jpg"><img src="http://saptrang.files.wordpress.com/2007/02/sunset.jpg" alt="sunset.jpg" align="middle" border="3" height="300" width="400" /></a></p>
<p><strong>(तापी नदी के पीछे ढलता सूरज - चित्र मांडवी वन विश्राम गह के पास से, जहाँ अपन रुके थे &#124; सभी चित्र - मोहसिन जी) </strong></p>
<p>(अगली मंजिल - अहमदाबाद - तरकश टीम से मुलाकात....)</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[गुजरात प्रवास (जो याद रहा)]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/19/gujarat-1/</link>
<pubDate>Mon, 19 Feb 2007 17:39:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[कच्छ, भारत का पश्चिमी कोना, हिन्दुस्ता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कच्छ, भारत का पश्चिमी कोना, हिन्दुस्तान का दूसरा सबसे बडा जिला । इसी कच्छ के जिला मुख्यालय भुज में अपने कदम पडे २६ जनवरी २००७ की शाम को, याने भूकम्पी गणतंत्र दिवस के ठीक छः साल बाद । गुजरात का यह मेरा पहला प्रवास था, २००५ में एकदिवसीय दाहोद यात्रा को छोड दूं तो, और काफ़ी कुछ सोंचा हुआ था मैने गुजरात को लेकर । अगले २२ दिनों में काफी कुछ नया जाना, देखा और समझा ।</p>
<p>पहली बात जो ध्यान गयी, अहमदाबाद में ही, वो था गुजरातियों का गुजराती प्रेम । अब से पहले मैं यही समझता था कि गुजरात में हिन्दी ही 'ज्यादा' बोली और प्रयोग में ली जाती है, लेकिन अपन गलत साबित हुए...दुकानों के साइनबोर्ड हों, या बसों के, या चौराहों पर, सर्वत्र गुजराती का बोलबाला है, शायद यही वजह भी है, गुजराती चिट्ठा संसार के काफी समृद्ध होने की । भुज पहुँचे तो पता चला, यहाँ गुजराती नही, 'कच्छी' बोली जाती है । कच्छी शायद गुजराती और सिंधी का घालमेल है, और पूरे कच्छ में यही बोली जाती है । एक और बात पता चली, कच्छी सिर्फ़ बोली जाती है, लिखे नही जाती, याने इसकी लिपी नही है । और समझने में गुजराती से थोडी कठिन भी है ।</p>
<p>कच्छ ..और भुज, २००१ के भूकम्प के बाद दुनिया की निगाहों में आया था, भूकम्प को ६ साल हो गये लेकिन उसके निशान आज भी कई जगहों पर दिख जाते हैं, कई इमारतों में आज भी दरारें पडी हुई हैं...(और लोग भी रह रहे हैं) । भूकम्प राहत के नाम पर खूब पैसा आया है, लेकिन ज्यादातर लोगों की शिकायत है कि उन्हे पर्याप्त राहत नही मिली ।</p>
<p>भुज के आसपास घूमने को कई जगहें हैं लेकिन अफसोस कि मैं कहीं नही जा पाया । हाँ लेकिन शहर की कच्ची बस्तियों में खूब घूमा । आबादी का एक बडा हिस्सा मुस्लिम है, और लगभग हर घर में 'बाँधनी' (कपडे में गठान बाँध कर रंगाई) का काम होता है जो मुख्यतः घर की महिलाएं करती हैं । भुज का मिट्टी का काम भी बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन एक मात्र कलाकार जिनसे मैं मिल पाया, ने बताया कि यह लगभग विलुप्ति की कगार पर है, युवा पीढी सीखना नही चाहती इसे ।</p>
<p>कच्छ , विशेष कर अंजार, गाँधीधाम और काँडला, औद्योगिक दृष्टि से काफ़ी समृद्ध हैं, लेकिन भुज इस मामले में थोडा पीछे लगा । वैसे भुज के आसपास भी फ़ेक्ट्रियाँ हैं, लेकिन यहाँ के लोगों को इससे ज्यादा रोजगार नही मिलता । ज्यादातर मानव संसाधन बाहर से लाया जाता है, अहमदाबाद आदि से। और उत्तर प्रदेश , बिहार के लोग तो बहुतायत में हैं । लोग कहते हैं कि कंपनियां यहाँ के लोगों को नौकरी नही देती, कंपनियाँ कहती है कि यहाँ के लोग काम नही करना चाहते । हालत ये है कि जिस होटल में हम रुके वहाँ ८०% सटाफ नेपाली था । वैसे ये बात यहाँ के लोग भी स्वीकारते हैं कि कच्छी आदमी चाहे छोटी सी दुकान खोल ले लेकिन किसी की नौकरी करना पसंद नही करता, खुद के धंधे को प्राथमिकता देते हैं । वैसे भी, पूरे भारत में गुजराती लोग अपनी उद्यमिता के लिये जाने जाते हैं ।</p>
<p>सडकें गुजरात में काफी अच्छी हैं, अंदरूनी गाँवों तक भी, लेकिन राज्य परिवहन की बसें इतनी खटारा कि दिल दहल जाए । दो मिसालें देखी, अहमदाबाद से भुज जाते वक्त एक जगह ढाबे पे बस रुकी, हम इंतजार कर रहे थे, कि पीछे से खचाखच भरी हुई एक बस आई, देख कर दंग रह गये कि बस की पूरी विंडस्क्रीन गायब थी, और लोग आगे तक बैठे थे । दूसरी घटना सूरत के सोनगढ तालुका की है, राज्य परिवहन की चलती हुई एक बस के पीछे के चारों पहिये बाहर निकल गये....और बस वहीं बैठ गई, गनीमत है, घटना शहर में हुई जहाँ ट्रेफ़िक की वजह से गति कम थी, सो कोई हादसा नही हुआ । खैर, हमें ज्यादा सफ़र नही करना पडा इन बसों में ।</p>
<p>आगे .....सूरत का आदिवासी क्षेत्र और अहमदाबाद में तरकश टीम से मुलाकात ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अवलोकन २००६]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/12/21/avlokan/</link>
<pubDate>Thu, 21 Dec 2006 05:45:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पता नही इस बार बीतते हुए साल का तरीके स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पता नही इस बार बीतते हुए साल का तरीके से अवलोकन कर पाऊंगा या नही, पर जो सबसे सरल काम कर सकता हूँ...साल में पढी गई पुस्तकों की सूची तो बना ही ली जाए...</p>
<p><strong>२००६ में पढी गई पुस्तकें</strong></p>
<p>The Afghan - Fredrick Forsyth<br />
Fist of God - Fredrick Forsyth<br />
The Match - Romesh Gunashekhara<br />
Mediocore but Arrogant - Abhijit Bhaduri<br />
Timeline - Michael Crichton<br />
Airframe - Michael Crichton<br />
One night at the call center - Chetan Bhagat<br />
Making of an MBA: snapshots from hell- Peter Robinson<br />
The department of Denials -Anurag Mathur<br />
The Old Man and His God - Sudha Murthy</p>
<p><strong>आधी पढी पुस्तकें</strong><br />
Third Wave- Alvin Toffler<br />
Human Zoo - Desmond Morris<br />
Everybody Loves a Good Draught - P Sainath<br />
Jurrasic Park - Michael Crichton<br />
राग दरबारी - श्री लाल शुक्ल (ब्लागर साथियों के सहयोग से)</p>
<p>पिछले साल के मुकाबले इस साल गिनती थोडी कम रही, कारण नौकरी । कालेज का समय अच्छा था...खूब वक्त निकाल लेते थे पढने के लिये ।इसी चक्कर मे ये पाँच पुस्तकें पिछले २-३ महीने से आधी-पौनी पढ पाया हूं</p>
<p>हाँ एक काम जो अच्छा शुरू किया है, नियमित रूप से किताबें खरीदने लगा हूँ, और यह भी निश्चय किया है कि पाइरेटेड पुस्तकें नही खरीदूंगा :).</p>
<p>बाकी का अवलोकन देखते हैं...कर पाते हैं या नही</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक सवाल, एक टिप्पणी]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/12/14/workshop1/</link>
<pubDate>Thu, 14 Dec 2006 19:19:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले दिनों एक दस दिवसीय कार्यशाला आय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले दिनों एक दस दिवसीय कार्यशाला आयोजित करवाई थी । कुछ अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभागी भी थे। आखिरी दिन दो अलग अलग मेहमानों ने दो अलग अलग बातें कहीं</p>
<p>भोजन करते वक्त सेनेगल के एक प्रतिभागी पूंछ बैठे, "क्या आपके यहाँ हमेशा खडे होकर भोजन करने की परंपरा है?"<br />
मैं अवाक रह गया । लेकिन प्रश्न अपनी जगह सही था, मैने गौर किया तो पाय कि पिछले १० दिन में भी टेबल कुर्सी की व्यवस्था होने के बावजूद अधिकतर लोग खडे होकर बातें करते हुए भोजन कर रहे थे ।<br />
खैर, मैं काफ़ी देर तक उन्हे समझाता रहा कि परम्परागत रूप से तो भारत में जमीन पर बैठ कर भोजन किया जाता है पर...जमाना बदल रहा है।</p>
<p>एक अन्य टिप्पणी खुश कर देने वाली थी, सेनेगल के ही एक अन्य प्रतिभागी बोले, "मैं अपनी जिन्दगी में कभी नही सोंच सकता था कि मैं इतने दिन तक माँस खाये बिन रह पाऊँगा । मैं विश्वास नही कर सकता कि शाकाहारी भोजन भी इतने तरीके से पकाया और खाया जा सकता है कि माँसाहार की जरूरत ही महसूस नही होती ।"(वैसे उन्हे दिन में एक बार निरामिष भोजन उपलब्ध कराया जाता था, पर पता नही वो खाते थे या नही) जाते जाते बोले, मैं अपने देश जाकर भी इन सब चीजों को बनाने/खाने की कोशिश करूंगा...वाह जी वाह...सेनेगल में आलू का परांठा :), क्या कहने :D</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खाना-पीना इन हैदराबाद....]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/25/hyderabad_food/</link>
<pubDate>Mon, 25 Sep 2006 18:48:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/25/hyderabad_food/</guid>
<description><![CDATA[हैदराबाद में करीब ६ महीने हो गये हैं औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हैदराबाद में करीब ६ महीने हो गये हैं और इन छः महीनों में सबसे ज्यादा धक्के खाना खाने के लिये खाए हैं ...ना जाने कितने होटलों के मत्थे टेके हैं, कितने रेस्त्राओं को आजमा कर देखा है । इसी लेकर कुछ राज की बातें-ज्ञान की बातें-काम की बातें, जो अपन ने अपने अनुभव से जानी, देखी, सीखीं, समझीं । </p>
<p>'टिफ़िन' का मतलब होता है नाश्ता और 'मील्स'  मतलब खाना...याने अगर दफ़्तर में कोई आपसे पूँछे कि "Had your Tiffin?" तो उसे अपना लंचबाक्स मत दिखाने लगिये...वो पूँछ रहा है कि क्या आप नाश्ता कर चुके?</p>
<p>चपाती और फुल्का और रोटी तीन अलग अलग चीजें है..<br />
चलिये आपको इनका अंतर भी समझा देते हैं,चपाती और फुल्का, मैदा के बनते हैं, आटा प्रयोग करने का चलन नही है इधर । फुल्का बोले तो मैदा की लोई को जरा सा चपटा किया, और एक मिनट तक डोसे वाले तवे पर गरम होने दिया । बस और कुछ नही करना, फुल्का तैयार..ये आपको मील्स के साथ बोनस के तौर पर दिया जाता है। चपाती फुल्के की बडी बहन है, और मेरे हिसाब में हमारी तरफ़ पाये जाने वाले परांठे की भी दूर की रिश्तेदार हो सकती है । इसके अंतर्गत फुल्के से  थोडी बडी और नरम लोई को बेल कर उसी डोसे वाले तवे पे डाल दें, ऊपर से थोडे नारियल तेल के छींटे दे दें, थोडा उलट पलट दें। बस चपाती तैयार । और रोटी...अबे वो क्या होती है...वो इधर नही मिलती ।<br />
वैसे फुल्के और चपाती की खासियत ये है, कि थाली में परोसने के १० मिनट तक अगर आपने इन्हे खुल्ला छोड दिया, तो फ़िर चाहे आप पेप्सोडेंट लगातें हों, या लाल दंत मंजन...आप इन्हे नही चबा सकते...अजी चबाना छोडिये, टुकडे करने में पसीने आ जायेंगे ।</p>
<p>आप को रोटी खानी हो या पूरी या डोसा, साथ में नारियल चटनी ही मिलेगी...न ना..अचार तक नही मिलेगा..अगर आप अड गये तो पहले आपको समझाया जायेगा कि नही 'साsssर' अचार रोटी के साथ नही देते (थोडा आश्चर्य भी जताया जायेगा, कि कैसा बेवकूफ़ है, चपाती/पूरी के साथ अचार मांग रहा है)...फ़िर थोडी बहस कीजिये...फ़िर समझौता..कि भाई चटनी ना दे..बस अचार दे दे</p>
<p>सब्जी(दाल/सांभर) में डालने के लिये एक प्याज या टमाटर के दो से ज्यादा टुकडे करना वर्जित है। अगर प्याज/टमाटर छोटा है  तो पूरा भी चलेगा (क्या फ़र्क पडता है, उबलने के बाद सब एक जैसे हो जायेंगे)। लौकी के टुकडे कम से कम एक क्यूबिक इंच के जरूर हों, इससे छोटे नही।  गनीमत है, कद्दू का ज्यादा चलन नही है ।</p>
<p>ऊपर वाला नियम हरी मिर्च पर भी लागू होता है</p>
<p>सलाद याने कच्ची प्याज/टमाटर या ककडी नाम की कोई चीज नही होती...पर सांभर में कोई सी भी सब्जी (गाजर,लौकी,बैंगन...)किसी भी मात्रा में और किसी भी आकार में डाली जा सकती है।</p>
<p>झाडू से अपनी जिन्दगी में फ़र्श ही साफ़ होते देखा था..लेकिन नही, डोसा बनाने का तवा भी इससे साफ़ किया जाता है (सींक वाला झाडू)</p>
<p>कोई भी मील्स दही के बिना अधूरा है...दही नही तो सही नही ।</p>
<p>चावल के साथ आपको सांभर,रसम,दाल,एक सूखी सब्जी और कोई चटनी भी मिल जायेगी...पर रोटी (सारी चपाती के साथ...सिर्फ़ नारियल चटनी और पता नही कौन सी सब्जी)...बहुत नाइंसाफ़ी है !!!!</p>
<p>हरी सब्जी (साग) का यहाँ चलन नही है...उसकी कमी सांभर/रसम/नारियल चटनी में करी पत्ता डाल कर पूरी कर ली जाती है. अब करी पता के साथ दिक्कत ये है कि उसे चबाकर निगलना बडा मुश्किल है..इसलिये छाँटना पडता है</p>
<p>चाय में अदरक/इलायची/चाय मसाला डालने का कोई रिवाज नही है,  यहाँ तक कि दूध और चाय को साथ साथ उबालते भी नही हैँ, चाय का पानी अलग, दूध अलग और ऐन मौके दोनो को चीनी के साथ मिलाया और पकडा दी(एकदम फ़ारेन श्टाइल में)...अब यार जब तक पत्ती दूध में ना उबले तब तक भला चाय का भी कोई मजा है?</p>
<p>अब कुछ अच्छी बातें भी (इसका मतकब ये नही है कि ऊपर मैने बुरी बातें लिखी थी ;) )...</p>
<p>इधर अधिकतर होटल्स में बर्तन गर्म पानी से धोये जाते हैं, और विशेषकर चम्मच तो हमेशा ही गर्म पानी में डूबी हुई मिलती है।</p>
<p>पीने का पानी बाकायदा स्टील के जग-गिलास में ही मिलता है,और ढँका हुआ होता है...वो सीमेंट की खुली टंकी, और प्लास्टिक के जग नही दिखते।</p>
<p>हैदराबाद में शाकाहारी भोजन की समस्या नही आती,'सिर्फ़ शाकाहारी' होटल बहुतायत में हैं, बहुरूपता भी है खाने में। पर उत्तर भारतीय को ज्यादा समय दक्खिन का खाना हजम नही हो सकता..इसी लिये तो ऊपर इतना रोना रोया है। फ़िर भी हैदराबाद को पूरा दक्षिण भारत का हिस्सा कहना उचित न होगा, और चेन्नई और बैंगलोर जैसे शहरों के मुकाबले उत्तर भारतीयों के लिये यहाँ ज्यादा आसानी होती है।</p>
<p>और हाँ, कुछ चीजें जिनकी खूब याद आती है..गरमागरम पोहा-जलेबी,  दाल-बाटी,  सादा रोटी-सब्जी :(<br />
 <br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या ईश्वर है?]]></title>
<link>http://kulbulahat.wordpress.com/2006/02/24/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%88%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Fri, 24 Feb 2006 14:08:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>Vijay Wadnere</dc:creator>
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<description><![CDATA[बात बहुत छोटी है, और, पता नहीं जो मैं बत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बात बहुत छोटी है, और, पता नहीं जो मैं बता रहा हूँ वह कितनो को सच लगेगी और कितनो को समझ आयेगी। पर फ़िर भी, मन में बात आई है और लोगों तक पहुँचाने का माध्यम भी सहजता से उपलब्ध है तो कह देना ही बेहतर होगा।</p>
<p>मैं खुद को न आस्तिक कहता हूँ और ना ही नास्तिक। आस्तिक इसलिए नहीं क्योंकि मुझे "भगवान" को मनाने का तरीका नहीं पसन्द। मुझे कभी नहीं लगा कि "भगवान" पुजा करने से, आरती करने से, प्रसाद चढाने से या फ़िर मुर्ति के सामने आँख बन्द कर हाथ जोड कर खडे रह कर मन्त्रादि का जाप करने से आपकी बात सुन ही लेते हैं। नास्तिक इसलिए नहीं क्योंकि मुझे लगता है कि कोई तो शक्ति कहीं ना कहीं जरुर है जो "सब देखती है", "सब कंट्रोल करती है"। और फ़िर बात आस्था की भी होती है। हम विश्वास करते हैं कि सब कुछ बिगड़ने पर भी "कोई" तो है जो हमारी रक्षा करेगा। कब करेगा, कैसे करेगा यह कोई नहीं जानता। और शायद जान भी नहीं पाएगा।</p>
<p>यहाँ मैं यह भी कहुँगा कि अगर मैं आस्तिक हूँ तो किसी एक धर्म विशेष के लिए नहीं। यह मेरी आस्था है जो मुझे किसी मंदिर में भी वही महसूस करवाती है जो किसी मस्जिद के सामने से निकलने पर महसूस होती है। अगर मैं मंदिर में बिना हाथ जोडे भी खड़ा हूँ तो हो सकता है कि मैं उस "अज्ञात शक्ति" से कुछ अपने मन की बात कह रहा हूँ, कुछ "अच्छा" करने की सिफ़ारिश कर रहा हो सकता हूँ। मगर किसी मंत्र का जाप करने का विचार तक नहीं आता। वैसे यह एक बहुत ही सामान्य सा व्यहार है इंसान का कि - अपना बोझ अपने से बड़े के उपर डाल के खुद को बड़ा मुक्त सा समझता है, शांति पाता है। शायद यही आस्था है।</p>
<p>मैं एक वाकया बताना चाहुँगा जो किसी के लिए तो "चमत्कार" हो सकता है, पर किसी के लिए मात्र एक "संयोग"। अभी कुछ दिनों पहले मैं काफ़ी परेशान था। कारण, मेरा मोबाईल चोरी हो गया था। मोबाईल, वह भी पहला-पहला, हालांकि साल भर इस्तेमाल कर चुका था, मगर, मेहनत की कमाई के 5 रू भी जाया होते हैं तो दुःख होता है। मुझे तो होता है। मगर फ़िर भी, मोबाईल का इतना दुख नही था जितना उसमें स्टोर किये हुए डाटा का। किसी और के लिए भले ही वह काम का ना हो, मेरे लिये तो था। तो मैं दुखी था अपने डाटा के लिये। कुछ समझ नही आ रहा था। पुलिस अपना काम उनकी ही गति से कर रही थी। उम्मीद न के बराबर थी। और फ़िर वही याद आये- जिन्हें हम भगवान कहते हैं। मंदिर गया, "भगवान" से कुछ बातें की, मन थोड़ा शांत हुआ। खुद को समझाया कि अपनी ही किसी "action" की यह "reaction" है। घर पर पहले ही "गणेशजी" और "लक्ष्मीजी" की फ़ोटो लगा रखी थी। घर आकर सोच रहा था कि- ऐसे मामलो में "हनुमानजी" की ज्यादा धाक होती है, काश, मेरे पास उनकी भी कोई तस्वीर होती। अगले दिन जब आफ़िस जाने के लिए निकला तब भी यही बात मन में थी कि "बजरंगबली" को भी अपने घर ले आते हैं। यही सोचते सोचते मैं अपने बस स्टाप तक आ गया। पता नहीं क्या सोचा और बस स्टाप के बजाय स्टाप के पहले ट्राफ़िक सिग्नल के पास ही खड़ा रह गया। शायद यह सोचा होगा कि, सिग्नल पर बस रुकेगी तो वहीं से सवार हो जाऊंगा। फ़ुटपाथ पर ही इंतज़ार करने लगा। 5 मिनिट एक ही जगह खड़े रहने के बाद मैं स्वाभाविक रुप से चहलकदमी करते हुए थोडी दूर गया और एक पेड़ से टिक कर खड़ा हो गया। कुछ ही क्षणों पश्चात् अचानक ही मेरी नज़र जमीन पर पड़ी जहाँ एक छोटी सी तस्वीर पड़ी हुई दिख रही थी। थोड़ा गौर से देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। देखने से लग रहा था कि कोई पाकेट कैलेण्डर है। सोचा कि कैसे लोग होते हैं, जो पिछले साल का कैलेण्डर फ़ैकते समय यह भी नही देखते कि क्या फ़ैक रहे हैं। "तिरंगा" तो बहुधा दिखता है हर 26 जनवरी या 15 अगस्त के बाद, "भगवान" की तस्वीर के भी वही हाल दिखे। मुझसे तो रहा नही गया, उठा ही ली। देखा तो जाना वह "बजरंगबली" की ही तस्वीर थी। मन में काफ़ी विचार आए, यूँ भगवान की तस्वीर मिलना, वह भी तब जब वही इच्छा थी, मगर विश्लेषण नहीं कर सका। कहने की जरुरत नहीं कि तब से वह तस्वीर मेरे पास है।</p>
<p>इस तरह "बजरंगबली" का मेरे पास आना (अब इसे तो मैं खुद चल कर आना ही कहुँगा) सिर्फ़ एक संयोग मात्र था या कुछ और, मैं किसी निश्कर्श तक नहीं पहुँच सका। शायद कोई इसे समझा सके।</p>
<p>मैंने यह कभी नही सोचा था कि किसी ऐसे विषय पर कुछ लिखुंगा, किंतु बात हुई ही कुछ ऐसी है कि लिखे बिना रहा भी नहीं गया। फ़िलहाल तो मन को कुछ शांति मिली है।</p>
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