<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>चिट्ठाकारी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/चिट्ठाकारी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "चिट्ठाकारी"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 14:34:30 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[मीडिया प्रसन्न , चिट्ठेकार सन्न ….]]></title>
<link>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/11/blog-stableguardian/</link>
<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 09:42:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/11/blog-stableguardian/</guid>
<description><![CDATA[सरकार प्रसन्न ,  
घोड़ा सन्न ,
कि घोड़े से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h4>सरकार प्रसन्न ,  </h4>
<h4>घोड़ा सन्न ,</h4>
<h4>कि घोड़े से तेज दौड़ता है -</h4>
<h4>कागज का घोड़ा .</h4>
<h4>- राजेन्द्र राजन</h4>
<p>    कवि मित्र राजेन्द्र राजन की यह छोटी-सी कविता उनकी ‘घोड़ा’ - सिरीज़  से ली गई है । कई अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया प्रतिष्ठानों द्वारा ब्लॉगों के ‘घुड़साल’ या अस्तबल शुरु किए जाने की सूचना पाने के बाद से  इसका बार-बार याद आना लाजमी है । अस्तबल शब्द शायद अंग्रेजी के stable से पहले गढ़ा गया होगा , ध्वनि और तवारीख के लिहाज से लगता है । विलायत में घोड़े पहुँचे ही कब ?  पक्की सूचना अजित दे सकते हैं ।</p>
<p>    अपने देश में हम जैसे दिल्ली के अखबारों और चैनलों को राष्ट्रीय चैनल और दिल्ली के बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय बुद्धिजीवी मान लेते हैं उसी गणित से अमेरिकी <a href="http://www.huffingtonpost.com/theblog/"><font color="#265e15">हफ़िंग्टन पोस्ट</font></a> या इग्लैंड के गार्जियन अखबार का <a href="http://commentisfree.guardian.co.uk/index.html"><font color="#265e15">‘कमेन्ट इज़ फ़्री’</font></a> जैसे चिट्ठों के अस्तबलों को अन्तर्राष्ट्रीय चिट्ठा-घुड़साल मानना होगा । साइबर जगत  के ’ऑस्कर’ कहे जाने वाले पुरस्कार(इन वेब्बी पुरस्कारों पर फिर कभी) इन्हें मिलेते रहे हैं । इन मीडिया - चिट्ठों की सामग्री तय करने में अखबार के स्थापित स्तंभकारों के अलावा कुछ चर्चित चिट्ठेकार भी चुने जाते हैं । गार्जियन के अस्तबल की शुरुआत में अखबार के चार वरिष्ठ सम्पादकीय स्टाफ़ को जिम्मा दिया गया कि वे चिट्ठे और अखबार के बीच तालमेल बैठाने का काम करें । गार्जियन अनलिमिटेड की मुख्य सम्पादक एमिली बेल और ज्यॉर्जिना हेनरी इस परियोजना की शुरुआत से जुड़ी रहीं । एमिली बताती हैं ,’ गत वर्ष मार्च महीने(२००६) में मैंने इस काम को शुरु किया। दो महीने बीतते-बीतते  पेशेवर स्तंभकारों और चिट्ठेकारों (जिन्हे मैं लिखने के लिए चुनती थी) के सन्दर्भ में मुझे अपना नजरिया बदलना पड़ा । ये चिट्ठेकार मुझे अत्यन्त बहुश्रुत और पाण्डित्यपूर्ण लगे ।’ इन चिट्ठेकारों द्वारा बिना मेहनताना लिए अपनी रुचि के विषयों पर बहस शुरु करने की ललक देख कर एमिली अचरज में पड़ जाती हैं । हांलाकि प्रतिदिन चुने गये टिप्पणीकारों और अखबार द्वारा निमंत्रित टिप्पणीकर्ताओं को धन भी दिया जाता है।</p>
<p>    चिट्ठे चुनने का क्रम हिन्दी में भी शुरु हुआ है , फिलहाल बिना ईनाम।यहाँ यह शुरु करने वाले चिट्ठे <strike>शशि</strike> cum(या कम ?) अस्तबल <em>ज्यादा</em>  <strike>लोकमंच</strike> हैं। इस प्रयोग(गार्जियन वाले) से जुड़े रसब्रिजर कहते हैं , ‘हमने जो प्रयोग किया है वह पहले किसी अखबार ने न किया होगा - दरमाह पाने वाले स्थापित प्रभु-स्तंभकारों को हम उसी अखाड़े में उतारते हैं जहाँ बिना पैसों के लिखने वाले हैं।पेशेवर पत्रकारिता क्या है और क्या नहीं , और दोनों एक ही अखाड़े में कैसे चलेंगे यह हम इस प्रयोग के दौरान तय करेंगे।’</p>
<p>    बहरहाल इस स्थापित मीडिया समूह ( गार्जियन) को अपने अस्तबलों से जो मिला है उस पर गौर करें : <strong>५०,००० पाठक टिप्पणियाँ और मासिक बीस लाख देखने वाले</strong> । एमिली बताती है कि  <strong>हफ़िग्टन पोस्ट</strong> नौ महीने में ५०० चिट्ठेकारों को जोड़ सका था,हमने यह संख्या दो महीने में हासिल कर ली । एमिली का कहना है , ‘ हर युवा पत्रकार को चिट्ठेकारी पर हाथ आजमाना चाहिए ।’ <strong>यहाँ हाथ आजमाना शुरु करते न करते मुक्ति का बोध होने लगता है।</strong></p>
<p>    इस माध्यम (चिट्ठाकारी) में सबसे जरूरी है पारदर्शिता । कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़ते वक्त यदि स्रोतों का जानबूझकर जिक्र न हो या अथवा किसी के अन्य स्थलों पर लिखे गये बयानों को ऐसे जोड़ देने से मानो वे बयान भी वहीं दिये गये हों बवेला ज्यादा होता है । - ऐसे में चिट्ठालोक में विश्वसनीयता ज्यादा तेजी से लुप्त हो जाती है और लुप्त हो जाते हैं पाठक । हाल ही में प्रसिद्ध हॉलीवुड अभिनेता ज्यॉर्ज क्लूनी के सी.एन.एन के चर्चित कार्यक्रम <em>लैरी किंग लाइव</em> तथा <em>गार्जियन</em> को दिये गये साक्षात्कारों को <strong>हफ़िंग्टन पोस्ट </strong>के <strike>मोहल्ले</strike>  अस्तबल पर क्लूनी की चिट्ठा प्रविष्टि के तौर पर छापने पर विश्वसनीयता का सवाल उभर कर आया था। इस प्रविष्टि के साथ मूल स्रोत का जिक्र नहीं था।क्लूनी को कहना पड़ा , ‘मैं उन बयानों पर कायम हूँ लेकिन यह चिट्ठा मैंने नहीं लिखा । सुश्री हफ़िंग्टन ने मेरे पूर्व के साक्षात्कारों से सामग्री लेने की अनुमति भी मुझसे ली थी।मुझसे उन्होंने सिर्फ़ मेरे उत्तरों को(प्रश्न हटा कर) सम्मिलित करने की अनुमति नहीं ली थी और इसी कारण पाठकों को यह लग रहा है कि यह मेरा लेख है।मुझसे पूछे गए सवालों के जवाबों और मेरे मौलिक लेख में अन्तर होगा ही ।’</p>
<p>    टेलिविजन ,अखबार या रेडियो फोन कम्पनियों से व्यावसायिक सौदा तय कर के चाहे जितने पूर्व-निर्धारित, निश्चित विकल्पों वाले एस.एम.एस. प्राप्त कर लें और उन्हें फ़ीडबैक की संज्ञा दें ,  इन माध्यमों में संवाद मोटे तौर पर एकतरफा ही होता है । संजाल पर परस्पर होने वाले संवाद की श्रेष्ठता इन सब पर भारी है । ऐसे में अन्य माध्यमों द्वारा संजाल पर हाथ आजमाने को जरूर बढ़ावा दिया जायेगा ।</p>
<p>     फिर दिल्ली की राष्ट्रीय मीडिया हस्तियाँ अपने कारिन्दों को अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया समूहों की नकल करने के लिए प्रोत्साहित ही करेंगी अथवा नहीं ? क्योंकि <strong>कागजी घोड़ों से भी तेज होता है साइबर घोड़ा ।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिट्ठाकारी : अपठित महान - महा अपठित]]></title>
<link>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/10/bloggingnicolas-carr/</link>
<pubDate>Thu, 10 Jan 2008 10:05:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/10/bloggingnicolas-carr/</guid>
<description><![CDATA[[ चिट्ठाकारी पर पिछली पोस्ट से कुछ अनु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>[ चिट्ठाकारी पर <a target="_blank" href="http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/09/blogsrevolution-evangelists/">पिछली पोस्ट</a> से कुछ अनुदित सामग्री सम्पादित कर यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। हिन्दी चिट्ठेकारों ने विषय में रस लिया और बहस भी चलायी । आज <a href="http://www.roughtype.com/archives/2006/08/the_great_unrea.php"><font color="#265e15">निकोलस कार्र</font></a> के चिट्ठे से यह बहुचर्चित वक्तव्य यहाँ दिया जा रहा है । ]</p>
<h3><font color="#8080ff" face="Verdana"><u><em>मंगलाचरण</em></u></font></h3>
<p>    किसी जमाने की बात है चिट्ठालोक नामक एक टापू था जिसके बीचोबीच पत्थर का एक विशाल किला था । किले के चारों ओर मीलों तक टीन , गत्ते और फूस की मड़इयों में रहने वाले किसानों की बस्तियाँ थीं ।</p>
<h3><em><u><font color="#ff80c0" face="Verdana">भाग एक </font></u></em></h3>
<p>   <strong> <em><font color="#804000"><u>निरीह कपट का स्वरूप</u></font></em></strong></p>
<p><font color="#804000">    मैं जॉन केनेथ गालब्रेथ की लिखी एक छोटी किताब पढ़ रहा था,यूँ कह सकते हैं कि यह एक निबन्ध है -  <strong>‘  निरीह कपट का अर्थशास्त्र ‘</strong> ( Economics of Innocent Fraud ) . यह उनकी आखिरी किताब है जिसे उन्होंने अपनी जिन्दगी के नौवें दशक में , मरने के कुछ समय पहले ही पूरा किया । ( गालब्रेथ पूँजीवाद के प्रबल प्रवक्ता , पुरोधा और झण्डाबरदार रहे हैं । - अफ़लातून । किताब में उन्होंने समझाया है कि अमेरिकी समाज कैसे ‘पूँजीवाद’ के लिए अब ‘बाजार अर्थव्यवस्था’ शब्द का इस्तेमाल करने लगा है । नया नाम पहले वाले से कुछ मृदु और नम्र है , मानो यह अन्तर्निहित हो कि अब आर्थिक सत्ता  उपभोक्ता की हाथों में आ गयी है बनिस्पत  पूँजी के मालिकों या  उनका काम करने वाले प्रबन्धकों के । गालब्रेथ इसे निरीह कपट का सटीक उदाहरण मानते हैं ।</font></p>
<p><font color="#804000">  निरीह कपट भी एक झूठ है जो काला नहीं सफ़ेद होता है । यह सभी को खुशफ़हमी में रखता है। यह एक ओर ताकतवर लोगों के मन माफ़िक होता है क्योंकि यह उनकी पूरी सत्ता को ढँक देता है , वहीं सत्ता विहीन लोगों के मन माफ़िक इसलिए होता है कि उनकी सत्ताहीनता को भी आवृत कर देता है ।</font></p>
<p><font color="#804000">   <strong> चिट्ठालोक के बारे में हम खुद को कहते हैं कि - नियन्त्रित और नियन्ता जन-सम्प्रेषण माध्यम के मुकाबले यह माध्यम खुला , लोकतांत्रिक और समतामूलक है । ऐसा कहना निरीह कपट है ।</strong></font></p>
<h3><u><font color="#00ff00" face="Verdana">भाग दो</font></u></h3>
<p>    <strong><em><u>लम्बी पूँछ वाले चिट्ठाकारों का अकेलापन</u></em></strong></p>
<p>    निरीह कपट की विशेषता हाँलाकि यह है कि इसके आर - पार दिखाई पड़ता है , परन्तु अक्सर लोग आर - पार न देखने की कोशिश करते हैं , और कुछ लोगों के लिए कभी - यह कोशिश भी व्यर्थ रह जाती है । कुछ दिनों पहले चिट्ठाकार केन न्यूसम ने सवाल खड़ा किया : ” हमारे चिट्ठों के पाठक कौन हैं ? ” उसके जवाब में अवसाद की झलक थी :</p>
<blockquote><p>    चिट्ठालोक में चिट्ठेकारों के बीच ध्यान खींचने की ऐसी होड़ लगी रहती है कि आभास होता है कि यह एक बहुत बड़ी-सी जगह है , मानो मछली बाजार । यह केवल आभास है दरअसल एक बड़े हॉल के आखिरी छोर पर बने एक छोटे से कमरे में हम सब पहुँच जाते हैं। जब लोग संवाद बनाने से इन्कार करते हैं किन्तु किसी हद को पार कर अपने चिट्ठे की कड़ी लगवाना चाहते हैं तब थोड़ा कष्ट जरूर होता है । यह कष्ट तब तक जारी रहता है जब तक मुझे इस बात का अहसास नहीं हो जाता कि , ‘ चलो मेरी बात न सुने भले , वास्तविक जगत में कोई उन्हें भी तो नहीं सुन रहा ‘ ।</p>
<p>    मुझे गलत मत समझिएगा -  लिखने में मुझे रस मिलता है । कभी - कभी जब हम कुछ लिख कर चिट्ठे पर डाल देते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि कोई टिप्पणी आएगी अथवा कोई उस पोस्ट की कड़ी उद्धृत कर देगा , तब एक अजीब  अवसाद-सा तिरता है , माहौल में।</p></blockquote>
<p>    मुष्टिमेय लोगों ने इस प्रविष्टि पर अपनी राय प्रकट की जिनमें लम्बे समय से चिट्ठाकारी कर रहे सेथ फ़िन्कल्स्टीन भी थे । फ़िन्कल्स्टीन के स्वर में कहीं अधिक निराशा का पुट था।उनकी प्रतिक्रिया में तथ्य को स्वीकार कर लेने के साथ एक कटुता भी देखी जा सकती है जो किसी कपट की पोल खुलने पर प्रकट होती है  :</p>
<blockquote><p><font color="#333333">व्यक्तिगत तौर पर बताऊँ तो यह कह सकता हूँ कि मैं इन कारणों से लिखता था :</font></p>
<ol>
<li><font color="#333333">मुझे यह कह कर मूर्ख बनाया गया कि चिट्ठे खुद की आवाज सुनाने के लिए तथा मीडिया के विकल्प के रूप में  होते हैं ।</font></li>
<li><font color="#333333">मुझे भ्रम था कि यह प्रभावशाली है ।</font></li>
<li><font color="#333333">कभी-कदाच ध्यान खींच लेने पर यह बहुत असरकारक साधन लगने लगता है , यथार्थ से बढ़कर ।</font></li>
<li><font color="#333333">यह स्वीकृति कष्टपूर्ण है कि आपने इतना समय और प्रयत्न जाया किया लेकिन कोई आप की सुनता नहीं ।</font></li>
</ol>
</blockquote>
<blockquote><p><font color="#333333">        चिट्ठाकारी को धार्मिक सुसमाचार (Blog Evangelist) मानने की निष्ठा अत्यन्त क्रूर होती है चूँकि वह लोगों की कुण्ठित उम्मीदों और ख्वाबों का शिकार करती है ।</font></p>
<p><font color="#333333">       मेरा चिट्ठा कुछ दर्जन प्रशंसकों द्वारा पढ़ा जाता है । कई बार बन्द करने की नौबत आई है और आखिरकार वह चरम-बिन्दु भी आ ही जाएगा ।</font></p></blockquote>
<p>    किसी निरीह कपट के स्थायी हो जाने पर ताकतवर लोगों का बड़ा  दाँव लगा होता है, ताकतहीन लोगों की बनिस्पत । ताकतहीन लोगों द्वारा इस कपट के प्रति अविश्वास को टालते रहने को निलम्बित करने के काफ़ी समय बाद तक ताकतवर इस कपट से लिपटे रहेंगे , सच के विकल्प की अनुगूँज सुनाने वाले एक  कक्ष में एक दूसरे को अन्तहीन समय तक यह सुनाते हुए।</p>
<h3><u><font color="#000080" face="Verdana">उपसंहार </font></u></h3>
<p>        एक दिन एक चिट्ठा-किसान लड़के को अपनी मड़ई के निकट धूल के ढेर में एक स्फटिक का गोला पड़ा मिला । उस गोले में झाँकने पर वह चकित हो गया , उसने एक चलचित्र देखा । व्यापारिक पोतों का एक बेड़ा चिट्ठालोक के बन्दरगाह में प्रवेश कर रहा था।जहाजों पर वे नाम अंकित थे जो टापू भर में हमेशा से घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे । टाइम-वॉर्नर और न्यूज कॉर्प और पियरसन और न्यू यॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल और कोन्डे नोस्ट और मैक्ग्रॉ हिल । चिट्ठा -किसान तट पर जुट गए , जहाजों पर ताने मारते हुए ,आक्रमणकारियों को ललकारा कि हमारे बड़े किले के ठाकुरों द्वारा तुम्हारा बेड़ा शीघ्र गर्क कर दिया जाएगा । व्यापारिक पोतों के जहाजों के कप्तान सोने से भरे टोकरे ले कर जब किले के द्वार तक पहुँचे , तब उन्हें ठाकुरों  की तोपों का सामना करने के बजाए तुरही-नाद सहित स्वागत मिला । चिट्ठा - किसानों को रात भर महाभोज से आने वाली ध्वनियाँ सुनाई देती रहीं ।</p>
<p><font color="#804000">    </font></p>
<p class="postmetadata">Posted in <a rel="category tag" href="http://hi.wordpress.com/tag/internet/" title="View all posts in internet"><font color="#265e15">internet</font></a>, <a rel="category tag" href="http://hi.wordpress.com/tag/online-journalism/" title="View all posts in online journalism"><font color="#265e15">online journalism</font></a> &#124; 4 Comments</p>
<p><!-- You can start editing here. --></p>
<h3>4 Responses to “अपठित महान : महा अपठित”</h3>
<ol class="commentlist snap_preview">
<li class="alt">
<div class="cmtinfo">on June 12, 2007 at 9:43 pm<a href="http://chitthakari.wordpress.com/wp-admin/#comment-635"><span class="commentnum"><strong><font size="3" color="#265e15">1</font></strong></span></a> <img width="48" src="http://www.gravatar.com/avatar.php?gravatar_id=c1b0998d289b2738f60a15e334d9fb7a&#38;size=48&#38;default=http%3A%2F%2Fs.wordpress.com%2Fi%2Fmu.gif" height="48" class="avatar avatar- avatar-48" /> <cite><a rel="external nofollow" href="http://dhurvirodhi.wordpress.ocm/"><strong><font color="#265e15">धुरविरोधी</font></strong></a></cite></div>
<p>आपने एकदम यथार्थ परक लिखा है.</p>
<p>यह यक्षप्रश्न मेरे आगे भी बार बार खड़ा हो जाता है कि हमारे चिठ्ठों का पाठक कौन है? क्या हम सभी ब्लागर आपस में लठ्ठमलठ्ठा कर रहे हैं? हिन्दी में सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्ट नारद में सिर्फ 250 हिट्स दिखाती है. इतनी हिट्स भी सिर्फ आपस की टिप्पणी को बार बार पढ़ने पर हुईं हैं. यथार्थ में तो हमारे ब्लाग्स के पाठक एक अर्धशतक पर भी नहीं पहुंचते.</p>
<p>कल मुझे श्री चौपटस्वामी के ब्लाग पर ब्लाग के बारे में व्याख्या मिली कि चिठ्ठा हमारा एक ‘स्वकथन’ है, बिलकुल रंगमंच की तरह, जिस पर हमें तुरन्त फुरन्त तालियां या गालियां मिल जाती हैं.</p>
<p></li>
<li>
<div class="cmtinfo">on June 12, 2007 at 10:19 pm<a href="http://chitthakari.wordpress.com/wp-admin/#comment-636"><span class="commentnum"><strong><font size="3" color="#265e15">2</font></strong></span></a> <img width="48" src="http://a.wordpress.com/avatar/aroonarora-48.jpg" height="48" class="avatar avatar-aroonarora avatar-48" /> <cite><a rel="external nofollow" href="http://www.pangebaaj.blogspot.com/"><strong><font color="#265e15">arun</font></strong></a></cite></div>
<p>धुर विरोधी जी से सहमती के स्वर निकालने वाला बाजा बजाने के अलावा और कोई चारा हमारे पास नही है</p>
<p></li>
<li class="alt">
<div class="cmtinfo">on June 13, 2007 at 12:40 am<a href="http://chitthakari.wordpress.com/wp-admin/#comment-637"><span class="commentnum"><strong><font size="3" color="#265e15">3</font></strong></span></a> <img width="48" src="http://www.gravatar.com/avatar.php?gravatar_id=ebec36c44cd1371daa3eea01cb2cc668&#38;size=48&#38;default=http%3A%2F%2Fs.wordpress.com%2Fi%2Fmu.gif" height="48" class="avatar avatar- avatar-48" /> <cite><a rel="external nofollow" href="http://hindini.com/fursatiya"><strong><font color="#265e15">अनूप शुक्ल</font></strong></a></cite></div>
<p>सही है!</p>
<p></li>
<li>
<div class="cmtinfo">on June 15, 2007 at 4:44 am<a href="http://chitthakari.wordpress.com/wp-admin/#comment-654"><span class="commentnum"><strong><font size="3" color="#265e15">4</font></strong></span></a> <img width="48" src="http://www.gravatar.com/avatar.php?gravatar_id=bc53496239bc45ac020ba4aef4fb58b6&#38;size=48&#38;default=http%3A%2F%2Fs.wordpress.com%2Fi%2Fmu.gif" height="48" class="avatar avatar- avatar-48" /> <cite><a rel="external nofollow" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/"><strong><font color="#265e15">अभय तिवारी</font></strong></a></cite></div>
<p>सही समय पर यह लेख पढ़्वाया है अफ़लातून भाई… धन्यवाद.</p>
<p>[ <a target="_blank" href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/06/12/blogsonline-journalism/">मूल पोस्ट</a> ]</li>
</ol>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिट्ठे इन्क़लाब नहीं लाते !]]></title>
<link>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/09/blogsrevolution-evangelists/</link>
<pubDate>Wed, 09 Jan 2008 07:43:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/09/blogsrevolution-evangelists/</guid>
<description><![CDATA[
 [ ‘बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते' -  श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><font color="#800080"></font></p>
<p align="left"><font color="#800080"> <b>[ ‘बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते' -  शहीदे आजम भगत सिंह का यह बयान जैसे कइयों के गले नहीं उतरता वैसे ही कुंजी-पटल के योद्धा भी यह सुनना नहीं चाहेंगे कि          ‘ चिट्ठे इन्कलाब नहीं लाते'। ऐसा मानने वाले कुछ स्थापित चिट्ठेकारों के विचार यहाँ दिए जा रहे हैं। </b></font><a href="http://technology.guardian.co.uk/weekly/story/0,,2091220,00.html"><b><font color="#800080">सेथ फिंकल्स्टीन</font></b></a><b><font color="#800080">, </font><a href="http://www.newsome.org/2006/08/bloggers-challenge-who-do-you-write.shtml"><font color="#800080">केन्ट न्यूसम</font></a></b><b><font color="#800080">, </font></b><a href="http://www.roughtype.com/archives/2006/08/the_great_unrea.php"><b><font color="#800080">निकोलस कार</font></b></a><b><font color="#800080"> आदि कई प्रमुख चिट्ठेकार इस मत के हैं। ]</font></b></p>
<h3>    <b><u> सेथ फिंकलस्टीन</u></b></h3>
<p align="left">    दमनकारी सरकारों द्वारा सेन्सरवेयर (सेन्सर हेतु इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ़्टवेयर) का इस्तेमाल अब वैधानिक नीति का हिस्सा बन चुका है। इस बाबत संगोष्ठियाँ आयोजित हो रही हैं, सिफ़ारिशें दी जा रही हैं तथा लेख लिखे जा रहे हैं। वैश्विक-सेन्सरशिप के विरुद्ध लड़ाई में हमारा क्या योगदान हो सकता है ? - इसका जवाब लोग जानना चाहते हं ।</p>
<p align="left">    दुर्भाग्यवश मेरे उत्तर लुभावने नहीं हैं । गैर सरकारी संस्थाओं, थिंक टैंक्स और शैक्षणिक संस्थाओं में श्रेणीबद्धता है तथा इनमें प्रवेश-पूर्व बाधायें भी होती हैं, जिन्हें पार करना पड़ता है। बरसों पहले जब इन्टरनेट का विस्तार कम था तब किसी व्यक्ति द्वारा खुद को सुनाने का मकसद ज्यादा विस्तृत तौर पर पूरा होता था। इन्टरनेट के व्यापक समाज का हिस्सा बन जाने के बाद एक अदद व्यक्ति की हैसियत और उसका असर उसी तरह हाशिए पर पहुँच गया है जितना समाज में उस व्यक्ति का होता है । ऐसा नहीं कि किसी भी व्यक्ति की आवाज बिलकुल ही न सुनी गई हो - परन्तु यहाँ भी स्थापित सामाजिक संगठनों के ढाँचे की सत्ता आम तौर पर हावी हो जाती है ।</p>
<p align="left"><!--more--></p>
<p align="left">    ब्लॉग कोई हल नहीं हैं। धार्मिक सुसमाचारों की तरह ब्लॉगिंग-निष्ठा रखने वालों (Blog evangelists) की आस्था के विपरीत कई बार ब्लॉग असर डालने में बाधक बन जाते हैं। अत्यन्त विरले, जो ब्लॉग्स के जरिए ठोस असर डालने में कामयाब हो जाते हैं, उनकी कहानी को व्यापक तौर पर ‘सक्सेस स्टोरी’ के तौर पर प्रचार मिलता है । इस परिणाम के दूसरे बाजू की व्यापक चर्चा नहीं हो पाती है - सभी लोग जो अपने हृदय उड़ेल कर चिट्ठे लिखते हैं, एक छोटे से प्रशंसक-पाठक वर्ग के दायरे के बाहर कभी पढ़े नहीं जाते हैं ।</p>
<p align="left">     ब्लॉग सुसमाचारी इस स्थिति पर आम तौर पर यह कहते पाए जाएँगे कि इन सीमित भक्तों से खुश रहना मुमकिन है। अमूमन वे यह नहीं कहना चाहते कि एक सीमा से आगे न पढ़ा जाना दु:ख का कारण भी हो सकता है। एक चुनिन्दा छोटे समूह की बीच ही अपनी बात कहते रहने के कारण अपने विचारों की पहुँच की बाबत उनके दिमाग में भ्रामक धारणा भी बन सकती है।</p>
<h3><font face="Verdana">    <u><font color="#808000">केन न्यूसम</font></u></font></h3>
<p>किन के लिए लिखते हैं चिट्ठेकार? आपने खुद से कभी यह सवाल किया है? मैंने कुछ दिनों से इस पर गहराई से सोचना शुरु किया है ।</p>
<p>झटके में इसका जवाब देने वाले कहेंगे -- अलग-अलग लोग अलग-अलग कारणों से लिखते हैं। कुछ अपने व्यवसाय के हित में लिखते हैं और कुछ स्वान्त:सुखाय ।</p>
<p>यह सवाल मैं कुछ बुनियादी तौर पर पूछता हूँ। हमारे चिट्ठों के पाठक कौन हैं ? हमने जिन पाठकों को ध्यान में रख कर लिखा है वे नहीं , वास्तविक पढ़ने वाले कौन हैं ?</p>
<p>मेरा जवाब है हम (चिट्ठेकार)  अमूमन एक-दूसरे के लिए ही लिखते हैं। हमारे पाठक ज्यादातर चिट्ठेकार ही होते हैं, कभी-कभार मित्र और रिश्तेदार पढ़ लेते हैं ।</p>
<p>मुझे गलत मत समझिएगा -  लिखने में मुझे रस मिलता है। कभी-कभी जब हम कुछ लिख कर चिट्ठे पर डाल देते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि कोई टिप्पणी आएगी अथवा कोई उस पोस्ट की कड़ी उद्धृत कर देगा, तब एक अजीब  अवसाद-सा तिरता है, माहौल में।</p>
<p>चिट्ठालोक की क्रिया-प्रतिक्रिया देने की विशिष्टता को अक्सर हम लोग कुछ ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। यह सही है कि चिट्ठे कुछ हद तक क्रिया-प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन संवाद स्थापित करने के लिए यहाँ भी आप को कुछ बाधायें पार करनी पड़ती हैं। आप को टिप्पणियाँ देने और असरकारी पोस्ट लिखने के लिए समय  लगाना पड़ता है और कोशिश भी करनी पड़ती है। और जब ढेर सारे लोग एक विषय पर अपनी ढपली अपने राग में बजाने लगते हैं तब कई बातें इस शोर में गुम भी हो जाती हैं ।</p>
<p>चिट्ठालोक में चिट्ठेकारों के बीच ध्यान खींचने की ऐसी होड़ लगी रहती है कि आभास होता है कि यह एक बहुत बड़ी-सी जगह है, मानो मछली बाजार। यह केवल आभास है, दरअसल एक बड़े हॉल के आखिरी छोर पर बने एक छोटे-से कमरे में हम सब पहुँच जाते हैं। जब लोग संवाद बनाने से इन्कार करते हैं किन्तु किसी हद को पार कर अपने चिट्ठे की कड़ी लगवाना चाहते हैं तब थोड़ा कष्ट जरूर होता है । यह कष्ट तब तक जारी रहता है जब तक मुझे इस बात का अहसास नहीं हो जाता कि  ‘चलो मेरी बात न सुने भले, वास्तविक जगत में कोई उन्हें भी तो नहीं सुन रहा ' ।</p>
<h3><font color="#ff0080" face="Verdana">(जारी...) </font></h3>
<p><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/06/10/blogospherelimitationsevangelists/" target="_blank">Original post</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून]]></title>
<link>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/07/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 07 Jan 2008 17:50:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
<guid>http://chitthakari.wordpress.com/2008/01/07/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाका]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा <i>चिट्ठा चर्चा</i> पर <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2007/03/blog-post_24.html" target="_blank">इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा</a> कर दिए जाने के बाद भी वह जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा <a href="http://beji-viewpoint.blogspot.com/2007/03/blog-post_21.html" target="_blank">राग छेड़ा</a> कि अपनी तरफ से <a href="http://beji-viewpoint.blogspot.com/2007/03/blog-post_24.html" target="_blank">निष्कर्ष निकाल देने</a> के बाद भी उसके सुर  मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा <a href="http://srijanshilpi.com/?p=39" target="_blank">पहले भी</a> होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=261" target="_blank">अनूप</a> जी, <a href="http://azdak.blogspot.com/2007/03/blog-post_22.html" target="_blank">प्रमोद</a> जी, <a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/03/blog-post_22.html" target="_blank">अभय</a> जी, <a href="http://anamdasblog.blogspot.com/2007/03/blog-post_28.html" target="_blank">अनामदास</a> जी और <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/03/27/future_trends" target="_blank">काकेश</a> जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा।</p>
<p><!--more--></p>
<p>अंग्रेजी चिट्ठा जगत में तो यह बहस <a href="http://www.journalism.co.uk/features/story604.html" target="_blank">कई वर्षों से जारी</a> है। इस विषय पर सबसे अच्छी परिचर्चा पिछले वर्ष हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा <a href="http://cyber.law.harvard.edu/webcred/wp-content/CONFREPORT2.htm" target="_blank">Blogging, Journalism &#38; Credibility: Battleground and Common Ground</a> पर आयोजित सम्मेलन के दौरान हुई। अमेरिका में यह मामला <a href="http://www.cnn.com/2005/LAW/04/27/hilden.blogging/index.html" target="_blank">कोर्ट में भी </a>पहुंचा है। अदालतों ने इस बारे में <a href="http://www.sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?file=/c/a/2006/05/27/MNGTGJ3K7S1.DTL" target="_blank">स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश</a> भी की है। लेकिन अदालतों के क्षेत्राधिकार (jurisdiction) इतने सीमित दायरे में लागू होते हैं कि पूरे ग्लोब में फैले ब्लॉग जगत के लिए मान्य नहीं हो सकते। हर देश के अपने क़ानून हैं और अदालतों द्वारा की जाने वाली उनकी अलग-अलग व्याख्याएँ हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि टेक्नोलॉजी जहां रोज-ब-रोज तेजी से बदल रही है, क़ानून उसी पुरानी, शनि की मंथर चाल से आगे बढ़ रहा है। जब तक कोई नया क़ानून बनता है तब तक टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ चुकी होती है कि क़ानून अप्रासंगिक हो चुका होता है। सायबर लॉ में मेरे गुरु और सुप्रीम कोर्ट के वकील <i><a href="http://www.cybersmart.in/books/handbook-cyberlaws.htm" target="_blank">वकुल शर्मा</a></i> कहते हैं:</p>
<blockquote><p>Technology has always posed problems for law but lawyers and judges have been managing the problems by stretching the meaning of the existing laws without breaking the spirit of laws.</p></blockquote>
<blockquote><p>(टेक्नोलॉजी हमेशा से क़ानून के लिए मुश्किलें खड़ी करती रही है लेकिन वकील और न्यायाधीश इन मुश्किलों को मौजूदा कानूनों की व्याख्या को खींच-तान करके क़ानूनों की मूल भावना को बगैर नुकसान पहुंचाए हल करने की कोशिश करते रहे हैं।)</p></blockquote>
<p>इंटरनेट ने हमें एक ऐसे युग में पहुंचा दिया है जहां हम घर बैठे ही दुनिया की तमाम अच्छाइयों और तमाम बुराइयों से प्रभावित हो सकते हैं। इंटरनेट ने भगवान और शैतान, दोनों को हमारे मन का पता दे दिया है। कोई भी हमारे मन के साथ खेल सकता है, उसे संवार सकता है और उसे बिगाड़ सकता है। तमाम तरह के घोटाले, धोखाधड़ी, आतंकवादी वारदातें, सांप्रदायिक वैमनस्य, अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र इंटरनेट के जरिए होने लगे हैं। इसी तरह समाज सेवा, धर्म, अध्यात्म, अच्छी पुस्तकों और सदविचारों के प्रचार-प्रसार, आदि के काम भी इंटरनेट के जरिए होते हैं। <i>चार्ल्स डिकेन्स</i> ने <i>‘ए टेल ऑफ टू सीटिज’</i> में जो बात 1859 में कही थी, लगता है कि वह आज के इंटरनेट युग पर भी लागू होती है:</p>
<blockquote><p>“ It was the best of times, it was the worst of times; it was the age of wisdom, It was the age of foolishnesses… we had everything before us, we had nothing before us.”</p></blockquote>
<blockquote><p>(यह सबसे अच्छा समय है, यह सबसे बुरा समय है; यह समझदारी का युग है, यह नासमझी का युग है….हमारे सामने सब कुछ है, हमारे सामने कुछ भी नहीं है।)</p></blockquote>
<p>यह जो वेब जगत है, वह हमारी भौगोलिक दुनिया की छाया प्रतिलिपि नहीं है। इसे किलोमीटर और घंटे के स्थूल मात्रकों में नहीं, बल्कि इसे ‘बिट्स’ और ‘बाइट्स’ जैसे सूक्ष्म मात्रकों में मापा जाता है। इस दुनिया के तमाम लोगों की अपनी एक अलग राष्ट्रीयता है और यहाँ वे ‘सिटीजन’ नहीं, बल्कि ‘नेटीजन’ कहलाते हैं। हमारे क़ानूनों की सीमा यह है कि वे ऐसी राजनीतिक, भौगोलिक और भौतिक दुनिया के लिए बनाए गए हैं, जो स्थिर, परिभाषित और आबद्ध है, जबकि इसके विपरीत वेब जगत गतिशील, अपरिभाषित और असीमित है। इस वेब जगत के नियमन के लिए ऐसे गतिशील कानूनों की जरूरत है जो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। क़ानून के रखवालों के लिए यह जरूरी है कि वे टेक्नोलॉजी की भाषा को समझें और टेक्नोलॉजी के प्रयोगकर्ताओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे क़ानून की भाषा को समझें। यह कहने से काम चलने वाला नहीं है कि टेक्नोलॉजी और क़ानून पूर्व और पश्चिम की तरह हैं, जो आपस में कभी मिल नहीं सकते। लेकिन यह सच है कि टेक्नोलॉजी की जो रफ्तार है उसकी बराबरी क़ानून कभी नहीं कर सकता। जैसा कि <i>ओलिवर वेन्डेल होम्स</i> कहते हैं:</p>
<blockquote><p>It cannot be helped, it is as it should be, that the law is behind the times.</p></blockquote>
<p>(इसका कोई उपाय नहीं है, यह ऐसे ही रहने वाला है, कि क़ानून समय से हमेशा पीछे रहता है।)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दीपावली की शुभकामनाऎं]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/11/09/deepawali-wishes/</link>
<pubDate>Fri, 09 Nov 2007 11:13:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/11/09/deepawali-wishes/</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी चिट्ठाकारी शुरु करने के बाद यह ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#800080" size="3">हिन्दी चिट्ठाकारी शुरु करने के बाद यह मेरी पहली दीवाली है. मेरा पहला चिट्ठा यहीं वर्डप्रेस पर था. हालांकि अब मैं अपने </font><a href="http://kakesh.com/"><strong><font color="#800080" size="3">नये पते पर</font></strong></a><font color="#800080" size="3"> चला गया हूँ पर मुझे ब्लॉगिंग की दुनिया में जो भी थोड़ी बहुत पहचान मिली वो इसी चिट्ठे से मिली. इसलिये आज यहीं से&#160; सभी पाठकों, ई-मेल पर सबस्क्राईब करने वाले पाठकों को और सभी जाने-अनजाने मित्रों, शुभचिंतकों को दीपावली की बधाई व शुभकामनाऎं देता हूँ. आप </font><a href="http://kakesh.com/"><font color="#800080" size="3">मेरे नये चिट्ठे पर</font></a><font color="#800080" size="3"> आते रहें पढ़ते रहें और उत्साह वर्धन करते रहें.</font></p>
<p><font size="3">पेश हैं मेरी पसंद की दो कविताऎं.</font>
<p><font color="#800040" size="3">जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना<br>अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए</font>
<p><font color="#800040" size="3">नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,<br>उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,<br>लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,<br>निशा की गली में तिमिर राह भूले,<br>खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,<br>उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।</font>
<p><font color="#800040" size="3">जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना<br>अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए</font>
<p><font color="#800040" size="3">सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,<br>कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,<br>मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,<br>कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,<br>चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,<br>भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।</font>
<p><font color="#800040" size="3">जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना <br>अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए</font>
<p><font color="#800040" size="3">मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,<br>नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,<br>उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,<br>नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,<br>कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब<br>स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए</font>
<p><font color="#800040" size="3">जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना <br>अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए </font>
<p><font color="#800040" size="3">- नीरज</font>
<p><font size="3"></font>&#160;</p>
<p><font size="3"></font>&#160;</p>
<p><font color="#008000" size="3">आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ</font>
<p><font color="#008000" size="3">है कहाँ वह आग जो मुझको जलाए,<br>है कहाँ वह ज्वाल मेरे पास आए,</font>
<p><font color="#008000" size="3">रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ,<br>आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।</font>
<p><font color="#008000" size="3">तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,<br>नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,</font>
<p><font color="#008000" size="3">आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ,<br>आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।</font>
<p><font color="#008000" size="3">मैं तपोमय ज्योति की, पर, प्यास मुझको,<br>है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,</font>
<p><font color="#008000" size="3">स्नेह की दो बूँद भी तो तुम गिराओ,<br>आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।</font>
<p><font color="#008000" size="3">कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूँगा,<br>कल प्रलय की आँधियों से मैं लडूँगा,</font>
<p><font color="#008000" size="3">किंतु मुझको आज आँचल से बचाओ,<br>आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ। </font>
<p><font size="3"><font color="#008000">- डॉ. हरिवंशराय बच्चन</font> </font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[छोटे शहरों की बड़ी चिट्ठाकारी,सन्दर्भ-टाइम्स ऑफ इन्डिया.]]></title>
<link>http://kakesh.wordpress.com/2007/07/11/article-in-times-of-india/</link>
<pubDate>Wed, 11 Jul 2007 15:01:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>kakesh</dc:creator>
<guid>http://kakesh.wordpress.com/2007/07/11/article-in-times-of-india/</guid>
<description><![CDATA[
रविवार 8 जुलाई को&nbsp; अंग्रेजी के प्रमु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"></p>
<p>रविवार 8 जुलाई को&#160; अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख छ्पा था <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/Deep_Focus/Blogging_straight_from_the_heartland/articleshow/2185160.cms" target="_blank">" Blogging straight from the heartland"</a> .&#160;हाँलाकि मैं इस समाचार पत्र को पढ़ता हूँ पर मेरी नजर इस लेख पर नहीं पड़ी.शाम को श्रीश जी ने बातचीत के दौरान इस लेख के बारे में बताया. तुरंत खोज कर पढ़ा ..लेख पढ़ कर लगा कहीं कुछ अधूरा सा है .. हिन्दी चिट्ठाकारी [पल्लवी जी,जिन्होने ये लेख लिखा था, ने कहा है कि ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठाकारी दोनों पर था] पर लेख और&#160;उल्लेख केवल कुछ ही चिट्ठों का!!&#160;बात कुछ हजम नहीं हुई ..श्रीश जी से इस बाबत बात हुई हाँलाकि नाम छपने से श्रीश जी खुश तो थे&#160; पर थोड़ा निराश लगे कि इसमें नारद,&#160;सर्वज्ञ आदि का नाम नहीं आया. उनका कहना था कि उन्होने इस का उल्लेख तो लेखिका से किया था पर ना जाने छ्पा क्यों नहीं.&#160;</p>
<p><a href="http://narad.akshargram.com/" target="_blank">नारद</a>,<a href="http://www.filmyblogs.com/hindi.jsp" target="_blank">हिन्दी ब्लॉग्स डॉट कॉम</a> और&#160;<a href="http://www.akshargram.com/sarvagya" target="_blank">सर्वज्ञ</a> का हिन्दी चिट्ठाजगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है....&#160;और हिन्दी चिट्ठाजगत पर&#160;&#160;लेख बिना इनके अधूरा सा लगता है.. इसके अलावा और भी कई महत्वपूर्ण स्तंभ (चिट्ठाकार)&#160;हैं हिन्दी चिट्ठाजगत में जिनके बारे में इस लेख में कोई जिक्र नहीं था.</p>
<p>वैसे बता दूँ कि इस लेख में&#160;किस किस का उल्लेख है.इसमें उल्लेख है यमुनानगर के&#160;<a href="http://epandit.blogspot.com/" target="_blank">श्रीश जी का,</a> रतलाम के <a href="http://raviratlami.blogspot.com/" target="_blank">रवि जी का,</a> जालन्धर के गोपाल अग्रवाल का, नागपुर के संतोष मिश्रा का, कोल्हापुर के नवीन तिवारी का. [मैने रवि जी और श्रीश जी के अलावा बांकी महानुभावों का चिट्ठा नहीं देखा है.यदि आपको मालूम हो तो टिप्पणी द्वारा बतायें ताकि लिंक दिया जा सके..पल्लवी जी ने अपने ई-पत्र में बताया है कि बांकी के चिट्ठाकार हिन्दी के नहीं वरन अंग्रेजी के हैं]. लेख में छ्पी&#160;रवि जी की फोटो बहुत अच्छी थी <strong>वो क्या कहते ना झक्कास.</strong> वैसे रवि जी ने इसका श्रेय <a href="http://hindi.rcmishra.net/2007/07/blog-post.html" target="_blank">अपनी पत्नी रेखा जी को दिया</a>&#160;है. अब उनकी अच्छी फोटो में रेखा जी का हाथ कैसे है ये तो नहीं मालूम पर हाँ यदि कभी हमारी कोई खराब फोटो (जाहिर है खराब ही होगी) छपे तो (वैसे संभावना कम ही है) हम भी कहेंगे कि इसमें हमारी पत्नी का ना सिर्फ हाथ है वरन और भी बहुत कुछ है..आखिर उन्होने ही तो खिला पिला के इतना मोटा किया है कि अब तो आइने में भी पूरा मुँह नहीं समाता :-) खैर ये तो विषयातंर हो रहा है. लेख पर आते हैं.</p>
<p>पूरे लेख का चित्र देवाशीष जी के सौजन्य से यहां मौजूद है.</p>
<p><a href="http://kakesh.files.wordpress.com/2007/07/toi-article-on-small-city-bloggers.png"><img style="border-width:0;" height="337" alt="ToI_article_on_small_city_bloggers" src="http://kakesh.files.wordpress.com/2007/07/toi-article-on-small-city-bloggers-thumb.png" width="502" border="0"></a></p>
<p>लेख पढ़ने के बाद&#160;मैने उसी समय लेख की लेखिका पल्लवी जी&#160;को ई-पत्र लिखा और धन्यवाद सहित&#160;उन्हे सुझाया कि कुछ और प्रमुख हिन्दी चिट्ठाकारों के नामों को लेख में शामिल किया जा सकता था.मैने प्रमुख चिट्ठों के पते जानने के लिये उन्हे चिट्ठा जगत डॉट कॉम की सकियता सूची को देखने की भी सलाह दी. ताकि वो अपने अगले लेख में अधिकाधिक हिन्दी चिट्ठाकारों को सम्मिलित कर सकें.</p>
<p>पल्लवी जी ,जो टाइम्स ऑफ इंडिया की विशेष संवाददाता है,से मुझे किसी उत्तर की अपेक्षा नहीं थी लेकिन कल&#160; मेरे पास जब उनका जबाब आया तो सुखद आश्चर्य हुआ. उन्होने अपने ई-पत्र में जो कहा उससे में सहमत होता दिखा.इसलिये आपकी जानकारी के लिये उसका सार आप तक पहुंचा रहा हूँ.</p>
<p><strong>उनका कहना था कि उनका ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन छोटे शहरों में रहने वाले हिन्दी चिट्ठाकारों पर केन्द्रित था जो&#160;तकनीक की बहुत अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद चिट्ठाकारी कर रहे हैं. इसीलिये रतलाम के चिट्ठाकार रवि जी और यमुनानगर के चिट्ठाकार श्रीश जी और अन्य को चुना गया.</strong> (गौरतलब है कि&#160;तकनीक की अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद दोनों चिट्ठाकारों का चिट्ठा तकनीकी विषयों पर ही आधारित है)</p>
<p>पल्लवी जी ने <strike>वादा किया है</strike> कहा है कि <strike>शीघ्र</strike> यदि वो <strike>एक लेख</strike> हिन्दी चिट्ठाजगत पर भी लिखेंगी तो मुझसे भी संपर्क करेंगी..<strike>जिसमें अधिकाधिक चिट्ठाकारों को शामिल किया जा सकेगा.</strike> आप लोग अभी से मुझे अपने बधाई संदेश भेज सकते हैं..हो सकता है फोटो देखने के बाद ना भेजें... :-) </p>
<p>तो प्रतीक्षा कीजिये पल्लवी जी के अगले लेख&#160;की और इस लेख के लिये उन्हे पुन: धन्यवाद.</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिठ्ठाकारी का एक साल]]></title>
<link>http://malwa.wordpress.com/2007/06/07/one-year-of-blogginghow-i-create-my-blog/</link>
<pubDate>Thu, 07 Jun 2007 06:59:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
<guid>http://malwa.wordpress.com/2007/06/07/one-year-of-blogginghow-i-create-my-blog/</guid>
<description><![CDATA[कल इस चिट्ठे को एक वर्ष पूरा हो गया। सम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल इस चिट्ठे को एक वर्ष पूरा हो गया। समय की कमी के कारण इस पोस्ट कल नहीं लिख सका  इसलिए ‍चिट्ठे के जन्मदिन के दूसरे दिन मैं यह पोस्ट डाल रहा हूँ। ठीक एक साल पहले 6 जून 2006 को पहली पोस्ट लिखी थी और देखते ही देखते एक साल गुजर गया पता ही नहीं चला। जब इस पोस्ट को लिखने के लिए पहली पोस्ट को देखा तो मालूम हुआ कि चिट्ठे की शुरुआत वाले दिन में कुछ खास बात है; तारीख 6, महीना छठा (जून) और इक्कीसवीं सदी का छठा साल (2006)। वैसे देखा जाए तो यह दिन केवल लिखने के प्रयास की शुरुआत का दिन है। चिट्ठों की गलियों में भटकना तो 2006 की आधी फरवरी से ही शुरु कर दिया था। इन्हीं दिनों एक दिन गूगल पर कुछ सर्च करने पर गूगल ने जो सूची दी थी उसमें एक लिंक <a target="_blank" href="http://rojnamcha.blogspot.com/" title="अतुलजी अरोरा">अतुलजी अरोरा</a> के संस्मरण ब्लॉग <a target="_blank" href="http://lifeinahovlane.blogspot.com/" title="लाइफ इन ए एचओवी लेन">लाइफ इन ए एचओवी लेन</a> के लिए थी। वहाँ जाने पर बहुत हैरानी हुई थी। हैरानी इसलिए कि यह सब उनका हिन्दी में व्यक्तिगत लेखन था अर्थात् यह कोई समाचार पत्र, पत्रिका की साइट नहीं थी। उस समय तक इंटरनेट साइट्स के बारे में मेरा ज्ञान इतना ही था ‍कि केवल सरकारी-निजी संस्थान, कंपनियाँ, शिक्षा संस्थान, व्यापारिक संगठन, संस्था आदि ही साइट बना सकते हैं। अपनी निजी साइट बनाना आम आदमी के बूते के बाहर है क्योंकि नेट पर जगह पाना बहुत मँहगा हो सकता है और उससे भी बड़ी बात, साइट का खाका तैयार करने के लिए किसी वेब डिज़ाइनर की सेवा लेना अतिआवश्यक है। इसके अलावा मैं केवल इतना जानता था कि हिन्दी तो केवल कुछ गिने-चुने समाचार पत्रों, पत्रिकाओं की साइट पर देखी जा सकती है, बाकी तो इंटरनेट पर सभी कुछ अंग्रेजी में है। गूगल पर हिन्दी शब्दों की खोज तो केवल उत्सुकतावश की थी। उसी उत्सुकता से अतुलजी का संस्मरण पढ़ना शुरु किया तो पढ़ता ही चला गया, इतनी रोचक, बांधे रखने वाली सरल भाषा में लिखा गया है किसी कोई भी भाग अधूरा छोड़ने का मन ही नहीं करता था। आज भी इसे पढ़ने में वही आनंद आता है जो पहली बार आया था। एक ही कमी है इस पर टिप्पणियाँ बहुत ही कम हैं (मैंने खुद ने ही नहीं डाली अब तक :(  )। </p>
<p>यहीं से शुरु होता है अंदर उतरते जाने का सफर। मुझे टिप्पणियों में जो नाम दिखाई दिए उनमें से दो थे <a target="_blank" href="http://www.jitu.info/merapanna/" title="जितेन्द्रजी चौधरी">जितेन्द्रजी चौधरी</a> और <a target="_blank" href="http://www.hindini.com/fursatiya/" title="अनूपजी शुक्ला">अनूपजी शुक्ला</a>। इनके नामों पर क्लिक करके देखा तो दूसरे दरवाजे खुलना शुरु हुए। मैं हर चिट्ठे की टिप्पणी के माध्यम से अगले चिट्ठे पर जाता था। जिस भी नए चिट्ठे पर जाता उसका URL कॉपी करके रख लेता। इस तरह फ़रवरी के अंतिम सप्ताह से लेकर मई तक मैंने लगभग 150 चिट्ठों की सूची तैयार कर ली थी। जी हाँ, उस समय तक नारद के बारे में ठीक से नहीं जान पाया था। बीच में किसी चिट्ठे पर <a target="_blank" href="http://narad.akshargram.com/" title="नारद">नारद</a> के बटन को क्लिक किया था और जाकर देखा तो बहुत सारे शीर्षक हैं और उनके नीचे चार चार लाइनों का विवरण है। मैंने सोचा, 'यह कुछ अजीब चिट्ठा है, सब पोस्ट अधूरी डिस्प्ले होती है।' बाद में चिट्ठों को पढ़ पढ़ कर समझ में आया कि नारद एक जंक्शन है और हर चिट्ठे की रेल यहीं से होकर गुजरती है। किसी चिट्ठे पर <a target="_blank" href="http://bunokahani.blogspot.com/" title="बुनो कहानी">बुनो कहानी</a> का जायजा लिया, तो किसी से होकर <a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Main_page" title="सर्वज्ञ">सर्वज्ञ</a> पर पहुँचा। इसी तरह <a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj" title="अनुगूँज">अनुगूँज</a>, <a target="_blank" href="http://akshargram.com/" title="अक्षरग्राम">अक्षरग्राम</a>, <a target="_blank" href="http://www.nirantar.org/" title="निरंतर">निरंतर</a>, चिट्ठाविश्व, <a target="_blank" href="http://www.jitu.info/blognaad/" title="ब्लॉगनाद">ब्लॉगनाद</a> आदि के बारे में जाना। तब भी मैं इन सबको अलग अलग चिट्ठे समझता था। बाद में जाना कि ये सभी नारद के <a target="_blank" href="http://narad.akshargram.com/akshargramnetwork/" title="समवेत स्वर">समवेत स्वर</a> () हैं। इसी दौरान इन चिट्ठों को पढ़ते पढ़ते यह जाना कि ये चिट्ठे ब्लॉग कहलाते हैं और ब्लॉग का हिन्दी शब्द चिट्ठा मान्य किया गया है।</p>
<p>इतने चिट्ठों से यह मालूम हुआ कि ब्लॉगर एक सेवा है जो लोगों को निशुल्क चिट्ठा बनाने और होस्टिंग की सुविधा देता है। तो मई माह में मैंने भी ब्लॉगर पर पंजीयन किया और चिट्ठा बनाने बैठे, परंतु जब एक छोटी सी पोस्ट लिख कर पब्लिश करने गए तो 71% पर जाकर गाड़ी अटक गई। दोबारा प्रयास किया तो फिर 71% पर जाकर विराम लग गया। एक बार और कोशिश की परंतु वही ढाक के तीन पात। अब तो हिम्मत जवाब दे गई थी। शायद नेटवर्क की या कोई अन्य समस्या रही होगी अलबत्ता चिट्ठा बनाने का विचार कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया। मैंने सोचा था कि चिट्ठा न बने तो भी कोई बात नहीं पंजीकरण टिप्पणी देने के काम आएगा क्योंकि बहुत से चिट्ठों में टिप्पणी करने के लिए लॉ‍ग इन करना होता है और इसीलिए शुरु में तो यही समझ लिया था कि केवल एक चिट्ठाकार ही दूसरे चिट्ठाकार के चिट्ठे पर टिप्पणी दे सकता है (हाल ही में कुछ दिनों पहले इसी लॉग इन करके टिपियाने की प्रथा के कारण ही ब्लॉगर पर दोबारा पंजीयन किया)। फ़रवरी से मई तक कहीं भी टिप्पणी नहीं की थी। थोड़ा सा भय भी था क्योंकि पुराने लोग बेतकल्लुफ थे और हमें लगता था कि इनके बीच में हम कहाँ कूद पड़ें, बेवजह 'मान न मान मैं तेरा मेहमान' ठीक नहीं। तो मैं साक्षी भाव से चिट्ठों को निहारे जा रहा था कि अचानक एक दिन बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। कुछ चिट्ठों की पोस्ट में संदेश देखा कि वे ब्लॉगर से वर्डप्रेस डॉट कॉम के घर पर जा रहे हैं (वो कौन से चिट्ठे थे अब याद भी नहीं है)। अब तक एकत्र किए ज्ञान से इतना समझ में आ गया कि ये ब्लॉगर जैसी कोई दूसरी सेवा है जहाँ चिट्ठे बनाए जा सकते हैं। उन बंधुओं के बताते पते पर जाकर उनके नए चिट्ठों को निहारा, वे कुछ अलग-अलग से लगे, तो मैंने सोचा लगे हाथ वर्डप्रेस पर ही चिट्ठा बना कर देख लिया जाए। यहाँ पर बहुत ही आसानी से चिट्ठा बन गया तो मालव संदेश यहीं पर शुरु हो गया जो आपके सामने हैं। यह चिट्ठा ब्लॉगर और वर्डप्रेस के गुण-अवगुण देख कर नहीं बनाया बल्कि जहाँ आसानी से बन गया वहीं डेरा डाल लिया।</p>
<p>यह तो मेरे चिट्ठे के निर्माण तक की गाथा थी। इसमें मुख्‍य रूप से मैंने चिट्ठों को देखने-पढ़ने और स्वयं का चिट्ठा बनाने की बात की। फ़रवरी से मई तक लगभग तीन माह तक मैंने जो तकरीबन 150 चिट्ठे देखे उनमें से अनेक पर आज भी लेखन जारी है और कई ऐसे भी हैं जो एक अरसे से सोए पड़े हैं। मैं चाहता हूँ कि जो कुछ उस समय मैंने देखा, पढ़ा समझा कुछ उसके बारे में बताऊँ, कुछ उन चिट्ठों और चिट्ठाकारों के बारे में बताऊँ जिन्हें मैंने उस समय पढ़ा और बाद तक पढ़ता आया हूँ। जो एक साल आप लोगों के साथ गुजारा उसके बारे में भी लिखना चाहता हूँ। इस एक वर्ष में चिट्ठा जगत में जो परिवर्तन मैंने अनुभव किए उसे आपके साथ बाँटना चाहता हूँ। इस दौरान बहुत से नए साथी आए उनके बारे में बात करना चाहता हूँ। परंतु अभी इन सब बातों को समेटने के लिए समय कुछ कम लग रहा है क्योंकि सूत्र सारे बिखरे पड़े हैं इसलिए इस पोस्ट को यहीं विराम दे रहा हूँ। शेष बातें इसी पोस्ट की अगली कड़ी में देने का विचार है।</p>
<p><strong>~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ </strong></p>
<p><strong>पुनश्च: अरुण के आग्रह पर भूल सुधार करते हुए जन्मदिन का केक आप सभी के लिए प्रस्तुत कर दिया गया है।</strong></p>
<p>                                 </p>
<p><a rel="attachment wp-att-101" href="http://malwa.wordpress.com/2007/06/07/one-year-of-blogginghow-i-create-my-blog/101/"><img src="http://malwa.wordpress.com/files/2007/06/first-birthday_1.jpg" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विंडोज लाइव राइटर - चिट्ठाकारी का नया औजार]]></title>
<link>http://epandit.wordpress.com/2007/01/02/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a5%8b%e0%a4%9c-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b5-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Tue, 02 Jan 2007 02:51:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shrish</dc:creator>
<guid>http://epandit.wordpress.com/2007/01/02/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a5%8b%e0%a4%9c-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b5-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[ब्लॉगिंग ने वेब को दोतरफा संवाद माध्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लॉगिंग ने वेब को दोतरफा संवाद माध्यम में बदल दिया है। सभी ब्लॉगर चाहते हैं कि ब्लॉग लिखना सरलतम तथा आनंददायक काम बने। अधिकतर ब्लॉगर ब्लॉगिंग सर्विस के वेब आधारित अंतर्निमित एडीटर से लिखना शुरु करते हैं जिससे काम तो चल जाता है पर इसमें अधिक फंक्शनैलिटी नहीं होती। अगर ऐतिहासिक दृष्टि से बात करें तो सबसे पहले डेस्कटॉप ब्लॉगिंग टूल आये जैसे <font size="2">w.Bloggar तथा BlogJet आदि। </font>इसके बाद नंबर आता है ब्राउजर आधारित टूल्स का जैसे <font size="2">Flock तथा Performancing.  इसी श्रृखंला में नवीनतम हैं MS Word 2007 का अंतर्निमित ब्लॉग एडीटर था Windows Live Writer।</font></p>
<p>जहाँ तक बात है ब्लॉगिंग सर्विस के वेब आधारित अंतर्निमित एडीटर की तो उसके के उपयोग में दो नुक्सान हैं एक तो वहाँ उपलब्ध Rich Text Editor सीमित संसाधन युक्त होत है <font color="#555555">मतलब उसमें फंक्शन कम होते हैं साथ ही लिखने की जगह भी बहुत सीमित सी होती है दूसरा नुक्सान है आपको ऑनलाइन रहते हुए लिखना पड़ता है जिससे मेरे जैसे सीमित इंटरनेट कनेक्शन वाले को बिल की ही चिंता सताती रहती है। डेस्कटॉप ब्लॉगिंग टूल एक रिच टेक्स्ट एडीटर/वर्ड प्रोसेसर </font><font color="#555555">जैसा टूल होता है जिसमें ब्लॉगिंग सबधित कई फंक्शन होते हैं। आप ऑफलाइन रह कर पोस्ट लिखते हो, उसे सजाते संवारते हो,  काम फाइनल हो जाने पर ऑनलाइन होकर पोस्ट प्रकाशित (Publish) कर देते हो। पोस्ट को ड्राफ्ट के रूप में सहेजने (Save) करने की सुविधा के कारण आप उसे कई चरणों में लिख सकते हैं। ब्राउजर आधारित टूल वेब आधारित तथा डेस्कटॉप आधारित टॄल्स के बीच की  चीज है। इनमें Performaing जो कि एक फायरफॉक्स एड-ऑन है काफी उन्नत है परंतु डेस्कटॉप ब्लॉगिंग टूल इन तीनों प्रकार के टूल्स में बाजी मार ले जाते हैं अब तक जो टूल विंडोज उपयोगकर्ताओं द्वारा सर्वाधिक प्रयोग हो रहा था वह है w.bloggar पर एक तो अब इसका डेवलपमेंट मंद पड़ गया है। दूसरा Windows Live Writer की विशिष्ट खूबियों के चलते यह इस दौड़ में पिछड़ गया है।</font></p>
<p><a href="http://www.microsoft.com" title="Microsoft Corporation" target="_blank">बिल्लू भैया एंड कंपनी</a> ने १३ अगस्त २००६ को बहुत काम का औजार निकाला विंडोज लाइव राइटर। यद्यपि यह <a href="http://spaces.live.com/" target="_blank">Live Spaces</a> को ध्यान में रखकर बनाया गया था परंतु यह अधिकतर ब्लॉगिंग सेवाओं पर कार्य कर लेता है। <font color="#555555">इसका लेआउट माइक्रोसॉफ्ट वर्ड </font><font color="#555555">जैसा है, यह अभी बीटा चरण में है तथापि काफी अच्छा कार्य करता है।</font></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/93231401@N00/341765708/" title="WLW_Window"><img src="http://static.flickr.com/124/341765708_0819380b0b.jpg" alt="इमेज को जूम करने के लिए क्लिक करें" border="0" /></a></p>
<p><font size="2"> </font></p>
<p><font size="2">विंडोज लाइव राइटर में बहुत सी विशेषताएं हैं जैसे WYSIWYG या HTML मोड में पूर्वालोकन, आसान फोटो-पब्लिशिंग, श्रेणियाँ (Tagging) तथा अधिकतर ब्लॉगिंग प्लेटफार्म हेतु सपोर्ट परंतु यह सब तो पुराने डेस्कटॉप क्लाइंट यथा w.bloggar आदि में भी था। इसे उन सब से अलग बनाती हैं  कुछ निम्नलिखित खूबियाँ:</font></p>
<ul>   <font size="2"></p>
<li><font size="2"> </font><font size="2">"Web Layout" मोड में लेखन जिससे आप को लगता है कि जैसे आप साक्षात अपने ब्लॉग में लिख रहे  हों। आपको लिखते हुए पोस्ट जैसी दिखाई देगी, पब्लिश होने पर ठीक वैसी ही होगी।</font></li>
<p></font><font size="2"></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"></p>
<li><font size="2"> </font><font size="2">इसमें प्ल्ग‍इन फंक्शनैलिटी है जिसके द्वारा इसमें नये फीचर जोड़े जा सकते हैं। (फायरफॉक्स एक्सटेंशनों की तरह)</font></li>
<p></font></font></ul>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"> </font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">इसका इंटरफेस साफ-सुथरा है तथा माइक्रोसॉफ्ट-वर्ड से मिलता जुलता है। इतना ही नहीं इसकी शब्द-संपादन कार्य-प्रणाली भी वर्ड जैसी ही है जिससे की नये प्रयोगकर्ताओं को इसे सीखने में वक्त नहीं लगता जो कि इसके प्रचलन का एक प्रमुख कारण भी है। साथ ही वर्तनी जाँचक की सुविधा भी है लेकिन यह इंग्लिश तक सीमित है। </font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><a href="http://www.flickr.com/photos/93231401@N00/341785242/" title="WLW_Add New Weblog"><img src="http://static.flickr.com/157/341785242_122d31121c_m.jpg" alt="WLW_Add New Weblog" border="0" /></a></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">इसको इंस्टाल करना w.bloggar आदि अन्य टूल्स की तुलना में अत्यंत आसान है। बस अपना ब्लॉग  का URL, य़ूजरनेम तथा पासवर्ड दीजिए तथा बाकी काम यह स्वयं कर लेगा। यह लॉग‍इन करके Weblog Style तथा अन्य फाइलें डाउनलोड कर लेता है। अगर आप इंटरनेट एक्सप्लोरर प्रयोग करते हैं तो इसमें उसके लिए एक टूलबार इंस्टाल करने का विकल्प भी है लेकिन मेरी तरह कई लोग टूलबार पसंद नहीं करते। इसके अतिरिक्त यह नये यूजरों के लिए Live Spaces के लिए साइनअप करने का भी विकल्प देता है पर हिन्दी ब्लॉगर लाइव स्पेसिज का प्रयोग नहीं करते।</font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">जब आप WLW को पहली बार स्टार्ट करते हैं तो यह एक new, blank पोस्ट दिखाता है। यह आपके ब्लॉग के CSS को डाउनलोड कर लेता है तथा आपके ब्लॉग का एक काल्पनिक वर्जन बना देता है जिससे आपको लगता है कि जैसे आप सीधे ही अपने ब्लॉग में लिख रहे हों। आजकल ज्यादातर ब्लॉग एडीटरों में <font size="2">WYSIWYG (What You See Is What You Get अर्थात जैसा देखो वैसा प्राप्त होगा) होता है लेकिन WLW इस सबसे एक कदम आगे है यह आपके ब्लॉग का Template इस्तेमाल करता है जिससे आप जिसके रंग, चौड़ाई आदि आपके ब्लॉग जितनी ही होती है जिससे कि एडीटर स्क्रीन बिल्कुल आपके ब्लॉग जैसी ही दिखाई देती है। इसमें तीन WYSIWYG मोड हैं - <font size="2">Normal, Web Layout तथा Web Preview. मैं वेब लेआउट मोड में लिखता हूँ। वेब प्रिव्यू मोड में यह आपका ब्लॉग नई सामग्री के साथ दिखाता है जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि आपने पोस्ट को पब्लिश कर दिया हो।</font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><a href="http://www.flickr.com/photos/93231401@N00/341785193/" title="WLW_Post Properties"><img src="http://static.flickr.com/154/341785193_1c6b043c86.jpg" alt="इमेज को जूम करने के लिए क्लिक करें" border="0" /></a></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">नीचे Post Properties तथा Trackbacks bar है जिसमें आप पोस्ट संबंधी विभिन्न विकल्प जैसे Time Stamp,  Keywords, Comments तथा Trackback संबंधी विकल्प तथा Trackback भेजने के लिए URL आदि कॉन्फिगर कर सकते हैं। ऊपर दाईं तरफ आप पोस्ट के लिए श्रेणियाँ चुन सकते हैं जिसे WLW आपके ब्लॉग से खोज लेता है। आप ड्रॉफ्ट को अपने कम्यूटर तथा ब्लॉग सर्वर दोनों पर सहेज सकते हैं। ऊपर टूलबार से पब्लिश ड्रॉप-डाउन बॉक्स से आप अपनी पोस्ट को ड्रॉफ्ट के रुप में ब्लॉग पर सहेज सकते हैं अथवा सीधे पोस्ट कर सकते हैं। पिछली पोस्टों को खोला तथा संपादित भी किया जा सकता है। एक फीचर Map Publishing जिसमें यह Live.com Maps ब्लॉग का प्रयोग करता है पर यह फीचर ज्यादा प्रयोग नहीं होती।</font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"> </font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>प्लगइन</strong></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">माइक्रोसॉफ्ट ने WLW के लिए <font size="2">SDK (Application API) जारी किया है जिसके द्वारा डेवेलपर इसके लिए प्ल्गइन बनाकर इसमें नये फीचर्स जोड़ सकते हैं। यह फायरफॉक्स एक्स्टेम्शनों (जिन्हें संस्करण २.० से एड-ऑन कहा जा रहा है) जैसी ही सुविधा है जो कि फायरफॉक्स के लोकप्रिय होने का एक प्रमुख कारण था यही बात WLW के लिए भी कही जा सकती है। </font><font size="2">इस तरह का काम माइक्रोसॉफ्ट ने मेरे विचार से पहली बार किया है। :)</font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">प्लगइन जमा कराने तथा डाउनलोड के लिए लाइव गैलरी है इसके अतिरिक्त कुछ अन-ऑफिशियल साइटों से भी इन्हें डाउनलोड किया जा सकता है।</font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>फोटो</strong></font><strong><font face="Arial" size="2">-</font><font size="2">पब्लिशिंग</font></strong></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">अपने कम्प्यूटर अथवा वेब से फोटो पोस्ट में डाली जा सकती है, इसके अतिरिक्त फ्लिकर से फोटो डालने के लिए भी प्लगइन उपलब्ध हैं। यह फोटो को अपने आप रीसाइज कर लेता है तथा उसका थम्बनेल डाल देता है जिस पर क्लिक करने से मूल इमेज पर जाया जा सकता है। इसके अतितिक्त इमेज संबंधी बहुत विकल्प हैं जिनमें <font size="2">drop shadow, adjusting brightness, contrast, sharpen, emboss तथा अन्य इफेक्ट शामिल हैं। आप इमेजिस को FTP सर्वर पर भी अपलोड कर सकते हैं। </font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>पॉडकास्टिंग</strong></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">ऑडियो तथा वीडियो पोस्ट करने हेतु कुछ प्लगइन उपलब्ध हैं लेकिन चूंकि मैं वर्डप्रैस.कॉम प्रयोग करता हूँ जिसमें इन्हें केवल एक लाइन लिखकर पोस्ट किया जा सकता है अतः इस बारे में अभी कोई जानकारी नहीं दे सकता।</font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"> </font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>कमियाँ</strong></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"> </font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">कमियाँ हर चीज में होती हैं तथा WLW इसका अपवाद नहीं है। जब भी आप एक नई पोस्ट अथवा ड्रॉफ्ट बनाना चाहते हैं एक नई विंडो खुल जाती है जो कि काफी खीझ भरा है। इसी तरह फाइल मीनू में Close Post जैसा विकल्प भी नहीं है।</font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"> </font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">अगर किसी पुरानी पोस्ट को संपादित करें तथा उसमें &#60;!- -more- -&#62; टैग हो जिसे कि <font size="2">"continue reading" संवाद के लिए प्रयोग किया जाता है तो यह केवल उपरोक्त टैग से पहले तक की ही पोस्ट दिखाएगा बाद की नहीं।</font></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">इसके अतिरिक्त भी इसमें कई कमियाँ हैं परंतु चूंकि यह अभी बीटा स्टेज में है इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि फाइनल संस्करण में इन्हें दूर कर लिया जाएगा। लेकिन अच्छी बात यह है कि आप WLW ग्रुप फोरम में इन के बारे में बता सकते हैं तथा WLW टीम इस बारें में सुनती है और आपके प्रश्नों का जवाब देती है। </font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>उपसंहार</strong></font></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">अगर तो आपको संक्षिप्त पोस्ट लिखनी हो जिसमें विशेष फॉर्मेटिंग की आवश्यकता न हो तो ब्लॉग-सेवा के वेब आधारित इंटरफेस का प्रयोग करें परंतु यदि आपको लंबी तथा सजा-संवार कर पोस्ट लिखनी हो तो WLW से अच्छा कुछ नहीं। मैं तो अब छोटी से छोटी पोस्ट भी इसमें लिखता हूँ। एक बार प्रयोग शुरु करने के बाद आपको भी इसकी आदत हो जाएगी जिसके बाद सीमित सुविधा वाले वेब-आधारित एडीटर में लिखने का मन ही नहीं करता। 'फुरसतिया' जी के लिए तो मैं इसे खास रिकमेन्ड करूँगा।</font></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2">अब चिट्ठाकारी न करने का कोई बहाना नहीं चलेगा। <img src="http://spaces.live.com/rte/emoticons/smile_nerd.gif" alt="smile_nerd" /></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>नोट:</strong> <font color="#8000ff">कल WLW की प्रैक्टिकल क्लास लगेगी। इस लिए सभी छात्र हाजिर रहें। 'कविराज' सुन रहे हैं न।</font></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><strong>संबंधित कड़ियाँ</strong></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><a href="http://windowslivewriter.spaces.live.com/" target="_blank">Writer Zone (WLW ब्लॉग)</a><br />
<a href="http://g.msn.com/8SEENUS030000TBR/WriterMSI" target="_blank">विंडोज लाइव राइटर डाउनलोड</a><br />
<a href="http://groups.msn.com/windowslivewriter/home" target="_blank">विंडोज लाइव राइटर फोरम ग्रुप</a><br />
<a href="http://gallery.live.com/default.aspx?l=8" target="_blank">विंडोज लाइव गैलरी (WLW प्लगइन ऑफीशियल साइट)</a><br />
<a href="http://wlwplugins.com/" target="_blank">wlwplugins.com (WLW प्लगइन अनऑफीशियल साइट)</a></font></font></font></font></font></font></font></p>
<p><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"><font size="2"> </font></font></font></font></font></font></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बारहा, हिन्दीराइटर तथा इंडिक IME की तुलनात्मक समीक्षा]]></title>
<link>http://epandit.wordpress.com/2006/12/22/review-of-baraha-hindiwriter-and-indic-ime/</link>
<pubDate>Fri, 22 Dec 2006 03:45:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shrish</dc:creator>
<guid>http://epandit.wordpress.com/2006/12/22/review-of-baraha-hindiwriter-and-indic-ime/</guid>
<description><![CDATA[This post is a STUB you can help expanding it by comments.
अपडेट: इस विषय प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><em>This post is a STUB you can help expanding it by comments.</em></p>
<p><strong>अपडेट:</strong> इस विषय पर <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/" target="_blank">परिचर्चा</a> में एक पोल रखा है - <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewpoll.php?id=731" target="_blank">आप कौन सा IME (फोनेटिक) प्रयोग करते हैं ?</a> कृपया उसमें भाग लेकर वोट दें।</p>
<p>हिन्दी चिट्ठाजगत में नये आये किसी भी सदस्य की एक बड़ी उलझन होती है कि हिन्दी टाइप करने के लिए कौन सा टूल प्रयोग किया जाए। जिन्होंने किसी जमाने में हिन्दी टाइपिंग (रेमिंगटन टाइपराइटर वाली) सीखी हुई हो उन्हें न तो सोचना पड़ता है न हीं अलग से किसी टूल की जरुरत होती है पर जिसने कभी पहले हिन्दी न टाइप की हो वह काफी भ्रमित होता है। जब मैंने लिखना शुरु किया था तो दुनिया जहान के टूल आजमाने के बाद सही टूल का चुनाव कर पाया। वैसे तो नेट पर 'हिन्दी कैसे लिखें' टाइप काफी लेख  उपलब्ध हैं जिनमें कई टूल्स का जिक्र है परंतु उनकी आपसी तुलना पर कोई लेख उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस पोस्ट को लिखने का विचार आया।</p>
<p>यहाँ मैं केवल Phonetic IME औजारों की ही चर्चा कर रहा हूँ। IME या इनपुट मैथड एडीटर का परिचय देने की मेरे विचार से कोई जरुरत नहीं फिर भी जो इस बारे में नहीं जानते <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/IME" title="विकीपीडिया पर IME पर लेख" target="_blank">यहाँ</a> पढ़ें। वैसे तो आजकल ढेरों IME उपलब्ध हैं पर उनमें प्रमुख हैं: Baraha Direct/IME, HindiWriter तथा Indic IME. <a href="http://geocities.com/hanu_man_ji/" target="_blank">तख्ती</a>, <a href="http://www.chhahari.com/unicode/" target="_blank">छाहरी</a>, <a href="http://kaulonline.com/kalusa/hindi/unipad.htm" target="_blank">यूनीपैड</a>, <a href="http://www.hindini.com/tool/hug2.html" target="_blank">हग</a> (<a href="http://www.hindini.com/tool/hug2.zip" target="_blank">ऑफलाइन वाला</a>) तथा <a href="http://www.aczoom.com/itrans/" target="_blank">ITRANS</a> आदि अब प्रचलन से बाहर (आउटडेटिड) हो चुके हैं।</p>
<p><strong><a href="http://www.baraha.com/" title="बारहा होमपेज - Free Indian Language Software" target="_blank">Baraha</a>: </strong> Baraha द्वारा विकसित किया गया है। इस सॉफ्टवेयर में दो टूल हैं: Baraha तथा Baraha Direct. Baraha एक वर्ड प्रोसेसर है तथा Baraha Direct एक Phonetic IME। इसके अतिरिक्त बारहा वालों ने अलग से भी BarahaIME नाम का टूल निकाला है जो कि Baraha Direct का ही Lite Version है ताकि सिर्फ IME टूल हेतु पूरा सॉफ्टवेयर न डाउनलोड करना पड़े। इनमें एकमात्र अन्तर यह है कि BarahaIME केवल Unicode फॉन्ट पर कार्य करता है तथा Baraha Direct, Unicode तथा ANSI दोनों पर। जब तक आपको  कोई विशेष प्रयोजन न हो BarahaIME ही उपयुक्त तथा पर्याप्त है।</p>
<p><font color="#ff0000">खूबियाँ (Pros):</font></p>
<ul>
<li>आसान इंस्टालेशन तथा प्रयोग।</li>
<li>ट्रांस्लिटरेशन संबंधी विस्तृत सहायता उदाहरणों सहित। यह नये टाइपिस्टों के लिए विशेष उपयोगी है।</li>
<li>Indic IME की तुलना में आसान ट्रांस्लिटरेशन स्कीम।</li>
<li>हिन्दी तथा इंग्लिश भाषा में आसानी से Switching/Toggling। यह कार्य यहाँ उल्लिखित तीनों IME में सबसे फास्ट तथा स्मूथ है तथा केवल एक कुंजी के प्रयोग से किया जा सकता है। शार्टकट है-  F11 या F12.<font color="#ff0000">*</font></li>
<li>इसमें संस्कृत का कीबोर्ड भी शामिल है जो कि संस्कृत भाषा के कई विशिष्ट शब्दों को शुद्ध लिखना संभव बनाता है। यह कीबोर्ड किसी अन्य IME में नहीं है।<font color="#ff0000">*</font></li>
<li>Baraha Direct द्वारा नॉन-यूनीकोड वाले प्रोग्रामों में भी आसानी से हिन्दी टाइप कर सकते हैं। उदाहरण: <a href="http://epandit.wordpress.com/2006/12/13/how-to-type-hindi-text-in-photoshop/" target="_blank">फोटोशॉप आदि ग्राफिक्स प्रोग्राम</a>।<font color="#ff0000">*</font></li>
<li>Baraha Direct द्वारा एक भाषा से दूसरी भाषा में लिप्यांतरण (Convert Indian language text from one script to another), फॉन्ट परिवर्तन (Unicode &#60;--&#62; ASNI) तथा टेक्स्ट की सॉर्टिंग (Sorting Indian language data).<font color="#ff0000">*</font></li>
</ul>
<p><font color="#ff0000"> </font></p>
<p><font color="#ff0000"><font color="#ff0000">कमियाँ </font>(Cons):</font></p>
<ul>
<li>याहू ! मैसेंजर पर कार्य नहीं करता।<em><font color="#0000ff">*</font></em></li>
</ul>
<p>यदि इसमें Word Lookup/Auto Text तथा On-the-Fly help भी शामिल कर दिए जाएं तो यह सर्वश्रेष्ठ टूल बन जाएगा।</p>
<p><a href="http://www.baraha.com/baraha.htm" title="बारहा वर्ड प्रोसेसर का विवरण" target="_blank">Baraha विवरण,</a> <a href="http://www.baraha.com/download/baraha70.exe" title="बारहा �.० डायरेक्ट डाउनलोड लिंक" target="_blank">Baraha डाउनलोड (Baraha Direct सहित)</a><br />
<a href="http://www.baraha.com/BarahaIME.htm" title="BarahaIME - Baraha Input Method Editor का विवरण" target="_blank">BarahaIME विवरण</a>,  <a href="http://www.baraha.com/download/BarahaIMESetup.exe" title="BarahaIME डायरेक्ट डाउनलोड लिंक" target="_blank">BarahaIME डाउनलोड</a></p>
<p><strong><a href="http://devendraparakh.port5.com/" title="HindiWriter होमपेज" target="_blank">HindiWriter</a>: </strong>HindiWriter देवेंद्र परख जी द्वारा विकसित किया गया है। यह पहला IME टूल था जिसका इंस्टालेशन तथा प्रयोग अत्यंत आसान था। शुरुआत में, BarahaIME के आने से पहले यह सबसे आसान ट्रांस्लिटरेशन स्कीम वाला टूल था। उस समय यह मेरा फेवरिट टूल हुआ करता था।</p>
<p><font color="#ff0000">खूबियाँ (Pros):</font></p>
<ul>
<li>आसान इंस्टालेशन तथा प्रयोग।</li>
<li>Indic IME की तुलना में आसान ट्रांस्लिटरेशन स्कीम।</li>
<li>Word Lookup फीचर (संस्करण १.४ से जारी)। यद्यपि यह फीचर Indic IME में भी Auto Text के नाम से है पर उसमें नहीं के बराबर शब्द हैं।</li>
<li>माइक्रोसॉफ्ट वर्ड (Office XP) तथा ओपन ऑफिस २.० के लिए हिन्दी वर्तनी जाँचक (HindiSpell Check)<font color="#ff0000">*</font></li>
</ul>
<p><font color="#ff0000">कमियाँ (Cons):</font></p>
<ul>
<li>याहू ! मैसेंजर पर कार्य नहीं करता (यद्यपि उनकी साइट पर लिखा है कि करता है, इस बारे में उनसे बात करता हूँ)।<em><font color="#0000ff"> *</font></em></li>
<li>हिन्दी तथा इंग्लिश कीबोर्ड स्विच करने में BarahaIME से अपेक्षाकृत अधिक समय लेता है। शार्टकट है- Shift+Pause.</li>
<li>BarahaIME की तुलना में सीमित सहायता।</li>
</ul>
<p><a href="http://devendraparakh.port5.com/" title="देवेद्र परख जी का होमपेज" target="_blank">HindiWriter होमपेज</a>, <a href="http://devendraparakh.port5.com/HindiWriterSetup.exe" title="HindiWriter डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें." target="_blank">HindiWriter डाउनलोड</a></p>
<p><strong><a href="http://www.bhashaindia.com/Patrons/Tutorials/HindiIME.aspx" target="_blank">Hindi Indic IME</a>: </strong>इसका निर्माण माइक्रोसॉफ्ट ने भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग को बढ़ावा देने हेतु वेबदुनिया से करवाया था। यह अपने समय का एक अच्छा तथा काफी प्रचलित टूल था परंतु अब काफी हद तक आउटडेटिड हो चुका है पर अभी भी काफी लोग इसे प्रयोग कर रहे हैं। आजकल माइक्रोसॉफ्ट इसे नये अवतार में Microsoft Input Tool के नाम से बना रहा है जिसका बीटा संस्करण जारी किया जा चुका है।</p>
<p><font color="#ff0000">खूबियाँ (Pros):</font></p>
<ul>
<li>याहू ! मैसेंजर पर कार्य करता है।</li>
<li>नये टाइपिस्टों के लिए On-the-Fly help तथा Visual Keyboard उपयोगी हैं। पर एकाध हफ्ते बाद ही इसकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।</li>
</ul>
<p>इसमें आठ कीबोर्ड लेआउट दिए गए हैं लेकिन काम के केवल तीन ही हैं: Hindi Transliteration, Hindi Remington तथा Hindi Inscript. अब जहाँ तक मैं जानता हूँ Remington टाइपिंग जानने वालों को अलग से किसी टूल की आवश्यकता नहीं तथा Inscript कीबोर्ड Windows XP में इनबिल्ट होता है। अतः ये आठ कीबोर्ड कोई विशेष उपयोगी नहीं।</p>
<p><font color="#ff0000">कमियाँ (Cons):</font></p>
<ul>
<li>मुश्किल, लंबी तथा थकाऊ इंस्टालेशन प्रक्रिया।</li>
<li>हिन्दी तथा इंग्लिश कीबोर्ड स्विच करने में सर्वाधिक समय लेता है। शार्टकट है- Alt+Shift.<em><font color="#0000ff">*</font></em></li>
</ul>
<p>दो अन्य कमियाँ भी कहीं पढ़ी थी कि ये Text Area तथा Internet Explorer में काम नहीं करता पर ये बात ठीक नहीं निकली।</p>
<p><a href="http://www.bhashaindia.com/Patrons/Tutorials/HindiIME.aspx" target="_blank">माइक्रोसॉफ्ट भाषाइंडिया पर विवरण</a>, <a href="http://www.bhashaindia.com/Downloads/IME/hindi_IME_setup.zip" title="Hindi Indic IME 1 Version 5.0 डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें." target="_blank">Hindi Indic IME डाउनलोड</a></p>
<p><font color="#ff0000"> </font></p>
<p><strong>उपसंहार:</strong> यह तो तय है कि Hindi Indic IME इस दौड़ में पिछड़ गया है तथा यह अब अपडेट भी नहीं किया जा रहा। इसकी एकमात्र काम की खूबी इसका याहू ! मैसेंजर में कार्य करना है यद्यपि उसके लिए भी अन्य विकल्प हैं जिसके बारे में अलग पोस्ट में लिखूँगा। फिलहाल BarahaIME तथा HindiWriter में तगड़ा कम्पटीशन चल रहा है तथा दोनों एक से बढ़कर एक हैं। पर मेरे विचार से <font color="#8000ff">फीचर्स के मामले में Baraha Direct/IME फिलहाल भारी पड़ता है।</font></p>
<p>अगला काम यह पता करना है कि BarahaIME तथा HindiWriter में से टाइपिंग के दौरान किसमें कम कुंजियाँ (Less Keystrokes) दबानी पड़ती हैं खासकर मिश्रित अक्षरों (Complex Letters) यथा 'ज्ञ', 'श्र', 'क्ष' तथा 'ॠ' आदि टाइप करने में।</p>
<p><em><font color="#ff0000">*</font> खास खूबी<br />
</em><em><font color="#0000ff">*</font> खास कमी</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लॉगिंग शब्दावली (निरंतर अद्यतन)]]></title>
<link>http://epandit.wordpress.com/2006/12/05/%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%85/</link>
<pubDate>Tue, 05 Dec 2006 06:40:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shrish</dc:creator>
<guid>http://epandit.wordpress.com/2006/12/05/%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%85/</guid>
<description><![CDATA[जब मैंने हिन्दी चिट्ठाजगत में प्रवेश ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब मैंने <font color="#ff0000">हिन्दी चिट्ठाजगत</font> में प्रवेश किया था तो मुझे कई हिन्दी शब्दों का अर्थ समझ नहीं आया था, पहला शब्द तो चिट्ठा ही था, इसी प्रकार कड़ियाँ, संजाल, पुरालेख आदि। अतः मेरा विचार है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में प्रचलित शब्दों से एक <font color="#ff0000">ब्लॉगिंग शब्दावली (Blogging Jargon)</font> बनायी जाए। यह नये चिट्ठाकारों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध होगा। मैं इसका श्रीगणेश कर रहा हूँ, समय-समय पर इसमें नये शब्द जोड़ता रहूँगा, कृपया आप भी <font color="#ff0000">टिप्पणियों के द्वारा शब्दभंडार बढ़ाने में सहयोग दें</font>, मैं उन्हैं यहाँ जोड़त