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	<title>कबीर-वाणी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/कबीर-वाणी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "कबीर-वाणी"</description>
	<pubDate>Sat, 06 Sep 2008 02:55:36 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[जो बडे हैं वह कभी संयम नहीं गंवाते-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=139</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 16:34:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
&#8221;क्या दीपक बापू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आया फंदेबाज और बोला<br />
''क्या दीपक बापू हम तो<br />
समझते थे कोई भारी भरकम लेखक को<br />
पर हम अब समझे हमें भरमाते हो<br />
सभ्य शब्दों की बात करते हो<br />
गालियाँ लिखने में शर्माते हो<br />
देखो अंतर्जाल पर बडे-बडे लेखकों के नाम का<br />
 लेखक  गालिया चाप (छाप) जाते<br />
और लोग तारीफ भी कर आते''</p>
<p>सुन पहले चौंके<br />
फिर कुर्सी से उठकर<br />
टोपी को घुमाते कहानी दीपक बापू<br />
''लोगों की  हताशा और निराशा दूर करने का<br />
ठेका वैसे हमने नहीं लिया<br />
अभिव्यक्ति की आजादी है<br />
किसी का मुहँ सिलने का<br />
काम हमने कभी नहीं किया<br />
करते हो गालियों की बात<br />
हम नहीं लिखेंगे<br />
चाहे तालियाँ बजे या पड़े लात<br />
लोगों का क्या<br />
जो लेखक होते सामने<br />
उनका पूछते नहीं<br />
पीठ पीछे उनके नाम की<br />
कविताओं के गुणगान कर जाते<br />
समझना तो दूर कभीं पढीं भी<br />
नहीं होगी जिन कवियों की कवितायेँ<br />
उनके पीछे गाते हैं उनकी गाथाएं<br />
और अपना प्रभाव जमाने के लिए<br />
उनकी  गालियाँ चिपका जाते<br />
दूसरों पर लाशों का व्यापार करने का<br />
आरोप लगाने वाले<br />
स्वर्गवासी लोगों के नाम से<br />
गालियाँ छपने के  लिए आते<br />
अपने दिल के अरमान दबाये दिल में<br />
बडे कवियों के नाम से वाह-वाही लूट जाते<br />
हिन्दी भाषा का है बहुत बडा इलाका<br />
दर्द भी बहुत है यहाँ<br />
इसलिए कवि और लेखक भी बहुत हैं<br />
सबको कौन पढ़ पाता<br />
इसलिए लोग अपनी बात उनसे नाम से<br />
चिपका जाते<br />
हम तो बस इतना जानते कि<br />
जो बडे हैं वह कभी अपना संयम नहीं गंवाते''<br />
----------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:जब फसल घर आये तभी उसे अपनी समझो]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=113</link>
<pubDate>Fri, 01 Feb 2008 04:06:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=113</guid>
<description><![CDATA[पकी कहती देखि के, गरब किया किसान
अजहूँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पकी कहती देखि के, गरब किया किसान<br />
अजहूँ झोला बहुत हैं, घर आवै तब जान</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की फसल को तैयार देखकर किसान खुशी से फूला नहीं समाता. उसे  अत्यंत अभिमानी हो जाता. परतु यह उसका भ्रम है क्योंकि उसके बाद भी बहुत परेशानियाँ होतीं हैं  और जब वह कटकर घर आ जाये तभी उसे अपनी समझना चाहिए  </p>
<p><strong>पांच तत्व का पुतरा, मानुष धरिया नाम<br />
दिन चार के कारने, फिर फिर  रोके ठाम</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की यह देह रूपी पुतला पांच तत्वों से निर्मित है जिसका मनुष्य नाम रखा दिया है. चार दिन के क्षणिक भोगों के कारण इस जीव ने अपनी मुक्ति का रास्ता स्वयं ही बंद कर रखा है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:माया के स्वरूप को भी कोई नहीं जानता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/23/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 04:04:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय
जो मन म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय<br />
जो मन में ना उतरे, माया कहिए सोय </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया-माया कहकर उसके पीछे तो सब पड़े हैं पर उसका सही स्वरूप कोई नहीं जानता. सभी एक दूसरे को सन्देश देते हैं कि माया के चक्कर में मत पडो पर पर सभी उसके इर्द-गिर्द जिन्दगी भर घूमते हैं. </p>
<p>भावार्थ-आपने देखा होगा कि सब लोग एक दूसरे को तमाम तरह के उपदेश देते हैं कि पैसे से सब कुछ नहीं होता है और धर्म-कर्म भी करना चाहिए और दिखाने के लिए भक्ति भी करते हैं पर उनके मन से माया का मोह नहीं निकलता और भगवान् का नाम लेते हैं पर उनको मन में स्थान नहीं दे पाते.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:जो दंभ रखता है वह साधू नहीं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/22/sant-kabir-vanijo-danbh-rakhta-hai-vah-sadhu-naheen/</link>
<pubDate>Tue, 22 Jan 2008 04:08:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/22/sant-kabir-vanijo-danbh-rakhta-hai-vah-sadhu-naheen/</guid>
<description><![CDATA[जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं
डिंभ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं<br />
डिंभ चाल करनी करे, साधू कहो मत ताहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो आचरण संसार का वह साधू का हो नहीं सकता। जो अपने आचरण और करनी का दंभ रखता है उसको साधू मत कहो। </p>
<p><strong>सोई आवै भाव ले, कोइ अभाव लै आव<br />
साधू दौऊँ को पोषते, भाव न गिनै अभाव</strong></p>
<p>कोई भाव लेकर आता है और कोई अभाव लेकर आता है। साधू दोनों का पोषण करते हैं, वह न किसी के प्रेम पर आसक्त होते हैं और न किसी के अभाव देखकर उससे विरक्ति दिखाते हैं।</p>
<p><strong>'कबीर' सो धन संचिये, जो आगै कू होइ<br />
सीस चढाये पोटली, ले जात न देख्या कोइ</strong></p>
<p>उसी धन का संचय करो, जो आगे काम आए, तुम्हारे इस धन में क्या रखा है। गठरी सिर पर रखकर किसी को भी आज तक ले जाते नहीं देखा। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कबीर के दोहे:मन की कल्पना माया के विस्तार तक ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/18/man-ke-kalpna-maya-ke-vistar-tak/</link>
<pubDate>Fri, 18 Jan 2008 02:59:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/18/man-ke-kalpna-maya-ke-vistar-tak/</guid>
<description><![CDATA[गुरु कुम्हार शीश कुंभ है, गढ़िं-गढ़िं का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गुरु कुम्हार शीश कुंभ है, गढ़िं-गढ़िं काढेँ खोट<br />
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहि चोट </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य मिट्टी के समान है। जैसे कुम्हार घडे या बर्तन को सुन्दर व सही आकार प्रदान कर अपने जीवन के प्रगति पथ पर चलने के लिए प्रस्तुत करता है।</p>
<p><strong><strong>जो गोचर जहिं लगि मन जाई<br />
तहँ लगि माया जानेहु  भाई </strong></strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इन्द्रियाँ और उसके विषय जहाँ तक मन की कल्पना की पहुंच है वहाँ तक केवल माया का विस्तार ही जानना चाहिऐ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:संतों की निंदा करना ठीक नहीं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/28/sant-kabir-vanisanton-kee-ninda-karnaa-theek-naheen/</link>
<pubDate>Fri, 28 Dec 2007 04:36:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/28/sant-kabir-vanisanton-kee-ninda-karnaa-theek-naheen/</guid>
<description><![CDATA[सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय<br />
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय<br />
</strong>
</p>
<p align="center"> </p>
<p align="left">संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य और न्याय के शब्दों को अच्छी तरह से ग्रहण करता है उसके लिए ही फलदायी होता है। परंतु जो बिना समझे, बिना सोचे-विचारे शब्द को ग्रहण करता है तथा रटता फिरता है उसे कोई लाभ नहीं मिलता ।</p>
<p align="center"><strong>जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय </strong></p>
<p align="center"><strong>नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु</strong> <strong>नहिं होय</strong></p>
<p align="left">संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।</p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रभु का दर्शन करने वाला गाता नहीं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/27/sant-kabir-vaniprabhu-kaa-darshan-karne-vala-gata-nahin/</link>
<pubDate>Thu, 27 Dec 2007 03:39:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/27/sant-kabir-vaniprabhu-kaa-darshan-karne-vala-gata-nahin/</guid>
<description><![CDATA[कबीर जब हम गावते, तब जाना गुरु नाहीं
अब ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>कबीर जब हम गावते, तब जाना गुरु नाहीं<br />
अब गुरु दिल में देखिया, गावन को कछु नाहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक हम गाते रहे, तब तक हम गुरु को जान ही नहीं पाए, परन्तु अब हृदय में दर्शन पा लिया, तो गाने को कुछ नहीं रहा.</p>
<p>भावार्थ- संत कबीरदास जी के दोहों में बहुत बड़ा महत्वपूर्ण  दर्शन मिलता है. समाज में कई  ऐसे लोग हैं जो किन्हीं गुरु के पास  या किसी मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थान  पर जाते है और फिर लोगों से वहाँ  के महत्त्व का दर्शन बखान करते हैं. यह उनका ढोंग होता है. इसके अलावा कई गुरु ऐसे भी  हैं जो धर्म ग्रंथों का बखान कर अपने  ज्ञान तो बघारते हैं पर उस पर चलना तो दूर उस सत्य के मार्ग की तरफ झांकते  तक नहीं है. ऐसे लोग भक्त नहीं होते बल्कि एक गायक की तरह होते हैं. जिसने भगवान् की भक्ति हृदय में धारण कर ली है तो उसे तत्वज्ञान मिल जाता है और वह इस तरह नहीं गाता. वह तो अपनी मस्ती में मस्त रहता है किसी के सामने अपने भक्ति का बखान नहीं करता.  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:एक राम को जानिए ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/18/sant-kabir-vaaniek-ram-ko-jaaniye/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 04:00:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/18/sant-kabir-vaaniek-ram-ko-jaaniye/</guid>
<description><![CDATA[आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक
कहैं कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक<br />
कहैं कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक </strong></p>
<p>संत कबीर जी का कहना है की गाली आते हुए एक होती है, परन्तु उसके प्रत्युतर  में जब दूसरा भी गाली देता है, तो वह एक की अनेक रूप होती जातीं हैं। अगर कोई गाली देता है तो उसे सह जाओ क्योंकि अगर पलट कर गाली दोगे तो झगडा बढ़ता जायेगा-और गाली पर गाली से उसकी संख्या बढ़ती जायेगी।</p>
<p><strong>जैसा भोजन खाईये, तैसा ही मन होय<br />
जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय संत</strong><br />
कबीर कहते हैं जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है। </p>
<p><strong>एक राम को जानि करि, दूजा देह बहाय<br />
तीरथ व्रत जप तप नहिं, सतगुरु चरण समाय</strong></p>
<p>संत कबीर कहते हैं की जो सबके भीतर रमा हुआ एक राम है, उसे जानकर दूसरों को भुला दो, अन्य सब भ्रम है। तीर्थ-व्रत-जप-तप आदि सब झंझटों से मुक्त हो जाओ और सद्गुरु-स्वामी के श्रीचरणों में ध्यान लगाए रखो। उनकी सेवा और भक्ति करो </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:आलस्य मनुष्य का स्वाभाविक दुर्गुण ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/07/chankya-neeti-2/</link>
<pubDate>Fri, 07 Dec 2007 04:17:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/07/chankya-neeti-2/</guid>
<description><![CDATA[ 1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> 1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।<br />
3.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि  हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से  समय पर न विद्या काम आती है न धनं.</p>
<p>4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैंजो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.<br />
5.आलस्य मनुष्य के स्वभाव का बहुत बड़ा दुर्गुण है। आलस्य के कारण प्राप्त की गयी विद्या भी नष्ट हो जाती है दुसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता।बीज अच्छा न हो तो फसल भी अच्छी नहीं होती और थोडा बीज डालने से भी खेत उजड़ जाते हैंसेनापति कुशल न हो तो सेना भी नष्ट हो जाती है। शील के संरक्षण में कुल का नाम उज्जवल होता है।<br />
6.बुरे राजा के राज में भला जनता कैसे सुखी रह सकती है। बुरे मित्र से भला क्या सुख मिल सकता है। वह और भी गले की फांसी सिद्ध हो सकता है। बुरी स्त्री से भला घर में सुख शांति और प्रेम का भाव कैसे हो सकता है। बुरे शिष्य को गुरू लाख पढाये पर ऐसे शिष्य पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:फ़टे दिल को कौन सिल सकता है]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/28/santkabir-vanifate-dil-ko-kaun-sil-sakta-hai/</link>
<pubDate>Wed, 28 Nov 2007 05:36:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/28/santkabir-vanifate-dil-ko-kaun-sil-sakta-hai/</guid>
<description><![CDATA[
बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जानिए राम
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
<strong>बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जानिए राम<br />
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम</strong></p>
<p> संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि बाहर दिखाकर भगवान् का स्मरण करने से क्या लाभ, राम का स्मरण तो अपने ह्रदय में करना चाहिए। जब भगवान् के भक्ती करनी है फिर इस संसार से क्या काम । </p>
<p>*लेखक का मत है कि अगर हमें भगवान् की पूजा या भक्ती करनी है तो उसका दिखावा करने कई जरूरत नहीं है। कई लोग अपने इष्ट और उसकी भक्ती के दावा लोगों के सामने करते हैं, ऐसे लोग ढोंगी होते हैं। प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय चाहे घर में बात कर, चाहे बन को जाय इसका आशय यह है कि अगर भगवान की भक्ती करनी है तो घर-गृहस्थी में रहते हुए भी की जा सकती है उसके लिए वेशभूषा बदलने की कोई जरूरत नहीं है और न वन जाने की। बस मन में प्रेमभाव होना चाहिए।</p>
<p><strong><strong>दिल का मरहम कोई न मिला, जो मिला मर्जी<br />
कहे कबीर बादल फटा, क्यों कर सीवे दर्जी </strong></strong></p>
<p>कबीर दास जीं कहते हैं कि इस संसार में ऐसा कोई नहीं मिला जो मेरे हृदय को शांति प्रदान कर सके। जो भी मिले सब अपने मतलब से मिले । स्वार्थियों को देखकर मन जब बादल की तरह फट गया तो उसे दरजी क्यों सीयेगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: जल-धन बढने लगे तो उसे निकालो ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/08/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 03:43:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/08/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%97/</guid>
<description><![CDATA[
जो जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम
दोन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जो जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम<br />
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है किसी कारणवश नाव में जल भरने लगे और घर में धन की मात्रा बढती चली जाये तो बिना देरी किये दोनों हाथों से उसे    निकालो,यही बुद्धिमानी का काम है, अन्यथा डूब जाओगे। </p>
<p><strong>निन्दक ते कुता भला, हट कर माँडै शर<br />
कुत्ते ते क्रोधी बुरा, गुरू दिलावै गार</strong></p>
<p>निंदा से बहुत भला तो कुता है, जो कि दूर हटकर भौंकता है। परंतु कुत्ते से भी अधिक क्रोध करने वाल निंदा बुरा है जो अपने गुरू को गाली दिलवाता है। लोग सोचते हैं कि जब यही ऐसा अज्ञानी और परनिन्दा करने वाला है तो इसका गुरू भी ऐसा ही होगा।</p>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मन तो पंछी है ]]></title>
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<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 02:25:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मनुवां तो पंछी भया, उडिके चला अकास
ऊपर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मनुवां तो पंछी भया, उडिके चला अकास<br />
ऊपर ही ते गिरि पडा, मन माया के पास</strong></p>
<p>संत कबीर दास कहते हैं कि मन पक्षी के रूप में भावना रूपी आकाश में ऊंची उड़ान पर चल पड़ता है। लकिन जैसे ही उसे माया का दृश्य नीचे के ओर दिखता है वह ऊपर से नीचे की तरह आकर गिर पड़ता है।<br />
इसका आशय यह है कि हमारा मन हमेशा हमें भटकाता रहता है और हम कभी इधर तो कभी उधर धन, पद और सम्मान पाने के लिए भटकते हैं। यहाँ नहीं तो वहाँ मिलेगा पर जब लगता है कि जहां हम थे वहीं हमे सब कुछ मिलेगा तो भाग कर फिर लौट आते हैं। </p>
<p><strong>मन चलताँ तन भी चलै, ताते मन को घेर<br />
तन मन दोऊ बसि कराइ, होय राईं सुमेर</strong></p>
<p>मन से ही हमारा तन प्रभावित होकर चलता है। जब मन किसी विषय से आकर्षित होता है तो अपनी शरीर को उसी तरफ ले जाते हैं। इसलिये मन को सदैव अपने वश में रखना चाहिए। यदि तन और मन को वश में कर लिया जाये तो इस थोड़े से प्रयास से हम सुमेरु पर्वत के समान लाभ पा सकते हैं। </p>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:अंहकार आदमी को बन्दर बना देता है ]]></title>
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<pubDate>Thu, 04 Oct 2007 02:11:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पांच तत्व का पूतरा रज बीरज की बूँद
एकै ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पांच तत्व का पूतरा रज बीरज की बूँद<br />
एकै घाटी नीसरा ब्राह्मन क्षत्री सूद </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि माता-पिता के रज-वीर्य की बूँद से पांच तत्व (पृथ्वी,जल, अग्नि,वायु आकाश) के पुतले माता के गर्भ से बने हैं। ये सब एक ही द्वार से ब्राहण , क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र के रूप में प्रकट हुए हैं। इनमें कोई इनमें कोई अंतर नहीं है, सब एक समान भाई-भाई हैं।</p>
<p><strong>अकिल बिहूना आदमी, जाने नहीं गंवार<br />
जैसे कापी परबस पर्यो , नाचै घर-घर द्वार</strong> </p>
<p>बुद्धिहीन, मूर्ख-गंवार मनुष्य कुछ नहीं जानता-समझता। जैसे बन्दर मदारी के वश होकर, हर घर-द्वार नाचता है, वैसे ही आदमी अभिमानवश भ्रम में पडा हुआ अपने जाति-कुल-धरम आदि में नाचता फिरता है अर्थात अपने आपको महत्त्व देता है। </p>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: साधू वह जो समदर्शी हो ]]></title>
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<pubDate>Wed, 03 Oct 2007 03:37:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं
डिंभ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं<br />
डिंभ चाल करनी करे, साधू कहो मत ताहिं </p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो आचरण संसार का वह साधू का हो नहीं सकता। जो अपने आचरण और करनी का दंभ रखता है उसको साधू मत कहो। </p>
<p>सोई आवै भाव ले, कोइ अभाव लै आव<br />
साधू दौऊँ को पोषते, भाव न गिनै अभाव</p>
<p>कोई भाव लेकर आता है और कोई अभाव लेकर आता है। साधू दोनों का पोषण करते हैं, वह न किसी के प्रेम पर आसक्त होते हैं और न किसी के अभाव देखकर उससे विरक्ति दिखाते हैं। </p>
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