<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>जटायू &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/जटायू/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "जटायू"</description>
	<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 21:23:26 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सम्पाती - धरमवीर भारती जी की एक कविता]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 05:26:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95/</guid>
<description><![CDATA[(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)</p>
<p>...यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की<br />
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:<br />
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-<br />
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख<br />
ताकि वे सनद रहें...<br />
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं<br />
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी</p>
<p>सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह<br />
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है<br />
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर<br />
बंद कर दिया है अब!</p>
<p>सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए<br />
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना</p>
<p>कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का<br />
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है<br />
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!<br />
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं<br />
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)</p>
<p>उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ<br />
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख<br />
क्योंकि वे सनद हैं<br />
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ</p>
<p>नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं<br />
वह मैं नहीं<br />
मेरा भाई था जटायु<br />
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से<br />
कौन है सीता?<br />
और किसको बचायें? क्यों?<br />
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे<br />
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर<br />
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं</p>
<p>...........................<br />
गुफा में शाँती है...<br />
...........................</p>
<p>कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार<br />
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है<br />
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं<br />
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं<br />
देखते नहीं ये<br />
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर<br />
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना...</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
