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	<title>दुबई &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/दुबई/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "दुबई"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 10:53:39 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[चैनीस]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/05/%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Wed, 05 Jul 2006 10:54:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[मां के हाथ का बना हुवा खाना मेरा मन पसं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मां के हाथ का बना हुवा खाना मेरा मन पसंद खाना है, वैसे सभी भारती खाने बहुत मज़ेदार होते हैं। यहां इमारात मे भारती होटल का मतलब मलबारी होटल है और इन होटलों मे वही पकाया जाता है जो मलबारी अपने गाऊँ मे खाते हैं और तो और अंग्रेज़ी, भारती और चैनीस खानों को मिला कर उसकी खिचडी भी बनाते हैं जिसे आम भाषा मे "घटिया खाना" कहा जाता है। दुबई मे मलबारियों के अलावा चंद उत्तरी भारत के रेसटुरंट्स भी हैं जैसे दिल्ली, मुम्बई, बेंगलौर और हैदराबादी वगैरह जहां पर शुध भारती खानों का सवाद तो नहीं मगर कुछ अच्छा खाने को मिल जाता है मगर ऐसे रेसटुरंट्स कहीं कहीं पर ही दिखाई देते और जहां भी नज़र डालो हर तरफ मलबारी होटल नज़र आते हैं। उनके अलावा बाकी दुनिया भर के रेसटुरंट्स भी हैं जो हैं तो बहुत महंगे पर वहां हर क़िस्म के मज़ेदार और बेहतरीन पकवान खाने को मिलते हैं। यहां हम बेचलर्स की नसीब मे घर जैसा खाना कहां मिलता है, मैं खुद पिछले तीन वर्षों से मुखतलिफ होटलों मे खाता आरहा हूं और यहां मुझे चैनीस रेसटुरंट्स का खाना बहुत पसंद आया जो मेरे फ़्लैट के बिलकुल करीब ही है। हफ्ते मे दो-तीन बार इसी रेसटुरंट से रात का खाना खाता था मगर--- पिछले महीने उस रेसटुरंट के किचन का सिलेंडर बलास्ट होगया जिसकी वजे से पूरा रेसटुरंट ढेर होचुका। आज कल चैनीस खाने के लिए टैक्सी मे बैठ कर थोडा दूर जाना पड रहा है।</p>
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<title><![CDATA[New Linux Ubuntu in just 15 Days]]></title>
<link>http://ubuntukanpur.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Wed, 09 Apr 2008 11:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>oskanpur</dc:creator>
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<description><![CDATA[लाइनक्स उबुँटू के सबसे आधुनिक संसकरण ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लाइनक्स उबुँटू के सबसे आधुनिक संसकरण में अब मात्र १५ दिन बाकी - २४ अप्रैल को स्वयं <a title="लाइनक्स उबुँटू - डाउनलोड करें" href="http://www.ubuntu.com/getubuntu/download" target="_blank">डाउनलोड करें</a> और अपने नवीन अथवा खटारा कम्प्यूटर में नया जीवन फूँक दें &#124;</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[Open Source Software Education in India]]></title>
<link>http://oskanpur.wordpress.com/2008/03/28/open-source-software-education-in-india/</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 10:26:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>oskanpur</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारत मे सार्वजनिक वित्त पर चलने वाली श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत मे सार्वजनिक वित्त पर चलने वाली शिक्षण सँसथाएं व खुला सोर्स कोड / <a title="अपने कम्प्यूटर के लिए आाधुनिक व मुफ्त लाइनक्स उबुँटू डाउन लोड करें" href="http://www.ubuntu.com/getubuntu/download" target="_blank">लाइनक्स उबुँटू शिक्षा</a> - किसकी जिम्मेदारी ?</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[मूंह मीठा करें]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/11/10/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Fri, 10 Nov 2006 11:00:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[नीचे तसवीर पर किल्क करना लड्डू खाने जै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>नीचे तसवीर पर किल्क करना लड्डू खाने जैसा है :)</strong></p>
<p align="left">और हां ....... लड्डू खाने के बाद चिट्ठाचर्चा चलें वहां आज <a target="_blank" href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2006/11/blog-post_10.html" title="ChitthaCharcha">मज़ेदार चर्चा</a> चल रही है, बहुत दिनों की खामोशी के बाद सबको एक साथ एक जगह बोलते हुए अच्छा लग रहा है ........ लड्डू बाद मे खाना  - <a target="_blank" href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2006/11/blog-post_10.html" title="Chittha Charcha">आइये आइये चलते हैं चिट्ठाचर्चा</a></p>
<p align="center"><a href="http://www.shuaib.in/chittha/"><img border="0" width="354" src="http://www.giftmela.com/images/827_thumb.jpg" alt="http://shuaib.in" height="338" style="width:354px;height:338px;" /></a></p>
<p align="center"><a href="http://www.shuaib.in/chittha/"></a><a href="http://www.shuaib.in/chittha/">This blog has been moved on a new location</a></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ये भारत है जनाब !!!]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Fri, 27 Oct 2006 05:57:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योहार खतम होने का नाम ही नही लेते कभी दीपावली की खरीदारी तो कभी रमज़ान की गहमा गहमी, कभी दशहरा तो कभी दुर्ग पूजा। पिछले चंद महीनों मे त्योहारों का जैसे एक सिलसिला चल रहा है। पहले तो पूरे भारत मे दशहरा की धूम धाम थी और लोगों ने रावन को जला कर चैन का सांस लिया ही था कि दिपावली और रमज़ान की तैयारियाँ और शुरू होगई।</p>
<p>रात के बारह बजते ही जहां पूरी दुनिया सोजाती है लेकिन इस वक्त रमज़ान और दिपावली के मौके पर पूरे भारत मे सवेरा हो जाता है - लोगों की चहल पहल की वजह से बाज़ारों मे रौनक लग जाती है। इस बार दिपावली के साथ रमज़ान का भी समाँ था, पूरे बाज़ार खरीदारी के लिए खचाखच भरे हुए, भारत मे इन त्योहारों के मौके पर कौन हिन्दू और कौन मुसलमान पहचानना मुश्किल है क्योंकि सभी भारतीयों का एक-दूसरे के त्योहारों मे आना-जाना और मुबारकबादी देना ज़रूरी है और तो और एक-दूसरे के घरों मे खाना भी खाते हैं और ये नज़ारा चंद नेता लोगों से हज़म नही होता, जैसे ही त्योहारों का मौसम खतम हुआ फिर दंगा फसाद शुरू करवा देते हैं - वाह क्या कल्चर है हमारा!</p>
<p>भारत कोई ऐसा वैसा देश नही जहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच सिर्फ दंगे ही होते हैं - भारत के हिन्दू और मुसलमान अपस मे लडते ज़रूर हैं मगर एक दूसरे के बगैर रह भी नही सकते। वैसे तो मैं सिर्फ नाम का मुसलमान हूं और हर दिन मुसलमानों मे उठता बैठता हूं लेकिन अपने देश के कल्चर को ही अपना धर्म और भारत को अपनी मां सम्मान मानता हूं। मैं ने हमेशा से हिन्दू को हिन्दू नहीं बल्कि अपना भाई माना है हालांकि दंगों के वक्त अपने हिन्दू भाईयों से मार भी खा चुका हूं। खैर दंगे फसाद के मौके पर कौन क्या है दिखाई नही देता और ये दंगा फसाद तो हमारे देश मे रोज़ का मामूल है, फसाद किसी भी टाइप का हो मगर भुगतने वाला कोई, पकडा जाने वाला कोई, मरने वाला कोई लेकिन फसाद मचाने वाला आज़ाद - नेता लोग को कौन पकडे? जबकि पकडने,  मारने और फसाद मचाने का आर्डर तो वही देते हैं।</p>
<p>यहां दुबई मे कहने को बहुत सारे दोस्त हैं मगर अपना जो सच्चा दोस्त है वो एक हिन्दू है, ज़रूरतों पर काम आने वाला, खुशी और दुःख मे साथ देने वाला हालांकि वो अभी तक मुझे मुसलमान ही समझता है फिर भी अपनी सच्ची दोस्ती निभाता है। हम पिछले चार वर्षों से साथ हैं लेकिन आज तक उस ने मुझ से ये नही पूछा कि दूसरे मुसलमानों की तरह तू नमाज़ क्यों नही पढता? जबकि मैं ने उस से पूछ डाला तू पूजा पाठ क्यों नही करता? उसने जवाब दियाः "हालांकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं और पूजा भी करते हैं लेकिन जब से मैं ने दुनिया देखा धर्म पर से विश्वास उठ गया। ये सारे लोग झूठे हैं जो सुबह शाम राम अल्लाह का नाम लेते हैं और छुप कर गलत काम भी करते हैं लेकिन मैं राम अल्लाह का नाम नही लेता सिर्फ अपने दिल की सुनता हूं जो बुरा लगे वो बुरा और जो अच्छा लगे वो अच्छा।" अपने इस दोस्त के विचार जान कर मुझे बहुत खुशी हुई, पहली बार मुझे अपने विचारों जैसा अपने ही देश का ये मित्र मिला, मैं ने अपनी किस्मत का शुक्र अदा किया। आज अपने देश मे ऐसे बहुत सारे नौजवान हैं जो अपने धर्म मे पाबंदियों की वजह से तंग आचुके वो खुल कर जीना चाहते हैं लेकिन अपने माता-पिता की इज़्ज़त के लिए आवाज़ नही उठाते। ऐसे आज़ाद विचार वाले भी अपने मां बाप से डरते हैं और उनकी इज़्ज़त करते हैं, ऐसा प्यारा परिवार भारत के अलावा और कहां मिलेगा? ये कैसा अजीब देश है हमारा, जैसा भी हो वो हमें प्यारा।</p>
<p>इस लेख मे कुछ खास बात नही है, लेकिन ये लेख अपने इस मित्र के नाम लिख रहा हूं जो चार वर्ष साथ रहने के बाद उसके विचारों को पहली बार जान कर मुझे सच्ची खुशी मिली।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[दिन मे प्लेन गिनना]]></title>
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<pubDate>Wed, 11 Oct 2006 08:41:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमारी छत के ऊपर बिलकुल करीब से हर 3 मिनट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारी छत के ऊपर बिलकुल करीब से हर 3 मिनट पर हर देश का हवाई जहाज़ उतरता है वो इस लिए के एरपोर्ट बिलकुल पास मे है। और हर पांचवें प्लेन की आवाज़ इतनी भयानक होती है जैसे ये अपने घर पर ही उतरे गा। कल शाम को बाहर कहीं जाने के लिए गेट खोला ही था कि नज़रों के बिलकुल सामने ऐर-इन्डिया कान फाडते हुए आया। पहले तो एक पल के लिए दिल मे खुशी की लहर दौड़ पडी क्योंकि विदेश मे अपने देश का हवाई जहाज़ आंखों के सामने था - जब वो बहुत ही नीचे यानी अपने सर पर ज़ोरदार आवाज़ से आया तो लगा कि ये अपने सर पर यकीनन गिरने ही वाला है। दिन भर यहां से दर्जनों प्लेन उतरते हैं और एक ही तरीके से सीधा उतर हैं मगर ये हमारा <img align="right" src="http://images.google.com/images?q=tbn:zx0IE1BkXFXIPM:http://www.math.tau.ac.il/~turkel/planecity.jpg" /> ऐर-इन्डिया कुछ ज़्यादा ही नीचे से उतरा - फिर खयाल आया आखिर अपने ही देश का प्लेन है, कैसे भी उतरे उसकी मर्ज़ी और शायद उसके पाइलट सरदारजी होंगे जो सबसे अलग ही उतर रहे थे।</p>
<p>पिछले सप्ताह हम सब लोग शारजाह छोड दुबई चले आए - हर दिन शारजाह से दुबई आते-जाते थक चुके थे। हमारी कम्पनी ने हम लोगों का Accommodation जो पिछले चार वर्षों से खूबसूरत शहर शारजाह मे था अब दुबई मे शिफ्ट कर दिया और वो भी शहर से दूर ऐरपोर्ट के पीछे जहां बस और टैक्सी भी नही, एकदम बडी बडी सडकें, दूर दूर तक होटल और खने पीने की दुकानें तक नही - हर तरफ बडे बडे आलिशान Villas यहां सब अमीर लोग रहते हैं और इनके बीच मे हम बेचारों को डाल दिया। ना साइबर केफे है ना रेस्टुरंट। हमारे एक मित्र जो अपनी फेम्ली के साथ शारजाह ही मे रहते हैं, उन्हों ने मुझ से मज़ाक मे पूछाः जब वहां कुछ नही तो शाम को आफिस से आकर घर पर क्या करते हो? मैं ने जवाब दियाः हवाई जहाज़ गिनते हैं, कौनसे देश का कितवां प्लेन है।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[फिर रमज़ान आया]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/09/23/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%9b%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sat, 23 Sep 2006 09:21:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[हर वर्ष दुबई मे शॉपिंग फेसटिवल मनाया ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर वर्ष दुबई मे शॉपिंग फेसटिवल मनाया जाता है और शारजाह मे रमज़ान का फेसटिवल मनाने की रिवायत है मानो मुखतलिफ फेसटिवलों को इस देश के सात राष्ट्रों ने आपस मे बांट रखा है। कोई भी फेसटिवल हो मकसद एक ही है पैसा कमाना और दबा कर कमाना।</p>
<p>आज रमज़ान का पहला दिन है, यहां पूरे शारजह शहर को दुल्हन की तरह सजा दिया, जगह जगह मेले भी लगे हैं और हर मेले मे वही चैनीज़ आइटम्स, कपडे, अनोखे सिगार, सिगरेट, झूले झमके वगैरह वगैरह। सुबह से शाम तक पूरे UAE मे खाने की दुकानों होटलों वगैरह सब बंद रहते हैं - सभी मुसलमानों को रोज़ा रखने का हुकम है और गैर मुस्लिम लोग सिर्फ अपने घर पर ही खा सकते हैं। रमज़ान का पूरा महीना होने तक अगर कोई रास्ते मे सडकों, पार्कों आदी जगहों मे कुछ खाया पिया तो उसे पुलिस पकड ले जाती है फिर जुर्माना भी मांगती है या फिर छोटी मोटी सज़ा भुगतनी पडेगी। गैर मुसलिम अगर फैमली वाला हो तो खैर मगर बैचलर्स लोग जिन्हें खाना पकाना नही आता और वोह लोग जो सिर्फ होटलों से खाते हैं, उन बेचारों को मुसलमानों की तरह शाम तक भूका रह कर होटलों के खुलने का इनतेज़ार करना पडेगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[भारत का उलटा तिरंगा ]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/15/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%89%e0%a4%b2%e0%a4%9f%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Tue, 15 Aug 2006 20:18:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[गलती किसकी?
आज भारत के स्वतंत्रता दिवस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गलती किसकी?</strong></p>
<p>आज भारत के स्वतंत्रता दिवस के शुभ मौके पर दुबई से छपने वाले अंग्रेज़ी अखबार <a href="http://www.gulfnews.com/supplements/india2006/index.html">Gulf News</a> के SPECIAL REPORT (मेगज़ीन) के 20 वें पन्ने पर छपा Thomas Cook का ऐड देखें जिस पर भारत का तिरंगा उलटा छापा है। कॉपी अटाच की होई है</p>
<p><strong><a href="http://shuaib.sitesled.com/11.jpg">तसवीर यहां पर  अटाच की है</a></strong></p>
<p>ये बात दिल्ली तक जाए। सब भारतियों से गुज़ारिश है के इसका चर्चा हर जगाह करें क्योंकि ये भारत की इज़्ज़त का सवाल है - एक इनटरनैशनाल शहर दुबई मे छपने वाला अखबार जिसमे सभी देश के लोग काम करते हैं और भारत के तिरंगे के साथ इतनी बडी गलती? ये हमसे बरदाश्त नही।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहला नशा]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/10/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b6%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 10 Aug 2006 12:55:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[हम तो अपनी जगह खडे थे मगर आस-पास की सभी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हम तो अपनी जगह खडे थे मगर आस-पास की सभी चीज़े घूम रही थीं। फिर लगा कि पैर भी डगमगाने लगे और धडाम से ज़मीन पर गिर पडे। यार दोसतों ने सहारा दिया और सोफे पर बिठाया। अजीब बेचैनी, पानी पीने को भी मन नही कर रहा, कोई सीधा बात करे तो उसे डांट कर कहते कि ज़बान संभाल के बात करो। फिर महसूस किया कि कुछ तो गड बड है हम शरीफ आदमी हैं और अचानक ऐसे अजीब दौरे परेशानी की बात है, इस से पहले कि हमारी आंख लग जाए – हम ने अपने फ़्लैट शारजाह जाने के लिए दुबारा खडे हुए तो दोसतों ने मना किया कि ऐसी हालत मे ना जऊ कल सवेरे चले जाना। इस हालत मे भी हमे याद आया कि कल शुक्रवार है और हमें कल एक घंटा पहले ड्यूटी पर जाना है यानी सुबह आठ बजे दोसतों को बताए बगैर हम फ़्लैट से बाहर निकले, लिफ्ट मे घुसते ही नीचे बैठ गए, कुछ देर बाद याद आया कि ग्रऊँड फलोर का बटन दबाया ही नही - बिलडिंग से बाहर निकल कर चौराहे पर लगी बडी सी घडी को डगमगाती आंखों से देखा तो रात के दो बज रहे थे। टैक्सी को इशारा किया तो कमबख्त हमें देखे बगैर निकल गया। ज़्यादा देर तक खडे रहने की हिम्मत ना रही, बैठने के लिए आस-पास नज़र दौडाई तो करीब ही एक टैक्सी खडी नज़र आई (हां वोह टैक्सी ही थी) ड्राईवर की इजाज़त के बगैर टैक्सी का दरवाज़ा ज़ोर से खोल कर अंदर बैठ गए तो ड्राईवर ने हमें गुस्से से घूरा और हमने हुकम दिया कि शहारजाह चलो। ड्राईवर हमारी हालत देख कर समझ गया कि कौन ऐसों के मूंह लगे। इसके बाद पता नही हम दुबई से किस तरह अपने फ़्लैट शहारजाह पहुंचे?</p>
<p>दुबई मे हमारे एक मित्र का जनम दिन था, पार्टी शार्टी का ऐलान किया। सब एक ही कम्पनी के थे और यहां UAE मे हम बेचलर्स को कभी कभी ही ऐसा मौका मिलता है कि सब मिल कर खुशी मनाएं वरना यहां किसी को भी अपने काम से हट कर फुरसत नही। और जब जनम दिन की पार्टी मे आने वाले सब एक ही कम्पनी के यार दोसत हों तो ज़बरदस्त हंगामा है। सबको मालूम है कि हम शरीफ आदमी पानी और जूस के सिवा कुछ नही पीते मगर कुछ शरीर मित्रों ने हमे औरेंज जूस मे वोडका मिला कर पिला दिया और ये दो दिन बाद पता चला जब सब दोस्त हमें देख कर हंस रहे थे।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[आज की ताज़ा खबर]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/08/08/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a5%9b%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Tue, 08 Aug 2006 08:18:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[अखबार का नाम &#8220;रोज़नामा इनकिलाब मुंबई]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal"><font size="3"><b><span>अखबार का नाम</span></b><span> "रोज़नामा <a target="_blank" href="http://inquilab.com" title="Urdu Newspaper from Mumbai">इनकिलाब</a> मुंबई"</span></font></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><b><span>भाषाः</span></b><span> उर्दू</span></font></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><b><span>बडी हेडलाईनः</span></b><span> "इज़राईल पर हिज़बुल्लाह का कामयाबतरीन हमला"</span></font></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><b><span>छोटी हेडलाईनः</span></b><span> "हिज़बुल्लाह के कामयाब हमले से तलअबिब झल्ला उठा"</span></font></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><span></span></font></p>
<p class="MsoNormal"><b><font size="3"><span>हमारी टिप्पणीः</span></font></b></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><span>शायद मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी सुरखी लिखी है - और क्यों ना लिखे अखबार मुसलमानों का और पढने वाले मुसलमान - ज़ाहिर सी बात है हिज़बुल्लाह दूसरों के लिए आतंकवादी और मुसलमानों के लिए मुजाहिद का मुकाम रखते हैं। मगर एक अखबार किया किसी की तरफदारी कर सकता है अखबार का काम होता है कि बगैर किसी की तरफदारी किए सिर्फ खबरें छापे ना कि किसी को खुश करने के लिए। चूंके ये अखबार इन्टरनेट पर गिफ फॉरमेट मे खबरें छापता है जिसकी वजा से उसकी खबरों का यहां लिंक नही दिया जासकता - अभी थोडे दिन पहले भी इसी अखबार की एक खबर पर हम चोंक पडे सुरखी थी "इज़राईल के हमले मे पांच फिलिस्तीनी शहीद" किया ये अखबार बता सकता है कि "शहीद" किसको कहते हैं? फिलिस्तीनियों ने ऐसा कौनसा कारनामा कर दिखाया कि उन्हें शहीद के अलकाब से नवाज़ें। जबकि इस्लाम मे शहीद उसको कहते हैं जो इस्लाम के लिए लडते हुवे मरे। मगर फिलिस्तीन और इज़राईल दोनों आपस मे पुराने दुश्मन एक-दूसरे को मारते हैं - यही अगर फिलिस्तीनी इज़राईलियों को मारे तो वोह सिर्फ मरे और इज़राईल फिलिसतीनियों को मारे तो वोह शहीद। किया ये फिलिसतीनी इस्लाम के लिए लड रहे हैं जिन्हें इस्लाम किया चिज़ पता ही नही।</span></font></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><span></span></font></p>
<p class="MsoNormal"><font size="3"><span>इसी अखबार मे ऐसी बहुत सारी खबरें गुज़र चुकी हैं जो शायद सिर्फ मुसलमानों को खुश करने के लिए लिखा जाता है। हम ने भी ज़मानों से अखबारों मे काम किया है - अखबार किसी की तरफदारी नही कर सकता उसे बगैर जानिबदारी के खबरें छापना है। मेरा पूछना ये था कि कुछ खास लोगों के लिए खबरें छापे तो किया वोह अखबार है?</span></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[टॉप ब्लॉगर]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/27/%e0%a4%9f%e0%a5%89%e0%a4%aa-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 27 Jul 2006 14:48:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[ब्लॉगिंग एक ऐसा नशा जैसे चंद लोगों को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लॉगिंग एक ऐसा नशा जैसे चंद लोगों को खाने के फोरन बाद सिगरेट पीना होता है और ब्लॉगर का नशा ऐसा कि अभी अपना लेख पोस्ट किया तो जल्दी से पन्ने को रि-फ्रेश कर के भी देख लिया कि शायद कोई टिप्पणी आगई हो :<font face="Times New Roman">p </font>चंद ब्लॉगर हमारी तरह भी होते हैं जो साइबर केफे जा कर पोस्ट करते हैं<font face="Times New Roman">, </font>आज पोस्ट किया तो अपने ब्लॉग का मुंह देखने के लिए दूसरे दिन का इनतेज़ार करना पडता है कि कब दफतर से छुटटी हो और साइबर केफे की तरफ डोड लगाएं <font face="Times New Roman">;) </font><font face="Times New Roman"> </font></p>
<p class="MsoNormal">मानो आज हम भी टॉप के ब्लॉगर बन गए :) अरे भाई पिछले तीन वर्षों से ब्लॉगिंग कर रहे हैं तो टॉप ब्लॉगर ही कहलाएंगे ना :<font face="Times New Roman">p </font>ये बात अलग है कि ब्लॉगिंग की ए बी सी डी नही मालूम मगर कुछ ना कुछ लिख कर पोस्ट तो करते हैं। तीन वर्ष पहले जब हमें ब्लॉग किया चीज़ पता ही नही था<font face="Times New Roman">, </font>तब हम साइबर केफे मे बैठ कर नेट की रंगीन दुनिया मे खोजाते थे और जब साइबर केफे वाला आकर कहता "और बैठना है आपको<font face="Times New Roman">?" </font>तब हम अपनी घडी देख कर कुर्सी से उछल पडते कि "अरे बापरे - पिछले चार घंटे से हम इन्टरनेट मे ऐसे खो<font face="Times New Roman"> </font>गए कि वकत का पता ही नही और आए थे सिर्फ इ-मेल चेक करने और लिंक से लिंक मिलाते कहीं और निकल जाते। आआह ---- वोह दिन और आज का दिन बहुत फरक है क्योंकि पहले हम नेट पर बेकार ही अनजानों से चैट करते थे या फिर रंगीन वैब साईट्स की रंगीनियों मे खोजाते थे। दोसतों की इ-मेल का जवाब लिखने के लिए फुरसत नही थी और अब लम्बी लम्बी पोस्ट लिखने मे चैम्पिन बन गए। अभी वाशिंग मशीन मे कपडे पडे हैं जिसे दुबारा घुमाने के लिए 8वीं फलोर (अपने फ्लैट) जाना था मगर हम तो अपनी बिलडिंग के करीब से गुज़रते हुए सीधा साइबर केफे पहुंच गए (ब्लॉगिंग का नशा) - दफतर मे हमारा बॉस इधर उधर निकल जाता है तब हम इन्टरनेट खोल लेते हैं मगर यहां हमारा नशा और भी बढ जाता है क्योंकि ब्लॉगर तो किया हम किसी का भी ब्लॉग खोल नही सकते तो हमारा ब्लॉग कैसे देखे<font face="Times New Roman">? </font>सिर्फ शाम के 7 बजने का इनतेज़ार रहता है और दफतर से सीधा साइबर केफे :<font face="Times New Roman">D </font>अच्छा किया जो इन्टरनेट पर ब्लॉगिंग का सिलसिला चालू हुवा वरना हम अभी तक इन्टरनेट की दूसरी रंगीनियों मे खोए रहते :<font face="Times New Roman">P :D :) </font></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[जापानी कवाली]]></title>
<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/07/03/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 03 Jul 2006 10:44:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमारे पडोस की बिलडिंग मे एक अपने मित्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे पडोस की बिलडिंग मे एक अपने मित्र से मिलने गया तो उसके सामने वाले फ़्लैट से नुसरत फतेह अली खान की चीखें सुनाई दे रही थीं, मेरा मतलब है Classical राग की आवाज़ें। जब उनका दरवाज़ा खुला तो चार जापानी बाहर निकले, मैं इन्हें जानता हूं वो सब एक जापानी रेसटुरंट मे काम करते हैं जो करीब ही है। दूसरे दिन भी मुझे अपने उस मित्र के फ़्लैट पर जाना हुवा तो तब भी उन जापानियों के फ़्लैट से नुसरत की चीखें सुनाई दी और उस फ़्लैट मे सिर्फ जापानी लोग ही रहते हैं उनके अलावा दूसरा कोई पाकिस्तानी या भारती नहीं है। उन जापानियों को अपनी जापानी और अंग्रेज़ी भाषा के सिवा दूसरी कोई भाषा नहीं मालूम। मुझे याद आया एक बार नुसरत फतेह अली खान अपनी कवाली गाने के लिए बेंगलौर आऐ तब एक उर्दू अखबार ने लिखा थाः नुसरत ने चार बार जापान जाकर जापानियों को भी अपनी कवाली सुनाई थी और जापानी लोग नुसरत की कवाली सुनने के लिए अपने जूते उतार कर अदब से बैठते थे।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[हमारा मौसम]]></title>
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<pubDate>Fri, 30 Jun 2006 09:13:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[UAE, दुनिया के सबसे गरम देशों मे से एक है, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>UAE, दुनिया के सबसे गरम देशों मे से एक है, इस वकत यहां 45 डिगरी और साथ में तेज़ गरम हवा के झोंके बरदाश्त से बाहर है फिर भी यहां रशय, फ्रांस, हॉलेंड और दूसरे थंडे देशों के हज़ारों रोज़गार और कारोबारी लोग रहते हैं पता नहीं वो कैसे यहां की गरमी बरदाश्त करते होंगे? 45 डिगरी कोई बडी बात नहीं, कभी कभी काटा 50 डिगरी के ऊपर भी चला जाता है, बडी और गम्भीर बात तो यहां की गरम हवा है। बीस कदम आगे चलो तो आदमी पसीने मे पूरा भीग जायेगा, दिन मे दो बार नहाऐं तो भी कम है और उस पर से नलों मे पानी भी खवलता हुवा आयेगा। UAE के सिर्फ दो मौसम होते हैं एक सम्मर दूसरा तेज़ और तूफानी हवाऊँ का मगर यहां कभी बरसात तो दूर की बात छींटे और बोछाडें तक नहीं टपकतीं। वो तो शुक्र है पिछले वर्ष सोनामी के वकत यहां अचानक चंद बूंदें टपक पडीं वरना बरसात और वो भी दुबाई में, कभी नहीं। कभी कभी आसमान को देख कर लगता है कि आज बरसात होगी, और हमेशा ऐसा ही होता कि बरसात तो किया एक बूंद भी नहीं टपकती।<br />
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ये बरसात के आसार नही बलकि आस पास रेगिसतान मे ज़बरदस्त आंधी की वजे से दुबई के कुछ इलाके धूल - मिट्टी की लिपेट मे हैं।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[दुबाई मे हंगामा]]></title>
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<pubDate>Sun, 18 Jun 2006 10:00:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>shuaib</dc:creator>
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<description><![CDATA[बालिवूड के सभी सितारे इस वकत दुबाई मे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बालिवूड के सभी सितारे इस वकत दुबाई मे जगमगा रहे हैं। यहां तो हर सप्ताह बालिवूड से कोई ना कोई आता रहता है और परदेस मे रहने वाले भारतियों को खुश करके लाखों रुपया लूट लेजाता है। मगर इस बार बालिवूड के सभी सितारे एक साथ दुबाई मे नज़र आने लगे, यहां के भारतियों को लूटने और खुश करने के लिए नहीं बल्कि <a href="http://server1.msn.co.in/sp06/IIFA2006/static/weekend.asp">IIFA एवार्डस</a> लूटने आऐ हैं। अमिताभ से लेकर फरदीन तक, आश से लेकर रानी तक सब यहीं हैं। दो वर्ष पहले Zee एवार्डस के वकत भी यहां ऐसी ही रोनक लगी थी जो अब दुबारा देखने को मिल रही है। वैसे भारती तो बालिवूड के दीवाने मगर पाकिस्तानी ज़रूरत से कुछ ज़ियादा ही दीवाने हैं।</p>
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