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	<title>उदास &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/उदास/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "उदास"</description>
	<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 03:57:34 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[शायर और माशुका-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=66</link>
<pubDate>Tue, 05 Aug 2008 18:00:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[माशुका ने शायर से कहा
‘बहुत बुरा समय थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>माशुका ने शायर से कहा<br />
‘बहुत बुरा समय था जब मैंने<br />
अपनी सहेलियों के सामने<br />
किसी शायर से शादी करने की कसम खाई<br />
तुमने मेरे इश्क में कितने शेर लिखे<br />
पर किसी मुशायरे में तुम्हारे शामिल होने की<br />
खबर  अखबार में नहीं आई<br />
सब सहेलियां शादी कर मां बन गयीं<br />
पर मैं उदास बैठी देखती हूं<br />
अब तो कोई मशहूर शायर<br />
देखकर शादी करनी होगी<br />
नहीं झेल सकती ज्यादा जगहंसाई’</p>
<p>शायर खुश होकर बोला<br />
‘लिखता बहुत हूं<br />
पर सुनने वाले कहते हैं कि<br />
उसमें दर्द नहीं दिखता<br />
भला ऐसा कैसे हो<br />
जब मैं तुम्हारे प्यार में<br />
श्रृंगार रस में डुबोकर शेर लिखता<br />
अब तो मेरे शेरों में दर्द की<br />
नदिया बहती दिखेगी<br />
जब शराब मेरे सिर पर चढ़कर लिखेगी<br />
अपने प्यार से तुम नहीं कर सकी मुझे रौशन<br />
मेहरबानी कर तोहफे में जल्दी  दो जुदाई’</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://rajdpk2.wordpress.com">लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</a></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उदास चाँद ]]></title>
<link>http://kmuskan.wordpress.com/?p=67</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 11:51:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>kmuskan</dc:creator>
<guid>http://kmuskan.hi.wordpress.com/2008/07/05/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा चाँद उदास है
दुनिया से अनजान
अ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज मेरा चाँद उदास है<br />
दुनिया से अनजान<br />
अपने ही ख्यालो में उलझा है<br />
जानती हूँ उसकी उलझन<br />
पर उसे सुलझाना मेरे बसमें नही<br />
मैंने कहा उससे तुम यू उदास न रहा करो<br />
तुम्हारे उदास होने से<br />
आसमान का चाँद भी उदास हो जाता है<br />
तारे टिमटिमाना छोड़ देते है<br />
पूर्णिमा की रात भी अमावस सी लगाती है<br />
और .........<br />
मेरे चाँद ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पूछा<br />
और ........और क्या<br />
मैंने कहा<br />
और ........और इस मुस्कान के चेहरे की मुस्कान भी गायब हो जाती है<br />
वह मुस्कुराया और बोला .........<br />
इस चेहरे की मुस्कान को देखकर ही तो मैं अपने हर गम भूल जाता हूँ<br />
पर मेरी मुस्कान तो तुमसे है<br />
उसने मेरे दिल के ये भाव शायद मेरी आँख में पड़ लिए<br />
तभी तो वह बोला<br />
तुम नही चाहती मैं उदास रहू<br />
तो मैं अब कभी उदास नही रहूँगा<br />
हम दोनों अब मिलकर अपनी हर उलझन का हल ढूढेगे<br />
पर अब कभी इस चेहरे की मुस्कान नही जानी चाहिए<br />
मैंने कहा .........<br />
तुम खुश हो तो इस चेहरे की मुस्कान कभी नही जायेगी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हँसते है ज़माने मैं और भी कई...]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=24</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 14:53:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://meredilne.hi.wordpress.com/2008/06/09/haste-hai-jamane-me-aur-bhi-kayi/</guid>
<description><![CDATA[हँसते है ज़माने मैं और भी कई,
दिल से हँस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हँसते है ज़माने मैं और भी कई,<br />
दिल से हँसते पहली बार देखा है,<br />
आज मैंने उनको हँसते हुए देखा है,<br />
उनकी हँसी दिल को छू जाती है,<br />
चुपके चुपके कुछ कह जाती है,<br />
कसम है उदास न होना तुम कभी,<br />
ये खूबसूरत हँसी न खोना कभी,<br />
तेरी हँसी से है गुलशन खिले,<br />
आता है सावन है फूल खिले,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंधेरे मे छुप गया चाँद मेरा...]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=19</link>
<pubDate>Thu, 29 May 2008 15:54:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://meredilne.hi.wordpress.com/2008/05/29/andhere-me-chup-gaya-chand-mera/</guid>
<description><![CDATA[अंधेरे मे छुप गया चाँद मेरा,
हुआ उदास न ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंधेरे मे छुप गया चाँद मेरा,<br />
हुआ उदास न जाने क्यों दिल मेरा,<br />
जानता हूँ न तू मेरी और न मैं तेरा,<br />
दीदार-ऐ-यार को तरसे क्यों दिल मेरा,<br />
रौशनी की एक किरण उस पर आई,<br />
झलक देख क्यों न भरा दिल मेरा,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आज है वो कुछ उदास उदास से...]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=8</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 08:41:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://meredilne.hi.wordpress.com/2008/05/23/aaj-hai-wo-kuch-udaas-udaas-se/</guid>
<description><![CDATA[आज है वो कुछ उदास उदास से
न जाने क्यों न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज है वो कुछ उदास उदास से<br />
न जाने क्यों नही दे देते ये उदासी मुझे वो</p>
<p>आज है वो कुछ रूठे रूठे से<br />
न जाने क्यों नही नही मान जाते अब वो</p>
<p>आज है वो कुछ अलग अलग से<br />
न जाने क्यों नही हो जाते पहले जैसे वो</p>
<p>आज है वो कुछ बुझे बुझे से<br />
न जाने क्यों नही हंस के दिखा देते अब वो</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आज काली रात है तो क्या...]]></title>
<link>http://meredilne.wordpress.com/?p=6</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 08:21:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://meredilne.hi.wordpress.com/2008/05/23/aaj-kali-raat-hai-to-kya/</guid>
<description><![CDATA[आज काली रात है तो क्या, कल चाँदनी रात हो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज काली रात है तो क्या, कल चाँदनी रात होगी,<br />
आज तपती धुप है तो क्या, कल मौसम-ऐ-बहार होगी,<br />
आज खाली हाथ है तो क्या, कल खुशिया हज़ार होगी,<br />
आज मन उदास है तो क्या, कल लबो पे मुस्कराहट होगी,<br />
आज उठती नजरे है तो क्या, कल पलके बिछी होगी,<br />
आज जमी पे है तो क्या, कल उड़ान हमारी होगी,<br />
आज हम पीछे है तो क्या, कल दुनिया पीछे होगी,<br />
आज हम हारे है तो क्या, कल जीत हमारी होगी,<br />
आज पहचान नही है तो क्या, कल पहचान हमसे होगी,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=960</link>
<pubDate>Sun, 06 Apr 2008 18:17:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/04/06/raahe-ishq-mein-mushkil-hii-sahii-paar-utarana/</guid>
<description><![CDATA[राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना<br />
मगर हम शोलों पर भी चलकर जायेंगे<br />
हमें तो चाह है तेरे इश्क़ की रोज़े-अव्वल से<br />
तुम नहीं जानते क्या कर गुज़र जायेंगे</span></p>
<p><span style="color:#000000;">है हर गुल को छूने से तेरा लम्स हासिल<br />
मगर यह चमन इक रोज़ बिखर जायेंगे<br />
लम्हे यह बहुत उदास-उदास हैं तुम बिन<br />
तुम आओगे रंगो-शाद से निखर जायेंगे</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मेहरबानिए-इश्क़ कभी तुम हमसे निबाहो<br />
हम बिगड़ी क़िस्मत हैं सँवर जायेंगे<br />
मरना तो एक न एक दिन सबको है हमदम<br />
जान लो तेरे इश्क़ की ख़ातिर मर जायेंगे</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सदफ़ में गौहर की तरह दिल में तुम रहते हो<br />
ज़ीस्त है तुमसे, तुम बिन ज़रर जायेंगे<br />
ख़ातिर से अपने तुम नवाज़ दो हमको मेहरबाँ<br />
तेरे दिल तक आँसुओं में बहकर जायेंगे</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=956</link>
<pubDate>Wed, 02 Apr 2008 17:03:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/04/02/tumhaarii-khushboo-se-mahak-utha-hai-man/</guid>
<description><![CDATA[तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन<br />
तुम्हारे तस्व्वुर से भर आये नयन<br />
बरखा की मखमली फुहार से जी तर है<br />
धीरे-धीरे बुझ रही है दर्द की सूजन</font></p>
<p><font color="#000000">लहू फिर ज़ख़्मे-जिगर से बहा है<br />
दर्द तुम्हारा दिल में मेहमान रहा है<br />
सर्द है बरसों से यह ख़िज़ाँ का मौसम<br />
ज़र्द पत्तों में खो गया है कहीं गुलशन</font></p>
<p><font color="#000000">बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है<br />
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है<br />
यह उदास फ़ज़िर भी कितनी तवील है<br />
दिखता नहीं दूर तक उफ़क़ का रोगन</font></p>
<p><font color="#000000">तुमको पहली नज़र से चाहा दिलो-जाँ से<br />
हर दुआ में मैंने तुमको माँगा आसमाँ से<br />
मेरी मंज़िल मेरी मोहब्बत हो तुम<br />
कैसे भी तुम मेरी बनो, जुड़ जाये बन्धन</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शाम है और मैं हूँ, तुम क्यों नहीं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=948</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 07:49:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/03/25/shaam-hai-aur-main-hoom-tum-kyon-nahiin/</guid>
<description><![CDATA[शाम है और मैं हूँ, तुम क्यों नहीं, क्यों]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">शाम है और मैं हूँ, तुम क्यों नहीं, क्यों नहीं<br />
डर-सा बैठा है दिल में तुम्हें खो न दूँ कहीं<br />
तिलिस्म यह मेरी आँखों का टूट न जाये कहीं<br />
तुमने जहाँ छोड़ा था मुझे मैं आज भी हूँ वहीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह फूल हल्के गुलाबी यह आसमाँ आसमानी<br />
सब उदास हैं इक तेरे न होने से और मैं भी<br />
वह यादें मुस्कुराती हुई आज रोती हैं तन्हा<br />
मेरे साथ हैं सीने से लगकर, बिलखती हुई</font></p>
<p><font color="#000000">मुँहज़ोर तन्हाई है सीने में, आँसुओं के भँवर<br />
मैं अकेला कब तलक जूझता रहूँगा यूँ ही<br />
तुमको पाने का इरादा है पर तुम यहाँ नहीं<br />
फिर आँखों से गिरह लगा दो कर लूँ ख़ुद पे यक़ीं</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा दिल किसी ग़मो-अफ़सोस का घर नहीं<br />
यह वक़्तो-ख़ुदा का फ़ैसला है, हम जुदा हैं<br />
सच्चे प्यार की साँसें टूटती नहीं, न टूटेंगी<br />
यह फ़ासला मिटायेगा आप ख़ुदा मुझे है यक़ीं</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरे दिल की पगडंडियों से गुज़र जा]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=857</link>
<pubDate>Wed, 27 Feb 2008 18:18:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/27/mere-dil-kii-pagadandiyon-se-guzar-jaa/</guid>
<description><![CDATA[मेरे दिल की पगडंडियों से गुज़र जा एक दफ़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मेरे दिल की पगडंडियों से गुज़र जा एक दफ़ा फिर<br />
मेरे जिस्मो-जाँ को जीवन दे जा ओ बेवफ़ा फिर</font></p>
<p><font color="#000000">इन राहों पर हल्के गुलाबी फूल खिलने लगे हैं<br />
बेज़ुबाँ दिल में मोहब्बत के अरमान जगने लगे हैं<br />
आ निगाहों में आ जा, कर दे धड़कनें रवाँ फिर<br />
मेरे दिल की पगडंडियों से गुज़र जा एक दफ़ा फिर</font></p>
<p><font color="#000000">उदासियाँ, तन्हाइयाँ, मुझसे शिकवे करने लगी हैं<br />
आँखों में, रोज़ ख़ाबों में, तेरी तस्वीरें बनने लगी हैं<br />
आ मेरे सनम कर दे धुँधली-धुँधली यादें जवाँ फिर<br />
मेरे दिल की पगडंडियों से गुज़र जा एक दफ़ा फिर</font></p>
<p><font color="#000000">यह प्यार मुझको दुनिया से गुमराह करने लगा है<br />
तेरा दीवाना हर चेहरे में तेरा चेहरा पढ़ने लगा है<br />
बता तू, मुझसे मिलेगी, कैसे, कब और कहाँ फिर<br />
मेरे दिल की पगडंडियों से गुज़र जा एक दफ़ा फिर</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: ०४ मई २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ तो बोलो!]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=845</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 12:09:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/26/kuchh-to-bolo/</guid>
<description><![CDATA[क्यों लोग यहाँ जमा हैं?
क्यों वह उदास ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">क्यों लोग यहाँ जमा हैं?<br />
क्यों वह उदास बैठा है?</font></p>
<p><font color="#000000">कुछ तो बोलो! मेरी साँसें उखड़ रही हैं</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बड़ी उदास दोपहर है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%ac%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 14:43:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/15/barii-uadaas-dopahar-hai/</guid>
<description><![CDATA[बड़ी उदास दोपहर है, दिल भी ख़ाली
मेरा क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">बड़ी उदास दोपहर है, दिल भी ख़ाली<br />
मेरा कमरा भी ख़ाली...</font></p>
<p><font color="#000000">कुछ यादों का धुँधलाया हुआ-सा<br />
एक क़ाफ़िला गुज़र रहा है,<br />
आँख जो भर-भर आ रही है<br />
किनारों की काई फिर सब्ज़ होने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">इक दर्द फिर अँगड़ाई ले रहा है<br />
एक आस फिर तेरी जुस्तजू कर रही है</font></p>
<p><font color="#000000">माज़ी के सफ़्हे पलट रहा हूँ<br />
बीती हुई शामों की नर्म धूप-<br />
मेरा मन पिघला रही है,<br />
बदन में फिर साँस भारी होने लगी है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १८/अगस्त/२००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दोनों बहुत देर तक बैठे रहते हैं ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%a0%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 13:36:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/15/donon-bahut-der-tak-baithe-rahate-hain/</guid>
<description><![CDATA[बहुत उदास-सी एक शाम बैठी है मेरे साथ
अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">बहुत उदास-सी एक शाम बैठी है मेरे साथ<br />
अपने ख़ामोश लबों से कह देती है अनकही बातें<br />
दोनों बहुत देर तक बैठे रहते हैं एक साथ<br />
दोनों ऐसे ही रोज़ दिल का बोझ हल्का करते हैं<br />
वो चाँद की बात करती है<br />
मैं तुम्हारी बात करता हूँ....</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उल्टे सूरज की आग जम गयी]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/14/%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Fri, 14 Sep 2007 20:54:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/14/ulte-suraj-kii-aag-jam-gayii/</guid>
<description><![CDATA[सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक
तो सूरज की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">सोचा था दिन चढ़ेगा दोपहर तक<br />
तो सूरज की आग<br />
सर्दियों के सर्द बादलों को ग़ुबार कर देगी<br />
बहने लगेगा बदन में जमा हुआ लहू<br />
और झपकने लगेंगी एक टुक अपलक पलकें<br />
लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं</font></p>
<p><font color="#000000">दिन दोपहर तो चढ़ा पर बादल नहीं छटे<br />
कोहरा नहीं पिघला<br />
उल्टे सूरज की आग जम गयी,<br />
ठिठुर गयी...<br />
सर्द हवा ने बुझा दिया दिन का सूरज<br />
उतरने लगा शाम के आगोश में दिन</font></p>
<p><font color="#000000">आज शफ़क़ न गुलाबी न जाफ़रानी थी<br />
बस नीला स्लेटी आकाश<br />
अजीब उदासियों के साथ बैठा रहा<br />
न जाने किसके इन्तिज़ार में...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब बात करते हुए देखता हूँ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%8f-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 21:31:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/08/27/jab-baat-karte-huye-dekhta-hoom/</guid>
<description><![CDATA[तमन्ना बेताब रहती है
और खा़हिश परेशाँ
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">तमन्ना बेताब रहती है<br />
और खा़हिश परेशाँ<br />
उदास आईने-<br />
खु़द-ब-खु़द टूटते रहते हैं<br />
राह चलती रहती है<br />
पाँव थक जाते हैं<br />
उम्र कम होती रहती है<br />
साल बढ़ते रहते हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">रात जागती है आँखों में<br />
दिन वीरान उजाड़ गुज़रता है<br />
उँगलियों में उँगलियों से<br />
और निगाहों को बदन से<br />
जब बात करते हुए देखता हूँ<br />
तेरी याद खा़मोश रह जाती है<br />
कुछ सुलगता रहता है सीने में</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तन्हाई का साया न टलता है<br />
दिल की ख़ला न घटती है<br />
अरमान सूखे हुए पत्तों की तरह<br />
ज़मीन पर पडे़ रहते हैं<br />
आँसुओं में भीगते-भीगते<br />
ज़मीन में जज़्ब हो जाते हैं<br />
दफ़्न हो जाते हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दिल के टूटने से<br />
फ़र्क साँस लेने लग जाता है<br />
फ़ज़ा तो नहीं बदलती<br />
लेकिन उसकी छुअन<br />
और एहसास के ज़ख़्म हरे हो जाते हैं<br />
लम्हा-लम्हा मन ग़म में डूबता जाता है<br />
और गीला-गीला जलता रहता है<br />
</span> </p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तन्हाई के साये मुझे घेर कर बैठ जाते हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 21:11:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/08/27/tanhaaii-ke-saaye-mujhe-gher-kar-baith-jaate-hain/</guid>
<description><![CDATA[हल्के गुलाबी फूलों पर ओस की बूँदों को
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">हल्के गुलाबी फूलों पर ओस की बूँदों को<br />
सूरज की किरनें छूती हैं तो...<br />
बदन में तेरी यादों के दर्द अचानक उठने लगते हैं<br />
तेरी तस्वीर बनने लगती है<br />
दिल तो सुकूत पाता है मगर<br />
मन खा़ली-खा़ली और उदास हो जाता है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सबा के परों पर तैरती हुई खु़शबू<br />
मेरे बेजान खा़बों की जान बन जाती है<br />
फिर कौन बुला रहा है मुझे<br />
मैं कहाँ हूँ, कौन देख रहा है मुझको<br />
सब भूल जाता हूँ, कुछ याद नहीं रहता<br />
साँसों में धड़कनों में तेरा नाम घुल जाता है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आँखों को सिवा तेरे चेहरे के कुछ भी नहीं दिखता<br />
हर शै में बस तू ही तू नज़र आने लगती है मुझको<br />
दिल फिर तेरे क़रीब आने के बहाने ढूँढ़ने लगता है<br />
तुझे पाने के खा़ब संजोने लगता है<br />
और बेताब धड़कनों को<br />
खा़मोश ज़ुबाँ की खा़मोशी चुभने लगती है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सहमे हुए-से हर्फ़ फिर टूटने लगते हैं<br />
बिखरने लगते हैं<br />
और ऐसे में जब किसी सदा के हाथ<br />
मुझे छू देते हैं तो<br />
तन्हाई के साये मुझे घेर कर बैठ जाते हैं<br />
</span> </p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a5%9e-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 18:32:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/08/27/zindagii-ke-harf-badal-gaye-hain/</guid>
<description><![CDATA[आइने रातभर रोते रहे
तस्वीरें रातभर जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">आइने रातभर रोते रहे<br />
तस्वीरें रातभर जागती रहीं<br />
लम्हे उम्रभर सिसकते रहे<br />
ख़ामोशियाँ उम्रभर ख़ाक फाँकती रहीं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यादें धूप में सूख रही हैं<br />
बातें सब मुरझा गयी हैं<br />
आँखों में दरार पड़ रही है<br />
सपने बंजर हो गये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आँसू बर्फ़ बन गये हैं<br />
ख़ाहिशें तिनके चुन रही हैं<br />
आरज़ू के पाँव थक चुके हैं<br />
ख़्याल ज़मीन में दफ़्न हो गये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">साँसें सीने में भीग गयी हैं<br />
उदास सावन टपक रहा है<br />
जंगल तन्हाई में सुलगता है<br />
फूल पलकें झुकाये हुए हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ख़ुशबू बे-सदा गल रही है<br />
पलाश के फूल हँस रहे हैं<br />
जड़ें मिट्टी सोख रही हैं<br />
पत्ते सूखी बेलों ने डस लिये हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">उजाले पत्थरों में जज़्ब हो गये हैं<br />
चाँद धुँध हो रहा है<br />
रात रेत हो गयी है<br />
सितारे रेत के दरया में बह रहे हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दर्द तेज़ाब हो गया है<br />
और खु़शी मग़रूर रहती है<br />
मैं शब्द उगलता रहता हूँ<br />
ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
