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	<title>जलवायु-परिवर्तन &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "जलवायु-परिवर्तन"</description>
	<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 21:33:09 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[माइकल क्रिचटान की कुछ पुस्तकें और कूछ इधर उधर की]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/05/michale-crichton-ki-pustakem-aur-idhar-udhar-ki/</link>
<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 12:53:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[जरा सोंचिये, कैसा लगेगा अगर कोई आपसे क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जरा सोंचिये, कैसा लगेगा अगर कोई आपसे कहे , कि आपके शरीर में एक विशेष जीन (Gene) मौजूद है, लेकिन...आप का उस पर कोई अधिकार नही। वो इसलिये, कि कोई बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी अथवा अनुसंधानकर्ता उस जीन को पेटेन्ट करा चुके हैं। जब आपको ये पता चले कि उस जीन पर आपका स्वामित्त्व तो है ही नही...और तो और, वो कम्पनी आपसे वो जीन छीन सकती है, चूंकि वो जीन उसकी संपत्ती है और आप चोरी का माल अपने शरीर में लिये चल रहे हैं(!!!) और आपसे ही नही..आपके बच्चों, पोतों से भी। जरा सोंचिये, आप किसी ब्लड बैंक को अपना रक्त दान करते हैं....और कोई सिरफिरा वैज्ञानिक आपके रक्त को चिम्पांजी से क्रास करवा के कपि-मानव को जन्म दे देता है। वो आपकी संतान होगी या नही? उसके अधिकार, समाज में स्थान क्या होंगे? चूंकि Humon Genome पूरा पढा चुका है, तो ये जानकर कितना अजीब लगता है कि संसार की सभी प्रजातियों में बमुश्किल हजार-पाँच सौ genes का ही फर्क है?</p>
<p>ऐसे ही कुछ सवाल खडे करती है <strong>माइकल क्रिचटान (Michael Crichton) </strong>के नई विज्ञान फंतांसी <strong>"नेक्स्ट" (Next)</strong>। बायोटेक्नालाजी के क्षेत्र में जिस रफ्तार से परिवर्तन और खोजें हो रही हैं..और उनको लेकर जो कानूनी एवं सामाजिक दांवपेंच पैदा हो रहे हैं/हो सकते हैं...उन पर भी ये पुस्तक एक नजर डालती है। विषय नया था इसलिये पढना बनता था, लेकिन क्रिचटान के पुराने उपन्यासों की तुलना में इसने मुझे बहुत निराश किया। गति, रहस्य , रोमांच, कहानी का फैलाव और फिर उसे समेटना....किसी भी दृष्टि से मुझे उपन्यास पसंद नही आया, या ये कहें कि क्रिचटान के लेवल का नही था, सिवाय विषय की नवीनता के। कहानी में ३-४ प्लाट एक साथ चलते हैं...एक बडी बायोटेक कंपनी और उसके द्वारा छल से पेटेंट कराई हुई जीन, जीन के मालिक का दूसरी कंपनी के साथ मिलना और इस सिलसिले में अपनी बेटी और पोते की जान खतरे में डालना, एक बोलने वाला तोता और कपि-मानव आदि आदि। अंत में उनका घालमेल करके उन्हे एक जगह पर लाकर समेटने की कोशिश की गई है..पर उपन्यास की रफ्तार बहुत धीमी है। अगर इस क्षेत्र में रुचि रखते हैं तो पढें अन्यथा छोडा भी जा सकता है।</p>
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<p>Michael Crichton का पिछला उपन्यास था <strong>"स्टेट आफ फीयर" (State of Fear)</strong> । यह उपन्यास जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की पृष्ठभूमि पर आधारित था, और मैने ऐसा फिक्शन पहली बार पढा था, जिसमें लेखक ने हर तर्क के रेफ़ेरेन्स तक दिये थे, बाकायदा जर्नल्स , शोध पत्रों और पुस्तकों के। संयोग से उपन्यास जब पढा था उस समय जलवायु परिवर्तन मेरे पी. जी. कोर्स में एक क्रेडिट कोर्स का इलेक्टिव था जो मैने लिया था। कक्षा की पढाई, और उपन्यास द्वारा जलवायु परिवर्तन के हौवे की धज्जी उडाई (बकायदा वैज्ञानिक शोधों के पत्रों के रेफेरेन्सेज देकर), एक समय में हो रहे थे..और मैने इस उपन्यास का भरपूर आनंद लिया था। एक तेज रफ्तार, <em>Out of the box thinking</em> वाला उपन्यास, अगर कभी हाथ लगे तो जरूर पढियेगा....पढने के बाद ऐसा लगने लगता है...कि जो हो रहा है, सब प्रकृति के द्वार किये जा रहे सतत परिवर्तन का एक हिस्सा है...और जलवायु परिवर्तन एक हौवा ही है।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन की ही बात चली, तो एक फिल्म <strong><a href="http://www.thedayaftertomorrow.com/" target="_blank">Day After Tomorrow</a></strong> भी मैने लगभग इसी समय देखी थी। उपन्यास के ठीक उलट ,निर्देशक Ronald Emmerich ये फिल्म वो भयावह दृश्य सामने लाती है, जिसके बारे में सिर्फ किताबों में पढा है...और सोंचा है, कि जब वो होगा, तो कैसे होगा। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप किस तरह से अचानक समुद्र का जलस्तर बढ जायेगा, तटीय इलाके डूब जायेंगे। फिल्म बताती है, कि इसके फलस्वरूप एक नये हिमयुग की शुरुआत होगी, भारी जानमाल की हानि तो होगी, लेकिन पृथ्वी का काफी हिस्सा बर्फ में दब जायेगा। फिल्म के नायक Dennis Quaid की एक पंक्ति मुझे बहुत आशांवित करती है, <em>"मानव जाति पिछले हिमयुग को पार कर गयी थी, और परिस्थितियों के अनुसार ढल कर इस हिमयुग को भी पार कर लेगी"</em>। कभी मौका लगे , तो ये फिल्म भी जरूर देखियेगा। (हालांकि फिल्म के <em>कान्सेप्ट </em>की जम कर <a href="http://sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?f=/c/a/2004/06/01/DDGUP6TQKR1.DTL" target="_blank">आलोचना </a>हुई थी, चूंकि ये वैज्ञानिक धरातल पर कहीं सही नही बैठता, पर साहब...वैज्ञानिक धरातल पर तो आजतक ी मौसम का पूर्वानुमान भी ठीक नही बैठा..... )</p>
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<p>Michael Crichton के ही एक अन्य उपन्यास (शायद <strong>जुरासिक पार्क</strong> या <strong>लास्ट वर्ल्ड</strong>) के प्राक्कथन में वो कहते हैं कि पृथ्वी के बनने से अबतक पैदा हुई जीव जंतुओं की प्रजातियों (species) में से ९९% विलुप्त (extinct) हो चुकी हैं, और मात्र १ % बची हैं...संसार में हर रोज हजारों species विलुप्त होती हैं..और कई जन्म लेती हैं..ये चक्र चलता ही रहता है। ये कथन कितना सही है ये तो नही मालूम...लेकिन ये जानता हूँ कि अपने वातावरण से जिसने जितना सामन्जस्य बिठा लिया, वो उतना ही ज्यादा जियेगा। शायद इसी को परिस्थितियों के अनुसार ढलना, परिवर्तन और बदलाव को समझना कहते हैं। मेरे खयाल में मानव प्रजाति की यही खूबी उसे पृथ्वी पर इतना लंबा टिका सकी है।</p>
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नब्बे के दशक में, जब हम बच्चे/किशोर थे, एक बात हम दोस्तों में बहुत चर्चा का विषय हुआ करती थी..वो ये कि सन २००० में दुनिया खत्म हो जायेगी, प्रलय आ जायेगी..आदि आदि। नास्त्रेदमस की भविष्य़वाणियां नुमां किताबें भी खूब पढी थीं..अक्सर सोंचा करते थे कि प्रलय आयेगी तो क्या होगा? अफसोस ऐसा कुछ हुआ नही...। पर अब मैं ऐसा नही सोंचता (मैं बडा हो गया हूँ..<em>बार्नवीटा </em>भी नही पीता :) )।</p>
<p>समझ में काफी फर्क आया है। ये तो अब भी लगता है, कि परिवर्तन जिस गति से हो रहा है, किसी दिन जोर का झटका, धीरे से जरूर लगेगा, समुद्री जलस्तर या तापमान में अचानक कमी-बेसी, प्राकृतिक विपदा कुछ भी..लेकिन मुझे इतना विश्वास है कि मानव जाति इन सबसे पार पा जायेगी..और अगली पीढी फिर एक नया गीत गुनगुनायेगी । हो सकता है प्रकृति अपना संतुलन बनाये रखने के लिये कोई कडा कदम उठाये और हम और आप में से कई ना रहें ...लेकिन जितने बचेंगे...वो काफी होंगे जिंदगी की मशाल को आगे वालों के हाथ में देने के लिये। शायद वो लोग इससे सबक भी लेंगे और २-४ हजार साल तक फिर धरती पर अमन चैन रहे (इंसान के होते हुए अमन चैन वैसे विरोधाभास है), लेकिन मनुष्य का समय के साथ खुद को बदल लेने का जज्बा उसे लम्बी रेस का घोडा बनाता है, इसमें कोई शक नही।</p>
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<p>किताबों की बात हुई, तो ये भी जोड ही दें कि हैरी पुत्तर (V 7.0) भी पढ ही लिये मैने पिछले दिनों..&#124; आशानुरूप, हैरी भी एक <em>हार्क्रक्स </em>निकला (बोले तो राक्षस की जान का एक हिस्सा कई <em>तोतों </em>के अलावा हैरी के अन्दर भी था), और कोई मुख्य पात्र मरा नही..सब कुछ ठीक ठाक निपट गया। हाँ ये जरूर सरप्राइज रहा कि JKR ने कहानी १९ साल आगे ले जाकर छोडी...हैरी,हरमाइनी, और रोन के बच्चों के पास। अब इसका अगला भाग आता ये या नही देखना है, वैसे ऐसी कोई घोषणा  या खंडन हुआ नही अब तक, किताब के प्रकाशित होने के बाद से।</p>
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चलते चलते, आप सबको दोस्ती का दिन बहुत बहुत मुबारक। बात बहुत दूर तक निकल आयी....फिलहाल आप अपनी जीन्स(Genes वाली जीन्स, Jeans नही) बचा कर रखिये...या ऐसे करें कि वक्ती तौर पर ब्लागिंग की, या दोस्ती की ही, Genes सबको Inject करें  :). ..बहुत जरूरत है आजकल दुनिया को।</p>
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