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	<title>चेहरे &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/चेहरे/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "चेहरे"</description>
	<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 03:58:49 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=1116</link>
<pubDate>Sat, 13 Sep 2008 14:55:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/09/13/yah-munaasib-nahiin-main-bhulaa-doom-tujh-ko/</guid>
<description><![CDATA[यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको
तेर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको<br />
तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको</span></p>
<p><span style="color:#000000;">ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं<br />
मेरे इस जिस्म की गीली मिट्टी से<br />
किसी ने कभी न छुआ ऐसे मुझे<br />
जिस तरह से छुआ है तूने मुझको</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं बहुत भटका हूँ चेहरे-चेहरे<br />
और हर दिल को झाँककर देखा है<br />
तेरे दिल-सा नादाँ और मासूम<br />
कोई दूसरा दिल न मिला है मुझको</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तू मुझसे दूर बहुत दूर सही लेकिन<br />
बहुत पास है धड़कते हुए दिल के<br />
यह वही शाम है याद तो होगा<br />
जब आँखों में लिया था मैंने तुझको</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मेरे नाम से रोशन जलता हुआ शायद<br />
कोई चराग़ तो होगा तेरे दिल में<br />
क्या तूने तन्हाई से मज़बूर होके<br />
आज फिर से याद किया है मुझको</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दुख के चेहरे पर लकीरें याद की]]></title>
<link>http://rohitler.wordpress.com/2008/02/28/%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Thu, 28 Feb 2008 07:43:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rohit Jain</dc:creator>
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<description><![CDATA[दुख के चेहरे पर लकीरें याद की
सुन रहा ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दुख के चेहरे पर लकीरें याद की<br />
सुन रहा हूं सदा दिलेबरबाद की</p>
<p>तेरी महफ़िल तेरा परचम ओ' हुजूम<br />
अब किसे है फ़िक़्र इस नाशाद की</p>
<p>तूने जीते जी ही मारा है मुझे<br />
अब ज़रूरत ही नहीं जल्लाद की</p>
<p>क्यों न टूटूं क्यों न रो'ऊं ये बता<br />
इन्सान हूँ, मूरत नहीं फ़ौलाद की</p>
<p>है तबियत ये के खुद मिट जायेंगे<br />
क्या ज़रूरत है किसी की याद की</p>
<p>मुझसे बोला अब ज़माने से न बोल<br />
और ना तौहीन कर फ़रियाद की</p>
<p>जो क़रम होता नहीं तो ना सही<br />
हमको भी आदत नहीं है दाद की</p>
<p>सोचता हूं के परों को तोड़ना<br />
आपकी फ़ितरत है या सैय्याद की</p>
<p>हर तरह से तोड़ के देखा ये दिल<br />
है ज़रूरत अब नई ईजाद की</p>
<p>पूरी महफ़िल ही ग़मों में चूर है<br />
क्या करें कोशिश अब इसकी शाद की</p>
<p>क्या इमारत क्या मकां क्या झोंपड़ा<br />
तोड़ दी बुनियाद हर बुनियाद की<br />
रोहित जैन<br />
28-02-2008</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल की लगी दिल को दिल से लगी]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=781</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 12:34:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/15/dil-kii-lagii-dil-ko-dil-se-lagii/</guid>
<description><![CDATA[दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दिल की लगी दिल को दिल से लगी<br />
जब लगी यह आग फिर न बुझी<br />
यह दिल की लगी है दिल से लगी है<br />
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है</font></p>
<p><font color="#000000">उठता है तूफ़ाँ दिल में बनते हैं निशाँ<br />
फैला हर दिशा यह यहाँ से वहाँ<br />
बसा है दो दिलों में ख़ुशबू की तरह<br />
नाम मुहब्बत है ख़ुदा की तरह<br />
पतझड़ जाता है और सावन आता है<br />
जब दिल में कोई उन्स जगाता है</font></p>
<p><font color="#000000">दिल की लगी दिल को दिल से लगी<br />
जब लगी यह आग फिर न बुझी<br />
यह दिल की लगी है दिल से लगी है<br />
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है</font></p>
<p><font color="#000000">चेहरे पर नज़रें रुकीं फिर पलकें झुकीं<br />
होंठों पर नाम है आँखें सपने बुनती हैं<br />
अफ़साने बनते हैं पन्ने भी खुलते हैं<br />
मिटता है सब-कुछ ज़माने से सुनते हैं<br />
कोहरे-से बिछते हैं दो दिल मिटते हैं<br />
मोहब्बत के निशाँ बनते न मिटते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">दिल की लगी दिल को दिल से लगी<br />
जब लगी यह आग फिर न बुझी<br />
यह दिल की लगी है दिल से लगी है<br />
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह कहाँ चले गये]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=740</link>
<pubDate>Sun, 10 Feb 2008 04:39:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/10/wah-kahaan-chale-gaye/</guid>
<description><![CDATA[वह कहाँ चले गये
जो कल घर आये थे हमारे
थो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे<br />
थोड़ा-सा और क़रीब हमारे<br />
वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे</font></p>
<p><font color="#000000">बड़ी रहमत की थी<br />
जो आये किसी बहाने से<br />
उनके चेहरे पर थी<br />
दबी-सी मुस्कुराहट<br />
आँखें कह रही थीं<br />
अनकहे अफ़साने</font></p>
<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे<br />
कुछ न कहकर भी<br />
सब कुछ कह गये<br />
तोहफ़े में हमें<br />
अपनी यादें दे गये</font></p>
<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे<br />
दिल ने चाहा था<br />
कुछ देर और ठहरें<br />
और कुछ देखें नज़ारें<br />
जो सजाये थे मैंने</font></p>
<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे<br />
पहला करम था उनका<br />
जब नज़रें मिलायी थीं<br />
नज़रें मिलाकर<br />
निगाहें झुकायी थीं</font></p>
<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे<br />
फ़र्श पर जो निशाँ बने<br />
वह  तो मिट गये<br />
मिटे कब वह निशाँ<br />
जो दिल पर रह गये</font></p>
<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे<br />
दिल चाहता था<br />
वह पास बैठें हमारे<br />
दीदार करें हम<br />
खींचे उनकी तस्वीरें</font></p>
<p><font color="#000000">वह कहाँ चले गये<br />
जो कल घर आये थे हमारे</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तन्हाई के साये मुझे घेर कर बैठ जाते हैं]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 21:11:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/08/27/tanhaaii-ke-saaye-mujhe-gher-kar-baith-jaate-hain/</guid>
<description><![CDATA[हल्के गुलाबी फूलों पर ओस की बूँदों को
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">हल्के गुलाबी फूलों पर ओस की बूँदों को<br />
सूरज की किरनें छूती हैं तो...<br />
बदन में तेरी यादों के दर्द अचानक उठने लगते हैं<br />
तेरी तस्वीर बनने लगती है<br />
दिल तो सुकूत पाता है मगर<br />
मन खा़ली-खा़ली और उदास हो जाता है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सबा के परों पर तैरती हुई खु़शबू<br />
मेरे बेजान खा़बों की जान बन जाती है<br />
फिर कौन बुला रहा है मुझे<br />
मैं कहाँ हूँ, कौन देख रहा है मुझको<br />
सब भूल जाता हूँ, कुछ याद नहीं रहता<br />
साँसों में धड़कनों में तेरा नाम घुल जाता है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आँखों को सिवा तेरे चेहरे के कुछ भी नहीं दिखता<br />
हर शै में बस तू ही तू नज़र आने लगती है मुझको<br />
दिल फिर तेरे क़रीब आने के बहाने ढूँढ़ने लगता है<br />
तुझे पाने के खा़ब संजोने लगता है<br />
और बेताब धड़कनों को<br />
खा़मोश ज़ुबाँ की खा़मोशी चुभने लगती है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">सहमे हुए-से हर्फ़ फिर टूटने लगते हैं<br />
बिखरने लगते हैं<br />
और ऐसे में जब किसी सदा के हाथ<br />
मुझे छू देते हैं तो<br />
तन्हाई के साये मुझे घेर कर बैठ जाते हैं<br />
</span> </p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति 'नज़र'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सब चेहरे एक-से हो जाते हैं...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/08/27/%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Mon, 27 Aug 2007 17:57:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/08/27/sab-chehre-ek-se-ho-jaate-hain/</guid>
<description><![CDATA[यह कौन-सा मुक़ाम है?
जहाँ आकर सब चेहरे एक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">यह कौन-सा मुक़ाम है?<br />
जहाँ आकर सब चेहरे एक-से हो जाते हैं<br />
दिल रेत बनकर सीने में<br />
गहरा और गहरा धँसने लगता है<br />
धड़कनें गु़मशुदा हो जाती हैं<br />
साँस-साँस हर नस फटने लगती है<br />
हर बात अपनी हर बात<br />
पत्थरों से टकराकर सुनायी देती है<br />
आवाज़ें मानूस जानी-पहचानी<br />
सर पर पत्थरों की तरह चोट करती हैं<br />
मिलने वाले आते हैं<br />
बैठते हैं सुनाते हैं चले जाते हैं<br />
मैं जिस ओर भी जाता हूँ<br />
उस राह की उम्र कुछ और बढ़ जाती है</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यह कौन-सा मुक़ाम है?<br />
जहाँ आकर सब चेहरे एक-से हो जाते हैं</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’</p>
]]></content:encoded>
</item>

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