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	<title>कहानियाँ &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/कहानियाँ/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "कहानियाँ"</description>
	<pubDate>Sat, 06 Sep 2008 16:50:01 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मूल-मंत्र (कहानी) ]]></title>
<link>http://hindibharat.wordpress.com/?p=58</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 11:23:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>विजय-राज चौहान</dc:creator>
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<description><![CDATA[झींगा शेर तालाब  के किनारे काँस के झुं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><img class="alignright" style="float:right;" src="http://hindibharat.files.wordpress.com/2008/06/jackal.jpg" alt="" width="291" height="220" /><strong>झींगा</strong> शेर तालाब  के किनारे काँस के झुंडों के बीच में अपने भूखे बच्चों और पत्नी के साथ बैठा सूरज की मीठी धूप में ऊँघ रहा था &#124; इस समय उसकी आँखें बंद थी ओर वह अपने सुनहरे दिनों के सपनों में खोया हुआ था उसे अपनी जवानी के उन दिनों की याद आ रही थी जब वह खूब शक्तिशाली था उन दिनों का भी क्या रंग था ,क्या ताकत थी ,शरीर की चुस्ती ओर फुरती के आगे क्या मजाल थी कि कोई शिकार हाथों से निकल जाये &#124; अगर उसे दिन में दो तीन बार भी शिकार के पीछे दौड़ना पड़ता था तो वह तब भी नहीं थकता था &#124; लेकिन अब उम्र का तकाजा था कि अब उसे एक शिकार मरने के लिए भी तालाब के किनारे कई-कई घंटे इंतजार करना पड़ता था , ओर कभी तो पूरा दिन भी कोई शिकार नहीं मिलता था ओर भूखों ही सो जाना पड़ता था &#124; उसकी यह हालत बूढ़े हो जाने के कारण थी क्योंकि अब उसके शरीर की शक्ति अब क्षीण हो चुकी थी इसलिए वह अब तालाब के किनारे पानी पीने आए एक-आध कमजोर पशु को ही मार पता था ओर उसे उसी से ही अपने परिवार की भूख को शांत करना पड़ता था &#124;<br />
लेकिन आज सुबह से शाम होने को आयी , तो भी कोई शिकार दिखाई नहीं दिया था &#124;<br />
झींगा शेर की माँद से कुछ दूर पर ही शेरू नाम का एक गीदड़ भी अपनी पत्नी रानी ओर अपने दो बच्चों के साथ एक बिल में रहता था &#124;<br />
शेरू के परिवार का पेट भी काफी हद तक झींगा शेर के शिकार के ऊपर ही निर्भर करता था क्योंकि जब झींगा किसी शिकार की मार डालता था तो शेरू का परिवार भी बची झूठन को कई दिनों तक खाता था &#124;<br />
लेकिन आज शेरू के परिवार का भी भूख के मरे बूरा हाल हुआ जा रहा था &#124; लेकिन फ़िर भी वह अपने परिवार के साथ किसी शुभ घड़ी के इंतजार में, झींगे के ऊपर नजरे गडाये बैठा था &#124;<br />
आखिर जब सूरज छ्हेतिज में छूपने जा रहा था तो शुभ घड़ी आ पहुँची ओर एक दरियाई घोड़ों का झुंड तालाब किनारे आ पहुँचा &#124; झुंड को देखते ही दोनों परिवारों में खुशी ही लहर दौड़ गई , झींगे ने भी झुंड को देखते ही अपनी स्थिति को संभाला ओर खड़ा होकर कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई ली &#124; इसके बाद उसने हाथ पैरो को झटका ओर किसी पहलवान की तरह से आगे पीछे किया &#124; इसके बाद उसने मूल-मन्त्र करने के लिए अपनी पत्नी को पास बुलाया जिससे झींगे के शरीर में एक उतेजना पैदा हो गई &#124;<br />
उसने अपनी पूछ को कमर पर मोड़ा ओर आखे लाल की, फिर उसने अपनी पत्नी से पूछा-<br />
-"देखो तो जरा मेरी पूछ मुंड कर पीठ पर आ गई हैंया नही"<br />
शेरनी ने कहा -"हां स्वामी आप तो प्रचंड योद्धा की तरह से लग रहे हो "<br />
इसके बाद झींगे ने पूछा-<br />
-"मेरी आँखें कैसी लग रही हैं"<br />
शेरनी ने कहा -"स्वामी आप की आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मनो कोई ज्वालामुखी लावा उगल रहा हो "<br />
झींगे ने इतना सुना तो वह पूर्ण रूप से उतेजित हो गया ओर उसने तूफान की गति से दौड़ कर एक ही झटके में एक कमजोर से दिखाई देने वाले दरियाई घोड़े को मार गिराया जिसे वह खींचकर अपने झुंड में ले आया &#124;<br />
इसके बाद पूरे परिवार ने व्रत तोड़ा ओर खूब डट कर खाया ओर फिर पेट पारा हाथ फिराते हुए अपनी माँद की तरफ़ चल पड़े &#124;<br />
झींगा शेर ने जब से शिकार किया तब से ही शेरू गीदड़ का परिवार भी उन पर आँखें गडाये बैठा था ,झींगे का परिवार पातळ से उठ कर चला तो शेरू झूठी पातळ को साफ़ करने के लिए उसकी तरफ़ दोडा ओर वह भी अपने परिवार सहित अपनी भूख मिटाने में जुट गया &#124;<br />
परिवार के सभी सदस्य झूठन को खा रहैंथे लेकिन शेरू की पत्नी रानी  के मन में सुबह से व्रत करते-करते कुछ प्रश्न जमा हो रहे थे, जिन्हें पूछने का वह मोका तलाश रही थी &#124;<br />
आख़िर उसने भोजन करते-करते शेरू से पूछा -<br />
-"स्वामी आख़िर हम कब तक दूसरों का झूठा खाते रहेंगे ,किया हम अपने लिए ख़ुद शिकार नहीं कर सकते "<br />
शेरू ने रानी के ये वाक्य सुने तो मुँह चलते हुए बोला -<br />
-"अरे जब तक मिलता हैंतब तक खाओ, आगे की आगे संचेंगे "<br />
रानी त्योरिया चढाते हुए बोली -"नहीं आगे न खायेगे,तुम भी तो जवान हो,झींगा बूढ़ा हो चुका हैं लेकिन अब भी शिकार करता हैं किया तुम नहीं कर सकते "<br />
रानी की इस बात पर शेरू चुप रहा,कुछ न बोला &#124;<br />
उधर रानी ने पेट भर खाया ओर बच्चों को को लेकर अपने बिल में जा लेटी &#124; शेरू वही झूठन चाटता रहा लेकिन रानी फ़िर उसके साथ न बोली &#124;<br />
शेरू की झूठन ख़त्म हुई तो वह भी बिल की तरफ चला ,लेकिन उदास क़दमों से &#124; उसे वास्तव में रानी ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था वह जाकर बिल में लेट जाता हैंलेकिन उसे नींद नहीं आती, वह सोच रहा था आख़िर झींगा इतना बड़ा शिकार कैसे मार लेता हैं, ऐसी कोन सी शक्ति हैंउसके पास जो उसमें बूढ़ा होने पर भी इतना जोश ओर ताकत पैदा कर देती हैं &#124;<br />
शेरू इन्ही विचारों में काफी देर तक उलझा रहा ओर यह सोच कर सोया की कल झींगे शेर की जासूसी करता हूँ ओर देखता हूँ की ऐसी कोन सी शक्ति हैं जो उसमें इतना जोश बार देती हैं&#124; इतना सोच कर शेरू गीदड़ निश्चित होकर सो गया &#124;<br />
अगले दिन शेरू जल्दी जाग गया, उसने बिल से बहार मुह निकल कर देखा तो अभी काफी अँधेरा था, ओर पाला पड़ने के कारण काफी ठंड थी &#124; लेकिन उसने उसकी परवाह नहीं की ओर वह अपनी पत्नी ओर बच्चों के उठने से पहले ही झींगे शेर की माँद की तरफ चल दिया ओर जाकर एक काँस के झुंड के पीछे छिप कर बैठ गया &#124;<br />
झींगा शेर अभी जागा न था, कुछ देर बाद सूरज की मीठी धूप चारो ओर फैली तो झींगा अपनी मांद से बहार आया ओर उसने कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई तोड़ी ओर फिर जाकर धूप में बैठ गया &#124; इसके बाद उसके बच्चे ओर शेरनी जागी वे भी मांद से बहार आये ओर धूप में बैठ कर उंगने लगे, ओर झींगा अपनी उसी तलास में लग गया कि कब शिकार आये ओर कब वह उसे मार कर अपने आज के भोजन का इंतजाम करे &#124;<br />
काँस के झुंड के पीछे छिपा शेरू झींगे शेर कि इस सारी दिनचर्या बड़े ध्यान से देख रहा था ओर इस समय वह झींगे के हर पैंतरे को बड़े ध्यान से सीख कर रहा था &#124;<br />
झींगा अपने परिवार के साथ धूप में बैठा था तो एक जंगली भैंसा पानी कि टोह में उधर से आ निकला, वह धीमे ओर टूटे क़दमों से चल रहा था देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शायद वह बीमार था ओर बीमारी में अपनी प्यास बुझाने तालाब किनारे आया था &#124;<br />
आख़िर जब झींगे ने जंगली भैंसे को देखा तो उसे सुबह-सुबह पै-बारह होते नजर आये ओर वह भैंसे को देखकर खड़ा हो गया &#124;<br />
झींगे शेर के खड़े होते ही शेरू गीदड़ के भी कान खड़े हो गये, उसकी एक आँख शिकार पर लगी हुई थी तो दूसरी आँख झींगे कि हर हरकत को बारीकी से देख रही थी &#124;<br />
ज्यों ही भैंसा तालाब में पानी पीने के लिए घुसा तो झींगे शेर ने अपना मूल-मंत्र पढ़ा &#124;<br />
वह पास बैठी शेरनी से बोला -"देखो तो जरा मेरी पूछ मुंड कर पीठ पर आ गई हैं या नहीं"<br />
शेरनी ने कहा -"हां स्वामी आप तो प्रचंड योद्धा की तरह से लग रहे हो "<br />
इसके बाद झींगे ने पूछा-<br />
-"मेरी आँखें कैसी लग रही हैं"<br />
शेरनी ने कहा -"स्वामी आप की आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मनो कोई ज्वालामुखी लावा उगल रहा हो "<br />
शेर ने इतना सुना तो वह पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गया ओर इससे पहले कि जंगली भैंसा पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता, झींगे शेर ने एक ही वार में तूफान कि गति से आगे बढ़कर भैंसे को धराशाई कर दिया ओर उसे खींचकर अपने झुंड में ले आया &#124;<br />
काँस के झुंड के पीछे छुपा शेरू गीदड़ झींगे की ये सारी हरकत देख रहा था उसने जब झींगे का मूल-मंत्र सुना तो खुशी से झूम उठा ओर खुशी को कारण जमीन में लोटपोट हो गया &#124; उसने भी आज शक्ति के उस मूल-मन्त्र को पा लिया था जिसे पढ़कर वह भी अधिक शक्तिशाली हो सकता था &#124; वह धूल से उठा ओर खुशी से कुचले भरता हुआ अपने बिल में जा घुसा &#124;<br />
शेरू की पत्नी रानी अब तक जग चुकी थी उसने शेरू को इतना खुश होते देखा तो बोली -<br />
"क्या बात हैं बड़े खुश नजर आ रहे हो,ऐसा सुबह-सुबह किया मिल गया जो तुम फूले नहीं समां रहे हो"<br />
शेरू बच्चों के पास बैठते हुए टांग पर टांग रखकर बोला -<br />
"तुम कहती थी ना में शिकार नही कर सकता ओर में डरपोक और भुज दिल हूँ,तो तुम झूठ बोलती थी,तुम नहीं जानती मेरे अन्दर कितनी शक्ति हैं,में चाँहू तो अच्छे से अच्छे बलशाली को धूल चटा सकता हूँ &#124;<br />
रानी त्योरिया चढाते हुए बोली - "रहने दो कभी किसी चूहे का शिकार तो किया नही,कहते हो बलशाली को धूल चटा सकता हूँ "<br />
शेरू रहस्यमय मुस्कान होठों पर लाते हुए बोला -"अरे तुम्हें किया पता ,जब में तुम्हें अपनी शक्ति दिखाऊंगा तब देखना दांतों तले उँगली दबा लोगी,तुम बस ऐसा कहना जैसा में कहता हूँ "&#124;<br />
रानी -"ठीक हैं कह दूंगी लेकिन कुछ कर के तो दिखाओ "&#124;<br />
इसके बाद शेरू का पूरा परिवार उठा और जाकर तालाब किनारे काँस के झुंड में छिपकर बैठ गया, और शेरू इस बात का इंतजार करने लगा की कब कोई शिकार आये और वह उसे अपने मूल-मंत्र से धराशायी करे &#124;<br />
शेरू को अपने परिवार सहित काँस में छुपे-छुपे शाम हो गई थी &#124; सूरज अब डूबने ही वाला था लेकिन शेरू को अब तक कोई ऐसा शिकार दिखाई नहीं दिया था जिस पर वह अपना मूल-मंत्र आजमा सके &#124;<br />
आखिर जब शाम होने को आयी तो दरयाई-घोडो का वही झुंड जो कल आया था तलब किनारे पानी पीने आ पंहुचा &#124; जिसे देखते ही शेरू गीदड़ के मुह में पानी भर आया और उसके पैरो में खुजली होने लगी और ज्यो ही घोडो का झुंड तालाब में पानी पीने घुसा तो शेरू खड़ा हो गया &#124; उसने भी अपनी कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई तोडी और अपनी पत्नी रानी से मूल-मंत्र पढ़ते हुए बोला -<br />
"देखो तो जरा मेरी पूछ मुड़कर पीठ पर आ गई हे या नहीं " &#124;<br />
रानी -"हाँ स्वामी आप तो इस समय एक प्रकांड योद्धा की तरह लग रहे हो" &#124;<br />
शेरू आँखें निकलते हुए -"और मेरी आँखें तो देखो लाल हुई या नहीं " &#124;<br />
रानी -"हाँ स्वामी आपकी तो इस समय ऐसी लग रही हे मनो ज्वालामुखी लावा उगल रहा हो" &#124;<br />
शेरू ने इतना सुना तो वास्तव में उसे अपने अन्दर एक शक्ति सी जान पड़ी &#124; वह तेजी से काँस के झुंड के ऊपर से कूदते हुए किसी तूफान की तरह से एक दरियाई घोड़े पर कूद पड़ा &#124;लेकिन ज्योंही शेरू ने घोड़े की पिछली टांग में अपने दांत गाड़ ने चाहे तो घोड़े ने अपनी शक्तिशाली दुल्लती से शेरू को काँस के झुंडों  के ऊपर से दर्जनों मीटर दूर फेक दिया, जिसके कारण जमीन पर पड़ते ही शेरू का मुंह जमीन में चार-पाँच अंगुल नीचे धस गया &#124;<br />
उसकी लाल ज्वालामुखी आँखें धूल मिट्टी के कारण सूखे कुए की तरह से रूँध गई और उनका लाल रंग भी पीला-पीला सा दिखाई देने लगा &#124; इसके आलावा उसकी धनुष रूपी पूँछ भी टूटकर नीचे को मुड़ती हुई किसी पिटी भिखारिन की भांति दोनों टाँगों के बीच में छुप गई &#124;<br />
इतना सब होने के बाद शेरू अपनी टूटी टांग से खड़ा हुआ और किसी पैर बंधे ख़च्चर की भांति लंगड़ता हुआ अपने बिल की तरफ़ चल दिया &#124;<br />
शेरू की महेरिया रानी अपने बच्चों के साथ इस समय दूर से अपने स्वामी की इस वीरता को देख रही थी &#124;<br />
लेकिन जब उसने स्वामी को स्वादिष्ट शिकार की जगह जंगली धूल खाते देखा तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह खबर लेने के लिए अपने स्वामी की तरफ़ दोड़ी &#124; एक बार रानी डर गई थी लेकिन अगले ही पल शेरू की हालत पर रानी हँस पड़ी उसने ्र की इतनी बुरी हालत आज से पहले कभी नहीं देखी थी &#124;<br />
शेरू ने जब पत्नी के द्वारा उपहास होते देखा तो वह जल उठा और वह रानी हो जलती आँखों से देखते हुए अपने बिल की दीवार के पास बैठ कर अपनी टांग के दर्द को जीब से चाटने लगा &#124; लेकिन रानी को अब भी अपने स्वामी की इस मूर्खता भरी वीरता पर हँसी आ रही थी और वह हँसी के कर्ण मिट्टी में लोट-पोट थी &#124;</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-विजय-राज चौहान</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह यादें तो ऐसी हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=766</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 16:22:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=766</guid>
<description><![CDATA[यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं<br />
जब तक अंधेरे में चलते रहे<br />
तब तक हम दोनों साथ नहीं<br />
जहाँ उजालों की ओर मुड़े<br />
फिर से मेरे दिल पर आयीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें वह तो नहीं<br />
जिनको काग़ज़ पर लिखकर मिटा दें<br />
यह वह लम्हे तो नहीं<br />
जिनको कहानियाँ समझकर भुला दें</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं<br />
जब तक अंधेरे में चलते रहे<br />
तब तक हम दोनों साथ नहीं<br />
जहाँ उजालों की ओर मुड़े<br />
फिर से मेरे दिल पर छायीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह वह चाँद तो नहीं<br />
जिनको काले बादलों की शालें उढ़ा दें<br />
यह वह पंक्षी तो नहीं<br />
जिनको दिल-क़ैद के पिंजड़े से उड़ा दें</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं<br />
जब तक अंधेरे में चलते रहे<br />
तब तक हम दोनों साथ नहीं<br />
जहाँ उजालों की ओर मुड़े<br />
फिर से मेरे दिल पर आयीं</font></p>
<p><font color="#000000">यह वह फ़िज़ा की हवाएँ हैं<br />
आठों पहर जो दिल में आएँ-जाएँ<br />
यह बिन बादलों के<br />
आकाश के घट से पानी छलकाएँ</font></p>
<p><font color="#000000">यह यादें तो ऐसी हैं जैसे मेरी परछाईं</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कब कहाँ रुकें, कब तक चलें]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=762</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 07:12:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=762</guid>
<description><![CDATA[कब कहाँ रुकें, कब तक चलें
ठहर जायें जहा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">कब कहाँ रुकें, कब तक चलें<br />
ठहर जायें जहाँ दो पल के लिए<br />
वह मंज़िल है कहाँ? तुम जहाँ<br />
कहानियाँ कहती हों वादियाँ<br />
हर लम्हा रोशन हो प्यार से<br />
जिसको चाहें उसका दीदार मिले</font></p>
<p><font color="#000000">कब कहाँ रुकें, कब तक चलें<br />
ठहर जायें जहाँ दो पल के लिए<br />
वह मंज़िल है कहाँ? तुम जहाँ<br />
ख़ुशियाँ हो दिल में सारे जहाँ की<br />
चाहें जो दिल से वह हमें मिले<br />
पूरे हों सभी अरमान दिल के...</font></p>
<p><font color="#000000">कब कहाँ रुकें, कब तक चलें<br />
ठहर जायें जहाँ दो पल के लिए<br />
वह मंज़िल है कहाँ? तुम जहाँ<br />
जैसे वादे हैं वैसे ही इरादे हैं<br />
यही दुआ है दर्दे-दिल की<br />
जहाँ भी रुकें हम, वहाँ तू मिले</font></p>
<p><font color="#000000">आमीन, आमीन, आमीन, आमीन</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खैरुन की माँ]]></title>
<link>http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/09/01/%e0%a4%96%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81/</link>
<pubDate>Sat, 01 Sep 2007 19:37:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>Prem Piyush</dc:creator>
<guid>http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/09/01/%e0%a4%96%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81/</guid>
<description><![CDATA[पिछले पोस्ट में बिमला दीदी के बारे में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले पोस्ट में <a href="http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a5%80/" target="_blank">बिमला दीदी</a> के बारे में आपलोगों ने पढ़ा होगा तो, एक ऐसा ही दुसरा संस्मरण एक ऐसी महिला के लिए - जो हम भाई बहनों की परवरिश में मां का साथ निभायी । आज कारपोरेट जिंदगी से फुरसत के कुछ लम्हों में आज मिलवाता हूँ - मेरी खाला - "खैरुन की माँ" से ।</p>
<p>अभी शाम को माँ का फोन आया था । वह "खैरुन की माँ" के यहाँ से बोल रही थी कि और बता रही थी "खैरुन की माँ" मुझे याद करती है । वह शिकायत कर रही माँ को - कि मैं अबकी बार जब घर गया था तो उससे मिलने क्यों नहीं गया । फिर माँ ने अपना मोबाईल खैरुन की माँ के कानों से लगा दिया । मैने उससे बात कि और बताया कि - मैं उसे बराबर याद करता हूँ और कुछ दिन पहले तो और भी ज्यादा । वह कहने लगी - "अल्लाह बेटा .... " और नेटवर्क कट गया और मैं.... । मैनें फोन लगाने की कोशिश की पर नहीं लगा । दरअसल जिस दिन मैं बिमला दीदी के बारे में लिख रहा था तो खैरुन की माँ की भी याद आ रही थी ।</p>
<p>--------------------------------------</p>
<p>उन दिनों मैं शायद चौथी कक्षा में पढ़ता होऊँगा । पर पुरी तरह से याद है वह रविवार का दिन । "माँजी-माँजी कुछ भीख देना" - हर रविवार की तरह उसदिन भी भिखारी एक-एक कर आते और चले जाते । लंगरू और कालु जैसे सारे भिखारी हमारे दरवाजे पर नियमित आते थे । हमारे यहाँ भिखारियों को ज्यादतर समय चावल देते है । एक भिखारिन भी हमेशा आती थी । उस दिन उस भिखारिन के साथ एक दूसरी साँवली - दुबली पतली भिखारिन आ गयी थी । उसकी उम्र होगी कोई 35 साल । चुँकि उस दिन दो भिखारिन थी - माँ प्लेट में दुगुना चावल लेकर निकली । और उस नये भिखारिन के आँचल में भीख देने जब वह सामने गयी तो माँ का मन नहीं माना कह ही दिया । वह बहुत गरीब लग रही थी पर वेष-भुषा से भिखारी नहीं ।</p>
<p>"इतना अच्छा देह है, कुछ काम-वाम क्यों नहीं खोजती ?" - माँ पुछ ली ।</p>
<p>वह चुप रही । माँ ने फिर दूहराया ।</p>
<p>"कौन देगा काम मुझे" - वह भिखारिन बोल पड़ी</p>
<p>"कुछ भी कर सकती हो - काम की कमी रहती है क्या ? " - माँ कहने लगी -  "कब से भीख माँग रही है ?"</p>
<p>"आज ही पहली बार निकली हूँ । " - वह कह पड़ी ।</p>
<p>"हमारे यहाँ काम करोगी ? " -   माँ पुछ बैठी ।</p>
<p>उसने सिर हिलायी । उसका इतना हाँ के इशारे में सिर हिलाना था उसे भीख नहीं मिली । और हमेशा वाली भिखारिन को उस दिन इसके हिस्से का भी चावल मिल गया ।</p>
<p>माँ ने उस महिला को वहीं रोक लिया । उसके पोटली में पिछले कई घरों के माँगे चावल पड़े थे ।</p>
<p>उस महिला के गाल पिचके से थे ।  साड़ी -चोली और कपड़ा से पुरा माथा ढँका - वह मुसलमान थी । पुछने से पता चला कि दो बेटे हैं उसके । बड़ा बैटा - खैरुन दिल्ली में काम करता है - घर से उसका कोई लेना - देना नहीं । एक बेटा है तीन साल का । और एक बेटी है - 10 साल की कलुआनी । पति भी है उसका - पर दो महीने से लकुआ के कारण बिस्तर पर पड़ा है । घर में खाने के कुछ नहीं है । कभी मजदूरी नहीं की इसलिए उस दिन आ गयी भीख माँगने आ गयी उसके गाँव वाली के साथ । माँ का अनुमान गलत न था ।</p>
<p>माँ ने उसे रोक तो लिया था पर काम क्या करने को दे यह सोचकर मुश्किल में पड़ गयी । उसे कह तो दी की काम की कमी नहीं रहती है - पर अपने घर में इतनी जल्दी क्या काम दे मुश्किल में पड़ गयी । उस समय कपड़े धोना या बरतन माँजने या पोछा लगाने वाले काम का तो प्रश्न ही नहीं उठता था । एक काम निकल पड़ा - भुटिया सिलाई करना । भुटिया मतलब - हमारे यहाँ पुराने सुती साड़ी-धोती और चादर को कई तह बनाकर फिर रंगीन धागों से सीकर एक कंबल सा बनाया जाता है । यह काम हमारे यहाँ महिलाँए जानती है । माँ को तो आज भी घर में फाइलों से समय मिले तो भुटिया सिलाई करने बैठ जाती है ।</p>
<p>खैरुन की माँ को भुटिया सिलाई का काम दिया गया । उसकी मेहनताना तय हूई । वो पुरे दिन बरामदे पर बैठकर काम की । उसके खाने के लिए अलग एल्युमिनियम की थाली । उसकी पहनी साड़ी की हालत देखकर जाते समय माँ एक पुरानी साड़ी उसे दे दी और पोटली बनाकर दे दी घर में पकाने के लिए चावल-दाल ।<br />
माँ को उसका काम पसंद आया । काम करते समय उसने कह दिया कि वह माँ को उस दिन से दीदी  कहकर पुकारेगी । उसकी साफगोई और सीधापन माँ को छु गई - और मेरी माँ की सबसे बड़ी कमजोरी और जीने का आधार भी यही है । माँ भी क्या करती बेचारी - उसने भी जो बुला लिया था न उस दिन भिखारिन को घर में । खैरुन की माँ ने भुटिया में<br />
धागे क्या सीये - माँ के दिल में एकाध धागे जड़ दिए ।</p>
<p>अगले दिन उसे फिर बुलाया गया और वह करीब 4-5 बर्षों तक काम करती रही । जो भी घर का काम उसे कहा जाता लगन से करती रही । मेरे शैशव में अगर बिमला दीदी थी तो मेरे अनुज के लिए वह फुआ जैसी । गरीब होने से क्या हुआ उसकी सफाई पसंद के कारण वह सिर्फ रसोई के काम के सिवा काफी काम संभाल लेती थी ।</p>
<p>फिर बाद में खैरुन की माँ अब कम आती थी - सुनने में आया कि वह दुसरी महिलाओं के साथ किसी खान साहब के घर जाती है । वे लोग हमलोगों से ज्यादा मजुरी देते थे । हमें भी शिकायत नहीं रही - उसे दौ पैसे कहीं से ज्यादा मिल रहे थे । हाँ एक बात थी - कभी काम के लिए माँ उसे अगर कभी बुला लेती तो कभी ना नहीं करती ।</p>
<p>अपने बुते पर काफी कोशिशों के बाद वह जीत न पायी किस्मत से अपनी लड़ाई । उसके आँसु वर्षों पहले शायद भिखारी के चोले के अंदर ही दब गये थे । इसी बीच हमने देखा - उसे विधवा होते हूए । लकुआ से कमजोर उसका सौहर चल बसा । अभी वह कुछ संभल ही पाती की एक दिन सुनने में आया कि उसके छोटे बेटे के पैर में चोट लगा है । वह उसी भिखारन से खबर दिलवा भेजी । माँ ने देखने के लिए अमिय मामा को भेजा । सुनने मे आया उसके छोटे बेटे का बदन टेढ़ा हो रहा था फिर देखते-देखते 24 घंटे के अंदर टेटनस से उसका बेटा चल बसा ।</p>
<p>खैरुन माँ का वह पहला संतान है ना - सो उसे वर्षों से खैरुन की माँ के नाम से ही जानता आया हूँ । वह भुले भटके ही घर आता था वह बस नाम का रह गया - मेरी संस्मरण में नाम पाने के लिए ।</p>
<p>अब घर में बच रह गयी खैरुन की माँ और बेटी कलुआनी । इधर कलुआनी बड़ी हो गयी थी । उसकी शादी अकेली माँ के लिए सिर-दर्द था । उपर से झमेला दहेज का । देखने में कलुआनी बिलकुल काली, दुबली-पतली । और स्वभाव में कलुआनी स्वभाव से अपनी माँ से नहीं मिलती थी । वैसे खैरुन की माँ ने मेरी माँ से पहले ही कह दिया था कलुआनी की शादी के समय दान (दहेज) की तीन चीजों में कम से कम एक देकर मदद करे । दान की ये तीन चीजें उस स्तर के सब बेटी वालों को देना पड़ता है - साईकिल, घड़ी और बाजा मतलब रेडियो ।</p>
<p>कलुआनी जैसी भी थी - अपनी किस्मत लेकर जन्मी होगी । कितनी ही बार हमने सुनी कलुआनी के शादी के रिश्ते बनते और बिगड़ते । और हमारी आदत सी पड़ गयी थी - यह सब सुनते सुनते । पर एक दिन खैरुन की माँ खुशी-खुशी हमारे घर आयी और बताया माँ को कि कलुआनी की शादी पक्की हो गयी है । बुधवार को शादी तय हूई है । लड़का अपना रिक्सा चलाता है ।</p>
<p>पर उसकी खुशी के पीछे चिंता की रेखाएँ आज स्पष्ट थी । शादी-ब्याह में जब माँ को पिताजी का भी दायित्व, बेबस होकर निभाना पड़ता है तो - वह उसके लिए शायद काफी कष्टप्रद होता है । वह बता रही थी उस दिन जब वह दहेज के तीन समान के लिए कैसे सबके यहाँ सुबह से घुम रही थी । उसने कहा कि अली साहब घड़ी और खान साहब बाजा देना चाहते है । अब सबसे ज्यादा दाम वाला समान सिर्फ साईकिल बच गया है उसे आप दे देती तो..... कहते कहते वो मायूस हो गयी । शाम का समय था  - बरामदे पर माँ ने उसे चाय-पिलाई और उससे पुछा कि साईकिल के लिए रुपये दे दूँ या साईकिल बनवा दूँ । उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि माँ यूँ हाँ कर देगी । उसने कहा साईकिल ही बनवा दीजिए । चुँकि उसके घर में पहले से साईकिल खरीदकर रखने का मतलब चोरी का डर था इसलिए , मुझे बुलाकर माँ समझा दी की मंगलवार को नई साईकिल बनवाकर बुधवार को शादी के दिन ही उसके घर में सुबह दे आऊँ । खैरुन की माँ आश्वस्त होकर चली गयी ।</p>
<p>मैनें पता किया उस समय 1500 रुपये में अच्छी हीरो रायल साईकिल बन जाएगी । मंगलवार के रोज मै दोपहर को साईकिल की दुकान पैदल पहूँचा - क्योंकि आते समय नयी साईकिल में आना था ना  । बनवाने से पहले वहाँ जब कीमत जोड़ा जा रहा था दुकानदार ने बताया - पीछे का कैरियर कैसा चाहिए , सीट कवर, और दुसरे समान कैसे चाहिए । मैनें कहा - अच्छा वाला । फिर मैनें उसे समझाने के लिए कहा कि साईकिल दान में देना है । दुकान का स्टाफ हँसने लगा । वह कहने लगा - दान के साईकिल के लिए इतनी कीमत का समान क्यों लगा रहे है । उसने बताया कि लोग दान मे देने के लिए तो सस्ती वाली साईकिल बिना कैरियर, सीट कवर के ले जाते है । जिसे दान मिलेगा वह अपना कैरियर लगाएगा । उस समय इस बिन माँगी राय सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया था  । मेरा मन किया की बहूत सारा भाषण दे दूँ उसको - पर कुछ न कहा । मैने वहीं बैठकर साईकिल बनवाले लगा । टायर लगवाया नाईलन का, साईकिल की मैचिंग का गद्दे वाला सीट कवर और पहिये के अंदर का रंगीन फुल । जब साईकिल तैयार हो गयी तो मैनें उसके हैंडिल में झालर लगवाया । और सामने हैंडिल पर प्लास्टिक के गुलाब फुल । मेरी मन माफ़िक साईकिल तैयार हो गयी थी । नयी साईकिल की धंटी टनाटन बजती थी ।</p>
<p>बुधवार के दिन शादी रात को होनी थी । माँ मुझे दोपहर से ही पहले भेज दी - उसके घर सुबह साईकिल पहूँच जाएगी तो उसे तस्ल्ली हो जाएगी और कुछ अगर काम-वाम की जरूरत पड़े तो सहायता हो जाएगी ।</p>
<p>मैं नयी साईकिल उठाकर खाला के घर पहूँच गया । शादी का शामियाना देखकर मुझे आश्चर्य हुआ । एक छोटा तिरपाल टंगा था बस । आँगन की लिपाई सुबह में हुई होगी पर कहीं पानी पर फिसलते हुए पदचिन्ह तो कहीं पड़े हैं मुढ़ी के दाने । और कहीं लोट रहा है करीब आठ-दस महीने का नंगा बच्चा ।  उस गाँव में बुरके का प्रचलन नहीं था पर महिलाँए आँगन में सिर ढँककर काम कर रही थी । मैं नई साईकिल को सही जगह में रखने की मैं सोच ही रहा था । गाँव के नंग-धरंग बच्चे मेरे साईकिल के चारों ओर खड़े थे । एक बच्चा हैंडिल का झालर छुता तो दुसरा बच्चा उसे दुबारा छुते हूए पहले को फटकार लगाता ।</p>
<p>खैरुन की मां मेरे लिए क्या करे ना करे - परेशान सी हो गयी । क्या खाने को दे मुझे उसे समझ में नहीं आ रहा था । उसने चुनरी के कोने से गाँठ खोलकर पाँच रुपये का नोट निकालकर एक गाँव के बड़े लड़के को दी कि - जाकर मिठाई और नमकीन ले आए ।</p>
<p>लड़का थोड़ी देर के बाद लौटा - अब मेरे लिए स्टील का प्लेट तो खाला के घर का था यह तो पता नही पर उसके पास अभी चम्मच न था । बगलवाली से चम्मच माँग कर ले आयी । एक सस्ती लकड़ी का मेज और एक लकड़ी की कुर्सी भी मंगवा ली । मिठाई में छेना कम पर मैदा अधिक था - पर मुझे वह अच्छी लगी थी । उस नमकीन का स्वाद आजतक अंकल चिप्स में भी नहीं मिला । लेकिन उस नमकीन का नमक खाकर पता नहीं मुझे उसके प्रति कृतज्ञता भार बोध होने लगा । सोचा शादी का घर है कुछ करूँ - और कलुआनी बहन भी तो थी ।</p>
<p>मैं आँगन से बाहर खड़ा-खड़ा सब देख रहा था । वहाँ व्यवस्था में लगे किशोर लड़को से बात करने के बाद लगा कि रंगीन कागज के झालर काटने बाकी हैं । और क्या था - मैनें खैरुन की माँ से मांग ली रंगीन कागज । पर कैंची का पता नहीं - बगल वाले के यहाँ से एक मँगवायी तो पुरी तरह से भोथी । एक तो सस्ती वाली कागज फिर पानी काटने वाले उस कैंची से महीन झालर की डियाजन भी नहीं बनती थी । एकाध डिजाईन बनाने के बाद एक बेहतर कैंची आयी और हमनें फिर सारे झालर बनाये । लड़के कहीं से आटे की लेई बनाकर लाए और जहाँ- जहाँ बन पड़ा चिपकाते गये । अब लग रहा था - उस घर में शादी होने वाली है ।</p>
<p>करीब तीन बज गये थे और मुझे पैदल घर आना था । दोपहर को वहाँ भात खाने की व्यवस्था की न कोई संभावना थी और न ही कोई इच्छा भी हो रही थी । खैरुन की माँ को साईकिल की चाभी ठीक  से रखने के लिए कहा और मैं वापस घर आ गया । शादी के लिए रात में रहना हमलोगों के लिए संभव न था और शायद रहने से खैरुन की माँ को हमलोगों के खाने के लिए कुछ अलग व्यवस्था करनी पड़ती ।</p>
<p>घर आकर खाना खाया और रात में माँ को सब कहानी सुनाया । उसे खुशी हूई ।</p>
<p>शादी के कई दिन के बाद खैरुन की माँ फिर से काम पर आने लगी । अब उसकी उम्र काम करने सी नहीं थी - माँ कहती की खाना खाकर वह बस थोड़ा चावल साफ कर दे वही काफी है । पर पता नहीं उसकी आदत वही रही । खोज-खोजकर काम निकाल लेती ।</p>
<p>एक दिन खैरुन की माँ बात कम रही थी । पुछा मां नें - उसकी तबीयत ठीक तो है , कलुआनी ठीक तो है । उसने कहा सब ठीक है । पर वह रोक न सकी खुद को । आँखों में आँसु भरकर बोल दी -  साईकिल चोरी हो गयी है कलुआनी के ससुराल में । साईकिल चोरी - सुनकर मेरा तो हाथ-पैर जम गया । उसने बताया कुछ दिन पहले रेडियो - घड़ी चोरी हो गयी थी और आज रात साईकिल । हमलोगों ने पुछा कैसे । वह कह रही थी - उसका जमाई बता रहा था रात में कैसे हूई है पता नहीं ।</p>
<p>अब मुझे साईकिल की दुकान वाले आदमी की याद आ रही थी -  "दान के साईकिल के लिए इतनी कीमत का समान क्यों लगा रहे है  ...... दान मे देने के लिए तो सस्ती वाली साईकिल बिना कैरियर, सीट कवर के ले जाते है । "</p>
<p>माँ कलुआनी के ससुराल वालों को एकाध भला-बुरा सुनाकर उसे ढाँढस बँधायी । उसके हताश चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था टुट सी गयी लता माँ के सुखे टहनी से सहारा माँग रही हो ।</p>
<p>साईकिल चली गयी - पर खैरुन की माँ हमेशा की तरह उसी तरह रही । शायद ईश्वर उसकी सहनशीलता को देखकर ही उसे "खैरुन की माँ" बनाकर यहाँ भेजी । घर जाने से कोशिश करता हूँ एक बार मौका निकालकर उसे देख आऊँ । मुझे अचानक अपने घर पर देखकर खुशी से हमेशा उसके मुँह से निकलती है - "अल्लाह रे बेटा । कसे करे ओसलो ( कैसे आना हुआ ) "  ।</p>
<p>वह मुसलमान या "किस्मत की भिखारी" नहीं -  मेरी खाला है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक है मेरी बिमला दीदी]]></title>
<link>http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 23:11:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>Prem Piyush</dc:creator>
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<description><![CDATA[उस दिन 15 साल के बाद, करीब दिन के दस बजे, ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#003366">उस दिन 15 साल के बाद, करीब दिन के दस बजे, बहनों से राखी बँधवाकर अपनी गोरी, छोटी नाकवाली बिमला दीदी का याद आ रही थी । माँ से मैने कहा कि बिमला दीदी के यहाँ जाने का मन कर रहा है । माँ को आश्चर्य और खुशी दोनो हूई । उनसे पुछकर मैनें जल्दी से तैयार हो गया । जब जाने लगा तो माँ कहने लगी - रास्ते में मिठाई खरीद लेना । माँ मुझे एक राखी साथ में ले जाने को कही । मुझे अटपटा सा लगा । वह समझाने लगी - कि मैं अचानक जा रहा हूँ ना उसके गाँव में राखी नहीं भी मिल सकती है । हमारे घर पर कुछ राखियाँ हरेक बार बच जाती है - माँ उसमें से एक राखी चुनकर मेरे पाकेट में डाल दी । </font></p>
<p><font color="#003366">बिमला दीदी वह कोई 10-12 साल की रही होगी तब उसे उसकी, माँ हमारे घर में रख गयी थी । मैनें उसी के पास घुटने टेकना, और दूध-भात खाना सीखा था । फिर कुछ बरसों बाद जब मैं स्कुल जाने लगा था तो उसकी माँ फिर उसे हमारे यहाँ रख गयी थी - ताकि हमलोग शादी के लायक लड़का खोजकर शादी का प्रबंध कर सके । उसकी माँ किसी तरह से छोटी सी अपनी खेती और लोगों के यहाँ खेतों में मजदूरी करती थी ।</font></p>
<p><font color="#003366">मैनें साईकिल उठाई और चल पड़ा बेलगाछी । वैसे उस दिन सुबह भी बारिश हूई थी और आकाश में मेघ थे - सो छाता मैनें ले लिया  था। 15 साल के बाद भी वहाँ का सर्पीला रास्ता मुझे याद है । दो चीजें मैं जल्दी नहीं भुलता - चेहरे और रास्ते । पर बेलगाछी में कहाँ रहती है बिमला दीदी पता नहीं । पर खोज लूँगा मुझे विश्वास था । रास्ते में मिठाई खरीदी, आधा किलो रसगुल्ले - एक पालिथीन में । पालिथीन को डाल दिया साईकिल के हैंडिल पर । आधे रास्ते मैं पहूँचा था कि बारिश शुरू हो गयी । एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया ।</font></p>
<p><font color="#003366">अपनी मिठाई की पालिथीन ठीक कर ली । रास्ते में आस-पास गाँव भी नहीं दिख रहा था । कुछ देर रुकने के बाद मुझे लगा कि मैं समय बरबाद कर रहा हूँ । छाता खोलकर एक हाथ से साईकिल पकड़कर धीरे-धीरे साईकिल चलाने लगा । शायद इस तरह से कुछ दूर और निकल जाऊँ । </font></p>
<p><font color="#003366">रास्ते में कहीं कहीं पानी जमा हूआ था और उस रास्ते के मरम्मत की सुध किसी को नहीं रहती होगी । हाँ कहीं-कहीं कंक्रीट पत्थर के ढेर नजर आ जाते थे । अचानक रास्ते में किसी पत्थर पर ठोकर लगी और मैंनें छाता नीचे कर साईकिल संभालने की कोशिश की । संभल गया मैं, पर देखा मिठाई की पालिथीन फट गयी थी । उससे रस टपक रहा था । अब मिठाई को हैंडिल पर टाँगकर रखना संभव न था । अब उपर से बारिश एक हाथ में मिठाई की फटी पालिथीन, जिसे अब बस एक ठोकर लगी तो सारी मिठाई सड़क पर बिखर जाती । अब शहर से जा रहे मेरे से मेहमान का हालत क्या हूई होगी - समझ लिजीए । </font></p>
<p><font color="#003366">मुझे अब एक पालिथीन की जरूरत थी । फटे मिठाई की पालिथीन को मैने बायें हाथ से अपने सीने से लगाकर दुसरे हाथ से साईकिल चला रहा था । शायद एक किलोमीटर गया ही होऊँगा कि एक गाँव सा दिख रहा था । वहाँ तक पहूँचने से पहले पालिथीन के अंदर कई मिठाई टुट चुके थे । वह गाँव बेलगाछी नहीं था पर वहाँ रास्ते में एक पंसारी का दुकान दिखा । मैनें उनसे एक पालिथीन मांगी । दुकानदार मेरी फटी पालिथीन देखकर परिस्थिति समझ गया । उसने एक पालिथीन दी - और भी पतली सी । मैनें सोचा कि उनसे पुछा बेलगाछी कितना दूर है । 2 किलोमीटर - उसने कहा । मेरा मन हुआ एक और पालिथीन माँग लूँ । और बिना कोई सामान खरीदे माँग भी लिया । उसे मैनें सोचा कि उसे एकाध रुपये दे दूँ , फिर लगा कि कहीं रुपये देने से उसके स्वाभिमान को ठोकर न लगे । </font></p>
<p><font color="#003366">बारिश भी अब धीमी हो गई थी । लगता था धुप भी निकले वाला था । मैं अब पालिथीन को अपनी अँगुलियों में लटकाकर फिर दोनों हाथों से साईकिल चलाने लगा । मैं चलता रहा, रास्ते में कुछ लोग मिलते तो पुछ लेता और कितनी दूर है बेलगाछी । </font></p>
<p><font color="#003366">विमला दीदी माँ की प्यारी थी । किसी पर गुस्सा कैसे करते हैं - विमला दीदी को पता नहीं था । 1986 - विमला दीदी की शादी हो गयी । हमलोग पुरा परिवार जाकर उसकी शादी का प्रबंध किये थे । पालकी में उसकी विदाई के समय मैं भी रोया था - हाँ आँसु नहीं आये थे, जैसे अपनी बहन की विदाई में आई । </font></p>
<p><font color="#003366">पर मुझे पता था कि जीजाजी किसी बेकरी में काम करते थे । हमारे शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर बेलगाछी गाँव में शादी हूई थी उसकी । और उसकी शादी के बाद बहुभात में मैं उसके गाँव मामाजी के साथ गया था उसके बहूभात के दिन । दोनो की जोड़ी दो सीधे बैल की जोड़ी थी ।</font></p>
<p><font color="#003366">ऐसी ही बातें सोचते सोचते मैं पहूँच गया बेलगाछी के करीब । रमजान नदी के किनारे बेलगाछी का गाँव वही था - दिल मेरा पुरा गवाह दे रहा था । पर अब गाँव में पहूँचकर किससे कैसे पूछेंगे - बिमला दीदी के बारे में पता नहीं । वह मुझे पहचान पाएगी भी नहीं या मैं उसे पहचान पाऊँगा भी कि नहीं । </font></p>
<p><font color="#003366">अगर गाँव में प्रवेश से पहले किसी से बिमला दीदी के बारे में पुछ लूँ तो अच्छा रहेगा । मैं आगे बढ़ गया । दूर से दिख रहा था एक बट वृक्ष के नीचे कुछ महिलाएँ बैठी थी । निकट गया तो पता चला वो खेत के मजदूर है । पास में धान की रोपनी हो रही है । शायद दोपहर के खाने के लिए बैठी है । मै साईकिल से उतर कर उनकी ओर जाने लगा । सब महिलाएँ मेरी ओर देखने लगी । कैसे पूछूँ और किससे पूछूँ - एक अजीब सा उधेरबुन में था मैं । उनके सामने मुझे ऐसा लग रहा था कि सब महिलाओं के जिज्ञासु चेहरे मुझसे स्वाभाविक रूप से पुछ रहे थे - आप किसे खोज रहे हैं । मेरी नजरें बीच में बैठी एक महिला पर अटक गयी । गोरी सी, छोटी सी नाक । और उसकी आँखे मुझ पर । मुझे लगा कि वह बिमला दीदी जैसी लगती है । मैनें अपने को धिक्कारा - 15 साल के बाद ऐसे किसी मजदूर महिला के साथ बिमला दीदी को कैसे तुलना कर सकता हूँ । पर वह महिला मेरे तरफ देखे जा रही थी । मुझे लगा कि उन्हीं से पुछ लूँ ।वो अपने बगलवाली महिला से कुछ बात करने लगी - फिर अचानक कह उठी हमारे देशी भाषा में - "प्रेम नाकी" ( प्रेम हो क्या ) । </font></p>
<p><font color="#003366">"बिमला दीदी" - मैनें भी पुकार लिया । "भाई रे - भाई" - वह उठकर सामने आने लगी । सारे औरतें हम दोनों की और देखने लगी । मैनें साईकिल को स्टैंड लगाकर आगे बढ़कर उसके पैर छूए । वह बाकी महिलाओं को कहने लगी - जिस भाई की बात वह आज उनसे कर रही थी - वह मैं ही था । आज वह किसी को राखी नहीं पहनाई थी । कई साल पहले वह राखी लेकर हमारे घर आई थी और हम भाईयों को घर में नहीं पाकर चली गयी थी । वह दूसरे मजदूरों को कह दी कि वह घर जा रही है - वह अब नहीं आएगी । मैनें मिठाई की पालिथीन उसके हाथ में थमा दी । </font></p>
<p><font color="#003366">सब महिलाओं के चेहरे पर आश्चर्य का भाव और विमला दीदी के लिए खुशी का सागर । मैनें पुछा, वह मुझे कैसे पहचानी । उसने सरल शब्दों में मुझे चुप कर दिया - "जो मेरे सामने घुटने टेकने सीखा, खाना सीखा, उसे मैं नहीं पहचान सकूँ" । मैनें पुछा - वह यहाँ खेतों में क्या कर रही थी , चुकि मेरा विश्वास था कि वह शायद मजदूरों कि निगरानी के लिए आयी होगी । उसने बतायी - आजकल थोड़ा काम मिला है, कई दिन से वही कर रही थी । मेरी बिमला दीदी - खेत की मजदूर । जीजाजी किसी मिठाई के दुकान में आजकल काम करते हैं । </font></p>
<p><font color="#003366"> मैं उसके साथ उसके घर गया । देखा उसका दो घर , कच्चा सा । एक रसोईघर, कोने में । उसने सारा हाल कह सुनाया कैसे उसके दिन बीते । बीच में बगल की एक लड़की को बुला लाई खाना बनाने के लिए । और मुझे नास्ता परोसा - भूजे हूए चुरा दुकान से अभी खरीदी डालमोट और आलु की महीन भुजिया । </font></p>
<p><font color="#003366">और कह गयी बेटी को आँगन लेपने और खुद निकल गयी गाँव की और - अगर मैं गलत ना था तो कुछ खरीदने । वापस आकर नहाने गयी - और नयी सुती साड़ी पहनी, शायद शादी-विवाह में एकाध बार पहनी होगी और पुरानी मैंचिंग की ब्लाउज । बीच बीच में रसोई में जाकर कुछ कह आती । उसके आँगन में आज मेहमान आया है । </font></p>
<p><font color="#003366">उसने राखी की थाली सजाई - बरामदे पर - दुब, धान, पानी का लोटा - उसमे आम का पल्लव । टीका के लिए चंदन तो था नहीं थोड़ी सी कहीं की रखी अबीर । और थाली में एक कोने पर पड़ी थी - दीदी का खरीदा हुआ राखी - छोटा सा - शायद दो रुपये का होगा - फोम पर चमचमाते प्लास्टिक और लटकते नन्हें से धागे - पतले से  । बैठने के लिए लकड़ी की पिढि़या । मैं बैठ गया । मुझे याद थी कि मेरा पाकेट में घर से लायी राखी पड़ी है - पर मेरा मन हुआ कि मैं वही राखी पहनूँ । सस्ती वाली दीदी की । धान-दूब से मेरा आदर हुआ । हमारे यहाँ शुभ मुहूर्त में महिलाँए उलू ध्वनि देते है । उसने भी दी । अब वह राखी को उठाकर उलट पलट ही रही थी और बता रही थी - उसके गाँव में एक ही दुकान में राखी मिली । राखी के धागे इतने छोटे थे कि मेरी कलाई मे नहीं बँधते । वह अफसोस कर रही थी । मेरा मन नहीं माना - मैनें बता दिया कि माँ ने एक राखी भेजी है और निकालकर उसे दिखाया ।  शहर की डिजाईनर राखियाँ - उसके आँखों में एक चमक सी छा गयी । पर मैनें कहा कि, दीदी मुझे आप अपनी वाली राखी पहनाओ । लेकिन अच्छी राखी पाकर, वह अब अपनी राखी को अलगकर रख दी । वह कहने लगी, मामी ( मेरी माँ को वह मामी कहती है ) कितनी अच्छी है । मैं हमेशा कि तरह मान गया, कहानियों और कविताओं से परे महिलाओँ की कुछ भावनाएँ महिलाँए ही समझती है । </font></p>
<p><font color="#003366">हाँ एक कटोरे में मिठाई थी - मेरा लाई हूई । मुझे वह मिठाई खिलाने लगी - और अपने मुँह की अधकटी मिठाई मैनें भी उसे खिलाई । मैनें थाली में रख दिये सौ रुपये का नोट । शाय़द दो दिन की मजदूरी सी होगी । पर वह अधिकार से बोल पड़ी - भाई अगले बार साड़ी लुँगी । </font></p>
<p><font color="#003366">अब जब तक खाना पक रहा था । वह मुझे गाँव में सब संबंधी के घर घुमाने ले गयी । और बीच-बीच में बताती जाती - कैसे लोगों ने जमीन बँटवारे के समय जीजाजी के साथ बेमानी की । पर आश्चर्य मुझे लगा कि सबके साथ उसके व्यवहार अच्छे थे । सारे जगह पर वह भाई की बड़ाई करती और शो-मेन जैसा पेश करती जाती । चाय का पेशकश मुझसे पहले वही ठुकरा देती - पर वह अंडे के बारे में सबसे पुछ लेती । गाँव में अंडे दुसरों के घरों से खरदते हैं।  अंतिम मे एक घर पर चाय के लिए हां कह दी । और वहाँ से कुछ अंडे भी ले ली ।</font></p>
<p><font color="#003366">खाना बन गया था -मेहमान को अकेले नहीं खिलाना चाहिए इसलिए साथ में बैठा था उसका बेटा जो छठी में पढ़ता था । परोसा गया - मोटा चावल का भात, लकड़ी के चुल्हें पर पका मुँग का दाल, भिंडी की भुजिया , पटुए का साग, आलु-परवल की तरकारी और स्पेशल आईटम - अंडे का आमलेट । फिर भोजन समाप्ति पर वही मेरी  वाली मिठाई फिर से ।<br />
------------------<br />
<font color="#000080"> आज अभी रक्षा-बँधन का बर्ह्ममुहूर्त है । सुरज उगने में कई घंटे और बाकी है - पर बिमला दीदी के लिए यह रतजगा छोटा संस्मरण भी कम है । कल आफिस की कामों में उसे याद कर पाऊँ या ना कर पाऊँ, पर मुझे पता है -फिर कल दिन में शायद धान की खेतों में बहना - भाई को याद करेगी ।</font> </font></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[प्यासी पगली]]></title>
<link>http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/07/23/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 23 Jul 2007 19:49:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Prem Piyush</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह शुक्रवार का दिन, और कंपनी की टीम लंच-]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">वह शुक्रवार का दिन, और कंपनी की टीम लंच-पार्टी । क्या पियेंगे आप- मिनरल वाटर, सोडा वाटर या और कोई कोल्ड ड्रिंक ,  मीनू देखिये और बस आर्डर किजिए जनाब , चाहे तो फलेवर वाली लस्सी और बटर-मिल्क भी है ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">उस दिन दोपहर का खाना था इसलिए 'लाल-शरबत' का आयोजन नहीं था । वैसे मैं पीता नहीं हूँ पर मैनें देखा है यहाँ पर, सोमरस बिना पार्टी नहीं होती है यहाँ । फिर भी मस्त पार्टी हूई थी । चुँकि अबकी बार हमारे नियमित रेस्तराँ से ये अलग यह एक नया रेस्तराँ था, इसलिए स्वाद जीभ पर चिपक कर रह गया । करीब 35 जनों की हमारी टीम में हमलोग गये थे मस्त से रेस्तरां में । हँसी-मजाक और टेबल पर पिघल रहे थे आईसक्रीम पर लाल-लाल चेरी। उस दिन भी सभी ने जम-कर खाया-पीया ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">और पार्टी के बाद हमलोग वापस हो रहे थे । लौटते समय भी अपने कैब में मैं आने के समय के तरह ही नहीं बैठा था । ऐसे समय में मस्ती मुझे भाती है । कैब का JBL सराउंड साउंड सिस्टम इतना मस्त था कि चलती कैब में भी मैनें नाचने की कोई कसर न छोड़ी थी । आते समय खुब नाचा था - अपने दोस्तों के साथ । अबकी बार लौटती बार में भी पेट भरा होने पर भी थोड़ा थिरक तो जरुर सकता था ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">अभी थिड़कना मैनें शुरू ही किया था कि, ट्रैफिक पर कैब रुक गयी ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">खैर मेरा मन हूआ कि थोड़ा बाहर देखुँ । थोड़ा झुककर बाहर झाँककर देखा तो एक पानी का टैंकर का पीछे वाला हिस्सा दिखा । उसके पास घुम रही थी एक किशोरी लड़की - पगली सी। उमर होगी कोई 18-19 साल या और कम पता नहीं लगा मुझे। उसकी पतली सी काली सी देह पर, गंदे से सलवार-कमीज । पतली रस्सी सी मटमैली पीली चुनर कमर पर बँधी हूई ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">अब मेरे डांस वाले थिड़कते पैर - पता नहीं क्यों जम से गये । मैं देख रहा था, उस पगली की आँखों को । मुझे लगा वह कुछ खोज रही थी। शायद ढुँढ रही थी रास्ता या और कुछ । वह टैंकर के पीछे गयी । जहाँ टैंकर के पीछे से पानी नल से टपक रहा था, वहाँ वह खड़ी हो गयी । और जल्दी ही मेरी शंका दुर हो गयी ।  पता चला वह पगली नहीं थी - वह कान साफ करने के बड्स बेचने वाली थी । उसके हाथ में कुछ पैकट थे - कान साफ करने वाले सस्ते रंगीन बड्स के । जिसे शायद ट्रैफिक जाम में रुके कार के अधखुले खिड़कियों और हेलमेट से मुखड़े लगाये सभ्य लोगों को बेचती थी ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">पर उसके आँखों से साफ था कि  वह अभी वह बड्स खरीदने वाले ग्राहक नहीं ढुँढ रही थी । उसने अपने बड्स के पैकेट को झोले में जल्दी से डाल दी । टैंकर से पीछे वाले जिस नल से पानी की बुँदे टपक रहा था , वहाँ पर पानी निकलने वाले हैंडल को उसने थोड़ा घुमाया, और वहाँ से पानी की पतली सी धारा बहने लगी सड़क पर । वह अपने हाथों से चुल्लु बनाकर पानी की धारा गटक रही थी । लग रहा था, महीनों से प्यासी है वह । बता दूँ कि पानी मुफ्त में नहीं मिलता है यहाँ बंगलौर में - और वह टैंकर भी कहीं किसी के घर में पानी बेचने जा रहा होगा । पर उस दिन खुले सड़क पर, वह पी रही थी बेचे जाने वाली पानी - मुफ्त मे । पर वह पी रही थी चोरी-चोरी - सबके सामने । कहीं टैंकर का ड्राईवर या खलासी देख न ले - वह गटक रही थी पानी उस तपती दुपहरिया में । उसके सलवार पर पानी के छींटे गिर रहे थे । पानी पीकर उसने उस बहती धारा में अपनी बाहों को आधा धो लिया । उसकी कमीज का निचला किनारा भींज चुका था ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">हमारी कैब की खिड़की से सब लोग अब यह सब देख रहे थे । टैंकर के पीछे खड़ी थी - होंडा सीटी कार । उसकी काँच के पीछे से भी चार आँखें उसे देख रही थी । उसने अब उस पानी से जल्दी-जल्दी अपना चेहरा धो लिया -  थोड़ी साफ सी हो गयी थी अब वो । सारा कुछ  हो गया करीब 1-2 मिनट में । अब शायद उसका समय हो गया था । ट्रैफिक का जाम भी अब साफ हो सकता था। अब वह टैंकर का हैंडिल बंद करते-करते अपने पैर भी धो डाली । नल बंद होते ही पानी की धार रुक गयी । उसका काम हो गया था ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">इतनी सफाई से टैंकर का नल खोलना और बंद करने से साफ हो गया कि हमारी पगली ऐसे कामों की अभ्यस्त थी । अब धोये हूए भींगें सामने के बाल, भींगें सलवार-कमीज के छोर । प्यासी की तृष्णा बुझ चुकी थी । उसकी चेहरे पर एक तृपती सी आ गयी । अब जल्दी से दो बड्स के पैकेट निकाल कर सड़क के उस पार चली गयी । मुड़कर भी नहीं देखा टेंकर की ओर या मुझ लेखक को ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">वह मेरी आँखों के सामने से ओझल हो गयी थी पर - भींग गयी थी बहुत सी चीजें -  भींग गयी थी काली तपती सड़क, दो चार बुँदों से भींग गयी होगी - हमारी लंच-पार्टी की कैब की पहिए । भींग गयी होगी - एकाध पानी की छींटों से कार की बम्पर ।</span></p>
<p><span style="font-size:14px;color:#00008b;">ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती हरी हो गयी । चल पड़ी हमारी कैब । चल पड़ी टैंकर । चल पड़ी कार । और टैंकर के पीछे नल से पहले की तरह से टपक रहा था बुँद-बुँद पानी ।</span></p>
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<title><![CDATA[सड़क पर आम]]></title>
<link>http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/05/31/%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Thu, 31 May 2007 19:59:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>Prem Piyush</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज दिन के करीब 11 बज रहे थे ।  बंगलौर की स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:15px;">आज दिन के करीब 11 बज रहे थे ।  बंगलौर की सड़कों लोगों और गाड़ियों के हिसाब से संकड़ी दिखती थी । इन सड़कों जैसी रगों में दौड़ती थी - हमारी अर्थव्यवस्था की जान और रंगीन कारें,खचाखच भड़ी बसें, स्कुटी और मोटरसाइकिलों की पुरी जमात ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">इस तिराहे पर कोई लाल बत्ती नहीं थी पर चेहरे पर मास्क लगाकर खड़ा था - ट्रैफिक पुलिसवाला । लाल बत्ती और हरी बत्ती के ईशारे को उसके हाथों से समझने की जरुरत होती थी । ट्रैफिक ज़ाम का मतलब होता था - कोई आधी किलोमीटर तक गाड़ियों की लाईन । देखकर लगता था - एक का पुँछ पकड़े दुसरा तैयार है - दौड़ लगाने को ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">ऐसी ही गाड़ियों के लाइन में सबसे सामने खड़ा था - एक आमवाला । उसके ठेले पर भड़े परे थे - पीले पीले पके आम । काफी बड़े बड़े आम थे । शायद सुबह ही उसने करीने से सजाए रखे थे - पहाड़ की तरह । इन गाड़ियों और लोगों के बीच में सामने में खड़ा आम का ठेला एक बार तो सबकी नजरें जरुर अटकाता होगा । इस महीने आम की बिक्री  भी खुब होती होगी इसलिए आम सजे हुए थे - लगभग ठेले के अंतिम कोनों तक ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">उसके दाहिने बगल खड़ी थी एक हरे रंग की सुंदर सी बड़ी कार  । अंदर कार के अंदर बैठे लोग ए सी में म्युजिक सिस्टम सुन रहे होंगे । । कम से कम 50 हजार रुपये की मासिक कमाने वाला कारवाला और 5 हजार रुपये कमा लेने पर खुश होने वाला आमवाला । भारतीय अर्थव्यवस्था की सच्ची तस्वीर ।  ट्रैफिक जाम में दोनों अटक पड़े - खैर दोनों ही इंतजार कर रहे थे - टैफिक पुलिस की इशारे की । बस हाथ का इशारा होता तो दोनों दौड़ जाते ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">दुसरी और से गाड़िओं की काफी लंबी कतार खत्म हो गयी तब ट्रैफिक पुलिस वाला इधर की और इशारा करने ही वाला था गियर चेंज किया कार वाले और ठेले को थक्का देने के लिए तैयार आमवाला ।बायीं और खड़े नवयुवक अपनी मोटरसाईकिल स्टार्ट कर चुके थे ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">ट्रैफिक पुलिसवाले ने जाने के इशारा कर ही दिया - अचानक आमवाले के बाँयी और से निकल गया एक मोटरसाईकिल वाला । और आमवाला अपने ठेले को धक्का दे रहा था कि थोड़ी झटक लग गयी ठेले में । ठेले के सामने से करीब आठ - दस आम लुढ़क कर सड़क पर गिर गये कार के सामने । कारवाले ने एक्सीलेरेटर नहीं दबाया था पर बस कार के पहिये से बस एक फीट की दुरी पर कुछ आम थे ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">ठेलावाला झट से दौड़कर कार के सामने आ गया - चुनने लगा आम । एक आम को चुनकर हाथों से छाती पर अटकाया फिर दो आम चुनकर ठेले पर उसने रखा । फिर जल्दी से झुकाया सर कार के सामने फिर से चुनने के लिए । किसी तरह से उठा लिया उसने एक आम को - पर बढ़ने लगी कार की गति । अभी भी कई और आम  पड़े थे - नहीं रुकी कार । जैसे ही आमवाला ठेले पर आम रखा ही   था कि - काली सड़क पर काली टायरों ने आमों को पिचक दिया । कार निकल गयी और पिचका गई दो आमों को । अब भी आमवाला देख रहा था उन आमों को जो गाड़ी के सामने ठीक बीच में गिरे थे - जिन पर टायरें नही जा सकती । बचे आमों को चुनने फिर बढ़ गया आमवाला । चुन लिया उसने दो साबुत आम बिना परवाह किये पीछे हार्न बजाती गाड़ियों का । उसने फिर ठेले पर आम रखा ही था कि फिर बाकी कई आमों को फिर पिचकाती गई दुसरी गाड़ियाँ । अब वह देख रहा था एक बचे आम को - जो सारी पहियों से बच गया - वह उसे चुनना चाह ही रहा थी कि एक जीप का चक्का उसे भी पीस कर निकल गया ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">ठेले के दाहिने - बायें दोनों तरफ से गाड़ियाँ निकलती चली गयी । बीच में रह गये करीब दो किवंटल आमों से लदा एक ठेला - पसीने से लतपत आमवाला - और उसकी दो धँसी हूई आँखें जो देख रही थी सड़क पर पड़ी गुठलियाँ - पिचके आम का पानी सा गुदा - और सड़क से चिपके छिलके ।</span></p>
<p><span style="font-size:15px;">अगर बस एक मिनट से भी कम समय बड़े लोग उसे दे देते तो वह अपना सारा आम चुन लेता । किसी ने न सीखी आम की सीख - जो महीनों तक धुप-पानी सहकर एक दिन दुसरों को मिठास देता है ।</span></p>
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