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	<title>कम्युनिस्ट &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/कम्युनिस्ट/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "कम्युनिस्ट"</description>
	<pubDate>Mon, 13 Oct 2008 14:42:45 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[दो -वर्गों का  समाज ]]></title>
<link>http://samajvad.wordpress.com/?p=484</link>
<pubDate>Thu, 09 Oct 2008 06:07:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>विचारमंच</dc:creator>
<guid>http://samajvad.hi.wordpress.com/2008/10/09/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/</guid>
<description><![CDATA[सबसे खुबसूरत है वह समुद्र

जिसे अब तक द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">सबसे खुबसूरत है वह समुद्र<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">जिसे अब तक देखा नही हमने</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">सबसे खूबसूरत बच्चा</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">अब तक बड़ा नहीं हुआ</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">सबसे खुबसूरत हैं वे दिन </span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">जिन्हें अब तक जिया नहीं हमने</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">सबसे ख़ूबसूरत हैं वे बातें</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">जो अभी कही जानी है</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">---नाजिम हिकमत </span></h3>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">दो -वर्गों का  समाज </span></h2>
<p style="text-align:left;">अगर आप किसी आधुनिक समाज शास्त्री से सवाल करें कि वर्ग कितने होते हैं, उनका जवाब होगा छ: , या शायद तीन, या बारह, या कोई अन्य संख्या जो उनकी  कल्पना को भाए. 'वर्ग' की बहुत सी परिभाषाएँ दी जाती हैं. वे प्राय नकली और अप्रयाप्त होती हैं.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">एक बेहतर सहायक उत्तर</span></h2>
<p style="text-align:left;">हमरा समाज दो वर्गों में विभाजित है. इसमें एक मेहनतकश वर्ग और दूसरा पूंजीपति वर्ग शामिल है. मेहनतकश वर्ग को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करना पड़ता है जबकि पूंजीपति वर्ग के जीने के लिए प्रयाप्त धन होता है. अगर आप को आश्चर्य हो कि आप किस वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, अपने आप से एक सवाल करें कि अगर  आप कल से काम करना बंद कर दें तो क्या आप अपने निवेश पर गुज़ारा कर सकते हैं?. पूंजीवादी  वर्ग इस प्रकार आपकी तरह टूट जाए, सवाल ही पैदा नहीं होता . प्रत्येक श्रेणी में कुछ लोग शामिल होते हैं. निसंदेह ज्यादातर लोग मेहनतकश श्रेणी में शामिल हैं और पूजीपति श्रेणी जनसँख्या  का एक छोटा सा ही हिस्सा हैं. लेकिन, पूंजीवाद को समझने के दृष्टिकोण  से वे एक बहुत महतवपूर्ण अंश हैं.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">सहायता के लिए इस परिभाषा का क्या महत्व है</span></h2>
<p>केवल दो ही श्रेणीओं के होने के पीछे क्या कारण है ? उत्तर बड़ा सरल है, वह है कि, आपको यह समझना है कि कैसे   पूंजीवाद काम करता है. श्रेणी हमें बताती है कि हम अपनी वर्तमान अवस्था में क्यों हैं. यह हमें समझाती है कि किस प्रकार समाज गुलाम समाज से सामंतवाद को पार करते हुए  पूंजीवाद में विकसित हुआ और बदल गया. विशेष आर्थिक हित के कारण एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से समाज के आर्थिक आधार को छीन लिया.</p>
<p style="text-align:left;">परंतु श्रेणी केवल इतना ही नहीं समझाती कि  इस पूंजीवाद के झंझट में हम कैसे फंस गए बल्कि पूंजीवाद किस प्रकार काम करता है , का विश्लेषण भी करती है. अधिकतर लोगों के जीवन का मुख्य तथ्य है काम--- घर में काम ताकि उजरती-गुलाम का गुजरा हो सके या फ़िर जीने के लिए मजदूरी करने का काम. क्यों ? ऐसा हमेशा से नहीं रहा. सामंती युग में भू-दास खेतों पर काम करते हुए , भोजन का उत्पादन करते थे ताकि वे उसे खा सके . इस प्रकार वे अपना समय व्यतीत करते थे. निश्चय ही, अगर उत्पाद  भू-पति को देना पड़ता था, यह परेशानियों का सबब था, फ़िर भी ये परेशानियाँ आधुनिक उजरती गुलाम की परेशानियों से बिल्कुल अलग तरह की थीं.</p>
<p style="text-align:left;">वर्ग पूंजीवाद की दुर्घतानायों का भी विश्लेषण करता है:<span style="color:#808000;"> </span><span style="color:#0000ff;"><em>युद्ध, जिसे हम इसलिए लड़ते हैं ताकि पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा हो सके. अकाल तभी पड़ता है जब पूंजीपति श्रेणी हमारे खान-पान से मुनाफा नहीं कमा रही होती. काम से हमें दूर रखकर बेरोज़गारी इसलिए पैदा की  जाती है ताकि हम मजदूरों में मुकाबला पैदा करके मजदूरी को कम से कम रखा जा सके,</em></span> और इस प्रकार और बहुत सी बातें. इस प्रकार अब हमारे पास बचती हैं दो श्रेणियां , चूंकि यही हमें चाहिए यह जानने के लिए कि किस प्रकार हम पूंजीवाद तक पहुच गए और यह पूंजीवाद किस प्रकार विकसित हुआ.</p>
<p style="text-align:left;">सबसे महत्वपूर्ण कारण कि केवल दो ही श्रेणियां क्यों हैं, का इन दो कारणों से कुछ भी लेना-देना नहीं है. यह एक तथ्य है कि इससे हमें समझ आती है कि किस तरह हम इस पूंजीवाद के झंझट से मुक्त हो सकते हैं. हम, मेहनतकश श्रेणी के लोगों का इसी में हित है कि इस बीमार पूंजीवादी श्रेणी जिसमे हमें बलात रूप से धकेल दिया गया है, से किस तरह मुक्ति पाई जाए.केवल वर्ग-चेतना के कार्य  की पहचान करके ही एक वर्ग-विहीन समाज की स्थापना हो सकती है. एक रास्ता है जिस पर चलकर ऐसा किया जा सकता है और वह रास्ता है वैज्ञानिक समाजवाद का, केवल  इसी रास्ते पर चलकर वर्ग-विहीन समाज जिसे साम्यवाद कहतें हैं, की मंजिल को पाया जा सकता है. एक वर्ग के रूप में संगठित होकर हम समाज बदल सकते हैं. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमें पूंजीवाद से यूँ ही चिपके रहना होगा.</p>
<p style="text-align:left;">राजनितिक लोगो का यह दावा की हम वर्ग-विहीन समाज में ही तो रह रहें हैं, निश्चित रूप से गुमराह करने वाला है, काश कि वे इमानदारी से इसे स्वीकार कर पाते. समाज विज्ञानी ग़लत बताते हैं कि पूंजीवाद और वर्गों का अस्तित्व सदैव रहा है और सदैव रहेगा. हमारा यह मानना कि समाज दो वर्गों में विभाजित है पूर्ण रूप से ठीक हैं क्योंकि कोई और नहीं बल्कि यही तरीका हमें समझाता है कि किस प्रकार हम युद्ध, अकाल, गरीबी और बेरोजगारी पर काबू पा सकते हैं. हमें जरूरत है <span style="color:#ff0000;"><strong>वर्ग-चेतना की और उससे भी बढ़कर इस बात के लिए चेतन होने की कि हम मेहनतकश वर्ग से तालुक रखते हैं और वे पूंजीपति वर्ग से</strong></span>. इसलिए वर्ग दो होते हैं.</p>
<p style="text-align:center;">
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मार्क्सवादी अर्थशास्त्र से परिचय ]]></title>
<link>http://bigulnews.wordpress.com/?p=272</link>
<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 14:24:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>नौभास</dc:creator>
<guid>http://bigulnews.hi.wordpress.com/2008/10/08/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[मूल्य का श्रम-सिद्धांत

“राजनितिक अर्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h2 style="text-align:center;"><a title="Permanent Link to मूल्य का श्रम-सिद्धांत" rel="bookmark" href="http://samajvad.wordpress.com/2008/10/07/469/">मूल्य का श्रम-सिद्धांत</a></h2>
<div class="snap_preview">
<p style="text-align:left;"><span style="color:#008000;"><em><strong>“राजनितिक अर्थशास्त्र मालों का नहीं मनुष्यों के आपसी  संबंधो का वर्णनं करता है.”– एंगेल्ज़ </strong></em></span><br />
पूंजीवाद के अधीन किस प्रकार मेहनतकश जनता का शोषण किया जाता है और पूंजीवाद समाज कैसे चलता है को  समझने के लिए राजनितिक अर्थशास्त्र में मूल्य का श्रम-सिद्धांत है. इस लेख में मजदूरी, कीमत और मुनाफों के घटनावृत्त का भी वर्णन किया गया है.</p>
<h2 style="text-align:center;"><em><span style="color:#ff0000;"><strong>क्यों महत्वपूर्ण है मूल्य का श्रम-सिद्धांत<br />
</strong></span></em></h2>
<p style="text-align:left;">मानव समाज के विकास में पूंजीवाद वह पड़ाव है जिसके लक्षण हैं उत्पादन के साधनों पर  श्रम मजदूरी और जिन्स (माल) उत्पादन पर एकाधिकार. पूंजीवाद अर्थशास्त्र को समझाने के लिए मूल्य के श्रम सिद्धांत  का केन्द्रीय स्थान है क्योंकि पूंजीवाद  जिन्स उत्पादन का लासानी रूप है और मूलरूप से मूल्य का श्रम सिद्धांत  जिन्स की कीमत का निर्धारक कौन है, का विश्लेषण करता है. कोई समय था जब  मूल्य के प्रतिद्वंदी सिद्धांत थे, परंतु अब अकादमिक अर्थशास्त्र में इस प्रकार के किसी भी सिद्धांत की जरूरत से इनकार करने की प्रवृति पाई जाती हैं. आपको जो चाहिए, वे कहते हैं, वह है कीमत का सिद्धांत. यद्धपि हम पाएंगे, कि  मूल्य की अवधारणा से मुक्त होकर कीमतों का विश्लेषण नहीं किया जा सकता.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">कुछ परिभाषाएँ </span></h2>
<p><span style="color:#008000;"><strong>धन</strong> </span> प्रकृति में पाए जाने वाले पदार्थ से मानवीय श्रम द्वारा निर्मित कोई भी वस्तु. पूंजीवादी समाज में, मार्क्स कहते हैं,धन बेहद्द जिन्सों के संग्रह का रूप धारण कर लेता है.</p>
<p style="text-align:left;"><strong><span style="color:#008000;">जिन्स</span></strong> धन की वह वस्तु जिसका धन की  अन्य वस्तुओं  के साथ विनिमय के लिए उत्पादन किया जाता है. इस प्रकार जिन्स एक आर्थिक प्रणाली है जहाँ धन बिक्री के लिए उत्पादित होता है. साधारण रूपों में उत्पादन के गैर-जिन्स समाजों की सीमायों पर इसका अस्तित्व होता है जहाँ धन केवल प्रत्यक्षत:  या तो उत्पादकों के स्वयं के लिए या फ़िर मालिकों के अधीन वर्ग  के उपयोग के लिए पैदा किया जाता है. पहले जिन्सों की अदला-बदली होती थी लेकिन जैसे ही जिन्स उत्पादन का विकास हुआ एक जिन्स ने विशेष भूमिका अपना ली जिसके बदले में सभी जिन्सों का विनिमय किया जा सकता था और इसके विपरीत भी, संक्षिप्त में इसने ही धन का रूप धारण कर लिया. राजनितिक अर्थशास्त्र के लिए यहीं से समस्या का जन्म होता है. <span style="color:#008000;"><strong>जिन अनुपातों पर जिंसों के आपसी विनिमय का निर्धारण होता है उनका निर्णय कौन करता हैं ?</strong></span></p>
<p style="text-align:left;">
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">वह क्या है जो सभी जिन्सों में  उभयनिष्ठ है…</span></h2>
<p style="text-align:left;">एक निष्कर्ष जोकि हम इस तथ्य से निकाल सकते हैं कि जिंसों के निर्धारित अनुपातों में लगातार आपस में  अदला-बदली के लिए जरूरी है कि कोई उभयनिष्ठ चरित्र,  वाला कम या अधिक मापन के लिए पैमाना हो.<span style="color:#008000;"><strong>लेकिन क्या हो?</strong></span> धन की वस्तुओं के रूप में जिन्सों के दो चरित्र हैं; <span style="color:#008000;"><strong>उनकी उपयोगिता होती है और वे मानव श्रम के उत्पाद हैं.</strong></span> इनमें कौन मानक हो सकता है? कुछ ने उपयोगिता की और इशारा किया लेकिन समस्या यह है कि वही वस्तु किसी अन्य व्यक्ति के लिए कम या ज्यादा उपयोगी हो सकती है. <span style="color:#008000;"><em><strong>उपयोगिता एक व्यक्तिगत मसला है, जिन्स और इसके उपभोक्ता  के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध.</strong></em></span> इसलिए उपयोगिता परिवर्तनशील और मनोगत मानक होगी और इसका विश्लेषण नहीं कर पायेगी कि क्यों जिन्सों का टिकाऊ अनुपात पर विनिमय लगातार जारी रहता है. अब हमारे पास बचती हैं जिन्से जो कि मानव श्रम की उत्पाद हैं.<br />
<span style="color:#008000;"><em><strong>उपयोगिता के विपरीत जिन्स में निहित श्रम की मात्रा का वस्तुगत मापन किया जा सकता है</strong></em></span> : उदाहरण के लिए, इसके बनाने पर कितना समय लगा. तथापि वह  धन, जिसमें मानव श्रम के उत्पाद होने का गुण निहित न हो   जिन्स  नहीं हो सकता. हम जो जानना चाहते हैं वह यह कि जिन्से धन के अन्य रूपों से कैसे भिन्न हैं.धन, हम जानते हैं कि,केवल  कुछ विशेष सामाजिक हालात में जिन्स का रूप लेता है, विशेषकर तब जब इसका उत्पादन बिक्री के लिए होता है. इसी प्रकार श्रम ( खर्च  हुई मानव-उर्जा) उन्हीं हालातों में “मूल्य” बन जाती है. इस प्रकार मूल्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप जिन्स के भौतिक या रासायनिक गुण में ढूंढ़ सकें क्योंकि यह एक सामाजिक गुण, सामाजिक सम्बन्ध  है. चूंकि मूल्य स्वयं को केवल  विनिमय में ही उजागर करता है, विनिमय मूल्य, यह सामाजिक सम्बन्ध दिखने में ऐसा लगता है जैसे वस्तुओं के बीच का सम्बन्ध हो. (लेकिन ऐसा नही जैसे की ऊपर एंगेल्ज़ ने कहा है) यही वह चीज़ थी जो  मार्क्स के  “जिन्सों की अंधभक्ति” लिखने का कारण बनी.<strong> कीमत मूल्य की मुद्रा में अभिव्यक्ति है.</strong><br />
<span style="color:#008000;"><em><strong>श्रम,</strong></em></span> मूल्य के  श्रम-सिद्धांत के अनुसार मूल्य का आधार है.लेकिन श्रम किस तरह किसी जिन्स का मूल्य निर्धारित करती है? किसी जिन्स का मूल्य, मार्क्स बताते हैं, इस पर खर्च होने वाले सामाजिक आवश्यक श्रम-समय में निहित होता है या इसे यूँ कहे, इसके शुरू से अंत तक की उत्पादन प्रक्रिया पर <em><strong><span style="color:#008000;">खर्च होने वाली सामाजिक आवश्यक श्रम-समय की मात्रा पर.</span></strong></em> इस बात को नोट करें कि मूल्य का श्रम-सिद्धांत यह नहीं कहता कि किसी जिन्स का मूल्य इसमें निहित श्रम की वास्तविक मात्रा द्वारा निर्धारित होता है. इसका अर्थ होगा कि एक अकुशल वर्कर निपुण वर्कर से ज्यादा मूल्य पैदा करेगा. <span style="color:#008000;">सामाजिक<em><strong>-</strong></em><em><strong>आवश्यक</strong></em></span> से अभिप्राय है औसत काम के हालात जैसे कि  औसत उत्पादनशीलता, औसत श्रम-सघनता के अधीन किसी जिन्स के उत्पादन और पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक मात्रा.उदाहरण के लिए , कोयला उद्योग को लें, मान लीजिए एक शिफ्ट में औसत प्रति व्यक्ति उत्पादन 43 क्व्ट्स . है और 230 गद्दों में काम चल रहा है. इनमे से कुछ में 43 क्व्ट्स से ऊपर जबकि कुछ में कम कोयला निकाला जा रहा होगा परन्तु कोयले का मूल्य किसी भी प्रकार से गद्दों में मजदूरों के श्रम द्वारा निर्धारित नही होता. इसका मूल्य मण्डी द्वारा निर्धारित सामाजिक औसत से होता है.निश्चित रूप से इसका अर्थ है कि जो भी सामाजिक-आवश्यक होता है, वह बदलता रहता है. कोयला जिन्स पैदा करने की प्रक्रिया में गद्दों से बाहर  मौजूद मजदूर जो कोयला खंनन के लिए आवश्यक पदार्थ पैदा कर रहे होते हैं भी शामिल  होते हैं.<br />
पूंजीवाद के अधीन प्रत्येक वस्तु यो तो जिन्स होती हैं या फ़िर जिन्स का रूप धारण कर लेती है, खरीदी और बेची जाती है. मूल्य के श्रम-सिद्धांत के विरुद्ध दिए जाने वाले तर्क से मुकाबले के लिए इस योग्यता का होना आवश्यक है कि कुछ वस्तुएं जिनका क्रय-विक्रय भी होता है श्रम का उत्पाद नहीं हैं या उनमें  निहित श्रम की मात्र से बहूत दूर उन्हें किसी मूल्य पर बेचा जाता है उदाहरण  के लिए,भूमि और कला की वस्तुएं. पूंजीवाद के अधीन भूमि का मूल्य, इसके शुद्ध रूप में इसके लगान का मात्र पूंजीकरण ही तो है. भूमि का कोई मूल्य नहीं होता क्योंकि यह मानव श्रम का उत्पाद नहीं है. कलाकृतियां और ऐन्टिक्स वास्तव में मानव श्रम के ही उत्पाद है लेकिन वास्तव में जिन्सें नहीं है क्योंकि उनका पुनरुत्पादन नहीं हो सकता; इसलिए  इस प्रकार की वस्तुओं के सन्दर्भ में “सामाजिक ज़रूरी-श्रम कोई मायने नहीं रखता. <span style="color:#008000;"><em><strong>एक बचकाना एतराज है : क्यों एक सोने का ढेला एक उल्का-पिण्ड से अधिक कीमती है जबकि इसमें कोई श्रम निहित नहीं है ? वस्तुत: यह मूल्य  के श्रम-सिद्धांत की पुष्टि है कि सामान्य दशा के अधीन उत्पादन में सोने का  मूल्य इसके मूल्य जितना ही होता. अगर सोना आसमानों से निरंतर गिरता रहे तब इसकी कीमत इसको एकत्रित करने पर लगी श्रम तक गिर जायेगी</strong></em></span>.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">जिन्स के रूप में श्रम शक्ति </span></h2>
<p style="text-align:left;">पूंजीवाद के अधीन एक और वस्तु  जो जिन्स  का रूप लेती  है, वह है मानव शक्ति (काम करने की  मानव की क्षमता, मानव ऊर्जा). वास्तव में यह  तथ्य  पूंजीवाद का आधार है क्योंकि यह पहले  निर्माताओं (यहाँ मजदूरों को) को स्वामित्व और संपत्ति निर्माण के लिए उपकरणों पर नियंत्रण से  पृथक मानता है. परंतू यहाँ मानव-शक्ति और अन्य जिन्सोँ के मध्य एक बहुत महत्वपूर्ण अन्तर हैं, मानव-शक्ति मनुष्य में जो अपनी जो वस्तु (मानव-शक्ति) वे बेच रहे होते हैं के मूल्य को प्राप्त करने के लिए सोच और संघर्ष  कर सकते हैं, में अवतीर्ण होती है. अन्यथा इसका मूल्य दूसरी जिन्सों के मूल्य की भांति इसे बनाने और इसे पुनः बनाने पर खर्च की गई सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम की मात्रा द्वारा  तय होता. एक आदमी की श्रम शक्ति बनाने पर खर्च हुई श्रम वह होती है जो उस पर  भोजन, वस्त्र  आश्रय और उसे काम के योग्य फिट रखने के लिए खर्च हुई होती है. इसलिए अकुशल मानव की  श्रम-शक्ति उसे और उसके परिवार को जिन्दा रखने और काम करने के योग्य रखने के मूल्य  के बराबर होती है. कुशल मनुष्यों को इसलिए ज्यादा मिलता है क्योंकि उनके कौशल की उपज और उसे बरक़रार रखने पर ज्यादा खर्च होता है.जब मजदूर  एक नियोक्ता ढूँढता है तो उसे  उसकी श्रम-शक्ति का प्रयोग (अर्थात 8 घंटे)  करने के बदले में भुगतान किया जाता है. मजदूरी, इस प्रकार, <span style="color:#008000;"><strong>एक विशेष प्रकार का मूल्य है; यह मानव-शक्ति की कीमत की मुद्रा में अभिव्यक्ति है.</strong></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;"><strong><em>अवैतनिक श्रम </em></strong></span></h2>
<p style="text-align:left;">श्रम शक्ति की एक विशिष्ट विशेषता है.क्योंकि धन केवल मनुष्य की  मानसिक और शारीरिक ऊर्जा के प्रकृति में पाई जाने वाली सामग्री पर  खर्च  द्वारा उत्पादित किया जा सकता है और चूंकि श्रम ( श्रम-शक्ति का क्षय) मूल्य का आधार है ,इसलिए इस  मानव-शक्ति में नए मूल्य उत्पादित करने की विशिष्टता समाहित है. मान लीजिए हमारे श्रमिक के श्रम-शक्ति की कीमत 4 घंटे प्रतिदिन है. 4 घंटे काम करने के बाद क्या वह काम करना बंद कर देगा. बिल्कुल नहीं. अपने अनुबंध के तहत उसे और 4 घंटे के लिए काम करना होगा. चूंकि वह अपने नियोक्ता के ठिकाने पर उसके उपकरण, मशीनरी और कच्चे माल के साथ काम कर रहा  है इसलिए , हर चीज़ जो वह उत्पादित करता है वह नियोक्ता की होती है. इस प्रकार, <span style="color:#339966;"><strong>इस मामले में, नियोक्ता को 4 घंटे का मुफ्त  श्रम मिल जाता है.</strong></span> यह उसके  लाभ का स्रोत है जिसका  वह ब्याज के रूप में अपने लेनदारों और (भूमि) किराया के रूप में उसके मकान मालिक को (और करों के रूप में )राज्य के साथ बटवारा करता है.<span style="color:#008000;"><strong>इन  सब ब्याज, लाभ और किराये का स्रोत श्रमिक-वर्ग का अवैतनिक श्रम है</strong></span>. आओ शोषण की इस प्रक्रिया को थोड़ा करीब से देखें . देखने के लिए पहला मुद्दा यह है कि <span style="color:#008000;"><strong>यह सब उत्पादन के स्थान पर घटित होता है. काम का स्थान ही वह जगह है जहाँ मजदूर का शोषण होता है</strong></span>. <span style="color:#3366ff;"><em><strong>( मार्क्स का यह सिद्धांत उन कम्युनिस्टों और वामपंथी और मार्क्सवादी विचारधारा का दम भरने वाली पत्रिकायों के भारतीय नारोदनिक संस्करण का परदाफाश करने के लिए काफी है जो किसान की लूट का स्थान मण्डी मानते हैं) जब एक कामगार अपनी मजदूरी (या वेतन, श्रम शक्ति की कीमत के लिए एक और नाम) प्राप्त करता है उसका पहले ही शोषण हो चुका होता है. इस प्रकार उसका साहूकार या दुकानदार या भूपति या कर संग्रह करने वाले द्वारा दोबारा  शोषण नहीं किया जा सकता बेशक वे भी उसे लूट सकते हैं और धोखा दे सकते हैं परंतु यह मार्क्सवाद के मूल्य का श्रम-सिद्धांत के बाहर अलग विषय है. तथाकथित दूसरे दरजे का  शोषण एक मिथक है. </strong></em></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;"> क्या है पूँजी ?</span></h2>
<p style="text-align:left;">मार्क्स के लिए , मूल्य की  भांति, <span style="color:#008000;"><strong>पूँजी कोई वस्तु न होकर एक सामाजिक सम्बन्ध है</strong></span>. वास्तव में यह मूल्य, बल्कि मूल्यों का संग्रह है. केवल कुछ सामाजिक शर्तों के अधीन ही उत्पादन के साधन पूँजी बनते हैं, विशेषकर तब जब अधिशेष या अतिरिक्त मूल्य हासिल करने के लिए इनका प्रयोग उजरती-श्रम के शोषण के लिए किया जाता है.इस प्रकार हम मार्क्स को <span style="color:#008000;"><strong>“मूल्य के स्व विस्तार”</strong></span> के रूप में पूंजी संचय की इस प्रक्रिया का  वर्णन करते  हुए पाते हैं. पूंजी, अपने शुद्ध रूप में, धन-पूँजी है. कहने के लिए एक पूंजीपति सूती वस्त्र उत्पादन  के लिए अपनी पूंजी निवेश करता है. एक कारखाना, वस्त्र मशीनरी, कच्चा कपास  आदि और श्रम शक्ति खरीदने के लिए भी, उसे अपनी पूँजी अग्रिम रूप से खर्च करनी होगी. उसकी पूँजी को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. अचल पूँजी में इमारतें और मशीनरी शामिल होती हैं जिनका उत्पादन प्रक्रिया  में पूर्ण रूप से क्षय नहीं होता. चक्रीय पूंजी में  कच्ची सामग्री और श्रम शक्ति होते हैं <span style="color:#008000;"><strong>जिनको समाजवादी नज़रिए से स्थिर  पूँजी और अस्थिर पूँजी की दो उप-श्रेणियों में विभाजित करने की बहुत अहमियत है. </strong></span>भवन, मशीनरी और कच्चे माल में निवेश की हुई पूँजी स्थिर पूँजी कहलाती है. उत्पादन की  प्रक्रिया में इनके मूल्य या मूल्य के  भाग का नए उत्पाद में हस्तांतरण हो जाता है. श्रम- शक्ति में निवेशित पूँजी अस्थिर पूँजी कहलाती है. <span style="color:#ff0000;"><em><strong>चूंकि इस पूँजी का ही विस्तार होता है इसलिए इसे अस्थिर पूँजी कहते हैं</strong></em></span>. नए उत्पाद में स्थिर पूँजी के हस्तांतरण के औजार के अलावा श्रम-शक्ति न केवल अपने मूल्य का हस्तांतरण करती है बल्कि इसमें नया मूल्य भी जोड़ देती है. इस प्रकार हमें पता चलता है कि <span style="color:#008000;"><strong>मशीनें मूल्य पैदा नहीं कर सकती</strong></span>. वे जो कुछ करती हैं , वह तब जब मनुष्य द्वारा उन्हें गति प्रदान की जाती है. हाँ, उनके मूल्य( जो भूतकाल में मानवीय श्रम का ही उत्पाद रहा है) का कुछ भाग नए उत्पाद के मूल्य में परवर्तित हो जाता है. <span style="color:#3366ff;"><em><strong>पूंजीवादी अर्थशास्त्री भी इसकी मान्यता देते हैं जब वे तबदीली की इस प्रक्रिया में इमारतें और मशीनरी के मूल्य को कवर करने के लिए, वस्तु की लागत के इस हिस्से को मूल्यह्रास में दिखाते हैं</strong></em></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">शोषण की दर</span></h2>
<p style="text-align:left;">हम पहले ही जान चुके हैं कि दिन का एक  भाग  श्रम-शक्ति के क्षय द्वारा समकक्ष उत्पादन की प्रक्रिया में खर्च हो जाता है और बाकि पूंजीपति के लिए अतिरिक्त मूल्य पैदा करने पर खर्च  होता है. काम के दिन का पहला भाग को मार्क्स ने आवश्यक-श्रम कहा ( “सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम” के साथ भ्रमित न हों) जबकि  शेष को अतिरिक्त श्रम का भाग. हम यहाँ दिन के हिस्से के रूप के बारे में बता रहे है. <span style="color:#008000;"><strong>इसे शाब्दिक रूप से ग्रहण न करें</strong></span>, ऐसा होने पर आप मार्क्स के ज़माने के अर्थशास्त्रियों की भांति गलती कर सकते हो,<span style="color:#008000;"><strong> जिन्होंने ‘10 घंटे काम के’ के बिल का इस बिनाह पर विरोध किया था कि सारा मुनाफा तो दिन के अन्तिम घंटों में ही पैदा होता है !</strong></span> <span style="color:#0000ff;">वास्तव में काम के समय  हर पल मजदूर द्वारा  अतरिक्त मूल्य का सृजन  किया जा रहा होता </span>है. मार्क्स अतिरिक्त श्रम और आवश्यक श्रम में  अनुपात को ( जो अतिरिक्त मूल्य और अस्थिर पूँजी के अनुपात की तरह ही होता है ) अतिरिक्त मूल्य की दर, या शोषण की दर (s/v).  कहते हैं. निश्चित रूप से आवश्यक श्रम के मुकाबले अतिरिक्त श्रम के अनुपात को बढ़ाने में पूंजीपति का हित होता है. इसे सिरे चढाने के दो तरीके हैं. पहला, काम के दिन को ही बड़ा करके. इस प्रकार से पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य को निरपेक्ष बेशी/अतिरिक्त मूल्य या निरपेक्ष अधिशेष कहते हैं. दूसरा तरीका है आवश्यक श्रम के मुकाबले अतिरिक्त श्रम के अनुपात में बढोत्तरी  करना. इसे करने का सबसे जालिम तरीका उनकी मजदूरी में कटौती ( जिसे नियोक्ता कर सकें तो बिल्कुल करेंगे) करना है जिससे उनका जीवन स्तर गिर जाता है. इस प्रकार पैदा हुआ अतिरिक्त मूल्य सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य कहलाता है.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">जिन्स के मूल्य की परिभाष देते हुए </span></h2>
<p style="text-align:left;">पूंजीवादी उत्पादन की जटिलताओं का जींस के मूल्य पर क्या प्रभाव पड़ता है ? सूती वस्त्रों की  प्रत्येक इकाई के मूल्य में कच्चे माल का मूल्य, मशीनों के मूल्य का हस्तांतरण, श्रम-शक्ति का मूल्य या  जिन्स का मूल्य शामिल होता है = c+v+s, c यहाँ उत्पाद में हस्तांतरित कुल स्थिर पूँजी C का एक हिस्सा है . S/(C + V).  लाभ की दर है. <span style="color:#008000;"><strong>शुरू से लेकर अंत तक सामाजिक रूप से जरूरी श्रम का  इसमे निहित होना ही जिन्स का मूल्य निर्धारित करता है, न कि  इसके उपादान के केवल अन्तिम पड़ाव पर लगी हुई श्रम-शक्ति द्वारा इसका मूल्य निर्धारित होता है</strong></span>. <span style="color:#3366ff;">इसलिए यह कहना गलत है कि खेतिहर मजदूर भोजन पैदा करते हैं और कार बनाने वाले मजदूर कारें</span>. पूँजीवाद के अंतर्गत उत्पादन जिसमें सभी मजदूर  भाग लेते हैं एक सामाजिक प्रक्रिया है.  पूरे पूंजीपति वर्ग द्वारा पूरे मजदूर वर्ग का शोषण इस का एक महत्वपूर्ण परिणाम  है. <span style="color:#008000;"><em><strong>मजदूर अपने विशेष नियोक्ता द्वारा नहीं बल्कि पुरे पूंजीपति वर्ग द्वारा शोषित किया जाता है</strong></em></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">क्यों कीमत हमेशा मूल्य के बराबर नहीं  होती </span></h2>
<p>वस्तुओं के बारे में इतना सब कुछ कहने के बाद  कि पूंजीवाद के अधीन वस्तुएं निर्धारित अनुपात में अपने मूल्यों के अनुसार विनिमय करती हैं, यह कहना कि जिन्से अपने मूल्य पर नहीं बिकती हैं, आश्चर्य चकित कर सकता है. लेकिन वास्तव में मामला यही है. इस वजह से यह समझना महत्वपूर्ण है कि श्रम सिद्धांत कीमत का केवल  मात्र सिद्धांत नहीं  है. कीमत और मूल्य में अन्तर कैसे  हो सकता  है, को जानने के लिए दो आसान कारण हैं. कीमतें में उतार चढाव  मांग और पूर्ति के कारण हो सकता है और एकाधिकार में वस्तु अपने मूल्य के ऊपर बिकेगी (या  सब्सिडी के कारण अपने मूल्य से नीचे). तीसरा कारण और अधिक जटिल है लेकिन पता  होना चाहिए अगर हम पूँजीवाद के नमूदार कामकाज को समझना चाहते हैं, उदाहरणार्थ व्यवसाय के मूल्य निर्धारण की नीतियों के पीछे क्या है ? जो लोग कीमतों का फ़ैसला करते हैं वे मूल्यों के बारे में कुछ नहीं जानते होते और न ही उन्हें इसकी जरूरत होती है. फ़िर वे क्या करते हैं ?<br />
हमने  देखा  कि लगी हुई पूँजी को स्थिर और अस्थिर में विभाजित किया जा सकता है और यह अस्थिर पूँजी ही  होती है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करने के वास्ते <span style="color:#008000;"><strong>बढ़</strong></span> जाती है. मार्क्स के अनुसार अनुपात C/V  <span style="color:#008000;"><strong>पूंजी की जैविक संरचना  है.</strong></span> सभी उद्योगों में शोषण (s / v) की इसी दर को देखते हुए, अगर सभी जिन्सों को उनकी कीमत पर बेचा जाए तो इसका अर्थ होगा कि तकनिकी रूप से पिछडे  और उद्योगों के  गहन-श्रमिक वाले क्षत्रों में इसकी दर सबसे ऊँची होगी. क्या ऐसा होता है ?<span style="color:#ff0000;"><strong> बिल्कुल नहीं !</strong></span> पूँजी के लिए कम या ज्यादा होने की बजाय दर वही रहती है चाहे यह कहीं भी निवेशित हो.<br />
लाभों  के औसत के साथ मूल्य के  श्रमिक सिद्धांत का किस प्रकार  समाधान किया जाए, ऐसी समस्या थी जिसने एडम स्मिथ और रिकार्डो को सबसे ज्यादा परेशान किया. लेकिन मार्क्स ने इसे एक ही सम्भव तरीके से हल कर दिया, <span style="color:#008000;">और वह इस अवमानना को छोड़ना था कि सभी जिन्से अपने मूल्यों पर बिकती हैं</span>. आलोचकों ने  मार्क्स के इसी काम में “बड़ा  विरोधाभास” देखा<span style="color:#339966;"> लेकिन इसका कुछ भी अर्थ नहीं है</span>. जैसा कि हमने  पूंजीवादी उत्पादन और संचालन में  देखा है कि यह एक सामाजिक प्रक्रिया है: व्यक्तिगत रूप से पूंजीपति द्वारा अपने मजदूरों का ही शोषण नहीं होता बल्कि सारा पूंजीपति वर्ग सारे श्रमिक वर्ग का  मिलकर शोषण करता है. प्रत्येक पूंजीपति बहूत से मजदूर रखता है जो बहुत सारा अधिशेष कमाते/ पैदा करते हैं. अधिशेष व्यक्तिगत रूप से किसी एक अकेले पूंजीपति के पास न जाकर एक पूल में चली जाती है जहाँ यह अन्य अतिरिक्त मूल्यों में मिलकर प्रत्येक पूंजीपति द्वारा निवेशित अनुपात के अनुसार (पूंजीपतियों में) बँट जाती है. <span style="color:#008000;"><strong>(यही कारण है कि क्यों एक पूर्ण  स्वचालित फैक्ट्री  भी मुनाफा कमा रही होती है)</strong></span>. इसके कारण  कीमतों पर पड़ने वाले प्रभाव की कल्पना करें. मान लीजिए s/v 100 प्रतिशत है और विभिन्न  जैविक संरचनाओं  वाले तीन सेक्टर हैं.<br />
.CVC मुनाफे की  दर का मूल्य ABC<br />
औसत रहित लाभों   के साथ B सबसे ज्यादा मुनाफे वाला सेक्टर है, लेकिन औसत निकालते हुए हम पाते हैं कि:<br />
CVC मुनाफा मूल्य कीमत A 140 मूल्य से अधिक  B 140 मूल्य से नीचे  C 140 मूल्य पर<br />
मार्क्स इसी को विक्रय  मूल्य कहते हैं, जो की लागत से जमा <span style="color:#008000;"><strong>मुनाफे  की दर की औसत से पैदा हुई उत्पादन की कीमत है.</strong></span> बिल्कुल इसी तरह व्यापर चलते हैं और अकादमिक अर्थशात्रियों द्वारा <span style="color:#ff0000;">(जो कि व्यापारियों के द्रष्टिकोण से केवल घटनाओं को ही लेते हैं)</span> इस तरह माना जाता है.  लेकिन वो बात नहीं है. ऐसा कहना हवा में बात करना होगा कि कीमत खर्च जमा “सामान्य मुनाफे” पर निर्धारित होती है, <span style="color:#ff0000;">लेकिन सामान्य मुनाफा है क्या ? रिवाज द्वारा लागू की गई कोई चीज़ !</span> केवल यही है जो दिखाई देता है.श्रम पर आधारित मूल्य और अतिरिक्त मूल्य के कारण  केवल मूल्य का श्रम-सिद्धांत ही प्रयाप्त रूप से विश्लेषण कर सकता है कि क्यों मुनाफे की सामान्य दर , कहने के लिए, 10 है बजाय 15 के.</p>
<p style="text-align:left;">जारी</p>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मूल्य का श्रम-सिद्धांत ]]></title>
<link>http://samajvad.wordpress.com/?p=469</link>
<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 13:08:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>विचारमंच</dc:creator>
<guid>http://samajvad.hi.wordpress.com/2008/10/07/469/</guid>
<description><![CDATA[मार्क्सवादी अर्थशास्त्र से परिचय 
&#8220;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">मार्क्सवादी अर्थशास्त्र से परिचय </span></h2>
<p style="text-align:left;"><span style="color:#008000;"><em><strong>"राजनितिक अर्थशास्त्र मालों का नहीं मनुष्यों के आपसी  संबंधो का वर्णनं करता है."-- एंगेल्ज़ </strong></em></span><br />
पूंजीवाद के अधीन किस प्रकार मेहनतकश जनता का शोषण किया जाता है और पूंजीवाद समाज कैसे चलता है को  समझने के लिए राजनितिक अर्थशास्त्र में मूल्य का श्रम-सिद्धांत है. इस लेख में मजदूरी, कीमत और मुनाफों के घटनावृत्त का भी वर्णन किया गया है.</p>
<h2 style="text-align:center;"><em><span style="color:#ff0000;"><strong>क्यों महत्वपूर्ण है मूल्य का श्रम-सिद्धांत<br />
</strong></span></em></h2>
<p style="text-align:left;">मानव समाज के विकास में पूंजीवाद वह पड़ाव है जिसके लक्षण हैं उत्पादन के साधनों पर  श्रम मजदूरी और जिन्स (माल) उत्पादन पर एकाधिकार. पूंजीवाद अर्थशास्त्र को समझाने के लिए मूल्य के श्रम सिद्धांत  का केन्द्रीय स्थान है क्योंकि पूंजीवाद  जिन्स उत्पादन का लासानी रूप है और मूलरूप से मूल्य का श्रम सिद्धांत  जिन्स की कीमत का निर्धारक कौन है, का विश्लेषण करता है. कोई समय था जब  मूल्य के प्रतिद्वंदी सिद्धांत थे, परंतु अब अकादमिक अर्थशास्त्र में इस प्रकार के किसी भी सिद्धांत की जरूरत से इनकार करने की प्रवृति पाई जाती हैं. आपको जो चाहिए, वे कहते हैं, वह है कीमत का सिद्धांत. यद्धपि हम पाएंगे, कि  मूल्य की अवधारणा से मुक्त होकर कीमतों का विश्लेषण नहीं किया जा सकता.</p>
<p style="text-align:left;">
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">कुछ परिभाषाएँ </span></h2>
<p><span style="color:#008000;"><strong>धन</strong> </span> प्रकृति में पाए जाने वाले पदार्थ से मानवीय श्रम द्वारा निर्मित कोई भी वस्तु. पूंजीवादी समाज में, मार्क्स कहते हैं,धन बेहद्द जिन्सों के संग्रह का रूप धारण कर लेता है.</p>
<p style="text-align:left;"><strong><span style="color:#008000;">जिन्स</span></strong> धन की वह वस्तु जिसका धन की  अन्य वस्तुओं  के साथ विनिमय के लिए उत्पादन किया जाता है. इस प्रकार जिन्स एक आर्थिक प्रणाली है जहाँ धन बिक्री के लिए उत्पादित होता है. साधारण रूपों में उत्पादन के गैर-जिन्स समाजों की सीमायों पर इसका अस्तित्व होता है जहाँ धन केवल प्रत्यक्षत:  या तो उत्पादकों के स्वयं के लिए या फ़िर मालिकों के अधीन वर्ग  के उपयोग के लिए पैदा किया जाता है. पहले जिन्सों की अदला-बदली होती थी लेकिन जैसे ही जिन्स उत्पादन का विकास हुआ एक जिन्स ने विशेष भूमिका अपना ली जिसके बदले में सभी जिन्सों का विनिमय किया जा सकता था और इसके विपरीत भी, संक्षिप्त में इसने ही धन का रूप धारण कर लिया. राजनितिक अर्थशास्त्र के लिए यहीं से समस्या का जन्म होता है. <span style="color:#008000;"><strong>जिन अनुपातों पर जिंसों के आपसी विनिमय का निर्धारण होता है उनका निर्णय कौन करता हैं ?</strong></span></p>
<p style="text-align:center;">
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">वह क्या है जो सभी जिन्सों में  उभयनिष्ठ है...</span></h2>
<p style="text-align:left;">एक निष्कर्ष जोकि हम इस तथ्य से निकाल सकते हैं कि जिंसों के निर्धारित अनुपातों में लगातार आपस में  अदला-बदली के लिए जरूरी है कि कोई उभयनिष्ठ चरित्र,  वाला कम या अधिक मापन के लिए पैमाना हो.<span style="color:#008000;"><strong>लेकिन क्या हो?</strong></span> धन की वस्तुओं के रूप में जिन्सों के दो चरित्र हैं; <span style="color:#008000;"><strong>उनकी उपयोगिता होती है और वे मानव श्रम के उत्पाद हैं.</strong></span> इनमें कौन मानक हो सकता है? कुछ ने उपयोगिता की और इशारा किया लेकिन समस्या यह है कि वही वस्तु किसी अन्य व्यक्ति के लिए कम या ज्यादा उपयोगी हो सकती है. <span style="color:#008000;"><em><strong>उपयोगिता एक व्यक्तिगत मसला है, जिन्स और इसके उपभोक्ता  के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध.</strong></em></span> इसलिए उपयोगिता परिवर्तनशील और मनोगत मानक होगी और इसका विश्लेषण नहीं कर पायेगी कि क्यों जिन्सों का टिकाऊ अनुपात पर विनिमय लगातार जारी रहता है. अब हमारे पास बचती हैं जिन्से जो कि मानव श्रम की उत्पाद हैं.<br />
<span style="color:#008000;"><em><strong>उपयोगिता के विपरीत जिन्स में निहित श्रम की मात्रा का वस्तुगत मापन किया जा सकता है</strong></em></span> : उदाहरण के लिए, इसके बनाने पर कितना समय लगा. तथापि वह  धन, जिसमें मानव श्रम के उत्पाद होने का गुण निहित न हो   जिन्स  नहीं हो सकता. हम जो जानना चाहते हैं वह यह कि जिन्से धन के अन्य रूपों से कैसे भिन्न हैं.धन, हम जानते हैं कि,केवल  कुछ विशेष सामाजिक हालात में जिन्स का रूप लेता है, विशेषकर तब जब इसका उत्पादन बिक्री के लिए होता है. इसी प्रकार श्रम ( खर्च  हुई मानव-उर्जा) उन्हीं हालातों में "मूल्य" बन जाती है. इस प्रकार मूल्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप जिन्स के भौतिक या रासायनिक गुण में ढूंढ़ सकें क्योंकि यह एक सामाजिक गुण, सामाजिक सम्बन्ध  है. चूंकि मूल्य स्वयं को केवल  विनिमय में ही उजागर करता है, विनिमय मूल्य, यह सामाजिक सम्बन्ध दिखने में ऐसा लगता है जैसे वस्तुओं के बीच का सम्बन्ध  हो. (लेकिन ऐसा नही जैसे की ऊपर एंगेल्ज़ ने कहा है) यही वह चीज़ थी जो  मार्क्स के  "जिन्सों की अंधभक्ति" लिखने का कारण बनी.<strong> कीमत मूल्य की मुद्रा में अभिव्यक्ति है.</strong></p>
<p style="text-align:left;"><span style="color:#008000;"><em><strong>श्रम,</strong></em></span> मूल्य के  श्रम-सिद्धांत के अनुसार मूल्य का आधार है.लेकिन श्रम किस तरह किसी जिन्स का मूल्य निर्धारित करती है? किसी जिन्स का मूल्य, मार्क्स बताते हैं, इस पर खर्च होने वाले सामाजिक आवश्यक श्रम-समय में निहित होता  है या इसे यूँ कहे, इसके शुरू से अंत तक की उत्पादन प्रक्रिया पर <em><strong><span style="color:#008000;">खर्च होने वाली सामाजिक आवश्यक श्रम-समय की मात्रा पर.</span></strong></em> इस बात को नोट करें कि मूल्य का श्रम-सिद्धांत यह नहीं कहता कि किसी जिन्स का मूल्य इसमें निहित श्रम की वास्तविक मात्रा द्वारा निर्धारित होता है. इसका अर्थ होगा कि एक अकुशल वर्कर निपुण वर्कर से ज्यादा मूल्य पैदा करेगा. <span style="color:#008000;">सामाजिक<em><strong>-</strong></em><em><strong>आवश्यक</strong></em></span> से अभिप्राय है औसत काम के हालात जैसे कि  औसत उत्पादनशीलता, औसत श्रम-सघनता के अधीन किसी जिन्स के उत्पादन और पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक मात्रा.उदाहरण के लिए , कोयला उद्योग को लें, मान लीजिए एक शिफ्ट में औसत प्रति व्यक्ति उत्पादन 43 क्व्ट्स . है और 230 गद्दों में काम चल रहा है. इनमे से कुछ में 43 क्व्ट्स से ऊपर जबकि कुछ में कम कोयला निकाला जा रहा होगा परन्तु कोयले का मूल्य किसी भी प्रकार से गद्दों में मजदूरों के श्रम द्वारा निर्धारित नही होता. इसका मूल्य मण्डी द्वारा निर्धारित सामाजिक औसत से होता है.निश्चित रूप से इसका अर्थ है कि जो भी सामाजिक-आवश्यक होता है, वह बदलता रहता है. कोयला जिन्स पैदा करने की प्रक्रिया में गद्दों से बाहर  मौजूद मजदूर जो कोयला खंनन के लिए आवश्यक पदार्थ पैदा कर रहे होते हैं भी शामिल  होते हैं.</p>
<p style="text-align:left;">पूंजीवाद के अधीन प्रत्येक वस्तु यो तो जिन्स होती हैं या फ़िर जिन्स का रूप धारण कर लेती है, खरीदी और बेची जाती है. मूल्य के श्रम-सिद्धांत के विरुद्ध दिए जाने वाले तर्क से मुकाबले के लिए इस योग्यता का होना आवश्यक है कि कुछ वस्तुएं जिनका क्रय-विक्रय भी होता है श्रम का उत्पाद नहीं हैं या उनमें  निहित श्रम की मात्र से बहूत दूर उन्हें किसी मूल्य पर बेचा जाता है उदाहरण  के लिए,भूमि और कला की वस्तुएं. पूंजीवाद के अधीन भूमि का मूल्य, इसके शुद्ध रूप में इसके लगान का मात्र पूंजीकरण ही तो है. भूमि का कोई मूल्य नहीं होता क्योंकि यह मानव श्रम का उत्पाद नहीं है. कलाकृतियां और ऐन्टिक्स वास्तव में मानव श्रम के ही उत्पाद है लेकिन वास्तव में जिन्सें नहीं है क्योंकि उनका पुनरुत्पादन नहीं हो सकता; इसलिए  इस प्रकार की वस्तुओं के सन्दर्भ में "सामाजिक ज़रूरी-श्रम कोई मायने नहीं रखता. <span style="color:#008000;"><em><strong>एक बचकाना एतराज है : क्यों एक सोने का ढेला एक उल्का-पिण्ड से अधिक कीमती है जबकि इसमें कोई श्रम निहित नहीं है ? वस्तुत: यह मूल्य  के श्रम-सिद्धांत की पुष्टि है कि सामान्य दशा के अधीन उत्पादन में सोने का  मूल्य इसके मूल्य जितना ही होता. अगर सोना आसमानों से निरंतर गिरता रहे तब इसकी कीमत इसको एकत्रित करने पर लगी श्रम तक गिर जायेगी</strong></em></span>.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">जिन्स के रूप में श्रम शक्ति </span></h2>
<p style="text-align:left;">पूंजीवाद के अधीन एक और वस्तु  जो जिन्स  का रूप लेती  है, वह है मानव शक्ति (काम करने की  मानव की क्षमता, मानव ऊर्जा). वास्तव में यह  तथ्य  पूंजीवाद का आधार है क्योंकि यह पहले  निर्माताओं (यहाँ मजदूरों को) को स्वामित्व और संपत्ति निर्माण के लिए उपकरणों पर नियंत्रण से  पृथक मानता है. परंतू यहाँ मानव-शक्ति और अन्य जिन्सोँ के मध्य एक बहुत महत्वपूर्ण अन्तर हैं, मानव-शक्ति मनुष्य में जो अपनी जो वस्तु (मानव-शक्ति) वे बेच रहे होते हैं के मूल्य को प्राप्त करने के लिए सोच और संघर्ष  कर सकते हैं, में अवतीर्ण होती है. अन्यथा इसका मूल्य दूसरी जिन्सों के मूल्य की भांति इसे बनाने और इसे पुनः बनाने पर खर्च की गई सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम की मात्रा द्वारा  तय होता. एक आदमी की श्रम शक्ति बनाने पर खर्च हुई श्रम वह होती है जो उस पर  भोजन, वस्त्र  आश्रय और उसे काम के योग्य फिट रखने के लिए खर्च हुई होती है. इसलिए अकुशल मानव की  श्रम-शक्ति उसे और उसके परिवार को जिन्दा रखने और काम करने के योग्य रखने के मूल्य  के बराबर होती है. कुशल मनुष्यों को इसलिए ज्यादा मिलता है क्योंकि उनके कौशल की उपज और उसे बरक़रार रखने पर ज्यादा खर्च होता है.जब मजदूर  एक नियोक्ता ढूँढता है तो उसे  उसकी श्रम-शक्ति का प्रयोग (अर्थात 8 घंटे)  करने के बदले में भुगतान किया जाता है. मजदूरी, इस प्रकार, <span style="color:#008000;"><strong>एक विशेष प्रकार का मूल्य है; यह मानव-शक्ति की कीमत की मुद्रा में अभिव्यक्ति है.</strong></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;"><strong><em>अवैतनिक श्रम </em></strong></span></h2>
<p style="text-align:left;">श्रम शक्ति की एक विशिष्ट विशेषता है.क्योंकि धन केवल मनुष्य की  मानसिक और शारीरिक ऊर्जा के प्रकृति में पाई जाने वाली सामग्री पर  खर्च  द्वारा उत्पादित किया जा सकता है और चूंकि श्रम ( श्रम-शक्ति का क्षय) मूल्य का आधार है ,इसलिए इस  मानव-शक्ति में नए मूल्य उत्पादित करने की विशिष्टता समाहित है. मान लीजिए हमारे श्रमिक के श्रम-शक्ति की कीमत 4 घंटे प्रतिदिन है. 4 घंटे काम करने के बाद क्या वह काम करना बंद कर देगा. बिल्कुल नहीं. अपने अनुबंध के तहत उसे और 4 घंटे के लिए काम करना होगा. चूंकि वह अपने नियोक्ता के ठिकाने पर उसके उपकरण, मशीनरी और कच्चे माल के साथ काम कर रहा  है इसलिए , हर चीज़ जो वह उत्पादित करता है वह नियोक्ता की होती है. इस प्रकार, <span style="color:#339966;"><strong>इस मामले में, नियोक्ता को 4 घंटे का मुफ्त  श्रम मिल जाता है.</strong></span> यह उसके  लाभ का स्रोत है जिसका  वह ब्याज के रूप में अपने लेनदारों और (भूमि) किराया के रूप में उसके मकान मालिक को (और करों के रूप में )राज्य के साथ बटवारा करता है.<span style="color:#008000;"><strong>इन  सब ब्याज, लाभ और किराये का स्रोत श्रमिक-वर्ग का अवैतनिक श्रम है</strong></span>. आओ शोषण की इस प्रक्रिया को थोड़ा करीब से देखें . देखने के लिए पहला मुद्दा यह है कि <span style="color:#008000;"><strong>यह सब उत्पादन के स्थान पर घटित होता है. काम का स्थान ही वह जगह है जहाँ मजदूर का शोषण होता है</strong></span>. <span style="color:#3366ff;"><em><strong>( मार्क्स का यह सिद्धांत उन कम्युनिस्टों और वामपंथी और मार्क्सवादी विचारधारा का दम भरने वाली पत्रिकायों के भारतीय नारोदनिक संस्करण का परदाफाश करने के लिए काफी है जो किसान की लूट का स्थान मण्डी मानते हैं) जब एक कामगार अपनी मजदूरी (या वेतन, श्रम शक्ति की कीमत के लिए एक और नाम) प्राप्त करता है उसका पहले ही शोषण हो चुका होता है. इस प्रकार उसका साहूकार या दुकानदार या भूपति या कर संग्रह करने वाले द्वारा दोबारा  शोषण नहीं किया जा सकता बेशक वे भी उसे लूट सकते हैं और धोखा दे सकते हैं परंतु यह मार्क्सवाद के मूल्य का श्रम-सिद्धांत के बाहर अलग विषय है. तथाकथित दूसरे दरजे का  शोषण एक मिथक है. </strong></em></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;"> क्या है पूँजी ?</span></h2>
<p style="text-align:left;">मार्क्स के लिए , मूल्य की  भांति, <span style="color:#008000;"><strong>पूँजी कोई वस्तु न होकर एक सामाजिक सम्बन्ध है</strong></span>. वास्तव में यह मूल्य, बल्कि मूल्यों का संग्रह है. केवल कुछ सामाजिक शर्तों के अधीन ही उत्पादन के साधन पूँजी बनते हैं, विशेषकर तब जब अधिशेष या अतिरिक्त मूल्य हासिल करने के लिए इनका प्रयोग उजरती-श्रम के शोषण के लिए किया जाता है.इस प्रकार हम मार्क्स को <span style="color:#008000;"><strong>"मूल्य के स्व विस्तार"</strong></span> के रूप में पूंजी संचय की इस प्रक्रिया का  वर्णन करते  हुए पाते हैं. पूंजी, अपने शुद्ध रूप में, धन-पूँजी है. कहने के लिए एक पूंजीपति सूती वस्त्र उत्पादन  के लिए अपनी पूंजी निवेश करता है. एक कारखाना, वस्त्र मशीनरी, कच्चा कपास  आदि और श्रम शक्ति खरीदने के लिए भी, उसे अपनी पूँजी अग्रिम रूप से खर्च करनी होगी. उसकी पूँजी को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. अचल पूँजी में इमारतें और मशीनरी शामिल होती हैं जिनका उत्पादन प्रक्रिया  में पूर्ण रूप से क्षय नहीं होता. चक्रीय पूंजी में  कच्ची सामग्री और श्रम शक्ति होते हैं <span style="color:#008000;"><strong>जिनको समाजवादी नज़रिए से स्थिर  पूँजी और अस्थिर पूँजी की दो उप-श्रेणियों में विभाजित करने की बहुत अहमियत है. </strong></span>भवन, मशीनरी और कच्चे माल में निवेश की हुई पूँजी स्थिर पूँजी कहलाती है. उत्पादन की  प्रक्रिया में इनके मूल्य या मूल्य के  भाग का नए उत्पाद में हस्तांतरण हो जाता है. श्रम- शक्ति में निवेशित पूँजी अस्थिर पूँजी कहलाती है. <span style="color:#ff0000;"><em><strong>चूंकि इस पूँजी का ही विस्तार होता है इसलिए इसे अस्थिर पूँजी कहते हैं</strong></em></span>. नए उत्पाद में स्थिर पूँजी के हस्तांतरण के औजार के अलावा श्रम-शक्ति न केवल अपने मूल्य का हस्तांतरण करती है बल्कि इसमें नया मूल्य भी जोड़ देती है. इस प्रकार हमें पता चलता है कि <span style="color:#008000;"><strong>मशीनें मूल्य पैदा नहीं कर सकती</strong></span>. वे जो कुछ करती हैं , वह तब जब मनुष्य द्वारा उन्हें गति प्रदान की जाती है. हाँ, उनके मूल्य( जो भूतकाल में मानवीय श्रम का ही उत्पाद रहा है) का कुछ भाग नए उत्पाद के मूल्य में परवर्तित हो जाता है. <span style="color:#3366ff;"><em><strong>पूंजीवादी अर्थशास्त्री भी इसकी मान्यता देते हैं जब वे तबदीली की इस प्रक्रिया में इमारतें और मशीनरी के मूल्य को कवर करने के लिए, वस्तु की लागत के इस हिस्से को मूल्यह्रास में दिखाते हैं</strong></em></span></p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">शोषण की दर</span></h2>
<p style="text-align:left;">हम पहले ही जान चुके हैं कि दिन का एक  भाग  श्रम-शक्ति के क्षय द्वारा समकक्ष उत्पादन की प्रक्रिया में खर्च हो जाता है और बाकि पूंजीपति के लिए अतिरिक्त मूल्य पैदा करने पर खर्च  होता है. काम के दिन का पहला भाग को मार्क्स ने आवश्यक-श्रम कहा ( "सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम" के साथ भ्रमित न हों) जबकि  शेष को अतिरिक्त श्रम का भाग. हम यहाँ दिन के हिस्से के रूप के बारे में बता रहे है. <span style="color:#008000;"><strong>इसे शाब्दिक रूप से ग्रहण न करें</strong></span>, ऐसा होने पर आप मार्क्स के ज़माने के अर्थशास्त्रियों की भांति गलती कर सकते हो,<span style="color:#008000;"><strong> जिन्होंने '10 घंटे काम के' के बिल का इस बिनाह पर विरोध किया था कि सारा मुनाफा तो दिन के अन्तिम घंटों में ही पैदा होता है !</strong></span> <span style="color:#0000ff;">वास्तव में काम के समय  हर पल मजदूर द्वारा  अतरिक्त मूल्य का सृजन  किया जा रहा होता </span>है. मार्क्स अतिरिक्त श्रम और आवश्यक श्रम में  अनुपात को  ( जो अतिरिक्त मूल्य और अस्थिर पूँजी के अनुपात की तरह ही होता है ) अतिरिक्त मूल्य की दर, या शोषण की दर (s/v).  कहते हैं. निश्चित रूप से आवश्यक श्रम के मुकाबले अतिरिक्त श्रम के अनुपात को बढ़ाने में पूंजीपति का हित होता है. इसे सिरे चढाने के दो तरीके हैं. पहला, काम के दिन को ही बड़ा करके. इस प्रकार से पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य को निरपेक्ष बेशी/अतिरिक्त मूल्य या निरपेक्ष अधिशेष कहते हैं. दूसरा तरीका है आवश्यक श्रम के मुकाबले अतिरिक्त श्रम के अनुपात में बढोत्तरी  करना. इसे करने का सबसे जालिम तरीका उनकी मजदूरी में कटौती ( जिसे नियोक्ता कर सकें तो बिल्कुल करेंगे) करना है जिससे उनका जीवन स्तर गिर जाता है. इस प्रकार पैदा हुआ अतिरिक्त मूल्य सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य कहलाता है.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">जिन्स के मूल्य की परिभाष देते हुए </span></h2>
<p style="text-align:left;">पूंजीवादी उत्पादन की जटिलताओं का जींस के मूल्य पर क्या प्रभाव पड़ता है ? सूती वस्त्रों की  प्रत्येक इकाई के मूल्य में कच्चे माल का मूल्य, मशीनों के मूल्य का हस्तांतरण, श्रम-शक्ति का मूल्य या  जिन्स का मूल्य शामिल होता है = c+v+s, c यहाँ उत्पाद में हस्तांतरित कुल स्थिर पूँजी C का एक हिस्सा है . S/(C + V).  लाभ की दर है. <span style="color:#008000;"><strong>शुरू से लेकर अंत तक सामाजिक रूप से जरूरी श्रम का  इसमे निहित होना ही जिन्स का मूल्य निर्धारित करता है, न कि  इसके उपादान के केवल अन्तिम पड़ाव पर लगी हुई श्रम-शक्ति द्वारा इसका मूल्य निर्धारित होता है</strong></span>. <span style="color:#3366ff;">इसलिए यह कहना गलत है कि खेतिहर मजदूर भोजन पैदा करते हैं और कार बनाने वाले मजदूर कारें</span>. पूँजीवाद के अंतर्गत उत्पादन जिसमें सभी मजदूर  भाग लेते हैं एक सामाजिक प्रक्रिया है.  पूरे पूंजीपति वर्ग द्वारा पूरे मजदूर वर्ग का शोषण इस का एक महत्वपूर्ण परिणाम  है. <span style="color:#008000;"><em><strong>मजदूर अपने विशेष नियोक्ता द्वारा नहीं बल्कि पुरे पूंजीपति वर्ग द्वारा शोषित किया जाता है</strong></em></span>.</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">क्यों कीमत हमेशा मूल्य के बराबर नहीं  होती </span></h2>
<p>वस्तुओं के बारे में इतना सब कुछ कहने के बाद  कि पूंजीवाद के अधीन वस्तुएं निर्धारित अनुपात में अपने मूल्यों के अनुसार विनिमय करती हैं, यह कहना कि जिन्से अपने मूल्य पर नहीं बिकती हैं, आश्चर्य चकित कर सकता है. लेकिन वास्तव में मामला यही है. इस वजह से यह समझना महत्वपूर्ण है कि श्रम सिद्धांत कीमत का केवल  मात्र सिद्धांत नहीं  है. कीमत और मूल्य में अन्तर कैसे  हो सकता  है, को जानने के लिए दो आसान कारण हैं. कीमतें में उतार चढाव  मांग और पूर्ति के कारण हो सकता है और एकाधिकार में वस्तु अपने मूल्य के ऊपर बिकेगी (या  सब्सिडी के कारण अपने मूल्य से नीचे). तीसरा कारण और अधिक जटिल है लेकिन पता  होना चाहिए अगर हम पूँजीवाद के नमूदार कामकाज को समझना चाहते हैं, उदाहरणार्थ व्यवसाय के मूल्य निर्धारण की नीतियों के पीछे क्या है ? जो लोग कीमतों का फ़ैसला करते हैं वे मूल्यों के बारे में कुछ नहीं जानते होते और न ही उन्हें इसकी जरूरत होती है. फ़िर वे क्या करते हैं ?<br />
हमने  देखा  कि लगी हुई पूँजी को स्थिर और अस्थिर में विभाजित किया जा सकता है और यह अस्थिर पूँजी ही  होती है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करने के वास्ते <span style="color:#008000;"><strong>बढ़</strong></span> जाती है. मार्क्स के अनुसार अनुपात C/V  <span style="color:#008000;"><strong>पूंजी की जैविक संरचना  है.</strong></span> सभी उद्योगों में शोषण (s / v) की इसी दर को देखते हुए, अगर सभी जिन्सों को उनकी कीमत पर बेचा जाए तो इसका अर्थ होगा कि तकनिकी रूप से पिछडे  और उद्योगों के  गहन-श्रमिक वाले क्षत्रों में इसकी दर सबसे ऊँची होगी. क्या ऐसा होता है ?<span style="color:#ff0000;"><strong> बिल्कुल नहीं !</strong></span> पूँजी के लिए कम या ज्यादा होने की बजाय दर वही रहती है चाहे यह कहीं भी निवेशित हो.<br />
लाभों  के औसत के साथ मूल्य के  श्रमिक सिद्धांत का किस प्रकार  समाधान किया जाए, ऐसी समस्या थी जिसने एडम स्मिथ और रिकार्डो को सबसे ज्यादा परेशान किया. लेकिन मार्क्स ने इसे एक ही सम्भव तरीके से हल कर दिया, <span style="color:#008000;">और वह इस अवमानना को छोड़ना था कि सभी जिन्से अपने मूल्यों पर बिकती हैं</span>. आलोचकों ने  मार्क्स के इसी काम में "बड़ा  विरोधाभास" देखा<span style="color:#339966;"> लेकिन इसका कुछ भी अर्थ नहीं है</span>. जैसा कि हमने  पूंजीवादी उत्पादन और संचालन में  देखा है कि यह एक सामाजिक प्रक्रिया है: व्यक्तिगत रूप से पूंजीपति द्वारा अपने मजदूरों का ही शोषण नहीं होता बल्कि सारा पूंजीपति वर्ग सारे श्रमिक वर्ग का  मिलकर शोषण करता है. प्रत्येक पूंजीपति बहूत से मजदूर रखता है जो बहुत सारा अधिशेष कमाते/ पैदा करते हैं. अधिशेष व्यक्तिगत रूप से किसी एक अकेले पूंजीपति के पास न जाकर एक पूल में चली जाती है जहाँ यह अन्य अतिरिक्त मूल्यों में मिलकर प्रत्येक पूंजीपति द्वारा निवेशित अनुपात के अनुसार (पूंजीपतियों में) बँट जाती है. <span style="color:#008000;"><strong>(यही कारण है कि क्यों एक पूर्ण  स्वचालित फैक्ट्री  भी मुनाफा कमा रही होती है)</strong></span>. इसके कारण  कीमतों पर पड़ने वाले प्रभाव की कल्पना करें. मान लीजिए s/v 100 प्रतिशत है और विभिन्न  जैविक संरचनाओं  वाले तीन सेक्टर हैं.<br />
.CVC मुनाफे की  दर का मूल्य ABC<br />
औसत रहित लाभों   के साथ B सबसे ज्यादा मुनाफे वाला सेक्टर है, लेकिन औसत निकालते हुए हम पाते हैं कि:<br />
CVC मुनाफा मूल्य कीमत A 140 मूल्य से अधिक  B 140 मूल्य से नीचे  C 140 मूल्य पर<br />
मार्क्स इसी को विक्रय  मूल्य कहते हैं, जो की लागत से जमा <span style="color:#008000;"><strong>मुनाफे  की दर की औसत से पैदा हुई उत्पादन की कीमत है.</strong></span> बिल्कुल इसी तरह व्यापर चलते हैं और अकादमिक अर्थशात्रियों द्वारा <span style="color:#ff0000;">(जो कि व्यापारियों के द्रष्टिकोण से केवल घटनाओं को ही लेते हैं)</span> इस तरह माना जाता है.  लेकिन वो बात नहीं है. ऐसा कहना हवा में बात करना होगा कि कीमत खर्च जमा "सामान्य मुनाफे" पर निर्धारित होती है, <span style="color:#ff0000;">लेकिन सामान्य मुनाफा है क्या ? रिवाज द्वारा लागू की गई कोई चीज़ !</span> केवल यही है जो दिखाई देता है.श्रम पर आधारित मूल्य और अतिरिक्त मूल्य के कारण  केवल मूल्य का श्रम-सिद्धांत ही प्रयाप्त रूप से विश्लेषण कर सकता है कि क्यों मुनाफे की सामान्य दर , कहने के लिए, 10 है बजाय 15 के.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार]]></title>
<link>http://samajvad.wordpress.com/?p=457</link>
<pubDate>Mon, 06 Oct 2008 11:21:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>विचारमंच</dc:creator>
<guid>http://samajvad.hi.wordpress.com/2008/10/06/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%8f-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#008000;">(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)</span><a href="http://samajvad.files.wordpress.com/2008/10/marx-to-communist-league2.jpg"><img class="alignnone size-medium wp-image-460" title="marx-to-communist-league2" src="http://samajvad.wordpress.com/files/2008/10/marx-to-communist-league2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="177" /></a></h3>
<p style="text-align:left;"><span style="color:#0d51f1;">1.   नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन---- महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर<br />
2.   कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष<br />
3.   सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यक्तिवाद, अराजकतावाद, उदारतावाद का विरोध करो!<br />
4.   "वामपंथी" कलावाद, रूपवाद, और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!<br />
5.   कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृतियों का विरोध करो!<br />
6.   धार्मिक कट्टरपंथी फासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रांतिकारी रणनीति अपनाओ!<br />
7.   दलित प्रशन पर सही रुख अपनाओ!<br />
8.   स्त्री प्रशन पर सही रुख अपनाओ!<br />
9.   कला-साहित्य-संस्कृति में 'लोकवाद" और "स्वदेशीवाद"  का विरोध करो!<br />
10.  न तो इतिहास ग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!<br />
11.  सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न<br />
12.  सांस्कृतिक मोर्चे पर जन-दिशा का सवाल-- 'जनता के बीच जाओ, जनता से सीखो! जन-जीवन और सामाजिक संबंधों का गहन-गहरा-व्यापक अध्ययन करो!<br />
13.  सांस्कृतिक मोर्चे पर नई भरती करो&#124; मध्यवर्ग के बीच से ही नहीं, मजदूर वर्ग के बीच से भी!<br />
14.  कलात्मक स्तर और लोकप्रियता के द्वंद्वात्मक संबंधों के बारे में<br />
15.  पूंजीवादी संस्कृति उद्योग के विरुद्ध जवाबी कारवाई के तौर पर एक व्यापक, बहुमुखी सांस्कृतिक जन-अभियान संगठित करना होगा!</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[किसानों के लिए लाभकारी मूल्य और मुख्यधारा के कम्युनिस्ट ]]></title>
<link>http://samajvad.wordpress.com/2008/10/04/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82/</link>
<pubDate>Fri, 03 Oct 2008 20:15:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>विचारमंच</dc:creator>
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<description><![CDATA[(कई दिनों तक इन्टरनेट पर सर्फिंग करने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>(कई दिनों तक इन्टरनेट पर सर्फिंग करने के बाद यह तथ्य तो उजागर हो गया कि मेहनतकश वर्ग की वकालत करने वाले मुख्यधारा के  ये 'कम्युनिस्ट' जो अपनी-अपनी इन्टरनेट-साईटों पर रोजाना हजारों की संख्या में पन्ने तो काले करते हैं,लेकिन  आज तक इन्होने (कम्युनिस्ट क्लासिक्स तो दूर)  मार्क्स-एंगेल्ज़ द्वारा रचित 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' तक को क्षेत्रीय भाषाओँ में की तो बात ही छोड़ दें, हिन्दी भाषा में भी प्रकाशित करना गवारा क्यों नहीं समझा. लेकिन, भाषा की बिल्कुल सरल शैली में लिखित सुखविंदर के इस लेख से मार्क्स के अधिशेष/या अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की व्याख्या ने मुख्यधारा के कम्युनिस्टों की नीतिओं और अवसरवादिता का पर्दाफाश कर दिया. इन संशोधनवादी और लेफ्ट-विंग कम्युनिज्म के शिकार कम्युनिस्टों  से किसी भी प्रकार की उम्मीद न करते हुए,अन्य कार्यों के अतिरिक्त, नव सर्वहारा पुनर्जागरण और नव सर्वहारा प्रबोधन के इस काल में सर्वहारा  के सच्चे सेवकों के कन्धों से कन्धा मिलाते हुए मार्क्सवाद को सर्वहारा के बीच ले जाने के  कार्यभार में हम भी अपने आप को  सम्मलित समझते है. इसी सिलसिले को आगे बढाते हुए हम सुखविंदर के लेख को इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहे हैं--शहीद भगत सिंह विचार मंच के सदस्यों द्वारा)</p>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#ff0000;">पंजाब  का किसान आन्दोलन और कम्युनिस्ट--सुखविंदर</span></h2>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#33cccc;">दायित्वबोध के 2005,जुलाई-सितम्बर  से साभार </span></h3>
<p>यूँ तो हरित क्रांति के सभी इलाकों की ही यह खासियत रही है कि वहां धनी किसानों के नेतृत्व में  किसानों का कोई-न-कोई आन्दोलन चलता ही रहता है, लेकिन पंजाब का किसान आन्दोलन पिछले कुछ वर्षों से विशेष तौर से चर्चा का विषय बना हुआ है. यहाँ हमारी दिलचस्पी किसान आन्दोलन में कम  और<span style="color:#0000ff;"><strong> पंजाब के कम्युनिस्टों की इन आंदोलनों के प्रति पहुँच</strong></span> में ज़्यादा है. मालिक वर्गों की मांगो/मसलों/आंदोलनों के प्रति मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों की पहुँच (एप्रोच) क्या हो? आज एक बार फ़िर हमें इस प्रश्न के रूबरू होना पड़ रहा है.<br />
पंजाब में इन दिनों भी अलग-अलग इलाकों में कहीं ज़्यादा तो कहीं कम, किसान आन्दोलन हरकत में हैं. इस आन्दोलन का नेतृत्व सीपीआई, सीपीआई (एम्), सीपीएम से निकले पासला ग्रुप, और सीपीआई (एमएल) न्यू डेमोक्रेसी से संबधित किसान संगठन कर रहे हैं. इन किसान संगठनों  के आलावा भारतीय किसान यूनियन (एकता) के दोनों ग्रुप भी इस आन्दोलन में शामिल हैं,जिनका समर्थन और मार्गदर्शन पंजाबी में प्रकाशित पत्रिकाएं सुर्ख रेखा, दिशा, दोनों लाल तारा और लाल परचम कर रहे हैं, जो मजदूर वर्ग की वैज्ञानिक विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद विचारधारा  को मानने का दावा करते हैं और भारत में नव-जनवाद, समाजवाद और कम्युनिज्म स्थापित करने की बातें करते हैं.<br />
इन किसान संगठनों के आलावा पंजाब में कुछ और भी किसान संगठन सक्रिय हैं पर उनकी कार्रवाईयां इस लेख के  दायरे से बाहर हैं. उपरोक्त 'कम्युनिस्ट' किसान संगठनों द्वारा चलाये गए और चलाये जा रहे आन्दोलन की मुख्य मांगे इस प्रकार हैं :<br />
१. उत्पादों के लाभकारी मूल्य हासिल करना,<br />
२. कृषि लागतों पर सब्सिडी  हासिल करना,<br />
३. कृषि उत्पादों के लिए सुरक्षित मण्डी हासिल करना, और<br />
४. किसानों के कर्जे माफ़ करना.<br />
इसके आलावा और भी मांगे हो सकती हैं लेकिन हमारे लिए उनका ज्यादा महत्व नहीं.<br />
अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व और उपरोक्त पत्रिकाओं-पर्चों के समर्थन और मार्गदर्शन में उक्त मांगो पर चल रहे किसान आन्दोलन का मजदूर वर्ग के <span style="color:#0000ff;"><strong>विचारधारात्मक नज़रिए से विश्लेषण</strong></span> करना इस लेख का मुख्य मकसद है.<br />
जहाँ तक कृषि मालों गेहूं, धान, दूध आदि की कीमतों में बढोतरी की मांग का सवाल है, तो यह बात दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि यह मांग <span style="color:#0000ff;">मजदूर वर्ग के विरोध</span> में जाती है. हर प्रकार के मालिकाने से महरूम, कम मजदूरी पर मुश्किल से गुज़ारा करते मजदूरों को इन वस्तुओं की कीमत में बढोत्तरी की कीमत अपने जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी उपभोग या जिंदगी की ओर  बुनियादी ज़रूरतों में कटौती करके चुकानी पड़ती हैं. <span style="color:#f70729;"><strong>क्या कम्युनिस्टों को ऐसी मजदूर विरोधी मांगों पर चलने वाले आन्दोलनों का नेतृत्व, समर्थन या मार्गदर्शन करना चाहिए?</strong></span> और जो यह सब कर रहे हैं क्या वे मजदूर वर्ग के साथ <span style="color:#ff0000;"><strong>गद्दारी</strong></span> नहीं कर रहे? यह बात इतनी सीधी और सरल है कि इसकी ज्यादा व्याख्या की ज़रूरत नहीं.<br />
कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के विरोध  में है, वहीं यह मांग कृषि पूंजीपति या धनी किसानों के हक़ में है, क्योंकि, यही वह वर्ग है, जिसको कृषि मालों की कीमतों में बढोतरी का सबसे ज्यादा फायदा होता है.<br />
किसानी अलग-अलग परतों में बंटी हुई है. कृषि में हुए पूंजीवादी विकास ने इसके अच्छे-खास हिस्से को खेत-मजदूरों में बदल दिया है. मालिक किसानों की बड़ी संख्या गरीब और मध्यम किसानों की है. किसानी का यह हिस्सा खासकर गरीब किसानी आज पूँजी की मार  अधीन आ गई है. गरीब और मध्यम किसान अपनी ज़मीनें बेचकर सम्पत्तिहीन मजदूरों की कतारों में शामिल हो रहे हैं और यह प्रक्रिया दिन-बा-दिन तेज़ होती जा रही है.<br />
माल उत्पादक होने के चलते गरीब किसान भी अन्य  मालिक किसानों (धनी किसानों) के साथ ही अपनी वर्गीय नजदीकी महसूस करता है. उसको यह भ्रम होता है कि अगर उसकी फसल ( चाहे उसके पास बेचने के लिए बहुत अधिक फसल न हो) की ज्यादा कीमत मिले तो वह एक माल उत्पादक के रूप में बचा रह सकता है और किसी समय बड़ा मालिक भी बन सकता है. लाभकारी मूल्यों की लडाई में धनी किसान गरीब किसानों की इस मानसिकता का फायदा उठाते हैं. चूंकि मालिक किसानों का बड़ा हिस्सा गरीब किसानों और मध्यम किसानों का है इसलिए इनके, खासकर गरीब किसानों के समर्थन के बिना धनी किसान न तो अपनी लडाई लड़ सकते हैं और न ही जीत सकते हैं. इसलिए धनी किसान गरीब किसानों का मित्र होने का पाखण्ड करते हैं. धनी किसान कृषि लागतों में बढोतरी होने के कारण कृषि मालों के दामों में बढोतरी किए जाने की वकालत करते हैं. इस प्रकार वे गरीब किसानों को गुमराह करके अपने आन्दोलन में शामिल कर लेते हैं. इस प्रकार अगर कृषि मालों की कीमतें बढ़ जायें तो गरीब किसान के मुकाबले धनी किसानों के मुनाफे कई गुणा  बढ़ जाते हैं. विस्तृत पुनरुत्पादन करने वाला धनी किसानों का यह वर्ग इस बढे हुए मुनाफे को दोबारा कृषि में निवेश करता है. विस्तृत पुनरुत्पादन की एक शर्त यह भी है कि कृषि में लगी पूँजी में बढोतरी के साथ-साथ धनी किसानों के मालिकाने के अधीन ज़मीन में भी बढोतरी हो. इसलिए वह पहले से ही तबाही के कगार पर खड़े किसानों की ज़मीन खरीदकर उन्हें मजदूरों की कतारों में धकेल देते हैं. इसलिए गरीब किसानों के लिए लाभकारी मूल्यों की लडाई एक धोखा, एक छलावा ही साबित होती है.<br />
इस प्रकार देखा जाए तो कृषि उत्पादों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी है, वहीं छोटे किसान के साथ धोखा है और इस धोखाधडी भरे धंधे  में शामिल है यहाँ कम्युनिस्टों  का लेबल लगाई हुई पार्टियाँ और 'कम्युनिस्ट विचारधारा को समर्पित पत्रिकाएं' लेकिन लाभकारी मूल्यों का अभी और विश्लेषण बाकी है.</p>
<p>धनी किसान और उनकी समर्थक 'कम्युनिस्ट' पार्टियाँ और उपर जिक्र में आई पत्रिकाएं कृषि लागत बढ़ने से कृषि मालों की कीमतों में बढोत्तरी  की जो वकालत करती हैं उसकी चीरफाड़ भी जरूरी है. मार्क्सवादी अर्थशास्त्र बताता है कि किसी भी <span style="color:#ff0000;"><strong>माल की कीमत उसके मूल्य की ही मुद्रा के रूप में अभिव्यक्ति</strong></span> है. मूल्य का सारतत्व किसी माल के उत्पादन में खर्च हुआ श्रम-काल होता है. उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूंजीपति अपनी पूँजी को दो मदों पर खर्च करता है. एक मशीनरी, कच्चा माल आदि पर, पूँजी का यह  हिस्सा स्थिर पूँजी कहलाता है; दूसरा श्रम-शक्ति की खरीद पर, पूँजी का यह हिस्सा परिवर्तनशील पूँजी कहलाता है. <span style="color:#ff0000;">मशीनरी, कच्चा माल आदि भी चूंकि श्रम के ही उत्पाद होते हैं, इसलिए इसकी कीमत भी उनके उत्पादन के ऊपर खर्च हुए कुल श्रम-काल से ही तय होती है.</span> कच्चे माल पर जब श्रम-शक्ति कार्य करती है, तो कुल मूल्य में बढोत्तरी होती है. लेकिन कच्चा माल नए उत्पादित माल को सिर्फ़ उतने हीं मूल्य का हस्तांतरण कर सकता है, जितना उसमें पहले से ही मौजूद हो. यानी कच्चा माल कोई मूल्य पैदा नहीं करता. सिर्फ़ श्रम-शक्ति ही है जो नया मूल्य सृजित करती है. लेकिन पूँजी का मालिक श्रम-शक्ति के मालिक अर्थात मजदूर को उसके द्वारा सृजित कुल मूल्य का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा ही देता है, बाकी ख़ुद हड़प जाता है. पूँजी का मालिक इस माल को इसमें जोड़े गए मूल्य के ऊपर बेचकर ही मुनाफा कमाता है. मार्क्स इसकी इस प्रकार व्याख्या करते हैं,<em><strong><span style="color:#33cccc;">" मान लीजिए कि श्रम का एक औसत घंटा 6 पेन्स के बराबर मूल्य में जुडा हुआ है, या श्रम के 12 औसत घंटों में 6 शिलिंग का</span></strong></em><a href="http://samajvad.files.wordpress.com/2008/10/marx.jpg"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-425" title="marx" src="http://samajvad.wordpress.com/files/2008/10/marx.jpg?w=65" alt="" width="65" height="96" /></a><em><strong><span style="color:#33cccc;"> मूल्य जुडा हुआ होता है. यह भी मान लीजिए कि श्रम का मूल्य 3 शिलिंग, या 6 घंटे के श्रम की उपज है. अब यदि किसी माल में लगे हुए कच्चे माल, मशीन आदि में 24 घंटे का औसत श्रम लगा है, तो उसका मूल्य 12 शिलिग़ होगा. इ