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	<title>तारामती-बारादरी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/तारामती-बारादरी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "तारामती-बारादरी"</description>
	<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 21:33:49 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[पंकज उधास के साथ एक शाम]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=220</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 18:52:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[आजतक मैने सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आजतक मैने सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम को लाइव देखा है...पलाश सेन का यूफोरिया बैण्ड। इंजिनियरिंग के समय कालेज में आया था और चार घंटे तक खडे खडे हम झूमते-नाचते-कूदते रहे थे। बस उसके बाद कोई मौका ही नही लगा। पिछले दो साल में यहां हैदराबाद में गुलाम अली साहब और जगजीत सिंह जी आकर अपनी प्रस्तुतियां देकर चले गये पर हम टिकट का इंतजाम नही कर पाये और उन्हे नही सुन पाये। ऐसे में जब हमें पंकज उधास जी के शो के टिकट, <span style="text-decoration:line-through;">घर </span>आफिस बैठे अनायास ही प्राप्त हो गये (Thanks to my Super-Boss) तो अपनी तो बल्ले बल्ले हो गई। हालांकि पसंदीदा गज़ल गायकों की सूचि में पंकज उधास बहुत बाद में आते हैं पर पहली बार किसी गज़ल गायक को लाइव सुनने का मौका तो नही छोडना था। वे यहां APTDC द्वारा आयोजित तीन दिवसीय "Golconda Festival" के आखिरी दिन की शाम बनाने आये थे। वैसे तो हमारे पास तीनों दिन की प्रस्तुतियों के टिकट थे जिनमें राहुल शर्मा (पं शिवकुमार शर्मा जी के सुपुत्र) का प्यूज़न संगीत और एक शास्त्रीय नृत्य की शाम भी शामिल थे, पर बदकिस्मती से, व्यस्तताओं के चलते..पहले दो दिन नही जा सके।</p>
<p>कार्यक्रम का स्थल था <em><strong>तारामती-बारादरी</strong></em> जो हैदराबाद से थोडा बाहर स्थित है। थोडा <em>बारादरी </em>के बारे में। तारामती बारादरी (तारामती की बारादरी), गोलकुंडा के सातवें सुल्तान अब्दुल कुतुब शाह ने बनावायी थी, अपनी प्रित नर्तकी तारामती के लिये। एक छोटी से पहाडी पर बनी इस इमारत में बारह दर (दरवाजे) है। यहां तारामती नृत्य करती थी और कहते हैं कि सुल्तान गोलकुण्डा के किले में बैठा उसे सुनता/देखता था (अगर देख पाता था तो वाकई नजर थी बन्दे की...गोलकुण्डा किला यहां से काफी दूर एक अन्य पहाडी पर है।)</p>
<p>तो यहाँ, तारामती-बारादरी में हमें २० अप्रेल की शाम को सवा दो-ढाई घंटे पंकज उधास की महफिल में गुजारने का मौका मिला। ओपन एयर थियेटर, हल्का सा ठंडा-गरम माहौल, आसमान में लगभग पूरा चांद और सामने पंकज उधास और उनकी टीम....भई अपनी तो शाम बन गई। लाइव गजल सुनने का यह पहला मौका था और हालांकि पंकज उधास की गाई ४-६ गजलें ही मुझे पसंद हैं....कार्यक्रम मुझे बहुत पसंद<br />
आया। टिकट फोकट में मिल गये थे पर पैसा लगा कर जाते तो भी गम नही होता।</p>
<p>उस शाम को दो कार्यक्रम थे, एक नृत्य नाटिका और दूसरा शाम-ए-गजल। पहुँचने में थोडी देर हो गई थी। पहुंचे और घूम फिर कर, तीन बार जगह बदल कर (यहां से सही नही दिख रहा..., यहां आगे लम्बे लोग बैठे हैं..., यहां स्पीकर बहुत पास हैं...आदि आदि करके) अपनी सीट कब्जाई, तब तक नृत्य नाटिका काफी निकल चुकी थी। दूसरी बात...वो तेलुगू में थी। नृत्य चाव से देखा, नाटिका को समझने का प्रयास भी किया। शायद भगवान विष्णु-लक्ष्मी जी का विवाह और राजा कृष्ण्देव राय से संबंधित कोई प्रसंग था। राजा कृष्णदेव राय ने तेलुगु साहित्य को बढावा देने में बहुत योगदान दिया है। एक और पहला वाकया। इसके पहले कोई नृत्य नाटिका भी नही देखी थी न लाइव ना रिकार्डेड ;) ।</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/3.jpg"><img class="size-medium wp-image-221" style="border:2px solid black;vertical-align:middle;" src="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/3.jpg?w=300" alt="" width="398" height="298" /></a></p>
<p><strong>(नृत्य नाटिका की समाप्ति, बीच में लक्ष्मी-नारायण खडे हैं, ब्रह्मा जी भी पहचान में आ रहे हैं)</strong></p>
<p>चूंकि पंकज <em>उधास </em>थे, सो होश, मदहोश, साकी, शराब तो होने ही थे। कार्यक्रम की शुरुआत उन्होने की इस गजल से <em>"ये अलग बात है साथी, कि मुझे होश नही.."</em> पहली बार सुनी थी और गज़ल में रवानगी होने के बावजूद बहुत जमी नही।  शायद माहौल बनाने की को्शिश कर रहे थे। अगली गजल थी "दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है..."।बहुत समय बाद ये गजल सुनी और खूब पसंद आई। इसके पहले पता नही मैने कहां सुना था इसे...और मुझे ये भी पता नही थी कि इसे पंकज उधास ने भी/ही गाया है।</p>
<p>अगली गजल उन्होने ली कुछ समय पहले आये उनके अल्बम <strong>जश्न </strong>से । बोल <em>"दुःख सुख था एक सबका अपना हो या बेगाना..."</em>। एक बेहतरीन गजल। बहुत सुन्दर बोल। यह मैने इससे पहले कभी नही सुनी थी और अगर इस शाम में नही आता तो शायद सुन भी नही पाता। ये गजल मुझे इस शाम की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति लगी (जी हाँ, <em>'चिट्ठी आई है..'</em> भी थी, पर उससे भी अच्छी)। गजल चार पीढियों की तुलना करती है..हमारे दादा, पिताजी, हम खुद और आने वाली नस्लें। शुरुआत होती है दादाजी के जमाने से जब सुख दुःख मिल बांत कर बिताये जाते थे चाहे वो अपना हो या बेगाना और फिर अपने साथ बहाती ले जाती है। इस गजल को मेरे मित्र मुरली अपने मोबाइल में रिकार्ड नही कर पाये पर हमने मैने इसे नेट पर ढूढने की कोशिश की और ढूंढ भी लिया। मुश्किल यह है कि ई स्निप से यहां वर्डप्रेस पर गाना शायद चिपकता नही है। और कोई तरीका सूझ भी नही रहा।  फिलहाल इसे <a href="http://www.dhingana.com/pankaj-udhas-jashn-1/movie/songs/hindi/ghazals/1056" target="_blank">यहां </a>से सुनें (गाना नं 8)। कोशिश करूंगा कि इसके बोल भी टाइप करके यहां चिपका सकूं। एक और पहला वाकया। इससे पहले आजतक मैने अपने ब्लाग पर कोई गीत भी नही सुनावाया। :)</p>
<p>अब तक पब्लिक थोडी अधीर हो चुकी थी और शायद आगे की पंक्ति से एक सज्जन "चिट्ठी आई है.." चिल्लाये (बाद में लगा कि शायद काफी पब्लिक यही सुनने आयी थी)। पंकज बोले.."साहब चिट्ठी भी आयेगी..जरा सब्र कीजिये। आजकल ई-मेल का जमाना है, कोई सब्र ही नही करता।" आखिरकार चिट्ठी ४-५ गज़लों के बाद चिट्ठी भी आई। इस बीच उन्होने अपनी लोकप्रिय गजलें <em>"चांदी जैसा रंग है तेरा...",  "थोडे आहिस्ता कीजिये बातें..", "जियें तो जियें कैसे..."</em> पेश की। साथ ही कुछ अनसुनी और अत्यंत मद्धम गजलें भी (जिनके बोल याद नही रहे)। पर जब <em>चिट्ठी </em>आई तो उसमें इतना मजा नही आया। दरअसल उन्होने इसे शुरू किया शेर <em>"मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार से..."</em>। मैं<br />
इसे भांप नही पाया। मुरली ने कहा..वही है? रिकार्ड करें?  मैं बोला नही..शायद कोई और है। और फिर अचानक शुरू हो गये। मुझे लगा था कि इसे पहले थोडा सा खींचेंगे...आलाप लेंगे, लेकिन उन्होने अचानक शुरू कर दिया। बीच में भी जहां लगा कि थोडा रुक कर खींचेंगे...पर ऐसा हुआ नही। शायद इस गाने से अपेक्षाएं ज्यादा थीं..सो उतना मजा नही आया।</p>
<p>करीब सवा दस-साढे दस बजे तक कार्यक्रम चला। इस दरमियान कुछ और लोकप्रिय गज़लें और कुछ के सिर्फ मुखडे मसलन- <em>"ऐ गमे जिन्दगी कुछ तो दे मशविरा...", "हुई मंहगी बहुत शराब..","</em>आदि सुनाये। कार्यक्रम की समाप्ति उन्होने की <em>"मोहे आई न जग से लाज, मैं इतना जोर से नाची आज...कि घुंघरू टूट गये"</em> से। इसे मैने पहले अनूप जलोटा की आवाज में सुना था। सोंच सकते हैं कितना अलग लगा होगा।</p>
<p>एक बात जो मैने महसूस की वो ये कि मुझे लगता है कि अगर गजल गायक, अथवा कोई भी गयाक बीच बीच बीच में सामने बैठी जनता से संवाद स्थापित करता रहे तो कार्यक्रम और दिलचस्प लगेगा। पंकज एक-दो बार बतियाये , चांदी जैसा रंग है तेरा के पहले एक चुटुकला भी सुनाया पर बाकी समय शुक्रिया-Thank You तक सीमित रहे। इसके अलावा ...अगर कहीं कहीं पर पब्लिक को भी गाने अथवा ताली की थाप में साथ ले ले तो मजा दोबाला हो जाये। हालांकि ये प्रक्रिया पब्लिक की तरफ से शुरू होनी चाहिये और हैदराबाद की पब्लिक से में यह अपेक्षा नही करता। यहां तो ज्यादातर लोग पिच्चर हाल में भी सीटी भी नही बजाते। बहुत <em>डीसेंट पब्लिक</em> है।</p>
<p><a href="http://saptrang.files.wordpress.com/2008/04/pankaj-udhas.jpg"><img class="size-medium wp-image-222" style="border:2px solid black;vertical-align:middle;" src="http://saptrang.wordpress.com/files/2008/04/pankaj-udhas.jpg?w=300" alt="" width="395" height="297" /></a></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
<p><strong> (हमारी सीट से मंच का दृश्य। पृष्ठभूमि में ऊपर जो रोशनी में इमारत दिख रही है, वो तारामती की बारादरी है।)</strong></p>
<p>और हां, अगले शनिवार को (२६ अप्रेल) यहीं तारामती बारादारी में मरहूम शायर मखदूम मोहिउद्दीन साहब की कविताएं/गज़लें तीन विभिन्न विधाओं अभिनय, नृत्य और संगीत के द्वारा प्रस्तुत की जायेंगी। (पम्फलेट के अनुसार  "Renowned Poet Late Maqdoom Mohiuddin's poetry interpreted in three different performing art forms, by an Actor, a Dancer and a Musician"). मखदूम साहब से अपना थोडा सा परिचय मात्र यूनुस भाई के <a href="http://radiovani.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%AE%20%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8" target="_blank">ब्लाग </a>के <a href="http://radiovani.blogspot.com/2008/02/do-badan-pyar-ki-aag-me-jal-gaye-film.html" target="_blank">जरिये </a>है...देखते हैं जा पाते हैं क्या शनिवार को।</p>
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