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	<title>इस्लाम &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/इस्लाम/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "इस्लाम"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 10:21:56 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भारत में इस्लाम]]></title>
<link>http://mkasim.wordpress.com/?p=4</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 03:00:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>sim786</dc:creator>
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<description><![CDATA[
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<br />
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[आतंकवाद विरोधी मुस्लिम पहल के निहितार्थ ]]></title>
<link>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=85</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 07:59:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
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<description><![CDATA[31 मई दिन शनिवार, दिल्ली के रामलीला मैदा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>31 मई दिन शनिवार, दिल्ली के रामलीला मैदान पर प्रमुख इस्लामी संगठनों की पहल पर एक आतंकवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन एक बार फिर सहारनपुर स्थित प्रसिद्ध मदरसा दारूल उलूम देवबन्द की पहल पर आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में मुख्य रूप से दारूल उलूम देवबन्द, जमायत उलेमा ए हिन्द, जमायत इस्लामी, नदवातुल उलेमा लखनऊ और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्यों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में देश भर के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधित्व का दावा किया गया। दारूल उलूम देवबन्द के मुख्य मुफ्ती हबीबुर्रहमान द्वारा तथाकथित फतवे पर हस्ताक्षर किये गये जिसके प्रति सभी उपस्थित लोगों ने सहमति व्यक्त की और इस फतवे के अनुसार किसी भी प्रकार की अन्यायपूर्ण हिंसा की निन्दा की गयी और जेहाद को रचनात्मक और आतंकवाद को विध्वंसात्मक घोषित किया गया। आयोजकों के दावे के अनुसार इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से तीन लाख लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन में आने वालों में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोग शामिल थे। </p>
<p>इससे पूर्व सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी शिक्षा केन्द्र और तालिबान के प्रमुख सदस्यों मुला उमर और जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर के प्रेरणास्रोत रहे दारूल उलूम देवबन्द ने 25 फरवरी को भी देश भर के विभिन्न मुस्लिम पंथों के उलेमाओं को आमंत्रित कर आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया था। उस पहल को अनेक लोगों ने ऐतिहासिक पहल घोषित किया था और एक बार फिर रामलीला मैदान पर हुई आतंकवाद विरोधी सभा को एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है। परंतु जिस प्रकार फरवरी माह में हुए उलेमा सम्मेलन के निष्कर्षों पर देश में आम सहमति नहीं थी कि ऐसी पहल का इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैला रहे लोगों पर क्या प्रभाव होगा उसी प्रकार का प्रश्न एक बार फिर आतंकवाद विरोधी सम्मेलन से भी उभरता है। </p>
<p>इस सम्मेलन में फतवे की भाषा और वक्ताओं का सुर पूरी तरह उलेमा सम्मेलन की याद दिलाता है। सम्मेलन में पूरा जोर इस बात पर था कि किस प्रकार यह सिद्ध किया जाये कि इस्लाम और पैगम्बर की शिक्षायें आतंकवाद को प्रेरित नहीं करती और इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है। इसके साथ एक बार फिर जेहाद को इस्लाम का अभिन्न अंग घोषित करते हुए उसे आतंकवाद से पृथक किया गया। इसमें ऐसा नया क्या है जिसको लेकर इस सम्मेलन या फतवे को ऐतिहासिक पहल घोषित किया जा रहा है। जब से इस्लामी आतंकवाद का स्वरूप वैश्विक हुआ है तब से इस्लामी बुध्दिजीवी और धर्मगुरु इस्लाम को शांतिपूर्ण धर्म बता रहे हैं और जेहाद को एक शांतिपूर्ण आन्तरिक सुधार की प्रक्रिया घोषित कर रहे हैं परंतु उनके कहे का कोई प्रभाव उन आतंकवादी संगठनों पर नहीं हो रहा है जो जेहाद और इस्लाम के नाम पर आतंकवाद में लिप्त हैं। वास्तव में एक बार फिर इस सम्मेलन ने हमारे समक्ष एक बडा प्रश्न खडा कर दिया है कि क्या इस्लामी संगठन, धर्मगुरु या फिर बुद्धिजीवी इस्लामी आतंकवाद का समाधान ढूँढने के प्रति वाकई गम्भीर हैं। उनके प्रयासों की गहराई से छानबीन की जाये तो ऐसा नहीं लगता। </p>
<p>वास्तव में इस्लामी आतंकवाद को एक सामान्य आपराधिक घटना के रूप में जो भी सिद्ध करने का प्रयास करता है वह इसे प्रोत्साहन देता है। इस्लामी आतंकवाद एक वृहद इस्लामवादी आन्दोलन का एक रणनीति है और इस आन्दोलन का उद्देश्य राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करना है। समस्त समस्याओं का समाधान इस्लाम और कुरान में है, विश्व की सभी विचारधारायें असफल सिद्ध हो चुकी हैं और इस्लाम ही सही रास्ता दिखा सकता है, पश्चिम आधारित विश्व व्यवस्था अनैतिकता फैला रही है और उसके मूल स्रोत में अमेरिका है इसलिये अमेरिका का किसी भी स्तर पर विरोध न्यायसंगत है, इस्लामी आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं है यह समस्त विश्व में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार का परिणाम है, आज मीडिया इस्लाम को बदनाम कर रहा है, फिलीस्तीन में मुसलमानों के न्याय हुआ होता तो और इजरायल का साथ अमेरिका ने नहीं दिया होता तो इस्लामी आतंकवाद नहीं पनपता। ऐसे कुछ तर्क राजनीतिक इस्लाम के हैं जो इस्लामवादी आन्दोलन का प्रमुख वैचारिक अधिष्ठान है और इन्हीं तर्कों के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता विश्व पर स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। क्या किसी भी इस्लामी संगठन ने इन तर्कों या उद्देश्यों से अपनी असहमति जताई है। इसका स्पष्ट उत्तर है कि नहीं। </p>
<p>31 मई को रामलीला मैदान में जो तथाकथित आतंकवाद विरोधी रैली हुई उसमें भी जिस प्रकार के तेवर में बात की गयी वह यही संकेत कर रहा था कि इस रैली में मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को ही प्रोत्साहित किया गया और अमेरिका के विरोध में जब भी वक्ताओं ने कुछ बोला तो खूब तालियाँ बजीं। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका शैतान है या नहीं यहाँ प्रश्न यह है कि एक ओर आतंकवाद को इस्लाम से पृथक कर और फिर इस्लामी आतंकवाद के मूल में छिपी अवधारणा को बल देकर इस्लामी संगठन किस प्रकार आतंकवाद से लड्ना चाहते हैं। किसी तर्क का सहारा लेकर यदि आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराये जाने का प्रयास हो तो फिर आतंकवाद की निन्दा करना एक ढोंग नहीं तो और क्या है। आज बडा प्रश्न जो हमारे समक्ष है वह राजनीतिक इस्लाम की महत्वाकांक्षा और इस्लामवादी आन्दोलन है जो इस्लाम में ही सभी समस्याओं का समाधान देखता है। वर्तमान समय में अंतरधार्मिक बहसों में भाग लेने वाले और ऐसी बहसें आयोजित कराने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवी भी आतंकवाद के सम्बन्ध में ऐसी अस्पष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं कि उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है। ऐसे ही एक मुस्लिम विद्वान हैं डा. जाकिर नाईक उनके कुछ उद्गार सुनकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ यू ट्यूब के वीडियो प्रस्तुत हैं। जिन्हें देखकर कोई भी सोचने पर विवश हो सकता है कि मुस्लिम बुध्दिजीवी किस प्रकार इस्लामवादी आन्दोलन का अंग हैं और अंतर है तो केवल रणनीति का है। http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI</p>
<p>http://www.youtube.com/watch?v=KAdwy5IJzj4&#38;feature=related</p>
<p>http://www.youtube.com/watch?v=_MtddCCuaC8&#38;feature=related</p>
<p>http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI&#38;feature=related</p>
<p>31 मई के सम्मेलन के सन्दर्भ में जाकिर नाइक का उल्लेख करना इसलिये आवश्यक हुआ कि आज उन्हें एक नरमपंथी और उदारवादी मुसलमान माना जा रहा है जो बहस में विश्वास करता है परंतु उनके भाव स्पष्ट करते हैं कि आज आतंकवाद की समस्या को एक प्रतिक्रिया के रूप में लिया जा रहा है और इसके लिये मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का सृजन किया जा रहा है। मुस्लिम उत्पीडन की इस अवधारणा का भी वैश्वीकरण हो गया है। एक ओर जहाँ इजरायल और फिलीस्तीन का विवाद समस्त विश्व के इस्लामवादियों के लिये आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने का सबसे बडा हथियार बन गया है वहीं स्थानीय स्तर पर भी मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा रची जाती है और इसका शिकार बनाया जाता है देश के पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों को।</p>
<p> रामलीला मैदान में जो भी पहल की गयी उसकी ईमानदारी पर सवाल उठने इसलिये भी स्वाभाविक हैं कि इस सम्मेलन या रैली में एक बार भी इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले वैश्विक और भारत स्थित संगठनों के बारे में इन मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अपनी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की। इन तथाकथित शांतिप्रेमियों ने एक बार भी सिमी, इण्डियन मुजाहिदीन, लश्कर, जैश का न तो उल्लेख किया और न ही उनकी निन्दा की या उनके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट की। वैसे आज तक ओसामा बिन लादेन के उत्कर्ष के बाद से विश्व के किसी भी इस्लामी संगठन ने उसके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की और अमेरिका पर किये गये उसके आक्रमण को मुस्लिम उत्पीडन की प्रतिक्रिया या फिर आतंकवादी अमेरिका पर आक्रमण कह कर न्यायसंगत ही ठहराया। सम्मेलन में जयपुर में आतंकवादी आक्रमण में मारे गये लोगों की सहानुभूति में भी कुछ नहीं बोला गया और पूरा समय इसी में बीता कि इस्लाम को आतंकवाद से कैसे असम्पृक्त रखा जाये। ऐसे में एक बडा प्रश्न हमारे समक्ष यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध इस युद्ध में हम इन इस्लामी संगठनों की पहल को लेकर कितना आश्वस्त हों कि इससे सब कुछ रूक जायेगा। क्योंकि समस्या के मूल पर प्रहार नहीं हो रहा है। </p>
<p>25 फरवरी को दारूल उलूम देवबन्द ने उलेमा सम्मेलन किया और एक माह के उपरांत ही मध्य प्रदेश में सिमी के सदस्य पुलिस की गिरफ्त में आये और मई की 13 दिनाँक को जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हो गया। जुलाई 2006 को मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के बाद अब तक 9 श्रृखलाबद्ध सुनियोजित विस्फोट हो चुके हैं और इन सभी विस्फोटों में भारत के मुस्लिम संगठनों और सदस्यों की भूमिका रही है। इससे स्पष्ट है भारत में मुसलमान वैश्विक जेहादी नेटवर्क से जुड गया है और वह मुस्लिम उत्पीडन की वैश्विक और स्थानीय अवधारणा से प्रभावित हो रहा है। जब तक इस्लामी संगठन इस अवधारणा के सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते और आतंकवाद के स्थान पर आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध फतवा नहीं जारी करते उनकी पहल लोगों को गुमराह करने के अलावा और किसी भी श्रेणी में नहीं आती। </p>
<p>इस्लामी आतंकवाद आज इस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ से उससे लड्ने के लिये एक समन्वित प्रतिरोध की आवश्यकता है और ऐसी पहल जो पूरे मन से न की गयी हो या जिसमें ईमानदारी का अभाव हो उससे ऐसी प्रतिरोधक शक्ति कमजोर ही होती है जिसका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी-उदारवादी लाबी ऐसे प्रयासों को महिमामण्डित कर प्रस्तुत करती है ताकि इस्लामी आतंकवाद के मूल स्रोत, विचारधारा और प्रेरणा पर बह्स न हो सके। ऐसे प्रयासों के मध्य हमें अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है और साथ ही इस पूरी समस्या को एक समग्र स्वरूप में व्यापक इस्लामवादी आन्दोलन के रणनीतिक अंग के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सिमी का फैलता जाल ]]></title>
<link>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=72</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 16:04:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
<guid>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=72</guid>
<description><![CDATA[सिमी का फैलता जाल 
 
प्रतिबन्धित इस्ला]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">सिमी का फैलता जाल </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">प्रतिबन्धित इस्लामी संगठन स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आफ इण्डिया या संक्षिप्त रूप में जिसे सिमी के नाम से जाना जाता है अब खुफिया एजेंसियों के लिये काफी बडा सिरदर्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार सिमी ऐसा पहला आतंकवादी संगठन है जिसने देश के अन्दर बडे पैमाने पर देशी आतंकवादियों का नेटवर्क खडा कर लिया है और इन खुफिया एजेंसियों का यह भी मानना है कि यह देश में कार्यरत अनेक मुस्लिम चरमपंथी संगठनों के साथ मिलकर काम ही नहीं कर रहा है वरन उनके साथ मिलकर नेटवर्क को और अधिक व्यापक बना रहा है। यह खुलासा मार्च के महीने में इन्दौर से पकडे गये सिमी के 13 सदस्यों में से एक अमील परवेज के साथ पुलिस की पूछताछ के दौरान हुआ। परवेज ने बताया कि सिमी हैदराबाद स्थित चरमपंथी इस्लामी संगठन दर्सगाह जिहादो शहादत के साथ के साथ काफी निकट से सम्बद्ध है और इसके साथ मिलकर काम कर रहा है।</span></p>
<p><span style="font-family:Mangal;">पूछ्ताछ के दौरान इस रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि इस्लामी संगठन मिलकर काम कर रहे हैं और इनका विशेषकर सिमी का व्यापक नेटवर्क देश भर में स्थापित हो चुका है। पुलिस से पूछ्ताछ के दौरान अमील परवेज ने बताया कि दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने उसे मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिये बुलाया था। इसके बाद पुलिस इस कोण पर भी जाँच कर रही है कि सिमी के देश भर में ऐसे कितने इस्लामी संगठनों के साथ सम्बन्ध हैं। पुलिस की इस बात को स्वीकार कर रही है कि यह तो एक<span>  </span>शुरूआत भर है और ऐसे कितने ही रहस्य अभी आगे खुलने शेष हैं।</span></span><span style="font-family:Batang;"><br />
<span style="font-size:small;"><span> </span></p>
<p></span></span><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इससे पूर्व भी हैदराबाद में दर्सगाह की गतिविधियों के बारे में और इसके उग्र स्वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला था जब गुजरात के पूर्व मंत्री हरेन पाण्ड्या की हत्या के आरोपी मौलाना नसीरुद्दीन को पुलिस ने पकडा तो दर्सगाह के सदस्यों ने पुलिस पर पथराव कर उसे पुलिस की पकड से छुडाने का प्रयास किया और जबरन पुलिस की गाडी से उसे ले जाने का प्रयास करने लगे। इस घटना के उपरांत पुलिस ने जब भीड को तितर बितर करने के लिये गोली चलाई तो दर्सगाह का कार्यकर्ता मुजाहिद सलीम इस्लाही गोलीबारी में मारा गया।</span><span style="font-family:Times New Roman;">.</p>
<p><span></span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">हैदराबाद के पुलिस आयुक्त ने भी स्वीकार किया कि वे इस संगठन के बारे में जानते हैं और सम्भव है कि सिमी के कुछ पूर्व सदस्य इस संगठन से सम्बद्ध हों। दर्सगाह के सम्बन्ध में उसकी वेबसाइट </span><span><a href="http://www.djsindia.org/"><span style="font-family:Times New Roman;">www.djsindia.org</span></a><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span><span style="font-family:Mangal;">से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसकी वेबसाइट के अनुसार इस संगठन का उद्देश्य मुस्लिम युवकों<span>  </span>को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना और इस हेतु उन्हें प्रशिक्षण देना जो कि सशस्त्र भी हो सकता है। इस संगठन के अनुसार उसका प्रमुख उद्देश्य हिजाब के सिद्धांत को सख्ती से लागू कराना, शरियत, मस्जिद और कुरान की पवित्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना, स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करना,<span>  </span>इस्लामी सुधार के लिये मार्ग प्रशस्त करना और अंत में इसके उद्देश्य में कहा गया है कि अल्लाह और इस्लाम <span> </span>की सर्वोच्चता स्थापित करना। लेकिन जिस बात ने खुफिया एजेंसियों को इस संगठन के सम्बन्ध में सर्वाधिक सतर्क किया है वह है इसके प्रशिक्षण की एक व्यवस्था जिसके अंतर्गत हैदराबाद के बाहरी क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट लोगों को छांटकर प्रशिक्षण दिया जाता है। परवेज ने पुलिस को बताया कि उसने 2007 में दो प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया था और इन शिविरों में अनेक कठिन प्रशिक्षण दिये गये जिनमें चाकू छूरी चलाने से लेकर पेट्रोल बम बनाने तक का प्रशिक्षण था। इस वेबसाइट ने एक किशोर का चित्र भी लगा रखा था जिसके हाथ में एक पट्टिका थी जिस पर लिखा था </span><span><span style="font-family:Times New Roman;">“</span></span><span style="font-family:Mangal;"> कुरान हमारा संविधान है और मैं उसका सिपाही</span><span><span style="font-family:Times New Roman;">”</span></span><span style="font-family:Mangal;"> परंतु कुछ समाचार पत्रों में इसके बारे में समाचार प्रकाशित होने के बाद फिलहाल इस चित्र को वहाँ से हटा दिया गया है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">पुलिस से पूछ्ताछ में जब सिमी और दर्सगाह के परस्पर सम्बन्धों की बात निकली तो दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने सिमी के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्धों से तो इंकार किया और कहा कि उनके संगठन के अन्य किसी संगठन से सम्बन्ध नहीं है परंतु यह माना कि देश भर में उनके 10-12 केन्द्र हैं और कौन कहाँ प्रशिक्षण प्राप्त करता है इसका रिकार्ड रखना सम्भव नहीं है। परवेज ने पूछ्ताछ में बताया कि प्रशिक्षण के दौरान शिविर के प्रभारी सफदर और कमरुद्दीन ने उसे बताया था कि यह आरम्भिक प्रशिक्षण है और इसके बाद जो लोग छांटे जायेंगे उन्हें पुनः प्रशिक्षित किया जायेगा। </span></span><span style="font-family:Batang;"><br />
</span><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Times New Roman;">.</p>
<p><span></span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">परवेज की पूछ्ताछ में सिमी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस्लामी संगठनों से सम्पर्क की बात सामने आयी है 1997 में अलीगढ में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता सिमी के तत्कालीन अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही ने की थी और उस सम्मेलन में परवेज के साथ 20 वर्षीय फिलीस्तीनी मूल के हमास नामक फिलीस्तीनी आतंकवादी संगठन के सदस्य शेख सियाम ने भी भाग लिया था। परवेज ने पूछ्ताछ के दौरान यह भी स्पष्ट किया है कि 2001 में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लग जाने के बाद भी किस प्रकार यह सक्रिय रहा और अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा। परवेज के अनुसार काफी सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद सफदर नागौरी और नोमन बद्र ने इस संगठन को नये सिरे से खडा किया। परवेज के अनुसार नगौरी ने उससे कहा कि वह प्रतिबन्ध हटवाने का पूरा प्रयत्न करेगा और इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देगा।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">पिछ्ले महीने मध्य प्रदेश में इन्दौर में पकडे गये सिमी के सदस्यों ने देश के समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं। 2001 में प्रतिबन्ध लगने के बाद भी यह संगठन कभी निष्क्रिय नहीं हुआ और पिछ्ले दो तीन वर्षों में देश में हुई बडी आतंकवादी घटनाओं में इसका हाथ रहा है या इसी संगठन ने उन्हें अंजाम दिया है। इस संगठन की सक्रियता के मूल कारण पर जब हम विचार करते हैं तो हमें कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से दिखायी पडते हैं एक तो हमारे राजनीतिक दलों द्वारा इस्लामी आतंकवाद के मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर देखना और दूसरा इस्लामी धार्मिक नेतृत्व या बुध्दिजीवियों द्वारा आतंकवाद को हतोत्साहित करने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को प्रोत्साहित कर सरकार, राज्य, प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को कटघरे में खडा कर इस्लामी प्रतिरोध की शक्तियों को कुण्ठित करना। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">2001 में जब तत्कालीन एन.डी.ए सरकार ने सिमी पर पहली बार प्रतिबन्ध लगाया तो उस समय विपक्ष की नेत्री श्रीमती सोनिया गाँधी ने इसकी आलोचना की और उनका साथ उनके ही दल की सदस्या अम्बिका सोनी ने दिया। फिर जब सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली यू.पी.ए की सरकार केन्द्र में बनी तो इस सरकार ने भी सिमी पर प्रतिबन्ध को जारी रखा। यह उदाहरण संकेत करता है कि आतंकवाद जैसे मह्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बन पायी है और इसे भी राजनीतिक मोल तोल के हिसाब से देखा जा रहा है। राजनीतिक दलों के इस रवैये का सीधा असर सुरक्षा एजेंसियों पर पड्ता है जो तमाम जानकारियों और प्रमाणों के बाद भी आरोपियों पर कार्रवायी करने में हिचकती हैं या उन्हें कार्रवायी धीरे धीरे करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों ही दशाओं में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वालों का मनोबल बढता है और वे अवसर पाकर अपनी ताकत और अपना नेटवर्क बढा लेते हैं। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">प्रतिबन्ध के बाद भी सिमी का इस मात्रा में सक्रिय रहना और ताकतवर रहना एक और मह्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख ऊपर भी किया गया है कि इस्लामी धर्मगुरूओं और बुद्धिजीविओं की भूमिका इस सम्बन्ध में सन्दिग्ध है। अभी कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित प्रमुख इस्लामी संस्थान दारूल- उलूम </span><span><span style="font-family:Times New Roman;">–</span></span><span style="font-family:Mangal;"> देवबन्द ने आतंकवाद के सम्बन्ध में एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उस सम्मेलन के द्वारा इस्लाम और आतंकवाद के मध्य किसी भी सम्बन्ध से इन्कार किया तो भी जैसे प्रस्ताव वहाँ पारित हुए उनमें राज्य, प्रशासन, पुलिस को ही निशाना बनाया गया और पूरे प्रस्ताव में सिमी जैसे संगठनों के बारे में एक भी शब्द नहीं बोला गया। पिछ्ले लेख में भी लोकमंच में इस बात को उठाया गया था कि एक ओर तो आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सिमी का नेटवर्क फैलता जा रहा है। यहाँ तक कि सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि सिमी का नेटवर्क दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत के अनेक प्रांतों में फैल चुका है। इससे तो यही संकेत मिलता है कि ऐसे संगठनों को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव है। सरकार जिसका नेतृत्व राजनीतिक दल कर रहे है उनमें ऐसे तत्वों को रोकने की शक्ति नहीं है क्योंकि उनके लिये मुस्लिम वोट अधिक महत्व रखते हैं और इस्लामी धर्मगुरूओं या बुद्धिजीवियों में इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे तत्वों को रोकने की इच्छा नहीं है क्योंकि यदि उनमें ऐसी इच्छा होती तो वे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को सशक्त बनाकर या खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को निशाने पर लेकर इस्लामी आतंकवादियों को बचने का रास्ता नहीं प्रदान करते।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">देश भर में सिमी के फैलते जाल ने हमारे समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं जिनके प्रकाश में इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। यह समस्या एक विचारधारा से जुडी है और उस विचारधारा की तह तक जाना होगा। इस समस्या को बेरोजगारी या अल्पसंख्यकों के देश की मुख्यधारा से अलग थलग रहने जैसे सतही निष्कर्षों से बाहर निकल कर पूरी समग्रता में लेने की आवश्यकता है। उन तथ्यों का पता लगाने की आवश्यकता है कि इस्लामी धर्मगुरु और बुध्दिजीवी आखिर क्योंकर इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों के विरुद्ध मुखर होकर उन्हें इस्लाम विरोधी घोषित नहीं करते। </span></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फतवा  और आतंकवाद साथ- साथ ]]></title>
<link>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=71</link>
<pubDate>Sun, 13 Apr 2008 09:39:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
<guid>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=71</guid>
<description><![CDATA[पिछ्ले दिनों जब उत्तर प्रदेश में सहार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">पिछ्ले दिनों जब उत्तर प्रदेश में सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी संस्था दारूल उलूम देवबन्द ने आतंकवाद की भर्त्सना करने जैसा दिखने वाला एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उसमें आतंकवाद और इस्लाम के मध्य परस्पर किसी भी सम्बन्ध से इंकार करते हुए भी अनेक ऐसी बातें कहीं जो इन मौलवियों या इस्लामी धर्मगुरुओं की नीयत पर प्रश्न खडा करने के लिये पर्याप्त था। इन बातों में सबसे प्रमुख बात यह थी कि आतंकवाद के नाम पर सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ निर्दोष मुसलमानों को निशाना बना रही हैं और उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है। इसी क्रम में इस सम्मेलन में कहा गया कि मदरसों को भी नाहक परेशान किया जा रहा है। इस उलेमा सम्मेलन की काफी चर्चा हुई और अनेक लोगों ने इसे अत्यंत सकारात्मक पहल घोषित किया। भारतीय जनता पार्टी के नेता और एक प्रमुख हिन्दी दैनिक में वरिष्ठ स्तम्भकार ने तो इस सम्मेलन को नरमपंथी इस्लाम के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम की सन्ज्ञा तक दे डाली तो वहीं कुछ अन्य लेखकों ने इस मामले पर काफी सधी टिप्पणी की। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इस विषय पर लोकमंच में प्रकाशित किये गये आलेख में उलेमा सम्मेलन को लेकर कुछ प्रश्न खडे किये गये थे और इस सम्मेलन के प्रस्तावों और इसमें हुई चर्चा के आधार पर आशंका प्रकट की गयी थी कि ऐसे प्रयास एक सोची समझी रणनीति का अंग हैं जिसका प्रमुख उद्देश्य समाज में इस्लामवाद के प्रतिरोध की शक्ति को कुन्द करना है और इस पूरी बहस में आतंकवाद की प्रेरणास्रोत विचारधारा पर चर्चा होने से रोकना है। यह विषय इस समय फिर से लाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं।</span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">मार्च महीने से लेकर इस अप्रैल महीने तक भारत में अनेक इस्लामी आतंकवादी नेटवर्क या आतंकवादी गिरफ्तार किये गये हैं। <span> </span>इसमें सबसे उल्लेखनीय गिरफ्तारी सिमी के सदस्यों की है। मार्च के महीने में इन्दौर में सिमी के कुछ सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद एक के बाद एक राज खुलते गये और अंततोगत्वा मध्य प्रदेश के एक क्षेत्र चोरल में सिमी के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर का भी पता चला और यह भी पता लगा कि यहाँ छोटे बच्चों को भी सशस्त्र प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और उन बच्चों को शिविर में देखभाल के लिये महिलाओं का एक बल शाहीन बल के नाम से गठित गिया गया था। सिमी के पकडे गये सदस्यों में इस संगठन का मुखिया सफदर नागौरी<span>  </span>भी शामिल है जिसका 11 जुलाई को मुम्बई के ट्रेन धमाकों के सिलसिले में मुम्बई के सिमी को जेल से पत्र लिखने का मामला भी काफी चर्चा में आया और इससे इन धमाकों में सिमी के लिप्त होने की पुष्टि भी हो गयी। मध्य प्रदेश से ही पकडे गये सिमी के सद्स्यों से पता चला कि हैदराबाद में मक्का मस्जिद में हुए धमाकों के तार भी सिमी से जुडे हैं। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">पिछ्ले वर्ष कर्नाटक में आतंकवादी प्रशिक्षण होने का समाचार एक चौंकाने वाली घटना थी और अब मध्य प्रदेश में ऐसे शिविर के मिलने से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि भारत में आतंकवाद का आधारभूत ढाँचा अब निर्णायक स्थिति में पहुँच गया है और इस सम्स्या पर समग्रता से विचार करने की आवश्यकता है। समग्रता से तात्पर्य है कि इस समस्या के पीछे के विचारधारागत स्रोत को पहचानने की आवश्यकता है। क्या इस सम्बन्ध में सार्थक प्रयास हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश इसका उत्तर नकारात्मक है। ऐसा इसलिये है कि भारत में बहुत कम संख्या में लोग ऐसे हैं जो इस समस्या को कानून व्यवस्था से परे कहीं अधिक व्यापक सन्दर्भ में देखना चाह्ते हैं। यह बात सत्य है कि इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद को पूरी तरह इस्लाम धर्म से नहीं जोडा जा सकता परंतु यह भी सत्य है कि इसके पीछे की प्रेरणास्रोत विचारधारा पूरी तरह इस्लाम से प्रेरणा ग्रहण करती है और इसका उद्देश्य भले ही विश्व में शक्ति के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करना और विश्व का संचालन शरियत या इस्लामी कानून के आधार पर सुनिश्चित करना हो इस राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा से इस्लामी धर्म के विद्वान और धर्मगुरु भी असहमत नहीं दिखते। यही विषय सर्वाधिक चिंता का कारण है और इसी कारण अंतर्धार्मिक बह्सों या आडम्बरी फतवों से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">अभी कुछ दिनों पूर्व मुझे किसी मित्र ने मुम्बई स्थित इस्लामिक रिसर्च फाउण्डेशन और उसके प्रमुख डा. जाकिर नाइक के सम्बन्ध में बताया। उनके सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा से जब इण्टरनेट पर ढूँढा तो मुझे कुछ विषयों पर घोर आश्चर्य हुआ और उनके कुछ विचार इतने असहिण्णु दिखे कि उनमें और इस्लामवादी आतंकवादियों के एजेण्डे में विशेष अंतर नहीं दिखा। वीडियो की प्रसिद्ध साइट यू-ट्यूब पर डा. जाकिर नाइक का एक वीडियो है जो प्रसिद्ध इस्लामी चैनल </span><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;">Q TV </span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">के प्रश्नोत्तर पर आधारित है इस वीडियो में डा जाकिर नाइक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस्लाम को छोडकर शेष सभी धर्म गलत हैं और वे गलत सीख देते हैं इसी कारण इस्लामी देशों में गैर मुस्लिम धर्मों का प्रचार या उनके उपासना स्थल बनाने की आज्ञा नहीं दी जा सकती। इस सम्बन्ध में तर्क के लिये उन्होंने एक उदाहरण दिया है जो अत्यंत रोचक है उनके अनुसार यदि किसी विद्यालय के प्रधानाचार्य के पास तीन व्यक्ति गणित का अध्यापक बनने आयें और प्रधानाचार्य उससे प्रश्न पूछे कि दो और दो कितने होते हैं और उनमें से एक का उत्तर हो चार, दूसरा कहे पाँच और तीसरा कहे छह तो प्रधानाचार्य उसी को अध्यापक नियुक्त करेगा जो उत्तर में दो और दो चार कहेगा न कि पाँच और छ्ह कहने वाले को। नाइक के अनुसार शेष दो को लगता है कि दो और दो पाँच और छह होता है पर प्रधानाचार्य को पता है कि यह गलत है इसलिये वह गलत शिक्षा अपने छात्रों को नहीं लेने देगा। जाकिर नाइक के अनुसार यही फार्मूला धर्म के मामले में भी है। गैर इस्लामी धर्मों को लगता है कि उनकी शिक्षायें ठीक हैं परंतु इस्लाम के अनुयायी जानते हैं कि वे गलत हैं और यदि किसी का दीन( धर्म) सही है तो वह सिर्फ इस्लाम है। यही कारण है कि इस्लामी देशों में अपने धर्म का प्रचार करने या उपासना स्थल बनाने की छूट गैर मुसलमानों को नहीं है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">डा. जाकिर नाइक को इन दिनों अंतरधार्मिक विमर्श के सम्बन्ध में और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन का विशेषज्ञ माना जाता है जो इसी विषय पर विश्व के अनेक देशों में व्याख्यान देते हैं। ऐसे व्यक्ति के विचार यदि इतने असहिण्णु हैं जो इस्लामी सर्वोच्चता के सिद्धांत से परिपूर्ण है उससे इस बात कि अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है कि वह ऐसे प्रयासों से विश्व में सहिण्णुता की स्थिति निर्माण करने में सहायक हो सकेगा। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इन्हीं महोदय ने मुम्बई में ही एक हिन्दू और इस्लाम के मध्य समानताओं के विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया जिसका पूरा वीडियो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। इस पूरे व्याख्यान में केवल एक बार कुछ मिनटों के लिये आर्य समाज के तीन विद्वानों को वैदिक ऋचाओं के पाठ के लिये मंच पर स्थान दिया गया और उसके उपरांत दोनों धर्मों की समानता पर डा जाकिर नाइक का एकपक्षीय भाषण होता रहा परंतु उनके भाषण का लब्बोलुआब यही रहा कि यदि हिन्दू इस्लाम की भाँति अल्लाह को सर्वोच्च ईश्वर स्वीकार करे तो ही दोनों धर्मों में सद्भाव सम्भव है। यह सन्दर्भ इसलिये मह्त्वपूर्ण है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी यही तर्क देते हैं कि उनका उद्देश्य गलत दीन का पालन कर रहे लोगों को अल्लाह के सही रास्ते पर लाना है। यही तर्क यदि इस्लाम के जानकार और विद्वान भी देते हैं कि इस्लाम के अतिरिक्त शेष धर्म अन्धकारमय हैं तो चिंता होती है कि इन दोनों की सोच में अंतर नहीं है अंतर है तो केवल उद्देश्य प्राप्त करने के तरीके में। एक इतना असहिण्णु है कि उसकी बात न मानने वाले को मौत के घाट उतार देता है और दूसरा यह कह कर लानत भेजता है कि तुम गलत रास्ते पर हो और सही रास्ता हमारा है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">विश्व के अनेक देशों में और विशेषकर यूरोप में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के तथाकथित प्रतीकों पर भी चर्चा का दौर आरम्भ हो गया है और इस विषय को लेकर इस्लाम में कुछ बेचैनी भी अनुभव की जा रही है तो भी भारत में यह विषय अब भी बह्स की परिधि से बाहर है और पिछ्ले महीने देश की राजधानी में बुद्धिजीवियों के मध्य एक घटना घटित हुई जिस पर विशेष संज्ञान नहीं लिया गया परंतु यह घटना हमारी लेख की इस विषयवस्तु को पुष्ट ही करती है कि जब भी आतंकवाद के नाम पर वामपंथियों या इस्लामवादियों द्वारा कोई बहस आयोजित की जाती है तो वह पूरे विषय के मूल स्रोत पर चर्चा करने के स्थान पर इस विषय पर केन्द्रित हो जाती है कि किस प्रकार मुसलमानों का उत्पीडन आतंकवाद को प्रेरित करता है। आज समस्त विश्व में मुस्लिम उत्पीडन की एक मिथ्या अवधारणा को सृजित किया गया है और इसके इर्द-गिर्द इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">पिछ्ले महीने 2 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी स्थित उर्दू प्रेस क्लब में आतंकवाद और फासिज्म: एक ही सिक्के के दो पहलू विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी और इसमें प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्त्री और लेखिका अरुन्धती राय, संसद पर आक्रमण के दोषी रहे और फिर साक्ष्यों के अभाव में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरी किये गये गिलानी, प्रसिद्ध टी वी पत्रकार मनोज रघुवंशी सहित अनेक मुस्लिम वक्ता भी थे। उस कार्यक्रम में भाग लेने गये विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता सुरेन्द्र जैन ने आँखो देखा हाल बताया कि अरुन्धती राय और गिलानी ने भारत सरकार को जमकर कोसा और निष्कर्ष निकाला कि भारत में कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं है और घोर अराजकता का माहौल है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">पत्रकार मनोज रघुवंशी ने मुस्लिम उत्पीडन के नाम पर इस्लामी आतंकवाद तो न्यायसंगत ठहराने की प्रवृत्ति की आलोचना की तो पूरे सभाकक्ष में शोर मचने लगा। इसके बाद हसनैन नामक एक वक्ता बोलने के लिये उठे और उन्होंने श्री राम और सीता पर अभद्र टिप्पणियाँ की और श्री राम को युद्ध प्रेमी सिद्ध कर दिया। इनके बाद जब विश्व हिन्दू परिषद के नेता सुरेन्द्र जैन बोलने आये तो उन्होंने श्री राम पर की गयी टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि इसी प्रकार की टिप्पणियाँ आपके पैगम्बर पर की जायें तो आपको कैसा लगेगा। इसके बाद तो सभाकक्ष में जम कर बवाल हो गया और मंच पर तथा दर्शकों में से लोगों ने वक्ता को घेर लिया और हाथापाई की नौबत आ गयी। किसी ने वक्ता को धमकाते हुए कहा कि 6 दिसम्बर से अब तक 10 हिन्दुओं को मार चुका हूँ और 11वाँ नम्बर तेरा है। मंच पर 13 से 15 लोगों ने वक्ता को घेर लिया और काफी देर बाद पुलिस आयी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता को सुरक्षित निकाल ले जा पाई। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इस घटना के भी निहितार्थ हैं। इस्लाम के धर्मगुरु या विद्वान जब व्याख्यान देते हैं तो इस अजीब तर्क पर जोर देते हैं कि इस्लाम का आकलन उसके धर्मग्रंथों के आधार पर किया जाना चाहिये न कि उसके अनुयायियों के आधार पर क्योंकि अनुयायी प्रायः धर्म को सही नहीं समझते और उनका आचरण धर्म के विपरीत होता है। इस धारणा को अंग्रेजी में</span><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> Apologetic </span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">कहते हैं इसके लिये हिन्दी में कोई समानान्तर शब्द नहीं है परंतु ये वही लोग हैं जो अपने तर्कों के आधार पर इस्लामी आतंकवाद को इस्लाम से अस्पृक्त भी करते हैं और आतंकवाद को मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा के आधार पर न्यायसंगत भी ठहराते हैं। यह प्रवृत्ति कितनी खतरनाक है इसका पता उपर्युक्त उदाहरण से बखूबी चलता है कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले मुसलमान भी दूसरे धर्मों के महापुरुषों का सम्मान नहीं करते और उनपर टिप्पणी करना अपना लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं और वही अधिकार जब उनके शीर्ष पुरुषों के सम्बन्ध में प्रयोग किया जाता है तो इसे ईशनिन्दा मानकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। यह अवधारणा किस ओर संकेत करती है और ऐसे लोग इस्लामी आतंकवाद की आग बुझाने में कितने सक्षम होंगे इसका निष्कर्ष पाठक ही निकालें तो </span><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">श्रेयस्कर होगा। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">आजकी सबसे बडी आवश्यकता इस्लामी आतंकवाद को व्यापक सन्दर्भ में समझने और उसके पीछे की मूल प्रेरणा को पहचानने की है। क्योंकि यह कानून और व्यवस्था का प्रश्न नहीं है इसके पीछे एक सोच है और जब तक उस सोच पर प्रहार नहीं होगा तब तक आतंकवाद से मुक्ति प्राप्त कर लेने से भी इस्लामी सर्वोच्चता और शरियत लागू करने की सोच से प्रेरित इस्लामवाद पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती क्योंकि इस्लामवादी केवल आतंकवादी नहीं हैं वे भी हैं जो इसी उद्देश्य को शांतिपूर्ण तरीके से प्राप्त करना चाह्ते हैं। ऐसे तत्वों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है।<span>  </span></span><span style="font-size:10pt;"><span><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;"><span> </span></span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस्लाम में बेचैनी ?]]></title>
<link>http://amitabhtri.wordpress.com/?p=70</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 15:41:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
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<description><![CDATA[लोकमंच ने अपने पिछले कुछ लेखों में उल्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">लोकमंच ने अपने पिछले कुछ लेखों में उल्लेख किया है कि किस प्रकार <a href="http://lokmanch.com/index.php/clashes-between-west-and-islam.html">पश्चिम और इस्लाम</a> आपस में टकराव की मुद्रा में आ गये हैं। इस्लामी और पश्चिम जगत में घट रही घटनायें इसी प्रवृत्ति की ओर बार बार संकेत कर रही हैं। पिछ्ले महीने दो विशेष घटनायें घटित हुईं जो इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्धों में और तनाव उत्पन्न कर सकती हैं और इनमें से एक घटना तो निश्चय ही ऐसी है जो दीर्घगामी स्तर पर प्रभाव डाल सकती है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">22 मार्च को ईसाइयों के मह्त्वपूर्ण पर्व ईस्टर के दिन वेटिकन में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट ने मिस्र मूल के मुसलमान और पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे मगदी आलम को पूरे विधिविधान से ईसाइत में दीक्षित कर लिया। मगदी आलम पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे थे और इस विषय पर भी मतभेद था कि मगदी आलम क्या आस्थावान मुसलमान थे या नहीं। यह विषय सर्वप्रथम 2007 में चर्चा में आया था जब लन्दन के मेयर द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में मध्य पूर्व के प्रसिद्ध विद्वान और इस्लामी विषयों के जानकार डा. डैनियल पाइप्स ने इस्लामवाद से लडाई के लिये सभ्यतागत लोगों के मध्य सहयोग की आवश्यकता जताते हुए उन्होंने मगदी आलम को एक इस्लाम धर्मानुयायी बताया जो नरमपंथी हैं और उनका सहयोग लेने की बात कही। इस बात पर एक और इस्लामी विद्वान तारिक रमादान ने आपत्ति जताते हुए डा. डैनियल पाइप्स पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि मगदी आलम एक ईसाई हैं। डा. डैनियल पाइप्स ने इसका खण्डन किया और प्रमाणित किया कि मगदी आलम एक मुसलमान हैं। यह सन्दर्भ यहाँ इसलिये महत्वपूर्ण है कि इस्लामी विषयों पर नजर रखने वाले लोगों के मध्य यह खासी चर्चा का विषय बना था। यह भ्रम इसलिये भी बना क्योंकि मगदी आलम का मध्य का नाम क्रिस्टोफर है। परंतु जब 22 मार्च को पोप ने विधिवत ढंग से मगदी आलम का धर्मांतरण कराया तो इस विषय में कोई सन्देह नहीं रह गया कि मगदी आलम एक मुसलमान थे। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">यह विषय अत्यंत मह्त्व का इसलिये है कि इतने बडे पैमाने पर एक वैश्विक मह्त्व वाले दिन एक महत्वपूर्ण मुसलमान का धर्मांतरण करा कर कैथोलिक चर्च ने क्या सन्देश देने का प्रयास किया है। विशेषकर इन समाचारों के मध्य कि विश्व में कैथोलिक जनसंख्या अब मुसलमानों के बाद दूसरे स्थान पर आ गयी है। यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कुल ईसाई अब भी मुसलमानों से अधिक हैं केवल कैथोलिक सम्प्रदाय दूसरे स्थान पर आ गया है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">मगदी आलम ने धर्मांतरण के उपरांत तत्काल एक बयान दिया और अपने पुराने धर्म पर टिप्पणी करते हुए कहा कि समस्त विश्व में जो कुछ भी आतंकवाद इस्लाम के नाम पर चल रहा है उसके लिये इस्लाम धर्म भी उत्तरदायी है। इस घटना के अपने निहितार्थ हैं। अर्थात कैथोलिक सम्प्रदाय अपनी संख्या की पूर्ति के लिये उन मुसलमानों को अपने शिविर में लाने से परहेज नहीं करेगा जो इस्लाम धर्म बदलना चाहेंगे। इससे इस्लाम और कैथोलिक चर्च में टकराव सुनिश्चित है। क्योंकि अभी तक चर्च खुलेआम मुसलमानों का धर्मांतरण करने से परहेज करता था और अंतर्धार्मिक बह्स के लिये इस्लाम से बातचीत के लिये अधिक उत्सुक दिख रहा था। परंतु अब इस नये घटनाक्रम से स्पष्ट है कि चर्च इस्लाम के विषय पर अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने की फिराक में है जिसमें धर्मांतरण का जवाब धर्मांतरण से देने की नीति अपनाई गयी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इस्लामी विश्व में किसी मुसलमान को अपना धर्म छोडने की आज्ञा नहीं है और ऐसा करने पर उसके लिये मृत्युदण्ड का विधान है। मगदी आलम के धर्मांतरण से भी ऐसे ही प्रश्न उठने वाले हैं क्योंकि मगदी आलम एक इस्लामी राज्य का मूलनिवासी है। तो क्या यह माना जाये कि यह धर्मांतरण एक विशेष राजनीतिक सन्देश है जो इस्लाम धर्म के उन तमाम अनुयायियों को एक सन्देश है जो इस्लाम में बेचैनी अनुभव कर रहे हैं परंतु धर्मांतरण के कडे नियमों के चलते धर्म बदलने के बारे में नहीं सोच पाते। यह इस्लाम की दृष्टि से एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि इससे पूर्व जितने भी मुसलमानों ने इस्लाम की आलोचना की थी उन्होंने धर्म परिवर्तन के विकल्प पर विचार नहीं किया था चाहे वह सलमान रश्दी हों, तस्लीमा नसरीन हों या फिर<span>  </span>सोमालिया मूल की अयान हिरसी अली हों। इन लोगों ने यूरोप के देशों में या अन्य देशों में शरण तो ले ली परंतु धर्म नहीं छोडा। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इसके पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख कारण थे एक तो ये लोग इस्लाम धर्म छोडने को लेकर इस्लाम में मृत्युदण्ड की व्यवस्था से चिंतित थे और अपने जीवन पर और अधिक संकट नहीं लाना चाह्ते थे और दूसरा कारण यह कि सामान्य रूप से पश्चिम और विशेष रूप से कैथोलिक चर्च इस्लाम के साथ प्रत्यक्ष रूप से टकराव मोल नहीं लेना चाह्ता था। तो प्रश्न यह उठता है कि अब परिस्थितियों में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया<span>  </span>है कि चर्च इस्लाम के मह्त्वपूर्ण व्यक्ति का धर्मांतरण करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहा है जबकि कैथोलिक चर्च के साथ इस्लाम की ओर से अंतर्धार्मिक बातचीत में लगे प्रतिनिधि भी मानते हैं कि मगदी आलम के ईसाई बनने से से दोनों के मध्य सद्भाव के प्रयास को झटका लगेगा और दोनों पक्षों के सम्बन्धों में तनाव आ सकता है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">कैथोलिक चर्च के दृष्टिकोण में यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। कैथोलिक चर्च पिछ्ले कुछ वर्षों से इस्लामी जगत के मध्य यह विषय उठाता रहा है कि यदि ईसाई बहुल देशों में इस्लाम धर्म के अनुयायियों को हर प्रकार की धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है और उन्हें प्रार्थना करने या मस्जिद बनाने की स्वतंत्रता है तो फिर मुस्लिम बहुल देशों में भी ईसाई धर्म के अनुयायियों को यही स्वतंत्रता मिलनी चाहिये और समानता के इस सिद्धांत पर जोर पोप जान पाल के समय से ही देना आरम्भ कर दिया गया था जब वैटिकन के विदेश मंत्री स्तर के जीन लुइस तौरोन ने पहली बार 2003 में स्पष्ट रूप से कहा था कि मुस्लिम बहुल देशों में ईसाइयों के साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसा व्यवहार हो रहा है।<span>  </span>पोप बेनेडिक्ट के समय में इस सिद्धांत पर अधिक आग्रह किया जाने लगा। इसी का परिणाम था कि अनेक अरब देशों में चर्च बनाने के प्रस्तावों पर चर्चा होने लगी यह बात और है कि इसका स्थानीय कट्टरपंथी मौलवियों ने कडा विरोध किया और ऐसे प्रस्तावों का प्रतिफल अभी तक सामने नहीं आया है परंतु ऐसे प्रस्तावों पर चर्चा कैथोलिक चर्च के कठोर रूख की ओर संकेत अवश्य देता है तो क्या माना जाये कि चर्च अब अधिक मुखर होकर इस्लाम और ईसाइत के मध्य समानता के सिद्धांत को अपनाना चाह्ता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इसके अतिरिक एक और घटनाक्रम है जो पश्चिम के कठोर रूख की ओर संकेत करता है वह है हालैण्ड के सांसद और नेशनल फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स द्वारा कुरान पर एक फिल्म का निर्माण और उसका प्रदर्शन। इस फिल्म के सम्बन्ध में पिछ्ले अनेक महीनों से चर्चा थी और इसके निर्माण से पूर्व ही इस पर काफी विवाद हो रहा था। हालाँकि इस फिल्म में सनसनीखेज या विवादित कुछ भी नहीं है फिर भी तमाम विवादों के बीच इस कानून निर्माता ने जिस प्रकार फिल्म के निर्माण फिर इसके प्रसारण में अपनी सक्रियता दिखाई है वह यूरोप की इस्लाम के प्रति बदलती मानसिकता का परिचय देता है। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">मगदी आलम के धर्मांतरण और वाइल्डर्स की फिल्म के निर्माण और प्रसारण में जो अत्यंत उल्लेखनीय बात रही वह यह कि दोनों ही घटनाओं पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं हुई जिसकी आशंका जतायी जा रही थी। प्रतिक्रिया नहीं होने से ऐसी घटनाओं को करने या अपने धर्म और मूल्यों के प्रति अधिक आग्रह की प्रवृत्ति पश्चिम में और बढेगी और इससे इस्लाम में बेचैनी और अधिक बढेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इस्लाम में बेचैनी की कुछ<span>  </span>मह्त्वपूर्ण घटनायें पिछ्ले दिनों घटित हुईं जिस पर विश्व की मीडिया का ध्यान बिल्कुल नहीं गया। इसी वर्ष यूरोप <span> </span>के कुछ समाचार पत्रों में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून पुनः प्रकाशित होने पर इस्लामी विश्व में एक दूसरे प्रकार का चिंतन आरम्भ हुआ। फरवरी के अंत में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए यमन के प्रधानमंत्री अली मोहम्मद मुजावर ने प्रस्ताव किया कि विश्व स्तर पर ऐसे कानून का निर्माण होना चाहिये जो किसी भी धर्म के अपमान को आपराधिक कृत्य घोषित करे और धर्मों के समान सम्मान की भावना पर जोर दे। उन्होंने पश्चिम से अनुरोध किया कि वे इस्लाम की भावनाओं का सम्मान करें अन्यथा अस्थिरता ही बढेगी। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इसी प्रकार का प्रस्ताव सऊदी अरब सलाहकार समिति ने सऊदी सरकार को दिया तथा विदेश मंत्रालय से आग्रह किया कि वह अन्य अरब देशों, मुस्लिम देशों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर ऐसे प्रस्ताव पर विचार करें कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सन्धि की जाये कि प्रत्येक धर्म के प्रतीकों, पैगम्बरों का सम्मान करते हुए सभी धर्मों के सम्मान को बल प्रदान किया जाये। सऊदी अरब सलाहकार समिति या मजलिसे अश शुरा की ओर से यह प्रस्ताव मोहम्मद अल कुवाहेश ने यूरोप और अमेरिका में पैगम्बर के कार्टूनों के प्रकाशन की प्रतिक्रिया में रखे थे। परंतु यह प्रस्ताव समिति ने 77 के मुकाबले 33 मतों से निरस्त कर दिया। इस प्रस्ताव को निरस्त करने के पीछे प्रमुख कारण यह बताया गया कि सभी धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करने की अंतरराष्ट्रीय सन्धि का अर्थ होगा शेष धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करना जो कि मुसलमानों के लिये सम्भव नहीं है। दूसरा कारण यह बताया गया कि इससे इस्लामी देशों में गैर मुसलमानों को अपने उपासना केन्द्र स्थापित करने की अनुमति मिल जायेगी। </span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">इस घटनाक्रम के अपने निहितार्थ हैं। एक तो यह घटनाक्रम बताता है कि चतुर्दिक इस्लाम पर हो रहे हमलों से इस्लामी धार्मिक नेतृत्व और सामाजिक नेतृत्व बेचैन है और इसके लिये रास्ता निकालने का प्रयास कर रहा है और वहीं दूसरी ओर समस्त विश्व में इस्लाम की अनेक प्रवृत्तियों को लेकर मंथन आरम्भ हो गया है और इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद या फिर शरियत लागू करने की इस्लामी मतानुयायियों की इच्छा के आगे विश्व झुकने के स्थान पर अधिक आग्रह पूर्वक इसका प्रतिरोध करने की तैयारी कर रहा है। इस सम्बन्ध में यूरोप ने पहल की है और इस्लाम को कठोरतापूर्वक सन्देश देने का प्रयास किया है कि वह अपने इस्लामीकरण के लिये तैयार नहीं है इसके स्थान पर वह अपनी संस्कृति और मूल्यों के प्रति अधिक सजग हो रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">जहाँ यूरोप और चर्च ने अपना आग्रह दिखाकर राजनीतिक और सांस्कृतिक सन्देश दिया है वहीं इस्लाम मतावलम्बी बेचैनी अनुभव कर रहे हैं और अनेक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं कि इस्लाम की छवि को सुधारा जा सके। इस क्रम में भारत में बडे बडे मुस्लिम सम्मेलन आयोजित<span>  </span>कर आतंकवाद की निन्दा की जा रही है परंतु ये प्रयास छवि सुधारने की कवायदें मात्र हैं क्योंकि आज तक इस्लामी धर्मगुरुओं ने उन मुद्दों को स्पर्श करने का प्रयास कभी नहीं किया जो वास्तव में समस्त विश्व के गैर मुसलमानों के लिये आशंका और चिंता के कारण हैं।</span><span style="font-size:10pt;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;"><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;">आज समस्त विश्व में जो वातावरण बन रहा है वह कतई उत्साहजनक नहीं है और संकेत यही मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में टकराव का यह वातावरण और भी तनावपूर्ण ही होने वाला है। विशेषकर कैथोलिक चर्च और यूरोप की भावभंगिमा से तो यही संकेत मिलता है कि इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्ध सामान्य नहीं हैं और विश्व की शेष सभ्यतायें भी शीघ्र ही इसका अनुसरण करने लगें और इस्लाम के प्रति सशंकित हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। <span> </span></span></p>
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<title><![CDATA[इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने हैं]]></title>
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<pubDate>Fri, 30 Nov 2007 23:27:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="2" color="#000000">इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने हैं<br />
दीजिए अगर आपको इल्ज़ाम देने हैं</font></p>
<p><font size="2" color="#000000">और कौन दूसरा सितम-परस्त होगा इतना<br />
आपकी न पर भी मुझे पयाम देने हैं</font></p>
<p><font size="2" color="#000000">आपकी नीम-नज़र देती है मुझको सौ ग़ालियाँ<br />
बावजूद इसके मुझे सौ सलाम देने हैं</font></p>
<p><font size="2" color="#000000">संग उठाते-उठाते न थक जायें हाथ कहीं<br />
आपको अभी मुझे ज़ख़्म तमाम देने हैं</font></p>
<p><font size="2" color="#000000">'नज़र' से पूछ सुम्बुल के दिये हुए ज़ख़्म<br />
आज काफ़िर को तर्क़े-इस्लाम देने हैं</font></p>
<p><font color="#000000"></p>
<hr /></font></p>
<p><font size="2">शायिर: </font><font size="2" color="#000000">विनय प्रजापति ‘नज़र'<br />
लेखन वर्ष: २००५</font></p>
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