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	<title>ऊलजलूल &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/ऊलजलूल/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "ऊलजलूल"</description>
	<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 06:38:10 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[पंगेबाज वापस !! ...एक अन्दर की बात ...!!]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/07/07/pangebaj_wapas/</link>
<pubDate>Sun, 08 Jul 2007 04:30:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/07/07/pangebaj_wapas/</guid>
<description><![CDATA[
ये तो आपको मालूम ही है कि हिन्दी ब्लॉग ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>ये तो आपको मालूम ही है कि हिन्दी ब्लॉग की दुनिया के एकमात्र <a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/07/blog-post_06.html" target="_blank">पंगेबाज ने 6 जुलाई</a> को संन्यास लेने की घोषणा की थी.ये एक बड़ी घटना थी कम से कम उन लोगों के लिये जो पंगेबाज के पंगों से परिचित थे.हर एक ब्लॉगर से पंगे लेने वाला बन्दा&#160; ऎसा कैसे कर सकता है.हमने तुरंत काकेश ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेसन (KBI) के कुछ जाबांज सिपाहियों को काम पर लगा दिया कि वो पता कर के आयें कि आखिर बात क्या है.उन्होने जो रपट भेजी उसी के आधार पर <strong>प्रस्तुत है ये विशेष रिपोर्ट&#160;एक्सक्लूसिबली इसी ब्लॉग पर.&#160;</strong>आइए उस पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें...लेकिन पंगेबाज वापस लौटे या नहीं ये हम आपको बतायेंगे एक छोटे से नॉन कॉमर्शियल ब्रेक के बाद. अभी आप&#160;पूरी घटना पर एक नजर डालें.</p>
<p>जब पंगेबाज ने अपना पोस्ट लिखा तब वो बहुत बैचैन थे ..अब वह भले ही कहते हों कि उन्होने केवल नारद से जाने का फैसला लिया है लेकिन उनकी <a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/07/blog-post_06.html" target="_blank">पोस्ट देखिये</a> क्या कहती है...</p>
<blockquote><p>ब्लोग की दुनिया के दोस्तो को पंगेबाज का नमस्कार<br>दोस्तो,ब्लोग बनाते समय मजाक मजाक मे ले लिया गया नाम एक पहचान बन जायेगा,एक मजाक से शुरु हुई पंगेबाज की ये यात्रा इतना खुबसूरत मोड लेकर यहा पहुचेगी कभी सोचा ना था,पर हुआ .आप सब लोगो का असीम प्यार का हकदार बना मै.आज दिनांक ६ जुलाई को मै पंगेबाज आप सब को अलविदा कहते हुये आप सब से विदा ले रहा हू.<br>आप सब से मिले प्यार दुलार का बहुत बहुत धन्यवाद,शुक्रिया,<br>आपका <br>पंगेबाज</p>
</blockquote>
<p>यानि वो ब्लौग की दुनिया से जाने का मन बना चुके थे ..उस समय उन्होने अपनी नारद वाली चिट्ठी भी नहीं चिपकायी थी... हमारी आदत है कि हम सुबह सुबह बिना किसी ऎग्रीग्रेटर की मदद लिये कुछ चुनिंदा ब्लौग जरूर खोल के देखते है .. उनका ब्लॉग देखा तो वो एक संन्यासी की तरह सब कुछ छोड़ छाड़ कर जाने की घोषणा कर चुके थे...तुरंत लगा कि या तो वो नाटक कर रहें हैं या फिर रात की अभी तक उतरी नहीं ..इसिलिये हम तो टिपिया भी दिये.. लेकिन उधर से कोई जबाब आता नहीं दिखायी दिया... तो तुरंत फोन लगाया गया कि आखिर बात क्या है...??</p>
<p>उनकी&#160;आवाज सुनके ही लगा कि चोट कहीं गहरी लगी है.. वही निर्विकार भाव और वही बच्चों जैसी बातें....कि नहीं रहना मुझे यहां .. क्या होगा ये सब ब्लॉग लिख कर ... फालतू की बातें करते हैं सब... एक दूसरे को गाली देने के अलावा कुछ काम ही नहीं रह गया है .....क्या समझता है वो @#$ अपने आपको ...</p>
<p>हम ध्यान पूर्वक उनको सुनते रहे ...ये तो साफ हो गया कि रात कि चढ़ी हुई तो नहीं ही है.... कुछ और बात है ...वो बदस्तूर जारी थे..</p>
<p>मैं अपने काम में मन लगाउंगा ..ये करुंगा वो करुंगा ...सारी की सारी पोस्टे डिलीट कर दुंगा...</p>
<p>हमने उन्हें समझाया ...जैसे शराबी फिल्म में अमिताभ बच्चन को उनके छोटे भाई समझाते हैं... कि भैया पोस्ट डिलीट करके क्या होगा..उलटा आपकी पोस्ट को कोई&#160;कॉपी कर लेगा (कुछ लोग इसमें बहुत माहिर हैं) ..फिर अपने&#160;ब्लॉग पर छापकर अपनी हिटास बुझायेगा.... अब तो लोगों की चिट्ठा जगत के सक्रियता क्रम पर भी नजर है भाई ...</p>
<p>तो उस समय तो मान गये कि नहीं वो पोस्ट डिलीट नहीं करेंगे ...हम अपनी सफलता पर वैसे ही &#160;खुश नजर आये जैसे माननीय प्रतिभा पाटिल को देख के शिव सेना वाले खुश होते हैं.... लेकिन मन तो खिन्न था ही कि आखिर क्या हो रहा है हिन्दी चिट्ठा जगत को....<a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/07/05/kuchh_aese_hee/" target="_blank">तुरंत एक पोस्ट चढ़ायी</a> जिसको शुरु तो किया था अपनी यात्रा के बारे में बताने के लिये&#160;पर उसके बीच में ही हमने भी इन सब झमेलों से दूर रहने की घोषणा कर दी.... &#160;</p>
<p>पंगेबाज से दिन में&#160;फिर वार्तालाप का दूसरा राउंड हुआ ..हमने उनसे कहा कि आप भले ही पंगेबाज नाम से ना लिखें या फिर ब्लॉग ही ना लिखें पर लिखना बन्द मत करें ...माशाअल्लाह अच्छा लिखते हैं...!! अब अपनी तारीफ सुनकर नाग भी काटना छोड़कर नाचना शुरु कर देता है ..वो भी पिघल ही गये ... :-) बोले नहीं नहीं लिखना बन्द नहीं करेंगे ....क्यों करेंगे इन @#$@ के लिये ..??? हम लिखेंगे और&#160;तुमको दे देंगे...तुम अपने ब्लॉग पर छाप देना....</p>
<p>हमने मन ही मन सोचा कि इतना अच्छा भी नहीं लिखते कि हम अपने ब्लॉग पर छाप दें.. :-) पर इनसे कहा ....नहीं नहीं इसकी क्या जरूरत है ..हम आपके लिये एक नया ब्लॉग बना देंगे .. और <a href="http://pangebaj.wordpress.com/" target="_blank">ये ब्लॉग</a> बना भी दिया...</p>
<p>कल अपनी पोस्ट चढ़ायी&#160;&#160;और फिर इन्हें फोन लगाया और जनाब इनको पूरे 35 मिनट झेला..अब तक सारा सीन बदल चुका था ..वे घोषणा कर चुके थे ....</p>
<blockquote><p>तो भाइ जी हम,हम है कह दिया तो कह दिया,हम पंगेबाज पर ही है और चिट्ठा जगत,ब्लोगवाणी तथा हिंदी ब्लोग पर भी होगे पर नारद पर नही परसो सुबह शायद ..अगर आप मिलना चाहे तो आ जाईयेगा</p>
</blockquote>
<p>और फिर हमारी <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/07/07/dhud-dhud-bum-bum/" target="_blank">11 सड़ी हुई कविताओं के बदले</a> उन्होने पूरी की पूरी 12 अच्छी कविताऎं भी टिप्पणी में डाल दी...लीजिये वो भी देखिये....</p>
<blockquote><p>धड़-धड़-धड़-धड़,<br>बम बम बम बम,<br>काहे लडें हम,<br>मौका देखा,<br>रणछोड़ चले हम.</p>
<p>आबाद करेंगे हम जहा नया,<br>ये यहा बरबाद करेंगे.<br>निपटा लेगे जब ये सब को<br>सब भस्मासुर को<br>याद करेंगे,</p>
<p>हर दम लेना तू,<br>ऐसे ही पंगा हमसे,<br>जवाब मिलेगे<br>पूरे दम से.</p>
<p>भाड़ में जाये,<br>तेरी दुनिया<br>तेरी उलझन<br>तेरी पलटन,<br>हम तो हैं,<br>भइ मन के राजा<br>जहा बैठ गये<br>वही पे मधुबन.</p>
<p>हम तो चले यहा से बच्चे<br>अब तू है और तेरे चच्चे<br>गली गली में नाला बहता,<br>बदबू से चाहे सर फटता,<br>पर कीड़ों की मौज हुई है,<br>गूंगा कहता,बहरा सुनता.</p>
<p>आओ राजा, आओ रानी,<br>सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,<br>एक गली में कुत्ता बोला,<br>मेरी ब्लोगिंग बडी पुरानी.</p>
<p>धाक धिनक धिन,<br>ताक तिनक तिन,<br>इस्को भोकू,उस्को काटू<br>प्लानिंग मे<br>कट जाये दिन.</p>
<p>अब तो कर ले,<br>अपने मन की.<br>जल्द ही होगा सारा चौपट,<br>तू तो है ही घोषित सनकी.</p>
<p>लगा रहेगा<br>जाना जाना,<br>ऐसे ही बस कसते रहना<br>हाथ मे लेकर के तू पाना</p>
<p>आग लगाई<br>भागो ज्ञानी<br>नारद की बस<br>यही कहानी</p>
<p>इस जंग से तू,<br>क्या पायेगा,<br>खाली टप्पर<br>रह जायेगा,</p>
<p>बिन सोचे तू<br>लेता पंगे<br>फ़िसल पडे<br>तो हर हर गंगे</p>
<p>पंगेबाज</p>
</blockquote>
<p>यानि वो वापस आने का मन बना चुके थे ...और अभी अभी सूत्रों से पता चला है कि वो फिर आ रहे हैं ...<a href="http://pangebaaj.wordpress.com/2007/07/08/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b8/" target="_blank">नहीं जी आ गये हैं......</a> </font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ ऊलजलूल...]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/07/05/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%8a%e0%a4%b2%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a5%82%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Fri, 06 Jul 2007 02:47:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
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<description><![CDATA[
पिछ्ले कुछ दिनों से दिल्ली से बाहर था..]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>पिछ्ले कुछ दिनों से दिल्ली से बाहर था..इस शोर शराबे,भीड़ भड़ाके से दूर.. शांत पहाड़ की वादियों में. एक वरिष्ठ चिट्ठाकार ने भी वादा किया था कि वे जुलाई के प्रथम सप्ताह में मेरे साथ पहाड़ आयेंगे उसी हिसाब से सारा कार्यक्रम बनाया था पर फिर वो नहीं आये..फिर मैं ही अपने परिवार को लेके चल पड़ा ..कुछ&#160; दिन हल्द्वानी रहा फिर मेरे अपने शहर अल्मोड़ा में भी जाना हुआ. वही अल्मोड़ा जो मेरे बचपन का साक्षी रहा है.वही अल्मोड़ा जिसने मुझे जीवन की आपाधापी से जूझना सिखाया..वहीं जहां मैने सुनहले भविष्य के सपने देखे..जिसकी पटाल वाली बाजार में दोस्तों के साथ घूमा ..जहां गोलू देवता,भोलेनाथ और नंदादेवी को वहां की मान्यताओं के हिसाब से पूजा. .. अभी कई सालों बाद वहां गया तो पाया कि कितना बदल गया है मेरा अल्मोड़ा... पटाल वाली बाजार के सारे पत्थर बदल दिये गये हैं&#160; कोई नये पत्थर लगाये गये हैं. ..जो पहले जैसी शोभा नहीं देते.. नये नये मकान बन गये हैं कई नये होटल खुल गये हैं... और भी बहुत कुछ बदल गया है इस शहर में...</p>
<p>इधर हिन्दी चिट्ठाजगत में भी बहुत कुछ घट गया है&#160;...घट रहा है...अभी पंगेबाज ने अलविदा कहा.. पहले धुरविरोधी अलविदा कह चुके हैं... मेरा मन भी पिछ्ले कुछ विवादों से बोझिल सा हो गया है... कुछ लोग होते हैं इस चिट्ठाकारी में... जो केवल खुद ही लिखते हैं बिना इस बात की परवाह किये हुए कि उनके आसपास क्या हो रहा है ..कौन क्या कर रहा है.. मैने हमेशा से&#160;ही अपने आसपास के विषयों को छुआ ..इसी कारण मेरी दूसरी ही पोस्ट विवादों में घिर गयी... मुझे&#160;खुद के लेखन से ज्यादा दूसरों का लेखन प्रभावित करता रहा है..इसलिये उन्ही सब से प्रेरणा&#160;ले के लिखता रहा हूँ.. जब&#160;से ये "नारद विवाद" हुआ तब से लिखने की इच्छा खतम सी हो गयी .. ना मालूम&#160; किस बात&#160;का कोई गलत मतलब निकाल ले....</p>
<p>लेकिन ना तो मैं अलविदा कह रहा हूँ ना ही चिट्ठा बन्द करने की धमकी दे रहा हूँ.. :-) बस अभी कुछ दिनों से जो कर रहा हूँ वही करुंगा ..यनि सिर्फ चिट्ठों को पढ़ुंगा और टिपियाउंगा...</p>
<p>इधर <a href="http://blogvani.com/" target="_blank">ब्लॉगवाणी भी अवतरित हुई है</a>... पहला प्रारूप काफी अच्छा लगता है ...हांलांकि वो कह रहे हैं कि अभी परीक्षण चल रहा है ..पर परीक्षण भी काफी अच्छा है... आगे देखिये और क्या क्या होता है....</p>
<p>कहीं कुछ दरक गया लगता है,<br>कोई थक के लुढ़क गया लगता है.<br>साहिलों के करीब ही था मेरा माझी,<br>लेकिन तूफान फिर लिपट गया लगता है.
<p>बदलते रास्ते हैं, फिर भी जिन्दा हैं,<br>टूटे अहसास हैं , फिर भी जिन्दा हैं,<br>आप समझो इसे या ना समझो.<br>हम तो आज तलक शर्मिन्दा हैं.
<p>राह से तेरी नहीं गुजरना अब,<br>वक्त मेरा बदलने वाला है.<br>रात काली जरूर थी मेरे हमदम,<br>अब तो सूरज निकलने वाला है...
<p>काकेश</p>
<p></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अरे वाह हम भी लिंक्ड हुई गवा...]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/05/30/three-stages-of-love/</link>
<pubDate>Thu, 31 May 2007 02:37:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/05/30/three-stages-of-love/</guid>
<description><![CDATA[
कल प्रमोद दद्दा पूछे कि &#8220;आप लिंक्ड ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>कल प्रमोद दद्दा पूछे कि <a href="http://azdak.blogspot.com/2007/05/blog-post_1756.html">"आप लिंक्ड है कि नहीं"</a> हम सोचे ई का हो गया ....दद्दा सकाले सकाले का पूछ रहे हैं ...वो भी सार्वजनिक रूप से . अब हम कैसे बतायें कि हम लिंक्ड है कि नहीं..वो भी सबके सामने.....घर में एक अदद बीबी भी है ना.... फिर जब पोस्ट में पढ़े तो उ तो एक नयी ही बात बताये कि लिंक करने से क्या क्या होता है... तो हम भी सार्वजनिक रूप से लोक लाज की फिकर किये बिना कह दिये ... <em>"<strong>अरे इ बड़े काम का बात बताये हैं... हम को तो इस लिकिंत कलंकित के बारे में पता ही नहीं था..वरना पहले ही तकादा करने आये होते ..कि हमरा लिंक काहे नहीं दिये ..चलिये तब ना सही अब कर देते हैं..लगा दीजिये ना जी एक ठो हमार भी लिंक ...कर दीजिये ना हमको भी लिंकित ..हमको बहूत अच्छा लगेगा जी ...वैसे मालुम है कि आप लिंकित तो ना ही करेंगे पर तकादा करने में क्या हरज ...वैसे भी हम लेडी नहीं लेडा हूँ..."</em></strong> हम सोचे कि कहां हम भरभण्‍ड के चक्‍कर में पड़ रहा हूं ..लिंकित तो ना ही होंगे ...लेकिन सांझ को देखा तो हम भी लिंकित थे... तब रात को खूब सूतल.... और सपने देखने लगे और बड़बड़ाने लगे...</p>
<p><strong>"लिंक न होने से लिंकन की स्थिति बेहतर है"</strong>.हमरा सौभाग्य है कि हम "अ","अ","अ" के एक "अ" से तो लिंक हो ही गये.. आपको शायद मालूम हो हिन्दी चिट्ठाजगत के अमर,अकबर और अन्थोनी (एंथोनी इंगलिश में होता है) के बारे में ...क्या कहा नहीं मालूम !!..ये लो जी ..इतना भी नहीं मालूम. ये तीन है "अ" हैं <a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/">अभय</a> ,<a href="http://azdak.blogspot.com/">अजदक</a> और <a href="http://anamdasblog.blogspot.com/">अनामदास</a>.अक्सर साथ साथ ही पाये जाते हैं....हाँलांकि वो कहते हैं <a href="http://anamdasblog.blogspot.com/2007/05/blog-post_30.html">"लेखक हमेशा अकेला होता है, संघी नहीं"</a> ..लेकिन जो दिखता है हम तो वही बोले... वैसे इनके साथ छोटी लाईन से सफर करने वाले एक "अ" और हैं...कोई <strong>सिदो <del datetime="2007-05-31T02:16:08+00:00">हैमबर्गर</del> हैम्ब्रम टाईप </strong>.. लेकिन वो अभी ट्रेनिंग ले रहे हैं...किसी छोटे शहर से आये हैं ..इसलिये नींद में बड़बड़ाकर उपन्यास लिखने की प्रैक्टिस कर रहे हैं... इस बात से इनकी पत्नी बहुत परेशान हैं... आप पूछेंगे वो कैसे ..वो होता क्या है ..ये नींद में बड़बड़ाते हैं और उनकी पत्नी हाथ में कॉपी,पैन लेकर बैठी रहती हैं कि जैसे ही ये बोलें वो नोट कर लें.... इनको किसी ने बता दिया कि <strong>ब्लॉग एक डॉट कॉम होता है</strong>...तब से हर नंगे और भूखे को खोज रहे हैं कि भला ये कौन सी नयी कौम आ गयी..जिस दिन इनको वो कौम मिल जायेगी उस दिन ये भी छोटी लाईन से बड़ी लाईन में आकर लाईन मारने लगेंगे...<br />
<a href='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/linkit_hum.jpg' title='pyar kee pahalee awasthaa'><img src='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/linkit_hum.jpg' alt='pyar kee pahalee awasthaa' align="left" hspace="5" vspace="5/"></a><br />
अब हम अपने लिंकन के बारे में बता रहे थे.. हमारे <strong>लिंकन की तीन अवस्था हैं जो हर लिंक्ड के जीवन में आती ही हैं .. जब कोई नया नया लिंक्ड होके प्यार की पहली अवस्था को प्राप्त होता है तो वो स्थिति सबसे सुखद और बेहतर होती है.... </strong>आपको अपने लिंकित के प्रति अगाध श्रद्धा होती है...  उसकी काँव काँव भी कोयल की कूक लगती है... आप उसके कांटो को भी पुराण की भाँति बांचते हैं.. दुनिया में उसके सिवा कोई नहीं होता ..सिर्फ आप और आपका लिंकित ... आपको "लिंकित" होकर "कलंकित" होने का कोई डर नहीं होता .. आप हवा में उड़ने लगते हैं ..आपके पास सारी दुनिया से लड़ने की ताकत आ जाती है...आप और आपका लिंकित अक्सर ये सोचते हैं ..कि काश ऎसे ही जिन्दगी की शाम हो जाये... कल रात तक हमारी भी ऎसी ही स्थिति थी ..जब हम लिंकन की पहली अवस्था में थे ...चित्र एक देखें ... सिर्फ हम और हमारा लिंकित ...</p>
<p><a href='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/linkit_hum1.jpg' title='Pyar kee doosaree awasthaa'><img src='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/linkit_hum1.jpg' alt='Pyar kee doosaree awasthaa' align="right" hspace="5" vspace="5/"></a> </p>
<p>फिर जब आप हवा से जमीन की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं ...तो आपको जिन्दगी की कुछ कुछ हकीकत मालूम होती जाती है....समझ में आता है कि "और भी लिंक हैं जमाने में इसके सिवा" .. तो फिर "पुराण" "कांटे" में परिवर्तित हो जाता है ..पूछ्ने पर पता चलता है अब इन्हें "ज्ञानदत का ज्ञान" प्राप्त हो रहा है ..बुरा हो इस "ज्ञान" का जो हमारे बीच में आ गया . चित्र 2 देखें ... इसी "ज्ञान" के कारण सारा झमेला हो गया.. लेकिन फिर भी मन में संतोष की चलो कोई बात नहीं चला लेंगे .थोड़ा बहुत टाइम तो मिलेगा ही ना लिंकित का....चला लेंगे जी वैसे भी ज्ञान प्राप्त होना अच्छी बात है... <strong>लोग तो अपनी बीबी बच्चे कि छोड़ कर ज्ञान की तलाश करने भाग जाते हैं </strong>..इन्हें तो घर बैठे ही ज्ञान प्राप्त हो गया....  </p>
<p><a href='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/linkit_hum2.jpg' title='Pyar kee teesari awasthaa'><img src='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/linkit_hum2.jpg' alt='Pyar kee teesari awasthaa' align="left" hspace="5" vspace="5/"></a></p>
<p>ये दुनिया का नियम है कि यहां <strong>परिवर्तन के अलावा कुछ भी स्थायी नहीं ..परिवर्तन ही पृकृति का नियम है</strong>... यही प्यार की तीसरी अवस्था होती है... जब आप पूरी तरह जमीन में आ चुके होते हो तब आपको पता लगता है असली जिन्दगी का स्वाद ..आप नून तेल लकड़ी के चक्कर में पड़ जाते हैं ..आप का लिंकित दुनिया के झमेलों के बीच कहीं छूट सा जाता है... चित्र 3 देखें...यही है असल जिन्दगी जहां आप जीवन की धमाचौकड़ी में केवल एक लिंकन से काम नहीं चला सकते...  आपको कई जगह लिंक बनाने होते है.. "बिना लिंक सब सून" वाली अवस्था है.... जितने ज्यादा लिंक उतना ज्यादा नाम और दाम ... अब ये बात हमारे भी समझ में आ गयी इसलिये हमें कोई ऎतराज नहीं ..हम तो खुश हैं कि हम लिंकित हैं...... </p>
<p>** एक चीज और देखियेगा ...पहले अंतरंग तीन थे अब सिर्फ दो ..ये क्या माजरा है...ये तो भाई अजदक ही जानें...<br />
</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चने की झाड़ पर ..घोड़े ..और चिट्ठाकार !]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/05/29/chane-ki-jhad-par/</link>
<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:32:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/05/29/chane-ki-jhad-par/</guid>
<description><![CDATA[
आज बात करते हैं हिन्दी के कुछ चिट्ठाक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/kartoon.jpg' title='kartoon.jpg'><img src='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/05/kartoon.jpg' alt='kartoon.jpg' align="left" vspace="5" hspace="5" /></a><font size="3"><br />
आज बात करते हैं हिन्दी के कुछ चिट्ठाकारों के साथ हुए मेरे अनुभवों की ..
<p>कल लंच के समय बाहर निकला ही थी कि हिन्दी के एक चिट्ठाकार मिल गये.टीका-वीका लगाये थे और इतनी गर्मी में भी फ्रैश फ्रैश लग रहे थे ... रिलांयस फ्रैश की तरह....लगता था जैसे अभी अभी हिल स्टेशन घूम के आये हों. कोई व्यक्ति जब परिवार के साथ किसी धाम की यात्रा करके आता है ...विशेषकर बद्रीनाथ,केदारनाथ की ...तो कुछ दिनों बड़ा ही आध्यात्मिक सा बना घूमता रहता है ...वैसे ही वह भी घूम रहे थे.हमें देख वैसे तो गाली देने का मन कर रहा होगा (प्रोफेशनल राइवैलरी जनाब!! ) लेकिन अच्छी अच्छी बातें करने लगे.अरे आप तो कभी मिलते ही नहीं... मिलिये ना कभी कहीं....हमने कहा ....अरे अभी नहीं कुछ दिनों रुक जाइये... थोड़ा नाम वाम हो जाने दीजिये ... फिर आयेंगे ताकि ज्यादा नहीं तो कुछ गोपियां तो हमारा भी इंतजार करते मिलें... </p>
<p>अरे नहीं जी आपका नाम तो हो ही गया ....कल ही हम तीन चार हिन्दी चिट्ठाकार मिले थे तो आपकी ही चर्चा कर रहे थे.</p>
<p>हाँ चर्चा  तो कर ही रहे होंगे.... <strong>पीठ पीछे गाली देने का अवसर कौन जाने देना चाहेगा.... </strong></p>
<p>अरे नहीं जी वहां तो ये चर्चा हो रही थी कि आप कितना अच्छा लिखते हैं. </p>
<p>हम समझ गये कि ये पक्का बद्रीनाथ,केदारनाथ का असर है वरना हम यदि चर्चा में ही होते तो क्या टाइम्स मैगजीन में जगह ना पाते.अरे चिट्ठाजगत की टाइम्स मैगजीन <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=280">फुरसतिया टाइम्स</a>. लेकिन वो चढ़ाते रहे और हम चढ़ते रहे <strong>चने  के झाड़ पर</strong>.   </p>
<p>उनसे तो किसी तरह पीछा छुड़ाया लेकिन फिर हम सोचने लगे "चने के झाड़ पर चढ़ने-चढ़ाने" के बारे में.इसकी चर्चा बाद में ....पहले आपको एक और घटना के बारे में बता दें. </p>
<p>पिछ्ले दिनो जब <a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/05/blog-post_6039.html">गधों</a> और <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2007/05/blog-post_22.html">घोड़ों </a>का बोलबाला था तब एक दिन कुछ घोड़े मिल गये.<strong>घोड़े वैसे ही गधों से दोस्ती करना पसंद नहीं करते</strong>.. इसीलिये शायद वो हम से नहीं बोले लेकिन आपस में कुछ गहन वार्तालाप सा करते प्रतीत हुए . हम ध्यान लगाकर उनका वार्तालाप सुनने की कोशिश करने लगे. </p>
<p>अरे हमें सरकार से इस बाबत बात करनी चाहिये...</p>
<p>हाँ हाँ ..क्यों नहीं ये तो हमारी इंटेल्क्चुअल प्रोपर्टी है...</p>
<p>हमारे दिमाग में बात समझ में नहीं आयी..<strong>दो विद्वानों की बातचीत के बीच में घुसने वाले मूर्ख को वैसे भी कोई बात समझ नहीं आती</strong>.. तो हमने पूछ ही लिया  कि क्या बात है...</p>
<p>पहले तो एक युवा घोड़े ने हमें अपनी आक्रामक नजरों से घूरा ...जैसे कोई तथाकथित धर्मरक्षक किसी नग्न पेंटिंग बनाने वाले चन्द्रमोहन को घूर रहा हो...  फिर जब उसने परख लिया कि इस बंदे में भी मनमोहन सिंह की तरह कोई दम नहीं है तो वो बोला...अरे हमें एम एफ हुसैन और बहुत सी कंपनियों के खिलाफ आन्दोलन छेड़ना है ...क्यों भाई .. अरे हुसैन साहब हम घोड़ों पर पेंटिग बनाते हैं और हमें रॉंयल्टी भी नहीं देते .. कनाडा वाले हमारे ऊपर पूरी की <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2007/05/blog-post_22.html">पूरी पोस्ट</a> लिखते हैं ..खूब टिप्पणी भी पाते हैं पर हमें कुछ नहीं देते.. <strong>खुद कॉकटेल पी-पीकर मुटा रहे हैं</strong> ... हिन्दुस्तान में जितनी भी शक्तिवर्धक दवायें बनती हैं उन में भी हमारी फोटो होती है .. लेकिन कोई हमें रॉयल्टी नहीं देता बल्कि हमें जेल डाला जा रहा है.. और तो और सारी मशीनों की रेटिंग भी घोड़ा-पावर यानि हौर्श-पावर में होती है.... उसके लिये भी हमें कुछ नहीं मिलता ...  उनकी बात में दम तो था....इसलिये हम चुप हो गये ... लेकिन उन्होने अपना डिसकसन जारी रखा ...  </p>
<p>अरे यार आजकल तो मनुष्य अपनी बातों में भी गधो के साथ साथ हमें शामिल कर रहा है.... </p>
<p>क्या बोलते हो बॉस!!  एक छुटभैये "तोड़ देंगे फोड़ देंगे" नेता-टाइप घोड़े ने कहा.</p>
<p>हाँ !! कल दो तीन मनुष्य बात कर रहे थे ...<strong>कंप्यूटर इन्ड्स्ट्री में देखो ना सारे गधे-घोड़े घुसे जा रहे हैं. आधे से ज्यादा तो इसमें गधे हैं और जो घोड़े भी थे उनसे भी गधों की तरह काम लिया जा रहा है...</strong></p>
<p>तो क्या हम गधों के साथ मिलकर कोई मोर्चा खोलें... आजकल वैसे भी कई गधे विभिन्न मुद्दों पर कई शहरों में अपना मोर्चा खोल रहे हैं....</p>
<p>अरे वो <strong>" मोर्चा अगेंस्ट खर्चा "</strong>वाले भी गधे ही हैं क्या ... एक युवा उत्साही घोड़े ने पूछा...</p>
<p>चुप रहो यार <strong>सीरियस बात में भी बिना कुछ समझे बूझे कूद पड़ते हो यार ..हिन्दी चिट्ठाकार की तरह</strong>....</p>
<p>अब बहुत ज्यादा गालियां हम से सहन नहीं हुई ....वो लोग अपनी बात कर रहे थे पर हम वहां से सरक लिये .....</p>
<p>अब बतायें आपको चने के झाड़ वाली बात. चने के झाड़ की बात भी घोड़ों से ही सबंधित है. "चने के झाड़ पर चढ़ाना" एक मुहावरा है जो तब प्रयोग में लाया जात जब किसी भी व्यक्ति को ये झूठा अहसास दिलाना होता है कि वो श्रेष्ठ है. इसलिये उसे चने के झाड़ पर चढ़ाया जाता है कि बेटा तू अभी कुछ भी नहीं कर सकता चल पहले इस झाड़ पर चढ़ कुछ चने खा..थोड़ी ताकत वाकत बना घोड़े जैसी फिर तू कुछ कर पायेगा.अभी तो तू फिसड्डी है , बेकार है तुझे चने की सख्त जरूरत है.. इसीलिये हमारे वो चिट्ठाकार हमें कल चने की झाड़ पर चढ़ा रहे थे.</p>
<p>तो आपको बात समझ में आ ही गयी होगी ..</p>
<p>कल <a href="http://puranikalok.blogspot.com/2007/05/blog-post_27.html">महिला सशक्तीकरण के विषय </a>में हमारा बहुत ज्ञान बढ़ा जब कहा गया <strong>" महिला सशक्तीकरण के चक्कर में पड़ने वाले बहुत जल्दी किसी भी किस्म की शक्ति से वंचित हो जाते हैं।"</strong> शायद इसीलिये बेचारे मनमोहन सोनिया जी के सशक्तीकरण के चक्कर में शक्ति से वंचित हो गये ...</p>
<p>एक और चिट्ठाकर टिप्पणीओफोबिया से ग्रस्त हैं और कह रहे हैं "<a href="http://vikashkablog.blogspot.com/2007/05/blog-post_28.html">कोई बचाओ मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से</a>"  हम तो उनको ये ज्ञान दे आये </p>
<p><strong>आओ आओ ना घबराओ..<br />
हाथ खोल के हाथ दिखाओ<br />
टिपियासा के मारे हम भी<br />
थोड़ा आके तुम टिपियाओ</strong></p>
<p>देखना है कि वो आज आते हैं कि </p>
<p>बस एक बात और .... कल शाम एक चिट्ठाकार ने <a href="http://www.tarakash.com/content/view/279/255/">कुछ अच्छे अच्छे गाने </a>सुनवाये ...गाने बहुत अच्छे थे ..मैलोडियस ..हमने भी तारीफ कर दी ..कि हां जी अच्छा लगा गाने सुनकर ..पर ये क्या वो जेब से एक छोटी सी डायरी निकाल लिये ..बोले यहां लिख कर दीजिये ..हमने कहा क्यों?  बोले ...अरे सबको दिखायेंगे ना कि आपको अच्छा लगा..वो भी टिपियासा से ग्रस्त एक चिट्ठाकार थे....</p>
<p></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गधा मिलन को जाना.....]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/05/16/gadha-milan-ko-jana/</link>
<pubDate>Wed, 16 May 2007 16:39:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/05/16/gadha-milan-ko-jana/</guid>
<description><![CDATA[
अरूण भाई ने कल जब अपनी करुण कहानी सुना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>अरूण भाई ने कल जब <a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/05/blog-post_15.html">अपनी करुण कहानी</a> सुनायी तो हमने सोचा कि अरूण भाई से दोस्ती निभा ही लें (वैसे दोस्ती नहीं निभानी थी..हमें तो डर था कि कहीं हमसे ही पंगा ना ले लें) और उसी भावावेश में लिख दिया. </p>
<p><em>अरे अपने बिरादरी के लोगों से कैसा घबराना,<br />
जरूरत पड़े तो हमें भी ले जाना ,<br />
बहुत दिनों से भाई लोगों से बाते नहीं हुई,<br />
चलो फिर मिल गया मिलने का बहाना. </em></p>
<p>हमने तो सच्ची मुच्ची इसलिये लिखा था कि पंगेबाज वैसे ही सबसे पंगा लेते रहते हैं कहीं फिर रास्ते में किसी मोहल्ले में.......खैर जाने दीजिये.....इसीलिये सोचा कि अपने सुरक्षा दस्ते के साथ हम भी चले चलेंगे इसी बहाने भाई लोगों से भी मुलाकात हो जायेगी. (जब से हमें कनाडा वाले <strong>नामी-गिरामी-ईनामी गदहा लेखक</strong> का पता चला तब से हम डर के मारे सारे गदर्भों को भाई कहने लगे हैं).</p>
<p>हमने अपना सुरक्षा दस्ता एडवांस में पंगेबाज जी के घर भेज दिया और खुद चुपचाप सजने संवरने में लग गये.....भला हो इस कनाडा वाली उड़नतस्तरी का ..न जाने उसको सारी बातें कैसे पता लग जाती हैं !!....अरे पता क्यों ना चले ....खुद <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2007/05/blog-post_16.html">चिट्ठा चर्चा का जिम्मा </a>किसी और को पकड़ाकर इधर उधर घूम घूम कर टिपियाते रहते हैं. </p>
<p>उनके इस तरह टिपियाने की कला को देख कर किसी ने ठीक ही कहा है....</p>
<p>जहां ना पहुंचे रवि (रतलामी),वहां पहुंचे कवि (समीर-नामी) </p>
<p>खैर जब पता ही लग गया तो हमने सोचा कि चलो हम भी बता दें अपनी 'गधा मिलन' की दास्तान ......</p>
<p>लेकिन पहले हम अरुण भाई से एक शिकायत कर लें...आप हमसे इतना बड़ा पंगा काहे लिये भइया ...<a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/05/blog-post_15.html">कल आपने </a>क्या लिखा था </p>
<blockquote><p>"उन्होने हमें कल शाम तक की छूट दी है कि हम कल शाम को गधों की बस्ती में जाकर समस्त गधों के सामने श्री गर्दभ राज जी से बात करेंगे और माफ़ी भी मागेंगे ......."  </p></blockquote>
<p>अब क्या आप को मालूम नहीं <strong>हम दिमाग से थोड़ा पैदल हैं</strong> ...हम नहीं समझ पाये आपके शब्दों को ...हमको क्या मालूम था कि वो <a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/05/blog-post_16.html"><strong>गधों की बस्ती नोयडा सेक्टर १६ अ में है</strong>... </a>और आप वहां जाकर समस्त गधों के सामने श्री गर्दभ राज जी से बात करेंगे... और आज जब आपने लिखा </p>
<blockquote><p>"कई सारी छोरियां उन्हें ऐसे पूछ रही थी जैसे हम हम ना हुये, उनके सेक्रेटरी हो और उनके आने से पहले मौका मुआयना पर आये हो" </p></blockquote>
<p>तब हमारा माथा ठनका ...अरे नोयडा की छोकरियों को उड़न तस्तरी से क्या वास्ता ...फिर जब उनके गदहा लेखक वाली छवि दिमाग में आयी तो सब कुछ साफ हो गया.. अरे "सारी (गदर्भ) छोरियां " क्यों ना पूछें  उड़न तस्तरी के बारे में .... आपको याद नहीं ....जब उधौ गोकुल पहुंचे थे तो कैसे सारी की सारी गोपियों ने उन्हें घेर लिया था.</p>
<p><strong>अंखिया हरि दरसन की प्यासी।<br />
देख्यो चाहतिं कमलनैन कों निसि दिन रहतिं उदासी॥<br />
आए ऊधौ फिरि गए आंगन डारि गए गर फांसी।</strong></p>
<p>वो ये भी कहती हैं कि उनका एक ही तो दिल था जो <del datetime="2007-05-16T16:18:09+00:00">समीर </del> श्याम संग <del datetime="2007-05-16T16:18:09+00:00">कनाडा</del> मथुरा चला गया</p>
<p><strong>ऊधौ मन न भए दस-बीस।<br />
एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस॥<br />
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु ज्यों देही बिनु सीस।</strong></p>
<p>तो हमें तो सारा राज समझ आ गया .... लेकिन अब समझ में आके भी क्या फायदा तब तो आया नहीं समझ में और हम चल दिये गधा मिलन समारोह के लिये... ये गाना गाते गाते .....</p>
<p>गधा मिलन को जाना, हाँ गधा मिलन को जाना<br />
जग की लाज......., मन की मौज........, दोनों को निभाना.....<br />
गधा मिलन को जाना, हाँ गधा मिलन को जाना</p>
<p>ढेंचू ढेंचू सीख ले, पंगा लेना छोड़ दे -2<br />
खुद के लिये तू सीख ले -2<br />
हर चिट्ठे पे टिपियाना  .....गधा मिलन को जाना</p>
<p>उड़न-थाली का नाम है, सबको फंसाना काम है<br />
आदत बड़ी बदनाम है..-2<br />
धीरे-धीरे ,हौले-हौले<br />
दबे पांव चले आना..... गधा मिलन को जाना</p>
<p>ओले पड़े हैं आज, आंधी का भी है साथ - २<br />
कैसे कटे कठिन बाट - २<br />
चल के आज़माना, गधा मिलन को जाना<br />
हां गधा मिलन को जाना, जाना<br />
गधा मिलन को जाना, जाना<br />
गधा मिलन को जाना, हां<br />
गधा मिलन को जाना</p>
<p>अब मीटिंग में क्या हुआ ये तो बतायेंगे कल....आज इतना ही..<font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीश जी के बहाने ऎश..]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/04/17/naam/</link>
<pubDate>Tue, 17 Apr 2007 11:36:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/04/17/naam/</guid>
<description><![CDATA[वैसे तो नाम के बारे में बहुत कुछ लिखा ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><a href="http://kakesh.files.wordpress.com/2007/04/453681940_2b9f9a1978_m.jpg" title="kuchh_bhi"><img vspace="5" align="left" src="http://kakesh.wordpress.com/files/2007/04/453681940_2b9f9a1978_m.thumbnail.jpg" hspace="5" alt="kuchh_bhi" /></a></font><font size="3">वैसे तो नाम के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. शैक्सपियर जी से लेकर <a href="http://epandit.blogspot.com">श्रीश जी</a> तक ने बहुत कुछ लिखा है.... और हमारे आमिर “कोला” खान जी ने भी इसके बारे में कहा है कि “पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा” तो इसी नाम की बात को लेकर कुछ बात करते हैं.</p>
<p>कल जब लोग कतरनें बटोरें या ना बटोरें के द्वन्द युद्ध में व्यस्त थे और हम <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/04/14/jansattaa/">‘जन’ को ‘सत्ता’ </a>ना मिलने के गम में <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/04/16/na_jane/">पीठ किये बिस्तर पर पड़े </a>थे... तो थोड़े नाराज और दुखी श्रीश जी से मुलाकात हुई. <a href="http://epandit.blogspot.com/2006/11/my-name-is-shrish.html">उन्ही के द्वारा उनके नाम के बारे में जाना</a>. तो एक उत्सुकता हुई अपने नाम के बारे में जानने की .</p>
<p>अब खुद की अकल तो इतनी है नहीं कि कुछ कर पाते ...तो फिर बगल के एक ज्ञानी पंडित जी के पास गये...और उनसे पूछा कि कृपा कर हमारे नाम का मतलब बताऎं.</p>
<p>पंडित जी बोले....</p>
<p>यदि काकेश का सन्धि विच्छेद करें तो बनेगा ‘काक’ + ‘ईश’ .</p>
<p>हमने कहा वो तो ठीक है पर इसका अर्थ क्या होगा. वो बोले 'काक' यानि 'कौवा' और 'ईश' यानि 'राजा' तो काकेश हुआ 'कव्वों का राजा....'</p>
<p>कव्वों का राजा ?? ...भला ये भी कोई नाम है..</p>
<p>पर फिर सोचा ...शायद ठीक ही बोला 'कव्वों का राजा' ......आखिर राजा तो है ना और फिर देखिये ना.. ‘यथा नाम: तथा कर्म:’ की तर्ज पर  काम भी क्या मिला . कौवे की तरह काँव काँव करने का . इसीलिये तो देखा नही किसी भी विषय पर काँव काँव करने लगते हैं.</p>
<p>अभी तो मजाक कर रहे हैं जनाब पर उस समय बहुत दुखी हो गये थे कि नाम भी रखा तो क्या रखा काकेश !!...कोई और नाम ही रख लेते.</p>
<p>इसी दुख में मुँह लटकाये घर आ रहे थे  कि बगल के बसका ( बसंत चाचू) मिल गये.वो पूछे तो उन को पूरी की पूरी राम कहानी सुना डाली .</p>
<p>वो बोले 'तू तो मूरख है रे बेटा'.</p>
<p>तेरे नाम का सन्धि विच्छेद करें तो बनेगा “काक” + “ऎश” . यानि तेरी किस्मत में तो ऎश ही ऎश है . देख नहीं रहा कितनी ऎश हो रही है. फ्री की हिट्स मिल रही हैं और कॉमेंटस भी. थोड़ा दुख तो दूर हुआ पर कंफ्यूजन बढ़ गया.   </p>
<p>अब क्या सही है क्या नहीं ये तो हमें  नही मालूम आप लोग ज्यादा समझदार हैं... कृपया बतायें क्या सही है ...हम तो ‘काका हाथरसी’ की एक कविता की कुछ पंक्तियां सुना देते हैं.</p>
<p>“<br />
नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर?<br />
नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और।<br />
शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने,<br />
बाबू सुंदरलाल बनाए ऐनकताने।<br />
कह ‘काका’ कवि, दयारामजी मारे मच्छर,<br />
विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर।</p>
<p>मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप,<br />
श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप।<br />
जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट पैण्ट में,<br />
ज्ञानचंद छ्ह बार फेल हो गए टैंथ में।<br />
कह ‘काका’ ज्वालाप्रसादजी बिल्कुल ठंडे,<br />
पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे।“</p>
<p></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[और 'जनसत्ता' नहीं मिला...]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/04/14/jansattaa/</link>
<pubDate>Sun, 15 Apr 2007 05:14:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/04/14/jansattaa/</guid>
<description><![CDATA[

कल जब विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p><a href='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/04/jansataa.jpg' title='जनसत्ता'><img src='/files/2007/04/jansataa.thumbnail.jpg' alt='जनसत्ता' align='left' hspace='5' vspace='5' /></a></p>
<p>कल जब <a href="http://linkitmann.blogspot.com/2007/04/blog-post_13.html">विश्वस्त सूत्रों </a>से ज्ञात हुआ की आज रविवासरीय जनसत्ता में हमारी प्रजाति के बारे में कुछ छप रहा है तो बड़ी खुशी हुई और तब से प्रतीक्षा करने लगे आज के 'रविवासरीय जनसत्ता' की . सुबह सुबह जब पेपर वाला आया तो उसे ‘जनसत्ता’  देने के लिये कहा . उसने कहा कि उसके पास कुछ ‘जनसत्ता’ थे लेकिन वो बांट दिये . उससे जब पूछा कि क्या वो एक प्रति ला के दे सकता है तो उसने कहा ....’जनसत्ता’ लोग कम ही पढते हैं इसलिये वो नहीं दे सकता . मैने सोचा कि चलो इंटरनैट पर पढ लेंगे लेकिन काफी ‘गूगलिंग’ करने के बाद भी ढूंढ नही पाया 'जनसत्ता' की साइट को .एक साईट मिली भी पर वो शायद 'जनसत्ता' की नहीं थी क्योकि उसमें काफी पुराने समाचार थे .  यदि आपको पता हो तो बताना. </p>
<p>यहाँ यह बता देने में मुझे कुछ भी शर्म नहीं है कि मैं भले ही हिन्दी भाषा में अपना चिट्ठा लिखता हूँ , भले ही हिन्दी मेरी मातृभाषा है , भले ही मेरे घर में सिर्फ हिन्दी ही बोली जाती है लेकिन मेरे घर में हर दिन जो दो समाचार पत्र आते हैं वो अंग्रेजी भाषा के हैं .रविवार को तीन समाचार पत्र आते हैं लेकिन वो भी अंग्रेजी भाषा के ही हैं. ऎसी बात नहीं है कि मैने कभी हिन्दी समाचार पत्र पढ़ा ही न हो . बचपन में पहले घर में ‘नवभारत टाइम्स’ आता था . जिसमें सबसे पीछे पृष्ठ पर छ्पे ‘शरद जोशी’ जी के व्यंग्य का तो मैं मुरीद था. फिर ‘जनसत्ता’ आने लगा . उस समय प्रभाष जोशी उसके संपादक हुआ करते थे . उस समय संपादकीय पृष्ठ मुझे बहुत पसंद था . प्रो. पुष्पेश पंत के लेख तो मैने काट के संभाल के भी रखे थे.  बाद में प्रभाष जोशी का ‘कागद कारे’ बहुत अच्छा लगता था . जहां तक हिन्दी पत्रिकाओं का सवाल है तो ‘धर्मयुग” तो आती ही थी घर में ...उसमें ‘कार्टून कोना डब्बू जी’ का इंतजार रहता था. जब अज्ञेय जी ‘दिनमान’ के संपादक थे तो ‘दिनमान’ भी पढ़ता था. फिर ‘कादंबिनी’ भी पढ़ी जिसमें ‘काल चिंतन’ और ‘समस्या पूर्ति ‘ मेरे प्रिय कॉलम थे . जब मैं हॉस्टल में था तो एक ‘वॉल मैगजीन’ निकाला करता था जिसमें ‘काल चिंतन’ की तरह मेरा एक कॉलम होता था ‘काक चिंतन’ .</p>
<p>खैर मैं भी कहां भटक गया . तो जब समाचार पत्र वाले ने मना कर दिया की वह ‘जनसत्ता’ नहीं दे पायेगा तो मैने सोचा चलो कोई बात नहीं बाहर से खुद ले आते हैं . तैयार होकर बाहर निकला और कम से कम दो किलोमीटर चला और 7 दुकानों में पूछा पर कहीं भी ‘जनसत्ता’ नहीं मिला . अब ये तो नहीं मालूम कि ऎसा इसलिये था कि लोग हमारी प्रजाति के बारे में पढ़ने के लिये बहुत बेताब थे और सारे पेपर सुबह सुबह खरीद लिये गये या फिर कोई और वजह थी पर कारण जो भी रहा हो नतीजा यही रहा कि ‘जनसत्ता’ नहीं मिला .... खैर आप लोग स्कैन कर भेजें ताकि हम भी जान पायें अपने बारे में.....वैसे भी लोकतंत्र में 'जन' को 'सत्ता' मिलना कठिन ही होता है..</p>
<p></font>  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जुरासिक पार्क का सच	]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/04/02/jurasic_park/</link>
<pubDate>Mon, 02 Apr 2007 05:18:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/04/02/jurasic_park/</guid>
<description><![CDATA[
कुछ दिनों पहले एक पोस्ट में पढ़ा था कि ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href='http://kakesh.files.wordpress.com/2007/04/comic2-447-2.png' title='जुरासिक पार्क'><img src='/files/2007/04/comic2-447-2.thumbnail.png' alt='जुरासिक पार्क' /></a></p>
<p>कुछ दिनों पहले <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/02/17/blog-3/">एक पोस्ट में </a>पढ़ा था कि हिन्दी ब्लौगिंग वाले जैसे जुरासिक पार्क में रहते हैं . उसी से मिलता जुलता एक कार्टून आज मिला. <a href="http://www.qwantz.com/index.pl?comic=508">आप भी  देखिये .</a></p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
