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	<title>केदारनाथ &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/केदारनाथ/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "केदारनाथ"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 22:55:22 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[चार धाम (केदार नाथ)]]></title>
<link>http://sahebali.wordpress.com/?p=26</link>
<pubDate>Thu, 08 May 2008 12:44:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>sahebali</dc:creator>
<guid>http://sahebali.hi.wordpress.com/2008/05/08/26/</guid>
<description><![CDATA[1- केदारनाथ धाम की कुल उंचाई 3581 मीटर
2-गंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1- केदारनाथ धाम की कुल उंचाई 3581 मीटर</p>
<p style="text-align:left;">2-गंगोत्री  कुल उचाई 3200 मीटर</p>
<p style="text-align:left;">3-यमुनोत्री कुल उंचाई 4421 मीटर</p>
<blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>केदारनाथ धाम</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align:center;">भगवान शिव के 12 ज्योतिरलिगों में सबसे महत्वपूर्ण पर्वत-मण्डलों के मध्य एकचित ध्यान लीन केदारनाथ तीर्थ 3581 मी. की ऊँचाई पर मंदाकिनी के तट पर स्तिथ है। हिन्दु धर्म में केदारनाथ की आस्था और मान्यता का कोई पार नहीं है। इस पावन तीर्थ स्थल का उद़गम महाभारत के पृष्ठों में अंकित है। पौराणिक मीन्यतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रूद्रनाथ में मुख, पदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप में पंचकेदार में शिव अर्चना की जाती है। 8 वीं सदी में आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पाण्डवों के प्राचीन मंदिर के समीप है। मंदिर की दीवारों पर देवताओं और पौराणिक गथाओं के चित्रण बड़े सजीव ढंग से अंकित हैं। <a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/kedarnath3.jpg"><img src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/kedarnath3.jpg?w=142" alt="" width="142" height="115" class="alignright size-medium wp-image-27" /></a>मुख्य प्रवेश द्वार पर नन्दी बैल की मूर्ती, पूजा के लिए गर्वगृह, श्रद्धालुओं और आगन्ततुकों के लिए मण्डप, यही केदारनाथ मंदिर का स्वरूप है। सर्दियों में केदारनाथ बर्फ से ढके होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है। मई से अक्टूवर के बीच केदारनाथ मंदिर के दर्शनों के लिये उपयुक्त समय है। आदिगुरू शंकाराचार्य की समाधि केदारनाथ मंदिर के पीछे है।<br />
पौराणिक मतानुसार पांडव ने कुरूक्षेत्र महायुद्ध के पश्चात हस्तिनापुर का राज्य, राजा परिक्षित को सौंप कर अपने परिजनों की मृत्यु का प्रायश्चित करने के लिए उत्तराखण्ड की ओर चल दिये। पर्वत-मण्डल के मध्य इस पावन स्थल पर पहुँचने के बाद पांडवों ने यहाँ पर केदारनाथ मंदिर की स्थापना की।<br />
केदारनाथ मंदिर के प्रमुख देव शिव का सर्दियों का निवास उखीमठ है जो केदारनाथ के पुजारी (रावल) का स्थान भी है। ऋषिकेश से केदारनाथ 223 कि. मी. दूरी पर है। केदारनाथ के पावन दर्शनों के लिए 14 कि. मी. की पद-यात्रा गौरीकुण्ड से आरंभ होती है। यंहा के मुख्य आकर्षक गौरी देवी का मंदिर और गर्म पानी के कुंड हैं। हरे भरे जंगलों के बीच मनमोहक प्राकृतिक दृष्य के अलौकिक आनन्द के साथ श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं, चार-पांच कि. मी. के बाद चट्टीयाँ आती हैं जहाँ पर खाने-पीने की चीजें उपलब्ध होती हैं। जब तीर्थयात्री पहाड़ से निकलते झरनों का अद्भुत दृश्य देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वास्तव में हम स्वर्ग में पहुँच गये हैं। अंत में गरूड़ चटटी आती है जहाँ से केदारनाथ मंदिर के पीछे की बर्फीली श्रृखलाएं नजर आने लगती हैं और अपनी मंजील तक पहुंचने का सुख प्राप्त होता है।<br />
<strong>पंच केदार<br />
श्री केदारनाथः</strong> यह सोन प्रयाग से 19 कि.मी. की दुरी पर स्थित है।<br />
श्री तुंगनाथः गोपेश्वर से 19 कि. मी. की दूरी पर तुगंनाथ का मन्दिर है। इसके निकट आकाश गंगा नामक श्रोत है। तुंगनाथ शिखर तीन जलधाराओं का उद्गम स्थल है।<br />
मद महेश्वरः माला चट्टी से 25 कि. मी. की दूरी पर मद महेश्वर महादेव का मन्दिर है। चौखम्भा की तलहटी पर 3289 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह एक अद्वितीय मन्दिर है। यहां के जल की कुछ बूदें ही मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयाप्त मानी जाती है।<br />
<strong>कल्पेश्वरः</strong> हेलंग से 9 कि. मी. की दूरी पर कल्पेश्वर महादेव का मन्दिर है। यह ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। ऋषि अधर्य ने यहां पर कठिन तपस्या करके सुप्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी का सृजन किया था।<br />
रूद्रनाथः मण्डल चट्टी से 24 कि.मी. की ऊंचाई पर भगवान रूद्रनाथ का मन्दिर है। अपने पूर्वजों के क्रिया-कर्म, तर्पण आदी तथा उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए धर्मावलंबी यहां आते हैं।</p>
<p style="text-align:center;">भारत के उत्तर-पश्चिम में हिमालय की चोटी में बसे केदारनाथ मंदिर की अपनी अलग ही गरिमा है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिन्गों में से एक है। मंदाकिनी नदी के शीर्ष के नजदीक 3584 मीटर की उंचाई पर बसा ये मंदिर एक पवित्र तीर्थस्थान है। हर साल भारी संख्या में तीर्थयात्री और संसार के पर्यटक भक्ति-भाव और रोमांच लिए यहां घूमने आते हैं।</p>
<p style="text-align:center;">महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे। पर भगवान शिव इस भेंट के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि पांडव गोत्र हत्या के दोषी थे। उन्हें आते देख शिव ने बैल का भेष धारण कर लिया। पर जब उन्हें लगा कि उनके बदले भेष ने कोई काम नहीं किया, तो बैल जमीन के नीचे कूदने की कोशिश करने लगा।</p>
<p style="text-align:center;">भीम ने फुर्ती से बैल के पीछे के पैर पकड़ लिए। इस जद्दोजहद में भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से केदारनाथ में अलग-अलग जगह फैल गए। नाभि सहित धड़ मद्महेश्वर में, भुजाऐं तुंगनाथ में, चेहरा रुद्रनाथ में और जटाऐं कप्लेश्वर में। भारत पंच केदार ट्रैक इन पांचों तीर्थस्थानों का ही भ्रमण है।</p>
<p style="text-align:center;">केदारनाथ की यात्रा गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल यात्रा है। जंगलचट्टी, रामबाड़ा और गरुड़ की खूबसूरती से होते हुए यहां पहुंचा जाता है। यात्रा में रामबाड़ा से 1 किमी पहले एक अनुपम भव्य झरना भी मिलता है।</p>
<p style="text-align:center;">मंदिर का ऐश्वर्य उसकी वास्तुकला में दिखता है। 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिर के पास ही है। मंदिर के पूजागृह में कई देवी-देवताओं और भारतीय पौराणिक दृष्य दिखते हैं। मंदिर के दरवाजे के बाहर नंदी बैल की प्रतिमा भी है।</p>
<p style="text-align:center;"> </p>
<p><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/83R8NFCsohY'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/83R8NFCsohY&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span>&#60;</p>
<p style="text-align:center;"><strong>यमुनोत्री</strong></p>
<p style="text-align:center;">उत्तरकाथी जिले में समुद्रतल से 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है, देवी यमुना का मंदिर- यमुनोत्री। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलारिया ने कराया था। चार धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी ) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है। गढ़वाल हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यमुना पावन नदी का स्त्रोत कालिंदी पर्वत है। तीर्थ स्थल से एक कि. मी. दूर यह स्थल 4421 मी. ऊँचाई पर स्थित है। दुर्गम चढ़ाई होने के कारण श्रद्धालू इस उद्गम स्थल को देखने से वंचित रह जाते हैं। यमुनोत्री का मुख्य मंदिर यमुना देवी को समर्पित है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार यह असित मुनी का निवास था। वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। भूकम्प से एक बार इसका विध्वंस हो चुका है, जिसका पुर्ननिर्माण कराया गया। यहाँ पर श्रधालु अविभूत हो जाते हैं और अपनी सारी थकान को भूल जाते हैं।<br /><a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/pic_yamunotri.jpg"><img src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/pic_yamunotri.jpg?w=250" alt="" width="250" height="150" class="alignleft size-medium wp-image-28" /></a><a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/gangotritemple.jpg"><img src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/gangotritemple.jpg?w=300" alt="" width="300" height="214" class="alignright size-medium wp-image-29" /></a><br />
सूर्यकुण्ड गरम पानी के मुख्य स्त्रोतों में से एक है जिसका तापमान भी काफी अधिक होता है। श्रधालु कपड़े में चावल या आलू बाँधकर इस कुण्ड में डालते है जो थोड़ी देर में पक कर उपर आ जाते है इसी का भोग मंदिर मे लगता है और यही यहाँ का प्रसाद भी है। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है जिसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है। यमुनोत्री मंदिर परिशर 3235 मी. उँचाई पर स्थित है। यँहा भी मई से अक्टूबर तक श्रद्धालुओं का अपार समूह हरवक्त देखा जाता है। शीतकाल मे यह स्थान पूर्णरूप से हिमाछादित रहता है। मोटर मार्ग का अंतिम विदुं हनुमान चट्टी है जिसकी ऋषिकेश से कुल दूरी 200 कि. मी. के आसपास है। हनुमान चट्टी से मंदिर तक 14 कि. मी. पैदल ही चलना होता था किन्तु अब हलके वाहनों से जानकीचट्टी तक पहुँचा जा सकता है जहाँ से मंदिर मात्र 5 कि. मी. दूर रह जाता है। <strong>गंगोत्री</strong><br />
 हिमालय की गोद उत्तरकाशी से 104 कि. मी. की दूरी पर स्थित यह तीर्थ स्थल श्रद्धालुऔं के लिए अति महत्वपूर्ण है। मान्यता यह है कि इसी स्थान पर अवतरित होकर माँ गंगा ने धरती माता को कृतार्थ किया था। यह स्थल समुद्रतल से 3140 मी. की ऊँचाई पर स्थित है। युगों-युगों से मई से अक्टूबर तक लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थल की यात्रा करते हैं। शीतकाल में यह स्थल पूर्ण रूप से बर्फ से ढक जाता है। पुराणों में कहा है कि स्वर्ग की बेटी गंगा देवी ने गंगा का रूप लेकर राजा भागीरथ के पूर्वजों का उद्घार किया था। शताब्दियों की कड़ी तपस्या के बाद ही गंगा देवी ने भागीरथ की मनोकामना पूरी की थी। गंगा को इसी लिये भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है। भागीरथी के दाएँ तट पर गंगा देवी को समर्पित गंगोत्री मंदिर है। 18वीं शताब्दी में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा इसका निर्माण हुवा था। भागीरथी या गंगा का मुख्य स्त्रोत गौमुख है जो गंगोत्री से 18 कि. मी. दूर पैदल यात्रा के रास्ते पर है। कई श्रद्धालु गौमुख को ही पूरी यात्रा मानते हुए वहाँ जाना आवश्यक समझते हैं और वहाँ पर स्नान कर अपने भाग्य को धन्य समझते हैं। जलमग्न शिवलिंग दिव्य शक्ति और आलौकिक आस्था का लजीव चित्रण है। पुराणों के अनुसार इसी स्थान पर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया था। पूर्ण शिवलिंग केवल शीत ऋतु में ही दिखाई देता है जब पानी का स्तर कम हो जाता है।</p>
<p>हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्य की बेटे यामा ने कहा था कि जो व्यक्ति उसकी बहिन यमुना के नदी स्वरूप में स्नान करेगा, उसे वह कभी परेथान नहीं करेगा।</p>
<p>हनुमानचट्टी से 13 किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है। मंदिर के दर्शन से पहले चट्टान से बनी दिव्य शिला की पूजा होती है। मुख्य पूजा से पहले जमुनाबाई कुंड में पवित्र स्नान होता है।</p>
<p>यमुनोत्री में बर्फीले ग्लेशियर के पास ही खौलते कुंड भी हैं, जिनमें प्रमुख सूर्य कुण्ड है। इस कुण्ड में पोटली में चावल या आलू बांधकर पानी में डालकर पकाया जाता है। ये ही मंदिर का प्रसाद माना जाता है।</p>
<p>यात्रा का रूट- हरिद्वार से चम्बा, टिहरी, उत्तरकाशी होते हुए चार धाम कैम्प गंगोत्री।</p>
<p>कुल दूरी- हरिद्वार से 295 किमी।</p>
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