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	<title>उपन्यास &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/उपन्यास/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "उपन्यास"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 16:54:13 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA["भगवान के घर देर है अंधेर नहीं " |]]></title>
<link>http://hindibharat.wordpress.com/?p=67</link>
<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 11:05:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>विजय-राज चौहान</dc:creator>
<guid>http://hindibharat.wordpress.com/?p=67</guid>
<description><![CDATA[&#8230;&#8230;.थोडी देर के बाद श्रीमती टंडन रूब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" src="http://hindibharat.files.wordpress.com/2008/07/blog.jpg" alt="" width="136" height="280" /><span style="font-family:Mangal;">.......थोडी देर के बाद श्रीमती टंडन रूबिया के कमरे में प्रवेश करती है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">उनके साथ उनकी तीन साल की बेटी एश्वेर्य टंडन भी थी </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">आधुनिक जमाने का टंडन साहिबा पर कुछ जायदा ही असर था </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">उनके पति टंडन साहब की कागज व गत्ता बनाने की फैक्टरी<span> </span>थी</span>, <span style="font-family:Mangal;">बिजनेस के फिल्ड में उनकी अच्छी पकड़ थी और वे भी चढ्ढा साहब की तरह से शहर के नमी रईसोमें गिने जाते थे </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">मिसिज टंडन का अधिकांश समय घर से बाहर ही गुजरता था </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">शहर में उन्हीं की तरह की कुछ रईस जादिया उनकी सहेली या थी जिनके पास जाकर वह सुबह से शाम तक ताश या जुए का खेल खेलती थी </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">वह टंडन साहब की दौलत को पानी की तरह से बहा रही थी </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">टंडन साहब ये जानते थे लेकिन उन्हें कुछ भी कहने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">टंडन साहब का बंगला भी चढ्ढा साहब के बंगले के पास था इसलिए दोनों एक दूसरे के दुःख-सुख में शरीक होते थे</span>, <span style="font-family:Mangal;">और इसलिए टंडन साहिबा आज रूबिया की हालत का पता लेने आई थी </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">टंडन साहिबा - "रूबिया अब तुम्हारी तबीयत कैसी है " </span>?</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">रूबिया - " अच्छी हूँ "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">टंडन साहिबा -"सुना है तुमने क्रष्ण और बलराम दोनों को एक साथ भी बुला लिया है " </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">रूबिया (हँसते हुए )- "बुलाया कहा भगवान की जैसी मर्जी होती है वैसा ही होता है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">वरना आठ साल हो गए थे </span>,<span style="font-family:Mangal;">घर में किसी बच्चे की किल्ल्कारी सुनने को कान तरस गए थे और अब आए भी तो दो एक साथ </span>, <span style="font-family:Mangal;">किसी ने टीक ही कहा है </span>'<span style="font-family:Mangal;">भगवान के घर देर है अंधेर नहीं " </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">टंडन साहिबा -"ठीक कहती हो </span>, <span style="font-family:Mangal;">कहा है तुम्हारे लाल "</span>?</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">रूबिया - " वहां पलने में दोनों सो रहे है"</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मिसिज टंडन पालने के पास जाती है और दोनों बच्चों को निहार ने लगती है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal">-"<span style="font-family:Mangal;">सच रूबिया दोनों के नैन-नक्श एक जैसे है</span>, <span style="font-family:Mangal;">इनमें बड़ा कोन सा है"</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">रूबिया -"वही जिसके हाथ में कला धागा बंधा है "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो कोफ़ि ले आती है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">दोनों सहेलिया कोफ़ि की चुस्किया लेते हुए बातें कर रही थी और तीन साल की छोटी बच्ची एश्वेर्या पलने के पास खड़ी सोते हुए बच्चों को देख रही थी </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मिसिज टंडन - " अच्छा तो रूबिया अब मै चलती हूँ शाम हो गई है "</span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">वह एश्वेर्या को आवाज लगाती है एश्वेर्या दोड़कर आती है और टंडन साहिबा की उंगली पकड़ कर साथ चल देती है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो आती है और पलने मे बच्चों को देखकर बोली -"मेमसाहब<span> </span>बच्चे जाग गए है </span>, <span style="font-family:Mangal;">आप उन्हें दूध पिला दीजिये तब तक मै खाना तैयार करती हूँ "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">रूबिया- " ठीक है तुम इन्हे मेरे पास ले आओ "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो बच्चो को उठा कर रूबिया के पास ले जाती है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">रूबिया दोनों बच्चो को बारी-बारी से दूध पिलाती है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">परो किचन में चली जाती है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">हरिया जो बाजार सब्जी आदि सामान लेने गया था सामान लाकर किचन में रख देता है और बचे पैसे रूबिया को दे देता है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">रात के लगभग साढ़े दस बजे जा रहे थे चढ्ढा साहब की गाड़ी आकर रूकती है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">चढ्ढा साहब गाड़ी से उतरते है और ऊपर रूबिया के कमरे में चले जाते है और हरिया को आवाज लगते है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया -"जी साहब "(हरिया किचन से दोड़ता हुआ आता है )</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">चढ्ढा साहब -"नीचे गाड़ी में कुछ दमन रखा है उसे उठा कर ऊपर ले आओ "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया -"जी अच्छा "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया नीचे जाता है और गाड़ी में रखे एक बड़े थैले की उठा कर ओपर कमरे में ले आता है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">शायद थैले में बच्चो के कुछ गरम कपड़े और खिलौने थे </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">वह थैले को कमरे में रख आता है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो आती है </span>&#124; "<span style="font-family:Mangal;">साहब खाना तैयार है "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">चढ्ढा साहब -"ठीक है मेज पर लगा दो तब तक मै हाथ मुँह धो लेता हूँ "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो -"ठीक हे साहब "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो किचन में जाकर खाना डालने लगती है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">हरिया खाने को मेज़ पर परोसा देता है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">चढ्ढा साहब मेज़ पर बैठे खाना खा रहे थे तो रूबिया बेड़ पर बेटी खा रही थी </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">दोनों खाना खा लेते है तो हरिया बर्तन उठा ले जाता है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो (हरिया से ) -"आप भी खाना खा लीजिए "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया भी बैठ जाता है और खाना खाने लगता है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">खाना खाखर हरिया नीचे अपने कमरे में चला जाता है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">वह चारपाई पर कपड़े बिछा कर बैठ जाता है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">वह जेब से बीड़ी का ब्लड निकलता है और उसे माचिस से जलाकर पीने लगता है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">बीड़ी पीकर वह लेट जाता है तब तक पारो भी बर्तन साफ करके उसके पास कमरे में आ जाती है </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">वह अपनी चारपाई बिछा देती है और बैठ जाती है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो -" सो गए हो किया </span>?"</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया -"नहीं अभी तो नहीं "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो हरिया के सिरहाना आकर बैठ जाती है और हाथो की उंगलियो से हरिया के बाल सहलाने लगती है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">घर में खुशी का माहोल होने के बाद भी पारो उदास थी </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो-</span>''<span style="font-family:Mangal;">किओजी </span>, <span style="font-family:Mangal;">किया हमारे भाग्य में ओलाद का सुख नही हे किया "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया -"ऐसा कियो सोचती हो पारो </span>,<span style="font-family:Mangal;">मेरा जी कहता हे<span> </span>एक दिन मम साहब की तरह से तुम्हारी भी गोद आवश्य भर जायेगी "</span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो -"जिस पेड़ पर भरी बाहर में फल न आया हो तो बुढापे में किया फल देगा "</span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो को आँखे भर आई थी उसका गला रूंध गया था </span>&#124;<span style="font-family:Mangal;">हरिया चुपचाप पड़ा रहता है </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">उसका मन भी दुखी था </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">कुछ देर बाद पारो बोलती है </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">-"किओजी एक बात कहू तो बूरा तो नही मानोगे "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया -" कहो तो सही बूरा कियो मानूंगा "</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">पारो - "कियो न हम साहब के एक बच्चे को लेकर<span> </span>आपने गाँव जा रहे </span>?"</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हरिया के शरीर में सर से पांव तक एक बिजली सी दोड़ जाती हे </span>&#124; <span style="font-family:Mangal;">उसे लगा जैसे किसी ने उसके घाव में सुई चुभो दी हो </span>&#124;</p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">वह बैठ जाता है पारो की तरफ़ मुँह करते हुए बोला -" ऐसा कहने से पहले तुम्हारी जीब कियो न कट गई </span>,<span style="font-family:Mangal;">तुम्हारी मति मरी गई हे किया </span>,<span style="font-family:Mangal;">जानती हो तुम किया कह रही हो </span>,<span style="font-family:Mangal;">जिस घर का पंद्रह साल से नामक खा रहे है उसी की थाली में छेद करने को कह रही हो तुम "</span></p>
<p class="MsoNormal">
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;"><strong>- उपन्यास (भारत /India) से</strong><strong>-(</strong><strong>लेखक-</strong><strong>विजय-राज चौहान)</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;"><span> </span><span> </span></span></p>
<p><a href="http://hindibharat.wordpress.com/2008/06/30/1-2" target="_self"><strong>&#60;&#60;पीछे</strong></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[!जो कमेन्ट देते हैं वह अच्छे हैं!]]></title>
<link>http://wanamastijokes.wordpress.com/?p=89</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 04:13:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>workwithseo</dc:creator>
<guid>http://wanamastijokes.wordpress.com/?p=89</guid>
<description><![CDATA[मेने ये इसलिए कहा क्योकि कमेन्ट देने स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>मेने ये इसलिए कहा क्योकि कमेन्ट देने से अच्छे बुरे का पता चलता हैं की उस साइट्स की करता-धरता कुछ</h3>
<p>~~~~~~~~~~~~</p>
<h3>सही लिखा रहा हैं या बसे टाइम पास कर रहा हैं  इसलिए जो भी कोई नया पोस्ट हो तो उस पर अपना कमेन्ट जरुरु दे</p>
<p><span style="color:#ffa07a;">धन्यवाद </span></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भादों का महीना था, पूरे शहर में...]]></title>
<link>http://hindibharat.wordpress.com/?p=63</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 08:29:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>विजय-राज चौहान</dc:creator>
<guid>http://hindibharat.wordpress.com/?p=63</guid>
<description><![CDATA[भादों का महीना था, पूरे शहर में कृष्णा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><img class="alignright" src="http://hindibharat.files.wordpress.com/2008/07/blog.jpg" alt="" width="136" height="280" /><strong>भादों</strong> का महीना था, पूरे शहर में कृष्णा जन्माष्टमी होने की वजह से धूमधाम थी &#124; हलवइयो की दुकानें घेवर, पेड़ों व मिठ्हियो से भरी पड़ी थी , लोग इन्हें खरीद रहे थे और एक दूसरे को त्यौहार ही बधाई दे रहे थे &#124;<br />
लेकिन धनपत चढ्ढा के घर में कोई उमंग न थी &#124; इस समय चढ्ढा साहब एक कमरे में सिगरेट के दम लगते टहल रहे थे , वे कुछ परेशां नजर आ रहे थे लेकिन परेशानी के साथ एक आत्मिक खुशी भी को रही थी ,किओकी शादी के आठ साल बाद आज उनके घर में एक नया मेहमान आने जा रहा था &#124;<br />
वैसे  तो चढ्ढा साहब की उमर चालीस -पैंतालीस की थी किंतु ओलाद न होने की वजह से कुछ ज्यादा ही उमर के लगने लगे थे &#124; इसके अलावा उनका कंप्यूटर सोफ्टवेर का काफी बड़ा कारोबार था जिसे वे बखूबी चला रहे थे &#124; उनकी पत्नी रूबिया का भी एक बूटी पार्लर था जिसे वह भी सुबह से देर रत तक चलती थी &#124; दोनों की अच्छी आमदनी थी, महीने में लाख -दो लाख की आमदनी तो हो ही जाती थी &#124; इसके अलावा बँगला गाड़ी व अन्य सभी ऐश आराम के सभी सामान घर में सुसज्जित थे घर में दो नौकर हरिया और उसकी पत्नी पारो भी थे जो पिछले पंद्रह साल से इसी घर में रह रहे थे &#124;<br />
अचानक पारो दौड़ती हुई आती है &#124;"साहब,मेम साहब की तबीयत ज्यादा ही ख़राब हो रही है" &#124; चढ्ढा साहब तेजी के साथ  रूबिया के कमरे में जाते है &#124; रूबिया प्रसव पीड़ा के कारण बहुत परेशान थी &#124; चढ्ढा साहब ने दोड़कर फोन का रिसीवर उठाया और लेडिज डाक्टर नीतू सिंह का नम्बर डायल कर दिया &#124; फोन उठाते ही चढ्ढा साहब बोले -"हेलो डाक्टर साहब में धनपत चढ्ढा बोल रहा हूँ " &#124; उधर से एक ओरत की आवाज आती है -"हेलो चढ्ढा साहब कैसे हो "&#124;<br />
"जी मै ठीक हूँ लेकिन मेरी पत्नी की तबीयत काफी ख़राब है "&#124; "क्या हुआ  उन्हें " &#124; "जी डिलेवरी केस हे आप जल्दी से एक एम्बुलेंस भेज दीजिए ", "अच्छा अभी भेजती हूँ "&#124;<br />
चढ्ढा साहब ने फोन रख दिया और रूबिया के पास चले गए &#124; पारो रूबिया के सिर को सहला रही थी और रह रहकर उस्केदिल को सांत्वना दे रही थी &#124;<br />
थोडी देर के बाद लोन में एक गाड़ी आकर रूकती है &#124; दो आदमी आते हे और रूबिया को उठाकर कार के अन्दर लिटा देते है &#124;<br />
पारो और चढ्ढा साहब भी गाड़ी में बैठ जाते है &#124; घर पर हरिया रह जाता है &#124; थोडी देर बाद गाड़ी अस्पताल पहुच जाती है &#124; दोनों व्यक्ति उतरते हे और रूबिया को उठा कर आपरेशन कक्ष में ले जाते है &#124;<br />
डाक्टर नीतू सिंह आती हे उनके साथ दो नर्स ओर थी, वे ओपरेशन कक्ष में चली जाती है &#124;पारो ओर चढ्ढा साहब बहार बैंच पर बैठ जाते हे &#124; वे आपरेशन कक्ष के बहार लगे लाल बल्ब को बार-बार देख रहे थे &#124;रह रहकर उनकी निगाह दीवार पर लगी घड़ी पर भी जा रही थी जी इस समय रात के ग्यारह बजा रही थी &#124;<br />
आख़िर एक घंटे बाद इंतजार की घड़िया समाप्त होती है और बारह बज कर कुछ ही सेकंड हुए थे कि ओपरेशन कक्ष के बहार लगा लाल बल्ब बूझ जाता है &#124;<br />
अन्दर से डाक्टर नीतू सिंह आती है , उनके चहरे पर मुस्कुराहट थी -"बधाई हो चढ्ढा साहब, आपके घर क्रष्ण और बलराम दोनों ने जन्म लिया है " &#124;<br />
चढ्ढा साहब चोककर - " क्या मतलब "&#124;<br />
"मतलब यह हे कि आप दो बेटो के बाप बन गए हो " &#124;<br />
चढ्ढा साहब खुशी के मरे उछल पड़ते है &#124; पारो का मन भी खुशी के मरे प्रफुलित हो उठता हे &#124;<br />
-"लेकिन चढ्ढा साहब " &#124;<br />
-"लेकिन क्या डॉक्टर " &#124;<br />
-"मुझे बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप कि पत्नी आगे माँ नही बन सकती "-चढ्डा साहब को लगा कि मनो किसी ने उनके सिर पर तोड़ा मर दिया हो &#124;<br />
-"दो बच्चे होने कि वजह से उनकी फोलिकल टूब ख़राब हो गई हे इसलिए वों आगे माँ नही बन सकती "&#124;<br />
इतना कह कर डॉक्टर चली जाती है &#124;<br />
-"डाक्टर "- पीछे से चढ्ढा साहब ने पुकारा &#124;<br />
-"क्या मै अभी रूबिया को देख सकता हूँ "&#124;<br />
डाक्टर -" नही अभी तो वों आराम कर रही है , और उन्हें ये बात भी न बताना,ओर बच्चो के पास पारो को भेज दो "&#124;<br />
-"जी अच्छा "&#124;<br />
चढ्ढा साहब इस समय काफी परेशान थे लेकिन साथ ही उन्हें एक आत्मिक खुशी भी हो रही थी &#124;वे सोच रहे थे कि आख़िर दो बच्चों से ज्यादा बच्चे पैदा करके क्या करना है &#124;<br />
पाँचवें दिन रूबिया कि अस्पताल से छुट्टी हो जय है &#124; घर पहुँचते ही एक बच्चे को हरिया उठा लेता है तो दुसरे को पारो &#124;वे बच्चों को इस तरह पियर कर रहे थे कि मनो वों उनकी अपनी औलाद हो &#124;<br />
पूरे घर में खुशी का माहोल था &#124;आठ साल के बाद आज ही तो वो दिन आया था कि घर में किसी बच्चे के रोने कि आवाज सुने दी हो &#124; रूबिया बेड़ पर लेती हुई थी &#124;वह बच्चों को देखकर इतनी खुश थी कि मनो साडी दुनिया कि खुशी उनके घर में आ गई हो ,वह कभी एक बच्चे का चुम्बन लेती तो कभी दुसरे का &#124;<br />
पारो और हरिया भी पास खड़े थे लेकिन पारो  कुछ  उदास नजर आ रही थी &#124; हरिया उसकी उदासी का कारण जनता था &#124;वो जनता था कि पारो उस बंजर पेड़ कि तरह से हे जिसकी डाल पर पिछले पन्द्र साल से कोई फल नहीं आया था &#124; अचानक ही चढ्ढा साहब कमरे में प्रवेश करते है &#124;<br />
-"हरिया"<br />
-"जी साहब "<br />
-"सभी लोगो को फोन कर दो कि हम परसों बच्चों के जन्म कि खुशी में पार्टी दे रहे है "&#124;<br />
हरिया (कुछ रुककर ) -"लेकिन साहब एक बात कहूं अगर आप मानो तो "&#124;<br />
-"हाँ कियो नहीं कहो तो सही "&#124;<br />
हरिया -"साहब मेरी मनो तो पहले मेमसाहब को आच्ची हो जाने दो"&#124;<br />
चढ्ढा साहब -"कियो रूबिया तुम्हारा क्या कहना है "&#124;<br />
-"जी हरिया ठीक ही तो कह रहा है "&#124;<br />
चढ्ढा साहब -"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा "&#124;<br />
इतना कह कर चढ्ढा साहब दफ्तर चले जाते है &#124;</p>
<p style="text-align:center;"><strong> </strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:left;"><strong>- उपन्यास (भारत /India) से</strong><strong>-(</strong><strong>लेखक-</strong><strong>विजय-राज चौहान)</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;"><a href="http://hindibharat.wordpress.com/2008/07/06/3-43-4/" target="_self"><strong> </strong></a><a href="http://hindibharat.wordpress.com/2008/07/06/3-4/" target="_self"><strong>आगे&#62;&#62;</strong></a></p>
<p style="text-align:center;"><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेने अपनी बंदी {Girlfriends} से मजे लिए]]></title>
<link>http://wanamastijokes.wordpress.com/?p=88</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 14:31:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>workwithseo</dc:creator>
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<description><![CDATA[

में कई दिनों से सोच रहा था की में अपनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="content">
<div class="snap_preview">
<h3>में कई दिनों से सोच रहा था की में अपनी बंदी से मजे लूँ<br />
मगर केसे लूँ इसका तरीका समझ नही आ रहा था</h3>
<h3>~~~~~~~~~~~~~~~~~</h3>
<h3>तब मेने अपने दोस्त को बताया की मुझे एसा करना हैं<br />
थो उसने मुझे राय दी की तूं कही उसे घुमाने ले जा<br />
तो मेने सोचा की यह सही हैं और मेने एसा ही किया!!<br />
और में उसे ग्रीन परक  ले गया और मेने वही किया जो करना चाहिए था आप तो समझ ही गए होंगे!!</h3>
<p>~~~~~~~~~~~~~~~~~~</p>
<h3><span style="color:#00ced1;">आपकी  राय में मेने जो किया वह ठीक था</span> <span style="color:#00fa9a;">या मुझे एसा नही कर</span><span style="color:#00ffff;">ना चाहिए था अपनी राय दे???</span></h3>
</div>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संस्कृत]]></title>
<link>http://samskrit.wordpress.com/?p=4</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 17:44:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>ggajendra71</dc:creator>
<guid>http://samskrit.wordpress.com/?p=4</guid>
<description><![CDATA[ 
1.संस्कृत कथा
( गजेन्द्र ठाकुरः)
 
गंगा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">1.संस्कृत कथा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं<span>  </span>कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल। </span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI"></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">2.कथा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">अहं इदानीम् एकं लघुकथां वदामि।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">काशीः नगरे एकः महान् पण्डितः आसीत्। सः बहुषु शास्त्रेषु पारंगतः आसीत्। तस्य समीपे बहुछात्राः अध्ययनं कुर्वंति स्म। तस्य ख्यातिः सर्वत्र प्रसारिता आसीत्। अतः दूर-दूरतः छात्राः आगच्छंति स्म।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">एकदा कश्चन् शिष्यः तस्य समीपम् आगतवान्। सः गुरोः नमस्कारं कृत्वा पृष्ठवान्- भोः। अहं भवतः समीपे अध्ययनं कर्त्तुम इच्छामि। अतः माम शिष्यत्वेन स्वीकरोतु। इति सः उक्तवान्। किंतुः सर्वेषाम छात्राणां बुद्धि परीक्षां कृत्वा एव तान स्वीकरोति स्म। अतः एतस्य अपि बुद्धि परीक्षां कर्त्तुम सः एकं प्रश्नं पृष्ठवान। भोः वत्सः। देवः कुत्र अस्ति। इति पृष्ठवान। तदा शिष्यः उक्तवान। भगवन्। देवः कुत्र नास्ति। सः सर्वोव्यापी अस्ति। इति। प्रस्नरूपेण एव गुरुः पृष्ठवान। एतस्य उत्तरम् श्रुत्वागुरुः अत्यन्तं संतुष्टः जातः। सः हर्षेण तम् आलिङ्गितवान। तम उक्तवान अपि। भोः वत्सः। भवान् बुद्धिमान् बालकः अस्ति। भवंतम् अहं शिष्यत्वेन निश्चयेन स्वीकरोमि। सत्यं देवः सर्वव्यापि अस्ति। इति तम उक्तवान, शिष्यत्वेन अंगीकृतवान। एवं सः शिष्यः तत्रैव विद्याभ्यासं कृतवान,गुरोः आशीर्वादं प्राप्तवान।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">भवन्तः कथाम् अर्थः ज्ञातवंतः किल।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI"><span> </span>सुभाषितम्( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">वयम् इदानीम् अद्यापि एकस्य सुभाषितस्य अभ्यासः कुर्मः। भवंतः इदानीं सुभाषितम् श्रुणवंतु।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">इदानीं यत् सुभाषितम् श्रुण्वंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">लोके द्विविधाः जनाः भवति। केचन् लघु मनस्काः।ते चिंतयंति, एषः मम जनः। एषः मम जनः न। इति चिंतयंति। अन्ये केचन् संति, महात्मानामः। उदार च्रिताः। ते चिन्तयन्ति-जगत एव मम कुटुम्बः। लघु कुटुम्बः। तेषां दृष्टयासमग्रः प्रपञ्चःएव मम कुटुम्बः। सज्जनाः एवं चिंतनं कुर्वंति। धन्यवाद:।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">सुभाषितम्( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः<span>  </span>तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः<span>  </span>स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">पद्य</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">चटका</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">रचयति नीडं चटका वृक्षे<span>  </span>आकाशे।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा,</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे,</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">पश्यतु </span></strong><strong><span><a href="http://www.videha.co.in/">http://www.videha.co.in/</a> </span></strong></p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संस्कृत]]></title>
<link>http://samskrit.wordpress.com/?p=3</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 17:43:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>ggajendra71</dc:creator>
<guid>http://samskrit.wordpress.com/?p=3</guid>
<description><![CDATA[1.संस्कृत कथा
( गजेन्द्र ठाकुरः)
 
गंगात]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">1.संस्कृत कथा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं<span>  </span>कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल। </span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI"></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">2.कथा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">अहं इदानीम् एकं लघुकथां वदामि।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">काशीः नगरे एकः महान् पण्डितः आसीत्। सः बहुषु शास्त्रेषु पारंगतः आसीत्। तस्य समीपे बहुछात्राः अध्ययनं कुर्वंति स्म। तस्य ख्यातिः सर्वत्र प्रसारिता आसीत्। अतः दूर-दूरतः छात्राः आगच्छंति स्म।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">एकदा कश्चन् शिष्यः तस्य समीपम् आगतवान्। सः गुरोः नमस्कारं कृत्वा पृष्ठवान्- भोः। अहं भवतः समीपे अध्ययनं कर्त्तुम इच्छामि। अतः माम शिष्यत्वेन स्वीकरोतु। इति सः उक्तवान्। किंतुः सर्वेषाम छात्राणां बुद्धि परीक्षां कृत्वा एव तान स्वीकरोति स्म। अतः एतस्य अपि बुद्धि परीक्षां कर्त्तुम सः एकं प्रश्नं पृष्ठवान। भोः वत्सः। देवः कुत्र अस्ति। इति पृष्ठवान। तदा शिष्यः उक्तवान। भगवन्। देवः कुत्र नास्ति। सः सर्वोव्यापी अस्ति। इति। प्रस्नरूपेण एव गुरुः पृष्ठवान। एतस्य उत्तरम् श्रुत्वागुरुः अत्यन्तं संतुष्टः जातः। सः हर्षेण तम् आलिङ्गितवान। तम उक्तवान अपि। भोः वत्सः। भवान् बुद्धिमान् बालकः अस्ति। भवंतम् अहं शिष्यत्वेन निश्चयेन स्वीकरोमि। सत्यं देवः सर्वव्यापि अस्ति। इति तम उक्तवान, शिष्यत्वेन अंगीकृतवान। एवं सः शिष्यः तत्रैव विद्याभ्यासं कृतवान,गुरोः आशीर्वादं प्राप्तवान।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">भवन्तः कथाम् अर्थः ज्ञातवंतः किल।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI"><span> </span>सुभाषितम्( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">वयम् इदानीम् अद्यापि एकस्य सुभाषितस्य अभ्यासः कुर्मः। भवंतः इदानीं सुभाषितम् श्रुणवंतु।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">इदानीं यत् सुभाषितम् श्रुण्वंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">लोके द्विविधाः जनाः भवति। केचन् लघु मनस्काः।ते चिंतयंति, एषः मम जनः। एषः मम जनः न। इति चिंतयंति। अन्ये केचन् संति, महात्मानामः। उदार च्रिताः। ते चिन्तयन्ति-जगत एव मम कुटुम्बः। लघु कुटुम्बः। तेषां दृष्टयासमग्रः प्रपञ्चःएव मम कुटुम्बः। सज्जनाः एवं चिंतनं कुर्वंति। धन्यवाद:।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">सुभाषितम्( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः<span>  </span>तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः<span>  </span>स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span> </span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">पद्य</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">( गजेन्द्र ठाकुरः)</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">चटका</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">रचयति नीडं चटका वृक्षे<span>  </span>आकाशे।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा,</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे,</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।</span></strong><strong><span></span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="HI">पश्यतु </span></strong><strong><span><a href="http://www.videha.co.in/">http://www.videha.co.in/</a> </span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सहस्रबाढ़नि मैथिली उपन्यास]]></title>
<link>http://sahasrabadhani.wordpress.com/?p=3</link>
<pubDate>Fri, 20 Jun 2008 02:26:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>ggajendra71</dc:creator>
<guid>http://sahasrabadhani.wordpress.com/?p=3</guid>
<description><![CDATA[१.
-     -     -     -     -     -     -     -     -     -  ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span>१</span><span lang="HI">.</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span>-<span>     </span></span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">स</span><span lang="EN-GB">न्</span><span lang="HI"> 1885 ई.। झिंगुर ठाकुरक घरमे एक</span><span lang="EN-GB">टा</span><span lang="HI"> बालकक जन्म भेल।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">एहि वर्षमे कांग्रेस पार्टीक स्थापना बादक समयमे एकटा महत्त्वपूर्ण घटनाक रूपमे वर्णित होमयवला छल। अंग्रेजी राज अपनाकेँ पूर्णरूपसँ स्थापित कए चुकल छल।राजा-रजवाड़ासभ अपनाकेँ अंग्रेजक मित्र बुझवामे गौरवक अनुभव करैत छलाह।शैक्षिक जगतमे कांग्रेस शीघ्रअहि उपद्रवी तत्वक रूपमे प्रचारित भय गेल। मिलाजुलाकेँ कांग्रेसी लोकनि अंग्रेजीराज आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भारतीय रजवाड़ा सभक सम्मिलित शासनकेँ स्थायित्व आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> यथास्थिति निर्माणकर्त्ताक रूपमे स्थान भेटि चुकल छल। कांग्रेस अपन यथास्थितिवादी स्वरूपकेँ बदलबाक हेतु भविष्यमे एकटा आन्दोलनात्मक स्वरूप ग्रहण करयबला छल। संस्क़ृतक रटन्त विद्याक वर्चस्व छल। परंतु सरकारी पद बिना आङ्ल सिखलासँ भेटब असंभव छल।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">सरकारी पदक तात्पर्य राजा-रजवाड़ाक वसूली कार्यसँ संबंधित आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ओतबहि धरि सीमित छल। मुदा किछु समयापरान्त अंग्रेजक किरानीबाबू लोकनि सेहो अस्तित्वमे अयलाह।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल। मैथिल परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ताहि कारणसँ अधिकांश परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल छल। मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक कलिकतियाबाबूकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएल। तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह। बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेलाह। जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू अन्यमनस्क पड़ल आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह, तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत से आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त क</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> रहल छथि। हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल, नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> बेंग जेंकाँ पाछू सँ सोझे आगू फाँगि जाइत छलाह। पूरा बेंग जेकाँ-अनायासहि ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> मुस्कुरा उठलाह। पत्नी पूछि देलखिन्ह जे कोन बात पर मुस्कुरेलहुँ, तँ पहिने तँ ना-नुकुर केलन्हि फेर सभटा गप कहि देलखिन्ह। तखनतँ गप पर गप निकलय लागल।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span></span><span lang="EN-GB">“</span><span lang="HI">एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> रहल छथि। आँगनसँ बाहर भेला पर जतय अंकर-पाथर देखल ततय ठेहुन उठा कय, मात्र हाथ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> पैर पर आगू बढ़य लगलाह</span><span lang="EN-GB">”</span><span lang="HI"> , पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span></span><span lang="EN-GB">“</span><span lang="HI">एक दिन हम देखलहुँ जे ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> देबालकेँ पकड़ि कय खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि। हमरो की फूड़ल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह। दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह। हाथ पहुँचबे नहि करन्हि। फेर तेसर बेर जेना कूदि गेलाह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ठाढ़ भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेलाह</span><span lang="EN-GB">”</span><span lang="HI"> , झिंगुर बाबूकेँ एकाएक यादि पड़लन्हि।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span></span><span lang="EN-GB">“</span><span lang="HI">एक दिन हम ओहिना एक-दू बाजि रहल छलहुँ। हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ। फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ। तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि</span><span lang="EN-GB">”</span><span lang="HI">।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span></span><span lang="EN-GB">“</span><span lang="HI"> एक दिन खेत परसँ एलहुँ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> नहा-सोना भोजन कय खखसि रहल छलहुँ। अहाहा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> केलथि। घूरि कय देखलहुँ तँ ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेंदसँ बैसि कय खेला रहल छलाह। दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह। हम कहलहुँ किछु नहि, ई हमर नकल कय रहल छथि। दलान पर सभ क्यो हँसय लागल। फेर तँ जे आबय, कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ दोसरे तरीकासँ कहथि। उम्र कतेक हेतन्हि, नौ-वा दस महिना</span><span lang="EN-GB">”</span><span lang="HI">।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span></span><span lang="EN-GB">“</span><span lang="HI"> हम जे सुनेलहुँ ताहि समय कतेक वयस होयतन्हि, छ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कि सात मास</span><span lang="EN-GB">”</span><span lang="HI">। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे-</span><span lang="EN-GB">‘</span><span lang="HI">गप सुनलहुँ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> वा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ई करू वा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> करू बजैत छलीह। मुदा सासु- ससुरक सोझाँ तृतीया पुरुषमे-सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक-। आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक काजक लेल काजक अनुकरणमे तृतीया पुरुषमे जवाब देथि। मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक। पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझताह जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक छथि। पनी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल। मुदा एहि बेर झिंगुर कन्नी काटि गेलाह। मुस्की दैत दलान दिशि निकलि गेलाह, ओतय किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात क</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> रहल छलाह। भोरहाकातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल। भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान सभ पहुँचि जाइत छल। एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कय कोड़ि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> चूरि कय बनायल। बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतय पहुँचैत छल। झिंगुर बाबू कचोट केलन्हि तँ आन लोक सभ कहलखिन्ह जे से की कहैत छी। अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति हेतु अपनासँ दूर रखने छी, तँ एहिमे कचोट कथीक। एकौरसँ ठाकुर परिवार मात्र एक घर मेंहथ आयल आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेल अछि। डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेट गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ ल</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कय आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे। अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता द</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> देल गेल छैक। तखने एकौरसँ एकटा समदी एलाह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भोजपत्रमे तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह। झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> पत्र पढ़य लगलाह। प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि। </span><span lang="EN-GB">‘</span><span lang="HI">परतापुरक सभागाछी देखि कय जायब</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> , ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह, एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि। फेर आँगन जाय पत्र पढ़ब प्रारंभ कएल।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>                              </span>॥श्रीः॥</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु। शतम</span><span lang="EN-GB">~</span><span lang="HI"> कुशलम। आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी। अहाँक प्रपितामह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> हमर प्रपितामह संगहि पढ़लथि। अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह। हर्षक वा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> शोकक कोनो घटना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अयने अशोचक विचार नहि करबासँ भविष्यक अनिष्टक डर अछि। संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी। अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी। परतापुरक सभागछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लालायित सेहो छथि। अगला महीनाक प्रथम सोमकेँ जौँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत। बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक<span>  </span>कार्य सभ शुरु भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> जायत। इति शुभम</span><span lang="EN-GB">~</span><span lang="HI">।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"><span>      </span></span><span lang="HI">बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> तकर नीचाँ सभागछी। बलानक धार खूब गहींर आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> पूर्ण शांत। ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> हायाघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> एकर धारकेँ रोकि देलक आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल। बलान झंझारपुर दिशि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कमला मेंहथ , गढ़िया आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> नरुआर दिशि। बलान गहींर आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी। बाढ़िक संग रेत कमला आनय लगलीह। ग्रीष्म ऋतुमे बलान पूर्वे रूप जेकाँ रहैत छथि, बिना नावक पार केनाइ कठिन, किंतु कमलामहारानीकेँ </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span> </span>पैरे लोक पार करैत रहथि। सभटा सभागछीक चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल। चारूदिश रेत आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> सभागाछी उपटि गेल। चलि गेल सभटा वैभव सौराठ। मुदा झिंगुर बाबूक कालमे परतेपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल, से बादहुमे परम्परारूपमे रहल।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जयताह</span><span lang="EN-GB">,,,, , </span><span lang="HI">तखन हुनका ल</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कय एकौर जायब। बेचारे बहुत दिन तपस्या कयलन्हि। एहि बेर मामा गाम, दीदीगाम सभ ठाम घुमा देबन्हि। सभकेँ मोन लागल छैक। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>पिता-पुत्र एकौर पहुँचलाह। ई गाम कोनो तरहेँ आन जेँकाँ नहीं लगलन्हि। जेना जमघट लगला पर शास्त्रार्थक परम्परा रहल अछि, तहिना विद्वतमण्डलीमे विभिन्न विषय पर चर्चा होबय लागल। चर्चामे अंग्रेजी शासन आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भारतवासीक सैन्य अभियान रहल। मँगरूबाबू लाल कोट पहिरि कय कतेक लड़ाई लड़ल छलाह। 1867-68क अबीसीनिया युद्धमे सर चार्ल्स नेपियरक संग कोनाकेँ अभियानमे ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेल छलाह, तकर वर्णन विस्तृतरूपमे देबय लगलाह मँगरूबाबू। द्वितीय अफगान-युद्धमे कोना समयक अभावमे सेनाकेँ लालक बदला मलिछह वर्दी लगबय पड़्लैक तकर वर्णन सेहो देलन्हि। यैह वर्दी बादमे खाकीरंगक रूपमे प्रसिद्ध भय गेल। एनफील्ड रायफालक खिस्सा जे 1857क स्वतंत्रता संग्राममे परिणत भेल केर बदलामे बेश नमगर स्नाइडर रायफल जे 1887मे देल गेल। मँगरू बाबू कांग्रेसक चर्चा सेहो केलन्हि।ओम्हर झिंगुर बाबू भोज-भातक फेहरिस्ट आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> एस्टीमेट बनबय लगलाह। कलित सेहो अपन तुरियाक विद्यार्थी सभक संग मगन भय गेलाह। ओहि भीड़मे राजे गामक फन्नू बाबू सेहो आयल छलाह। एकौरमे हुनकर बहिन-बहनोइ रहैत छलखिन्ह। ताहि द्वारे एतय एनाइ-गेनाइ ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> किछु बेशी करैत छलाह। कलितकेँ एहिसँ पहिने ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> नहीं देखने रहथि। अनायासहि उत्सुकता भेलन्हि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कलितक विषयमे पूछ्पाछ केलन्हि। ई जानि कि कलित झिंगुरबाबूक सुपुत्र छथि, क्षणहिमे झिंगुरबाबू<span>  </span>लग घुसकि कय चलि गेलाह। वार्त्तालाप क्रममे झिंगुर बाबू सँ ईहो पता चललन्हि जे जमीन्दारीक पर्मनेंट सेटलमेंटक बाद दरिभङ्गा राजकेँ वसूलीक हेतु परगनाक आधारपर मिथिला क्षेत्रक वसूलीक हेतु अधिकार प्राप्त भेलाक बाद कलित कटिहारमे वसूलीक कार्यक हेतु जयताह। एम्हर फारसी आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> अंग्रेजीक शिक्षा कलित पूरा क</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> लेने छलाह। विवाहक संबंधमे पता चललजे फन्नू बाबू अपन बचियाक हेतु योग्य वरक ताकमे छथि। तखन विचार भेल जे परतापुरक सभागाछीमे अगिला महिनामे फन्नू बाबू आबथि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> झिंगुर बाबूकें आतिथ्यक अवसर भेटन्हि। मुदा बीचहिमे दियाद सभ झिंगुर बाबूकँ तेनाने घेरलकन्हि जे कलितक विवाह फन्नू बाबूक बचियासँ थीक करैत आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भराममे सिद्धांत करेनहि गाम पहुँचलाह। ड</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">रो होइन्हि जे कनियाँ ने कहीं रपटा दय देथिन्ह। मुदा विवहक बात सुनितहि, कनियाँ खुशीसँ बताहि जेकाँ भय गेलीह। पिछला चारि दिनसँ जतेक गुनधुनी लागल रहन्हि सभटा खतम भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेलन्हि।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">-----------------------------------------------------------------------</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>पैरे किंवा कटही गाड़ी यैह छल यातायातक साधन। महफा सेहो बेश नक्काशी बला आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भरिगर। वर महफा पर आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> बरियातीमे जे युवा रहथि से पैरे आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> जे कनेक उमरिगर रहथि से कटही गाड़ी पर विदा भेलाह। संगमे सेवकक लश्कर। दरबज्जा पर स्वागत भेलन्हि। हजाम पैर धोलकन्हि, पुनः इत्र-सेंट, फूल, नाश्ता। गप्प सरक्का। शास्त्रर्थ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> चुटक्का। अँगनामे परिछनि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> विधि-व्यवहार तँ दलान पर गप्पक फूहारि। बीच-बीचमे क्यो आबि कय कहीं जाथि जे गहना कतय छैक। घोघट के</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> देथिन्ह। घोघटाही नूआ नहीं भेटि रहल अछि। एहिसँ विवाहक क्रम आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> प्रगतिक विषयमे बरियाती लोकनिकेँ सेहो पता चलैत छलन्हि। एवम् प्रकारे आँगन आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> दरबज्जा दुनू ठाम विवाहक कार्यक्रम भोरक पाँच बज्वए तक चलैत रहल। वर आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कनियाक हाथमे ब्रह्मचारी डोरी बान्हि देल गेल, जे चारि दिन धरि रहल। तकरा बाद विवाह पूर्ण भेल। विदाइक दिन</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> तका कय झिंगुर बाबू पठेलखिन्ह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कलित अपन गाम आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कलित अपन गाम आबि गेलाह। कटिहार जयबाक तैयारी भेल। अश्रुपूरित नेत्रसँ माय आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ग्रामीणसँ विदा लेलाक बाद कलित अपन रोजगार पर विदा भेलाह।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">+<span>                                  </span>+<span>                            </span>+</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>कोशीक विभीषिकासँ त्रस्त क्षेत्र होइत कटिहार पहुँचि कय कलित अप्पन काजमे शीघ्रहि पारंगत भय गेलाह। काजक अधिकता भेलापर अपन पितियौत भाय आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भातिजकेँ सेहो बजा लेलथिन्ह। एहि क्षेत्रक लोकक बीचमे बहुत थोरबेक दिनमे अपन प्रतिष्ठा बढ़ा लेलथि कलित। एहि क्षेत्रक लोकक बीचमे जमीन्दारीक परमानेंट सेटलमेन्टक विषयमे पुराण अनुभव बहुत खराब छल। वसूली पदाधिकारीक भ्रष्ट तरीका सभकेँ कलित बदलि देलखिन्ह। मुदा कालक गालनमे किछु आरे छल। कलितक द्विरागमनक पहिनहि हुनकर माय गुजरि गेलखिन्ह। बड्ड रास सौख-मनोरथ लेने चलि गेलीह माय। कखनो कलितकेँ कहैत छलखिन्ह जे तोरा कनियाँसँ खूब झगड़ा करबौक तखन देखबौक जे तूँ हमर पक्ष लैत छँह कि कनियाक।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>झिंगुर बाबू सेहो अन्यमनस्क रहय लगलाह। कलित कहबो केलखिन्ह जे सँगहि चलू, मुदा भरि जन्म जतय रहलाह ओहि ठामकेँ छोड़थु कोना।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>तेसर साल कलितक द्विरागमन भेलन्हि आ</span><span lang="EN-GB">&#124;</span><span lang="HI">तकरा बादे ओ</span><span lang="EN-GB">&#124;</span><span lang="HI"> निश्चिंत भ</span><span lang="EN-GB">&#124;</span><span lang="HI"> सकलाह। जाइत-जाइत कलितकेँ कहैत गेलखिन्ह जे तोँ तँ बेशीकाल गामसँ बाहरे रहलह। हमरा सभहक सेवा तँ ई बुचिया केलक। अपन बहिनक भार आब तोहिँ उठाबह। हमारा सोचने छलहुँ जे एकर विवाह दान करबाइये कय निश्चिंत हैब। मुदा तोहर माय हमरा तोड़ि देलन्हि। आब तूँ अपना जोगर भइये गेल छह। पाँच बरखक बेटा रहैत छैक तखनो लोक केँ लोक कहैत छैक जे अहाँ केँ कोन बातक चिंता अछि, पाँच बरखक बेटा अछि। तूँ तँ आब पढ़ि लिखि कय अपन जीवन यापन करैत छह। फेर पुतोहुकेँ सेहो बुचियाक हाथ पकड़ा कय एहि लोकसँ छुट्टी लेलन्हि झिँगुर बाबू। कलित हुनका एतेक हड़बड़ीमे कहियो नहि देखने छलथिन्ह।स्थिर, शांतचित्त आ</span><span lang="EN-GB">&#124;</span><span lang="HI"> फलक चिंता केनिहार किसान सेहो अपन जीवन-संगीक संग छुटलाक बाद अधीर भ</span><span lang="EN-GB">&#124;</span><span lang="HI"> गेल।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">+<span>                </span>+<span>                </span>+<span>                </span>+<span>                </span></span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>कलितकेँ कटिहार अयलाक बादो एकेटा चिंता लागल रहैत छलन्हि। से छल बुचियाक विवाह। पिताक रहैत ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कोनो परेशानीसँ चिंतित नहि भेल छलाह। मुदा हुनका गेलाक बाद आब लोकोकेँ देखेबाक छलन्हि जे क्यो ई नहि कहय जे बापक गेलाक बाद बहिन पर ध्यान नहि देलन्हि कलित। पिताक बरखी तक विवाहक प्रश्न उठेबो कोना करितथि। मुदा समय बितबामे कतेक देरी लगैत छैक। पूरा गामक बारहो वर्णक भोज<span>  </span>कय, कलित बुचियाक विवाहक हेतु वर ताकयमे लागि गेलाह। परतापुरक सभागाछीमे गेलाह मुदा कोनो वर पसिन्न नहि पड़लन्हि जे बुचियाक हेतु सुयोग्य होय। पन्द्रह दिनक छुट्टी बेकार गेलन्हि। पुनः कटिहार पहुँचि गेलाह। कार्यक क्रममे गिद्धौर,बाढ़ इत्यादि गंगाक दक्षिण दिशक मैथिल ब्राह्मण परिवार सभसँ<span>  </span>सेहो परिचय भेलन्हि। ओहिसँ हुनका बाढ़क एकटा लड़काक विषयमे पता चललन्हि जे गिदद्धौर स्टेटमे कार्य कय रहल छलाह। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">चोट्टहि ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> लड़कासँ भेँट करबाक हेतु<span>  </span>गिद्धौर पहुँचि गेलाह। बालक अत्यंत दिव्य छलाह। पता लय बाढ़ पहुँचि कय बालकक पितासँ गप केलन्हि। पंचकोशीक कथा कतबा दिनक बाद बाढ़क क्षेत्रमे आयल छल से एकरा काटब मुश्किल छल। सभटा गपशप कय पुनः भराममे सिद्धांत करेने मेहथ पहुँचलाह। बूढ़- पुरान जे<span>  </span>क्यो सुनलन्हि से आश्चर्यचकित रहि गेलाह। बढ़य पूत पिताक धरमे- झिंगुर बाबू जेना कलितक सिद्धांत करेनहि पहुँचल छलाह तहिना कलित केलन्हि, वाह...। कथा ओनातँ दूरगर भेलन्हि, मुदा कलित स्वयम् नेनेसँ दूरदेशक बाशी छलाह, ताहि द्वारे हुनका सभचीजक अनुभव छलन्हि , यैह सोचि सभ संतोष कएलक। पूरा टोल विवाहक तैयारीमे लागि गेल। बुचियाकेँ कोनो दिक्कत नहि होएतैक। सर्वगुण संपन्न अछि बुचिया। गीत-नाद लियऽ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">कि सराय-कटोरा, दसो हजार महादेव सुगढ़ पातर-पातर छनहिमे बना दैत अछि। जाहि घरमे जायत तकरा चमका देत।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>विवाह विधि-विधानसँ संपन्न भय गेल। वरपक्ष संगहि द्विरागमनक प्रस्ताव राखलन्हि, मुदा कलित तैयार नहि भेलाह, तखन बुचियाक हाथक छाप लऽ कय वरपक्ष केँ जाय पड़लन्हि। कलितक पत्नी छलीह पूर्ण शुद्धा। बुचियासँ बहिनापा छलन्हि। बुचियो भौजी-भौजी कहैत नहि थकैत छलीह। तेसर साल द्विरागमनक दिन भेलैक। बुचियाक संग जे खबासनी गेल छलीह से आबि कय गंगा आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गंगा पारक दृश्यक वर्णन करय लगलीह तँ भाउजक आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबय लागलन्हि। कलितसँ कतेक बेर पुछलथिन्ह जे ई बाढ़ छैक कतय। समयक सँग सभ किछु सामान्य भाय जाइत अछि। बुचिया जखन एक-दू बेर एलथि-गेलथि तखन भाउज आरो निश्चिंत भय गेलीह। एवम् क्रमे कलित पुनः एकाकी भय गेलाह। सन् चौंतीसक भूकम्पमे महादेव पोखरि पर पत्नी आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> दुहु पुत्री आऽ</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">एकटा पुत्रक संग बितायल रातिक बाद परिवार सहित किछु दिनका बाद कटिहार गेलाह। कारण छल महीना भरि चलल छोट-छोट भूकंपक तरंग। मुदा पत्नीकेँ घरक पीड़ा सतबय लगलन्हि। घरतँ भूकम्पमे ढहि गेल छलन्हि, से कलित भूमिक ओहि टुकड़ाकेँ छोड़ि फुलवरीक कातमे नव घरक निर्माण केलन्हि। अपन पुरान डीह अपन दियादकेँ दऽ एहि नबका डीह पर घरहट कएल। तकरा बाद एकटा पुत्र एवम् एकटा पुत्रीक प्राप्ति आओर भेलन्हि। पुनः एकटा पारिवारिक चक्रक प्रारंभ भय गेल। समय बितैत कतेक काल लगैत अछि। अपन बचिया सभ सेहो आब विवाह योग्य लागय लगलन्हि। अपन बच्चातँ सदिखन बच्चे लगैत छैक मुदा तँ की। पहिल बचियाक विवाह कछबी आऽ दोसरक खरख करेलखिन्ह। कछबीक परिवार सेहो राज-दरबारक कर्मचारी छलाह। घोड़ा, महफा, चास-बास....। मुदा बच्चा होयबाक क्रममे कलितक प्रथम पुत्रीक देहांत भय गेलन्हि मुदा ननकिरबी बचि गेल आऽ ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> मातृके मे रहय लागल। मुदा ओहो पाँचे वर्षक होयत कि एक दिन पेटमे दर्दक शिकायत भेलैक आऽ ओहो भगवानक घर मायक सेवामे चलि गेल।कलित जीवन आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> मृत्युक एहि संग्रामकेँ देखैत रहलाह। कहियो गाममे हैजाक प्रकोप पड़य लागल तँ कहियो प्लेग आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कि की ? एक गोटाकेँ लोक जरा कय आबय तँ दोसर गोटाक मृत्युक समाचार भेटय। मुदा कलितक परिवार अक्षुण्ण रहलन्हि। </span></p>
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<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>कलितक कटिहारमे पदोन्नत्ति<span>  </span>आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> प्रतिष्ठा बढ़ैत रहलन्हि। भातिज सभ पूर्वरूपेण ओतय रहैत छलाह। दुहू पुत्र केजरीवाल हाई स्कूल, झंझारपुरममे पढ़य लागल छलथिन्ह। कालक मंथर गतिमे कखनो काल गति आबि जाइत अछि। अपन तेसर पुत्रीक विवाह तमुरिया लग आमारूपी गाममे करबाय कलित जेना निश्चिंत भय गेलाह। अपन पैघ पुत्रक विवाह करेलन्हि, आऽ छोट पुत्रक अकादमिक प्रतिभाक प्रति निश्चिंत भेलाह। मुदा छोट पुत्रक अंधविश्वाशी होयबामे सेहो हुनका कोनो संदेह नहि छलन्हि। कारण एक दिन हल्ला उठलैक, जे घनगर चन्ना-गाछीमे, जतय दिनोमे अन्हार रहैत छैक, कोनो गाछक नीचा चाटी उठैत छैक, तखन हुनकर ई पुत्र चाटी उठाबय ओतय पहुँचि गेलन्हि। से जखन आठम वर्गमे विज्ञान वा कला चुनबाक बेर अयलैक, तखन पुत्रक विज्ञान विषय लेबाक निर्णयमे हाँमेहाँ मिला देलखिन्ह कलित बाबू। कतेक गोटे कहलथिन्ह जे सत्यनारायण बाबू आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> के-के साइंस लय फैल कए गेलाह, बादमे पुनः आर्ट्स विषय लेबय परलन्हि। मुदा नन्द नहि मानलथि। साइंसोमे गणित लेलन्हि। कलित सोचलथि जे विज्ञान विषय पढ़ि अदृश्यक प्रति स्नेहमे नन्दक रुचि कम हेतन्हि। पता नहि किएक एकर बाद कलित निश्चिंत जेकाँ भय गेलाह। कटिहारसँ एक बेर आयले रहथि कि भोरमे नित्यक्रियासँ निवृत्त भय कलित हाथ मटियाबय लेल चिकनी माटिक ढ़ेर दिशि बढ़ि रहल छलाह कि पता नहि कि भेलन्हि, हाथक लोटा दूर फेंका गेलन्हि। ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> नीचाँ खसि पड़लाह। कनिया दौड़ल अयलीह, मुदा जीवनक खेल एक बेर भेटैछ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> एक्के बेर चलियो जाइछ।नन्द पिताक मृत्युक साक्षी छलाह। मृत्युक ई प्रकार हुनका लेल सर्वथा नवीन आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> सर्वथा रहस्यमयी छल। अदृश्यक शक्ति विज्ञानक सर्वोच्चताकेँ नन्दक जीवनमे दबाबय लागल।</span></p>
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<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>वृत्तक गोलाकार आकृति केंद्रक परिधिमे घुमैत एकटा चक्र पूरा केलक। अदृश्य केंद्रक फाँसमे फँसल।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="EN-GB"><span>      </span></span><span lang="HI">नन्द अपन यशोदा मैयाक छत्रछायामे बढ़य लगलाह, उम्रोमे आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> पढ़ाइयोमे। अप्पन शिक्षक लोकनिक प्रिय पात्र भय गेलाह नन्द। हुनकर प्रैक्टिकलक कॉपीक साफ-सुथरा रूपक चर्चा सर्वत्र शिकक्षहु वर्गमे होमय लागल। फूल-सन अक्षर हुनकर शारीरिक सौन्दर्यसँ मेल खाइत छल। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>एहि बीच एकटा आर घटना घटित भेल। यशोदा मैय्याक दुहु पुत्र भगवत्ती घरक सोझाँमे नीचाँमे सुतल छलाह। भोरमे माय देखलन्हि जे गहुमन साँप चारि टुकरा भेल पड़ल अछि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> बिज्जी माथ लग ठाढ़ पहरा दय रहल अछि। प्रायः बिज्जीक मारि पड़लैक गहुमनकेँ आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> दुहु पुत्र सुरक्षित रहलन्हि यशोदा मैयाक। नन्द एहि घटनाक स्मृतिक संग आगू बढ़य लगलाह। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>बीचमे बँटवारा भेल। घरारी सभ, निकहा खेत सभ सभटा दू-दू टुकड़ा होमय लागल। बाहरी लोक सभ कहैत छल, जे दुनू भायक संग अन्याय भय रहल अछि। स्कॉलरशिप प्राप्त कय नन्द आर.के.कॉलेज मधुबनीमे अंतर-स्नातक विज्ञान(गणित)मे नामांकन लेलथि। शुरूमे गणित बुझबामे दिक्कत भेलन्हि तँ रटय लगलाह। गणितकेँ रटबाक बुद्धि ई सोचिकेँ लगेलथि जे बादमे लोक ई नहि कहय, जे की सोचि कय विज्ञानक चयन कएल। मुदा किछु दिनका बाद रटैत क्रममे बुझबामे सेहो आबय लगलैन्ह। गामक फुटबॉलक मैदानक स्मृतिये शेष रहलन्हि, खेलेबाक अवसरे नहि भेटन्हि। गणितक शिक्षक तीन सय प्रश्नक सेट परीक्षाक पहिने दैत छलखिन्ह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कहैत छलखिन्ह जे, जे क्यो साठि प्रतिशत प्रश्नक सही-सही उत्तर बना लेताह, ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> प्रथम श्रेणीमे निश्चित रूपसँ उत्तीर्ण होयताह। नन्द सत्तरि प्रतिशत प्रश्नक उत्तर तैयार कय शिक्षककेँ देखा देलखिन्ह। आशानुरूप बादमे परीक्षाक परिणाम अयला पर प्रथम श्रेणी भेटलन्हि। 1959 इंजीनियरिंगमे नामांकनक हेतु आवेदन दय देलखिन्ह। अंकक आधार पर सर्वोच्च अंक अयला उत्तर मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे नामांकन लय लेलथि। ओहि समय मात्र सिविल इंजीनियरिंग शाखाक पढ़ाई ओहि संस्थानमे होइत छलैक, से ओहि शाखामे नामांकन लय धोती-कुर्त्ता पहिरि कय पहुँचि गेलाह।दीक्षित साहेब वर्कशॉपक मशीन देखाय कहलखिन्ह</span><span lang="EN-GB">, </span><span lang="HI">जे एहिमे धोती फँसि जायत, से फुलपैंट आ</span><span lang="EN-GB">∙ </span><span lang="HI">शर्ट पहिरि कय आऊ। दू टा फुलपैन्ट आ</span><span lang="EN-GB">∙</span><span lang="HI"> शर्ट कीनय पड़लन्हि नन्दकेँ। कपड़ा कीनि सियबितथि तँ ढ़ेर दिन लागि जयतन्हि से रेडीमेड कीनय पड़लन्हि। मुदा गाम जाथितँ बिदेसरे स्थानमे फुलपैन्ट-शर्ट बदलि कय धोती कुर्त्ता पहिरि लैत छलाह। कहियो गाम फुलपैंट पहिरि कय नहि गेल छलाह। सन् 1959 सँ 1963 धरि इंजीनियरिंगक पढ़ाई चललन्हि आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> तखन बिहार सरकारमे इंजीनियरिंग असिसटेंन्ट आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> एक सालक बाद 1964 सँ सहायक अभियन्ताक रूपमे बहाली भेलन्हि। इंजीनियरिंग पढ़ाई विशेष खर्च बला छल से एहि शर्त्तनामाक संग विवाह भेलन्हि जे पढ़ाइक खर्चा ससुर उठेथिन्ह। गर्मी तातिलक एक मास आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> दुर्गापूजाक पंद्रह दिनक छुट्टीक पाइ ससुर काटि लैत छलथिन्ह। जौँ सासुरक लोक कहियो ई उपराग दैत छलैन्ह, जे हमही सभ इंजीनियरिंग करबेलहुँ अछि, तँ नन्द सेहो हँसि कय उपर्युक्त बातक खुलासा कय दैत छलखिन्ह। वृत्तक परिधि जेना पैघ भेल जा रहल छल। कालक परिधि पहिने पूर्ण चक्र पूरा कएलक आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> आब परिधिक विस्तार शुरु भय गेल। दुःख-सुख आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> उत्थान-पतनक खिस्सा। स्वतंत्रता दिवसक दिनक उमंग, झंडा ल</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">कय स्कूलक बच्चाक संग 15 अगस्त 1947 केँ घुमैत छलाह। कांग्रेसक भक्ति संगमे रहलन्हि। मुदा 1962क चीनी आक्रमणक बाद भारतीयसेनाक पाछू हटबाक दुःस्वप्न वायुसेनाक उपयोग नहि करबाक भारतक आश्चर्यजनक निर्णयक बादक मनःस्थिति छल पलायनक,हारिक । ऑल इंडिया रेडियोक घोषणा जे हमर सेना गर्वसँ पाछू हटि रहल अछि-सुनि नन्दक हृदय रुकि सन जाइन्ह। से जखन 1965क युद्धक बेर इंजीनियरक भर्त्ती सेनामे कैप्टनक रूपमे शुरु भेल तखन नन्द आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> साहा साहब आवेदन दय देलखिन्ह। साहा साहेबक कनियाँतँ कानय लगलीह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> साहा साहेबकेँ रुकि जाय पड़लन्हि। नन्दक पत्नी एको बेर प्रतिरोध नहि कएल। मुदा ओजनमे छँटा गेलाह नन्द। मसोसि कय रहि गेलाह। तकर बाद जे शरीर घटेबाक सूर चढ़लन्हि, से बढ़िते गेलन्हि। एकेटा सपना छलन्हि-गाममे कोठाक घर। से सभटा सर्वे सभक नक्शा ऊपर कय घरक कुर्सी देलन्हि जे सड़कमे घरक कोनो भाग नहि जाय। मकानक डिजाइनक मात्र आधे भाग पूरा भय सकलन्हि। जतय-जतय ट्रांसफर होइन्ह एकटा नव अनुभव भेटन्हि।ओहि समय कनियाँकेँ तृतीय पुरुषक रूपमे संबोधित करबाक प्रचलन छलैक, मुदा नन्द द्वितीय पुरुषमे संबोधन शुरु केलन्हि। एकर आलोचना होयबाक बदला गाममे आनो लोक सभ ई संबोधन अपना घरमे शुरु कए देलन्हि। डेहरी-ऑन-सोनमे विकास कार्यमे ग्रामीण आदिवासीक पूर्ण सहयोग भेटलन्हि। कहियो पाइ देखि कय अंतरात्मा नहि डिगलन्हि। जी-जानसँ जीप जीप उठा कय अपन कार्यकेँ पूर्ण करथि। कखनो जीप तेज होइन्हतँ यादि पड़न्हि जे कोनो बच्चा ने पिचा जाइ।मुदा कहियो कोनो दुर्घटना नहि भेल। गामक सभ जातिक लोककेँ कतहु ने कतहु मस्टरे रॉल पर नोकरी देलन्हि। स्थानीय लोककेँ सेहो नोकरी करबाक हेतु प्रोत्साहित करैत छलाह। स्थानीय गरीब आदिवासी नन्दकेँ देवता बुझैत छलाह। एतहि दमाक पहिल बेर अटैक भेलन्हि नन्द पर। स्थानीय वैद्य दिन-राति एक कय जंगलसँ बीटी आनि कय देलकन्हि। दमाक इलाज एलोपैथियोमे नहि अछि, मुदा एहि बूटीक एकमात्र खोराकी सँ अगिला कतेक साल तक नन्द दमासँ दूर रहलाह। सँगी सभ भोलेनाथ नाम राखि देलथिन्ह। कतेक कमाइ-धमाइक गुर सभ सिखेबाक प्रयास सेहो केलन्हि। मुदा ग्रामीण-जनक लाचारीकेँ ततेक ल</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">ग सँ देखने छलाह नन्द, जे एहि सभ गप्प दिशि ध्यानो नहि जाइत छलन्हि। ताहुमे गरीबीक बादो जे आपकता स्थानीय जनसँ भेटैत छलन्हि, तकरा बाद?</span></p>
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<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>एहि बीच एक पुत्रीक प्राप्ति सेहो भेलन्हि। दोसर बेर पुत्रक प्राप्ति भेलन्हि। पुत्री<span>  </span>मामा गाममे जन्म लेलथिन्ह आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> पुत्र अपन गाममे। बच्चा सभक स्थितप्रज्ञ भाव, फेर हँसबफेर ठेहुनिया,---। बच्चाक बढ़बाक प्रक्रियाक दर्शन ओहिना अछि, जेना विश्वक निर्माण ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ओकर चेतनाक विकास।हुनकर भातिजक देहांत नेनेमे भेलाक बाद एहि दुनू बच्चाक प्रति स्थितप्रज्ञताक भाव, न्हि सुखमे सुखी नहि दु:खमे दुखीक अवतरण भेल नन्दमे। नन्द दिल्ली कोनो ट्रेनिंगमे गेल छलाह।एक राति सपना देखलखिन्ह, जे नवीन हुनकर गामक फूसक ओसारा पर बैसल छथि।ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> नेना जकरासँ नन्दकेँ बड्ड आपकता छलन्हि, उठि कय खेलाइ लेल जाइत अछि। कनेक कालक बाद पेटमे दर्दक शिकाइत करैत अछि। सभ क्यो जमा भय जाइत छथि।बूढ़-पुरान अपन-अपन नुस्खा देबय लगैत छथि।मुदा कनिये कालक बाद बच्चाक मृत्यु भ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> जाइत अछि। नन्दक आँखि खुजि गेलन्हि।हुनका अपन बड़की बहिनक बचियाक मोन पड़लन्हि। एहने घटना छल ओहो।बचियाकेँ क्यो बूढ़ी पेट पर हाथ दय देने छल, आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> कनेक कालक बाद संयोगवश पेट दर्दसँ काल कवलित भय गेल छलीह। नन्दकेँ अदृश्य, भूत-प्रेत, राकश आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> डाइन जोगिन पर असीम विश्वास छलन्हि। ई सभ सोचिते ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> जोर-जोरसँ कानय लगलाह। संगी सभ हड़बड़ा कय उठैत जाइत गेलाह। जखन सभ समाचार ज्ञात होइ गेलन्हि त</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> किछु गोटे कहलखिन्ह, जे भातिजक अउरदा बढ़ि गेल। नन्दक मुँह लटकल देखि कय, क्यो-क्यो हुनक अभियंताक वैज्ञानिक दृष्टिकोणकेँ मोन पाड़य कहलकन्हि। मुदा नन्दकेँ बोल-भरोस क्यो नहो दय सकलाह। नन्द ट्रेनिंग छोड़ि कय सपनेक गप पर गाम विदा ब</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> गेलाह। तेसर दिन गाम पहुँचलाह, तँ भैयाकेँ केस कटेने देखि कय सशंकित भय गेलाह। गामक सीमांतेसँ जे क्यो भेटन्हि से कनेक दु:खी स्वरमे गप करन्हि।आँगन पहुँचलाह तँ माय जोर-जोरसँ कानय लगलीह।सपनाक सभ्टा गप सत्य बुझेलन्हि, अक्षरसः सत्य। भातिज हुनका केश कटाबय हेतु सही समय पर बजा लेलखिन्ह। नवीनक फोटोक पाँछामे अंग्रेजीमे ओकर जन्मक आ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> मृत्युक तिथिक संग ओकर तोतरायल बोलीमे काका-कका कहबाक बात फाउंटेन पेनक सियाहीसँ नन्द लिखलन्हि। कोठा घरकेँ बनयबाक पहिनहि ओ</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> चल गेलाह, गेलाक बादो मुदा स्वप्नमे काकाकेँ नहकेशक दिन मुदा बजा कय।</span></p>
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<p class="MsoNormal"><span lang="HI"><span>      </span>पुत्रीक जन्मक बाद कोठाक घरो बननाय शुरु भय गेलन्हि। पुत्री जखन पैघ भेलन्हि, तँ यादि करबाक क्रममे कहैत छलीह, जे कुर्सी पड़बाक लेल जे खधाइ खुनल गेल छल से बड्ड गँहीर छल।मुदा पिता यादि पाड़लखिन्ह जे काका अहाँकेँ हाथसँ पकड़ि कय खधाइमे पात सभ साफ करबाक लेल नीचाँ दैत छलाह, तखन खधाइ बहुत गँहीर कोना भेल। पुत्री बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> केर कोरामे एकर समाधानक हेतु पहुँचि जाइत छलीह, जे खधाइतँ बहुत गँहीर बुझाइत छल , तखन ईहो बात सही जे काका हाथेसँ खधाइमे उतारि दैत छलाह। नन्दक माय बच्चा सभक बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> भय गेलीह।नन्दक पुत्रकेँ बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> नन्दक नन्द कहैत छलीह। कखनो गोपाल तँ कखनो राजकुमार, ओकर हँसी, औँठिया कारी घनगर केश। बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">क कोठाक घर बनि गेलन्हि तँ पेटक दर्द सेहो शुरु भेलन्हि। मुदा नन्द एहि बेर अपन घरक पेटक दर्दक दू टा मृत्युकेँ अदृश्यक निर्देशपर होइत देखलाक उत्तर मायकेँ इलाजक हेतु कैक ठाम एलोपैथिक डाक्टरक ल</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">ग पैघ-पैघ शहरमे लय गेलाह। डायगनोस भेलन्हि कैंसर नामक दु:खदायी रोग। एहि बीमारीक इलाज रोगोसँ बेशी दुःखदायी छल। रेडियमसँ ट्यूमरकेँ जरेनाइ। बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> टूटि गेलीह। पटनेमे मृत्यु भय गेलन्हि। ओतहि दाह संस्कार गंगा-तट पर भेलन्हि, कारण ओतय मान्यता छल जे गंगा तट पर गायक बोली जतेक धरि सुनाइ पड़ैत अछि, ततेक दूर मगहक क्षेत्र नहि मानल जायत। तदंतर श्राद्ध कर्म गाममे भेलन्हि। बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> चलि गेलीह नन्दक द्वितीय पुत्रक जन्मक पहिनहि। मुदा बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI">क चर्चाघरमे होइते रहल। बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> केर फोटो बा</span><span lang="EN-GB">’</span><span lang="HI"> केर नाति सभक प्रेरणा श्रोत बनल रहल। जे सपेताक गाछ बा केर श्राधमे उसरगल गेल छल, तकर आम हुनकर नाति-नातिन नहि खाइत छलन्हि।जे आम खसैत छल से बाबाक सारा पर राखि देल जाइत छल।गो