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	<title>ग़ालिब &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/ग़ालिब/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "ग़ालिब"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 17:09:59 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[इस जानिब य उस जानिब]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=902</link>
<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 04:20:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/03/13/is-jaanib-ya-us-jaanib/</guid>
<description><![CDATA[इस जानिब य उस जानिब
कौन &#8216;नज़र&#8217; है कौन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">इस जानिब य उस जानिब<br />
कौन 'नज़र' है कौन 'ग़ालिब'</font></p>
<p><font color="#000000">एक बला है दर्दे-निहाँ<br />
कौन बुरा कौन भला साहिब</font></p>
<p><font color="#000000">यह मंडी भी ख़ूब है जिसमें<br />
दाम नहीं देता कोई वाजिब</font></p>
<p><font color="#000000">दिन को जी भर सो लिये<br />
हुए रात ख़ाबों से मुख़ातिब</font></p>
<p><font color="#000000">ज़ख़्म सीने पर पोंछ लिये<br />
थी उसे चुपचाप मुनासिब</font></p>
<p>दर्दे-निहाँ= छुपा हुआ दर्द, unsaid pain</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
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<title><![CDATA[ग़ज़ल ग़ालिब की होती थी मगर...]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/21/ghazal-to-galib-ki-hoti-thi-magar/</link>
<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 07:57:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.hi.wordpress.com/2007/11/21/ghazal-to-galib-ki-hoti-thi-magar/</guid>
<description><![CDATA[ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="storytext">ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत दसवीं शताब्दी में फ़ारसी कविता में हुई थी और बारहवीं शताब्दी में यह इस्लामी सल्तनतों और सूफ़ी संतों के साथ दक्षिण एशिया में आई. उर्दू ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान में बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं. ग़ज़ल के कुछ नियम हैं जैसे मतला, मक़्ता, रदीफ़, काफ़िया, बहर और वज़न. ग़ज़ल की हर पंक्ति को मिस्रा कहा जाता है और दो मिस्रों से मिलकर बनता है शेर. पहले शेर को मतला कहा जाता है और आख़िरी शेर को मक़्ता जिसमें शायर का नाम छिपा होता है. हर मिस्रे के अंतिम शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं जैसे मीर की ग़ज़ल का ये शेर देखिए....</p>
<p class="storytext"><em>देख तो दिल के जां से उठता है<br />
ये धुंआ सा कहां से उठता है.<br />
</em><br />
इसमें उठता है हर शेर के अंत में आएगा जिसे रदीफ़ कहते हैं और उससे पहले मिलते-जुलते शब्द आएँगे जैसे जां से उठता है, मकां से उठता है, जहां से उठता है....इसे काफ़िया कहते हैं. पहले शेर में ये दोनों मिलते जुलते होने चाहिए जबकि बाक़ी के शेरों की पहली पंक्ति में कुछ भी हो सकता है जबकि दूसरी पंक्ति में वह मिलता जुलता होना चाहिए. ग़ज़ल एक लयबद्ध कविता है. हर शेर तबले की थाप पर पढ़ा जा सकता है इसलिए ज़रूरी है कि दोनों मिस्रे बराबर हों. इसे वज़न कहा जाता है. और बहर हिंदी कविता के छंद के समान हुई जो बड़ी या छोटी कैसी भी हो सकती है. ग़ज़ल की एक विशेषता यह भी है कि हर शेर में बात पूरी हो जानी चाहिए.</p>
<p class="storytext"><!-- end_story -->उर्दू के बहुत से शायरों ने ग़ज़ल को बहुत समृद्ध किया है लेकिन ग़ालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. दुष्यंत ने ग़ज़ल को हिंदी में कहने की कोशिश की और यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा. दुष्यंत ने हिंदी ग़ज़ल के ज़रिए जीवन की वास्तविकताओं को उकेरा है. ग़ज़ल का इस्तेमाल हिंदी फ़िल्मों में भी बढ़चढ़कर हुआ है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेगम अख़्तर, मुन्नी बेगम, ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत सिंह आदि गायकों ने ख़ूब ग़ज़लें गाई हैं.</p>
<p class="storytext" style="font-size:11px;"><em>Source: BBC</em></p>
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