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	<title>गोकुल &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "गोकुल"</description>
	<pubDate>Thu, 15 May 2008 08:19:45 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[ढाई आखर प्रेम का भेद न जाने कोय]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 06:16:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[कृष्ण गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कृष्ण</strong> गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा में कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वहां मथुरा में उद्धव भगवान कृष्ण के मित्र थे। बड़े भारी विद्वान चिंतक। पर अपने ज्ञान का अभिमान भी उतना ही था। कृष्ण ने उद्धव को कहा- </p>
<p><strong>उधो ब्रज मोहि बिसरत नाहीं</strong></p>
<p>लेकिन उद्धव को यह पीड़ा कहाँ समझ में आने वाली थी। वे तो ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे। कृष्ण को माया-मोह को भुलाने की बात कहते थे। </p>
<p>कृष्ण ने उद्धव को अपना संदेशवाहक बनाकर मथुरा भेज दिया और एक पत्र भी ग्वाल बाल के नाम लिख भेजा। उधर उद्धव कृष्ण के सन्देशवाहक बनकर ब्रज पहुंचे और इधर ब्रज में कोहराम मच गया। जिसने जहां भी सुना वहीं अपना कामकाज छोड़कर उद्धव को मिलने पहुंच गया। यशोदानंदन के मित्र को सबने घेर लिया। उधो जी कृष्ण का क्या संदेश लाए हैं? </p>
<p>क्या लाए थे, उद्धव जी तो अपने ज्ञान की पोटली लेकर आए थे। कृष्ण का दिया हुआ तो बस एक पत्र ही था, सो हाथ का लिखा हुआ वह रुक्का बढ़ा दिया। सोचा, पढ़ लें, स्थिर चित्त हो जाएँ, तब समझाऊंगा इन्हें जीवन का तत्व भेद। </p>
<p>सो पत्र उनको दे दिया। लेकिन यह क्या, जिसके हाथ में पत्र आया, उसी के आँसुओं से वह भीगने लगा, कागज गल गया, स्याही फैल गई, पढ़ने को तो कुछ बचा ही नहीं। इसके बाद छीना-झपटी मच गई, जरा हम भी देखें, हम भी पढ़ें उनका संदेश। पत्र के टुकड़े-टुकड़े हो गया। छीना-झपटी में जिसके हाथ जितना छोटा टुकड़ा आया, उसी फटे हुए टुकड़े को वह लेकर रोने लगा। अपने माथे से लगाने लगा, छाती से लगाने लगा। कृष्ण की स्मृति में खो गया। पत्र पढ़ने की तो जरूरत ही नहीं रही। </p>
<p>सभी गोपी-ग्वाल बालकृष्ण की याद में रोते-सिसकते और आँसू बहाते रहे। उद्धव उनके प्रेमाश्रुओं की बहती हुई गंगा की धारा को पार नहीं कर सके। प्रेम भक्ति के इस हृदयस्पर्शी मार्मिक दृश्य में किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे। बिलखते हुए गोपियों ने कहा- उधो, अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी। </p>
<p>उद्धव ने उन्हें आत्मतत्व का महत्व समझाया, ज्ञान-ध्यान का रस पिलाया किन्तु कौन सुनता है। किसी को इसमें कोई स्वाद नहीं आया। नीरस ज्ञान किसी के मन को नहीं भाया। फिर उन सब को भगवान की व्यापकता का परिचय दिया। योग का मूल सूत्र बताया। किन्तु गोपियाँ तो उस कृष्ण की याद में आँसू बहाती रहीं, जो उनके साथ खेलता था। कहा, </p>
<p><strong>उधो! मन नाहीं दस-बीस, एकहुतो सो गयो श्याम संग, को आराधो ईश</strong></p>
<p>महाराज, यह मन 10-20 तो हैं नहीं। हमारे पास हमारा एक ही मन था और वह कृष्ण के संग चला गया। तुम्हारे ज्ञान की बातें सुनने के लिए अब हमारे पास हमारा मन नहीं है। </p>
<p>गोपियों और ग्वाल बाल के प्रेम के सामने उद्धव निरुत्तर हो गए। ज्ञान की पोटली खुल कर बिखर गई, मूल्यहीन हो गई। उन्हें मथुरा वापस लौटना पड़ा। प्रेम का सम्बन्ध तर्क-वितर्क से नहीं होता, उसका सम्बन्ध तो हृदय से होता है। </p>
<p>प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जान पाया। मीरा कृष्ण के प्रेम में व्याकुल होकर एक बार कहती हैं- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाको सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। फिर अगले ही पल कहती थी, जो मैं ऐसा जानती प्रेम करे दुख होय। नगर ढिंढोरा पीटती, प्रेम करो मत कोय। </p>
<p>प्रेम शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। यह प्रभु का ही अनन्त रूप है। यह निष्काम, नि:स्वार्थ, पावन पवित्र शब्द है। यह भगवान की महिमा का व्यापक रूप है। जिसने भी इस प्रेम शब्द को जान लिया-पहचान लिया, वह भगवानमय बन जाता है। जब भक्तगण भगवान को याद करते हैं, उनका मनन-चिन्तन-स्मरण करते हैं, भावविभोर होकर गुणगान करते हैं, भगवान के लिए करुण क्रंदन करते हैं, तो भगवान का हृदय भी उनकी भाव भक्ति से दवित हो जाता है। और भगवान भी अपने भक्तों को याद करते हैं। भक्ति भाव भी उसी प्रेम का एक रूप है। </p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
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