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	<title>छाँव &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/छाँव/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "छाँव"</description>
	<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 03:59:59 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[औरत की िजंदगी]]></title>
<link>http://kmuskan.wordpress.com/?p=44</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 12:58:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>kmuskan</dc:creator>
<guid>http://kmuskan.hi.wordpress.com/2008/06/12/%e0%a4%94%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे<br />
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए<br />
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।</p>
<p>बचपन से जवानी, जवानी से<br />
बुढापा जुझती रहती है औरत<br />
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े<br />
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है<br />
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है<br />
वो पूरी िजंदगी अपने आसिततव की लडाई लडती रहती हैै<br />
दुख होता है जब एक औरत ही हो जाती है औरत की दुशमन।<br />
दुख होता है जब कभी बेटे बेटी मे फरक होता है<br />
बेटी तो होती है बेटे से बडकर।</p>
<p>िपता के पयार के साए मे पली<br />
माँ के आँचल मे रही इक लडकी<br />
अपने ढेरो सपनो को साथ िलए पहुँचती है िपया के घर<br />
दुख होता है जब हर सपना टूट जाता है<br />
वो पित के िलए होती है िसरफ इक गुलाम<br />
पित के आसरे बीत जाती है जवानी उसकी सारी।</p>
<p>बचपन िपता की छाँव मे<br />
जवानी पित के आसरे<br />
बुढापे मे हो जाती हे बेट ेकी मोहताज<br />
बचचो को पाल पोसकर बडा करती है वो<br />
हर दुख दरद मे साथ खडी होती है वो<br />
माँ तो होती है ईशवर का वरदान<br />
दुख होता है जब अपना खून पानी हो जाता है<br />
खुद का बचचा पराया हो जाता है<br />
माँ को नही वो पहचानता है</p>
<p>यही है औरत की कहानी<br />
बचपन जवानी बुढापे मे जब भी<br />
कीसी से आसरा मागँती ह,ै वो बेगाना हो जाता है<br />
िजसे भी अपना मानती है, वो अनजाना हो जाता है<br />
हर िरशते को जी भरकर देती है<br />
बदले मे िसवा पयार के कुछ नही चाहती</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ मुझे जाने दो]]></title>
<link>http://kmuskan.wordpress.com/?p=40</link>
<pubDate>Mon, 19 May 2008 11:32:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>kmuskan</dc:creator>
<guid>http://kmuskan.hi.wordpress.com/2008/05/19/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/</guid>
<description><![CDATA[मेरे होठो की मुस्कान देखकर
गर वो समझते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<pre><span><span style="font-size:medium;">मेरे होठो की मुस्कान देखकर
गर वो समझते है की मैं खुश हूँ
तो उन्हें इसी
गलतफहमी मे खुश होने दो 

कल उजड़ जाएगा मेरा ये आशिअना
जाने फ़िर कहाँ बसेरा </span></span><span><span><span style="font-size:medium;">पाऊँगी</span></span></span><span><span style="font-size:medium;">
कम से कम आज की रात
तो मुझे चैन से सोने दो 

दिल का गुबार आंखो से
आंसू बन बह निकला है
कोई न रोको इसे
आज जी भर के रोने दो 

जा रही हूँ आज ,तेरी
छाँव  के बिना कैसे रह पाऊँगी
लौट के फिर आने के लिए
आज मुझे जाने दो</span></span></pre>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रात चाँदनी का दरया हुई]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=967</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 08:10:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/04/18/raat-chaandanii-kaa-daraya-huii/</guid>
<description><![CDATA[रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">रात चाँदनी का दरया हुई<br />
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें<br />
बादलों के पीछे,<br />
तारों की छाँव में...<br />
प्यार का हसीन कसूर करें</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आज दिल दिल के क़रीब है<br />
आज मोहब्बत ख़ुशनसीब है<br />
तेरा मुझसे मिलना,<br />
इत्तिफ़ाक़ नहीं...<br />
क्यों हम एक-दूसरे से दूर रहें</span></p>
<p><span style="color:#000000;">रात चाँदनी का दरया हुई<br />
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें</span></p>
<p><span style="color:#000000;">गुलाबी फूल दिलों में खिले हैं<br />
नयी ख़ुशबू जिस्मों में घुले है<br />
और कोई हुस्न नहीं,<br />
शाम-सी रस्म नहीं...<br />
हम निभाते इश्क़ के दस्तूर रहें</span></p>
<p><span style="color:#000000;">रात चाँदनी का दरया हुई<br />
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=951</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 17:47:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/03/28/koii-to-tumhein-paane-kii-raah-mile/</guid>
<description><![CDATA[कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी ते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले<br />
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले<br />
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ<br />
कभी तो इनायते-निगाह मिले</font></p>
<p><font color="#000000">तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा<br />
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा<br />
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है<br />
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले</font></p>
<p><font color="#000000">रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो<br />
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो<br />
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से<br />
तेरे दिल में मुझे जगह मिले</font></p>
<p><font color="#000000">मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल<br />
इस दरिया को मिले तेरा साहिल<br />
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है<br />
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले</font></p>
<p><font color="#000000">मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें<br />
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें<br />
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ<br />
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उफ़! यह छाँव की उमस]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=844</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 11:55:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/26/uf-yah-chhaanw-kii-umas/</guid>
<description><![CDATA[उफ़! यह छाँव की उमस
तौबा यह झूठे फ़साने
उम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">उफ़! यह छाँव की उमस<br />
तौबा यह झूठे फ़साने</font></p>
<p><font color="#000000">उम्मीद की धूप रिस गयी है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कितना काला पड़ गया हूँ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=838</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 03:40:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/26/kitana-kaala-par-gaya-hoon/</guid>
<description><![CDATA[मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर
कितन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर<br />
कितना काला पड़ गया हूँ, आकर देख</font></p>
<p><font color="#000000">तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा दे!</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टूटे हुए चाँद को]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 16:26:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/25/tuute-hue-chaand-ko/</guid>
<description><![CDATA[टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने<br />
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने<br />
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया<br />
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<p><font color="#000000">बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी<br />
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी<br />
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं<br />
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर<br />
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है<br />
...छोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं<br />
और मौसम बदलते रहते हैं<br />
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी<br />
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को<br />
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है<br />
...मोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं<br />
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं<br />
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं<br />
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं<br />
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,<br />
बिछुड़ते हैं मिलते हैं<br />
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं<br />
खिलते हैं महकते हैं<br />
बनते हैं बुझते हैं<br />
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है<br />
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>

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