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	<title>किताबें &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/किताबें/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "किताबें"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 16:54:40 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[किताब लिखने के बारे में क्या खयाल है?]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=250</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 13:26:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[अभी हाल ही में चेतन भगत की नयी पुस्तक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अभी हाल ही में चेतन भगत की नयी पुस्तक "Three Mistakes of My Life" पढी। एक टाइमपास किताब...बिना दिमाग लगाये पढने बैठिये, कुछ पात्र और घटनाएं आपको अपने आसपास की नजर आयेंगी...थोडा बहुत उनसे <em>रिलेट </em>करिये और ३-४ घंटे में खत्म करके अपने काम पर लगिये। यह पोस्ट "Three Mistakes of My Life" के बारे में नही है।</p>
<p>चेतन भगत की पहली किताब "Five Point Someone...", IIT के छात्रों की जिन्दगी पर आधारित थी। देश में हर साल करीब २ लाख इंजिनीयर निकलते हैं और हर इंजीनीयर ने, प्रवेश परीक्षा की तैयारी के समय IIT का सपना जरूर देखा होता है। इस हिसाब से किताब एक बहुत बडे <em>मार्केट </em>को <em>टार्गेट </em>करती थी। किताब अच्छी बिकी। इस किताब ने एक नया <em>ट्रेन्ड </em>स्थापित किया और फिर कई नये-नये लेखकों की IIT, IIM और अन्य कालेजों की जिन्दगी पर आधारित कई पुस्तकें आई। कुछ पढी भी गईं, कुछ ऐसे ही निकल गईं..पर "पाँच दशमलव..." एक <em>बेन्चमार्क</em> बन गई।</p>
<p>खैर,यहां लिखने का मूल मकसद चेतन भगत पर चर्चा करना भी नही है, पर इस <strong>प्रक्रिया </strong>पर चर्चा करना है। हल्का फुल्का लेखन, युवाओं पर केन्द्रित, मध्यवर्ग पर केन्द्रित जिसमें बहुत भारी भरकम कथानक होने की बजाय आसपास की जिन्दगी के कुछ पात्र हों। थोडी सी मार्केटिंग और ब्रांडिंग। जेब को <em>सूट </em>करती कीमत। एक <em>फार्मूले </em>जैसा।  ("Three Mistakes of My Life" ९९ रुपये की है..हालांकि कीमत कम करने के चक्कर में किताब की छपाई और बाइंडिंग एकदम घटिया कर दी गई)।</p>
<p>पिछले कुछ दिनों से सोंच रहा हूं कि हिन्दी में अगर इस तरह की किताबें आने लगें, तो उन्हे कितना पडा पाठक वर्ग मिल सकता है। कितना बडा बाजार है? क्या इस तरह का लेखन हिन्दी में अभी होता भी है?</p>
<p>मुझे लगता है कि हिन्दी में इस तरह की किताबों का बडा बाजार होगा। हिन्दी के २-३ अखबार अपनी-अपनी पाठक संख्या १ करोड से ऊपर बताते हैं। क्या इन पाठकों में से एक प्रतिशत भी हिन्दी में हल्के फुल्के लेखन को नही पढाना चाहेंगे। पिछली जुलाई में हैरी पाटर की सातवीं किताब रिलीज होने के <a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/07/14/hindi-ka-harry/" target="_blank">समय </a>हिन्दी में उसकी पांचवी किताब का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ था और हाथों-हाथ ५००० प्रतियां बिक गईं थी थी। हैरी पाटर पुस्तकों की पहली पाँच किताबों के हिन्दी अनुवादों की अब तक १ लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं, जिनकी कीमत २००/- से ३५०/- तक थी। खबर <a href="http://economictimes.indiatimes.com/How_Harrys_magic_changed_the_mkt_in_India/articleshow/2202462.cms" target="_blank">यहां </a>पढें। इन्हे प्रकाशित करने वाले <a href="http://www.manjulindia.com/" target="_blank">मंजुल पब्लिशिंग हाउस</a> एवं हिन्दी के अन्य प्रकाशक इन प्रक्रिया को किस तरह देखते हैं, पता नही...लेकिन अगर वो थोडी रुचि लें तो शायद अच्छा खासा मार्केट बन सकता है कई नये लेखक उभर सकते हैं। (हिन्दी के वर्तमान लेखकों की अपनी जानकारी बहुत अच्छी नही है।)</p>
<p>पिछले कुछ दिनों से मैं कमलेश्वर की "कितने पाकिस्तान" भी पढने की कोशिश कर रहा हूं। इस पुस्तक का काफी नाम सुना था और बहुत समय से पढने की इच्छा थी। मई अंत में नागपुर स्टेशन पर खरीदी, पर अभी तक आधी ही पढ पाया हूं। दिक्कत ये है कि एक बार में ३-४ पेज से ज्यादा नही पढ पाता। क्योंकि पढ कर उसे सोंचना पडता है, मनन करना पडता है और फिर पचाना पडता है। चेतन भगत नुमा पुस्तकों में आपको <em>प्रोसेसिंग </em>कुछ नही करनी पडती और हम जैसे कम समझ लोगों को भी आसानी से समझ आ जाती हैं...नतीजा <em>टारगेट मार्केट</em> में बढोतरी। अंग्रेजी पुस्तकों में रुचि रखने वाले भारतीय युवाओं से ही पूंछ लीजिये, कितने लोगों ने चेतन भगत को पढा है ...और कितने लोग विक्रम सेठ को।...अन्तर पता चल जायेगा।</p>
<p>अब आते हैं इस पोस्ट के मूल मकसद पर। मुझे लगता है कि हिन्दी चिट्ठाकारों से में कई लोगों में इस तरह का लिख पाने की संभवनाएं हैं। जिनकी भाषा और मुद्दे बहुत भारी नही होते, पढने-समझने में आसान होते हैं , आसपास की ज़िन्दगी से जुडे होते हैं। कई चिट्ठाकारों की कई पोस्ट्स इतनी बेहतरीन हैं कि उन्ही का संकलन कर के एक किताब छपवाई जा सकती है। तो बताइये, कैसा <em>आइडिया </em>है, और आप कब किताब लिखना शुरू कर रहे हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[किताबें...इन दिनों]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/01/03/books-january-2008/</link>
<pubDate>Thu, 03 Jan 2008 17:13:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2008/01/03/books-january-2008/</guid>
<description><![CDATA[दिसम्बर में हैदराबाद में एक पुस्तक मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिसम्बर में हैदराबाद में एक पुस्तक मेला लगा था, जिसकी कि खबर मुझे मेले के आखिरी दिन लगी। किस्मत से उस दिन शनिवार था सो घूमते फिरते पहुँचे और करीब ३-४ घंटे वहाँ बिताये। अधिकांश अंग्रेजी पुस्तकों के स्टाल, कुछ तेलुगु, एक-दो उर्दू पुस्तकों के स्टाल। और से २-३ स्टाल हिन्दी प्रकाशकों के भी। हैदराबाद में हिन्दी किताबों की दुकानें पिछले एक साल से ढूंढ रहा हूँ (या ढूंढने की सोंच रहा हूँ), लेकिन सफल नही हुआ...लेकिन इन स्टालों के मिलने से पुस्तक मेले में आना सार्थक रहा। ४ किताबें खरीदीं-<br />
<b>अमृतलाल नागर</b> की <b>नाच्यो बहुत गोपाल</b><br />
<b>विष्णु प्रभाकर</b> की लिखी शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की जीवनी <b>आवारा मसीहा</b><br />
<b>शरद जोशी</b> का व्यंग्य संग्रह <b>यत्र-तत्र-सर्वत्र</b><br />
और बहुत दिन से <b>ओशो </b>को पढने का सोंच रहा था सो एक पुस्तक <b>कोंपलें फूंट पडी</b></p>
<p>नाच्यो बहुत गोपाल तुरंत ही पढ ली थी। तत्कालीन समाज में हरिजन और महिलाओं की स्थिति पर केन्द्रित यह उपन्यास पढके मन एक अजीब सी बैचेनी से भर गया। इसे वितृष्णा कहूं, या सहानुभूति पता नही, मुझे खुद भी नही मालूम। समाज के दो सबसे उपेक्षित तबकों...एक तो महिला और ऊपर से हरिजन पर लिखा गया यह उपन्यास बहुत गहरे तक जाता है। हालांकि अब परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं और जिस काल खंड में यह उपन्यास लिखा गया है, तब में और आज में महिलाओं की और हरिजनों की स्थिति में बहुत अन्तर आया है।</p>
<p>आवारा मसीहा शरतचन्द्र की जीवनी है। अभी करीब सौ पन्ने पढे हैं। स्कूल समय में शरत चन्द्र के कई उपन्यास पढे थे, अब काफी समय हो गया, लेकिन इस उपन्यास को पढ कर कह सकते हैं कि उनके अधिकतर चरित्र उनकी ही जिन्दगी से निकले थे। यह बात भी सोंचने में आती है क्या अधिकतर महान लोग अपने शुरुआती दिनों में थोडे सनकी, थोडे विद्रोही होते हैं?</p>
<p>यत्र तत्र सर्वत्र और कोंपलें फूट पडीं अभी शुरू होने की राह देख रहे हैं। जो पुस्तकें मैने मांगी और नही मिल पाईं, वो थीं <b>श्रीलाल शुक्ल </b>की <b>राग दरबारी,</b> <b>कमलेश्वर</b> की <b>कितने पाकिस्तान </b>और <b>गिरिराज किशोर</b> की <b>पहला गिरमिटिया</b> । उसी समय रांची से एक सहकर्मी का फोन आ गया और उन्होने <b>डा राही मासूम रजा</b> के किसी गजल संग्रह की मांग की। लेकिन वो भी नही मिला। हालाँकि दोनो प्रकाशकों ने अपने पते दिये, ये पुस्तकें दुकान पर उपलब्ध हैं बताया, और दुकान पर जरूर आने को बोला, और किस्मत से ये दुकानें मेरे घर के एक किलोमीटर के दायरे में स्थित हैं। (देखते हैं कब जाना होता है।)</p>
<p>20-21 दिसम्बर को घर जाते समय नागपुर स्टेशन पर सुबह १० बजे नींद खुली। हाथ पैर सीधे करने उतरा और जब वापस चढा तो <b>मनोहर श्याम जोशी</b> का उपन्यास <b>क्याप </b>अपने हाथ में था जो रात को मथुरा पहुँचने से पहले निपटा दिया गया। जोशी जी का इससे पहले मैने <b>कसप </b>पढा था, पिछले साल, लगभग इन्ही दिनों। पता नही यह उनके अन्य उपन्यासों में भी है या नही...जोशी जी का नायक बहुत कन्फ्यूज्ड होता है..और नायिका एकदम सालिड, दृढ निश्चयी। कसप में पहाडी हिन्दी से मेरा पहला परिचय हुआ <i>रहा</i>.. और वो मुझे बहुत अच्छी लगी <i>रही </i>।पर क्याप में यह इतनी प्रयुक्त नही हुई <i>बल</i>।</p>
<p>घर से लौटते वक्त भोपाल रेलवे स्टेशन से <b>सुरेन्द्र मोहन पाठक</b> के तीन उपन्यास उठाये। ये भी सिर्फ स्टेशनों पर मिल पाते हैं और पिछले ५-६ महीने स्टेशन पर कोई काम न पडने की वजह से ३ नये उपन्यास बिन पढे हो गये थे। एक ट्रेन में और दो अगली रात को निपटा दिये गये।</p>
<p>हैदराबाद लौटा तो घर में मित्र रामा की लाई हुई <b>Amitabh Bagachi</b> की <b>Above Avarage</b> और <b>Anurag Mathur </b>की <b>The  Inscrutable American</b> बरामद हुईं। Above Avarage,  "Five Point Someone " वाली श्रेणी की किताब है..अपने स्कूल-कालेज के दिनों की याद दिलाती है। सो ये भी शुरू कर दी।  Five Point Someone, अपनी पी.जी. कक्षाओं में पीछे की कुर्सियों (BackBenches) पर बैठ कर निपटाई गई थी।</p>
<p>इस बीच और अभी कल आफिस का नियमित पुस्तक सप्लायर <b>Thomas L. Friedman</b> की <b>The World is Flat</b> दे गया। (यह बन्दा अंग्रेजी की अधिकतर पुस्तकों के प्रिंट मूल्य पर २०-२५% तक छूट देता है, और घर बैठे...(बोले तो आफिस बैठे) पुस्तकें डिलीवर करता है)। The World is Flat  बदलती दुनिया की बदलती अर्थव्यवस्था, वैश्वीकरण और उसके प्रभावों पर है..अभी पचासेक पेज पढे हैं और शुरुआती पृष्ठ पढते समय मुझे कई जगह एल्विन टाफ्लर(<b>Elvin Tofler</b>) की फ़्यूचर शाक (<b>Future Shock</b>)  याद आई।</p>
<p><b>William Dalrymple </b>की <b>The Last Mughal, George Orwel </b>की <b>1984, </b>और <span class="hotLink"></span><b><span class="hotLink">Robert T Kiyosaki</span> </b>की <b>Rich Dad Poor Dad</b> (जिसे पढने की सलाह और सोफ़्ट कापी समीर लाल जी से प्राप्त हुई), पिछले करीब ३-४ महीने से थोडा थोडा पढ कर खत्म होने की राह देख रही हैं।</p>
<p>पढने को इतना सारा मसाला। नये साल में एक ब्लागर बन्दे को और क्या चाहिये?.....सिवाय थोडे खाली समय के, जो मिलता नही, चुराना पडता है! :)</p>
<p>आप सबको साल-२००८ के लिये शुभकामनाएं।</p>
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