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	<title>जज़्बात &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/जज़्बात/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "जज़्बात"</description>
	<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 18:37:44 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[यादों की मद्धम आँच में]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=979</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 09:43:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/06/07/yaadon-kii-maddham-aamch-mein/</guid>
<description><![CDATA[यादों की मद्धम आँच में
ज़हनी जज़्बात पिघ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">यादों की मद्धम आँच में<br />
ज़हनी जज़्बात पिघलते जा रहे हैं<br />
मेरे दिल में आ रहे हैं<br />
ख़ुद काग़ज़ पर उतरते जा रहे हैं</span></p>
<p><span style="color:#000000;">अकेला मैं चीज़ क्या हूँ? कुछ नहीं!<br />
तेरा साथ पाकर पूरा हो जाता हूँ<br />
इस ज़िन्दगी को समझने लगता हूँ<br />
तेरे एतबार से नया हासिल पाता हूँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तेरे साथ बीते हर सुबह हर शाम<br />
मैं तेरे क़रीब आ रहा हूँ<br />
नग़मए-नाम तेरा गुनगुना रहा हूँ<br />
दर्मियाँ फ़ासले मिटा रहा हूँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">इरादा कर लो मेरे साथ तुम रहोगे<br />
हर ख़ाब पूरा करूँगा जो देखोगे<br />
सुनो धड़कन, इस दिल की सदा तुम<br />
क्यों यक़ीं है मुझे अपना कहोगे</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मुझसे कोई प्यार कर ले]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=974</link>
<pubDate>Fri, 30 May 2008 07:51:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/05/30/mujh-se-koii-pyaar-kar-le/</guid>
<description><![CDATA[मुझसे कोई प्यार कर ले
दिल अपना देकर, दि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">मुझसे कोई प्यार कर ले<br />
दिल अपना देकर, दिल मेरा ले ले<br />
मुझसे कोई प्यार कर ले...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तन्हाइयों का दर्द छुपा रखा है<br />
इसे कोई कभी दो आँखों से चुरा ले<br />
मुझसे कोई प्यार कर ले...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">यह हसीं जज़्बात टिके हुए हैं लबों पे<br />
इन्हें कोई अपने लबों से चख ले<br />
दिल अपना देकर, दिल मेरा ले ले<br />
मुझसे कोई प्यार कर ले...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">दु:ख यह मेरा दु:ख कब चुकेगा<br />
तूफ़ान यह दिल में कब रुकेगा<br />
मुझपे कोई एतबार कर ले<br />
मुझसे कोई प्यार कर ले...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">चेहरा जो दिल को अपना लगेगा<br />
समा जो बस इक सपना लगेगा<br />
वह उस ख़ाब में मुझको बुला ले<br />
मुझसे कोई प्यार कर ले...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वह हुस्न की जादूगरी हो न हो<br />
वह महजबीं या परी हो न हो<br />
बस मुझे अपनी तक़दीर बना ले<br />
मुझपे कोई एतबार कर ले...</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं सबसे बुरा था ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=973</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 17:46:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/05/21/main-sab-se-bura-tha/</guid>
<description><![CDATA[मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा<br />
मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">उसने मुझको सदा ख़ुशबू के<br />
इक बादल के पार देखा<br />
और मैं चाह कर भी कभी<br />
उसको इस तरह न देखूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">आईने उसकी आँखों के<br />
मुझको ढूँढ़ते रहे, जाने क्यों?<br />
और मैं अक्स उन आईनों का<br />
कभी भी न बनूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">इक मतलब ही तो है<br />
मुझसे जुड़ता हर नया रिश्ता<br />
और मैं ऐसे रिश्तों से कभी<br />
कोई जज़्बात न रखूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">हर शै पर हुक़ूमत करना<br />
मेरी सबसे बुरी आदत है<br />
और मैं अपनी यह आदत<br />
जानकर भी न बदलूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">अच्छा या बुरा जो भी समझो<br />
यह तुम्हारी अपनी सोच है<br />
और मैं किसी के लिए<br />
ख़ुद को कभी न बदलूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं सबसे बुरा था<br />
सबसे बुरा हूँ<br />
सबसे बुरा ही रहूँगा</span></p>
<p><span style="color:#000000;">वह किसी ग़ैर के पास जाता है<br />
तो चला जाये, बेपरवाह!<br />
और मैं उसके बेवफ़ा रुख़ का<br />
कभी अफ़सोस न करूँगा...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मैं जी रहा था<br />
जी रहा हूँ<br />
ऐसे ही जीता रहूँगा</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टूटे हुए चाँद को]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=827</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 16:26:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/25/tuute-hue-chaand-ko/</guid>
<description><![CDATA[टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने<br />
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने<br />
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया<br />
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<p><font color="#000000">बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी<br />
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी<br />
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं<br />
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर<br />
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है<br />
...छोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं<br />
और मौसम बदलते रहते हैं<br />
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी<br />
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को<br />
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है<br />
...मोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं<br />
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं<br />
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं<br />
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं<br />
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,<br />
बिछुड़ते हैं मिलते हैं<br />
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं<br />
खिलते हैं महकते हैं<br />
बनते हैं बुझते हैं<br />
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं</font></p>
<p><font color="#000000">उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है<br />
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है<br />
...तोड़ दिया है</font></p>
<p><font color="#000000">जला दिये दिल के जज़्बात उसने<br />
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने<br />
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है<br />
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आज फिर आसमाँ पे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=824</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 15:52:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/25/aaj-phir-aasmaan-pe/</guid>
<description><![CDATA[आज फिर आसमाँ पे देखा चाँद, गुलाबी चाँद
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">आज फिर आसमाँ पे देखा चाँद, गुलाबी चाँद<br />
आज फिर तेरी आँखों को देख्नने की ख़ाहिश हुई<br />
आज फिर सुलगने लगे मेरी आँखों के आँसू<br />
आज फिर बुझती हुई एक तमन्ना ने अँगड़ाई ली</font></p>
<p><font color="#000000">चाँद हसीन था तेरे जिस्म-सा शामीन था<br />
तेरे ग़म में यह कब मुझसे ग़मगीन था<br />
रोज़ महकता था मगर सुनहरा था<br />
आज कुछ ज़्यादा गुलाबी और गहरा था</font></p>
<p><font color="#000000">आज फिर दिल के जज़्बात बह निकले दिल से<br />
आज फिर उस मकान में तुम्हें देखने की ख़ाहिश हुई<br />
आज फिर कुछ अजीब भँवर थे मेरी धड़कनों में<br />
आज फिर नस-नस में लहू ने चिन्गारी जला दी</font></p>
<p><font color="#000000">तुमसे मेरी मुहब्बत बहुत याद आ रही है<br />
गुलाबी चाँद कह रहा है तू आ रही है<br />
आ लौट आ अब लौट भी आ तू कहाँ है<br />
तुमसे मेरे सपनों का यह हसीं जहाँ है</font></p>
<p><font color="#000000">आज फिर आसमाँ पे देखा चाँद, गुलाबी चाँद<br />
आज फिर तेरी आँखों को देखने की ख़ाहिश हुई<br />
आज फिर कुछ अजीब भँवर थे मेरी धड़कनों में<br />
आज फिर नस-नस में लहू ने चिन्गारी जला दी</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १६ अप्रैल २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो दिल से जाता नहीं है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=813</link>
<pubDate>Mon, 18 Feb 2008 19:42:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/19/jo-dil-se-jaata-nahiin-hai/</guid>
<description><![CDATA[जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">जो दिल से जाता नहीं है<br />
तू वह गीत है<br />
जो दिल में आकर बसा था<br />
तू वह मीत है</font></p>
<p><font color="#000000">साँसों की सरगम बस तुम ही तुम<br />
लफ़्ज़ों में जब हम बस तुम ही तुम</font></p>
<p><font color="#000000">कहना कितना मुश्किल था<br />
यह समझा न सके<br />
अपने दिल की बात हम<br />
तुम्हें बता न सके</font></p>
<p><font color="#000000">जो दिल से जाता नहीं है<br />
तू वह गीत है<br />
जो दिल में आकर बसा था<br />
तू वह मीत है</font></p>
<p><font color="#000000">प्यार क्या है सनम हमें कब पता था<br />
हमें जब तुम मिले तब पता चला था</font></p>
<p><font color="#000000">अकेले रहना मुमकिन नहीं<br />
यह कह न सके<br />
अपने दिल के जज़्बात हम<br />
तुम्हें जता न सके</font></p>
<p><font color="#000000">जो दिल से जाता नहीं है<br />
तू वह गीत है<br />
जो दिल में आकर बसा था<br />
तू वह मीत है</font></p>
<p><font color="#000000">अब तो ऐसा लगता है मुझको<br />
जैसे फूलों में ख़ुशबू नहीं है<br />
तुम जो नहीं यहाँ पर सनम<br />
जैसे यहाँ पर कुछ भी नहीं है</font></p>
<p><font color="#000000">बेचैन करती हैं यादें दिन-रात<br />
बुझती नहीं हैं साँसें<br />
हर लम्हा सोचता हूँ क्या मैं<br />
करूँ तो क्या करूँ</font></p>
<p><font color="#000000">जो दिल से जाता नहीं है<br />
तू वह गीत है<br />
जो दिल में आकर बसा था<br />
तू वह मीत है</font></p>
<p><font color="#000000">कुछ और अब बाक़ी नहीं<br />
बस मैं हूँ मेरा ख़ाब है<br />
ख़ामोश रहती हैं यह रातें<br />
बस मैं हूँ मेरा साथ है</font></p>
<p><font color="#000000">ज़िन्दगी मेरी तुम बदलकर चले गये<br />
तन्हा कर गये हमें तन्हा कर गये</font></p>
<p><font color="#000000">जो दिल से जाता नहीं है<br />
तू वह गीत है<br />
जो दिल में आकर बसा था<br />
तू वह मीत है</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरी बाइसे-ज़ीस्त]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=765</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 12:08:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/13/merii-baais-e-zeest/</guid>
<description><![CDATA[मेरी बाइसे-ज़ीस्त,
तुमको इक नज़र देखने क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#000000">मेरी बाइसे-ज़ीस्त,</font></p>
<p align="justify"><font color="#000000">तुमको इक नज़र देखने के बाद मैं क्यों मुदाम तुम्हारी जानिब खिंचता रहता हूँ? क्यों इक कशिश मुझको बारहा तुम्हारे तस्व्वुर के दाम में बाँध लेती है? क्यों तुम शबो-रोज़ कभी ख़्यालों की भीड़ में कभी ख़ाबों के चमन में मुझे मिल जाती हो? क्यों मुझे हर शय तुम्हारा ही अक्स लगती है? क्यों तुम मेरी ख़ाहिश मेरा अरमान बन गयी हो? क्यों मुझे तुम्हारी अदा, तुम्हारी तीर जैसी बातें, तुम्हारी मुस्कुराहट बारहा रह-रहकर याद आती है? क्यों मैं हर लम्हा सुकूनो-सबात से दूर रहता हूँ? क्यों मैं सिर्फ़ तुम्हारी उल्फ़त की तमन्ना करता हूँ? क्यों मैं तुम्हारे साथ अपनी ज़िन्दगी, सभी पहर, सभी लम्हे गुज़ारना चाहता हूँ? क्यों मैं सबा के लम्स में तुम्हारे हाथों का लम्स ढूँढ़ता हूँ? क्यों मुझको ऐसा लगता है कि गुलों में तुम्हारा रंग शामिल है? क्यों मुझे गुलों की ख़ुशबू से तुम्हारा एहसास होता है? शाम तले, ख़ामोश उदासियों में चाँद क्यों तुम्हारी बात करता है? क्यों मैं हर टूटते सितारे से तुमको माँगता हूँ? क्यों मुदाम ज़ुबाँ पर तुम्हारा नाम रहता है? क्यों उदासी और तन्हाई का दर्द मुझे मीठा लगता है? क्यों मेरी आँखें मुदाम राह पर तेरा इन्तिज़ार करती हैं? क्यों दिल की धड़कनों में नब्ज़-नब्ज़ तुम्हारा नाम ज़ाहिर होता है? क्यों फ़ज़िरो-शाम तुम्हारा रंग मेरी आँखों में छाया रहता है? क्यों यह लगता है कि तुम्हारे शीरीन लबों की ख़ामोश सदा मुझे बुला रही है? क्यों दर्दो-ग़म व फ़रहतो-शाद के दर्मियाँ बजाय दीवार मैं खड़ा हूँ? ख़ुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैं ख़ुद को कितना तन्हा महसूस कर रहा हूँ तुम बिन... शायद यह तुम समझ पाओ... शायद इसका बाइस तुमपे खुले... इसलिए यह ख़त तुम्हें भेज रहा हूँ...&#124;</font></p>
<p align="justify"><font color="#000000">तुम्हारा शैदाई</font></p>
<hr />
<p align="justify">शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरे दिलसिताँ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=764</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 10:52:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/13/mere-dil-sitaan/</guid>
<description><![CDATA[मेरे दिलसिताँ,
तुम्हें देखकर मुझे पहल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font color="#000000">मेरे दिलसिताँ,</font></p>
<p align="justify"><font color="#000000">तुम्हें देखकर मुझे पहली बार यूँ लगा था कि मेरी ज़िन्दगी मेरे सामने खड़ी है&#124; मेरे बदन में साँस पहले भी थी मगर मुझे उसका एहसास नहीं था&#124; तुम्हें देखकर मेरी धड़कनें जो रवाँ हुईं तो मैंने जाना कि आज तक मैं साँस क्यों ले रहा था&#124; शायद वह तुम्हीं हो, शायद क्यों हाँ वह तुम्हीं हो जिसने मुझे साँस लेने की किसी अपने के लिए जीने की वजह दी है&#124; तुम मेरी ज़िन्दगी हो और मेरी अपनी भी, मेरे मन में रह-रहकर यही ख़्याल आता रहता है&#124; इतने दिन मैंने दिल को बहुत समझाया, बहुत मनाया, लेकिन यह दिल मेरी सुनता कब है&#124; तुम्हें भूलने की कोशिश मैंने बहुत की मगर तुम मुझे याद आती रही, हर पल याद आती रही&#124; हर एक की ज़िन्दगी में कोई न कोई होता है जिसे वह दिल के सबसे क़रीब महसूस करता है, मेरे लिए वह शख़्स तुम ही हो&#124; मुझे यह नहीं पता कि मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ मगर मुझे यह मालूम है कि मैं इतना अच्छा नहीं कि मुझे कोई पहली बार देखते ही पसन्द कर ले&#124; जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा और देखता ही रहा तो जाने तुमने मेरे बारे में क्या सोचा हो कि मैं किस तरह का लड़का हूँ&#124; सच मानो मैंने तुम्हें यह सब परेशाँ करने के लिए नहीं किया था&#124; मैं तो बस तुमसे अपने जज़्बात बयाँ करने का एक मौक़ा चाहता था, जो कि तुमने मुझे इतनी कोशिशों में इक बार भी नहीं दिया और दूर से देखकर मुझपे हँसते रहे&#124; मैं तुम्हारी हँसी का क्या मतलब लूँ, तुम ही  कहो&#124; मैं यह सब बातें इक ख़त में लिखकर इसलिए दे रहा हूँ कि तुम मेरे दिल के हालात समझ सको, मैं तुम्हें यह हालात समझा सकूँ&#124; मेरे मन में तुम्हें लेकर कुछ भी ग़लत नहीं है जो है सो मोहब्ब्त है&#124; अब यह तुम्हारी मर्ज़ी है कि तुम मुझे ठुकरा दो या अपना लो&#124; मगर यह मदाम इक सच ही रहेगा कि मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और करता रहूँगा&#124;</font></p>
<p align="justify"><font color="#000000">तुम्हारा सिर्फ़ तुम्हारा</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर सकते थे]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=758</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 16:47:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/12/do-lafzon-mein-bayaan-kar-sakate-the/</guid>
<description><![CDATA[दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर सकते थे
हम अपने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर सकते थे<br />
हम अपने दिल की बात<br />
गुज़र गये वह सारे लम्हे<br />
बिताये थे जो हमने साथ</font></p>
<p><font color="#000000">पास तो बहुत थे वह<br />
फिर भी न कर पाये दिल की बात<br />
वह दिन थे कितने हसीं<br />
जब गुज़र रही थी उजालों से रात</font></p>
<p><font color="#000000">दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर सकते थे<br />
हम अपने दिल की बात<br />
जाने वह कौन घड़ी थी<br />
जब वह छोड़ गये साथ</font></p>
<p><font color="#000000">निगाहों में थे सारे इशारे<br />
इशारों में थी अपने दिल की बात<br />
कहने को बहुत था<br />
न कह पाये हम दिल के जज़्बात</font></p>
<p><font color="#000000">दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर सकते थे<br />
हम अपने दिल की बात<br />
मिले कहाँ हम कभी फिर<br />
जो कर पाते दिल की बात</font></p>
<p><font color="#000000">चले गये वापस हसीन मौसम<br />
गिर गये पेड़ों से सारे पात<br />
जाने कब वह आयेंगे वापस फिर<br />
जाने कहाँ होगी उनसे मुलाक़ात</font></p>
<p><font color="#000000">दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर सकते थे<br />
हम अपने दिल की बात...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मीठी-मीठी बातें]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=727</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 16:58:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/02/08/meethii-meethii-baatein/</guid>
<description><![CDATA[मीठी-मीठी बातें
वह शबनमी रातें
सब याद ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">मीठी-मीठी बातें<br />
वह शबनमी रातें<br />
सब याद हैं हमें<br />
वह रस्ते वह रिश्ते<br />
जो हमने क़ायम किये थे<br />
वादे जो हमने किये थे<br />
सब वैसे के वैसे हैं<br />
कल के जैसे-<br />
सब कुछ आज है</font></p>
<p><font color="#000000">हम तो चले तेरी डगर<br />
कुछ यादें लिए<br />
कुछ वादे लिए<br />
महकी हवाओं से<br />
बातें करते हुए<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000">मीठी-मीठी बातें<br />
वह शबनमी रातें<br />
सब याद हैं हमें<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000">हसीन नज़ारें हैं,<br />
अम्बर में सितारे हैं<br />
फिर भी तेरी कमी है<br />
दिल में कोई बात है<br />
उलझे हुए जज़्बात हैं<br />
सुलझायेंगे उनसे मिलके<br />
जो उलझे हुए...</font></p>
<p><font color="#000000">हम तो चले तेरी डगर<br />
कुछ वादे लिए<br />
कुछ इरादे लिए<br />
जाती बहारों से<br />
कुछ सीख लिए<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000">मीठी-मीठी बातें<br />
वह शबनमी रातें<br />
सब याद हैं हमें<br />
हम तो चले तेरी डगर</font></p>
<p><font color="#000000"></font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[एक यही इल्तिजा है...]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/14/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%87%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Fri, 14 Sep 2007 20:41:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2007/09/14/ek-yahii-iltijaa-hai/</guid>
<description><![CDATA[तुम्हें महसूस हो कि ना हो
मेरे सीने मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">तुम्हें महसूस हो कि ना हो<br />
मेरे सीने में दर्द है तो सही...</font></p>
<p><font color="#000000">लम्हा-लम्हा जज़्बात पिघलते हैं ग़म की चिंगारियों में,<br />
एहसास उबलते हैं मेरे,<br />
ख़्याल मसलते हैं मुझे...</font></p>
<p><font color="#000000">इक भँवर है आँखों में माज़ी का<br />
मुझको पूरे ज़ोर से खींचता है अपने अंदर...<br />
दिन-दिन, रात-रात, लम्हा-लम्हा, पल-पल<br />
मैं हूँ कि डूबना ही चाहता हूँ<br />
बचने की कोशिश भी नहीं करता</font></p>
<p><font color="#000000">अब तो हाल मेरा यह है कि जिस सिम्त भी देखता हूँ<br />
हर शै में तू नज़र आती है<br />
सिर्फ़ तू....</font></p>
<p><font color="#000000">नहीं चाहता महसूस करे तू मेरा दर्द<br />
मगर कभी फ़ुर्सत मिले तो यह एहसास सुन ले<br />
एक यही इल्तिजा है...</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
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