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	<title>जीवनी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/जीवनी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "जीवनी"</description>
	<pubDate>Mon, 08 Sep 2008 05:50:02 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[बसेरे से दूर]]></title>
<link>http://unmukth.wordpress.com/?p=91</link>
<pubDate>Wed, 18 Jun 2008 14:19:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
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<description><![CDATA[&#8216;बसेरे से दूर&#8217;, बच्चन जी की आत्म कथा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>'बसेरे से दूर', बच्चन जी की आत्म कथा का तीसरा भाग है। इसमें उस समय की बात है जब वे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Allahabad">इलाहाबाद</a> से दूर रहे।<a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/06/basere-se-door.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-92" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/06/basere-se-door.jpg?w=189" alt="" width="122" height="194" /></a></p>
<p>इस भाग में लिखी घटनाओं के बारे में विवाद है। मेरे कई मित्र इलाहाबाद के पुराने बाशिन्दे रहे हैं। उनके पिताओं से कभी कभी  मुलाकात होती है। एक बार जब मैंने इस भाग कि कुछ घटनाओं (जैसे, तेजी जी के साथ घटित घटना, या फिर कैम्ब्रिज़ से लौटते समय मिस्र में भारतीय राजदूत की चर्चा) की बात की तो उनका कहना था कि यह घटनायें सही तरह से वर्णित नहीं हैं और वास्तविकता इसके विपरीत है। मैं नहीं जानता कि क्या सच है पर लगा कि इस  बारे में विवाद अवश्य है।</p>
<p>इस भाग में बच्चन जी के इलाहाबाद से जुड़े खट्टे मीठे अनुभव हैं - ज्यादातर तो खट्टे ही हैं। यदि आप इलाहाबाद प्रेमी हैं, तो शायद यह भाग आपको न अच्छा लगे, पर एक जगह बच्चन जी इलाहाबाद के बारे में यह भी कहते हैं।</p>
<blockquote><p>‘इलाहाबाद भी क्या अजीबोगरीब शहर है। यह इसी शहर में सम्भव था कि एक तरु तो यहां ऐसी नई कविता लिखी जाय जिस पर योरोप और अमरीका को रश्क हो और दूसरी तरु यहां से एक ऐसी पत्रिका प्रकाशित हो जिसका  आधुनिकता से कोई संबंध न हो - संपादकीय को छोडकर। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी "सरस्वती" को द्विवेदी युग से भी पीछे ले जाकर जिलाए जा रहे  थे, आश्चर्य इस पर था।‘</p></blockquote>
<p>तो दूसरी जगह यह भी कहते हैं,</p>
<blockquote><p>‘इलाहाबाद की मिटटी में एक खसूसियत  है – बाहर से आकर उस पर जमने वालों के लिये वह बहुत अनुकूल पडती है। इलाहाबाद में जितने जाने-माने, नामी-गिरामी लोग हैं, उनमें से ९९% आपको ऐसे मिलेंगे जो बाहर से आकर इलाहाबाद में बस गए, खासकर उसकी सिविल लाइन में - स्यूडो इलाहाबादी। और हां, एक बात और गौर करने के काबिल है कि  इलाहाबाद का पौधा तभी पलुहाता है, जब वह इलाहाबाद छोड दे।‘</p></blockquote>
<p>इसमें कुछ तो सच है। नेहरू, सप्रू, काटजू, बैनर्जी वगैरह तो इलाहाबाद में बाहर से आये और फूले फले।  नेहरू की सन्तानें और आगे तब बढ़ी जब वे इलाहाबाद से बाहर गयीं। यह बात हरिवंश राय बच्चन के पुत्र  अमिताभ बच्चन पर भी लागू होती है - वे तभी फूले फले जब पहुंचे बॉलीवुड पर यह बात बच्चन जी के लिये सही नहीं है।</p>
<p>मेरे इलाहाबादी मित्र कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>'इलाहाबाद शहर अपने मैं अनूठा है - न ही किसी शहर ने देश को इतने प्रधान मन्त्री दिये, न ही साहित्यकार, न ही इतने सरकारी अफसर, न ही इतने वैज्ञनिक, और न ही न्यायविद। इससे सम्बन्धित  लोग दुनिया में फैले हैं।'</p></blockquote>
<p>वे लोग यह भी कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>'जहां तक साहित्यकारों की बात है जब तक वे इलाहाबाद में रहे सरस्वती उनके साथ रहीं, जब  उन्होंने इलाहाबाद छोड़ा लक्ष्मी तो मिली, पर सरस्वती ने साथ छोड़ दिया। उन्हें प्रसिद्धि उस काम के लिये मिली जो  उन्होंने  इलाहाबाद में किया - चाहें वे  हरिवंश राय बच्चन हों या  धर्मवीर भारती। सुमित्रा नन्दन पन्त, या महादेवी वर्मा, या राम कुमार वर्मा इस लिये लिख पाये क्योंकि वे इलाहाबाद में ही रहे।<br />
हरिवंश राय बच्चन माने या न माने उन्होने अपनी सबसे अच्छी कृति (मधुशाला) उनके इलाहाबाद  रहने के दौरान लिखी गयी। उन्हें जो भी प्रसिद्धि मिली वह उन कृतियों के लिये मिली, जो उन्होने इलाहाबाद में लिखी।'</p></blockquote>
<p>मैं साहित्य का ज्ञाता नहीं हूं। मैं नहीं कह सकता  कि यह सच है कि नहीं और न ही कुछ टिप्पणी करने का सार्मथ्य रखता हूं।</p>
<p>क्या इलाहाबाद की मिट्टी कुछ अलग है?  क्या इलाहाबाद वासी अपने शहर के लिये एहसान फरामोश हैं: मालुम नहीं - इलाहाबाद वासी ही जाने।</p>
<p><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/06/the-last-bunglow-f.jpg"><img class="size-medium wp-image-93 alignright" style="float:right;" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/06/the-last-bunglow-f.jpg?w=195" alt="" width="152" height="233" /></a></p>
<p>इलाहाबाद के बारे में सदियों से लिखा जा रहा है - शायद इतना जितना किसी और शहर के बारे में नहीं।  अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा ने   'द लास्ट बंगलो' (The Last Bunglow: writings on Allahabad) नामक पुस्तक में इन सारे लेखों को संकलित किया है।</p>
<p><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/06/the-last-bunglow-f.jpg"><br />
</a></p>
<p>ह्स्युआन त्संग (Hsiuan Tsang) सातवीं शताब्दी में भारत आये थे। उन्होंने  उस समय इलाहाबाद के कुंभ मेले के बारे में लिखा। इस पुस्तक में, इलाहाबाद के बारे में लिखने वाले  अन्य प्रमुख लोग हैं गालिब (Ghalib), रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling), मार्क ट्वैन (Mark Twain), जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru), अमर नाथ झा (Amar Nath Jha), राजेश्वर दयाल (Rajeshwar Dayal), सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (Suryakant  Tripathi 'Nirala', नयनतारा सहगल (Nayantara Sehgal), सईद ज़ाफरी (Saeed Jafrey), वेद मेहता (Ved Mehta), पंकज  मिश्रा (Pankaj Misra), और कई अन्य। इन सब के लेख इसी पुस्तक में संकलित हैं। इन लोगों ने कुछ न कुछ समय इलाहाबाद में बिताया है। यदि आपका इलाहाबाद से कोई संबन्ध है, या इन लोगो से - तो 'द लास्ट बंगलो'  पुस्तक को पढें। यह इलाहाबाद को उनके नज़रिये देखती है।</p>
<p style="text-align:center;">बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है</p>
<ul>
<li><a href="../2008/05/11/kya-bhuloon-kya-yaad-kroon-harivansh-rai-bachchan-2/">क्या भूलूं क्या याद करूं</a>;</li>
<li><a href="http://unmukth.wordpress.com/2008/05/19/neer-ka-nirman-phir/">नीड़ का निर्माण</a>;</li>
<li>बसेरे से दूर;</li>
<li>दशद्वार से सोपान तक।</li>
</ul>
<p style="text-align:left;">मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/08/blog-post_14.html">हरिवंश राय बच्चन - विवाद</a>‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_31.html">मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों</a>‘ पर पढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:left;">
<p style="text-align:center;">सांकेतिक चिन्ह</p>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">पुस्तक समीक्षा</a>, book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&#38;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/books/">books</a>,  <a href="http://hi.wordpress.com/tag/book-review/">book review</a>, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://wordpress.com/tag/review/">Review</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/reviews/">Reviews</a>, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&#38;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नीड़ का निर्माण फिर ]]></title>
<link>http://unmukth.wordpress.com/?p=83</link>
<pubDate>Mon, 19 May 2008 03:42:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
<guid>http://unmukth.wordpress.com/?p=83</guid>
<description><![CDATA[नीड़ का निर्माण फिर बच्चन जी की जीवनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नीड़ का निर्माण फिर बच्चन जी की जीवनी का दूसरा भाग है, <a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/neer-ka-nirman-phir2.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-88" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/neer-ka-nirman-phir2.jpg?w=195" alt="" width="118" height="168" /></a>यह भाग उनकी पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु से शुरू होकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुनः दाखिले, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नियुक्ति, तेजी जी से मिलन, अमिताभ एवं अजिताभ पुत्र रत्न  की प्राप्ति, और उनके  शिखर पर पहुंचने की कथा है। इस दौरान उन्होने अपने बसेरे का निर्माण किया शायद इसलिये इस भाग का नाम उन्होंने ‘नीड़ का निर्माण फिर’ रखा।</p>
<p style="text-align:center;"><strong>इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यापक</strong></p>
<p style="text-align:left;">बीसवीं शताब्दी  में इलाहाबाद विश्वविद्यालय Oxford of East के नाम से जाना जाता था यह  भारतवर्ष का सबसे अच्छा विश्‍वविद्यालय था। नीड़ के निर्माण फिर में वह विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पढ़ाई पूरी करने की कथा बताते हैं कि उन्हें कैसे वहां नौकरी मिली।अंग्रेजी विभाग के दो प्रसिद्ध अध्यापक  अमर नाथ झा और एम.सी. देव के बारे में बताते हैं।</p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;">‘पंडित अमरनाथ झा अंग्रेजी-साहित्‍य का इतिहास और शेक्सपियर पढ़ाते थे। साहित्य के इतिहास पर उनका एक व्याख्यान प्रति सप्ताह होता था और उसमें बी.ए. कें लड़के भी आकर बैठ सकते थे-विभाग के बीचोंबीच वाले सबसे बड़े हाल में, जिसमें अपराहन में  लॉ के क्लास होते थे। शेक्सपियर वाला क्लास वे अपने कमरे में लेते थे। हाजिरी लेने में वे अपना वक्त नहीं खराब करते थे । लड़के उनके क्लास में पहुंचे, उन्होंने एक नजर सब पर दौड़ाई, रजिस्टर खोला और अनुपस्थित लड़कों के नाम के आगे बिन्दी धर दी। किसी प्रकार का नोट हाथ में लेकर पढ़ाते मैंने कभी न देखा था; प्रो.एस.सी. देब को भी यह कमाल हासिल था, पर दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर था। झा साहब जब किसी विषय पर व्याख्यान देने लगते तो महसूस होता थ कि आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसकी पतवार ठीक दिशा में लगी हुई है और जिसका खेवनहार नाव को समगति से खेता आपको ४५ मिनट के निश्चित घाट पर उतार देगा। देब साहब की नाव में न पतवार होती थी न डांड़। वह शब्दों के तूफान में डगमग डोलती कभी कभी दाएं-बाएं, कभी आगे, और कभी पीछे भी खिंचती, किसी भी जगह जाकर टकरा सकती थी।‘</p>
</blockquote>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/vizianagram-hall.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-86" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/vizianagram-hall.jpg?w=225" alt="" width="145" height="193" /></a></p>
<p style="text-align:left;"><em>इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज़ियानगरम् हॉल</em></p>
<p>एक साल गर्मियों में बच्‍चन जी तेजी जी के साथ झा साहब के साथ मसूरी में रहे। उसके अनुभव पर बच‍चन जी कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>‘झा साहब के साथ कोई कितने ही दिन रहे, उनसे निकटता का अनुभव नहीं कर सकता था। वे अपने भीतर कहीं बहुत एकाकी, स्वकेन्द्रित और स्वयं-पर्याप्त थे। वे यह तो चाहते थे कि उनके आस-पास लोग रहें पर अपने निकट वे किसी को न आने देते थे। झा साहब में बहुत गुण थे, पर वे अच्छे मेजबान नहीं थे। धर्मशाला और घर रहने में कुछ अन्तर का अनुभव तो होना चाहिए। उनके घर में सब-कुछ ठंडा-ठंडा सा था ! हृदय की गर्माहट की प्रतीति कहीं नहीं होती थी।<br />
कैसे अनासक्त भाव से रहता था वह शख्स! सुबह से शाम तक सारे काम बिना किसी घबराहट के, थकावट के, बिना किसी शिकवा-शिकायत के, कर्तव्य की गरिमा से करते जाना रोज-ब-रोज, माह-ब-माह, साल-ब-साल। इतना जब्त करने वाला, इतना अपने को जाब्ते में रखने वाला मैंने दूसरा आदमी नहीं जाना।‘</p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>आइरिस, और अंग्रेजी</strong></p>
<p>बच्चन जी के जीवन में कई लड़कियां आयीं कुछ का नाम वह बताते हैं तो कुछ का नाम छिपा जाते हैं। इन सम‍बन्धों का जिक्र करने का उनका ढंग भी निराला है। विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते समय आइरिस‍ नाम की इसाई लड़की उनके सम्पर्क में आयी और उसे वे दिल से चाहने लगे । वे कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>‘आइरिस ने प्रथम दृष्टि में ही मुझे  आकर्षित किया। वैसे तो मुझमें कुछ विशेष  आकर्षक  नहीं था, पर मेरे बालों ने उसे आकर्षित किया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। यदि पहले से मेरा परिचय उसे कवि के रूप में दे दिया गया होता तो बालों के सम्बन्ध में मेरी रोमानी लापरवाही उसे अप्रत्याशित और अस्वाभाविक न लगी होगी। कद से लम्बी, बदन से इकहरी, और रंग से विशेष गौर वर्ण की, उसमें कहीं ऐंग्‍लो-इंडियन रक्त का मिश्रण अवश्य था। गर्दन लम्बी, चेहरा आयताकार, आंखें नीली, गाल की हड्डियां उभरी, होठ भरे, बाल सुनहरे, कटे, फिर भी इतने बड़े कि दायेँ-बायेँ कन्धों पर और पीठ के उपरी भाग पर लहराते। शायद उसके शरीर में उसके बाल ही उसके मनोभावों के सबसे अधिक अभिव्यंजक थे। वह थोड़ी-थोड़ी देर पर उन्हें कभी दाहिने और कभी बायेँ झटकती और इससे उसके सौन्दर्य में एक गतिशीलता –सी आ  जाती।‘</p></blockquote>
<p>आयरिस ने  बच्चन जी के प्रेम प्रणय  को अस्वीकार कर दिया। उससे पत्र व्यवहार अंग्रेजी में होता था। अस्वीकार होने के बाद बच्चन जी ने अंग्रेजी के पत्रों को  नष्ट कर दिया।  ‘नीड़ का निर्माण फिर’ लिखते समय उन्हें लगा कि उन्होंने उन पत्रों का  गलत अर्थ  शायद इसलिये लगा लिया था कि पत्र अंग्रेजी भाषा में थे। उन पत्रों को याद कर अंग्रेजी  के बारे में कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>‘अंग्रेजी बिना लेशमात्र कृतज्ञता अनुभव किए ‘थैंक यू’ कह सकती है। जब यह ‘सारी’ कहती है तब अफसोस इसे शायद ही कहीं छूता हो। ‘आई ऐम ऐफ्रेड’ से इसका तात्‍पर्य बिलकुल यह नहीं होता कि यह जरा भी डरी है; और इसकी उक्ति ‘एक्‍सक्यूज मी’ (यानी मुझे क्षमा करें) आपके गालों पर थप्‍पड़ लगाने की भूमिका भी हो सकती है। मेरी ‘मधुशाला’ की अंग्रेजी अनुवादिका  कुमारी मार्जरी बोल्टन की एक बात मुझे याद आ गई। जब मैं इंग्लैंड-प्रवास में एक छुट्टी में उनके घर गया तो एक शाम को वे अपने जीवन की दुखद अनुभूति मुझसे बताने लगीं। उनके एक प्रेमी ने कई वर्षो तक उनसे पत्र-व्यवहार किया। क्या भावना में भीगे पत्र थे वे! और एक दिन सहसा उसने उन्हें भुला दिया! मैं मार्जरी का वाक्‍य नहीं भूला-Since that day I have lost faith in English language [उस दिन से अंग्रेजी भाषा पर से मेरा विश्वास उठ गया]। अंग्रेजी औपचारिक शिष्टता, पटुता, प्रदर्शन और डिसेप्शन यानी धोखा-धड़ी की इतनी परिपूर्ण माध्यम हो गई है कि आज अभिव्यक्ति से अधिक यह गोपन और डिसटार्शन यानी विरूपन की भाषा है। क्या भाषाएँ विकसित और परिष्कृत होकर अपनी सूक्ष्म अभिव्यंजन शक्ति, सच्चाई, सिधाई, गहराई और ईमानदारी खो देती हैं?‘</p></blockquote>
<p>मुझे बच्चन जी की यह बात ठीक नहीं लगती। यह दूसरी संस्कृति के संस्कार हैं न कि भाषा की कमी - अंग्रेजी भाषा किसी प्रकार से हिन्दी से कम नहीं। किसी स्त्री द्वारा किसी पुरुष का प्रणय  अस्वीकार किया जाना हमेशा उसके सम्मान को ठेस पहुंचता है। यह कहना इस कारण भी हो सकता है।</p>
<p style="text-align:center;"><strong>तेजी जी से मिलन</strong></p>
<p>आइरिस के द्वारा बच्चन जी का प्रेम निवेदन  स्वीकार न किये जाने पर वे अकेले हो गये और जीवन में नारी को ढूढ़ने लगे। वे अपने मित्र प्रकाश के पास बरेली गये थे वहां पर उनकी मुलाकात तेजी जी से हुई जो कि लाहौर में साइकोलोजी पढ़ाती थीं।  प्रथम मुलाकात के अनुभव को बच्चन जी इस प्रकार से वर्णित  करते हैं।</p>
<blockquote><p>'आज प्रेमा ने अपनी सहेली का परिचय मुझसे कराया है, और बारह वर्ष पहले लिखी अपनी एक तुकबन्दी मेरे कानों में बार-बार गूँजती रही -<br />
इसीलिये सौन्दर्य देखकर<br />
शंका यह उठती तत्काल,<br />
कहीं फँसाने को तो मेरे<br />
नहीं बिछाया जाता जाल<br />
पर अदृश‍य  देख रहा था कि जाल बिछ चुका था और करूणा अवसाद के जाल में फँस चुकी थी या अवसाद ने करूणा को अपने पाश-अपने बाहुपाश- में बाँध लिया था ! यह तो मैं दूसरे  दिन कह सकता था, लेकिन उस दिन मैं उस सौन्दर्य से असंपृक्त, उदासीन, दूर, डरा-डरा रहा- ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का क्या कोई रहस्यपूर्ण अर्थ है?'</p></blockquote>
<p>रात्रि में कविता पाठ पर  उनका तेजी  जी से भावात्मक मिलन होता है जिसका वर्णन वे कुछ इस प्रकार करते हैं,</p>
<blockquote><p>'न जाने मेरे स्वर में कहाँ की वेदना भर गयी कि पहले पद पर ही सब लोग बहुत गम्भीर हो गए। जैसे ही मैंने यह पंक्ति पूरी की<br />
उस नयन में बह सकी कब<br />
इस नयन की अश्रुधरा<br />
कि देखता हूँ कि मिस [तेजी] सूरी की ऑंखें डबडबाती हैं और टप-टप उनके ऑँसू की बूँदें प्रकाश के कंधे पर गिर रही हैं, और यह देखकर मेरा कंठ भर आता है—मेरा गला रूंध जाता है—मेरे भी आँसू नहीं रूक रहे हैं। --- और अब मिस सूरी की आँखों से गंगा -जमुना बह चली है ---  मेरी आँखों से जैसे सरस्वती --- कुछ पता नहीं कब प्रकाश, प्रेमा, आदित्य और उमा कमरे से निकल गये र्हैं और हम दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे हैं और आँसुओं के उस संगम से हमने एक-दूसरे से कितना कह डाला है, एक-दूसरे को कितना सुन लिया है, ... चौबीस घंटे पहले हमने इस कमरे में अजनबी की तरह प्रवेश किया था, और चौबीस घंटे  बाद हम उसी कमरे से जीवन-साथी (पति-पत्नी नहीं) बनकर निकल रहे हैं- यह नए वर्ष का नव प्रभात है जिसका स्वागत करने को हम बाहर आए हैं।<br />
शादी का प्रण लिया, सगाई वहीं की। कुछ दिन बाद शादी इलाहाबाद में।'</p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>इन्दिरा जी से मित्रता</strong></p>
<p>बच्चन परिवार एवं नेहरू परिवार के सम्बन्ध आजकल वैसे नहीं है जैसे के पहले थे। इसका क्या कारण है यह तो वह ही लोग जानते हैं पर कुछ दिन <a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/bachchan-and-gandhi.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-89" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/bachchan-and-gandhi.jpg?w=284" alt="" width="215" height="148" /></a>पहले अमिताभ बच्चन ने राहुल गांधी के कथन पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि बच्चन परिवार और नेहरू परिवार के सम्बन्ध बहुत पुराने हैं और शायद राहुल गांधी को इसका अन्दाजा नहीं है।</p>
<p style="text-align:center;"><em>यह चित्र टाईमस् ऑफ इंडिया के <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-889128,prtpage-1.cms">इस</a> पेज से है।</em></p>
<p>बच्चन परिवार और गांधी परिवार कर सम्बन्धों की  शुरूवात कैसे हुई,  कैसे थे वे सम्बन्ध, इसके बारे में बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>‘उस फरवरी में सरोजिनी नायडू प्रयाग आई थीं ; आनन्द-भवन में ठहरी थीं। झा साहब ने एक रात को उनके सम्मान में भोज दिया था और उसमें सम्मिलित होने को तेजी को और मुझे निमन्त्रित किया था। तेजी के सौन्दर्य, सुरूचिपूर्ण पहनाव, शिष्टतापूर्ण बौद्धिक वार्तालाप से मिसेज नायडू इतनी प्रभावित हुई कि दूसरे दिन उन्‍होंने हमें आनन्द-भवन में चाय पर निमन्त्रित कर दिया। जब मैं तेजी के साथ वहाँ पहुँचा तो उन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से हमारा परिचय नेहरू-परिवार से कराया। हमारी ओर हाथ करके बोलीं, ‘The Poet and the poem’- ‘आप कवि, आप कविता’। इस परिचय के फलस्वरूप तेजी सबसे अधिक निकट इंदिरा जी के आई - उस समय तक उनका विवाह नहीं हुआ था - और तब से आज तक उनकी मैत्री बनी हुई है।‘</p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>बच्चन जी ने मांस और मदिरा क्यों छोड़ी</strong></p>
<p>कायस्थ, मांस खाने और मदिरा पीने में कोई परहेज नहीं करते हैं। बच्चन जी भी इसका उपभोग करते थे पर उन्होंने इसको छोड़ दिया। इसके छोड़ने का कारण उनके पुत्रों की बीमारी थी।</p>
<p>जब अमिताभ बीमार पड़े तो उस समय वह महू में विश्वविद्यालय के एन.सी.सी. से सम्‍बन्धित 8 सप्ताह की ट्रेनिंग में थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि ‘अगर अमित अच्‍छा हो जाएगा तो वे कभी शराब नहीं पियेंगे।' नीड़ का निर्माण फिर में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं कि,</p>
<blockquote><p>‘इस प्रण से ही मेरा मन कुछ शान्त हो गया।<br />
तेजी का जो दूसरा पत्र आया, उसमें लिखा था कि अमित की दशा में सुधार हो चला है।<br />
मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहा, भले ही कोई अफसर या अफसर का चचा बुरा माने।<br />
तेजी के तीसरे पत्र से अमित के और अच्छे होने की खबर आई।<br />
और एक समाचार आया कि अमित बिल्‍कुल अच्छा हो गया है।<br />
पचीस वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। तब से मैंने शराब छुई नहीं।'</p></blockquote>
<p>इसी तरह की कुछ बात तब हुई जब अजिताभ बीमार पड़े वह २-३ महीने का था तो उसे  दाने निकल आये और लोगों ने समझा कि उसे चेचक हो गयी है।  बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर' में कहते हैं,</p>
<blockquote><p>'मैंने  किसी तरह की प्रार्थना-विनती न की। एक पिछली बात याद आई। अमित के लिए मैंने सदा के लिए मदिरा छोड़ दी थी। मैंने अपने मन से कहा, यदि अजित बच जाएगा तो मैं कभी मांस नहीं खाऊंगा। रात का पिछला पहर था या सुबह का मुँह अँधेरा तेजी ने मुझे जोर से आवाज दी! मैंने समझा, कुछ अनिष्ट हो गया। पर वह तो तेजी के हर्ष-आश्चर्य का स्वर था। अजित के बदन से सारे दाने गायब हो गए थे!  उसका बुखार उतर गया था और वह मुस्करा  रहा था!  चमत्कार हो गया था,  चमत्कार !  मैंने किसी अज्ञात को धन्यवाद दिया।'</p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>बच्चन जी, पन्त जी और निराला जी</strong></p>
<p>कलाकार भी कुछ अजीब होते हैं सुमित्रा नन्दन पंत जहां सुकुमार, वहां निराला जी पहलवान। <a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/nirala-sarswati-ptrika-1961.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-90" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/nirala-sarswati-ptrika-1961.jpg?w=194" alt="" width="121" height="189" /></a>इनके सम्बन्ध भी कुछ अजीब थे। एक दिन तो दोनों में कुश्ती ही हो गयी।</p>
<p style="text-align:center;"><em>यह छवि निराला जी के युवा अवस्था यानी 1939 की है। तब वे 43-44 साल के थे। यह चित्र सरस्वती पत्रिका के 1961 के दीपावली अंक के सौजन्य से है। यह मुझे <a href="http://apnaaghar.blogspot.com/2007/12/blog-post.html">यहां</a> से मिला है।</em></p>
<p>बच्चन जी नीड़ का निर्माण फिर में लिखते हैं कि,</p>
<blockquote><p>‘पंत और निराला एक-दूसरे से जितने "एलर्जिक"  (एक-दूसरे के लिए कितने असह्य) थे, इसका अनुभव पहली बार मुझे हुआ।<br />
...<br />
निराला  जी पंत जी को देखते तो अवज्ञा से पीठ या मुंह फेर लेते । पंत जी निराला को देखते तो अपने कमरे में जा बैठते। एक दिन तो निराला जी मेरे ड्राइंग रूम में आ धमके और उन्होंने पंत जी को कुश्ती के लिए ललकारा।<br />
...<br />
अपने मनोविकारों से ग्रस्त-विवश निराला मुझे इससे दयनीय कभी नहीं दिखे।‘</p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>बच्चन जी - नियम और सिद्धान्त</strong></p>
<p>बच्चन जी नियमों और सिद्धान्तों से नहीं बंधना चाहते थे इसलिये किसी क्लब या कला सदस्य के सदस्य नहीं रहे पर यदि निमंत्रण होता तो अवश्य जाते थे। इसके बारे में कहते हैं कि,</p>
<blockquote><p>’मेरा कार्य युनिवर्सिटी में पढ़ाने और अपने अध्ययन-कक्ष में पढ़ने-लिखने तक सीमित हो गया। मैं कभी किसी क्लब वगैरह का सदस्य नहीं बना, किसी कला-साहित्य संस्था का भी नहीं। ... संस्थाऍ किसी-न-किसी सिद्धान्त से बंधती हैं- मैं अपने को किसी सिद्धान्त से बांधना नहीं चाहता था। ... संस्था ... मैंने अपने घर पर ही खोल दी थी। इसका नाम मैंने ‘निशान्त’ रख दिया था। इसके न कोई नियम थे, न सदस्यता की कोई फीस थी। कुछ लोग जिनमें अधिकतर युनिवर्सिटी के नाते मेरे विद्यार्थी थे - महीने के अन्तिम शनिवार को १० बजे रात से बैठते थे। और काव्‍य-पाठ, साहित्य चर्चा में रात बिताते थे। एक या दो बजे रात को हमीं लोग मिल-मिलाकर कॉफी अथवा कोई ताजी-गरम खाने की चीज बनाते, खाते-पीते, और तारों की महफिल के उठने तक हम अपनी बैठक जमाए रहते।'</p></blockquote>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/vizianagram-hall.jpg"><br />
</a></p>
<p style="text-align:center;"><strong>मैंने पिछली बार </strong><strong>अमिताभ बच्चन के द्वारा </strong><strong>मधुशाला का पाठ की चिट्ठी में लगाया था। इसे भी आप सुने। यह किसी तरह उससे कम नहीं है<br />
</strong>
</p>
<p style="text-align:center;">
<p style="text-align:center;"><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/KLGvsRThsOI'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/KLGvsRThsOI&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span></p>
<p style="text-align:center;">बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है</p>
<ul>
<li><a href="http://unmukth.wordpress.com/2008/05/11/kya-bhuloon-kya-yaad-kroon-harivansh-rai-bachchan-2/">क्या भूलूं क्या याद करूं</a>;</li>
<li>नीड़ का निर्माण;</li>
<li>बसेरे से दूर;</li>
<li>दशद्वार से सोपान तक।</li>
</ul>
<p style="text-align:left;">मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/08/blog-post_14.html">हरिवंश राय बच्चन - विवाद</a>‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_31.html">मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों</a>‘ पर पढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:center;">
<p style="text-align:center;">सांकेतिक चिन्ह</p>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">पुस्तक समीक्षा</a>, book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&#38;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/books/">books</a>,  <a href="http://hi.wordpress.com/tag/book-review/">book review</a>, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://wordpress.com/tag/review/">Review</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/reviews/">Reviews</a>, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&#38;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या भूलूं क्या याद करूं]]></title>
<link>http://unmukth.wordpress.com/?p=80</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 07:13:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
<guid>http://unmukth.wordpress.com/?p=80</guid>
<description><![CDATA[अमिताभ बच्चन के पिता, मधुशाला के लेखक - ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/kya-bhuloon-kya-yaad-kroon.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-81" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/kya-bhuloon-kya-yaad-kroon.jpg?w=189" alt="" width="150" height="239" /></a><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Amitabh_Bachchan">अमिताभ बच्चन</a> के पिता, मधुशाला के लेखक - <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harivansh_Rai_Bachchan">हरिवंश राय बच्चन</a> का जन्म २७ नवम्बर २००७ पर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Allahabad">इलाहाबाद</a> के पास <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pratapgarh%2C_Uttar_Pradesh">प्रतापगढ़</a> जिले के एक  गांव में हुआ था। उन्होने अपनी अधिकतर पढ़ायी इलाहाबाद में की और यहीं पर नौकरी भी की। १९५५ में, जवाहर लाल नहरू, इन्हें दिल्ली ले गये। वे राज्य सभा के सदस्य रहे। १९६९ में उन्हें साहित्य आकदमी का पुरुस्कार मिला। वे पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान, और यश भारती सम्मान से भी नवाज़े गये। उनकी मृत्यु १८ जनवरी २००३ में हो गयी।</p>
<p style="text-align:center;">बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। इस चिट्ठी में उनकी आत्मकथा के पहले भाग क्या भूलूं क्या याद करूं की समीक्षा है।</p>
<p><span style="font-size:medium;"> बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग 'क्या भूलूं क्या याद करूं' की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और  श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माना जाता है। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">'कायस्थ  के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां  के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या  बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं  कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !'</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Allahabad_University">इलाहाबाद विश्वविद्यालय</a> में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">'मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है - इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? - यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! - मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।'</span></p></blockquote>
<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/senate-hall-allahabad-university.jpg"><img class="alignnone size-medium wp-image-82" src="http://unmukth.wordpress.com/files/2008/05/senate-hall-allahabad-university.jpg?w=300" alt="" width="300" height="230" /></a></p>
<p style="text-align:center;"><em>इलाहाबाद विश्वविद्याल जहां बच्चन जी अपने जीवन के सबसे सृजनात्मक साल गुजारे</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे यहां तो <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/10/blog-post.html">टौमी</a> है।  टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये - बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। कुत्तों के बारे में  बच्चन जी के विचार यह हैं,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">'देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।'</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें  इलाहाबाद के मुहल्लों,  शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका  इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर  बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो  अच्छा रहता। यह इसको नीरस बनाता है।<br />
</span></p>
<p style="text-align:center;">बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है</p>
<ul>
<li>क्या भूलूं क्या याद करूं;</li>
<li>नीड़ का निर्माण;</li>
<li>बसेरे से दूर;</li>
<li>दशद्वार से सोपान तक।</li>
</ul>
<p style="text-align:center;">मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी  चिट्ठी, '<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/08/blog-post_14.html">हरिवंश राय बच्चन - विवाद</a>' पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं - इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, '<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/12/blog-post_31.html">मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों</a>' पर पढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:center;"><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/FO_2Ypeq6KM'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/FO_2Ypeq6KM&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><em> </em></p>
<p style="text-align:center;"><em>अमिताभ बच्चन मधुशाला का पाठ करते हुऐ</em></p>
<p style="text-align:center;">
<p style="text-align:center;">सांकेतिक चिन्ह</p>
<p style="text-align:left;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">पुस्तक समीक्षा</a>, book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&#38;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/books/">books</a>,  <a href="http://hi.wordpress.com/tag/book-review/">book review</a>, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://wordpress.com/tag/review/">Review</a>,  <a href="http://wordpress.com/tag/reviews/">Reviews</a>, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&#38;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतरजाल की मायानगरी में: टिम बरनर्स् ली]]></title>
<link>http://unmukts.wordpress.com/2007/06/25/internet-tim-berners-lee/</link>
<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 02:23:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
<guid>http://unmukts.wordpress.com/2007/06/25/internet-tim-berners-lee/</guid>
<description><![CDATA[इस कड़ी को आप यहां सुन सकते हैं।
&nbsp;
 ऑर्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><em>इस कड़ी को आप <a href="http://www.esnips.com/doc/82e96f95-20c4-4cdc-8034-b6559dd2525c/Tim-Berners-Lee-Internet">यहां</a> सुन सकते हैं।</em></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p> ऑर्डर ऑफ मेरिट, इंगलैंड का सबसे महत्वपूर्ण सम्मान है। यह वहां की महारानी द्वारा कला, विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिये दिया जाता है।</p>
<p>१३ जून २००७:<a href="http://www.w3.org/People/Berners-Lee/"> टिम बरनर्स् ली</a>, ऑर्डर ऑफ मेरिट से <a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/technology/6750395.stm">सम्मानित किये गये</a>। इसके पहले २००१ में, उन्हें <a href="http://www.royalsoc.ac.uk/">रॉयल सोसायटी</a> का सदस्य बनाया गया। २००४ में नाईटहुड की उपाधि दी गयी थी। टाइम पत्रिका ने उन्हें, २०वीं शताब्दी के १०० महान वैज्ञानिकों और विचारकों में <a href="http://www.time.com/time/time100/scientist/profile/bernerslee.html">चुना</a> है। क्या किया है उन्होने? क्यों दिये गये हैं,उन्हें यह सारे सम्मान?</p>
<p>उन्हें यह सम्मान, उस कार्य के लिये दिया गया है जिसका हम सब से संबन्ध है - अंतरजाल से। उन्होने वेब तकनीक का अविष्कारक किया है। टिम को ऑर्डर ऑफ मेरिट का सम्मान दिये जाने के उपलक्ष में, मैं एक नयी श्रंखला 'अंतरजाल की मायानगरी में' के नाम से शुरू कर रहा हूं। इसे आप मेरे <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त चिट्ठे</a> पर पढ़ पायेंगे।</p>
<p>इस श्रंखला में कई विषयों पर चर्चा रहेगी। हम बात करेंगे,</p>
<ul>
<li> इंटरनेट और वेब इतिहास के बारे में;</li>
<li> इन दोनो में क्या अन्तर है;</li>
<li> इसके भविष्य के बारे में - इसी में यह भी चर्चा करेंगे कि क्या चिट्ठाकार पत्रकारों की जगह ले लेंगे या फिर रेडियो की या टीवी की। इस तरह की कुछ बात, मैंने अपनी चिट्ठी  <a href="http://unmukts.wordpress.com/2007/03/28/journalist-blogger/">पत्रकार बनाम  चिट्ठाकार</a> में उठायी थी;</li>
<li> इंटरनेट पर उठ रहे मुद्दों के बारे में; और</li>
<li>मुद्दों के संभावित समाधानों के बारे में - आपके विचारों का हमेशा स्वागत है। खास तौर से, इन समाधानों की चर्चा के समय।</li>
</ul>
<p>इसके अतिरिक्त बहुत कुछ और भी होगा इस श्रंखला में, पर यह सब तब शुरू होगा इस समय चल रही तीन श्रंखलाओं (<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/protection-of-women-from-domestic.html">आज की दुर्गा</a>, <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/kashmir-pahalgaon-aru.html">कशमीर यात्रा</a>, और <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/mother-deathbed.html">हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू</a>) में से किसी के भी अन्त हो जाने के बाद। जहां तक मैं समझाता हूं कि इनमें सबसे पहले हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू ही समाप्त होगी। तब तक इंतजार कीजिये, पर आज कुछ टिम के बारे में।</p>
<p>टिम का जन्म ८ जून १९५५, इंगलैंड में हुआ था। माता पिता दोनो गणितज्ञ थे। कहा जाता है कि उन्होने टिम को गणित हर जगह, यहां तक कि खाने की मेज पर भी बतायी।</p>
<p>टिम ने अपनी उच्च शिक्षा क्वीनस् कॉलेज, औक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पूरी की। विश्वविद्यालय में उन्हें अपने मित्र के साथ हैकिंग करते हुऐ पकड़ लिया गया था। इसलिये उन्हें विश्वविद्यालय कंप्यूटर का प्रयोग करने से मना कर दिया गया :-( १९७६ में, उन्होने विश्विद्यालय से भौतिक शास्त्र में डिग्री प्राप्त की।</p>
<p><a href="http://public.web.cern.ch/Public/Welcome.html">CERN</a>, (सर्न) यूरोपियन देशों की नाभकीय प्रयोगशाला है। १९८४ से, टिम वहीं फेलो के रूप में काम करने लगे। वहां हर तरह के कंप्यूटर थे जिन पर अलग अलग के फॉरमैट पर सूचना रखी जाती थी। टिम का मुख्य काम था कि वे सूचनाये एक कंप्यूटर से दूसरे पर आसानी से जा सकें। उन्हे लगा कि क्या कोई ऐसा तरीका हो सकता है कि सारी सूचनायें,</p>
<ul>
<li>किसी तरह से पिरोयी जा सके, और</li>
<li>एक जगह ही प्रकाशित सी लगेंं।</li>
</ul>
<p>बस इसी का हल सोचते, सोचते - उन्होंने वेब तकनीक का अविष्कार किया और दुनिया का पहला वेब पेज ६ अगस्त १९९१ को सर्न में बना।</p>
<p><a href="http://unmukts.wordpress.com/files/2007/06/tim.gif" title="tim.gif"></a></p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukts.wordpress.com/files/2007/06/tim.gif" title="tim.gif"><img src="http://unmukts.wordpress.com/files/2007/06/tim.gif" alt="tim.gif" height="302" width="185" /></a></p>
<p align="center"> <em>लगता है टिम को नाई के पास जाना चाहिये </em>:-)<em><br />
</em></p>
<p>टिम ने इस तकनीक का जब आविष्कार किया तब वे सर्न में काम कर रहे थे। यह तकनीक सर्न की बौद्घिक संपदा थी। ३० अप्रैल १९९३ को, टिम के कहने पर सर्न ने इस तकनीक को मुक्त कर दिया। अब इसे दुनिया के लिए न केवल मुफ्त, पर मुक्त रूप से उपलब्ध है। इसके लिए किसी को, कोई भी फीस नहीं देनी पड़ती है। यह निर्णय न केवल महत्वपूर्ण था पर इंटरनेट के शुरुवाती दौर के निर्णयों के अनुरूप था जो हर तकनीक को मुफ्त व मुक्त रूप से उपलब्ध कराने के लिये कटिबद्ध थे। अब तो आप, ओपेन सोर्स दर्शन का महत्व समझ ही गये होंगे :-)</p>
<p>टिम, बाद में अमेरिका चले गये। १९९४ में उन्होने, मैसाचुसेटस् इंस्टिट्युट ऑफ टेकनॉलोजी में <a href="http://www.w3.org/Consortium/">World Wide Web Cosortium</a> (W3C) की स्थापना की। यह वेब के मानकीकरण में कार्यरत है।</p>
<p>ईंतजार कीजिये, उंमुक्त चिट्ठे पर चल रही श्रंखला के समाप्त होने काः हम तब इस श्रंखला की अगली कड़ी के अन्दर चर्चा करेंगे - इंटरनेट के बारे में, यह क्या होता है, क्या है इसका इतिहास?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन]]></title>
<link>http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/</link>
<pubDate>Tue, 01 Aug 2006 00:55:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
<guid>http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/</guid>
<description><![CDATA[मैं और फाइनमेन का संसार
बीसवीं शताब्द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><b>मैं और फाइनमेन का संसार</b></p>
<p align="left">बीसवीं शताब्दी के पहले भाग के सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आईनस्टाइन थे और रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन (फाइनमेन) बीसवी शताब्दी के अन्तिम भाग के। वे १९६६ मे नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित हुए। बीसवीं शताब्दी के बीच मे अच्छे विश्वविद्यालयों मे भौतिक शास्त्र को पढ़ाये जाने के तरीके पर विवाद चल रहा था।</p>
<p align="center">&#160;</p>
<ul>
<li>क्या भौतिक शास्त्र मे उसी तरह से उन्ही विषयों के साथ पढ़ाया जाय जैसे अभी तक पढ़ाया जा रहा था;  या</li>
<li>फिर नये तरह से नये विषयों के साथ पढ़ाया जाय।</li>
</ul>
<p>इस विवाद को फाइनमेन जैसा ही व्यक्ति अन्जाम दे सकता था। उनका रुतबा सब मानते थे। उनका सम्मान इसलिये नहीं था कि वह कैल टेक मे थे पर कैल टेक दुनिया का सबसे अचछा भौतिक शास्त्र का विश्वविद्यालय इसलिये माना जाता था क्योंकि फाइनमेन वहां थे<a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2006/08/fynman-hindi.pdf"></a> फाइनमेन ने १९६१-६३ मे कैल-टेक मे स्नातक के विद्यार्थियों को भौतिक शास्त्र पढ़ाया - कितने भाग्यशाली थे वह विद्यार्थी। इतिहास गवाह है कि आज तक इतने बड़े वैज्ञानिक ने कभी स्नातक के विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया। इन तीन साल ने भौतिक शास्त्र को पढ़ाने की नयी दिशा दी और भौतिक शास्त्र नयी तरह से नये विषयों के साथ पढ़ाया जाने लगा। इन लेक्चरों को तीन किताबों ने बदला गया। यह लाल बाईंडिंग मे थीं और 'Lectures on Physics by Richard P Feynman के नाम से मशहूर हुईं। यदि आप भौतिक शस्त्र में महआरत हासिल करने की सोचते हैं तो इन किताबों को पढ़ना आवश्यक है।</p>
<p>गणित और भौतिक शास्त्र हमेशा से मेरे प्रिय विषय थे। मैने स्कूली जीवन, हवाई-जहाज के मौडल, ट्रांजिस्टर, तथा अन्य मौडल बनाते गुजारा। १९६० के दशक मे १२वीं पास कर जब स्नातक की कक्षा मे कदम रखा तो हमे भौतिक शास्त्र इन्ही लाल बाईंडिंग की 'Lectures on Physics by Richard P Feynman' की किताबों से पढ़ाया जाना शुरू किया गया। उस समय अपने देश मे शायद यह किताब और कहीं नहीं चलती थी। तब से हम सब, न केवल कैल-टेक जाने की सोचने लगे, पर फाईनमेन के साथ काम करने का भी सपना संजोने लगे। मै तो फाईल पलटने वाला बन गया पर मेरे कुछ मित्र न केवल कैल-टेक गये पर उन्होने फाइनमेन के साथ काम भी किया।</p>
<p align="center"><b>फाईनमेन का बचपन</b></p>
<p align="left">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन, का जन्म ११ मई १९१८ में हुआ था और मृत्यु १९८८ में कैंसर से हो गयी। छुटपन में फाइनमेन अक्सर सोचा करते थे कि वह बडे होकर क्या बनें: विदूषक या वैज्ञानिक। बडे होकर उन्होंने इन दोनो भूमिकाओं को एक साथ बाखूबी निभाया। लोग कहते हैं कि वह इतने मशहूर क्यों हुये पर उनके बारे में वैज्ञानिक ठीक ही कहते हैं:</p>
<blockquote><p>'फाइनमेन  तो  ऐतिहासिक व्यक्ति हैं  उनको जितना सम्मान   मिला  वे उस सब के अधिकारी हैं।'</p></blockquote>
<p>फाइनमेन के पिता का बातों को बताने का अपना ही ढंग था। एक बार का किस्सा है कि पिता और पुत्र पार्क मे घूम रहे थे पिता ने एक चिड़िया की तरफ वह इशारा करके बताया कि यह चिड़िया दुनिया में अलग-अलग नामो से जानी जाती है। यह जरूरी नहीं है कि आप उन सब नामो को जाने, न ही महत्वपूर्ण है। पर महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या और कैसे करती है। वे बच्चे के मन मे जिज्ञासा जगाने की कोशिश करते थे यह बताने की जरूरत नहीं है कि फाइनमेन बचपन से जिज्ञासु तथा कुतुहली थे।</p>
<p>फाइनमेन के पिता को आजकल के टीवी के क्विज प्रोग्रामो जैसे 'कौन बनेगा करोड़पति' से तुलना करें कितना अन्तर पायेंगे। इस तरह के क्विज प्रोग्राम तो केवल यह बताते हैं कि कौन कितना रट सकता है। आज के क्विज प्रोग्रामो से यह पता नहीं चलता कि कौन कितना अच्छा सोच सकता है, किसमे कितना बूता है और कौन विज्ञान की दुनिया को बदलने की ताकत रखता है।</p>
<p align="center"><b>सोच कर रेडियो ठीक करना</b></p>
<p align="left">फाइनमेन बचपन के दिनों में रेडियों ठीक किया करते थे। उस समय वाल्व रेडियो हुआ करते थे। उनके पड़ोसी का रेडियो में शुरू होने के थोड़ी देर बाद खरखराने लगता था। उसने फाइनमेन से रेडिये ठीक करने के लिये कहा। फाइनमेन रेडियो को छूने के बजाय वही बैठ कर सोचने लगे। उन्हे लगा कि गर्म होने पर बिजली का अवरोध बढ जाता है जिससे खरखराहट बढ जाती है और दो वाल्वों को एक दूसरे से बदलने में यह दूर हो सकती है। उसने ऐसे ही किया और खरखराहट बन्द हो गयी और तभी से कई लोग उन्हे उस लड़के की तरह से याद रखते हैं जो केवल सोच कर रेडियो ठीक किया करता था।</p>
<p>स्कूल में वह गणित में सबसे अच्छे और गणित टीम के हीरो थे। पर उन्होंने गणित को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि गणित मे उच्च शिक्षा प्राप्त करके वे दूसरों को गणित पढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। वह कुछ व्यवहारिक करने का सोच कर, पहले इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग की तरफ गये पर बाद में भौतिक शास्त्र की पढ़ाई की। शायद यही ठीक था। यह बीसवीं शताब्दी थी - भौतिक शास्त्रियों की शताब्दी। इस शताब्दी मे यदि कोई विज्ञान की दुनिया को बदलने का दम रखता था तो भौतिक शास्त्र ही उसका विषय था। यह उसी तरह से जैसे इक्कीसवीं शताब्दी जीव शास्त्रियों की शताब्दी है। चलिये हम वापस फाइनमेन पर चलें।</p>
<p align="center"><b>युवा फाइनमेन</b></p>
<p align="left">फाइनमेन ने स्नातक की शिक्षा मैसाचुसेट इं‍स्टिट्यूट आफ टेक्नोलोजी से पूरी की। वह वहीं पर शोध कार्य करना चाहते थे पर फिर प्रिंक्सटन मे शोध कार्य करने के लिये चले गये। बाद में वे कहा करते थे,</p>
<blockquote><p>'यह ठीक  ही था। मैने वहां जाना कि दुनिया बहुत बड़ी  है और  काम  करने के लिये  बहुत  सी अच्छी  जगहें हैं।'</p></blockquote>
<p align="center"><b>व्हीलर और घड़ी</b></p>
<p align="left">यहां पर युवा फाइनमेन को व्हीलर के साथ शोध करने का मौका मिला। उस समय तक व्हीलर को नोबेल पुरूस्कार तो नहीं मिला था पर वे वह काम कर चुके थे जिस पर उन्हे बाद मे नोबेल पुरूस्कार मिला। वे कुछ आडम्बर प्रिय थे कुछ अपनी अहमियत भी जताते थे। उन्होंने फाइनमेन को सप्ताह में एक दिन का कुछ निश्चित समय मिलने का दिया । पहले दिन मुलाकात के समय वह सूट पहने थे उन्होंने अपनी जेब से अपनी सोने की विराम घडी निकाल कर मेज पर रख दी ताकि फाइनमेन को पता चल सके कि कब उसका समय समाप्त हो गया है। फाइनमेन उस समय विद्यार्थी थे। उन्होंने एक बाजार से एक सस्ती विराम घड़ी खरीदी - उनके पास मंहगी घड़ी खरीदने के लिये पैसे नहीं थे। अगली मीटिंग पर उन्होंने अपनी सस्ती घड़ी उस सोने की घड़ी के पास रख दी। व्हीलर को भी पता चलना चाहिये कि उनका समय भी महत्वपूर्ण है। व्हीलर को मजाक समझ में आया और दोनो दिल खोल कर हंसे। दोनों ने घड़ियां हटा ली। उनका रिश्ता औपचारिक नहीं रहा, वे मित्र बन गये, उनकी बातें हंसी मजाक में बदल गयीं, और हंसी-मजाक नये मौलिक विचारों मे।</p>
<p align="center"><b>लॉस एलमॉस </b></p>
<p align="left">इसी बीच दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। जर्मनी मे परमाणु बम बनाने का काम हो रहा था, यदि पहले वहां बन जाता तो हिटलर अजेय था। अमेरिका की लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी मे दुनिया के वैज्ञानिक इक्कठा होकर परमाणु बम बनाने के लिये एकजुट हो गये। फाइनमेन को भी वहां बुलाया गया और उन्होने वहां काम किया।</p>
<p>लॉस एलमॉस मे सुरक्षा का जिम्मा सेना का था जिनके अपने नियम अपने कानून थे। यह नियम फाइनमेन को अक्सर समझ मे नहीं आते थे। फाइनमेन ताले खोलने मे माहिर थे। वे सेना के अधिकारियों को तंग करने के लिये की लेबोरेटरी की तिजोरियों खोल कर उसमे कागज परguess whoलिख कर छोड़ देते थे पर तिजोरियों से कुछ निकालते नहीं थे। यह वह केवल, सेना के अधिकारियों को बताने के लिये करते थे कि उनकी सुरक्षा प्रणाली कितनी गलत है।</p>
<p align="center"><b>अरलीन</b></p>
<p align="left">उनके जीवन का एक और दृष्टान्त - बिल्‍कुल असम्भव सा लगता है, मै तो हमेशा सोचता था कि यह सब कहानियों या पिक्चरों में होता है इस वास्तविक दुनियां में नहीं।</p>
<p>स्कूल के दिनों में फाइनमेन का अपनी सहपाठिनी अरलीन से प्रेम हो गया। उन्होने शादी तब करने की सोची जब फाइनमेन को कोई नौकरी मिल जाय। जब फाइनमेन शोध कार्य कर रहे थे तब अरलीन को टी.बी. हो गयी उसके पास केवल चन्द सालों का समय था। उन दिनों टी.बी. का कोई इलाज नहीं था। अरलीन को टी.बी. हो जाने के कारण, फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे। उन्हे मालुम था कि अरलीन के साथ उसके सम्बन्ध केवल अध्यात्मिक (Platonic) ही रहेगें। इन सब के बावजूद, फाइनमेन अरलीन से शादी करना चाहते थे। उनके परिवार वाले और मित्र इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे मे उनकी अपने पिता से अनबन भी हो गयी। इसके बावजूद फाइनमेन ने अरलीन के साथ शादी की।</p>
<p>फाइनमेन, जब लॉस एलमॉस में काम कर रहे थे तो वहां के निदेशक रौबर्ट ओपेन्हाईमर ने अरलीन को पास ही के सैनीटेरियम में भरती करवा दिया ताकि फाइनमेन उससे मिल सके&#124; फाइनमेन के लॉस एलमॉस रहने के दौरान ही अरलीन की मृत्यु हो गयी। इस घटना चक्र पर एक पिक्चर भी बनी है जिसका नाम इंफिनिटी (Infinity) है इसे मैथयू बौरडविक (Malthew Bordevick) ने इसे निर्देशित किया है।</p>
<p align="center"><b>कौरनल विश्वविद्यालय</b></p>
<p align="left">फाइनमेन जीवन्त थे और अक्सर मौज मस्ती के लिये काम करते थे। मौज मस्ती मे ही उन्होने उस विषय पर काम किया जिस पर उन्हे नोबेल पुरुस्कार मिला। यह भी एक रोचक किस्सा है।</p>
<p>दूसरे महायुद्ध के दौरान लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी में फाइनमेन की मित्रता बेथ से हुई जिनसे उनकी काफी पटती थी। बेथ कौरनल में थे, इसलिये फाइनमेन भी कौरनल चले गये। एक दिन वे कौरनल के अल्पाहार गृह में बैठे थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक प्लेट को फेंका। प्लेट सफेद रंग की थी और उसमें बीच में कौरनल का लाल रंग का चिन्ह था। प्लेट डगमगा भी रही थी और घूम भी रही थी। यह अजीब नज़ारा था। फाइनमेन इसके डगमगाने और घूमने और के बीच में सम्बन्ध ढ़ूढ़ने लगे। इसमे काफी मुश्किल गणित के समीकरण लगते थे। इसमे उनका बहुत समय लगा। उन्होंने पाया कि दोनो मे 2:1 का सम्बन्ध है। उनके साथियों ने उनसे कहा कि वह इसमे समय क्यों बेकार कर रहे हैं। उनका जवाब था,</p>
<blockquote><p>'इसका कोई महत्व नहीं  है मैं यह  सब  मौज मस्ती के लिये कर रहा हूं।'</p></blockquote>
<p>पर वह इसके महत्व के बारे मे ठीक नहीं थे। वे जब एलेक्ट्रौन के घूमने के बारे में शोध करने लगे तो उन्हें कौरनल की डगमगाती और घूमती प्लेट में लगी गणित फिर से याद आने लगी। इसी ने उस सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण उन्हें नोबेल पुरूस्कार मिला। सच है जीवन में बहुत कुछ वह भी आवश्यक है जो केवल मौज मस्ती के लिये हो, चाहे उसका कोई और महत्व हो या न हो - मौज मस्ती ही अपने आप मे एक महत्व की बात है। यदि आप मौज मस्ती में ही अपनी जीविका ढ़ूढ सके तो क्या बात है, यदि यह नहीं हो सकता तो शायद जीविका में ही मौज मस्ती ढ़ूढ पाना दूसरी अच्छी बात है।</p>
<p align="center"><b>कैल-टेक</b></p>
<p align="left">फाइनमेन न ही एक महान वैज्ञानिक थे पर एक महान अध्यापक भी थे। उन्हे मालुम था कि अपनी बात दूसरे तक कैसे पहुंचायी जाय। व्याख्यानशाला उनके लिये रंगशाला थी, जिसमें नाटक भी था और आतिशबाजी भी।</p>
<p>फाइनमेन के द्वारा भौतिक शास्त्र पर कैल-टेक के लेक्चरों का जिक्र मैने इस लेख को शुरूवात मे किया है। इन लेक्चरों को उन्होने सितम्बर 1961-मई 1963 मे दिया था। यह लेक्चर खास थे इसलिये इन्हें हमेशा के लिये सुरक्षित रखा गया और बाद मे ये तीन लाल किताबों के रूप में छापे गये। फाइनमेन सप्ताह में केवल दो लेक्चर देते थे बाकी समय वह इन लेक्चरों को तैयार करने में लगाते थे। लेक्चर की हर लाइन, हर मजाक को (जो वह लेक्चरों के दौरान करते थे) पहले से सोच विचार कर रखते थे। कभी भी उनके साथ लेक्चर के नोटस नहीं होते थे। बस केवल एक छोटा सा कागज रहता था जिसमें आगे बताने के लिये कुछ खास शब्द केवल संकेत देने के लिये रहते थे। यह तीन साल, संसार मे किसी भी विश्वविद्यालय के, किसी भी विषय पर के लेक्चरों मे अद्वितीय हैं। न कभी ऐसे हुये न शायद फिर कभी होंगे। क्योंकि मालुम नहीं कि फिर कभी ऐसा व्यक्ति आयेगा कि नहीं।</p>
<p>फाइनमेन के लिये अंग्रेजी - बेकार, और दर्शन शास्त्र - तिरस्कृत विषय था। Religion से उनका कोई वास्ता नहीं था। चक्करों पर बात करना उनकी फिज़ा में नहीं था। वह हमेशा सीधी बात करते थे। उनका मतलब वही होता था जो वे कहते थे। वे इस बात से भ्रमित हो जाते थे यदि उनकी सीधी बात दूसरे को परेशान कर देती थी।</p>
<p align="center"><b>चैलेंजर दुर्घटना जांच कमीशन </b></p>
<p align="left">फाइनमेन को  लोग अलग अलग तरह से याद रखते हैं -  कुछ  लोग,</p>
<ul>
<li>उस लडके की तरह जो केवल सोच कर रेडियो  ठीक करता था;</li>
<li>उस वैज्ञानिक की तरह से जो भौतिक शास्त्र की  गणना  टौपलेस रेस्तराँ में करना पसन्द करता था;</li>
<li>उस चंचल युवा के रूप में याद रखते हैं जो लौस एलमौस की लेबॉरेटरी के तिजोरियों को खोल कर अलग अलग तरह के नोट लिखे कागज को रख कर, सेना के अधिकारियों को तंग करता था;</li>
<li>उन्हें बोंगों  बजाने  वाले की  तरह याद करते  हैं।</li>
</ul>
<p>सम्भवत: सबसे ज्यादा लोग उन्हें उस व्यक्तिि की तरह से याद करते हैं जिसने टीवी के सामने सार्वजनिक रूप से बताया कि चैलेंजर-दुर्घटना क्यों हुई।</p>
<p>28 जनवरी 1986 में चैलेंजर स्पेसशिप का विस्फोट आकाश में हो गया था, इसकी जांच करने के लिये एक कमीशन बैठा। फाइनमेन उसमें वैज्ञानिक की हैसियत से थे। यह विस्फोट, स्पेसशिप में कुछ घटिया किस्म का सामान लगाने के कारण हुआ था। नासा का प्रशासन (जिस पर सेना का जोर है) इसे दबाना चाहता था पर वैज्ञानिक इसे उजागर करना चाहते थे। कमीशन ने अपने निष्कर्ष को टीवी के सामने सीधे प्रसारण मे बताना शुरू किया (इसमें घटिया किस्म के सामान लगाने की बात स्पष्ट नहीं थी )। उस समय टीवी पर ही, सबके सामने फाइनमेन ने एकदम ठन्डे पानी के अन्दर घटिया सामान को डाल कर दिखाया कि वास्तव में विस्फोट क्यों हुआ था। यह सीधा प्रसारण था इसलिये फाइनमेन का प्रदर्शन रोका नहीं जा सका और यह दो मिनट की क्लिप कुछ घन्टो के अन्दर दुनिया की टीवी पर सबसे ज्यादा दिखायी जाने वाली न्यूस क्लिप बन गयी।</p>
<p align="center"><b>टौपलेस परिवेषिकायें</b></p>
<p align="left">फाइनमेन पैसाडीना में अक्सर वहीं के एक रेस्तराँ मे जाते थे, जहां पर टौपलेस परिवेषिकायें ( Waitress) रहती थीं। उस रेस्तराँ में वे उसके मालिक को भौतिक शास्त्र बताते थे और वह उन्हे चित्रकारी। एक बार पुलिस वालों को लगा कि उस रेस्तराँ में कुछ गड़बड़- सड़बड़ होता है और रेस्तराँ के मालिक पर अश्लीलता का मुकदमा चलाया। वास्तव में वहां पर इस तरह का कोई कार्य नहीं होता था। उस रेस्तराँ में कई प्रतिष्ठित व्यक्ति आते थे रेस्तराँ के मालिक ने उन सबसे गवाही देने की प्रार्थना की&#124; सबने चुप्पे से कन्नी काट ली, पर फाइनमेन ने नहीं। उन्होंने रेस्तराँ मालिक के पक्ष में गवाही दी और अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर सबसे मुख्य खबर के रूप में छपी।</p>
<blockquote><p>'Caltech's Feynman  tells lewd case jury, he watched the girls while doing his equations'</p></blockquote>
<p>फाइनमेन की जीवन की घटनाओं के बारे में यदि कोई लिखने बैठे तो एक किताब भी पूरी न पड़े। शायद इसलिये फाइनमेन पर कई किताबें लिखी गयीं हैं।</p>
<ul>
<li>Surely You’re Joking, Mr. Feynman! by Richard Feynman &#38; Ralph Leighton;</li>
<li>What Do You Care What Other People Think? by Richard Feynman &#38; Ralph Leighton;</li>
<li>Richard Feynman-A life in Science’ by John Gribbin &#38; Mary Gribbin;</li>
<li>Tuva or Bust! by Ralph Leighton;</li>
<li>No Ordinary Genius: The Illustrated Richard Feynman; edited by Christopher Sykes;</li>
<li>Most of the Good stuff; edited by Laurie Brown &#38; John Rigden;</li>
<li>Genius: Richard Feynman and Modern Physics by James Gleik;</li>
<li>The Beat of The Different Drum; by Jagdish Mehra.</li>
</ul>
<p>यह सब पढ़ने यो‍ग्य हैं पर इनमें से यदि आप एक किताब पढना चाहें तो आप Richard Feynman-A life in Science’ by John Gribbin &#38; Mary Gribbin पढ़ें।</p>
<p><a href="http://www.blogger.com/profile/19341159">उन्मुक्त</a><br />
ईमेल: unmukt.s@gmail.com</p>
<p align="center"><a href="http://unmukth.wordpress.com/files/2006/08/fynman-hindi.pdf">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन</a>  इस लेख की pdf  फाईल है। इसे आप डाउनलोड कर प्रयोग कर सकते हैं।</p>
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