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	<title>एहसास &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/एहसास/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "एहसास"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 14:38:16 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[नजदीकी का एहसास ]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/2008/03/21/%e0%a4%a8%e0%a4%9c%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 05:03:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/2008/03/21/%e0%a4%a8%e0%a4%9c%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b8/</guid>
<description><![CDATA[मन को है तुझे देखने की प्यास
तूझ बिन बे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मन को है तुझे देखने की प्यास<br />
तूझ बिन बेचैन है मेरी हर एक सांस<br />
उस एक क्षण के लिए छोड॰ सकता हूं ये जहाँ<br />
जिस पल मे हो तेरी नजदीकी का एहसास<br />
............................................. Shubhashish(1998)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नग़मे खिलने लगे हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=916</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 14:32:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=916</guid>
<description><![CDATA[नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है<br />
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है<br />
साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है<br />
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">बंजर सूखे मैदान सारे सब्ज़ होने लग गये<br />
फूल अरमानों के मेरे मन में खिलने लग गये<br />
सौंधे आसमाँ पर सतरंगी धनुष खिल गया है<br />
पर्वतों पे घटा झुकने लगी है बरसने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है<br />
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">दुआओं की सदा मेरी फ़ुग़ाँ असर कर जायेगी<br />
रहमत ख़ुदा की होगी मेरी ज़ीस्त घर आयेगी<br />
बहारो-फ़िज़ा का रंग हर-सू बदलने लगा है<br />
तेरे तस्व्वुर की मद्धम धूप खिलने लगी है</font></p>
<p><font color="#000000">साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है<br />
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है</font></p>
<p>मुसलसल= लगातार, ज़ीस्त= जीवन, हर-सू= चारों तरफ़</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=914</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 11:03:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=914</guid>
<description><![CDATA[यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई
यह फ़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई<br />
यह फ़ासले मीलों-से कैसे तय करे कोई<br />
दो पल में बिछड़ जाना ख़ाब जैसा है<br />
इश्क़ आग का दरया है कैसे बुझाये कोई</font></p>
<p><font color="#000000">इस टूटे हुए दिल में वही दर्द पुराने हैं<br />
आँखों में सिमटे हुए गुज़रे ज़माने हैं<br />
तेरी यादों को सीने से लगाके अपना बनाके<br />
यह दूरी दिल से दिल की कैसे मिटाये कोई</font></p>
<p><font color="#000000">यह वीराना तेरे बिना आबाद कैसे होगा<br />
दिल को भी ख़ुशियों का एहसास कैसे होगा<br />
पानी होके लहू आँखों से बहने लगा है<br />
बिगड़ी क़िस्मत अपनी कैसे बनाये कोई</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह कैसा लम्हा है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=881</link>
<pubDate>Thu, 06 Mar 2008 10:28:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=881</guid>
<description><![CDATA[यह कैसा लम्हा है
यह कैसा एहसास है
तू पल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">यह कैसा लम्हा है<br />
यह कैसा एहसास है<br />
तू पलकों में क़ैद है<br />
दिल के पास है</font></p>
<p><font color="#000000">क्या देखूँ तेरे सिवा<br />
क्या चाहूँ तेरे सिवा<br />
मेरे दर्दे-दिल की<br />
तू ही तो है दवा</font></p>
<p><font color="#000000">खिलते हुए लम्हे सब<br />
खिल गये हैं अब<br />
मैं तुझको महसूस करूँ<br />
साँस लूँ जब</font></p>
<p><font color="#000000">आज जो देखा तुझे<br />
याद आया मुझे<br />
लोग दीवाना क्यों<br />
कहते है मुझे</font></p>
<p><font color="#000000">जब निगाहों ने छुआ<br />
यह एहसास हुआ<br />
तूने भी मुझको सनम<br />
प्यार है किया</font></p>
<p><font color="#000000">दुनिया बदल गयी है<br />
तू मुझे मिल गयी है<br />
ज़िन्दगी मेरी इक हसीन<br />
शाम हो गयी है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रक़ाबी चाँद जला दो]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=816</link>
<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 13:01:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=816</guid>
<description><![CDATA[रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">रक़ाबी चाँद जला दो<br />
यह रात चाँदनी हो जाये<br />
कभी तो पास बुला लो<br />
तेरी नज़दीकियों का<br />
मुझे एहसास हो जाये</font></p>
<p><font color="#000000">गुलाबी शाम ढलती है<br />
रोज़ गुज़रती हो<br />
मेरे घर के सामने से<br />
मैं दिल थाम के बैठा रहता हूँ<br />
आइना जब भी हो हाथों में<br />
उससे तेरी बातें करता हूँ...</font></p>
<p><font color="#000000">रक़ाबी चाँद जला दो<br />
यह रात चाँदनी हो जाये<br />
एक रिश्ता बना लो<br />
मुलाक़ात लाज़मी हो जाये</font></p>
<p><font color="#000000">तेरे सिले हुए लबों पर<br />
क्या इक़रार होगा<br />
मेरा ख़्याल है कि इज़हार होगा<br />
बात कोई नही, बात तुम में है<br />
मैं न हूँ शायद तुझमें<br />
पर तू मुझमें है...</font></p>
<p><font color="#000000">रक़ाबी चाँद जला दो<br />
यह रात चाँदनी हो जाये</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जानते हैं दर्द बुझते हुए चाँद का]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=790</link>
<pubDate>Sat, 16 Feb 2008 12:18:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=790</guid>
<description><![CDATA[जानते हैं दर्द बुझते हुए चाँद का
जब बढ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">जानते हैं दर्द बुझते हुए चाँद का<br />
जब बढ़ते आते हैं सुबह के क़दम<br />
जुस्त-जू की छाया खो जाती है कहीं<br />
चाँद से बिछड़कर तन्हा हुए हम</font></p>
<p><font color="#000000">तेरा एहसास था कभी दिल के पास<br />
तू क्यूँ तोड़ गया जीने की हर आस<br />
नहीं थी उन गुलों में ख़ुशबू ज़रा भी<br />
वह भीगे हुए गुल थे जैसे पलाश</font></p>
<p><font color="#000000">जुस्त-जू की छाया खो जाती है कहीं<br />
चाँद से बिछड़कर तन्हा हुए हम</font></p>
<p><font color="#000000">तन पर मद्धम-मद्धम धूप गिरती है<br />
लॉन में कुर्सी डालकर बैठे हैं हम<br />
याद आते हैं सुस्त दिन सर्दियों के<br />
जब तुझे हँसते देखा करते थे हम</font></p>
<p><font color="#000000">जुस्त-जू की छाया खो जाती है कहीं<br />
चाँद से बिछड़कर तन्हा हुए हम</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहली बार देखा तुमको]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=768</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 18:15:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=768</guid>
<description><![CDATA[पहली बार देखा तुमको
जाने क्या हुआ
दिल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">पहली बार देखा तुमको<br />
जाने क्या हुआ<br />
दिल की धड़कनों का<br />
हल्का-हल्का एहसास हुआ</font></p>
<p><font color="#000000">डूब गया मैं तेरी आँखों में<br />
जाने-मन जाने-जानाँ<br />
तुमने मेरा चैन ले लिया<br />
वह तेरी पहली नज़र<br />
जाने-मन जाने-जानाँ<br />
यह दिल मेरा खो गया</font></p>
<p><font color="#000000">पहली बार देखा तुमको<br />
जाने क्या हुआ<br />
दिल की धड़कनों का<br />
हल्का-हल्का एहसास हुआ</font></p>
<p><font color="#000000">जब तक देखूँ न तुमको<br />
दिल क़रार पाता नहीं<br />
जाने कैसा तुमने जादू किया<br />
जाने कैसा तुमने दर्द दिया</font></p>
<p><font color="#000000">पहली बार देखा तुमको<br />
जाने क्या हुआ<br />
दिल की धड़कनों का<br />
हल्का-हल्का एहसास हुआ</font></p>
<p><font color="#000000">ढूँढ़ रहा था मैं गली-गली<br />
जिसको बरसों से<br />
आज मिली हो तुम<br />
एक तस्वीर बनायी थी<br />
मैंने अपने दिल में<br />
आज मिली हो तुम</font></p>
<p><font color="#000000">पहली बार देखा तुमको<br />
जाने क्या हुआ<br />
दिल की धड़कनों का<br />
हल्का-हल्का एहसास हुआ</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहते हैं हम जिन ख़ाबों में]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=745</link>
<pubDate>Mon, 11 Feb 2008 13:41:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=745</guid>
<description><![CDATA[रहते हैं हम जिन ख़ाबों में
उन ख़ाबों क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">रहते हैं हम जिन ख़ाबों में<br />
उन ख़ाबों का एहसास तुम हो<br />
रह जायें जो साँसें तन में बाक़ी<br />
उन साँसों की ख़ाहिश तुम हो</font></p>
<p><font color="#000000">मीठे-मीठे-से दर्द पर तुम<br />
यह सर्द-सी आँच बुझने दो<br />
उड़ती-उड़ती-सी प्यास को<br />
दो जिस्मों में सुलगने दो</font></p>
<p><font color="#000000">रहते हैं हम जिन ख़ाबों में<br />
उन ख़ाबों का एहसास तुम हो<br />
उन्स जो उठता है उठने दो<br />
आग जो लगती है जलने दो</font></p>
<p><font color="#000000">पलकों के नीचे जो छिपा है<br />
हमने उसे अभी-अभी देखा है<br />
हाथों को हाथों में उलझा दो<br />
होंठों से दो ओंठों पर लिख दो</font></p>
<p><font color="#000000">रह जायें जो साँसें तन में बाक़ी<br />
उन साँसों की ख़ाहिश तुम हो<br />
रहते हैं हम जिन ख़ाबों में<br />
उन ख़ाबों का एहसास तुम हो</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/25/%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%81%e0%a4%86-%e0%a4%a7%e0%a5%81/</link>
<pubDate>Tue, 25 Dec 2007 13:10:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/25/%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%81%e0%a4%86-%e0%a4%a7%e0%a5%81/</guid>
<description><![CDATA[ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है
जिस ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है<br />
जिस सिम्त देखता हूँ दिल बदगुमाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">दर्द को दर्द हो ऐसा होता नहीं<br />
इसीलिए ख़ातिर में यह नौ-जवाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">ख़ुदा ही मेहर से मैं रहा सदियों के फ़ासले पे<br />
आज भी वह ना-मेहरबाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">ढूँढ़ता हूँ मैं ख़ुद को उस गली में<br />
जिसमें मुझे ज़िन्दगी होने का नुमाया-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">रोशनी में भिगो दिया शबे-महफ़िल को जिसने<br />
तेरी रंगत का शुआ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">एहसासात दफ़्न हैं किसी कब्र में<br />
दर्द दिल का आज कुछ बे-ज़ुबाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">खींच लिया जिगर को दाँतों से लब तक<br />
आज महफ़िल में यह कमनुमा-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">तेरी दीद से बादशाहत मिली थी मुझे<br />
ज़ख़्म कहता है तेरा साया हुमा-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">बदनसीबी गर्दिशे-अय्याम है बस<br />
वक़्त यह एक इम्तिहाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">तमाशा बहुत हुआ तेरे जाने के बाद<br />
जो कुछ भी हुआ ज़ख़्मे-निहाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">शज़र बेसमर हैं नकहते-गुल भी नहीं<br />
मौसम यह ज़र्द ख़िज़ाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">ज़ीस्त नवाज़ी गयी सो जी रहे हैं<br />
मगर जीना मुश्किल मरना आसाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">मैं गर तेरा तस्व्वुर करूँ<br />
बूँद-बूँद शबनम का गिरना भी गिरियाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">तुम नहीं गुज़रते इस राह से<br />
मेरी गली का हर पत्थर रेगिस्ताँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">वह उजाले जिनसे चौंक गयीं थीं मेरी आँखें<br />
मंज़र वह भी कहकशाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">ना पूछ कब से तेरे दीवानों में शामिल हूँ<br />
हाल मेरा भी कुछ-कुछ बियाबाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">नीली शाल में लिपटी देखा था तुझे<br />
तब से जाना कि चाँद किसी माहलक़ा-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">तुम आये घर मेरे आस्ताने तक<br />
कि अब का'बा ही मेरे सँगे-आस्ताँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">इश्क़ में हमसा न पायेगा कोई<br />
न होना मेरा उनकी बज़्म में हरमाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">हम वस्ल की तमन्ना में मुए जाते हैं<br />
ज़ुज तेरे सभी से वस्ल हिज्राँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">शगून तेरे देखने भर से होता था<br />
आज इन आँखों में हर क़तरा टूटा-टूटा-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">बेज़ार है चमन तितली ज़र कैसे पिये<br />
अब कि मौसम भी कुछ बेईमाँ-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">ज़हर हमको दिया दवा बता के ख़ुदा ने<br />
ज़ीस्त जो बख़्शी यह भी सौदा-सा है</font></p>
<p><font color="#000000">'नज़र' बातें हैं बहुत उसके इश्क़ो-ग़म में<br />
जिसका दिल पर निशाँ-सा है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एहसास]]></title>
<link>http://mehhekk.wordpress.com/2007/12/05/%e0%a4%8f%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Wed, 05 Dec 2007 05:37:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>mehhekk</dc:creator>
<guid>http://mehhekk.wordpress.com/2007/12/05/%e0%a4%8f%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b8/</guid>
<description><![CDATA[एहसास
एक भावना,एक माध्यम है  
कुछ पान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span><span>एहसास</span></span></p>
<p><span><span></span></span><span><span>एक भावना,एक माध्यम है  </span><br />
<span>कुछ पाने और कुछ खोने का  </span><br />
<span></span><br />
<span>कभी ना कर सकी इस भावना का इज़हार  </span><br />
<span>और ना ही कभी किया है इंतज़ार </span></span></p>
<p><span><span></span></span></p>
<p><span><span></span></span><span></span><span><span></span><span><span>एसे ही उमड़ पड़ता है  </span><br />
<span>जब कोई चीज़ बहुत हो ज़्यादा,या बहुत कम  </span><br />
<span></span><br />
<span>दबे पाव आए , आहट भी ना होये  </span><br />
<span>बस एक हलचल महसूस करता है  </span><br />
<span></span><br />
<span>गम और खुशियों से मिलन करता है  </span><br />
<span>जुड़ ज़्याता है मन से, ज़िंदगी में ,ये अहसास  </span><br />
<span></span><br />
<span>मेरी ही भावना मुझे थमाता है </span><br />
<span>और अनकहे ही चला ज़्याता है, ये अहसास </span></span></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है]]></title>
<link>http://jagjitsingh.wordpress.com/2007/11/19/hum-dosti-ehsaan-wafa/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 14:25:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsingh.wordpress.com/2007/11/19/hum-dosti-ehsaan-wafa/</guid>
<description><![CDATA[हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है,
जिंदा तो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है,<br />
जिंदा तो है जीने की अदा भूल गए है,<br />
हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए है,</p>
<p>खुशबु जो लुटाती है मसलती है उसी को,<br />
एहसान का बदला यही मिलता है कली को,<br />
एहसान तो लेते है सिला भूल गए है,</p>
<p>करते है मोहब्बत का और एहसान का सौदा,<br />
मतलब के लिए करते है इमान का सौदा,<br />
डर मौत का और खौफ-ऐ-खुदा भूल गए है,</p>
<p>अब मोम पिघल कर कोई पत्थर नही होता,<br />
अब कोई भी कुर्बान किसी पर नही होता,<br />
यू भटकते है मंजिल का पता भूल गए है,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मरासिम लफ़्ज़ों से नहीं होते]]></title>
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<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 14:33:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[बारिश, बूँदें, पत्ते, मिट्टी -सौंधी
रात,]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">बारिश, बूँदें, पत्ते, मिट्टी -सौंधी<br />
रात, चाँद, तारे, निगाह -मेरी</font></p>
<p><font color="#000000">मरासिम लफ़्ज़ों से नहीं होते<br />
एहसास से होते हैं,<br />
अश्क जो आँखों में उतर आयें<br />
फिर पलकें भिगोते हैं...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बारिश जैसी हो तुम]]></title>
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<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 13:56:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[खिली हुई शाम की बिखरी हुई धूप में
बारि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">खिली हुई शाम की बिखरी हुई धूप में<br />
बारिश जैसी हो तुम<br />
ये लाल फूल खिले हुए हैं<br />
तुम्हारी यादों की तरह<br />
ये भीगे हुए पत्तों पर हवा की सरसराहट-से हैं<br />
बहते हुए तुम्हारे ख़्याल...</font></p>
<p><font color="#000000">तन्हा शाम ऐसे खु़शनुमा मौसम में<br />
तुमसे दूर मेरे साथ और भी ग़मगीन<br />
और ज़्यादा नागँवार हो गयी है<br />
कहाँ हो तुम?<br />
तुम्हारे एहसास, तुम्हारी याद, तुम्हारे ख़्याल<br />
सब मुझे तन्हाई की सूली पर चढ़ा रहे हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">अब तो आ जाओ<br />
या अपने पास बुला लो मुझे<br />
मेरे महबूब मेरे मसीहा<br />
बादे-खु़दा सब तेरा है...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िन्दगी माने हो तुम]]></title>
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<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 11:27:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[ज़िन्दगी माने हो तुम
साँसें तुम्हारा ए]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ज़िन्दगी माने हो तुम<br />
साँसें तुम्हारा एहसास हैं<br />
यादें बाइस हैं ज़ीस्त को<br />
तेरी तमन्ना है खु़शी<br />
ग़म है तेरी जुदाई<br />
ज़ख़्मे-दिल ही मरहम<br />
ज़ख़्मे-दिल ही दवा<br />
और चारागर हो तुम...</font></p>
<p><font color="#000000">आप ही हँसना है<br />
आप ही रोना है<br />
दिन-रात ख़्यालों में<br />
तुमसे बातें करना<br />
सब जीने का मतलब है<br />
खा़ली सीने में दिल कहाँ है<br />
वह तो तुम्हारे पास है<br />
जो सीने में धड़कता है<br />
महज़ तुम्हारा एहसास है</font></p>
<p><font color="#000000">जब भी बेले की कली खुलती है<br />
और गुलाब महकता है<br />
यूँ एहसास होता है उसे छूकर<br />
जैसे तुमको छू लिया है<br />
तुम मुझसे नाआश्ना हो<br />
मगर मैं तुमसे दूर नहीं<br />
यह दूरियाँ यह फ़ासले<br />
सब कम हो जायेंगे<br />
बस तुम्हारे घर का पता मिले</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४ </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेक़रार है उदास है बिन तुम्हारे...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a5%98%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 10:59:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[मेरी ज़िन्दगी में धूप थी मगर
तेरी यादों]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मेरी ज़िन्दगी में धूप थी मगर<br />
तेरी यादों की नर्म धूप<br />
ओस में भीगी ऊदी धूप<br />
कोहरे में छनी हुई धूप<br />
चाँदनी से भी कोमल... निर्मल...</font></p>
<p><font color="#000000">आज भी महसूस करता हूँ रोज़ शाम<br />
जब सूरज मद्धम पड़ जाता है<br />
और चाँद खिलने लगता है,<br />
चाँद में तुम्हें और धूप में तुम्हारा एहसास...</font></p>
<p><font color="#000000">लम्स महज़ जिस्म की<br />
नज़दीकियों से महसूस नहीं होता<br />
किसी के इश्क़ में<br />
वो उसके ख़्याल से भी मिलता है,<br />
महज़ ख़्याल से...</font></p>
<p><font color="#000000">किस तरह समझाऊँ मैं तुम्हें<br />
हालत अपने इस दिल की<br />
जो तुम्हें सिर्फ़ तुम्हें चाहता है<br />
बेक़रार है उदास है बिन तुम्हारे...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४ </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[और इक आह की ख़लिश देती है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b6-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 09:16:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[रूह बहुत बेक़रार&#8217; बहुत बेकल है
इस जिस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">रूह बहुत बेक़रार' बहुत बेकल है<br />
इस जिस्म से छुटकारा चाहती है<br />
अगर तुम न मिली मुझको...<br />
यह बेक़रारी' यह बेकली उसी दिन से है<br />
जब तुम्हें पहली बार देखा था...</font></p>
<p><font color="#000000">वह अपलक आँखें<br />
वह थमी हुई साँसें<br />
और वह रवाँ धड़कनों की आवाज़...<br />
सारे एहसास,<br />
तुम्हारे तस्व्वुर से आज भी जाग उठते हैं...</font></p>
<p><font color="#000000">तुम्हारी मोहब्बत मुझे हर दम साँस देती है<br />
और इक आह की ख़लिश देती है<br />
हर लम्हा... हर पल...<br />
मैं कब तक यूँ ही ज़ीस्त की गिरह में फँसा रहूँगा!</font></p>
<p><font color="#000000">मेरा हाथ थाम लो,<br />
हमसफ़र बनके अपना लो मुझे<br />
या फिर अपने ही पाक़ीज़ा हाथों से...<br />
दफ़्न कर दो मुझे,<br />
एक यही चाह मुझे बरसों से है</font></p>
<p><font color="#000000">एक यही चाह मुझे बरसों से है...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक यही इल्तिजा है...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/14/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%87%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Fri, 14 Sep 2007 20:41:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
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<description><![CDATA[तुम्हें महसूस हो कि ना हो
मेरे सीने मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">तुम्हें महसूस हो कि ना हो<br />
मेरे सीने में दर्द है तो सही...</font></p>
<p><font color="#000000">लम्हा-लम्हा जज़्बात पिघलते हैं ग़म की चिंगारियों में,<br />
एहसास उबलते हैं मेरे,<br />
ख़्याल मसलते हैं मुझे...</font></p>
<p><font color="#000000">इक भँवर है आँखों में माज़ी का<br />
मुझको पूरे ज़ोर से खींचता है अपने अंदर...<br />
दिन-दिन, रात-रात, लम्हा-लम्हा, पल-पल<br />
मैं हूँ कि डूबना ही चाहता हूँ<br />
बचने की कोशिश भी नहीं करता</font></p>
<p><font color="#000000">अब तो हाल मेरा यह है कि जिस सिम्त भी देखता हूँ<br />
हर शै में तू नज़र आती है<br />
सिर्फ़ तू....</font></p>
<p><font color="#000000">नहीं चाहता महसूस करे तू मेरा दर्द<br />
मगर कभी फ़ुर्सत मिले तो यह एहसास सुन ले<br />
एक यही इल्तिजा है...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब बात करते हुए देखता हूँ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%8f-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 21:31:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%8f-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/</guid>
<description><![CDATA[तमन्ना बेताब रहती है
और खा़हिश परेशाँ
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">तमन्ना बेताब रहती है<br />
और खा़हिश परेशाँ<br />
उदास आईने-<br />
खु़द-ब-खु़द टूटते रहते हैं<br />
राह चलती रहती है<br />
पाँव थक जाते हैं<br />
उम्र कम होती रहती है<br />
साल बढ़ते रहते हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">रात जागती है आँखों में<br />
दिन वीरान उजाड़ गुज़रता है<br />
उँगलियों में उँगलियों से<br />
और निगाहों को बदन से<br />
जब बात करते हुए देखता हूँ<br />
तेरी याद खा़मोश रह जाती है<br />
कुछ सुलगता रहता है सीने में</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तन्हाई का साया न टलता है<br />
दिल की ख़ला न घटती है<br />
अरमान सूखे हुए पत्तों की तरह<br />
ज़मीन पर पडे़ रहते हैं<br />
आँसुओं में भीगते-भीगते<br />
ज़मीन में जज़्ब हो जाते हैं<br />
दफ़्न हो जाते हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दिल के टूटने से<br />
फ़र्क साँस लेने लग जाता है<br />
फ़ज़ा तो नहीं बदलती<br />
लेकिन उसकी छुअन<br />
और एहसास के ज़ख़्म हरे हो जाते हैं<br />
लम्हा-लम्हा मन ग़म में डूबता जाता है<br />
और गीला-गीला जलता रहता है<br />
</span> </p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
