<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>ग्रह &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/ग्रह/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "ग्रह"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 04:18:25 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[ग्रह-बाधा-शान्ति मन्त्र]]></title>
<link>http://shabarmantra.wordpress.com/?p=48</link>
<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 16:57:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>aspundir</dc:creator>
<guid>http://shabarmantra.wordpress.com/?p=48</guid>
<description><![CDATA[ग्रह-बाधा-शान्ति मन्त्र
&#8220;ॐ ऐं ह्रीं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ग्रह-बाधा-शान्ति मन्त्र<br />
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं दह दह।"<br />
विधि- सोम-प्रदोष से ७ दिन तक, माल-पुआ व कस्तुरी से उक्त मन्त्र से १०८ आहुतियाँ दें। इससे सभी प्रकार की ग्रह-बाधाएँ नष्ट होती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्रह्माण्ड]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=818</link>
<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 15:07:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=818</guid>
<description><![CDATA[मैं अत्यन्त अकेला था
अनन्त शून्य था मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मैं अत्यन्त अकेला था<br />
अनन्त शून्य था मेरे अन्दर<br />
यूँ ही विचार आया मन में<br />
अपना भी हो एक सुन्दर घर</font></p>
<p><font color="#000000">कुछ न कुछ बटोरकर<br />
जैसे-तैसे आदि परमाणु रचा<br />
बहुत लम्बी प्रतीक्षा के पश्चात<br />
वह सुन्दर दृश्य दिखा</font></p>
<p><font color="#000000">एक धमाके के पश्चात<br />
छितर गया सब बहुत दूर तक<br />
और खिसकता ही रहा है<br />
शून्य के अन्तिम छोर तक</font></p>
<p><font color="#000000">उभरी एक अनोखी आभा<br />
उस विस्फोट की छितर से<br />
बनाया सबने अपना झुण्ड<br />
आपसी गुरुत्वाकर्षण बल से</font></p>
<p><font color="#000000">जिसका नाम हुआ आकाशगंगा<br />
प्रारम्भ हुई केन्द्रित परिक्रमा<br />
फिर कुछ सौर-मण्डल बने<br />
जिसमें कुछ ग्रह और चन्द्रमा</font></p>
<p><font color="#000000">इस तरह शून्य का कोहरा छटा<br />
कुछ वर्ष प्रसन्नचित्त था<br />
किन्तु एकान्त भाया नहीं<br />
एक अनोखी रचना बनानी थी</font></p>
<p><font color="#000000">यह सोचकर मैंने उस पल<br />
पृथ्वी पर रचाया जैवमण्डल<br />
अनोखे जीवधारी बनाये<br />
आधार रखा मृदा और जल</font></p>
<p><font color="#000000">मनुष्य के तीव्र मस्तिष्क को<br />
यह रचना अदभुद लगी<br />
इस प्रश्नवाचक चिह्न पर<br />
उसके अन्दर की जिज्ञासा जगी</font></p>
<p><font color="#000000">मनुष्य सत्य का खोजकर्ता<br />
नित नये आविष्कार करता<br />
और मैं हूँ ब्रह्माण्ड,<br />
स्वयं ब्रह्माण्ड रचयिता...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९७-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मानव इतिहास का सबसे सफल अभियान :वायेजर २]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/03/19/voyegar2/</link>
<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 09:08:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/03/19/voyegar2/</guid>
<description><![CDATA[वायेजर २ यह एक मानव रहित अंतरग्रहीय शो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वायेजर २ यह एक मानव रहित अंतरग्रहीय शोध यान था जिसे वायेजर १ से पहले २० अगस्त १९७७ को प्रक्षेपित किया गया था।</p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/d/d2/Voyager.jpg/766px-Voyager.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/d/d2/Voyager.jpg/766px-Voyager.jpg" border="1" height="300" width="400" /></a></p>
<p>यह अपने जुड़वा यान वायेजर १ के जैसा ही है, लेकिन वायेजर १ के विपरित इसका पथ धीमा है। इसे धीमा रखकर इसका पथ <strong>युरेनस </strong>और <strong>नेपच्युन </strong>तक पहुचने के लिये अभिकल्पित किया गया था। शनि के गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप यह युरेनस की ओर धकेल दिया गया था जिससे यह यान वायेजर १ की तरह <strong>टाईटन </strong>चन्द्रमा को नही देख पाया था। लेकिन यह <strong>युरेनस </strong>और <strong>नेपच्युन </strong>तक पहुंचने वाला पहला यान बन गया था, इस तरह मानव का एक विशेष ग्रहीय परिस्थिती के दौरान जिसमे सभी ग्रह एक सरल रेखा मे आ जाते है;<strong>महा सैर (Grand Tour) </strong>का सपना पूरा हुआ था। <strong>यह विशेष स्थिती हर १७६ वर्ष पश्चात उतपन्न होती है।</strong></p>
<p align="center"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/thumb/a/af/Voyager_2_trajectory.png/800px-Voyager_2_trajectory.png"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/thumb/a/af/Voyager_2_trajectory.png/800px-Voyager_2_trajectory.png" border="1" height="262" width="400" /></a></p>
<p align="center">वायेजर २ का पथ</p>
<p>वायेजर २ यह सबसे ज्यादा सुचनाये प्राप्त करने वाला शोध यान है, जिसने चार ग्रह और उनके अनेको चन्द्रमाओ की अपने शक्तिशाली कैमरो और उपकरणो के साथ यात्रा की है। जबकि इस यान पर खर्च हुआ धन अन्य विशेष शोध यानो जैसे <strong>गैलेलीयो या कासीनी-हायगेन्स </strong>की तुलना मे काफी कम है।</p>
<p>यह यान मूलतः <strong>मैरीनर कार्यक्रम </strong>के यान <strong>मैरीनर १२ </strong>के रूप मे बनाया गया था। इसे २० अगस्त १९७७ को <strong>केप केनर्वल फ्लोरीडा</strong> से <strong>टाईटन ३इ सेन्टार </strong>राकेट से प्रक्षेपित किया गया था।</p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a4/Titan_3E_Centaur_launches_Voyager_2.jpg/452px-Titan_3E_Centaur_launches_Voyager_2.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a4/Titan_3E_Centaur_launches_Voyager_2.jpg/452px-Titan_3E_Centaur_launches_Voyager_2.jpg" border="1" height="300" width="225" /></a></p>
<p align="center">वायेजर २ का प्रक्षेपण</p>
<p><strong>गुरू की सैर</strong><br />
९ जुलाई १९७९ को वायेजर गुरु के सबसे समिप ५७०,००० किमी की दूरी पर था। इस यान ने गुरू के कुछ वलयो की खोज की। इसने गुरू के चन्द्रमा <strong>आयो </strong>की तस्वीरे ली और उसपर एक सक्रिय ज्वालामुखी का पता लगाया। पहली बार किसी अंतरिक्ष पिंड पर ज्वालामुखी का पता चला था।<br />
गुरू सौरमंडल का सबसे बडा़ ग्रह है, जो मुख्यतः हायड्रोजन और हीलीयम से बना है, कुछ मात्रा मे मिथेन,अमोनिया, जल भाप, अन्य यौगीको के अल्प मात्रा भी है। इसके केन्द्र मे द्रव अवस्था मे पत्त्थर और बर्फ है। इसके अक्षांसो पर बने रंगीन पट्टे, वातावरण मे बादल और तुफान इस ग्रह के हमेशा बदलने वाले मौसम के बारे मे बताते है। इस महाकाय ग्रह के अब तक ज्ञात चन्द्रमाओ की संख्या ६३ तक पहुंच चूकी है। यह ग्रह सूर्य की ११.८ वर्ष मे और खुद की परिक्रमा ९ घण्टे ५५ मिनिट मे करता है। अंतरिक्ष विज्ञानी इस ग्रह का आंखो से और दूरबीन से सदियो से निरिक्षण करते आ रहे है लेकिन वे वायेजर २ द्वारा प्रदान की गयी अनेको सूचनाओ से आश्चर्य चकित रह गये थे।<br />
इस ग्रह पर स्थित <strong>विशाल लाल धब्बा </strong>एक महाकाय तुफान है जो घडी़ के कांटो की विपरीत दिशा मे घूम रहा है। इस ग्रह पर कई अन्य छोटे तुफान भी पाये गये।<br />
<strong>आयो </strong>चन्द्रमा पर पाया गया सक्रिय ज्वालामुखी यह सबसे ज्यादा अनपेक्षित खोज थी। इस ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा और धुंवा सतह से ३०० किमी तक जाता है। वायेजर २ ने इस ज्वालामुखी से उत्सर्जीत पदार्थ की अधिकतम गति १ किमि प्रति सेकंड तक मापी थी। आयो के ज्वालामुखी इस चन्द्रमा पर ज्वारीय प्रभाव के कारण होने वाली उष्णता के कारण है। आयो अपनी कक्षा से समिओ के चन्द्रमा <strong>युरोपा </strong>और <strong>गीनीमेड </strong>के कारण भटकता है लेकिन गुरू का गुरुत्व उसे वापिस अपनी कक्षा मे ला देता है। इस रस्साकसी के चलते आयो पर १०० मीटर उंचा ज्वार आता है। ध्यान दें कि पृथ्वी पर आनेवाला ज्वार सिर्फ १ मीटर उंचा रहता है।<br />
आयो के इस ज्वालामुखी का प्रभाव सम्पूर्ण गुरू मंडल(गुरू और उसके चन्द्रमा) पर पडा़ है। ये ज्वालामुखी गुरू के चुंबकिय क्षेत्र मे पाये जाने वाले पदार्थ का मुख्य श्रोत है। इस ज्वालामुखी से उत्सर्जीत पदार्थ गंधक(सल्फर),आक्सीजन, सोडीयम गुरू से लाखो किमी दूर तक पाये गये हैं।<br />
वायेजर १ द्वारा ली गयी <strong>युरोपा </strong>की तस्वीरो मे एक दूसरे को काटती रेखाओ जैसी संरचनाओ का पता चला था। प्रारंभ मे विज्ञानीयो को ये भूकंप द्वारा निर्मीत गहरी दरारे जैसी प्रतित हुयी थी। वायेजर २ द्वारा ली तस्वीरो ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया। एक विज्ञानी के अनुसार ये किसी पेन द्वारा खींची गयी रेखाये जैसी है। संभावना है कि ज्वारीय प्रभाव की उष्णता के कारण युरोपा आंतरिक रूप से सक्रिय है, ये ज्वारीय प्रभाव आयो की तुलना मे दहाई है। युरोपा का भूपृष्ठ पतला है लगभग ३० किमी मोटी बर्फ से बना है, जो शायद ५० किमी गहरे समुद्र पर तैर रही है।<br />
<strong>गीनीमेड </strong>सौरमंडल का सबसे बड़ा चन्द्रमा है, जिसका व्यास ५,२७६ किमी है। इसकी सतह पर दो तरह के मैदान दिखायी दिये है एक क्रेटर से भरा हुआ है दूसरा पहाड़ो से। विज्ञानीयो को इससे प्रतित होता है कि गीनीमेड का बर्फीला भूपृष्ठ सर्वत्र व्याप्त विवर्तनिक प्रक्रियाओ से उतपन्न तनाव से प्रभावित है।<br />
<strong>कैलीस्टो </strong>का भूपृष्ठ काफी पूराना और उल्कापातो से बने क्रेटरो से भरा पड़ा है। सबसे बड़ा क्रेटर बर्फ से भर गया है।<br />
गुरू के आसपास एक धूंधला और पतला वलय पाया गया है, जिसका बाहरी व्यास १२९,००० किमी और चौडा़ई ३०,००० की मी है। दो नये चन्द्रमा <strong>एड्रास्टी </strong>और <strong>मेटीस </strong>इस वलय से ठीक बाहर की ओर पाये गये। एक तीसरा नया चन्द्रमा <strong>थेबे </strong>,<strong>अमाल्था </strong>और <strong>आयो </strong>के बीच मे पाया गया।<br />
गुरू के वलय और चन्द्रमा गुरू के चुंबकिय प्रभाव के जाल मे फंसे एक घने इलेक्ट्रान और आयन के एक बड़े विकीरण पट्टे के मध्य है। ये कण और चुंबकिय क्षेत्र एक जोवीयन चुंबकिय वातावरण बनाते है जो कि सूर्य की ओर ३० लाख से ७० लाख किमी तक और शनि की ओर ७५०० लाख किमी तक विस्तृत है।<br />
यह चुंबकिय वातावरण गुरु के साथ ही घुर्णन करता है, यह वातावरण आयो से हर सेकंड १ टन पदार्थ उड़ा ले जाता है। यह पदार्थ एक अंगूठी की शक्ल मे आयनो का एक बाद्ल बनाता है जो पराबैंगनी किरणो मे चमकता है। इस वलय मे भारी आयन बाहर की तरफ जाते है, जिसके दबाव से जोवीयन चुंबकिय क्षेत्र अपेक्षित आकार से दूगना फैल जाता है।<br />
आयो इस चुंबकिय क्षेत्र मे परिक्रमा करते हुये एक विद्युत निर्माण संयत्र का कार्य करता है, इसके व्यास के साथ ४००,००० वोल्ट और ३० लाख एम्पीयर की विद्युत धारा प्रवाहीत होती है जो कि इस ग्रह के चुंबकिय क्षेत्र मे प्रभा का निर्माण करती है।</p>
<p><strong>शनि की सैर</strong><br />
२५ अगस्त १९८१ को शनि के सबसे समीप आया था। शनि के पिछे रहते हुये वायेजर २ ने शनि के बाहरी वातावरण के तापमान और घन्तव का मापन किया। वायेजर ने बाहरी सतह पर  (७ किलो पास्कल) पर तापमान ७० केल्विन(-२०३ डीग्री सेल्सीयस) और अंदरूनी तह पर (१२० कीलो पास्कल) पर १४३(-१२० डीग्री सेल्सीयस) केल्विन तापमान पाया। उत्तरी ध्रुव पर तापमान १० केल्विन कम था, जो की मैसम के अनुसार बदल सकता है।</p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/b/b4/Saturn_%28planet%29_large.jpg/480px-Saturn_%28planet%29_large.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/b/b4/Saturn_%28planet%29_large.jpg/480px-Saturn_%28planet%29_large.jpg" border="1" height="300" width="240" /></a></p>
<p align="center"><strong>शनि</strong></p>
<p style="text-align:center;"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/5/5c/Iapetus_by_Voyager_2.jpg" border="1" height="350" width="325" /></p>
<p align="center"><strong>शनि का चन्द्रमा आयपेट्स</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p align="center"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/95/Enceladus_from_Voyager.jpg/600px-Enceladus_from_Voyager.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/95/Enceladus_from_Voyager.jpg/600px-Enceladus_from_Voyager.jpg" border="1" height="300" width="300" /></a></p>
<p align="center"><strong>शनि का चन्द्रमा  एन्सेलडस</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p align="center"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/4/4a/Titan_voyager.jpg" border="1" height="244" width="253" /></p>
<p align="center"><strong>शनि का चन्द्रमा  टाईटन</strong></p>
<p>शनि की सैर के बाद वायेजर २ चल दिया युरेनस की ओर<br />
<strong>युरेनस की सैर</strong><br />
२४ जनवरी १९८६ को वायेजर २ युरेनस के निकट ८१,५०० किमी की दूरी पर पहुंचा। वायेजर ने युरेनस के १० नये चन्द्रमा ढुंढ निकाले। युरेनस के वातावरण का अध्यन किया और उसकी ९७.७७ डीग्री झुके अक्ष का मापन और वलयो का अध्यन किया।<br />
युरेनस सौरमंडल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है। यह सूर्य की परिक्रमा २.८ करोड़ किमी की दूरी से ८४ वर्षो मे करता है। युरेनस पर एक दिन १७ घंटे अ४ मिनिट का होता है।<br />
युरेनस का अक्ष सूर्य की परिक्रमा प्रतल से ९० डीग्री अंश पर झुका हुआ है जो उसे अन्य सभी ग्रहो से अलग करता है। इस वजह से उसके ध्रुव लम्बे समय सूर्य के ठीक सामने और पिछे रहते है। सबसे आश्चर्य वाली खोज यह रही कि युरेनस का चुम्बकिय अक्ष घुर्णन अक्ष से ६० डीग्री का झुकाव लिये हुये है। युरेनस पर चुम्बकिय क्षेत्र की उपस्थिती वायेजर २ से पहले ज्ञात नही थी। इस क्षेत्र का प्रभाव पृथ्वी के बराबर ही है। युरेनस पर विकीरण का पटटा शनि के जैसा ही पाया गया।<br />
वायेजर द्वारा खोजे गये नए १० चन्द्रमाओ के साथ युरेनस के कुल चन्द्रमाओ की संख्या १५ हो गयी। अधिकतर नये चन्द्रमा छोटे है, जिसमे से सबसे बडे़ का व्यास १५० किमी है।<br />
<strong>मिरांडा </strong>नामक चन्द्रमा जो पांच बडे़ चन्द्रमाओ मे से सबसे अंदरूनी है, सौर मंडल का सबसे विचीत्र पिंड है। इस चन्द्र्मा पर २० किमी गहरी नहरे पायी गयी है जो भूगर्भीय हलचलो से बनी है। इसका भूपृष्ठ नये और पूराने का एक मिश्रण है। युरेनस के सभी पांच चन्द्रमा शनि के चन्द्र्माओ की तरह बर्फ और पत्थरो से बने है। इनमे से <strong>एरीयल </strong>सबसे चमकदार है, <strong>टाईटेनीया </strong>पर काफी बडी दरारे है, <strong>कैन्यान्स </strong>पर भूकंपीय घटनाओ के निशान है जबकि <strong>ओबेरान </strong>और <strong>अम्ब्रीयल </strong>पर भूकम्प कम या नही आते है।<br />
युरेनस के नौ वलय है और ये वलय शनि और गुरू के वलय से अलग है। ये वलय काफी नये है , युरेनस की उम्र से इनकी उम्र काफी कम है। ये वलय किसी चन्द्रमा के टूट जाने से बने है।</p>
<p align="center"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/1b/Uranus_Voyager_2.jpg/602px-Uranus_Voyager_2.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/1b/Uranus_Voyager_2.jpg/602px-Uranus_Voyager_2.jpg" border="1" height="300" width="300" /></a></p>
<p align="center"><strong>युरेनस</strong></p>
<p align="center"><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5c/Uranian_Rings.jpg/615px-Uranian_Rings.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5c/Uranian_Rings.jpg/615px-Uranian_Rings.jpg" border="1" height="300" width="300" /></a></p>
<p align="center"><strong>युरेनस के वलय<br />
</strong></p>
<p><strong>नेपच्युन के ओर</strong><br />
२५ अगस्त १९८९ को वायेजर नेपच्युन के पास पहुंचा। इस यान ने नेपच्युन के चन्द्रमा <strong>ट्रीटान </strong>की भी सैर की।<br />
इस यान ने नेपच्युन पर गुरू के विशाल लाल धब्बे के जैस <strong>विशाल गहरा धब्बा</strong> देखा। पहले इसे एक बादल समझा जाता था, लेकिन असल मे यह बादलो मे एक बड़ा छेद है।</p>
<p align="center"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/0/06/Neptune.jpg/609px-Neptune.jpg" border="1" height="300" width="300" /><br />
<strong>नेपच्युन</strong><br />
<a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a6/Triton_moon_mosaic_Voyager_2_%28large%29.jpg/771px-Triton_moon_mosaic_Voyager_2_%28large%29.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a6/Triton_moon_mosaic_Voyager_2_%28large%29.jpg/771px-Triton_moon_mosaic_Voyager_2_%28large%29.jpg" border="1" height="300" width="480" /></a><br />
<strong>नेपच्युन का चन्द्रमा ट्राईटन</strong></p>
<p><strong>सौर मंडल के बाहर: सूदूर अंतरिक्ष मे</strong><br />
वायेजर २ का ग्रहीय अभियान नेपच्युन के साथ खत्म हो गया था। अब यह अंतरखगोल अभियान मे तब्दिल हो गया है। वायेजर अभी भी <strong>हीलीयोस्फीयर </strong>के अंदर है। इस यान पर वायेजर १ की तरह एक सोने की ध्वनी चित्र वाली डीस्क रखी है। यह किसी अन्य बुद्धीमान सभ्यता के लिये पृथ्वीवासीयो का संदेश है। इस डीस्क पर पृथ्बी और उसके जीवो की तस्वीरे है।इस पर पृथ्वी पर की विभिन्न ध्वनीयां जैसे व्हेल की आवाज, बच्चे के रोने की आवाज, समुद्र के लहरो की आवाज है।<br />
५ सीतम्बर २००६ को वायेजर सूर्य से ८० खगोलीय इकाई की दूरी पर था, इसकी गति एक वर्ष मे ३.३ खगोलीय ईकाई है। अभी यह प्लूटो से उसके सूर्य की दूरी के दूगनी दूरी पर स्थित है और <strong>सेडना </strong>से भी बाहर स्थित है। लेकिन अभी भी यह <strong>एरीस </strong>क्षुद्र ग्रह के पथ के अंदर है।<br />
वायेजर २ २०२० तक पृथ्वी तक संकेत भेजता रहेगा।<br />
उर्जा की बचत और इस यान का जिवन काल बढाने के लिये विज्ञानीयो ने इसके उपकरण क्रमशः बंद करने का निर्णय लिया है।<br />
१९९८: स्केन प्लेटफार्म और पराबैंगनी निरिक्षण बंद कर दिया गया<br />
२०१२ : इसके एंटीना को घुमाने की प्रक्रिया(Gyro Operation) बंद कर दिया जाएगा<br />
२०१२ : DTR प्रक्रिया बंद कर दी जायेगी।<br />
२०१६ : उर्जा को सभी उपकरण बांट कर उपयोग करेंगे।<br />
२०२० : शायद उर्जा का उत्पादन बंद हो जायेगा</p>
<p>वायेजर श्रंखला इसके साथ समाप्त होती है, अगले लेख पायोनियर पर होंगे</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वर्ग का राजा और उसके वलय]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/02/04/uranus-2/</link>
<pubDate>Sat, 03 Feb 2007 19:57:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/02/04/uranus-2/</guid>
<description><![CDATA[
युरेनस ,उसके वलय और चन्द्रमा
वलय केवल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/9905/u10_vg2.jpg" border="1" height="473" width="473" /></p>
<p align="center"><strong>युरेनस ,उसके वलय और चन्द्रमा</strong></p>
<p>वलय केवल शनि के पास ही नही है, अन्य गैसीय ग्रह गुरू, युरेनस और नेपच्युन के भी वलय है। इस चित्र मे युरेनस, उसके वलय और चन्द्रमा दिखायी दे रहे है।</p>
<p>यह आधुनिक काल का पहला खोजा हुआ ग्रह है, इसे १३ मार्च १७८१ मे <strong>विलीयम हर्शेल</strong> ने खोज निकाला था। यह सूर्य की परिक्रमा <a href="http://antariksh.wordpress.com/2007/01/16/uranus/">लुढकते हुये</a> करता है। ग्रीक मिथको के अनुसार युरेनस <strong>स्वर्ग का राजा है।</strong></p>
<p>इस ग्रह का नीला रंग इसके वातावरण मे मिथेन की उपस्थिती के कारण है जो लाल रंग अवशोषीत कर लेती है। यह भी गुरू या शनि के जैसे गैसीय ग्रह (गैस का गोला) है।</p>
<p>इस ग्रह के ११ ज्ञात वलय है जोकी १० मीटर व्यास तक के धुल कणो से बने है। सबसे ज्यादा चमकदार वलय को <strong>एपसीलान </strong>वलय कहते है। अधिकतर वलय धुधंले है। शनि के बाद यह पहला ग्रह था जिसपर वलय खोजे गये थे।</p>
<p>शनि के बाद मे युरेनस के सबसे ज्यादा चन्द्रमा है , अब तक कुल २१ चन्द्रमा खोजे जा चुके हैं। अन्य ग्रहो के चन्द्रमा के नामो के विपरीत इसके चन्द्रमाओ के नाम <strong>शेक्सपीयर </strong>और <strong>पोप </strong>की रचनाओ से लिये गये है।</p>
<p>इसे नंगी आंखो से देखना मुश्किल है लेकिन बायनाकुलर या छोटी दूरबीन से आसानी से देखा जा सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुंदरता का राज ]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/31/saturnrings-2/</link>
<pubDate>Wed, 31 Jan 2007 07:02:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/31/saturnrings-2/</guid>
<description><![CDATA[ 
शनि की सुंदरता का राज क्या है ? निश्चय ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> <img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0701/ringcross_cassini.gif" border="1" height="420" width="560" /></p>
<p><strong>शनि की सुंदरता का राज क्या है ? निश्चय ही उसके सुंदर वलय !</strong></p>
<p>१७०० मे जब गैलेलियो ने शनि को अपनी दूरबीन से देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसे शनि के दोनो ओर उभार दिखायी दिये।   उसने अपने सहयोगी से कहा <strong>"ऐसा लगता है कि शनि के दो कान भी है !"</strong></p>
<p>उपर दी गयी तस्वीर कासीनी उपग्रह से ली गयी तस्वीरो को जोड कर एक चलचित्र है। इस चित्र मे शनि के चन्द्रमा टाईटन की कक्षा के अंदर के चन्द्र्मा और वलय दिखायी दे रहे है।  इस चित्र मे आप शनि के वलय बनाने वाले कणो का घनत्व और चमक देख सकते है। चित्र मे शनि के चन्द्रमा एनक्लीडस, मीमीस, जनुस, एपीअमेथेस, प्रामेथस और पैण्डोरा को भी देख सकते है।  शनि के ये वलय शनि की परिक्रमा करते है लेकिन ये शनि को छुते नही है।</p>
<p>शनि के मुख्य रूप से सात वलय है। जो शनि से दूरी के अनुसार D,C,B,A,F,G,E के नाम से जाने जाते है।</p>
<p><img src="http://farm1.static.flickr.com/161/375261449_e4ca4202c9_o.jpg" border="1" height="210" width="674" /></p>
<p align="center"><strong>शनि के मुख्य वलय</strong></p>
<p> वलय A और वलय B के मध्य एक खाली जगह है जिसे <strong>कासीनी अंतराल </strong>कहते है। ये वलय चमत्कारीक रूप से पतले है, इनकी चौडाई १०० किमी से भी ज्यादा है लेकिन मोटाइ १०० मिटर के आसपास है। ये कुछ इस तरह है कि किसी फुटबाल के मैदान पर एक टीश्यु पेपर को फैला दिया जाये।</p>
<p><img src="http://farm1.static.flickr.com/129/375261450_8fd44c4dbb_b.jpg" border="1" height="260" width="716" /></p>
<p align="center"><strong>शनि के वलय</strong></p>
<p><strong>  वलय A: </strong>यह वलय शनि की दो सबसे चमकदार वलयो मे से बाहरी वलय है। एक छोटा सा चन्द्रमा <strong>एटलस </strong>इस वलय के कुछ बाहर ही शनि की परिक्रमा करता है। इस वलय के बाहरी किनारे के पास एक छोटा अंतराल है जिसे <strong>एंके </strong>अंतराल कहते है। इस अंतराल मे भी शनि का एक छोटा सा चन्द्रमा <strong>पैन </strong>परिक्रमा करता है। इस अंतराल से बाहर एक अपेक्षाकृत छोटा अंतराल (<strong>कीलर </strong>अंतराल Keelar)और है जिसमे भी एक चन्द्रमा <strong>डैफनीस </strong>परिक्रमा करता है।</p>
<p><strong>कासीनी अंतराल </strong>: शनि के मुख्य वलय A और B के मध्य का अंतराल। यह बडा अंतराल है। इस अंतराल मे चन्द्रमा <strong>मीमास </strong>परिक्रमा करता है।</p>
<p><strong>वलय B </strong>: यह वलय A की तुलना मे ज्यादा घना है , इतना घना है कि ये एक अपारदर्शी वलय है। इसे बनाने वाले कण कीसी तरल पदार्थ की तरह शनी की परिक्रमा करते है। यह वलय अनेक छोटे छोटे वलय से बना एक बडा वलय प्रतित होता है। इसमे हब्बल और कासीनी उपग्रह ने स्पोक के जैसी संरचना भी देखी है।</p>
<p><strong>  वलय C</strong>: यह वलय  B वलय से अंदर है। इसका घन्त्व कम है और लगभग पारदर्शी है।</p>
<p><strong>वलय D </strong>: यह वलय D वलय से अंदर है, ये काफी धुंधला वलय है।</p>
<p><strong>वलय F </strong>: यह वलय A वलय के बाहर है। इसे पायोनियर ११ ने देखा था।</p>
<p><strong>वलय G और E : </strong>ये शनी के बाहरी और धुंधले वलय है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पाताल का देवता और मौत का नाविक]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/22/pluto/</link>
<pubDate>Mon, 22 Jan 2007 06:09:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/22/pluto/</guid>
<description><![CDATA[
प्लुटो , शेरान ,निक्स और  हायड्रा
 प्लू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0606/PlutoNamesFig_crop.jpg" border="1" height="456" width="556" /></p>
<p align="center"><strong>प्लुटो , शेरान ,निक्स और  हायड्रा</strong></p>
<p> प्लूटो यह सूर्य का नौंवा ग्रह हुआ करता था !</p>
<p>यह इतना छोटा है कि सौरमंडल के सात चन्द्रमा (हमारे चन्द्रमा सहित) इससे बड़े है। प्लूटो से बड़े अन्य चन्द्रमा है, गुरु के चन्द्रमा <strong>आयो, युरोपा, गीनीमेड और कैलीस्टो</strong>; शनि का चन्द्रमा  <strong>टाइटन </strong>और नेप्च्यून का <strong>ट्राइटन। </strong>इस वजह से इसे ग्रह का दर्जा देना हमेशा विवादों के घेरे मे रहा।</p>
<p>इसे ग्रह का दर्जा मिला और ७५ वर्ष तक रहा लेकिन २४ अगस्त २००६ को अतंरराष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान सभा ने ग्रह की नयी परिभाषा दी जिसके अंतर्गत प्लूटो नही आता था। प्लूटो अब एक बौना ग्रह(dwarf planet) है।</p>
<p>ग्रह की नयी परिभाषा</p>
<p>सौरमंडल के किसी पिंड के ग्रह होने के लिए तीन मानक तय किए गए हैं-</p>
<p>1. यह सूर्य की परिक्रमा करता हो।</p>
<p>2. यह इतना बड़ा ज़रूर हो कि अपने गुरुत्व बल के कारण इसका आकार लगभग गोलाकार हो जाए।<br />
3. इसमें इतना ज़ोर हो कि ये बाक़ी पिंडों से अलग अपनी स्वतंत्र कक्षा बना सके ।<br />
इसमे तीसरी अपेक्षा पर प्लूटो खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सूर्य की परिक्रमा के दौरान इसकी कक्षा नेप्चून की कक्षा से टकराती है।</p>
<p>रोमन मिथक कथाओं के अनुसार प्लूटो(ग्रीक मिथक मे हेडस)पाताल का देवता है। इस नाम के पीछे दो कारण है, एक तो यह कि सूर्य से काफी दूर होने की वजह से यह एक अंधेरा ग्रह(पाताल) है, दूसरा यह   कि प्लूटो का नाम PL से शुरू होता है जो इसके अन्वेषक पर्सीयल लावेल के आद्याक्षर है।</p>
<p>प्लूटो की खोज की एक लम्बी कहानी है। कुछ गणनाओ के आधार पर युरेनस और नेप्च्यून की गति मे एक विचलन पाया जाता था। इस आधार पर एक<strong> 'क्ष' ग्रह</strong>(Planet X) कि भविष्यवाणी की गयी थी, जिसके कारण युरेनस और नेपच्युन की गति प्रभावित हो रही थी। अंतरिक्ष विज्ञानी लावेल इस <strong>'क्ष' ग्रह</strong> की खोज मे  आकाश छान मारा और १९३० मे प्लूटो खोज निकाला। लेकिन प्लूटो इतना छोटा निकला कि यह नेप्च्यून और युरेनस की गति पर कोई प्रभाव नही डाल सकता है। <strong>'क्ष' ग्रह</strong> की खोज जारी रही। बाद मे वायेजर २ से प्राप्त आकडो से जब नेप्च्यून और युरेनस की गति की गणना की गयी तब यह विचलन नही पाया गया। इस तरह <strong>'क्ष' ग्रह</strong> की सारी संभावनाये समाप्त हो गयी।</p>
<p>नयी खोजों से अब हम जानते है कि प्लूटो के बाद भी सूर्य की परिक्रमा करने वाले अनेक पिंड है लेकिन उनमें कोई भी इतना बड़ा नही है जिसे ग्रह का दर्जा दिया जा सके। इसका एक उदाहरण हाल ही मेखोज निकाला गया बौना ग्रह <strong>जेना</strong> है।</p>
<p>प्लूटो सामान्यतः नेप्च्यून की कक्षा के बाहर सूर्य की परिक्रमा करता है लेकिन इसकी कक्षा नेप्च्यून की कक्षा के अंदर से होकर गुजरती है। जनवरी १९७९ से फरवरी १९९९ तक इसकी कक्षा नेप्च्यून की कक्षा के अंदर थी। यह अन्य ग्रहों के विपरीत दिशा मे सूर्य की परिक्रमा करता है। इसका घूर्णन अक्ष भी युरेनस की तरह इसके परिक्रमा प्रतल से लंबवत है, दूसरे शब्दों मे यह भी सूर्य की परिक्रमा लुढकते हुये करता है। इसकी कक्षा की एक और विशेषता यह है कि इसकी कक्षा अन्य ग्रहों की कक्षा के प्रतल से लगभग १५ अंश के कोण पर है।</p>
<p>इसकी और नेप्च्यून के चन्द्रमा <strong>ट्राइटन</strong> की असामान्य कक्षाओं के कारण इन दोनो मे किसी ऐतिहासिक रिश्ते का अनुमान है। एक समय यह भी अनुमान लगाया गया था कि प्लूटो नेप्च्यून का भटका हुआ चन्द्रमा है। एक अन्य अनुमान यह है कि ट्राइटन यह प्लूटो की तरह स्वतंत्र था लेकिन बाद मे नेप्च्यून के गुरुत्वाकर्षण की चपेट मे आ गया।</p>
<p>प्लूटो तक अभी तक कोई अंतरिक्ष यान नही गया है। एक यान "न्यू हारीझोंस" जिसे जनवरी २००६ मे छोड़ा गया है लगभग २०१५ तक प्लूटो तक पहुंचेगा।</p>
<p>प्लूटो पर तापमान -२३५ सेल्सीयस और -२१० सेलसीयस के मध्य रहता है। इसकी सरंचना अभी तक ज्ञात नही है। इसका घनत्व २ ग्राम/घन सेमी होने से अनुमान है कि इसका ७०% भाग सीलीका  और ३०% भाग पानी की बर्फ से बना होनी चाहिये। सतह पर हाइड्रोजन, मिथेन, इथेन और कार्बन मोनोक्साईड की बर्फ का संभावना है।</p>
<p>प्लूटो के तीन उपग्रह भी है, शेरॉन, निक्स और हायड्रा. निक्स का व्यास लगभग ६० किमी और हायड्रा का व्यास लगभग २०० किमी अनुमानित है जबकि प्लूटो का व्यास २२७४ किमी अनुमानित है।</p>
<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/9902/plutocharon_hst.jpg" border="1" height="272" width="522" /></p>
<p align="center"><strong>हब्बल दूरबीन से ली गयी तस्वीर(प्लुटो और शेरान)</strong></p>
<p>शेरॉन यह ग्रीक मिथक कथाओं के अनुसार मृत आत्माओ को अचेरान नदी के पार कराने कर पाताल ले जाने वाला नाविक है।<br />
एक अनुमान के अनुसार शेरॉन का निर्माण प्लूटो और किसी अन्य पिंड के मध्य  टक्कर के कारण हुआ है। बहुत कुछ हमारे चन्द्रमा के निर्माण की तरह।</p>
<p>शेरॉन को तकनीकी तरह से प्लूटो का चन्द्रमा कहना भी सही नही है। क्योंकि शेरॉन प्लूटो की परिक्रमा तो करता ही है लेकिन प्लूटो भी शेरॉन की परिक्रमा करता है। ये दोनो एक दूसरे की परिक्रमा करते हुये सूर्य की परिक्रमा करते है। एक तरह से युग्म ग्रह है !</p>
<p>प्लूटो को देखना काफी मुश्किल है,साधारण दूरबीन से भी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वाणिज्य, व्यापार का देवता ]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/21/mercury/</link>
<pubDate>Sun, 21 Jan 2007 01:08:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/21/mercury/</guid>
<description><![CDATA[
बुध यह सूर्य से सबसे पहला और द्रव्यमा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/9612/mercury2_mariner10_big.gif" border="1" height="487" width="487" /></p>
<p>बुध यह सूर्य से सबसे पहला और द्रव्यमान मे आंठवा सबसे बडा ग्रह है। सौर मंडल मे दो चन्द्रमा गुरू का गेनीमेड और शनि का टाईटन व्यास मे बुध से बडे है लेकिन द्रव्यमान मे आधे हैं।</p>
<p>रोमन मिथक के अनुसार बुध (Mercury)वाणिज्य, व्यापार के देवता हैं। यह ग्रह सुमेरीयन सभ्यता के काल से ज्ञात है।</p>
<p>इस ग्रह तक सिर्फ एक ही अंतरिक्ष यान मैरीनर १० सन १९७४ मे गया है। एक नया यान मेसेंजर जो २००४ मे छोडा गया है बुध तक २०११ तक पहुंचेगा।</p>
<p>बुध की कक्षा दिर्घ वृत्ताकार है ,कभी यह सुर्य से ४६० लाख किमी होता है, कभी यह ७०० लाख किमी दूर चला जाता है। बुध की कक्षा मे सूर्य की परिक्रमा की गति न्युटन के नियमो के अंतर्गत करने के बाद और निरिक्षित गति से तुलना करने पर एक छोटा सा अंतर आता था। यह कोई भी विज्ञानी समझ नही पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। कुछ विज्ञानीयो ने एक और ग्रह वल्कन जो बुध की परिक्रमा कक्षा से भी अंदर हो की कल्पना कर ली थी। उनका मानना था कि यह ग्रह वल्कन बुध की गति को विचलित कर रहा है। लेकिन कोई भी ऐसा ग्रह नही पाया गया । बाद मे आईन्सटाईन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत ने इस गुत्थी को सुलझा दिया। इस सिद्धांत से गणना करने पर आये आंकडे ,निरिक्षण से प्राप्त आंकडो से मेल खा रहे थे।</p>
<p>शुक्र की तरह बुध का घुर्णन धीमा है। बुध जितने समय मे सूर्य के दो चक्कर लगाता है उतने समय मे खुद के तिन चक्कर लगाता है। मतलब यह कि बुध के दो वर्षो मे तीन बुध के दिन होते है।</p>
<p>बुध की सतह पर तापमान ९० केल्विन से ७०० केल्वीन तक रहता है।<br />
बुध को हमारे चन्द्र्मा का भाई कहा जा सकता है दोनो की सतह पर उलकापात से बने ढेर सारे गढ्ढे है। लेकिन बुध का घनत्व चन्द्रमा के घनत्व से कहीं ज्यादा है(५.४३ ग्राम/घन सेमी और ३.३४ ग्राम/घन सेमी)। बुध का घनत्व सारे सौर मण्ड्ल मे सिर्फ पृथ्वी से कम है। लेकिन पृथ्वी का घनत्व उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण ज्यादा है, जबकि बुध का घनत्व उसके लोहे की कोर के कारण है जो कि ३६०० किमी से ३८०० किमी व्यास की है। इस लोहे की कोर के उपर का सिलीका का आवरण ५०० से ६०० किमी मोटा है।</p>
<p>बुध का वातावरण काफी पतला है। यह वातावरण सौर हवा से लगातार प्राप्त होते परमाणुओ से बना है। बुध काफी गरम है इस कारण इस ग्रह पर ये परमाणु टिक नही पाते है और उड जाते है। जहां पृथ्वी और शुक्र के वातावरण स्थिर है वंही पर बुध के वातावरण का पुननिर्माण होते रहता है।</p>
<p>बुध पर आश्चर्यजनक रूप से इसके उत्तरी ध्रुव पर कुछ क्रेटरो मे पानी की बर्फ के प्रमाण मिले है !</p>
<p>बुध पर चुंबकिय क्षेत्र है लेकिन पृथ्वी की तुलना मे काफी कमजोर लगभग १% है। बुध का कोई चंद्रमा नही है।</p>
<p>बुध को नंगी आंखो से देखा जा सकता है। लेकिन सूर्य के काफी पास होने की वजह से इसे देखना दूष्कर रहता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[युद्ध का देवता]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/19/mars/</link>
<pubDate>Fri, 19 Jan 2007 03:27:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/19/mars/</guid>
<description><![CDATA[
मंगल यह सूर्य का चौथा और आकार मे सांतव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0107/mars_hst.jpg" border="1" height="444" width="500" /></p>
<p>मंगल यह सूर्य का चौथा और आकार मे सांतवे क्रमांक का ग्रह है। अपने लाल रंग के कारण यह ग्रीक मिथक कथाओं मे युद्ध का देवता माना जाता रहा है। मार्च महीने का नाम भी इसी ग्रह के नाम पर पडाहै।</p>
<p>विज्ञान कथा लेखकों के लिये यह ग्रह सबसे प्रिय रहा है, उनके अनुसार पृथ्वी के अलावा सौर मंडल मे जीवन की संभावना सिर्फ मंगल मे है। लेकिन सच यह है कि इस ग्रह मे अब तक की खोजों के अनुसार जीवन के कोई लक्षण नही पाये गये है। वैज्ञानिक लावेल द्वारा खोजी गयी नहरें भी अब सिर्फ प्राकृतिक रूप से संरचना है।</p>
<p>चन्द्रमा के अलावा मंगल अकेला ग्रह है जिस पर मानव निर्मित यान पहुंचा है।सबसे पहले मंगल तक पहुंचने वाला यान मैरीनर ४ था जो १९६५ मे मंगल के पास पहुंचा था।उसके बाद मंगल २(Mars 2) पहला यान था जो मगंल पर उतरा था, इसके बाद १९७६ मे वाइकिंग,१९९७ मे पाथफाईंडर, २००४ मे स्प्रिट और आपुरचुनिटी मंगल पर उतर चुके हैं।</p>
<p>मंगल की कक्षा दिर्घवृत्ताकार है। मंगल पर औसत तापमान लगभग -५५ सेल्सीयस रहता है जो सतह पर सर्दियो मे -१३३ सेल्सीयस से गर्मियों मे २७ सेल्सीयस तक पहुंचता है।</p>
<p>मंगल पृथ्वी से बहुत छोटा है लेकिन उसकी सतह का क्षेत्रफल पृथ्वी की सतह के क्षेत्रफल के बराबर ही है। क्योंकि मंगल पर सागर नही है ! मंगल पर पर्वत भी है जिसमे से ओलम्पस मान्स पर्वत यह सौरमण्डल मे सबसे उंचा पर्वत है&#124; इसकी उंचाई लगभग ७८,००० फीट (माउंट एवरेस्ट से तीन गुना उंचा)!</p>
<p>मंगल का वातावरण काफी पतला है जिसमे ९५.३% कार्बन डाय आक्साईड, २.७% नायट्रोजन, १.६% ओर्गन. ०.१५% आक्सीजन और ०.०३ प्रतिशत जल भाप है। वायु का दबाव सिर्फ ७मीलीबार है(पृथ्वी के वायुदाब का सिर्फ १%)। लेकिन वायु दबाव इतना है कि तेज़ हवाये, धूल के अंधड़ चल सकते है।<br />
मंगल का वातावरण ग्रीनहाउस प्रभाव तैयार करता है लेकिन तापमान सिर्फ ५ सेल्सीयस ही बढ़ पाता है जो कि पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे काफी कम है।</p>
<p>मंगल के दोनो ध्रुवों पर पानी और कार्बन डाय ऑक्साइड की बर्फ की एक टोपी बनी हुयी है।  मंगल की सतह के नीचे पानी की संभावना है।</p>
<p>आशा के विपरीत ,मंगल पर जीवन के कोई लक्षण नही पाये गये है। १९९६ डेविड मैके ने घोषणा की कि ALH84001 उल्का पर किसी पुरातन मंगल के सूक्ष्म जीव के अवशेष पाये गये है। लेकिन वैज्ञानिक समुदाय ने इसे मानने से इंकार कर दिया। यदि मंगल पर जीवन है या था, हम अब तक उसका पता नही लगा पाये है। मतलब कि आशा अभी भी जवान है !</p>
<p>मंगल पर भी (पृथ्वी की तरह ही सर्वत्र नही)चुंबकिय क्षेत्र पाये जाते है। शायद यह क्षेत्र किसी समय मंगल पर रहे सार्वत्रिक चुंबकिय क्षेत्र के अवशेष हैं! यह भी यह मंगल पर किसी प्राचीन काल मेजीवन की संभावना का संकेत है।</p>
<p>मंगल के दो चन्द्रमा भी है जिनका नाम फोबोस और डीमोस है। फोबोस का व्यास ११ किमी है जबकि डीमोस का व्यास सिर्फ ६ किमी है।</p>
<p>रात मे मंगल आसानी नंगी आंखो से देखा जा सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महाकाय गुरु]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/18/jupitar/</link>
<pubDate>Thu, 18 Jan 2007 04:21:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/18/jupitar/</guid>
<description><![CDATA[
गुरु यह सूर्य का पांचवा और सबसे बडा ग्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://photojournal.jpl.nasa.gov/browse/PIA02873.jpg" border="1" height="256" width="455" /><br />
गुरु यह सूर्य का पांचवा और सबसे बडा ग्रह है। गुरू अकेले का द्रव्यमान अन्य सभी ग्रहो के कुल द्रव्यमान का दूगना है ! यह पृथ्वी से ३१८ गुना ज्यादा द्रव्यमान रखता है।<br />
गुरु आकाश मे चौथा सबसे चमकिला पिंड है(सूर्य,चन्द्रमा और शुक्र ग्रह के बाद)। इसके बहुत सारे चन्द्रमा(२५ से ज्यादा) है जिसमे आयो, युरोपा, गेनीमेड और केलिस्टो सबसे बडे है।</p>
<p>चित्र मे निचे बायें दिख रहा  छोटा काला धब्बा आयो की गुरु पर पडने वाली छाया है। दूसरे शब्दो मे गुरू पर उस छाया वाले स्थान पर सुर्य ग्रहण हो रहा है।</p>
<p>इन चन्द्रमाओ को गैलेलियो ने पहली बार अपनी दूरबीन से देखा था और पाया था कि ये गुरू की परिक्रमा करते है। इस खोज से उसने सिद्ध किया की ना तो पृथ्वी ब्रम्हांड का केन्द्र है ,ना सारे आकाशिय पिंड पृथ्वी की परिक्रमा करते है। उसने कोपरनिकस का समर्थन करना शुरू किया जिस कारण उसे अनेको परेशानीयो (वेटीकन से) का सामना करना पडा !<br />
गुरू और उसके चन्द्रमाओ को किसी साधारण दूरबीन से या अछे बायनाकुलर से देखा जा सकता है।</p>
<p>गुरू यह गैस का एक महाकाय गोला है जो ९०% हायड्रोजन और १० % हिलियम से बना है(काफी अल्प मात्रा मे मिथेन, अमोनिया, पानी और सीलीका भी है! गुरू आज भी उस निहारीका के जैसा है जिससे सौरमण्ड्ल का निर्माण हुआ। यह महाकाय ग्रह किन्ही अज्ञात कारणो से एक तारा बनते बनते रह गया , वर्ना हमारे सौर मण्डल मे दो सुर्य होते ! एक और तथ्य यह है कि गुरू सूर्य से जितनी उर्जा ग्रहण करता है उससे ज्यादा उत्सर्जीत करता है।<br />
शनी भी गुरू के जैसा है। युरेनस और नेपच्युन भी गुरू के जैसे है लेकिन हायड्रोजन और हिलीयम की मात्रा उनमे कम है।<br />
अन्य गैसीय ग्रहो (शनी, युरेनस, नेपच्युन) के जैसे गुरू के भी वलय है लेकिन शनी की तुलना मे धुंधले है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हीरो वाला निला दानव]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/17/neptune/</link>
<pubDate>Wed, 17 Jan 2007 04:23:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/17/neptune/</guid>
<description><![CDATA[
वायजर २ से १९८९ ली गयी सूर्य के आंठवे औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/neptune_vg2.gif" border="1" height="313" width="313" /></p>
<p>वायजर २ से १९८९ ली गयी सूर्य के आंठवे और अंतिम ग्रह की तस्वीर।<br />
नेपच्युन १९९९ तक सबसे आखरी ग्रह था क्योंकि प्लुटो अपनी अजीबोगरीब कक्षा के कारण नेप्च्युन की कक्षा के अंदर था। अब जब प्लुटो से ग्रह का दर्जा छीन गया है, नेप्च्युन सौरमंडल का अंतिम ग्रह है।</p>
<p>युरेनस के जैसे ही यह ग्रह पानी, मिथेन और अमोनिया से बना है और हायड्रोजन, हिलियम के एक मोटे आवरण से घिरा हुआ है। नेपच्युन का निला रंग इसके वातावरण की मिथेन के कारण है जो लाल रंग अवशोषीत कर लेती है।</p>
<p>इसके भी कई चन्द्रमा और वलय है।यह सूर्य की एक परिक्रमा पृथ्वी के १६५ वर्ष मे करता है। इसका अक्ष इसकी सूर्य की  परिक्रमा के प्रतल से २९ अंश झुका  हुआ है(पृथ्वी का अक्ष २३.५ अंश झुका हुआ है)।</p>
<p>नेपच्युन मे पूरे सौर मंडल मे सबसे तेज हवाये चलती है, कभी कभी २००० किमी प्रति घंटा की रफ्तार से !</p>
<p>एक संभावना यह है कि युरेनस और नेपच्युन के गर्म और अत्याधिक दबाव वाले वातवरण के कारण यहां पर हीरो की प्रचुरता होना चाहीये !</p>
<p>नेपच्युन का चंद्रमा ट्राईटन पूरे सौरमंडल मे सबसे अलग चंद्रमा है। इस पर अनेको सक्रिय ज्वालामुखी है।</p>
<p>नेपच्युन की कक्षा सामान्य नही है,इसकी कक्षा मे एक रहस्यमय विचलन पाया जाता है। कारण अभी तक अज्ञात है। इसका एक कारण नेपच्युन के बाद एक और ग्रह की उपस्थिती(प्लुटो और सेडान नही)हो सकती है।</p>
<p>प्लुटो और सेडान इतने छोटे है कि वे नेपच्युन पर कोई प्रभाव नही डाल सकते है!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लुढकने वाला ग्रह]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/16/uranus/</link>
<pubDate>Tue, 16 Jan 2007 05:08:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/16/uranus/</guid>
<description><![CDATA[
यह तस्वीर १९८६ मे वायेजर २ अंतरिक्ष य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0108/uranus_vg2.jpg" border="1" height="472" width="625" /></p>
<p>यह तस्वीर १९८६ मे वायेजर २ अंतरिक्ष यान से ली गयी है। यह अकेला यान है जो युरेनस के पास से गुजरा है।</p>
<p>युरेनस यह गुरु और शनी के बाद तिसरा सबसे बढा ग्रह है। यह मुख्यतः चट्टानो और बर्फ से बना है लेकिन इस पर हायड्रोजन और हीलीयम का एक काफी मोटा आवरण है। इसका निला रंग इसके वातावरण मे मिथेन गैस की उपस्थिति के कारण है। मिथेन गैस लाल रंग को सोख लेती है।</p>
<p>युरेनस के के १० से ज्यादा चन्द्रमा है और इसके आसपास शनि के जैसे लेकिन धुंधले वलय भी हैं।</p>
<p>युरेनस का अक्ष उसकी सूर्य की परीक्रमा के प्रतल से (शुक्र  ग्रह के जैसे ही) बहुत ज्यादा झुका हुआ है, कभी कभी तो <strong>यह अक्ष सुर्य के लम्बवत हो जाता है। जिससे यह प्रतित होता है कि यह ग्रह सुर्य की परिक्रमा लुढकते हुये कर रहा है।</strong> ज्ञात रहे पृथ्वी का अक्ष २३.५ अंश झुका हुआ है।<br />
युरेनश और नेपच्युन काफी मिलते जुलते ग्रह है, युरेनस बडा है लेकिन इसका द्रव्यमान कम है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चांद पर दाग ?]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/13/mooncrator/</link>
<pubDate>Sat, 13 Jan 2007 17:32:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/13/mooncrator/</guid>
<description><![CDATA[
चांद पर दाग ? चांद पर दाग ही नही गड्डे भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img border="1" width="504" src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/9809/copernicus_apollo17.jpg" height="374" style="width:504px;height:374px;" /></p>
<p>चांद पर दाग ? चांद पर दाग ही नही गड्डे भी है, अपोलो १७ द्वारा १९७२ मे ली गयी इस तस्वीर मे कोपरनिकस क्रेटर दिखायी दे रहा है। इस क्रेटर को आप साधारण बायनाकुलर से देख सकते है। यह चांद की धरती की ओर की सतह मे मध्य से उत्तर पूर्व दिशा मे है।</p>
<p>यह क्रेटर ज्यादा पूराना नही है, अन्य क्रेटर की तुलना मे नया है। यह लगभग १ बीलीयन साल पहले किसी उल्का के चंद्रमा से टकराव से बना है।</p>
<p>चण्द्रमा पर जो अंतिम मानव युक्त यान गया था अपोलो १७ उसने यह चित्र खिंचा था, अब चद्रमा पर फिर से जाने की उम्मीदे जागृत हुयी है क्योंकि इसके ध्रुवो पर पानी की बर्फ का पता चला है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शनी की छाया मे]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/05/saturnrings/</link>
<pubDate>Fri, 05 Jan 2007 09:42:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/05/saturnrings/</guid>
<description><![CDATA[
शनी की छाया मे अनेको चमत्कारी घट्नाये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0610/newrings_cassini.jpg" border="1" height="480" width="640" /></p>
<p>शनी की छाया मे अनेको चमत्कारी घट्नाये होती है। कासीनी उपग्रह ने यह चित्र लिया है। सुर्य इस समय शनी के पिछे है!<br />
कासीनी ने पहली बार शनी की रात का चित्र लिया। चित्र मे जो प्रकाश दिखायी दे रहा है वह उसके शाही वलयो द्वारा परावर्तित प्रकाश है। जब शनी के दिन वाली सतह से चित्र लेते है तब उसके वलय धुंधले दिखायी देते है लेकिन रात वाली सतह से वह चमकिले दिखायी देते है, इतने ज्यादा कि इससे नये वलय भी खोज निकाले गये हैं। ये नये वलय इस चित्र मे दिखायी नही दे रहे है।</p>
<p>चित्र मे एक  धुंधला निला बिन्दू  (सबसे बाहरी चमकिले वलय के उपर) दिखायी दे रहा है जो कुछ और नही हमारे पृथ्वी है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शनी की नजर से !]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/04/earthfmsaturn/</link>
<pubDate>Thu, 04 Jan 2007 09:25:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/04/earthfmsaturn/</guid>
<description><![CDATA[
इस चित्र  मे एक निले रंग का बिंदू क्या ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/0609/earth2_cassini.jpg" border="1" height="430" width="502" /></p>
<p>इस चित्र  मे एक निले रंग का बिंदू क्या है ?</p>
<p><strong> पृथ्वी।</strong></p>
<p>कासीनी उपग्रह ने शनी ग्रह के पास से गुजरते हुये यह चित्र लिया था !<br />
उपर बांये ये कोने मे इस बिन्दू को बडा कर के दिखाया गया है। ध्यान से देखने पर पृथ्वी का चन्द्रमा भी दिखायी दे रहा है। पृथ्वी की सतह का ७०% भाग पानी से घीरा होने से पृथ्वी का रंग निला दिखायी देता है !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक सुंदर ग्रह : शनी]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/03/saturn/</link>
<pubDate>Wed, 03 Jan 2007 09:19:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/03/saturn/</guid>
<description><![CDATA[
शनी बाकी ग्रहो से हटकर लेकिन एक सुंदर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://antwrp.gsfc.nasa.gov/apod/image/9703/saturncol_hst_big.jpg" border="1" height="492" width="546" /></p>
<p>शनी बाकी ग्रहो से हटकर लेकिन एक सुंदर ग्रह है। यह हमारे सौर मण्डल मे गुरु के बाद दूसरा सबसे बडा ग्रह है। यह रात मे आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन इसके सुंदर वलय सिर्फ दूरबीन से देखे जा सकते है। यह ग्रह मुख्यतः हायड्रोजन और हिलीयम से बना है। शनी के वलय बर्फ के टुकडो से बने है जिनका आकार एक छोटे सिक्के से लेकर कार के आकार तक है। यह चित्र हब्बल दूरबीन द्वारा लीया गया है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुरज के बौने बेटे]]></title>
<link>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/23/asteroids/</link>
<pubDate>Tue, 23 Jan 2007 04:53:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
<guid>http://antariksh.wordpress.com/2007/01/23/asteroids/</guid>
<description><![CDATA[
१सेरस -सबसे बडा क्षुद्र ग्रह
क्षुद्र ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/fc/Ceres_optimized.jpg" style="width:275px;height:275px;" border="1" height="275" width="275" /></p>
<p align="center"><strong>१सेरस -सबसे बडा क्षुद्र ग्रह</strong></p>
<p><font size="2">क्षुद्र ग्रह पथरीले और धातुओ के ऐसे पिंड है जो सूर्य की परिक्रमा करते</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">है</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">लेकिन</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">इतने लघु है कि इन्हे ग्रह नही कहा जा सकता। इन्हे लघु ग्रह या क्षुद्र ग्रह कहते है। इनका आकार १००० किमी व्यास के सेरस से १ से २ इंच के पत्थर के टुकडो तक है।</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">सोलह</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">क्षुद्रग्रहो का व्यास २४० किमी या उससे ज्यादा है। ये क्षुद्रग्रह पृथ्वी की कक्षा के अंदर से शनि की कक्षा से बाहर तक है। लेकिन अधिकतर क्षुद्रग्रह मंगल और गुरु के बिच मे एक पट्टे मे है। कुछ की कक्षा पृथ्वी की कक्षा को काटती है और कुछ ने भूतकाल मे</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पृथ्वी को टक्कर भी मारी है। एक उदाहरण महाराष्ट्र मे लोणार झील है।</font></p>
<p><strong><font size="2">क्षुद्र ग्रह का पट्टा<font face="Arial" size="2">(Asteroid Belt)</font></font></strong></p>
<p><font size="2">क्षुद्र ग्रह ये सौर मंडल बन जाने के बाद बचे हुये पदार्थ है। एक दूसरी कल्पना के</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">अनुसार ये मंगल और गुरु के बिच मे किसी समय रहे  प्राचीन ग्रह के अवशेष है जो किसी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">कारण से टूकडो टूकडो मे बंट गया। इस कल्पना का एक कारण यह भी है कि</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">मंगल और गुरू के बिच का अंतराल सामान्य से ज्यादा है। दूसरा कारण यह है कि सूर्य के ग्रह अपनी दूरी के अनुसार द्रव्यमान मे बढ्ते हुये और गुरु के बाद घटते क्रम मे है। इस तरह से मंगल और गुरु के मध्य मे गुरु से छोटा लेकिन मंगल से बडा एक ग्रह होना चाहिये। लेकिन इस प्राचिन ग्रह की कल्पना सिर्फ एक कल्पना ही लगती है क्योंकि यदि सभी क्षुद्र ग्रहो को एक साथ मिला भी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">लिया जाये तब भी इनसे बना संयुक्त ग्रह १५०० किमी से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">कम व्यास का होगा जो कि हमारे चन्द्रमा के आधे से भी कम है।</font><font size="2"> </font></p>
<p><font size="2">क्षुद्रग्रहो के बारे मे हमारी जानकारी उल्कापात मे बचे हुये अबशेषो से है। जो क्षुद्रग्रह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी के वातावरण मे आकर पृथ्वी से टकरा जाते है उन्हे उल्का <font face="Arial" size="2">(Meteoroids) </font><font size="2">कहा जाता है। अधिकतर उल्काये वातावरण मे ही जल जाती</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">है लेकिन कुछ उल्काये पृथ्वी से टकरा भी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">जाती है।</font></font></p>
<p><font size="2">इन उल्काओ का ९२</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">८</font><font face="Arial" size="2">% </font><font size="2">भाग सीलीकेट का और ५</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">७</font><font face="Arial" size="2"> % </font><font size="2">भाग लोहे और निकेल का बना हुआ होता है। उल्का अवशेषो को पहचाना मुश्किल होता है क्योंकि ये सामान्य पत्थरो जैसे ही होते है।</font><font size="2"> क्षुद्र ग्रह सौर मंडल के जन्म के समय से ही मौजुद है<font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">इसलिये विज्ञानी इनके अध्यन के लिये उत्सुक रहते है। अंतरिक्षयान जो इनके पट्टे के बिच से गये है उन्होने पाया है कि ये पट्टा सघन नही है, इन क्षुद्र ग्रहो के बिच मे काफी सारी खाली जगह है। अक्टूबर १९९१ मे गलेलियो यान क्षुद्रग्रह क्रंमांक <strong>९५१ गैसपरा </strong>के पास से गुजरा</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">था। अगस्त १९९३ मे गैलीलियो ने क्षुद्रग्रह क्रमांक <strong>२४३ इडा </strong>की नजदिक से तस्वीरे ली थी। ये दोनो</font><font face="Arial" size="2"> 'S' </font><font size="2">वर्ग के क्षुद्र ग्रह है।</font></font></p>
<p><strong><font size="2"><img src="http://www.nineplanets.org/pics/compare4.jpg" style="width:504px;height:620px;" border="1" height="620" width="504" /></font></strong></p>
<p><font size="2">अब तक हजारो क्षुद्रग्रह देखे जा चुके है और उनका नामकरण और वर्गीकरण हो चुका है। इनमे प्रमुख है <strong>सेरस<font face="Arial" size="2">, </font><font size="2">टाउटेटीस</font><font face="Arial" size="2">, </font><font size="2">कैस्टेलिया</font><font face="Arial" size="2">, </font></strong><font size="2"><strong>जीओग्राफोस </strong>और <strong>वेस्ता।</strong></font><strong><font face="Arial" size="2"> </font></strong><font size="2">सबसे बडा है <strong>१सेरस </strong>जो कि कुल</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">क्षुद्र ग्रहो के संयुक्त द्रव्यमान का २५</font><font face="Arial" size="2">% </font><font size="2">है और ९३३ किमी व्यास का है। <strong>२पालास</strong></font><strong><font face="Arial" size="2">, </font></strong><font size="2"><strong>४ वेस्ता</strong> और <strong>१० हाय्जीया </strong>ये ४०० किमीऔर ५२५ किमीके व्यास के बिच है। बाकि सभी क्षुद्रग्रह ३४० किमी व्यास से कम के है।</font></font></p>
<p><font face="Arial" size="2"><font size="2">धूमकेतू</font>, </font><font size="2">चन्द्रमा और क्षुद्रग्रहो के वर्गीकरण मे विवाद है। कुछ ग्रहो के चन्द्रमाओ को क्षुद्रग्रह कहना बेहतर होगा जैसे मंगल के चन्द्रमा <strong>फोबोस </strong>और <strong>डीमोस</strong></font><strong><font face="Arial" size="2">, </font></strong><font size="2">गुरू के बाहरी आठ चन्द्रमा शनि का बाहरी चन्द्रमा</font><font face="Arial" size="2"> </font><strong><font size="2">फोएबे</font><font face="Arial" size="2"> </font></strong><font size="2">वगैरह।</font></p>
<p><strong><font size="2">क्षुद्र ग्रहो का वर्गीकरण</font></strong></p>
<p><font size="2">१</font><font face="Arial" size="2">. <strong>C </strong></font><strong><font size="2">वर्ग</font></strong><font face="Arial" size="2"> :</font><font size="2">इस श्रेणी मे ७५</font><font face="Arial" size="2">% </font><font size="2">ज्ञात क्षुद्र ग्रह आते है। ये काफी धुंधले होते है।</font><font face="Arial" size="2">(albedo </font><font size="2">०</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">०३</font><font face="Arial" size="2">)</font><font size="2">। ये सूर्य के जैसे सरचना रखते है लेकिन हाय्ड्रोजन और हिलीयम</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">नही</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">होता है।</font></p>
<p><font size="2">२<font face="Arial" size="2">. <strong>S </strong></font><strong><font size="2">वर्ग</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> </strong>: </font><font size="2">१७</font><font face="Arial" size="2">%, </font><font size="2">कुछ</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">चमकदार</font><font face="Arial" size="2">(albedo </font><font size="2">०</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">१० से०</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">२२</font><font face="Arial" size="2">), </font><font size="2">ये धातुओ लोहा और निकेल तथा मैगनेशियम सीलीकेट से बने होते है।</font></font></p>
<p><font face="Arial" size="2"><font size="2">३</font>. <strong>M </strong></font><strong><font size="2">वर्ग</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> </strong>:</font><font size="2">अधिकतर</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">बचे हुये</font><font face="Arial" size="2"> : </font><font size="2">चमकदार</font><font face="Arial" size="2"> (albedo .</font><font size="2">१० से ०</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">१८</font><font face="Arial" size="2">) , </font><font size="2">निकेल और लोहे से बने।</font></p>
<p><font size="2">इनका वर्गीकरण इनकी सौरमण्डल मे जगह के आधार पर भी किया गया है।</font></p>
<p><font size="2">१</font><font face="Arial" size="2">. </font><strong><font size="2">मुख्य पट्टा</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> </strong>: </font><font size="2">मंगल और गुरु के मध्य। सूर्य से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">२</font><font face="Arial" size="2">-</font><font size="2">४</font><font face="Arial" size="2"> AU </font><font size="2">दूरी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पर।</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">इनमे कुछ उपवर्ग भी है</font><font face="Arial" size="2"> :- </font><strong><font size="2">हंगेरीयास</font><font face="Arial" size="2">, </font><font size="2">फ़्लोरास</font><font face="Arial" size="2">,</font><font size="2">फोकीआ</font><font face="Arial" size="2">,</font><font size="2">कोरोनीस</font><font face="Arial" size="2">, </font><font size="2">एओस</font><font face="Arial" size="2">,</font><font size="2">थेमीस</font><font face="Arial" size="2">,</font></strong><font size="2"><strong>सायबेलेस </strong>और <strong>हिल्डास। </strong>हिल्डास इनमे मुख्य है। </font></p>
<p><font size="2">१<font face="Arial" size="2">AU= </font><font size="2">पृथ्वी से सूर्य की</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">दूरी।</font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2">२<font face="Arial" size="2">. </font><strong><font size="2">पृथ्वी के पास के क्षुद्र ग्रह</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> (NEA)</strong> </font></font></font></p>
<p><font size="2">३</font><font face="Arial" size="2">.</font><strong><font size="2">ऎटेन्स</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> </strong>:</font><font size="2">सूर्य से १</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">०</font><font face="Arial" size="2"> AU </font><font size="2">से कम दूरी पर और ०</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">९८३</font><font face="Arial" size="2"> AU </font><font size="2">से ज्यादा दूरी पर।</font></p>
<p><font size="2">४<font face="Arial" size="2">. </font><strong><font size="2">अपोलोस</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> </strong>:</font><font size="2">सूर्य</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">१</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">०</font><font face="Arial" size="2"> AU </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">ज्यादा</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">दूरी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पर</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">लेकिन</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">१</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">०१७</font><font face="Arial" size="2"> AU </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">कम</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">दूरी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पर।</font></font></p>
<p><font face="Arial" size="2"><font size="2">५</font>.</font><strong><font size="2">अमार्स</font></strong><font face="Arial" size="2"> : </font><font size="2">सूर्य</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">१</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">०१७ </font><font face="Arial" size="2">AU </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">ज्यादा</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">दूरी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पर</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">लेकिन</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">१</font><font face="Arial" size="2">.</font><font size="2">३ </font><font face="Arial" size="2">AU </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">कम</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">दूरी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पर।</font></p>
<p><font size="2">६<font face="Arial" size="2">.</font><strong><font size="2">ट्राजन</font></strong><font face="Arial" size="2"><strong> </strong>: </font><font size="2">गुरु के गुरुत्व के पास।</font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2">सौर मण्डल के<font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">बाहरी</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">हिस्सो मे भी कुछ क्षुद्र ग्रह है जिन्हे <strong>सेन्टारस </strong>कहते है। इनमे से एक <strong>२०६० शीरान</strong> है जो शनि और युरेनस के बिच सूर्य की</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">परिक्रमा करता है। एक क्षुद्र ग्रह <strong>५३३५ डेमोकलस </strong>है जिसकी कक्षा मंगल के</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">पास</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">युरेनस तक है। <strong>५१४५ फोलुस</strong> की कक्षा शनि से नेपच्युन के मध्य है। इस तरह के क्षुद्र ग्रह अस्थायी होते है। ये या तो ग्रहो से</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">टकरा जाते है या उनके</font><font face="Arial" size="2"> </font><font size="2">गुरुत्व मे फंसकर उनके चन्द्रमा बन जाते है।</font></font></font></p>
<p><font size="2">क्षुद्रग्रहो को आंखो से नही देखा जा सकता लेकिन इन्हे बायनाकुलर या छोटी दूरबीन से देखा जा सकता है।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
