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	<title>क़ानून &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/क़ानून/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "क़ानून"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 16:56:19 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[चिट्ठे इन्क़लाब नहीं लाते !]]></title>
<link>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/09/blogsrevolution-evangelists/</link>
<pubDate>Wed, 09 Jan 2008 07:43:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/09/blogsrevolution-evangelists/</guid>
<description><![CDATA[
 [ ‘बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते' -  श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><font color="#800080"></font></p>
<p align="left"><font color="#800080"> <b>[ ‘बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते' -  शहीदे आजम भगत सिंह का यह बयान जैसे कइयों के गले नहीं उतरता वैसे ही कुंजी-पटल के योद्धा भी यह सुनना नहीं चाहेंगे कि          ‘ चिट्ठे इन्कलाब नहीं लाते'। ऐसा मानने वाले कुछ स्थापित चिट्ठेकारों के विचार यहाँ दिए जा रहे हैं। </b></font><a href="http://technology.guardian.co.uk/weekly/story/0,,2091220,00.html"><b><font color="#800080">सेथ फिंकल्स्टीन</font></b></a><b><font color="#800080">, </font><a href="http://www.newsome.org/2006/08/bloggers-challenge-who-do-you-write.shtml"><font color="#800080">केन्ट न्यूसम</font></a></b><b><font color="#800080">, </font></b><a href="http://www.roughtype.com/archives/2006/08/the_great_unrea.php"><b><font color="#800080">निकोलस कार</font></b></a><b><font color="#800080"> आदि कई प्रमुख चिट्ठेकार इस मत के हैं। ]</font></b></p>
<h3>    <b><u> सेथ फिंकलस्टीन</u></b></h3>
<p align="left">    दमनकारी सरकारों द्वारा सेन्सरवेयर (सेन्सर हेतु इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ़्टवेयर) का इस्तेमाल अब वैधानिक नीति का हिस्सा बन चुका है। इस बाबत संगोष्ठियाँ आयोजित हो रही हैं, सिफ़ारिशें दी जा रही हैं तथा लेख लिखे जा रहे हैं। वैश्विक-सेन्सरशिप के विरुद्ध लड़ाई में हमारा क्या योगदान हो सकता है ? - इसका जवाब लोग जानना चाहते हं ।</p>
<p align="left">    दुर्भाग्यवश मेरे उत्तर लुभावने नहीं हैं । गैर सरकारी संस्थाओं, थिंक टैंक्स और शैक्षणिक संस्थाओं में श्रेणीबद्धता है तथा इनमें प्रवेश-पूर्व बाधायें भी होती हैं, जिन्हें पार करना पड़ता है। बरसों पहले जब इन्टरनेट का विस्तार कम था तब किसी व्यक्ति द्वारा खुद को सुनाने का मकसद ज्यादा विस्तृत तौर पर पूरा होता था। इन्टरनेट के व्यापक समाज का हिस्सा बन जाने के बाद एक अदद व्यक्ति की हैसियत और उसका असर उसी तरह हाशिए पर पहुँच गया है जितना समाज में उस व्यक्ति का होता है । ऐसा नहीं कि किसी भी व्यक्ति की आवाज बिलकुल ही न सुनी गई हो - परन्तु यहाँ भी स्थापित सामाजिक संगठनों के ढाँचे की सत्ता आम तौर पर हावी हो जाती है ।</p>
<p align="left"><!--more--></p>
<p align="left">    ब्लॉग कोई हल नहीं हैं। धार्मिक सुसमाचारों की तरह ब्लॉगिंग-निष्ठा रखने वालों (Blog evangelists) की आस्था के विपरीत कई बार ब्लॉग असर डालने में बाधक बन जाते हैं। अत्यन्त विरले, जो ब्लॉग्स के जरिए ठोस असर डालने में कामयाब हो जाते हैं, उनकी कहानी को व्यापक तौर पर ‘सक्सेस स्टोरी’ के तौर पर प्रचार मिलता है । इस परिणाम के दूसरे बाजू की व्यापक चर्चा नहीं हो पाती है - सभी लोग जो अपने हृदय उड़ेल कर चिट्ठे लिखते हैं, एक छोटे से प्रशंसक-पाठक वर्ग के दायरे के बाहर कभी पढ़े नहीं जाते हैं ।</p>
<p align="left">     ब्लॉग सुसमाचारी इस स्थिति पर आम तौर पर यह कहते पाए जाएँगे कि इन सीमित भक्तों से खुश रहना मुमकिन है। अमूमन वे यह नहीं कहना चाहते कि एक सीमा से आगे न पढ़ा जाना दु:ख का कारण भी हो सकता है। एक चुनिन्दा छोटे समूह की बीच ही अपनी बात कहते रहने के कारण अपने विचारों की पहुँच की बाबत उनके दिमाग में भ्रामक धारणा भी बन सकती है।</p>
<h3><font face="Verdana">    <u><font color="#808000">केन न्यूसम</font></u></font></h3>
<p>किन के लिए लिखते हैं चिट्ठेकार? आपने खुद से कभी यह सवाल किया है? मैंने कुछ दिनों से इस पर गहराई से सोचना शुरु किया है ।</p>
<p>झटके में इसका जवाब देने वाले कहेंगे -- अलग-अलग लोग अलग-अलग कारणों से लिखते हैं। कुछ अपने व्यवसाय के हित में लिखते हैं और कुछ स्वान्त:सुखाय ।</p>
<p>यह सवाल मैं कुछ बुनियादी तौर पर पूछता हूँ। हमारे चिट्ठों के पाठक कौन हैं ? हमने जिन पाठकों को ध्यान में रख कर लिखा है वे नहीं , वास्तविक पढ़ने वाले कौन हैं ?</p>
<p>मेरा जवाब है हम (चिट्ठेकार)  अमूमन एक-दूसरे के लिए ही लिखते हैं। हमारे पाठक ज्यादातर चिट्ठेकार ही होते हैं, कभी-कभार मित्र और रिश्तेदार पढ़ लेते हैं ।</p>
<p>मुझे गलत मत समझिएगा -  लिखने में मुझे रस मिलता है। कभी-कभी जब हम कुछ लिख कर चिट्ठे पर डाल देते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि कोई टिप्पणी आएगी अथवा कोई उस पोस्ट की कड़ी उद्धृत कर देगा, तब एक अजीब  अवसाद-सा तिरता है, माहौल में।</p>
<p>चिट्ठालोक की क्रिया-प्रतिक्रिया देने की विशिष्टता को अक्सर हम लोग कुछ ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। यह सही है कि चिट्ठे कुछ हद तक क्रिया-प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन संवाद स्थापित करने के लिए यहाँ भी आप को कुछ बाधायें पार करनी पड़ती हैं। आप को टिप्पणियाँ देने और असरकारी पोस्ट लिखने के लिए समय  लगाना पड़ता है और कोशिश भी करनी पड़ती है। और जब ढेर सारे लोग एक विषय पर अपनी ढपली अपने राग में बजाने लगते हैं तब कई बातें इस शोर में गुम भी हो जाती हैं ।</p>
<p>चिट्ठालोक में चिट्ठेकारों के बीच ध्यान खींचने की ऐसी होड़ लगी रहती है कि आभास होता है कि यह एक बहुत बड़ी-सी जगह है, मानो मछली बाजार। यह केवल आभास है, दरअसल एक बड़े हॉल के आखिरी छोर पर बने एक छोटे-से कमरे में हम सब पहुँच जाते हैं। जब लोग संवाद बनाने से इन्कार करते हैं किन्तु किसी हद को पार कर अपने चिट्ठे की कड़ी लगवाना चाहते हैं तब थोड़ा कष्ट जरूर होता है । यह कष्ट तब तक जारी रहता है जब तक मुझे इस बात का अहसास नहीं हो जाता कि  ‘चलो मेरी बात न सुने भले, वास्तविक जगत में कोई उन्हें भी तो नहीं सुन रहा ' ।</p>
<h3><font color="#ff0080" face="Verdana">(जारी...) </font></h3>
<p><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/06/10/blogospherelimitationsevangelists/" target="_blank">Original post</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून]]></title>
<link>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/07/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 07 Jan 2008 17:50:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाका]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा <i>चिट्ठा चर्चा</i> पर <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2007/03/blog-post_24.html" target="_blank">इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा</a> कर दिए जाने के बाद भी वह जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा <a href="http://beji-viewpoint.blogspot.com/2007/03/blog-post_21.html" target="_blank">राग छेड़ा</a> कि अपनी तरफ से <a href="http://beji-viewpoint.blogspot.com/2007/03/blog-post_24.html" target="_blank">निष्कर्ष निकाल देने</a> के बाद भी उसके सुर  मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा <a href="http://srijanshilpi.com/?p=39" target="_blank">पहले भी</a> होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=261" target="_blank">अनूप</a> जी, <a href="http://azdak.blogspot.com/2007/03/blog-post_22.html" target="_blank">प्रमोद</a> जी, <a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/03/blog-post_22.html" target="_blank">अभय</a> जी, <a href="http://anamdasblog.blogspot.com/2007/03/blog-post_28.html" target="_blank">अनामदास</a> जी और <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/03/27/future_trends" target="_blank">काकेश</a> जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा।</p>
<p><!--more--></p>
<p>अंग्रेजी चिट्ठा जगत में तो यह बहस <a href="http://www.journalism.co.uk/features/story604.html" target="_blank">कई वर्षों से जारी</a> है। इस विषय पर सबसे अच्छी परिचर्चा पिछले वर्ष हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा <a href="http://cyber.law.harvard.edu/webcred/wp-content/CONFREPORT2.htm" target="_blank">Blogging, Journalism &#38; Credibility: Battleground and Common Ground</a> पर आयोजित सम्मेलन के दौरान हुई। अमेरिका में यह मामला <a href="http://www.cnn.com/2005/LAW/04/27/hilden.blogging/index.html" target="_blank">कोर्ट में भी </a>पहुंचा है। अदालतों ने इस बारे में <a href="http://www.sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?file=/c/a/2006/05/27/MNGTGJ3K7S1.DTL" target="_blank">स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश</a> भी की है। लेकिन अदालतों के क्षेत्राधिकार (jurisdiction) इतने सीमित दायरे में लागू होते हैं कि पूरे ग्लोब में फैले ब्लॉग जगत के लिए मान्य नहीं हो सकते। हर देश के अपने क़ानून हैं और अदालतों द्वारा की जाने वाली उनकी अलग-अलग व्याख्याएँ हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि टेक्नोलॉजी जहां रोज-ब-रोज तेजी से बदल रही है, क़ानून उसी पुरानी, शनि की मंथर चाल से आगे बढ़ रहा है। जब तक कोई नया क़ानून बनता है तब तक टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ चुकी होती है कि क़ानून अप्रासंगिक हो चुका होता है। सायबर लॉ में मेरे गुरु और सुप्रीम कोर्ट के वकील <i><a href="http://www.cybersmart.in/books/handbook-cyberlaws.htm" target="_blank">वकुल शर्मा</a></i> कहते हैं:</p>
<blockquote><p>Technology has always posed problems for law but lawyers and judges have been managing the problems by stretching the meaning of the existing laws without breaking the spirit of laws.</p></blockquote>
<blockquote><p>(टेक्नोलॉजी हमेशा से क़ानून के लिए मुश्किलें खड़ी करती रही है लेकिन वकील और न्यायाधीश इन मुश्किलों को मौजूदा कानूनों की व्याख्या को खींच-तान करके क़ानूनों की मूल भावना को बगैर नुकसान पहुंचाए हल करने की कोशिश करते रहे हैं।)</p></blockquote>
<p>इंटरनेट ने हमें एक ऐसे युग में पहुंचा दिया है जहां हम घर बैठे ही दुनिया की तमाम अच्छाइयों और तमाम बुराइयों से प्रभावित हो सकते हैं। इंटरनेट ने भगवान और शैतान, दोनों को हमारे मन का पता दे दिया है। कोई भी हमारे मन के साथ खेल सकता है, उसे संवार सकता है और उसे बिगाड़ सकता है। तमाम तरह के घोटाले, धोखाधड़ी, आतंकवादी वारदातें, सांप्रदायिक वैमनस्य, अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र इंटरनेट के जरिए होने लगे हैं। इसी तरह समाज सेवा, धर्म, अध्यात्म, अच्छी पुस्तकों और सदविचारों के प्रचार-प्रसार, आदि के काम भी इंटरनेट के जरिए होते हैं। <i>चार्ल्स डिकेन्स</i> ने <i>‘ए टेल ऑफ टू सीटिज’</i> में जो बात 1859 में कही थी, लगता है कि वह आज के इंटरनेट युग पर भी लागू होती है:</p>
<blockquote><p>“ It was the best of times, it was the worst of times; it was the age of wisdom, It was the age of foolishnesses… we had everything before us, we had nothing before us.”</p></blockquote>
<blockquote><p>(यह सबसे अच्छा समय है, यह सबसे बुरा समय है; यह समझदारी का युग है, यह नासमझी का युग है….हमारे सामने सब कुछ है, हमारे सामने कुछ भी नहीं है।)</p></blockquote>
<p>यह जो वेब जगत है, वह हमारी भौगोलिक दुनिया की छाया प्रतिलिपि नहीं है। इसे किलोमीटर और घंटे के स्थूल मात्रकों में नहीं, बल्कि इसे ‘बिट्स’ और ‘बाइट्स’ जैसे सूक्ष्म मात्रकों में मापा जाता है। इस दुनिया के तमाम लोगों की अपनी एक अलग राष्ट्रीयता है और यहाँ वे ‘सिटीजन’ नहीं, बल्कि ‘नेटीजन’ कहलाते हैं। हमारे क़ानूनों की सीमा यह है कि वे ऐसी राजनीतिक, भौगोलिक और भौतिक दुनिया के लिए बनाए गए हैं, जो स्थिर, परिभाषित और आबद्ध है, जबकि इसके विपरीत वेब जगत गतिशील, अपरिभाषित और असीमित है। इस वेब जगत के नियमन के लिए ऐसे गतिशील कानूनों की जरूरत है जो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। क़ानून के रखवालों के लिए यह जरूरी है कि वे टेक्नोलॉजी की भाषा को समझें और टेक्नोलॉजी के प्रयोगकर्ताओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे क़ानून की भाषा को समझें। यह कहने से काम चलने वाला नहीं है कि टेक्नोलॉजी और क़ानून पूर्व और पश्चिम की तरह हैं, जो आपस में कभी मिल नहीं सकते। लेकिन यह सच है कि टेक्नोलॉजी की जो रफ्तार है उसकी बराबरी क़ानून कभी नहीं कर सकता। जैसा कि <i>ओलिवर वेन्डेल होम्स</i> कहते हैं:</p>
<blockquote><p>It cannot be helped, it is as it should be, that the law is behind the times.</p></blockquote>
<p>(इसका कोई उपाय नहीं है, यह ऐसे ही रहने वाला है, कि क़ानून समय से हमेशा पीछे रहता है।)</p>
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