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	<title>जयगढ़ &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "जयगढ़"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 16:51:05 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[गुलाबी शहर]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/10/23/pink-city/</link>
<pubDate>Tue, 23 Oct 2007 01:37:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। <a href="http://blog.emptyhead.in/" target="_blank">आशीष</a> को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से <a href="http://blog.emptyhead.in/2007/10/14/two-historical-weekends/" target="_blank">आशीष की गाड़ी में</a> हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।</p>
<p><em>शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!!</em> ;) बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!! ;) काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!! ;)</p>
<p>तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं <a href="/2006/07/16/jaipur-blogger-meet-1/">पिछले वर्ष जुलाई में</a> आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1568914283/" title="एक लालटेन" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2414/1568914283_94d280d3e0.jpg" width="375" height="500" alt="एक लालटेन" /></a></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1569813128/" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2075/1569813128_fcdec69e11.jpg" width="375" height="500" /></a></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1569903506/" title="कुछ दुकान" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2025/1569903506_c1fe5b7046.jpg" width="500" height="375" alt="कुछ दुकान" /></a></p>
<p>वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!! ;) इस बार लगता है कि <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/" target="_blank">तरकश वाले संजय भाई</a> का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे। :D</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1569929212/" title="तीरांदाज़ी अठ??यास" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2051/1569929212_319198fa2b.jpg" width="500" height="375" alt="तीरांदाज़ी अठ??यास" /></a></p>
<p>योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1569954086/" title="एक सुंदर हस्त रंगित चित्र" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2400/1569954086_4aa0049419.jpg" width="375" height="500" alt="एक सुंदर हस्त रंगित चित्र" /></a></p>
<p>भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।</p>
<p>अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!! ;) खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!! ;)</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1570179208/" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2235/1570179208_31d5701b3b.jpg" width="500" height="375" /></a></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1569331713/" title="अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2389/1569331713_2c60629a18.jpg" width="500" height="375" alt="अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा" /></a></p>
<p>जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक <em>मौसी जी</em> भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये <em>मौसी जी</em> फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!! ;) बहरहाल, <em>मौसी जी</em> की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं <em>मौसी जी</em> क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। <em>मौसी जी</em> अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!! ;)</p>
<p>बहरहाल हम लोग <em>मौसी जी</em> और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1570364652/" title="Watchtower" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2164/1570364652_b776f36e2b.jpg" width="500" height="375" alt="Watchtower" /></a></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1570493996/" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2352/1570493996_1c73336723.jpg" width="500" height="375" /></a></p>
<p>तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!</p>
<p>
इस यात्रा में लिए गए <a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/sets/72157602416929975/" target="_blank" target="_blank">सभी फोटो यहाँ हैं</a>।</p>
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