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	<title>गेहूँ &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "गेहूँ"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 04:16:07 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[धान के कम न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों में रोष]]></title>
<link>http://cpimlnd.wordpress.com/?p=33</link>
<pubDate>Sun, 23 Dec 2007 00:05:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>cpimlnd</dc:creator>
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<description><![CDATA[हाल ही में धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">हाल ही में <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उचित वृद्धि न करने के सवाल पर दक्षिण भारत में किसानों के कई प्रदर्शन व रास्ता रोको कार्यक्रम हुए और विशेषकर </span><span style="font-family:Mangal;"><span title="Click to correct" class="transl_class">आंध</span></span><span style="font-family:Mangal;"> <span title="Click to correct" class="transl_class">प्रदेश</span> की सरकार पर काफी दबाव बना। <span title="Click to correct" class="transl_class">आंध्र</span> प्रदेश, तमिलनाडु व अन्य प्रान्तों के विपक्षी दलों ने भी यू0पी0ए0 सरकार के <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> के किसानों के प्रति इस सौतेले व्यवहार पर कई सवाल किये। किसानों की मांग थी कि जब गेहूँ के किसानों को 1000 रुपये कुन्तल का रेट दिया जा सकता है तो <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> के किसानों को क्यों नहीं दिया जाना चाहिये ?</span><!--more--></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इस वर्ष गेहूँ के किसानों को पिछले वर्ष की तुलना में 750 रुपये के स्थान पर 850 रुपये का रेट दिया गया। पर खेती से संबं</span><span>‌</span><span style="font-family:Mangal;"><span title="Click to correct" class="transl_class">धित</span> कई समस्याओं के कारण, जैसे पानी के स्तर का नीचे गिरना, लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग के कारण जमीन की उत्पादकता घट जाना; माईक्रोन्यूट्रियेन्ट्स, खाद, कीटनाशक दवाओं, डीजल आदि के दाम के बढ़ने के कारण लागत का बढ़ना आदि, गेहूँ की पैदावार पिछले कई सालों से स्थिर रही है और सरकारी भण्डार में भी गेहूँ की <span title="Click to correct" class="transl_class">मात्रा</span> खाद्य सुरक्षा से काफी कम हो गई है। इसके साथ इस वर्ष किसानों से गेहूँ की खरीद में विदेशी व निजी खरीददारों को पहले से ज्यादा छूट दी गई और उन्होंने कमोवेश सरकारी रेट से ज्यादा रेट पर, 900 से 1000 रुपये पर, <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> खरीदा। इसके फलस्वरूप सरकारी खरीद इस वर्ष भी काफी कम रही और भण्डारों में कमी हो गई।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">न्यूनतम सरकारी भण्डारण न केवल सरकारी राशन व्यवस्था को चलाने के लिए जरूरी है; यह जवाहर तथा रोजगार गारंटी योजनाओं, काम के बदले अनाज योजना तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी जरूरी है। यह केवल न्यूनतम भण्डारण है, सरकार की कुल आवश्यकता इससे कहीं ज्यादा है। यह आवश्यकता लगातार बढ़नी भी चाहिये पर सरकार ने न तो अनाज की कुल खरीद बढ़ाई है और न ही अनाज की भण्डारण सीमा, <span title="Click to correct" class="transl_class">जो</span>  काफी समय से 200 लाख टन है और सरकारी खरीद लगातार घट रही है। खाद्य सुरक्षा के आते संकट और बाजार में <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> के मंदे उत्पादन के नाम पर सरकार ने तुरन्त विदेश से <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> का आयात किया। पहले जून में 1200 रुपये कुन्तल के रेट को महंगा बता कर बाद <span title="Click to correct" class="transl_class">मे</span>  सरकार ने लगभग 8.5 लाख टन <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> 1600 रुपये कुन्तल पर आयात किया। इस वर्ष सरकार का कुल 23 लाख टन गेहूँ आयात करने का इरादा है। इस सवाल पर विदेशी कम्पनियों की तुलना में अपने किसानों के साथ सौतेला व्यवहार करने का जब आरोप आया तो सरकार ने गेहूँ की अगले साल की खरीद का रेट, यानी 2008 में 1000 रुपये कुन्तल करने की घोषणा अक्टूबर 2007 में कर दी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इसी बीच दक्षिण भारत में <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की फसल की सरकारी खरीद का समय प्रारम्भ हुआ और क्योंकि खेती की लागत के बढ़ते दाम तथा घटती उत्पादकता का असर उन पर भी रहा है, उन्होंने भी अपनी <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की फसल की खरीद का 1000 रुपये प्रति कुन्तल का रेट घोषित करने की मांग उठाई। जब किसानों के बड़े–बड़े प्रदर्शन होने लगे तो संसदीय विपक्षी दल भी मैदान में कूद पड़े और अपनी तरफ से उन्होंने किसानों के पक्ष में घोषणाएं करनी शुरू कर दीं। उदाहरण के लिए तेलुगु देसम ने घोषणा की कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह सहकारी समितियों के किसानों के सभी कर्जे माफ कर देगी और राजशेखर रेड्डी द्वारा दी जा रही 7 घंटे मुफ्त बिजली आपूर्ति को बढ़ा कर 9 घंटा कर देगी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">भाजपा ने भी इस सवाल पर मांग प्रस्तुत करते हुए <span title="Click to correct" class="transl_class">प्रधानमंत्री</span> को <span title="Click to correct" class="transl_class">पत्र</span>  <span title="Click to correct" class="transl_class">लिखकर</span> कई बातें लिखीं जो दिखाती <span title="Click to correct" class="transl_class">है</span>  कि शासक दल जानबूझकर किसानों के संकट को बढ़ा रहे ह। इनमें 1000 रुपये कुन्तल <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की खरीद की मांग के साथ–साथ उन्होंने लिखा कि भारतीय खेती के संकट से आप औरों से ज्यादा परिचित <span title="Click to correct" class="transl_class">है</span>  ... दसियों लाख घरों के विनाश से एक विस्फोटक व तनावपूर्ण स्थिति पनप रही है। उत्तरोत्तर सरकारों ने अपने गैरगम्भीर तथा अंशकालिक नजरिये के कारण इस सवाल पर गहराई से चिन्तन नहीं किया है और एक दूरगामी नीति नहीं बनाई है। जब डब्ल्यू0टी0ओ0 10 फीसदी सब्सिडी की अनुमति देती है तब सरकार ने न केवल खेती को प्रत्यक्ष सहयोग नहीं दिया है बल्कि खेती दबाने और बाजारों को भ्रष्ट करने के लिए सब कदम उठाए <span title="Click to correct" class="transl_class">है</span> । जाहिर है कि इस आलोचना में वे खुद भी शामिल <span title="Click to correct" class="transl_class">है</span> ।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">केन्द्र सरकार ने इस सवाल पर पहले तो चुप्पी <span title="Click to correct" class="transl_class">साधी</span> पर बाद में खाद्य <span title="Click to correct" class="transl_class">मंत्री</span> शरद पवार ने यह तर्क दिया कि <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की <span title="Click to correct" class="transl_class">साधारण</span> किस्मों की खरीद में की गई 25 रुपये की बढ़ोत्तरी और 50 रुपये का अतिरिक्त बोनस, जो संघर्ष प्रारम्भ होने के बाद किया गया था, पर्याप्त है और ये पिछले सालों की तुलना में सबसे बड़ी वृद्धि है। उन्होंने इसको पर्याप्त बताते हुए तर्क दिया कि जहाँ खरीदे गए <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> का कुल हिस्सा आटे में परिवर्तित हो जाता है वहीं 100 किलो <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> में मात्रा 65 किलो चावल निकलता है तो इस हिसाब से देखा जाए तो 695<span title="Click to correct" class="transl_class">रुपये</span> कुन्तल पर खरीदे गए 100 किलो <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> में से निकले हुए 65 किलो चावल का दाम 1050 रुपये कुन्तल बैठता है। वे भूल गये कि अगर 1000 रुपये कुन्तल के गेहूँ की कीमत कुल वसूल हो जाती है तो खरीदे गए <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की भी लगभग कुल कीमत वसूल हो जाती है क्योंकि उसकी भूसी भी बिकती है और तेल भी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-family:Mangal;">इस सवाल से जुड़े तथ्यों को देखा जाए तो स्पष्ट है कि 1994–95 में <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> की सरकारी खरीद 360 रुपये कुन्तल थी जबकि <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की खरीद 340 रुपये कुन्तल थी। यानी दोनों में 5–6 फीसदी का फर्क था। आज यह फर्क 30 फीसदी कर दिया गया है। जाहिर है नीतियों से उत्प संकट <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> और गेहूँ दोनों के किसानों को प्रभावित करता है। पर शायद सरकारी भंडारों में <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> का संकट कम है इसलिए यह दोयम व्यवहार किया जा रहा है। यह भी सच है कि पिछले 2 वर्षों में, <span title="Click to correct" class="transl_class">गेहूँ</span> की खरीद का रेट अप्रैल 2006 में 750 रुपये कुन्तल था जबकि 2008 के लिए 1000 किया गया है जबकि <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> की खरीद का रेट अक्टूबर 2005 में 570 था जिसे 695 किया गया है। अगर इन्हीं 2 वर्षों को भी देखा जाए तो गेहूँ की खरीद में 33 फीसदी वृद्धि की गई है जबकि <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> में इन 2 वर्षों में भी 22 फीसदी वृद्धि की गई है। इसलिए किसानों द्वारा <span title="Click to correct" class="transl_class">धान</span> का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1000 रुपये कुन्तल करने की मांग पूरी तरह न्यायोचित है।</span></p>
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