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	<title>खास-दिन &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/खास-दिन/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "खास-दिन"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 18:20:46 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[दिवाली...घर से दूर]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/08/diwali-2007/</link>
<pubDate>Thu, 08 Nov 2007 19:54:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/08/diwali-2007/</guid>
<description><![CDATA[इस बार दिवाली पर घर जाना नही हो पाया&#8230;.]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस बार दिवाली पर घर जाना नही हो पाया....हैदराबाद में ही मनेगी अपनी दीवाली। ऐसा नही है की पहली बार घर से दूर दिवाली मना रहा हूं, छात्रावास में पढाई होने के चलते बचपन की सब दीवालियां घर से दूर ही मनी हैं, लेकिन कालेज के समय से कोशिश रही है कि दिवाली पर तो घर पहुँच ही जायें। खैर...</p>
<p>तो अपना दुखडा साझा करते हैं उन लोगों के साथ, जिनका कि काम ही ऐसा है कि उनकी दिवाली भी घर से बाहर, अपनों से दूर ही मनता है। शायद इसलिये कि हम और आप जैसे कई, दिवाली पर समय से अपने घर पहुंच जायें...या हमारी दिवाली जगमगाती हुई मने...या हमारी दिवाली सुरक्षित, सुकून भरी मने। शायद ये पर्दे के पीछे के वो कलाकार हैं जो स्क्रीन पर नजर तो नही आते, पर मंच पर होने वाले हर घटनाक्रम में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।</p>
<p>ड्राइवर- एक दुनिया है जो रास्ते पर चलती है। सडक पर, रेल की पटरियों पर। बस, ट्रक, ट्रेन...। बदकिस्मती से एक दिवाली की एन शाम को, पूजन के समय बस में सफर करना पडा था। बहुत अजीब लगता है उस समय। जरा सोंचिये..आप अंधेरे में चले जा रहे हैं...सडक/पटरी के दोनो और दुकाने , घर, रास्ते जगमगा रहे हैं, पटाखों की आवाजें आ रही हैं...और बस के भीतर अंधेरा, इंजन की घर्र-घर्र और ठिकाने पहुंचने की जल्दी । बहुत अजीब सा महसूस होता है। हम तो फिर भी १-२ घंटे में घर पहुंच जायेंगे..लेकिन जो चला रहा है...वो तो घर से दूर ही है..पता नही कब पहुंचेगा।</p>
<p>पुलिस- पुलिस वालों का काम त्यौहारों पर और बढ जाता है..खासकर होली दिवाली दशहरा...जब हुडदंग होने की संभावना अधिक हो। शायद इसीलिये यह विभाग हर त्यौहारों दूसरे दिन मनाता है...मुख्य त्यौहार शांति से निपट जाये..तो इनकी सिरदर्दी हटे।</p>
<p>बिजली विभाग- वैसे तो आमतौर पर बिजली के आने जाने से कोई फर्क नही पडता, आदत हो चुकी है। पर दिवाली की शाम को इनके ऊपर खास दबाव रहता है, आपूर्ती बनाये रखने का। भई रोशनी की शाम है, इस दिन तो बनी रहे।</p>
<p>आपातकालीन सेवाएं (स्वास्थ्य, अग्निशमन आदि)- दिवाली जैसे त्यौहारों पर इन सेवाओं का काम और बढ जाता है विशेषकर पटाखे चलाते समय बरती असावधानियों की वजह से।</p>
<p>अगर आप भी घर से दूर हैं...तो मेरे और इन लोगों के साथ दुख साझा कर सकते है :)</p>
<p>**********************************************</p>
<p>यह दिवाली आपके जीवन में सुख, समृद्धी, हर्ष, उल्लास लाये।<br />
खुशियों के दीप आपकी जिन्दगी में झिलमिलाएं।<br />
आप सबको रोशनी के इस पर्व की हार्दिक मंगलकामनाएं।</p>
<p>और हाँ, खूब खायें, पियें नही। दीप जलायें, पटाखे नही। दिल मिलायें, पत्ते नही।<br />
:)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरे जवाब - लाक/फ्रीज़ किये जायें]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/03/03/savaal/</link>
<pubDate>Sat, 03 Mar 2007 12:57:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/03/03/savaal/</guid>
<description><![CDATA[सागर जी ने जब थोक में अपने शिकार बनाये ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सागर जी ने जब थोक में अपने <a target="_blank" href="http://nahar.wordpress.com/2007/02/24/fivequistions/">शिकार बनाये </a>थे तो मुझे भी लपेटे मे ले लिया था...८ सवाल पूँछे हैं जबकि चलन ५ का ही है । इंजिनियरिंग की परीक्षा में हमारे यहाँ ८ प्रश्न आते थे पेपर में, जिनमें से किन्ही ५ का उत्तर हमें देना होता था। प्रति प्रश्न २० नम्बर और उस १०० में से भी पास होने के लिये मात्र ३३ नम्बर की जरूरत होती थी । आदत कुछ-कुछ अभी भी वैसी ही पडी हुई है सो उसी हिसाब से प्रश्न पत्र हल करते हैं..३३ का लक्ष्य रख कर, इधर उधर ताका-झांकी करते हुए.. :)</p>
<p><strong>पहला सवाल: </strong> आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?</p>
<p>प्रश्नकर्ता के चिट्ठे से ही चेंपता हूं...</p>
<p><em>"इस  प्रश्न में दो की सीमाओं में बंधना मुझे मंजूर नहीं और वैसे भी दो का चयन करना बहुत मुश्किल है।"..</em>डान की भाषा में कहूँ तो मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है....काफी पहले <a href="http://saptrang.wordpress.com/2005/08/31/%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a5%8c%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a5%a7/">पढने का शौक</a> नाम से एक लेख लिखा था..उसकी दूसरी किस्त आज भी इंतजार कर रही है, लेकिन पास होने लायक जवाब वहाँ मिल ही जायेगा ।</p>
<p>फिर भी ये बता सकता हूँ कि किस तरह की पुस्तकें पढना पसंद करता हूँ । गीताप्रेस, गोरखपुर का तमाम साहित्य मुझे बहुत प्रिय है,  डोमेनिक लेपायर की सभी पुस्तकें जिनमें उन्होने ऐतिहासिक घटनाओं का काफी शोधपरक चित्रण किया है मुझे काफी अच्छी लगी (Freedom at Midnight, Paris is Burning, Oh!Jerusalam आदि)।  आत्मकथाएं मुझे बहुत अच्छी लगती हैं..(हाल ही में पढी स्टीव वा की "Out of My Comfort Zone") , और सुरेन्द्र मोहन पाठक के तमाम जासूसी उपन्यास।</p>
<p>फिल्में....हल्की फुल्की फिल्में देखना पसंद करता हूँ..बहुत भारी ना हों..मनोरंजन करें..ना कि उदास कर दें...वैसे संजीव कुमार-जया भादुडी की "कोशिश" मुझे बहुत पसंद है..दोनो के अभिनय की वजह से....अमोल पालेकर-उत्पल दत्त की फिल्में, फारुख शेख दीप्ती नवल की २-३ फिल्में ।वैसे इस मुद्दे पर अनुगूंज में एक चर्चा हो चुकी है कि <a target="_blank" href="http://saptrang.blogspot.com/2005_11_01_archive.html">हम फिल्में क्यो देखते </a>हैं । थोडे जवाब वहाँ भी मिल जायेंगे।</p>
<p><strong>दूसरा </strong> इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)</p>
<p>पहले चिट्ठा पढना - पढने का तो शौक है ना...और कुछ दिमाग चलाना भी नही होता, और इतनी अच्छी अच्छी सामग्री मिलती है ।</p>
<p>फ़िर टिप्पणी पढना। वजह ? किसी क्रिया की कितनी, और किस किस तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, जानने में बहुत मजा अता है, और मेरी सोंच-समझ के दायरे को बढाती है, दिमाग की खिडकियाँ खोलती हैं...</p>
<p>टिप्पणी करना - तीसरे नम्बर पर है...कई बार कई चिट्ठे बहुत अच्छे लगते हैं, पर समझ नही आता कि क्या लिखूँ, कई बार ऐसा हुआ है कि ’टिप्पणी करे” पर क्लिक किया, बहुत देर सोंचा कि क्या लिखूं, और फिर बन्द कर दिया । सोंचता हूं कि सिर्फ यह लिख देना कि "बहुत अच्छा लिखा", लिखने वाले के साथ अन्याय होगा।</p>
<p>और फिर चिट्ठा लिखना, हाथ पैर हिलाने पडते हैं, दिमाग चलाना पडता है । समय भी निकालना पडता है । कई बार हुआ है कि घूमते फिरते कोई विचार आया है लिखने को, लेकिन शाम तक गायब । वैसे ये क्रम इसलिये भी ठीक ही है कि अपनी चिट्ठाकारी का भी यही क्रम रहा है, पहले चिट्ठे और टिप्पणियां पढना शुरू की, फिर टिप्पणी करना..और फिर खुद का चिट्ठा बनाया ।</p>
<p><strong>तीसरा </strong>आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?</p>
<p>अगर समय इजाजत देता है तो लगभग हर चिट्ठा पढता हूँ, लेकिन पसंद पूँछी जाये तो पहले नम्बर पर संस्मरणात्मक चिट्ठे आते हैं । कई लोगों को पढ कर लगता है कि खुद की जिन्दगी पढ रहे हैं, ये तो अपने साथ भी हुआ था (या अपने साथ भी <em>नही</em> हुआ था ;) ) या इस तरह की खामी/खूबी वाले सिर्फ हम ही नही हैं । उसके बाद हास्य व्यंग्य आते हैं । और साथ ही सम सामयिक मुद्दों पर लिखे चिट्ठे । भारी कविताएं बिल्कुल हजम नही होती...उलझ कर रह जाता हूँ । तकनीकी चिट्ठे कई बार कमाल की जानकारी दे जाते हैं ।</p>
<p><strong>चौथा </strong>चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है?</p>
<p>व्यापार, व्यवसाय पर कोई फर्क नही लेकिन खुद पर बहुत फर्क पडा है । दुनिया को, घटनाओं को देखने का नजरिया बदला है । अपनी सोंच का दायरा बढा है । पहचान का दायरा बढा है । मुझे मालूम है कि हिन्दुस्तान/दुनिया के अनेक शहरों में मेरे जानने वाले रहते हैं...कभी मिला नही तो क्या हुआ। साथ ही यह भी कि जिन्दगी में बहुत कुछ देखना और करना बाकी है ।</p>
<p><strong>अंतिम सवाल…. </strong>. आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?</p>
<p>सबसे मिलना चाहूँगा..क्योंकि ऐसा कोई भी नही है जिससे ना मिलना चाहूँ :)</p>
<p>सागर जी से <a target="_blank" href="http://saptrang.blogspot.com/2006/05/blog-post_28.html">हैदराबाद </a>में और बैंगानी परिवार से अहमदाबाद में(<em>विवरण लिखना बकाया है</em>) मिल चुका हूँ । और भी जिन जिन शहरों में जाने का मौका मिलेगा वहाँ के चिट्ठाकारों से जरूर मिलूंगा । वैसे अभी हैदराबाद के ही सारे लोगों से नही मिल पाया हूँ ...</p>
<p>तो सागर जी ..८ में से ५ के जवाब हमने दे दिये....पास हम हमेशा होते आये हैं..इस बार भी हो जायेंगे ये हमें अच्छे से मालूम है. टाप करने की अपनी कोई इच्छा है नही :) कभी रही भी नही । और हाँ अगर पास ना किया.....तो जाओगे कहाँ..एक ही शहर के बाशिन्दे हैं.. निपट लेंगे.. :D</p>
<p>मैं आगे किसी को <em>टैग</em> नही कर पा रहा हूँ क्योंकि मेरी जानकारी में लगभग सारे सक्रिय चिट्ठाकार लपेटे में आ चुके हैं और हम "शिकार का शिकार नही करेंगे :D " </p>
<p>************************************************* </p>
<p>आप सब को होली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें...</p>
<p>आपकी होली  रंगीली, सजीली, छबीली, तडकीली- भडकीली, रसीली, लाल-गुलाबी-नीली-पीली, सूखी-गीली हो ऐसी हमारी कामना, मनोकामना, मंगलकामना है...</p>
<p>चलते चलते होली का एक <em>रसिया</em> (इस बार घर ना जा सकने की वजह से खुद ने मन ही मन गा लिये.. </p>
<p><strong>होरी खेलूँगी श्याम संग जाय,<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥१॥</strong></p>
<p class="snap_preview"><strong>फागुन आयो…फागुन आयो…फागुन आयो री<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री</strong></p>
<p><strong>वो भिजवे मेरी सुरंग चुनरिया,<br />
मैं भिजवूं वाकी पाग ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥२॥</strong></p>
<p><strong>चोवा चंदन और अरगजा,<br />
रंग की पडत फुहार ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥३॥</strong></p>
<p><strong>सास निगोडी रहे चाहे जावे,<br />
मेरो हियडो भर्यो अनुराग ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥४॥</strong></p>
<p><strong>आनंद घन जेसो सुघर स्याम सों,<br />
मेरो रहियो भाग सुहाग ।<br />
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥५॥</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मीठा मीठा थू थू...!!!]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/11/15/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a5%82-%e0%a4%a5%e0%a5%82/</link>
<pubDate>Wed, 15 Nov 2006 07:32:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[कल बाल दिवस था, बच्चों के प्यारे चाचा न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल बाल दिवस था, बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू का जन्म दिन ।सबको शुभकामनाएं(देर से ही सही) ।</p>
<p>पर कल एक और दिन भी था, वो था, विश्व मधुमेह दिवस, World Diabities Day. सुबह अखबार नही पढा था, सो शाम को टी.वीं पर देख कर पता चला, जहाँ कुछ 'विशेषज्ञ' इस पर 'गहन चर्चा' कर रहे थे ।मधुमेह के लिये भी कोई दिन रखा गया है, ये मुझे मालूम नही था, लेकिन अब मालूम चल गया(ठीक वैसे ही जैसे ग्रीटिंग कार्ड कम्पनियों की बदौलत फ़ादर्स, मदर्स, (गर्ल)फ़्रेंड्स और नाना प्रकार के दिन होने लगे हैं)। तो टी. वी. से ही पता चला की विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रपट के अनुसार सन २०२५ तक भारत में करीब  ८ करोड मधुमेह रोगी होंगे ।</p>
<p>वर्तमान में कितने हैं ये तो मुझे पता नही, लेकिन अब तक मैने जितना भी पढा है, सब इस बात की और संकेत करते हैं कि आने वाले समय में मधुमेह भारत के लिये एक बडी चुनौती होगा । खानपान की आदतों में बदलाव और जीवन शैली में परिवर्तन इसका एक बडा कारण मान जा रहा है,एक ऐसा कारण जिसका निवारण, 'डान' की भाषा में कहें तो, मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है । क्योंकि परिवर्तन तो होगा उसे रोकना असंभव है...हाँ प्रभावों को कम करने की कोशिश की जा सकती है। और सच कहें तो खानपान की समस्या के तो हम खुद भुक्तभोगी हैं ।</p>
<p>ज्यादा चिन्ता की बात ये है, कि शिकार होने वाला एक बडा हिस्सा बच्चों/किशोरों का है, वो तबका जो आज भारत की सबसे बडी पूंजी है, जिसके दम पर हम महाशक्ति बनने का सपना देख रहे हैं, क्योंकि २०२५ तक हमारे पास दुनिया के सबसे ज्यादा जवान लोग होंगे, पर अगर ये जवान मोटापा और मधुमेह जैसी बीमारियों के शिकार हुए तो ?</p>
<p>२-३ साल पहले , कोचिंग इंस्टिट्यूट में हमारे गुरूजी ने एक बात कही थी, सार कुछ इस तरह से था...आने वाले १० साल में भारत की युवा पीढी के लिये तीन चीजें सबसे बडा खतरा होंगी एड्स, मधुमेह और गुटखा/तम्बाकू । आप क्या सोंचते हैं इस बारे में?</p>
<p>चलते चलते ये भी सोंचियेगा कि ८-१० करोड लोगों  का यह समूह, कितना बडा बाजार होगा । अगर १० रुपये रोज प्रति व्यक्ति भी खर्च हो, तो आज के हिसाब से ही करीब २५-३० हजार करोड का बाजार, २०२५ तक तो ये रकम कहाँ पहुंच जायेगी ।गौरतलब है कि एक निजी बीमा कंपनी ने हाल ही में डायबिटीज के रोगियों के लिये विशेष बीमा योजना निकाली है ।याने नजर तो पड ही चुकी है भाई लोगों की यहाँ....आगे आगे देखिये होता है क्या?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वंदे मातरम]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/07/vande_maataram/</link>
<pubDate>Thu, 07 Sep 2006 06:45:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/07/vande_maataram/</guid>
<description><![CDATA[
वन्दे मातरम ।
सुजलाम् सुफलाम् मलयज शी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2006/09/vande-mataram.jpg" title="वन्दे मातरम" class="imagelink"><img width="184" src="http://saptrang.wordpress.com/files/2006/09/vande-mataram.jpg" alt="वन्दे मातरम" height="154" /></a></p>
<p>वन्दे मातरम ।</p>
<p>सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम् ,</p>
<p>सस्य श्यामलाम् मातरम्।</p>
<p>वन्दे मातरम ॥</p>
<p>शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनिम् ,</p>
<p>फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनिम्,</p>
<p>सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्,</p>
<p>सुखदाम् वरदाम् मातरम्,</p>
<p>वन्दे मातरम ॥</p>
<p>***********************************</p>
<p><strong><u>'वंदे मातरम' से संबंधित कुछ  तथ्य और तारीखें</u></strong></p>
<p><strong></strong></p>
<p><strong>७ नवम्वर १८७६</strong> बंगाल के कांतल पाडा गांव में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 'वंदे मातरम' की रचना की ।</p>
<p><strong>१८८२</strong> वंदे मातरम बंकिम चन्द्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास <em>'आनंद मठ'</em> में सम्मिलित ।</p>
<p><strong>१८९६</strong> रवीन्द्र नाथ टैगोर ने पहली बार 'वंदे मातरम' को बंगाली शैली में लय और संगीत के साथ कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गाया ।</p>
<p>मूलरूप से 'वंदे मातरम' के प्रारंभिक दो पद संस्कृत में थे, जबकि शेष गीत बांग्ला भाषा में ।</p>
<p>अंग्रेजी में सबसे पहले अनुवाद अरविंद घोष ने किया ।</p>
<p><strong>दिसम्बर १९०५</strong> में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया, बंग भंग आंदोलन में 'वंदे मातरम' राष्ट्रीय नारा बना।</p>
<p><strong>१९०६</strong> में 'वंदे मातरम' देव नागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया, कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया ।</p>
<p><strong>१९२३</strong> कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठे ।</p>
<p>पं. नेहरू, मौलाना अब्दुल कलाम अजाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव की समिति ने <strong>२८ अक्तूबर १९३७</strong> को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में इस राष्ट्रगीत के गायन को अनिवार्य बाध्यता से मुक्त रखते हुए कहा था कि इस गीत के शुरुआती दो पैरे ही प्रासंगिक है, इस समिति का मार्गदर्शन रवीन्द्र नाथ टैगोर ने किया ।</p>
<p><strong>१४ अगस्त १९४७</strong> की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ 'वंदे मातरम' के साथ और समापन 'जन गण मन..' के साथ..।</p>
<p><strong>१९५०</strong> 'वंदे मातरम' राष्ट्रीय गीत और 'जन गण मन' राष्ट्रीय गान बना ।</p>
<p><strong>२००२ </strong>बी.बी.सी. के एक सर्वेक्षण के अनुसार 'वंदे मातरम' विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ।</p>
<p>चित्र साभार <a target="_blank" href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=71">जोगलिखी</a></p>
<p>विषय वस्तु <a target="_blank" href="http://www.rajasthanpatrika.com/vandematram/index.asp">राजस्थान पत्रिका</a> से साभार</p>
<p>और हाँ, 'वंदे मातरम' से मेरी पहली याद दूरदर्शन से जुडी हुई है, जब <em>दूरदर्शन</em> की सुबह की सभा की शुरुआत इसी मधुर गान से हुआ करती थी...आज भी वंदे मातरम जुबां पर आते ही वही धुन मन में गूंज उठती है..</p>
<p><strong>पुनश्चः</strong> <a target="_blank" href="http://soumyadipc.blogspot.com/2006/09/vande-mataram-various-versions.html">सौम्यदीप </a>ने अपने चिट्ठे पर वन्दे मातरम की २८ विभिन्न धुनों, रागों एवं शैलियों का संकलन किया है...अवश्य सुनें</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नमन]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/05/naman/</link>
<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 07:12:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/05/naman/</guid>
<description><![CDATA[आज शिक्षक दिवस के अवसर पर समस्त गुरुज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज शिक्षक दिवस के अवसर पर समस्त गुरुजनों को प्रणाम एवं नमन,जिनकी सीख एवं आशिर्वाद से जीवन में कुछ करने के काबिल बना ।</p>
<p>साथ ही अनन्त चतुर्दशी एवं ओणम की बधाई एवं शुभकामनाएं !!!</p>
]]></content:encoded>
</item>

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