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	<title>कुछ-इधर-की-कुछ-उधर-की &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "कुछ-इधर-की-कुछ-उधर-की"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 13:31:33 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भाषा की विभीषिका]]></title>
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<pubDate>Wed, 17 Oct 2007 06:53:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
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<description><![CDATA[भाषा का इस्तेमाल किस तरह से अपने निजी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भाषा का इस्तेमाल किस तरह से अपने निजी और राजनैतिक उद्देस्यों की पूर्ति के लिये होता है यह कोई नयी या अपरिचित बात नहीं है/ सातवें दशक में त्रिभाषा फ़ार्मूला शिक्षा के क्षेत्र में लागू करने के समय भी ऐसा ही कुछ था/<br />
ताजातरीन घटना झारखन्ड की है जहाँ एक नितान्त लँगड़ी अक्षम और व्यावहारिक तौर पर अस्तित्वविहीन सरकार ने उर्दू को द्वितीय भाषा घोषित कर दिया है/ ज्ञातव्य है कि इस प्रकार की माँग बंगाली, सन्थाली और अन्य बोलियों की तरफ़ से भी आ रही थी/ मगर इन सबको नज़र-अन्दाज़ करते हुए उर्दू को यह दर्ज़ा देने का फ़ैसला किया गया/<br />
बतौर एक भाषा उर्दू से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती, मगर झारखण्ड में यह कितनी व्यावहारिक और अपरिहार्य है, यह विचारणीय बिन्दु है/ झारखण्ड एक जनजातीय बहुल राज्य है जिसमें कई लोकभाषाएं प्रचलित हैं, ये लोकभाषाएं जनजातीय समाज का इतिहास, वाचिक परम्परा और संस्कृति की अभिन्न सहचरियों की भूमिका निभाती चली आ रहीं हैं/ काफ़ी बड़ी संख्या में बंगाली प्रवासी भी इस राज्य में हैं जो बंगला को द्वितीय भाषा का स्तर देने का मज़बूत आधार और तर्क प्रस्तुत करते हैं/ इन सब तर्कों और भावनाओं को निरस्त करते हुए, राजनैतिक सौदेबाज़ी के तहत और चिरन्तन वोट बैंक पॉलिटिक्स के मँझे हुए खिलाड़ियों ने उर्दू को राजभाषा बना दिया/<br />
विडम्बना यह है कि उर्दू भाषियों की संख्या राज्य में न केवल अल्प परिमाण में है बल्कि यह भाषा ऊपर से थोपे गये होने का भी आभास कराती है क्योंकि यह जनजातीय लोगों के जीवन पद्धति से जुड़ी हुई नहीं है/ विडम्बना यह भी है कि प्रदेश की मुख्यमन्त्री की गद्दी पर मधु कौड़ा विराजे हुए हैं, जो स्वयं जनजातीय वर्ग से सम्बद्ध हैं/ ज़्यादा तार्किक और बेहतर यह होता कि किसी लोकभाषा को यह दर्ज़ा दिया जाता जिससे आदिवासी और पारम्परिक समुदायों को मुख्य धारा में लाने की शासकीय वादों की भूतल स्तर पर परिणिति की दिशा में एक मजबूट कदम माना जाता/ (मुख्य धारा का मिथक भी विवादास्पद है क्योंकि मुख्य और गौण तय करने का अधिकार हमको किसने दिया?)<br />
यह समझना बिल्कुल बुद्धि के परे है कि क्यों जनजातीय समुदायों की माँगों को नकारा जाता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों की माँगों को बिना किसी हो हल्ले के चुपचाप मान लिया जाता है/<br />
एक अद्भुत सरकार ऐसा ही कर सकती है क्योंकि उसे किसी भी समय चुनाव की रणभेरी सुनाई दे सकती है/ और ऐसे में राज्य के धर्म निरपेक्ष नेता गण अल्प्संख्यकों के विकास के बजाय भाषा और त्योहारों की छुट्टी के नाम पर वोट माँगने जा सकते हैं/<br />
भाषा के साथ ऐसा खेल वे ही लोग खेल सकते हैं जिन्हें दिन के ३ बजे भी राजनीति सूझती है और रात के ३ बजे भी/</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[चन्द्रशेखर का अवसान- एक युग का समापन]]></title>
<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/07/11/%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%af%e0%a5%81/</link>
<pubDate>Wed, 11 Jul 2007 17:30:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
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<description><![CDATA[अध्यक्ष जी का देहावसान हिन्दुस्तान क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अध्यक्ष जी का देहावसान हिन्दुस्तान की राजनीति के छायादार बरगद के पेड़ का गिरना है/ एक ऐसा पेड़ जिस पर लोग आशा की दृष्टि से देखते थे/ राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी राय ली जाती थी और गुनी जाती थी/ तेजी से क्षरित होते जाते राजनीतिक मूल्यों के इस दौर में अध्यक्ष जी उन चन्द नेताओं में थे जिनके लिए लोगों के दिलों में सम्मान था, जिनकी तरफ़ आशा और अपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था/ युवा तुर्कों की तिकड़ी के नेता कांग्रेस के उस हरावल दस्ते में शामिल थे जिसने कांग्रेस के भीतर रहकर इमर्जेन्सी का विरोध किया/ भले ही इसके चलते उन्हें जेल भेज दिया गया/<br />
चन्द्रशेखर की राजनीति के स्टाइल और तरीके को लेकर भले ही कई मत प्रतिमत रहे हों मगर उनका सुदीर्घ और बेदाग़ संसदीय जीवन अपने आप में सम्मान और श्लाघा का विषय है/<br />
यह बात चन्द्रशेखर में ही थी कि सांसद गण दलीय सीमाओं से परे उनका सम्मान करते थे/ संसद की कार्यवाहियों के सजीव प्रसारणों में कई बार अध्यक्ष जी को संसद को दिशा देते हुए और घर के बुजुर्ग की भूमिका में देखा/ बुजुर्ग भी ऐसा जो वास्तव में मर्यादा और नीतियों का पक्षधर हो न कि सिर्फ़ लीक पीटने वाला लकीर का फ़कीर/<br />
यही वजह थी कि अध्यक्ष जी जब भी संसद में बोलते थे तो सारी संसद उन्हें सुनती थी/ यह बात शायद अटल जी के साथ भी नहीं है क्यों कि उन्हें भाजपा का नेता माना जाता है जबकि चन्द्रशेखर अपनी पार्टी के अकेले सांसद होने के नाते निर्गुट किस्म के नेता हो गए थे/<br />
मुझे याद पड़ता है टी.वी. पर सजीव प्रसारण के दौरान देखा था कि एक बार जब NDA सरकार के रक्षा मन्त्री जॉर्ज फ़र्नांडिस किसी मुद्दे पर आग उगल रहे थे और वामपन्थी दूसरे तरफ़ प्रतिरोध के स्वर में मुखर थे, तब संसद में अत्यन्त अप्रिय स्थिति पैदा हो गई थी/ तब चन्द्रशेखर ने बात सम्हाली थी/ ऐसे तमाम हालातों में चन्द्रशेखर उठते थे, संसद को समझाइश देते थे और बाकी संसद उनके द्वारा दी गई व्यवस्थाओं को मानती भी थी/ एक बार अध्यक्ष जी किसी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर बोल रहे थे इतने में कोई नए सांसद गणों ने कुछ कमेंट कर दिया/ अध्यक्ष जी ने तुरन्त कहा कि अब आप ही बोल लें मैं बैठा जाता हूँ/<br />
जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते अध्यक्ष जी का सम्बोधन उनके साथ चस्पा हो गया/<br />
मात्र ५० की उम्र में इतने बड़े गठबन्धन जैसे पार्टी का नेतृत्व चन्द्रशेखर के बस की ही बात थी/ एक पुस्तक पढ़ी है हिमाचल के पूर्व मुख्यमन्त्री शान्ताकुमार जी की/ उसमें वे कहते हैं चन्द्रशेखर पार्टी को टूट से बचाना चाहते थे मगर कोई उनकी सुनता ही नहीं था/ विशेषकर राजनारायण और मधु लिमये जैसे दिग्गज/<br />
बहरहाल वह प्रयोग देश की राजनीति को एक अलग दिशा तो दे गया/ नए समीकरण बने और यह सिद्ध हुआ कि देश की सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता से बेदखल भी किया जा सकता है/ उस दौर ने मुल्क को तमाम क्षेत्रीय क्षत्रप और राष्ट्रीय दिग्गज दिए/ उनमें से कई अब भी राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं/<br />
चन्द्रशेखर की बड़ी बात उनका देशज मिजाज़ और भारतीयता से जुड़ाव था/ वैश्वीकरण के मुद्दे पर वे आखिर तक असहमत रहे और झंडा बुलन्द किये रहे/ यह सब सिद्धान्तों के राजनीति करने वालों के आखिरी दस्ते के संसदीय सेनानी थे/<br />
विरोध यानि कि खुला विरोध गुपचुप विरोध अध्यक्ष जी की फ़ितरत नहीं थी/ राजा मांडा के प्रधानमन्त्री बनते वक़्त भी चन्द्रशेखर ने विरोध किया और सहमति का लबादा नहीं ओढ़ा/ वी.पी.सिंह अपनी आत्मकथा "मन्ज़िल से ज़्यादा सफ़र" में इस बात का उल्लेख करते हैं कि चन्द्रशेखर संसदीय दल की बैठक से उठ कर चले गए थे/<br />
एक कमज़ोर सी सरकार का मुखिया बहुत कुछ कर नहीं सकता और चन्द्रशेखर के साथ भी ऐसा ही हुआ/ उनके खाते में वित्तीय कुप्रबन्धन की शिकायतें हैं और उन्हीं के समय में हिन्दुस्तान का सोना विदेश में गिरवी रखा गया/ मगर उन्हीं के समय में कहा जाता है कि अयोध्या विवाद सुलझने के कगार पर पहुँच गया था/ महन्त रामचन्द्रदास, संघ और अन्य पक्षों के साथ बैठकर एक सामान्य सर्वानुमत रास्ता निकालने का पथ प्रशस्त हो रहा था मगर तब तक सरकार का पतन हो गया/ बड़े लोगॊ के बड़े खेल! अगर विवाद के हल वाली बात सही मानी जाए तो कभी कभी सोचता हूँ कि क्या इन दोनॊ घटनाओं के बीच कोई सहसम्बन्ध है? ये सब घटनाएं इतिहास के गर्त में खो जाती हैं/<br />
अपने अन्तिम दिनों में अध्यक्ष जी को देखना एक शेर को तिल तिल कर मौत के तरफ़ बढ़ते हुए देखना था बीमारी से वे अत्यन्त कमज़ोर हो गए थे, मगर वे लड़ते रहे/ आगरा में मेरे एक मित्र हैं उनके मित्र के पिता अध्यक्ष जी के मिलने वालों में से हैं, वे बताते हैं कि जिस आदमी की दहाड़ ताउम्र आप सुनने के अभ्यस्त रहे हों उसे धीमे धीमे बोलते सुनना कारूणिक रूप से दुखद है/ कीमियोथेरेपी से भी अध्यक्ष जी ज़्यादा दिन नहीं चल सके/ मौत आनी ही थी/ बहुत लोगों के लिये चन्द्रशेखर का निधन एक पूर्व प्रधानमन्त्री का देहावसान है, बहुतों के लिए एक राजनेता का/ मगर मेरे लिए चन्द्रशेखर राजनीतिज्ञों की उस विरल होटि हुई नस्ल के आदमी थे जो मुल्क का दिल जानती थी/<br />
आज हिन्दुस्तान के दिल को जानने वाले और आत्मा को पहचानने वाले कितने नेता बचे हैं? जो लोग समझने पहचानने का दावा करते हैं वे सिर्फ़ चुनाव जीतने को अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं/<br />
किसी भी मुल्क का इतिहास बहुत बड़ा होता और हिन्दुस्तान जैसे मुल्कों का इतिहास तो अत्यन्त विस्तृत और गहन होता है/ मगर फ़िर भी कुछ लोगों का जीवन इतिहास के पत्थर पर लकीर खींच जाता है/ चन्द्रशेखर ने यह लकीर सत्ता के माध्यम से नहीं खींची इसलिए यह और अधिक महत्वपूर्ण और सम्मानित है/ उनके जीवन के कुछ साल ट्रेजरी बेन्च पर बैठने वाले छोड़ दें तो ताउम्र विपक्ष में बैठने वाले चन्द्रशेखर मूल्यों और आदर्शों की प्रतिबद्ध राजनीति के नाविक थे/<br />
म्रूत्यु के पहले वे श्रद्धेय थे अब स्मरणीय हो गए हैं/</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[]]></title>
<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/06/11/28/</link>
<pubDate>Mon, 11 Jun 2007 09:29:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
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<description><![CDATA[मौत दबे पाँव नहीं आती आजकल&#8230;गोलियाँ द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मौत दबे पाँव नहीं आती आजकल...गोलियाँ दाग़ते हुए आती है</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">लोग मर रहे हैं नन्दीग्राम हो या बस्तर का सुदूर बीजापुर/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">भीड़ भड़क जाती है</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">पुलिस मज़बूर... भरभरा के दाग़ती है सतरें गोलियों की/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">धाँय धाँय धू धू<span>  </span>धाँ....भीड़ मर रही है/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">उन सबके राज्यों में, जो कहते हैं खुद को चाहे राष्ट्रवादी या मज़दूरों के अलम्बरदार</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हज़ारों हज़ार लोग ढो चले हैं अपने मकान अपने सिरों पर</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">छोड़ रहे हैं ज़मीनें अधजुती</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">ताकि विकास हो सके देश का/ कुछ और खरब पति कर सकें नाम रोशन/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">सारा मुल्क एक </span><span><font face="Times New Roman">SEZ </font></span><span style="font-family:Mangal;">है</span><span><font face="Times New Roman">?</font></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">आज चाँद सचमुच काला पड़ गया है. तारे दिखते हैं खूनी लाल</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">बस कुछ लोग मरे हैं शासकों के राज में</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हुक्काम अलमस्त फ़्रेन्च वाइन के लुत्फ़ में गुम/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">झण्डे उठा के जो पीछे चले थे</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">उन्हीं के ड्ण्डे बरस रहे हैं/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span><font face="Times New Roman">SEZ </font></span><span style="font-family:Mangal;">का नक्शा खिंचा सा जाता है लाल लाल लकीरों से/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">धान के बोझे ढोने वाली पीठें हरहरा के गिर रही हैं एक के बाद एक/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">नाम बदल जाते हैं/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">सरकारें सिर्फ़ सरकार हैं कार्बन कॉपी एक दूसरे की/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया..</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कि विकास के डैने फ़ैल रहे गाँव गाँव गली गली/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">भीतर तक चौके की सिगड़ी तक विकास/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">आलू के चोखे में भी विकास नज़र आएगा...बस थोड़ा देर और..</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">शाम की खबर "मारे गए पुलिस के लोग नक्सलियों के हाथ झुण्ड के झूण्ड"</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मार्क्स कितनी बन्दूकें छिपा गए तुम बस्तर के गिरिकाननों में</span><span><font face="Times New Roman">?</font></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">यहाँ भी लोग मर रहे हैं/ नई भर्तियाँ नई मौत का नैवेद्य हैं/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कागज़ काले हो रहे हैं व्यर्थ ही इधर धरती लाल/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">देख रहे हैं सब चुप चुपचाप गुमसुम/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">जो नहीं ख्वाहिशमन्द देखने के बन्द कर लें आँख अपनी</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">खेल लम्बा चलेगा/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">ज्ञानी विद्वज्जन कहते हैं पोथियाँ खोल खोल...आँकड़ों के मज़बूत सबूतों के साथ/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हिन्दुस्तान के जाहिल ही नहीं चाहते विकास</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">तुम्हारा ही भला होगा मूर्खो</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">क्यों नहीं चाहते मिनिरल वाटर पीना</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">क्यों नहीं चाहते इन्स्टेन्ट कुक्ड फ़ुड</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">गँवार ही रहोगे बनाओगे आलू की भुजिया हाथों से/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">नहीं समझते तो मरो/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">विकास की कीमत अता करो/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हम बेखबर इससे सुबह की सुर्खियों को चाय में डुबो के पी रहे हैं </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span><font face="Times New Roman">"</font></span><span style="font-family:Mangal;">टैक्स प्लानिंग के आकर्षक उपाय" के टोस्ट के साथ/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">मुद्दा अल सुबह की बहस का कि शेयर हैं प्रोफ़िटेबल या म्यूचुअल फ़ंड/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">चलो नन्दीग्राम के बहाने खुल सा गया राज़</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हिन्द भर में हो रही मौतें/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">महामारी की मानिन्द बन्दूक का शासन/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">नहीं जानता कि कीमत क्या है विकास की</span><span><font face="Times New Roman">,</font></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">और कौन तय कर रहा है क्रेता विक्रेता इस खेल के/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">बस देखता हूँ तो ये कि मेरा घर,</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">एक भट्टी की तरह दहक रहा है इस आँच से/</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लो एक और कारनामा]]></title>
<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/06/06/27/</link>
<pubDate>Wed, 06 Jun 2007 18:46:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
<guid>http://samvadiya.wordpress.com/2007/06/06/27/</guid>
<description><![CDATA[ताज़ा खबर ये है कि शिवसैना के बहादुरों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ताज़ा खबर ये है कि शिवसैना के बहादुरों ने जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं, मुम्बई की बार गर्ल्स को मारा पीटा/ उन्हें ५ दिन के भीतर घर छॊड़ के चले जाने को कहा गया है/ किस अधिकार के तहत! पता नहीं/ इनमें से कई बार गर्ल्स ऐसी हैं जिन्होंने पूँजी लगा के ये मकान खरीदे हैं/ अब उन्हें छोड़ने को कहा जा रहा है/</p>
<p>मैं नहीं जानता नैतिकता क्या है? समाज के नैतिकता के मानदंड क्या है? मगर एक सवाल ये है कि कब और कैसे शहर को स्वच्छ करने की महान ज़िम्मेदारी इन लोगों के काँधों पर आ गई/ मैं बार गर्ल्स के ऊपर कोई शोध कर चुका होऊँ ऐसा भी नहीं है/ पहले सरकार ने उन्हें मुम्बई को साफ़ बनाने की पहल करते हुए निकाला दिया अब ये भाई लोग/</p>
<p>एक सीधी बात तो ये लगती है कि कमज़ोर को सब दबा सकते हैं सो दबा रहे हैं/ बँगलादेशी घुसपैठियों को निकालने के लिये कोई तार्किक परिणिति वाला अभियान ये नहीं चला सकते/ अय्याश नशे की तिज़ारत का मरकज़ बनते जा रहे शहर को उस गिरफ़्त से आज़ाद कराने की ज़हमत नहीं उठाएंगे रेव पार्टीज़ में जाने वाले अय्याश लोगों के खिलाफ़ ये कुछ नहीं करेंगे/ ये समाज से भ्रष्टाचार हटाने के लिये जंग नहीं करेंगे/ ये मुम्बई को कचरा मुक्त कराने के लिये आगे नहीं आएंगे/ ये धारावी को बेहतर सुविधाएं नहीं देंगे/ ये कभी बिहारियों को पीटेंगे कभी बार गर्ल्स को भगा के शहर साफ़ करने की स्कीम चलाएंगे/</p>
<p>ये सिर्फ़ मवाद को नोचने का काम करेंगे इनके पास दृष्टि ही नहीं है बीमारी की तह तक जाने की/</p>
<p>आखिर मुम्बई में इतनी बड़ी संख्या में बार गर्ल्स क्यों है? क्या यह कोई पसन्दीदा व्यवसाय है? या एक विवशतापूर्ण अर्थोपार्जन? समझ नहीं सकता कि वैश्याओं या कहूँ कि आधुनिक बार गर्ल्स से सबसे ज़्यादा खतरा शरीफ़ लोगों को ही क्यों होता है?</p>
<p>शराफ़त की सारी ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही है/ उन्हें चाहिए कि वे पर्दे में रहें छुप के रहें ढक के रहें ताकि हम धर्मभीरु मर्दों की लार न टपकने लगे/ हमें अपनी शराफ़त पर विश्वास नहीं है? हाँ शायद इसीलिए/</p>
<p>यह कुछ ऐसी बात है कि कोई सुरा प्रेमी किसी दिन निकले और भट्टी वाले को पीटने लगे कि तु बनाता ही क्यूँ है जो मैं तेरे यहाँ रोज़ आ जाता हूँ/ कोई इससे इंकार नहीं करेगा कि बार गर्ल्स का काम कोई शान का काम नहीं है/ मगर ज़रा उनके ग्राहकों की लिस्ट पर भी तो नज़र घुमा ले श्रीमान/ उन लोगों को शहर से जाने को कौन कहेगा जिनके बूते ये कारोबार पनप रहा था और ये बार गर्ल्स अपनी रोज़ी कमा रही थीं?</p>
<p>महाराष्ट्र के आगामी चुनाव को देखते हुए शिवसेना और राज ठाकरे की नव निर्माण पार्टी में यह होड़ लगी हुई है कि कौन कितना तोड़-फ़ोड़ मार-पीट कर सकता है? उनको लगता है शायद वोटर्स इसी से प्रभावित होते हों/ क्यों इसे मराठी अस्मिता का नाम देते हो?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ बाइ कास्ट क्या हैं आप?]]></title>
<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/05/26/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Sat, 26 May 2007 04:14:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
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<description><![CDATA[कुछ दिन हुए केरल के एक प्रख्यात मन्दिर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ दिन हुए केरल के एक प्रख्यात मन्दिर में एक केन्द्रीय मन्त्री के आगमन के उपरान्त मन्दिर को धोया गया पवित्र किया गया/ तर्क यह दिया गया कि चूँकि मन्त्री महोदय की पत्नी ईसाई हैं इसलिए वे और उनकी सन्तानें अपवित्र हैं/ मन्त्री महोदय ने बाद में कहा कि इस प्रकार से तो मेरी सन्तानें और वन्शज कभी किसी मन्दिर में जा ही नहीं पाएंगे/</p>
<p>ऐसी कोई पहली घटना हो ऐसा नहीं है इसके पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएँ विशेषकर दक्षिण भारत के मन्दिरों में हुई हैं/ एक तरफ़ तो हिन्दू धर्म अपने को विस्तृत और उदार होने का दावा करता है और वास्तव में ऐसा बहुत हद तक है भी कम से कम उपनिषद्‌ और वेद तो ऐसा कहते ही हैं और दूसरी तरफ़ जब आचार क्रिया की बात आती है तब बिल्कुल उल्टा हो जाता है/ ब्रहम सत्यं जगन्मिथ्या का नारा बुलन्द करने वाले लोग खूब माया जोड़ने में लगे रहते हैं/</p>
<p>बहरहाल ऐसी घटनाओं के बाद किसी आदमी का स्वाभिमान शायद उसे विवश करेगा कि वो अपना धर्म बदल ले/ तब फ़िर हिन्दुत्व के ध्वजवाहक खूब शोर मचाएंगे/ हम धर्मान्तरण पर तो खूब बहस करते हैं और हल्ला करते हैं मगर उन दलितों और जनजातीय लोगों के लिए मन्दिरों के दरवाज़े खोलने में अब भी आनाकानी करते हैं, जो सैकड़ों सालों से हिन्दू धर्म की ध्वजा घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में फ़हराते चले आ रहे हैं/ कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अगर ईसाई मिशनरी दवाई की गोलियाँ बाँटकर लोगों को क्रिश्चियन बना लेते हैं तो उसमें क्या बुराई है/ हमने तो उन्हें इतनी भी सहूलियत मुहैया नहीं कराई/</p>
<p>हालाँकि मैं जानता हूँ धोखे से या बलात धर्मान्तरण निश्चित रूप से कोई श्लाघ्य कर्म नहीं है मगर क्या हिन्दू धर्म में बने रहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन्हीं की या फ़िर धर्मध्वजियों और विद्वानों की भी है/ हमने सिर्फ़ जाति विशेष को वन्चित रखा हो ऐसा नहीं है/ आबादी की आधी हिस्से महिलाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है/ उज्जैन के महाकालेश्वर की भस्म आरती में महिलाओं को शामिल होने की अनुमति नहीं है/ कई सारे देवी देवता ऐसे हैं जो महिलाओं के छूने से अपवित्र हो जाते हैं फ़िर दलित और गैर हिन्दुओं की बात ही क्या/ ज़रा हिन्दू धर्म की पुनुरुत्थान वाले भाई लोग बताएंगे क्या कि आखिर कौन सा एजेन्डा हिन्दुत्व का पुनुरुत्थान कर सकता है?</p>
<p>हम यह तो चाहते हैं कि सब हिन्दू धर्म का सम्मान करें इसमें कोई आपत्ति है भी नहीं मगर जब भी सड़े-गले मवाद को कोई मसकता है तो बहुतों को दर्द होता है/ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने अपने प्रख्यात पुस्तक "कबीर" में लिखा है कि हिन्दुओं पर जब निरन्तर आक्रमण होते रहे तब उन्होंने अपने आप को एक सीमित दायरे में संकुचित रखने को अपना धर्म मान लिया/ इस की वजह यह रही कि उनके पास शायद उस समय और कोई विकल्प रहे ही नहीं होंगे/ मुझे छुओ मत वाली नीति अपना के रखने के सामाजिक और आर्थिक परिणाम अभी तक भुगतने पड़ रहे हैं/</p>
<p>चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी भी अपने प्रख्यात निबन्ध "कछुआ धर्म" में यही बात कहते हैं कि हमारा धर्म कछुए के समान है जरा कुच हुआ नहीं कि खोल में सरक गए फ़िर जै राम जी की दुनिया में कुछ हुआ करे/ अपन ब्रह्म और माया के चिन्तन में व्यस्त/</p>
<p>मुझे प्रायः ऐसा लगता है कि हमारे धर्म में ढोंग बहुत है/ अब भई कोई मुझे लाठी ले के न दौड़ पड़ना कि तुमने हिन्दू धर्म के बारे में ऐसा कहने की हिम्मत कैसे की/ दूसरे धर्म के बारे में कह के बताते हिम्मत है तो/</p>
<p>तो उन लोगों का जवाब किसी दिन विस्तार से लिखूँगा अभी इतना कह दूँ कि जिस धर्म को मैने देखा समझा और जाना है उसी के बारे में तो लिख सकता हूँ/ आदमी अपने परिवार के बारे में ही लिख सकता है न कि पड़ोसियों के बारे में/ ढोंग इस मायने में कि पानी छान के पीने वाले लोग बेईमानी करने में ज़रा कोताही नहीं करते /गरीब को पटखनी देते रहने में हम ज़रा भी कमी नहीं करते/ ऐसे एकाध नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जिन पर विस्तृत चर्चा की जा सकती है/</p>
<p>उपनिषद्‌ तो कहते हैं त्वं हि स्त्री त्वं हि पुमो॓ऽसि यानि कि तुम ही स्त्रि हो और तुम ही पुरुष/ आदि शंकराचार्य महाराज भी ऐसा ही कुछ कहते हैं अपने निर्वाण षटक्‌ में- "मनोऽबुद्धिऽहंकार चित्तानि नाहम्‌ चिदानन्द रूपं शिवोऽहम्‌ शिवोऽहम्‌" इसी में आगे कहा गया है कि "न मे राग द्वेषो न मे जाति भेदः" न मुझे राग है न द्वेष न जातिभेद/ मगर हम करेंगे ऐसा ही कि जब ट्रेन में कोई आदमी मिलता है तो उससे पूचे बिना रहा ही नहीं जाता कि भाई कौन ठाकुर हो या थोड़ा पढा लिखा आदमी हुआ तो पूछता है "बाइ कास्ट क्या हैं आप?" ये काल्पनिक उदाहरण सुने सुनाये नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सब घटित हुए हैं मेरे साथ/ हममें से बहुतॊ ने इस अनुभव को सहा होगा/</p>
<p>यहाँ कोई दलित विमर्श का नाटक अपन नहीं करने जा रहे/ सीधी बात सीधे लफ़्ज़ों में/ अभी कुछ दिन पहले मैं एक टूर पर था तो साथ के सज्जन ने आखिर कार पूछ ही लिया आप बाइ कास्ट क्या हैं? हो सकता है ये प्रश्न शायद यु.पी.एस.सी. के पेपर में आने वाला हो और उनका कोई दूसरा मन्तव्य न रहा हो/ मगर मैं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में बड़ा अचकचाता हूँ इसलिये नहीं कि मैं किसी कथित नीची या ऊँची जाति से ताल्लुक रखता हूँ बल्कि इसलिए कि यह प्रश्न बहुत ही भौंडा मुझे लगता है/</p>
<p>खैर यह हमारी कथनी और करनी का अन्तर है/ इसमें ज़्यादा क्या बोलूँ/ हमारे इलाकों में आज भी चमार-भंगी एक गाली के तौर पर इस्तेमाल होती आ रही है हमारे सामाजिक परिवेश में? एक घटना याद आ रही है/ हुआ यूँ कि मेरे ओफ़िस के कम्प्यूटर ऑपरेटर से कुछ बात चलते चलते बात जाति के मुद्दों पर आगई/ उसने कहा कि हमारे पूर्वज जो नियम बना गये वे बेवकूफ़ थोड़े ही थे/ हमको उन नियमों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए/ यह तर्क प्रायः वे सब लोग दिया करते हैं जिनके पास खुद के विचार नहीं होते/ मेरे द्वारा इस तर्क का प्रतितर्क दिये जाने पर उसने कहा सर आप कौन सी कास्ट के हैं तब मैं आपसे और ज़्यादा इस मुद्दे पर चर्चा कर सकता हूँ? मैंने कहा फ़िर हमें इस मुद्दे पर चर्चा बन्द कर देनी चाहिए/</p>
<p>बहुत बार लोगों को मैने यह भी कहते सुना है कि हम तो कोई फ़रक नहीं करते मानो उन्हें फ़र्क करने का ईश्वर-प्रदत्त अधिकार प्राप्त हो और इस अधिकार का इस्तेमाल न करके वे कोई एहसान कर रहे हों/ ौनको ऐसा कहते कई बार सुना है कि हम तो दलितों के साथ बैठ के खाना खा लेते हैं/ कुछ लोग बड़े गर्व के साथ ये भी कह्ते हैं कि हमारे घर में अगर पता चल जाए कि हम चमार के साथ बैठे थे तो हमको घर वाले नहलवा दें / इन सब बयानों और बातों में जो underlying assumption है वो ये कि हम दलित के साथ खाना खा के उनपर एहसान कर रहे हैं/ उन पर उपकार कर रहे हैं/ बहरहाल हिन्दुओं ही नहीं तमाम दूसरे धर्म वालों के सामने भी कमोबेश यह जाति प्रथा की समस्या है/ मगर हमारे हिन्दू धर्म में यह कुछ ज़्यादा ही भयावह है/</p>
<p>सवाल ये है क्या एक जातिविहीन समाज का सपना साकार करना सम्भव है? क्या जाति हमारे सामाजिक परिवेश में एक निल फ़ैक्टर बनाई जा सकती है?</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[अच्छे रिटर्न वाले निवेश]]></title>
<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/05/09/%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%b6/</link>
<pubDate>Wed, 09 May 2007 05:28:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
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<description><![CDATA[अच्छी नौकरी लगने के बाद बहुत से लोगों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">अच्छी नौकरी लगने के बाद बहुत से लोगों के सामने समस्या ये आती है कि अब जो पैसा बच रहा है उसका क्या किया जाए</span><span><font face="Times New Roman">? </font></span><span style="font-family:Mangal;">ये समस्या इस ब्लोग को पढ़ने वाले मेरे कई दोस्तों के सामने आ रही होगी/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">एक तो रेडीमेड उपाय है कि बैंक में जमा कर के उसपर ब्याज खाते रहा जाए</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">मगर उसमें लोचा ये है कि जितने की आमदनी होती है उससे ज़्यादा टै़क्स देना पड़ जाता है मतलब जितने की भक्ति नहीं हुई उससे ज़्यादा के मँजीरे फूट जाते हैं/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कुछ जानकार लोग ये भी बताते हैं कि इन्वेस्टमेंट किया जाए/ इन्वेस्टमेंट का मतलब अलग अलग कंपनियों के शेअर में पैसा लगाना</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">म्यूचुअल फ़ंड में पैसा लगाना</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">और बीमा पॉलिसी खरीदना होता है/ मगर खरीदें तो किस कंपनी का ये समस्या है/ ज्ञानीजन इसका उत्तर देते हैं जिसका रिटर्न अच्छा हो उस कम्पनी में पैसा लगाना चाहिये/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इसी जोड़ घटाव में मैं आजकल परेशान हूँ कि कहाँ पैसा लगाया जाए/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">वैसे मैंने कुछ बहुत दमदार रिटर्न देने वाली शेअर कम्पनियों और म्यूचअल फ़ंड की जानकारी इकट्ठी की है/ बिजनेस के इच्छुक लोगों की जानकारी के लिए यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span><font face="Times New Roman">A. </font></span><span style="font-family:Mangal;">सबसे प्रमुख नाम है <strong>हिन्दुत्व </strong></span><strong><span><font face="Times New Roman">&#38; </font></span></strong><strong><span style="font-family:Mangal;">सन्स कम्पनी</span></strong><span style="font-family:Mangal;"> का- इसका हेड ऒफ़िस नागपुर में है और अन्य शाखाएं विभिन्न प्रदेशों की राजधानियों में हैं इस कम्पनी के बारे में खास बात ये है कि इसके रिटेल आउटलेट तमाम सारे कस्बों में मौज़ूद हैं जिन्हें शाखा के नाम से जाना जाता है हालाँकि इन आउटलेट्स से आजकल बिक्री थोड़ी सी डाउन है यहाँ अत्यन्त प्राचीन माल उपलब्ध रहता है जिसकी गुणवत्ता पर कोई सन्देह नहीं किया जा सकता/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">वैसे तो ये कम्पनी काफ़ी पुरानी है मगर इसके शेअर होल्डर बनने क अधिकार सबको नहीं है/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इस कम्पनी ने समय समय पर अनेक म्यूचअल फ़ंड निकाले हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">१. <strong>गौ-वन्श संरक्षण</strong>- यह इसका सबसे पुराना फ़ंड है जिसका रिटर्न बहुत ज़बर्दस्त तो नहीं रहा था मगर इससे कम्पनी को एक पहचान ज़रूर मिली थी/ अब भी पुराने व्यापारी लोग कभी कभी इस फ़ंड के शेअर बेचने की कोशिश यदा-कदा करते रहते हैं/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">२. <strong>स्वदेशी फ़ंड-</strong> यह फ़ंड लोगों को बहुत पसन्द नहीं आया हालाँकि इस फ़ंड में कम्पनी ने कुछ अलग करने की कोशिश की थी मगर शेअर होल्डर्स का इस फ़ंड को अपनाने में नुकसान हो रह था इसलिए यह चला नहीं ज़्यादा/ बाद में रेगुलेटर्स ने इस फ़ंड की बिक्री लगभग खत्म करवा दी/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">३. कम्पनी की ऎतिहासिक योजना है <strong>"मन्दिर पुनर्निर्माण योजना"</strong>- इस योजना ने वाकई लोगों की किस्मत बदल दी/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">जिनको कोई उधार नहीं देता था</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">गाँव भर के लोगों ने उन्हें पूँजी के लिये चन्दे के रूप में चादर भर भर के पैसा दिया/ इस योजना के मेम्बर बन के कोई भी श्रद्धालु व्यापारी कई वर्षों तक निरन्तर लाभ प्राप्त कर सकते हैं हर विधानसभा चुनाव में इस योजना पर डिविडेण्ड दिया जाता है/ यह लाभ उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में दोगुने से भी ज़्यादा हो सकता है/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">यह योजना पहले काशी</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">मथुरा और अयोध्या के लिये लागू थी यानि कि वहाँ पर कम्पनी का अपनी फ़ैक्ट्री डालने का प्लान था मगर उपरोक्त योजना की अद्भुत सफ़लता को देखते हुए कम्पनी ने तय किया कि एक पूरी अलग कम्पनी "राम मन्दिर निर्मांण प्राइवेट लिमिटेड" के नाम से खोल दी जाए/ इस कम्पनी ने १९८८-८९ के दौरान गाँव-गाँव से पूँजी इकट्ठी की और कम्पनी का हेड ओफ़िस अयोध्या में बनाने की कोशिश की मगर वहाँ पर पहले से एक निजी कम्पनी कार्यरत थी जिसकी वजह से हाथा-पाई की नौबत आ गई/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इस नये उद्यम का डिविडेण्ड बहुत शानदार रहा और मालिकों की इसे खोलने की योजना पूरी तरह सफ़ल साबित हुई/ यहाँ तक कि इस कम्पनी के लाभांशों पर आयकर की छूट भी मिल गई/ इसके चूँकि ग्राहक बहुत ज़्यादा थे इस लिये यह तय किया गया कि इस स्कीम को सिर्फ़ चुनावों के समय ही जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा बाकी समय दूसरे छोटे-छोटे फ़ंड उपलब्ध कराए जाएंगे/ इस योजना का पे-बैक समयावधि बहुत कम रही मतलब ये कि बहुत जल्दी रिटर्न मिलना शुरू हो गए/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">अयोध्या-मन्दिर म्य़ूचुअल फ़ंड पहले एक बम्पर रिटर्न दे चुका है इस रिटर्न का लाभ ये हुआ कि उस समय जिसने भी इसके शेअर इफ़रात में खरीद लिये वे सब मन्त्री विधायक सांसद तक हो गये/ कुछ लोग केन्द्र में मन्त्री भी बने और अभी तक बन रहे हैं/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">४. तुष्टिकरण विरोधी म्यूचअल बेनेफ़िट ट्रस्ट- यह ट्रस्ट बहुत ही नेक उद्देश्यों के साथ कम्पनी ने अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिये गठित किया है/ इसमें आप अलग अलग समय में अलग अलग प्लान खरीद सकते हैं/ इस ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी एक पश्चिमी प्रदेश के मुख्यमन्त्री हैं जिनका काम इस ट्रस्ट के सामाजिक सोद्देश्यों को प्रचारित करना और उन्हें बढ़ावा देना है/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">निरन्तर बढ़ती लोकप्रियता और जबर्दस्त बिजनेस के कारण कम्पनी को इस बाज़ार में प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है/ यह प्रतियोगिता ठाकरे </span><span><font face="Times New Roman">&#38; </font></span><span style="font-family:Mangal;">सन्स की वजह से महाराष्ट्र में बढ़ गई है साथ ही कम्पनी के एक पूर्ववर्ती निदेशक ने अपनी अलग कम्पनी लाँच कर दी है/ इन सब कारणों के चलते अभी कुछ रिटर्न में कमी आई है/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कम्पनी नए उपायों के साथ शेअर होल्डर्स को रिझाने में लगी है साथ ही ये बता भी रही है कि "असली हिन्दुत्व सिर्फ़ हम बेचते हैं</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">इस शहर में हमारी कोई अन्य शाखा नहीं है</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">नक्कालों से सावधान" /</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span><font face="Times New Roman">B. </font></span><span style="font-family:Mangal;">बाज़ार की सबसे पुरानी कम्पनी काँग्रेस </span><span><font face="Times New Roman">&#38; </font></span><span style="font-family:Mangal;">फ़ैमिली प्राइवेट लिमिटेड है यूँ तो इस कम्पनी ने लॊंग टर्म इन्वेस्टर्स को जबर्दस्त लाभांश दिये हैं मगर छोटी अवधि के निवेशकों के लिए इस कम्पनी में फ़िलहाल कोई आकर्षक योजना उपलब्ध नहीं है/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इस कम्पनी की खास बात ये है कि इसका निदेशक मंडल यानि बोर्ड ओफ़ डायरेक्टर्स हमेशा एक जुट रहता है सी.ई.ओ. के पीछे और सी.ई.ओ.<span>  </span>की पोस्ट एक ही व्यक्ति के पास आजन्म बनी रहती है/ यदि परिवार में कोई बच्चा पैदा होता है तो कम्पनी को आने वाले सत्तर साल तक नए सी.ई.ओ. की तलाश नही करनी पड़ती/ इस वजह से कम्पनी बाज़ार में स्थिरता की गारंटी का दावा करती है/ इस कम्पनी ने अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया है "गरीबी हटाओ-बम्पर रिटर्न योजना" में/ इस का रिटर्न वाकई बम्पर रहा था और इस रिटर्न के चलते कई सालों तक शेअर होल्डर्स को लाभांश बाँटे जाते रहे/ इस कम्पनी ने अपने टारगेट क्लाइंट के हिसाब से अलअग अलग उत्पाद मार्केट में उतारे हैं जिससे कि इसका पोर्ट्फ़ोलिओ विविधीकृत है/ इस की सबसे खास बात ये है कि यह कम्पनी तब अच्छा प्रदर्शन करती है जब उम्मीद बिल्कुल कम हो/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">अभी मार्केट में ताज़ा फ़ंड इन्होंने उतारा है उसका नाम है "ओ.बी.सी. आरक्षण इन्सेन्टिव प्लान" इसके तहत कम्पनी अपना पब्लिक ऒफ़र देने जा रही है ताकि रिटर्न्स अगले चुनाव तक प्राप्त किये जा सकें मगर कुछ तकनीकी अड़ंगों के चलते यह प्लान ज़ोर की बिक्री पकड़ नहीं पा रहा है/ इसके अलावा स्थानीय स्तर पर कुछ छोटी कम्पनियाँ इस तरह के ऒफ़र के साथ पहले से ही तैयार बैठीं हैं/</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span><font face="Times New Roman">C. </font></span><span style="font-family:Mangal;">इन दो मुख्य कम्पनियों के अतिरिक्त छोटे -छोटे योजनाओं वाली भी कुछ कम्पनियाँ है जिनका रिटर्न पिछले चुनाव वर्षों में ठीक-ठाक रहा है जैसे कि "दलित-वर्ग बेवकूफ़ बनाओ ट्रस्ट" -प्रायोजक मायावती</span><span><font face="Times New Roman">&#38;</font></span><span style="font-family:Mangal;">मायावती</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">मुस्लिम हिमायत शेअर होल्डर्स- मालिक मुलायमसिंह (असली समाजवादी)</span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span><font face="Times New Roman">D. </font></span><span style="font-family:Mangal;">इन सबके अतिरिक्त एक ऐतिहासिक </span><span><font face="Times New Roman">IPO </font></span><span style="font-family:Mangal;">का उल्लेख किये बिना जानकारी अधूरी रह जाएगी/ दर-अस्ल अयोध्या मन्दिर म्यूचअल फ़ंड इस </span><span><font face="Times New Roman">IPO </font></span><span style="font-family:Mangal;">को टक्कर देने के लिये ही उतारा गया था/ इस का नाम है <strong>"मंडल मिलेनियम मेगा ओफ़र" </strong>- इस ओफ़र में नया कुछ नहीं था बल्कि यह तो काफ़ी पहले एक बिजनेस प्रोसेस रि-एन्जिनीयरिंग की रिपोर्ट में पड़ा हुआ था/ मगर अचानक ही कम्पनी के सी.ई.ओ. की नज़र इस पर पड़ी जो कि कम्पनी के अन्दरूनी विद्रोहों से परेशान थे/ उनके इस प्रस्ताव को हाथ लगाते ही उनके स्वयं और इस प्रस्ताव</span><span><font face="Times New Roman">, </font></span><span style="font-family:Mangal;">दोनों के दिन बदल गए/ </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;" class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">कम्पनी हालाँकि बाद में दिवालिया हो गई मगर तगड़े रिटर्न देके गई/ इस कम्पनी से टूट के बनी कम्पनियाँ आज तक इस </span><span><font face="Times New Roman">IPO </font></span><span style="font-family:Mangal;">की तर्ज़ पर मॊडल उतारते रहती हैं/</span></p>
<p><span style="font-family:Mangal;">तो भाई आपके सामने ये सब कम्पनियाँ और उनके स्कीम्स हैं/ बस ये तय कीजिये कहाँ इन्वेस्ट करना है हर तरह का प्लान हाज़िर है/</span><span></span><span><font face="Times New Roman"> </font></p>
<p></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पगडंडी के रास्ते किताब]]></title>
<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/05/03/18/</link>
<pubDate>Thu, 03 May 2007 19:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
<guid>http://samvadiya.wordpress.com/2007/05/03/18/</guid>
<description><![CDATA[ कभी कभी लोग पूछते हैं या बुद्धिजीवी क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> कभी कभी लोग पूछते हैं या बुद्धिजीवी किसिम के दोस्त ज़रूर पूछते हैं कि भाई भास्कर आजकल क्या पढ़ रहे हो? अब सामान्य तौर पर हम कुछ पढ़ते लिखते तो हैं नहीं मगर बुद्धिजीवी दोस्त पूछ के शर्मिन्दा न हो जाएँ इसलिये कुछ बताना लाज़िमी हो जाता है/ अगर हम कह दें कि भाई आजकल नौकरी से फ़ुर्सत मिल ही नहीं रही कि कुछ पढ़ें या यूँ कि शाम को आके हम खाना बनाने में व्यस्त हो जाते हैं इसलिये पढ नहीं पा रहे, तो जितनी शर्म हमें नहीं आएगी उससे ज़्यादा मेरे दोस्त को आएगी कि देखो तो साले को हमारा दोस्त होने का गौरव भी प्राप्त कर रहा है और कुछ पढ़ता ही नहीं है/<br />
इस प्रकार के अप्रिय प्रसंगों से बचाने के लिए मैं कुछ न कुछ बता दिया करता हूँ..वैसे बहुत से भाइयों ने मुझे एक राज़ की बात बताई है आपसे भी शेअर कर सकता हूँ.. वो ये कि जो खाँटी बुद्धिजीवी बनना चाहे उसे पढ़ना अनिवार्य नहीं है/ बुद्धिजीवी लोग किताबें नहीं पढ़ते वे लोग लेखकों को पढ़ते हैं दर-असल वे माल नहीं खरीदते ब्रांड खरीद कर खुश हो रहे होते है/ एक तरीका और है उसे पगडंडी पढ़ाई कहते हैं/ पगडंडी पढ़ाई होती है जैसे हम लोग १०वॊईं १२वीं में पढ़ा करते थे/ मुख्य मुख्य प्रश्नों के उत्तर रट के चले जाते थे और एग्जामिनेशन हॉल में उल्टी कर के भाग आते थे/ बहुत से लोग पगडंडी जेब में रख के भी एग्जाम हाऑल चले आते थे/<br />
इस तरीके के पढ़ाई का मुख्य सिद्धान्त है कि किताब का रिव्यू पढ़ लो/ आलोचना वाले विद्वान उस किताब की अच्छाई बुराई लिख ही देते हैं कण्टेण्ट के बारे में भी पता चल जाता है/<br />
इसके बाद किताब से उद्धरण निकाल के २-४ कहीं नोट कर लो ताकि मौक़े बेमौक़े काम आ सकें/ बाकी बचता है काम लेखक का नाम पता याद रखने के तो वो आसानी से किया जा सकता है/<br />
कभी कभी मैं उन लोगों की प्रतिभा से बहुत कुण्ठित महसूस करता हूँ जो एक बार मे ३-४ नोवेल, २-३ गैर-फ़न्तासी ग्रन्थ और ८-१० दीगरकिताबों का अध्ययन कर रहे होते हैं/ मैं सोचने लगता हूँ यार ऐसे ज़्यादा नहीं कुछ ३-४ हज़ार लोग हिन्दुस्तान में हो जाएं तो लेखकों की गरीबी और पाठकों का अभाव जैसी चिरन्तन समस्याएँ मिट जाए क्योंकि इन लोगों को एक ही समय में १५-२० किताबें पढ़ने की आदत होती है/<br />
ये लोग असल में किताबों की पगडंडियों से गुज़र के पुस्तकों का रसास्वादन करते हैं/<br />
एक दूसरा रास्ता है पम्फ़्लेट पुस्तक का गहन अध्ययन/ ये थोड़ा अलग तरह के पाठक होते हैं जो दुनियाँ के सब विषयों पर न सिर्फ़ कुछ न कुछ पढ़ चुके होते हैं बल्कि शायद ३-४ हज़ार विषयों पर उनकी डॉक्टरेट कम्प्लीट हो गई होती है/ ये सज्जन पम्फ्लेट को भी किताब का आदर देते हैं और उस पम्फ़्लेट को ही बाद में थोड़ा थोड़ा तानते खींचते किताब में बदल देते हैं/<br />
आयुर्वेद की किसी दुकान का विज्ञापन भर पढ़ लेने से इनको आयुर्वेद के निघण्टुओं तक की जानकारी हो जाती है/<br />
मेरे एक मित्र हैं वे सिर्फ़ पढ़ने के लिये पढ़ते हैं/ अच्छी बात है कुछ लोग खाने के लिये ही जीते हैं, ये पढ़ने के लिये जीते हैं/ वे कहते हैं कि मैं सब कुछ पढ्ता हूं वेद्प्रकाश शर्मा से ले के ........ (अंग्रेज़ी के कुछ बड़े नाम थे याद नहीं आ रहे ) तक सबको पढ्ता हूँ/ मतलब लुगदी साहित्य से ले के कालजयी रचनाओं तक सब कुछ/ हमने कहा फ़िर तो आप वर्णमाला और आरतियाँ भी पढ़ सकते हैं क्योंकि आपको तो समय काटने के लिये पढ़ना है या फ़िर पढ़ने के लिये पढ़ना है/ मैं सोच रहा हूँ कि आदमी को अगर पता ही न हो कि उसे क्या पढ़ना है, उसे पता ही न हो कि क्या पढ़ना चाहिये और क्या नहीं तो उस व्यक्ति का दिमाग तो एक कूड़ेदान सरीखा नहीं हो गया कि जिसमें हर घर से कुछ न कुछ मटेरियल सुबह सुबह डाल दिया जाता है/<br />
आइला<br />
कहाँ की बात चल रही थी कहाँ आ गई?<br />
मुद्दा ये बात रही कि लोगों को हम पर कभी कभी शक़ हो जाता है कि हमारा किताबों से नाता रहता है/ और इसी उलझन में पूछ बैठते हैं कि "भाई क्या पढ़ रह हो" यहाँ भैंस चारा खाए कि दूध की गुणवत्ता पर सेमिनार में भाग लेने जाए?<br />
मगर हमारे दोस्त शर्मिन्दा न हों इसलिये हम मज़बूरन बता देते हैं कि भाई अमुक किताब पढ़ रहे हैं/<br />
कुछ दिन हुए एक सज्जन मिले एक वर्कशॉप में उन्होंने भी कुछ ऐसा ही प्रसंग छेड़ दिया ..संयोग से उस समय कोई पुस्तक हम पढ़ रहे होंगे// हमने पुस्तक का नाम बता दिया//<br />
उन्होंने हमारी तरफ़ ऐसे देखा मानो हमने किताब का नाम नहीं बताया हो बल्कि मीटिंग रूम का गिलास बैग में डालते वक़्त पकड़े गए हों/<br />
कहने लगे यार नया क्या पढ़ रहे हो? कन्टेम्परेरी क्या पढ़ रहे हो?<br />
हमने उद्दंडता से जवाब दिया यार ये क्या कण्टेम्परेरी नहीं है? और अगर नहीं है तो उससे क्या मुझे पसन्द है/<br />
उनको शायद मेरी बालहठ पर और मेरी नादानी पर तरस आया होगा इसीलिए कृपापूर्ण निगाहों से देखते रहे/<br />
फ़िर उन्होंने कहा "यार तुम कायदे का क्या पढ़ रहे हो/"<br />
मैने मन में सोचा अगर मेरी बताई हुई किताब के लेखक यह बात सुन लें तो बेचारे लिखना बन्द कर दें और मोबाइल रिचार्ज की दुकान खोल लें/<br />
"कायदे की ही तो है यार ये किताब.." मैने प्रतिवाद में कहा/<br />
"नहीं मेरा मतलब इंगलिश में कुछ नहीं पढ़ते हो?"<br />
हमने कहा "हाँ पढ़ते तो हैं अखबार वगैरह देख लेते हैं अपने विषयों या काम से सम्बन्धित लेख रिपोर्ट्स वगैरह पढ़ते हैं इंगलिश में"<br />
मैने सज्जन के चेहरे पर उभरते मनोबावों से ये अर्थ निकाला कि उनका चेहरा का एक एक अंश कह रहा है कि धिक्कार है तुमपे हिन्दी पढ़ते हो .. अंग्रेज़ी नहीं पढ़ते हो फ़िर क्या ख़ाक पढ़ा तुमने /"<br />
मै बेशर्म वहाँ से खिसक लिया, बुद्धिजीवी सज्जन दुखी हो गये थे/<br />
भाई ऐसा हो गया है इन दिनों कि लोग एक दूसरे को बताते हैं देखो हम ये पढ़ रहे हैं तुमने पढ़ा है कभी इसे?( अरे देखा भी है?)<br />
कभी कभी मैं सोचता हूँ कि हम पढ़ने के लिये पढ़ते हैं या दूसरे को दिखाने के लिये?<br />
हम ज़्याँ पाल सार्त्र पढ़ रहे हैं, हम कृष्णमूर्ति को पढ़ रहे हैं, हम इन्डियन फ़िलोसोफ़ी वाली बुक श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ रहे है अंग्रेज़ी ट्रान्सलेशन है बाबू, हम मार्केटिग की बेस्ट्सेलर पढ़ रहे हैं, हम सिडनी शेल्डन पढ़ रहे हैं, हम नैन्सी फ़्राईडे पढ़ रहे हैं....<br />
लोग शायद ही हिन्दी पढ़ रहे हैं या हो सकता है पढ़ते हों मगर छुपाते हों कि दूसरा सुनेगा तो क्या सोचेगा देखो अभी भी हिन्दी पढ़ता है पूअर चैप.<br />
किताबों की जो दुकानें बड़े बड़े मॉल्स में खुली हैं वहाँ किताबें खरीदना एक कॊस्टली अफ़ेयर बना दिया गया है शायद लग्ज़री से जोड़ के और इसलिये किताब का कथ्य नहीं उसका नाम बिकता है और लेखक का नाम बिकता है/ लग्जरी वाली किताबों की दुकानें हिन्दी जैसी गरीब और दरिद्र भाषा का माल नहीं रखतीं/ उनके कस्ट्मर ऐसे है ही नहीं/<br />
ऐसा भी होता है कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने सोचा हो कि पढ़ने का झंझट बहुत है मगर बुद्धिजीवी तो बनना है..क्या किया जाए? ऐसा करते हैं कि किताबों के ढेर खरीद लेते हैं/<br />
बहुत से कस्ट्मर किताब खरीदने नहीं आते अपने लिये बौद्धिक होने का तमगा खरीदने का भुगतान किस्तों में करने आते हैं/ ऐसा सिर्फ़ किसी भाषा तक सीमित हो ऐसा नहीं है/<br />
मैने महसूस किया है कि आजकल उच्च शिक्षित वर्गे में हिन्दी में पढ़ने को पढ़ना नहीं समझा जा रहा/ जब आपसे प्रश्न पूछा जाता है कि क्या पढ़ रहे हो तब उम्मीद ये की जाती है कि आप किसी धुआँधार किस्म के बड़े से अंग्रेज़ी लेखक का नाम बताएंगे या किसी बेस्टसेलर किताब का नाम...जब मेरे जैसे लोग दोनों कसौटियों पर खरे नहीं उतरते तब उनके विश्वास को बड़ी चोट लगती है, शायद वे सोचने लगते हैं कि अरे अंग्रेज़ी किताबों के बाहर भी कोई पढ़ता लिखता है?</p>
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<title><![CDATA[गायकी का अलग अन्दाज़- शोभा गुर्टू]]></title>
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<pubDate>Sat, 14 Apr 2007 18:12:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
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<description><![CDATA[आर्कुट नाम की चीज़ से जो मुझे सबसे ज़्या]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-family:Mangal;">आर्कुट नाम की चीज़ से जो मुझे सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ वो ये कि तमाम सारा शास्त्रीय संगीत उपलब्ध हुआ सुनने के लिये/</span><span style="font-family:Mangal;">कुछ दिन पहले श्रीमती शोभा गुर्टू जी की कुछ ठुमरियां डाउनलोड की/ शोभा जी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की महान गायिकाओं में से रही हैं उनकी मां मेनकाबाई शिरोड़्कर भी बड़ी गायिका थीं/ शोभा जी ने मुख्यतः उपशास्त्रीय गाया है यानि कि दादरा ठुमरी, चैती और कजरी मगर उपशास्त्रीय के लिये भी तालीम और रियाज़ में कोई छूट की गुन्जाइश है नहीं/</span><span style="font-family:Mangal;">शोभा जी लगभग २ वर्ष पूर्व दिवंगत हो गईं ७८ साल की उम्र में, मगर उनका संगीत विचक्षण है हालांकि उनके संगीत की तकनीकी बारीकियां तो सुर-ताल के महारथी ही जानें मगर अपने को सुनने में जो अच्छा लगे वही बढ़िया लगता है/ उन्हें ठुमरी की साम्राज्ञी की उपाधि दी गई हालांकि उनसे पहले भी कई गायिकाओं ने उपशास्त्रीय गाया है और समकालीन में भी गा रही हैं, मगर वह बुलन्द आवाज़ और खुले गले की गायकी शोभा जी की विशेषता है/ जिन मित्रों का शास्त्रीय संगीत से थोड़ा दूर का नाता है उनके लिये बता दूं कि फ़िल्म “मैं तुलसी तेरे आंगन की” में “सैयां रूठ गये”<span>  </span>और “प्रहार” में “याद पिया की आये” ठुमरियां शोभा जी ने ही गाई है/ कभी मौका मिले तो ज़रूर सुनें एक अलग मज़ा आयेगा.</span><span style="font-family:Mangal;">शास्त्रीय संगीत की तकनीकी बारीकियों से अनभिज्ञ हमारे जैसे लोग भी आनन्द उठा सकते हैं इसका/ उस्ताद विलायत खान साहब फ़रमा गये हैं कि “ठुमरी गाने के लिये तो अल्लाह मियां एक दिल देवें तभी सुनने में मज़ा आता है” तो ठुमरी है भाव की गायकी/ भाव जितना ज़्यादा सही तरीके से और जिस तीव्रता से श्रोता तक पहुंचता है वही गायकी की सफ़लता मानी जाती है/ इस विषय पर थोड़ी गप-शप और मन्थन फ़िर कभी/</span></p>
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