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	<title>नरेश &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/नरेश/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "नरेश"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 16:49:40 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[सच्चा साधु]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=180</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 14:59:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[गौतम बुद्ध के एक शिष्य पूर्ण ने सीमाप्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गौतम बुद्ध के एक शिष्य पूर्ण ने सीमाप्रांत में धर्म प्रचार करने की अनुमति मांगी। बुद्ध ने कहा, 'उस प्रांत के लोग अत्यंत कठोर तथा क्रूर हैं। वे तुम्हें गाली देंगे।' पूर्ण ने कहा, 'मैं समझूंगा वे भले लोग हैं कि वे मुझे थप्पड़-घूंसे नहीं मारते।' बुद्ध बोले, 'यदि वे तुम्हें थप्पड़-घूंसे मारने लगे तो...।' पूर्ण ने कहा, 'वे शस्त्र-प्रहार नहीं करेंगे इस कारण मैं उन्हें दयालु मानूंगा।' </p>
<p>इस पर बुद्ध बोले, 'यदि वे शस्त्र प्रहार करें तो...?' पूर्ण ने फिर उसी तरह जवाब दिया, 'अगर वे मुझे मार नहीं देंगे तो मुझे इसमें उनकी कृपा ही दिखेगी।' बुद्ध बोले, 'ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि वे तुम्हारा वध नहीं करेंगे।' पूर्ण ने उत्तर दिया, 'यह शरीर रोगों का घर है। आत्मघात पाप है इसलिए जीवन धारण करना पड़ता है। मुझे मारकर वे मेरे ऊपर कृपा ही करेंगे।' बुद्ध प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे धर्मप्रचार की अनुमति देते हुए कहा, 'जो किसी दशा में दोष नहीं देखता वही सच्चा साधु है।' </p>
<p><em>संकलन: उमेश प्रसाद सिंह<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
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<title><![CDATA[हंस की पहचान]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 03:36:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक धनी किसान था। उसे विरासत में खूब सं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक धनी किसान था। उसे विरासत में खूब संपत्ति मिली थी। ज्यादा धन-संपदा ने उसे आलसी बना दिया। वह सारा दिन खाली बैठा हुक्का गुड़गुड़ाता रहता था। उसकी लापरवाही का नौकर-चाकर नाजायज फायदा उठाते थे। उसके सगे-संबंधी भी उसका माल साफ करने में लगे रहते थे। एक बार किसान का एक पुराना मित्र उससे मिलने आया। वह उसके घर की अराजकता देख दुखी हुआ। उसने किसान को समझाने की कोशिश की लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा। एक दिन उसने कहा कि वह उसे एक ऐसे महात्मा के पास ले जाएगा जो अमीर होने का तरीका बताते हैं। किसान के भीतर उत्सुकता जागी। वह महात्मा से मिलने को तैयार हो गया। महात्मा ने बताया, 'हर रोज सूर्योदय से पहले एक हंस आता है जो किसी के देखने से पहले ही गायब हो जाता है। जो इस हंस को देख लेता है उसका धन निरंतर बढ़ता जाता है।' </p>
<p>अगले दिन किसान सूर्योदय से पहले उठा और हंस को खोजने खलिहान में गया। उसने देखा कि उसका एक संबंधी बोरे में अनाज भरकर ले जा रहा है। किसान ने उसे पकड़ लिया। वह रिश्तेदार बेहद लज्जित हुआ और क्षमा मांगने लगा। तब वह गौशाला में पहुंचा। वहां उसका एक नौकर दूध चुरा रहा था। किसान ने उसे फटकारा। उसने पाया कि वहां बेहद गंदगी है। उसने नौकरों को नींद से जगाया और उन्हें काम करने की हिदायत दी। दूसरे दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस तरह किसान रोज हंस की खोज में जल्दी उठता। इस कारण सारे नौकर सचेत हो गए और मुस्तैदी से काम करने लगे। जो रिश्तेदार गड़बड़ी कर रहे थे वे भी सुधर गए। </p>
<p>जल्दी उठने और घूमने-फिरने से किसान का स्वास्थ्य भी ठीक हो गया। इस प्रकार धन तो बढ़ने लगा, लेकिन हंस नहीं दिखा। इस बात की शिकायत करने जब वह महात्मा के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा, 'तुम्हें हंस के दर्शन तो हो गए, पर तुम उसे पहचान नहीं पाए। वह हंस है परिश्रम। तुमने परिश्रम किया, जिसका लाभ अब तुम्हें मिलने लगा है।' </p>
<p><em>संकलन: त्रिलोक चंद जैन<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
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<title><![CDATA[प्रकर्ती के कुछ छायाचित्र]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=170</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 17:23:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://pryas.files.wordpress.com/2008/06/flower.jpg"><img src="http://pryas.wordpress.com/files/2008/06/flower.jpg?w=300" alt="Flower" width="300" height="231" class="alignnone size-medium wp-image-169" /></a></p>
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<title><![CDATA[अर्जुन का अहंकार]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=168</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 12:27:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, 'आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?' ब्राह्मण ने जवाब दिया, 'मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।' </p>
<p>' आपके शत्रु कौन हैं?' अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, 'मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।' </p>
<p>' आपका तीसरा शत्रु कौन है?' अर्जुन ने पूछा। </p>
<p>' वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया। और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।' यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, 'मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।' </p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
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<title><![CDATA[अकबर-बीरबल की पहली मुलाकात]]></title>
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<pubDate>Thu, 15 Nov 2007 09:19:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[अकबर को शिकार का बहुत शौक था. वे किसी भी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अकबर को शिकार का बहुत शौक था. वे किसी भी तरह शिकार के लिए समय निकल ही लेते थे. बाद में वे अपने समय के बहुत ही अच्छे घुड़सवार और शिकरी भी कहलाये. एक बार राजा अकबर शिकार के लिए निकले, घोडे पर सरपट दौड़ते हुए उन्हें पता ही नहीं चला और केवल कुछ सिपाहियों को छोड़ कर बाकी सेना पीछे रह गई. शाम घिर आई थी, सभी भूखे और प्यासे थे, और समझ गए थे की वो रास्ता भटक गए हैं. राजा को समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरफ़ जाएं.</p>
<p>कुछ दूर जाने पर उन्हें एक तिराहा नज़र आया. राजा बहुत खुश हुए चलो अब तो किसी तरह वे अपनी राजधानी पहुँच ही जायेंगे. लेकिन जाएं तो जायें किस तरफ़. राजा उलझन में थे. वे सभी सोच में थे किंतु कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी. तभी उन्होंने देखा कि एक लड़का उन्हें सड़क के किनारे खड़ा-खडा घूर रहा है. सैनिकों ने यह देखा तो उसे पकड़ कर राजा के सामने पेश किया. राजा ने कड़कती आवाज़ में पूछा, "ऐ लड़के, आगरा के लिए कौन सी सड़क जाती है"? लड़का मुस्कुराया और कहा, "जनाब, ये सड़क चल नहीं सकती तो ये आगरा कैसे जायेगी". महाराज जाना तो आपको ही पड़ेगा और यह कहकर वह खिलखिलाकर हंस पड़ा.</p>
<p>सभी सैनिक मौन खड़े थे, वे राजा के गुस्से से वाकिफ थे. लड़का फ़िर बोला," जनाब, लोग चलते हैं, रास्ते नहीं". यह सुनकर इस बार राजा मुस्कुराया और कहा," नहीं, तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा नाम क्या है, अकबर ने पूछा. मेरा नाम महेश दास है महाराज, लड़के ने उत्तर दिया, और आप कौन हैं? अकबर ने अपनी अंगूठी निकाल कर महेश दास को देते हुए कहा, "तुम महाराजा अकबर - हिंदुस्तान के सम्राट से बात कर रहे हो". मुझे निडर लोग पसंद हैं. तुम मेरे दरबार में आना और मुझे ये अंगूठी दिखाना. ये अंगूठी देख कर मैं तुम्हें पहचान लूंगा. अब तुम मुझे बताओ कि मैं किस रास्ते पर चलूँ ताकि मैं आगरा पहुँच जाऊं.</p>
<p>महेश दास ने सिर झुका कर आगरा का रास्ता बताया और जाते हुए हिंदुस्तान के सम्राट को देखता रहा.</p>
<p>और इस तरह अकबर भविष्य के बीरबल से मिला.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[चौबीसवीं पुतली - करुणावती]]></title>
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<pubDate>Sun, 04 Nov 2007 03:11:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[चौबीसवीं पुतली करुणावती ने जो कथा कही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चौबीसवीं पुतली करुणावती ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य का सारा समय ही अपनी प्रजा के दुखों का निवारण करने में बीतता था। प्रजा की किसी भी समस्या को वे अनदेखा नहीं करते थे। सारी समस्याओं की जानकारी उन्हें रहे, इसलिए वे भेष बदलकर रात में पूरे राज्य में, आज किसी हिस्से में, कल किसी और में घूमा करते थे। उनकी इस आदत का पता चोर-डाकुओं को भी था, इसलिए अपराध की घटनाएँ छिट-पुट ही हुआ करती थीं। विक्रम चाहते थे कि अपराध बिल्कुल मिट जाए ताकि लोग निर्भय होकर एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करें तथा चैन की नींद सो सकें। ऐसे ही विक्रम एक रात वेश बदलकर राज्य के एक हिस्से में घूम रहे थे कि उन्हें एक बड़े भवन से लटकता एक कमन्द नज़र आया। इस कमन्द के सहारे ज़रुर कोई चोर ही ऊपर की मंज़िल तक गया होगा, यह सोचकर वे कमन्द के सहारे ऊपर पहुँचे।  </p>
<p>उन्होंने अपनी तलवार हाथों में ले ली ताकि सामना होने पर चोर को मौत के घाट उतार सकें। तभी उनके कानों में स्री की धीमी आवाज़ पड़ी "तो चोर कोई स्री है", यह सोचकर वे उस कमरे की दीवार से सटकर खड़े हो गए जहाँ से आवाज़ आ रही थी। कोई स्री किसी से बगल वाले कमरे में जाकर किसी का वध करने को कह रही थी। उसका कहना था कि बिना उस आदमी का वध किए हुए किसी अन्य के साथ उसका सम्बन्ध रखना असम्भव है। तभी एक पुरुष स्वर बोला कि वह लुटेरा अवश्य है, मगर किसी निरपराध व्यक्ति की जान लेना उसके लिए सम्भव नही है। वह स्री को अपने साथ किसी सुदूर स्थान जाने के लिए कह रहा था और उसके विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था कि उसके पास इतना अधिक धन है कि बाकी बची ज़िन्दगी वे दोनों आराम से बसर कर लेंगे। वह स्री अन्त में उससे दूसरे दिन आने के लिए बोली, क्योंकि उसे धन बटोरने में कम से कम चौबीस घंटे लग जाते।  </p>
<p>राजा समझ गए कि पुरुष उस स्री का प्रेमी है तथा स्री उस सेठ की पत्नी है जिसका यह भवन है। सेठ बगल वाले कमरे में सो रहा है और सेठानी उसके वध के लिए अपने प्रेमी को उकसा रही थी। राजा कमन्द पकडकर नीचे आ गए और उस प्रेमी का इन्तज़ार करने लगे। थोड़ी देर बाद सेठानी का प्रेमी कमन्द से नीचे आया तो राजा ने अपनी तलवार उसकी गर्दन पर रख दी तथा उसे बता दिया कि उसके सामने विक्रम खड़े हैं। वह आदमी डर से थर-थर काँपने लगा और प्राण दण्ड के भय से उसकी घिघ्घी बँध गई। जब राजा ने उसे सच बताने पर मृत्यु दण्ड न देने का वायदा किया तो उसने अपनी कहानी इस प्रकार बताई-</p>
<p>"मैं बचपन से ही उससे प्रेम करता था तथा उसके साथ विवाह के सपने संजोए हुए था। मेरे पास भी बहुत सारा धन था क्योंकि मेरे पिता एक बहुत ही बड़े व्यापारी थे। लेकिन मेरे सुखी भविष्य के सारे सपने धरे-के-धरे रह गए। एक दिन मेरे पिताजी का धन से भरा जहाज समुद्री डाकुओं ने लूट लिया। लूट की खबर पाते ही मेरे पिताजी के दिल को ऐसा धक्का लगा कि उनके प्राण निकल गए। हम लोग कंगाल हो गाए। मैं अपनी तबाही का कारण उन समुद्री डाकुओं को मानकर उनसे बदला लेने निकल पड़ा। कई वर्षों तक ठोकर खाने के बाद मुझे उनका पता चल ही गया। मैंने बहुत मुश्किल से उनका विश्वास जीता तथा उनके दल में शामिल हो गया। अवसर पाते ही मैं किसी एक का वध कर देता। एक-एक करके मैंने पूरे दल का सफाया कर दिया और लूट से जो धन उन्होंने एकत्र किया था वह लेकर अपने घर वापस चला आया।  </p>
<p>घर आकर मुझे पता चला कि एक धनी सेठ से मेरी प्रेमिका का विवाह हो गया और वह अपने पति के साथ चली गई। मेरे सारे सपने बिखर गए। एक दिन उसके मायके आने की खबर मुझे मिली तो मैं खुश हो गया। वह आकर मुझसे मिलने लगी और मैंने सारा वृतान्त उसे बता दिया। एक दिन वह मुझसे मिली तो उसने कहा कि उसे मेरे पास बहुत सारा धन होने की बात पर तभी विश्वास होगा जब मैं नौलखा हार उसके गले में डाल दूँ। मैं नौलखा हार लेकर गया। तब तक वह पति के पास चली गई थी। मैंने नौलखा हार लाकर उसे पति के घर में पहना दिया तो उसने अपने पति की हत्या करने को मुझे उकसाया। मैंने उसका कहने नहीं माना क्योंकि किसी निरपराध की हत्या अपने हाथों से करना मैं भयानक पाप समझता हूँ।"</p>
<p>राजा विक्रमादित्य ने सच बोलने के लिए उसकी तारीफ की और समुद्री डाकुओं का सफाया करने के लिए उसका कंधा थपथपाया। उन्होंने उसे त्रिया चरित्र नहीं समझ पाने कि लिए डाँटा। उन्होंने कहा कि सच्ची प्रेमिकाएँ प्रेमी से प्रेम करती हैं उसके धन से नहीं। उसकी प्रेमिका ने उसकी प्रतीक्षा नहीं की और सम्पन्न व्यक्ति से शादी कर ली। दुबारा उससे भेंट होने पर पति से द्रोह करने से नहीं हिचकिचाई। नौलखा हार प्राप्त कर लेने के बाद भी उसका विश्वास करके उसके साथ चलने को तैयार नहीं हुई। उलटे उसके मना करने पर भी उससे निरपराध पति की हत्या करवाने को तैयार बैठी है। ऐसी निष्ठुर तथा चरित्रहीन स्री से प्रेम सिर्फ विनाश की ओर ले जाएगा।</p>
<p>वह आदमी रोता हुआ राजा के चरणों में गिर पड़ा तथा अपना अपराध क्षमा करने के लिए प्रार्थना करने लगा। राजा ने मृत्युदण्ड के बदले उसे वीरता और सत्यवादिता के लिए ढेरों पुरस्कार दिए। उस आदमी की आँखें खुल चुकी थीं।</p>
<p>दूसरे दिन रात को उस प्रेमी का भेष धरकर वे कमन्द के सहारे उसकी प्रेमिका के पास पहुँचे। उनके पहुँचते ही उस स्री ने स्वर्णाभूषणों की बड़ी सी थैली उन्हें अपना प्रेमी समझकर पकड़ा दी और बोली कि उसने विष खिलाकर सेठ को मार दिया और सारे स्वर्णाभूषण और हीरे जवाहरात चुनकर इस थैली में भर लिए। जब राजा कुछ नहीं बोले तो उसे शक हुआ और उसने नकली दाढ़ी-मूँछ नोच ली। किसी अन्य पुरुष को पाकर "चोर-चोर" चिल्लाने लगी तथा राजा को अपने पति का हत्यारा बताकर विलाप करने लगी। राजा के सिपाही और नगर कोतवाल नीचे छिपे हुए थे। वे दौड़कर आए और राजा के आदेश पर उस हत्यारी चरित्रहीन स्री को गिरफ्तार कर लिया गया। उस स्री को समझते देर नहीं लगी कि भेष बदलकर आधा हुआ पुरुष खुद विक्रम थे। उसने झट से विष की शीशी निकाली और विषपान कर लिया। </p>
<p>सौजन्य : <a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/snbts024.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[तेइसवीं पुतली - धर्मवती]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/11/02/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Fri, 02 Nov 2007 08:43:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[तेइसवीं पुतली जिसका नाम धर्मवती था, ने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तेइसवीं पुतली जिसका नाम धर्मवती था, ने इस प्रकार कथा कही- एक बार राजा विक्रमादित्य दरबार में बैठे थे और दरबारियों से बातचीत कर रहे थे। बातचीत के क्रम में दरबारीयों में इस बात पर बहस छिड़ गई कि मनुष्य जन्म से बड़ा होता है या कर्म से। बहस का अन्त नहीं हो रहा था, क्योंकि दरबारियों के दो गुट हो चुके थे। एक कहता था कि मनुष्य जन्म से बड़ा होता है क्योंकि मनुष्य का जन्म उसके पूर्वजन्मों का फल होता है। अच्छे संस्कार मनुष्य में वंशानुगत होते हैं जैसे राजा का बेटा राजा हो जाता है। उसका व्यवहार भी राजाओं की तरह रहता है। कुछ दरबारियों का मत था कि कर्म ही प्रधान है। अच्छे कुल में जन्मे व्यक्ति भी दुर्व्यसनों के आदी हो जाते हैं और मर्यादा के विरुद्ध कर्मों में लीन होकर पतन की ओर चले जाते हैं।  </p>
<p>अपने दुष्कर्मों और दुराचार के चलते कोई सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करते और सर्वत्र तिरस्कार पाते हैं। इस पर पहले गुट ने तर्क दिया कि मूल संस्कार नष्ट नहीं हो सकते हैं जैसे कमल का पौधा कीचड़ में रहकर भी अपने गुण नहीं खोता। गुलाब काँटों पर पैदा होकर भी अपनी सुगन्ध नहीं खोता और चन्दन के वृक्ष पर सर्पों का वास होने से भी चन्दन अपनी सुगनध और शीतलता बरकरार रखता है, कभी भी विषैला नहीं होता। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों द्वारा अपने को सही सिद्ध करने की कोशिश करते रहे। कोई भी अपना विचार बदलने को राज़ी नहीं था। विक्रम चुपचाप उनकी बहस का मज़ा ले रहे थे। जब उनकी बहस बहुत आगे बढ़ गई तो राजा ने उन्हें शान्त रहने का आदेश दिया और कहा कि वे प्रत्यक्ष उदाहरण द्वारा करेंगे।  </p>
<p>उन्होंने आदेश दिया कि जंगल से एक सिंह का बच्चा पकड़कर लाया जाए। तुरन्त कुछ शिकारी जंगल गए और एक सिंह का नवजात शावक उठाकर ले आए। उन्होंने एक गड़ेरिये को बुलाया और उस नवजात शावक को बकरी के बच्चों के साथ-साथ पालने को कहा। गड़ेरिये की समझ में कुछ नहीं आया, लेकिन राजा का आदेश मानकर वह शावक को ले गया। शावक की परवरिश बकरी के बच्चों के साथ होने लगी। वह भी भूख मिटाने के लिए बकरियों का दूध पीने लगा जब बकरी के बच्चे बड़ हुए तो घास और पत्तियाँ चरने लगे। शावक भी पत्तियाँ बड़े चाव से खाता। कुछ और बड़ा होने पर दूध तो वह पीता रहा, मगर घास और पत्तियाँ चाहकर भी नहीं खा पाता। एक दिन जब विक्रम ने उसे शावक का हाल बताने के लिए बुलाया तो उसने उन्हें बताया कि शेर का बच्चा एकदम बकरियों की तरह व्यवहार करता है।  </p>
<p>उसने राजा से विनती की कि उसे शावक को मांस खिलाने की अनुमति दी जाए, क्योंकि शावक को अब घास और पत्तियाँ अच्छी नहीं लगती हैं। विक्रम ने साफ़ मना कर दिया और कहा कि सिर्फ दूध पर उसका पालन पोषण किया जाए। गड़ेरिया उलझन में पड़ गया। उसकी समझ में नहीं आया कि महाराज एक मांसभक्षी प्राणी को शाकाहारी बनाने पर क्यों तुले हैं। वह घर लौट आया। शावक जो कि अब जवान होने लगा था सारा दिन बकरियों के साथ रहता और दूध पीता। कभी-कभी बहुत अधिक भूख लगने पर घास-पत्तियाँ भी खा लेता। अन्य बकरियों की तरह जब शाम में उसे दडबे की तरफ हाँका जाता तो चुपचाप सर झुकाए बढ़ जाता तथा बन्द होने पर कोई प्रतिरोध नहीं करता। एक दिन जब वह अन्य बकरियों के साथ चर रहा था तो पिंजरे में बन्द एक सिंह को लाया गया। सिंह को देखते ही सारी बकरियाँ डरकर भागने लगीं तो वह भी उनके साथ दुम दबाकर भाग गया। उसके बाद राजा ने गड़ेरियें को उसे स्वतंत्र रुप से रखने को कहा। भूख लगने पर उसने खरगोश का शिकार किया और अपनी भूख मिटाई।  </p>
<p>कुछ दिन स्वतंत्र रुप से रहने पर वह छोटे-छोटे जानवरों को मारकर खाने लगा। लेकिन गड़ेरिये के कहने पर पिंजरे में शान्तिपूर्वक बन्द हो जाता। कुछ दिनों बाद उसका बकरियों की तरह भीरु स्वभाव जाता रहा। एक दिन जब फिर से उसी शेर को जब उसके सामने लाया गया तो वह डरकर नहीं भागा। शेर की दहाड़ उसने सुनी तो वह भी पूरे स्वर से दहाड़ा। राजा अपने दरबारियों के साथ सब कुछ गौर से देख रहे थे। उन्होंने दरबारियों को कहा कि इन्सान में मूल प्रवृतियाँ शेर के बच्चे की तरह ही जन्म से होती हैं। अवसर पाकर वे प्रवृतियाँ स्वत: उजागर हो जाती हैं जैसे कि इस शावक के साथ हुआ। बकरियों के साथ रहते हुए उसकी सिंह वाली प्रवृति छिप गई थी, मगर स्वतंत्र रुप से विचरण करने पर अपने-आप प्रकट हो गई। उसे यह सब किसी ने नहीं सिखाया। लेकिन मनुष्य का सम्मान कर्म के अनुसार किया जाना चाहिए।  </p>
<p>सभी सहमत हो गए, मगर एक मन्त्री राजा की बातों से सहमत नहीं हुआ। उसका मानना था कि विक्रम राजकुल में पैदा होने के कारण ही राजा हुए अन्यथा सात जन्मों तक कर्म करने के बाद भी राजा नहीं होते। राजा मुस्कराकर रह गए। समय बीतता रहा। एक दिन उनके दरबार में एक नाविक सुन्दर फूल लेकर उपस्थित हुआ। फूल सचमुच विलक्षण था और लोगों ने पहली बार इतना सुन्दर लाल फूल देखा था। राजा फूल के उद्गम स्थल का पता लगाने भेज दिया। वे दोनों उस दिशा में नाव से बढ़ते गए जिधर से फूल बहकर आया था। नदी की धारा कहीं अत्यधिक सँकरी और तीव्र हो जाती थी, कहीं चट्टानों के ऊपर से बहती थी। काफी दुर्गम रास्ता था। बहते-बहते नाव उस जगह पहुँची जहाँ किनारे पर एक अद्भुत दृश्य था।  </p>
<p>एक बड़े पेड़ पर एक योगी उलटा लटका हुआ था और वह जंज़ीरों से जकडा हुआ था, जंज़ीरों की रगड़ से उसके शरीर पर कई गहरे घाव बन गए थे। उन घावों से रक्त चू रहा था जो नदी में गिरते ही रक्तवर्ण पुष्पों में बदल जाता था। कुछ दूरी पर ही कुछ साधु बैठे तपस्या में लीन थे। जब वे कुछ और फूल लेकर दरबार में वापस लौटे तो मंत्री ने राजा को सब कुछ बताया। तब विक्रम ने उसे समझाया कि उस उलटे लटके योगी को राजा समझो और अन्य साधनारत सन्यासी उसके दरबारी हुए। पूर्वजन्म का यह कर्म उन्हें राजा या दरबारी बनाता है। अब मन्त्री को राजा की बात समझ में आ गई। उसने मान लिया कि पूर्वजन्म के कर्म के फल के रुप में ही किसी को राजगद्दी मिलती है। </p>
<p>सौजन्य : <a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/snbts023.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[क्षणिकाएँ - जानवर]]></title>
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<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 07:03:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ द्वारा रचित। </p>
<p>- जानवर -<br />
(१)<br />
जानवर की कोख से<br />
जनते न देखा आदमी<br />
आदमी की नस्ल फिर क्यों<br />
जानवर होने लगी।</p>
<p>(२)<br />
गो पालतू है जानवर<br />
पर आप चौकन्ने रहें<br />
क्या पता किस वक़्त वो<br />
इन्सान बनना ठान ले।</p>
<p>(३)<br />
पड़ोसी मर गया, अब यह खबर अखबार देते हैं<br />
सोच लो किस तज़&#124; में हम ज़िन्दगी का बोझ ढोते हैं,<br />
अब तो मैं भी छोड़ता बिस्तर सुनो तस्दीक़ कर,<br />
नाम मेरा तो नहीं था कल ’निधन’ के पृष्ठ पर।</p>
<p><a href="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/K/KPSaxsena/kshanikayen.htm">साहित्य कुंज के आभार से</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बाइसवीं पुतली - अनुरोधवती]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/22/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 22 Oct 2007 08:29:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[अनुरोधवती नामक बाइसवीं पुतली ने जो कथ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अनुरोधवती</strong> नामक <strong>बाइसवीं पुतली </strong>ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य अद्भुत गुणग्राही थे। वे सच्चे कलाकारों का बहुत अधिक सम्मान करते थे तथा स्पष्टवादिता पसंद करते थे। उनके दरबार में योग्यता का सम्मान किया जाता था। चापलूसी जैसे दुर्गुण की उनके यहाँ कोई कद्र नहीं थी। यही सुनकर एक दिन एक युवक उनसे मिलने उनके द्वार तक आ पहुँचा। दरबार में महफिल सजी हुई थी और संगीत का दौर चल रहा था। वह युवक द्वार पर राजा की अनुमति का इंतज़ार करने लगा। वह युवक बहुत ही गुणी था। बहुत सारे शास्त्रों का ज्ञाता था। कई राज्यों में नौकरी कर चुका था। स्पष्टवक्ता होने के कारण उसके आश्रयदाताओं को वह धृष्ट नज़र आया, अत: हर जगह उसे नौकरी से निकाल दिया गया।  </p>
<p>इतनी ठोकरें खाने के बाद भी उसकी प्रकृति तथा व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आ सका। वह द्वार पर खड़ा था तभी उसके कान में वादन का स्वर पड़ा और वह बड़बड़ाया- "महफिल में बैठे हुए लोग मूर्ख हैं। संगीत का आनन्द उठा रहे है, मगर संगीत का जरा भी ज्ञान नहीं है। साज़िन्दा गलत राग बजाए जा रहा है, लेकिन कोई भी उसे मना नहीं कर रहा है।" उसकी बड़बड़ाहट द्वारपाल को स्पष्ट सुनाई पड़ी। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उसने उसको सम्भालकर टिप्पणी करने को कहा। उसने जब उस युवक को कहा कि महाराज विक्रमादित्य खुद महफिल में बैठे है और वे बहुत बड़े कला पारखी है तो युवक ने उपहास किया। उसने द्वारपाल को कहा कि वे कला प्रेमी हो सकते हैं, मगर कला पारखी नहीं, क्योंकि साजिन्दे का दोषपूर्ण वादन उनकी समझ में नहीं आ रहा है। उस युवक ने यह भी बता दिया कि वह साज़िन्दा किस तरफ बैठा हुआ है।  </p>
<p>अब द्वारपाल से नहीं रहा गया। उसने उस युवक से कहा कि उसे राजदण्ड मिलेगा, अगर उसकी बात सच साबित नहीं हुई। उस युवक ने उसे सच्चाई का पता लगाने के लिए कहा तथा बड़े ही आत्मविश्वास से कहा कि वह हर दण्ड भुगतने को तैयार है अगर यह बात सच नहीं साबित हुई। द्वारपाल अन्दर गया तथा राजा के कानों तक यह बात पहुँची। विक्रम ने तुरन्त आदेश किया कि वह युवक महफिल में पेश किया जाए। विक्रम के सामने भी उस युवक ने एक दिशा में इशारा करके कहा कि वहाँ एक वादक की ऊँगली दोषपूर्ण है। उस ओर बैठे सारे वादकों की ऊँगलियों का निरीक्षण किया जाने लगा। सचमुच एक वादक के अँगूठे का ऊपरी भाग कटा हुआ था और उसने उस अँगूठे पर पतली खाल चढ़ा रखी थी।  </p>
<p>राजा उस युवक के संगीत ज्ञान के कायल हो गए। तब उन्होंने उस युवक से उसका परिचय प्राप्त किया और अपने दरबार में उचित सम्मान देकर रख लिया। वह युवक सचमुच ही बड़ा ज्ञानी और कला मर्मज्ञ था। उसने समय-समय पर अपनी योग्यता का परिचय देकर राजा का दिल जीत लिया। एक दिन दरबार में एक अत्यंत रुपवती नर्त्तकी आई। उसके नृत्य का आयोजन हुआ और कुछ ही क्षणों में महफिल सज गई। वह युवक भी दरबारियों के बीच बैठा हुआ नृत्य और संगीत का आनन्द उठाने लगा। वह नर्त्तकी बहुत ही सधा हुआ नृत्य प्रस्तुत कर रही थी और दर्शक मुग्ध होकर रसास्वादन कर रहे थे। तभी न जाने कहाँ से एक भंवरा आ कर उसके वक्ष पर बैठ गया। नर्त्तकी नृत्य नहीं रोक सकती थी और न ही अपने हाथों से भंवरे को हटा सकती थी, क्योंकि भंगिमाएँ गड़बड़ हो जातीं। उसने बड़ी चतुरता से साँस अन्दर की ओर खींची तथा पूरे वेग से भंवरे पर छोड़ दी। अनायास निकले साँस के झौंके से भंवरा डर कर उड़ गया। क्षण भर की इस घटना को कोई भी न ताड़ सका, मगर उस युवक की आँखों ने सब कुछ देख लिया।  </p>
<p>वह "वाह! वाह!" करते उठा और अपने गले की मोतियों की माला उस नर्त्तकी के गले में डाल दी। सारे दरबारी स्तब्ध रह गए। अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा हो गई। राजा की उपस्थिति में दरबार में किसी और के द्वारा कोई पुरस्कार दिया जाना राजा का सबसे बड़ा अपमान माना जाता था। विक्रम को भी यह पसंद नहीं आया और उन्होंने उस युवक को इस धृष्टता के लिए कोई ठोस कारण देने को कहा। तब युवक ने राजा को भंवरे वाली सारी घटना बता दी। उसने कहा कि बिना नृत्य की एक भई भंगिमा को नष्ट किए, लय ताल के साथ सामंजस्य रखते हुए इस नर्त्तकी ने जिस सफ़ाई से भंवरे को उड़ाया वह पुरस्कार योग्य चेष्टा थी।  </p>
<p>उसे छोड़कर किसी और का ध्यान गया ही नहीं तो पुरस्कार कैसे मिलता। विक्रम ने नर्त्तकी से पूछा तो उसने उस युवक की बातों का समर्थन किया। विक्रम का क्रोध गायब हो गया और उन्होंने नर्त्तकी तथा उस युवक- दोनों की बहुत तारीफ की। अब उनकी नज़र में उस युवक का महत्व और बढ़ गया। जब भी कोई समाधान ढूँढना रहता उसकी बातों को ध्यान से सुना जाता तथा उसके परामर्श को गंभीरतापूर्वक लिया जाता।</p>
<p>एक बार दरबार में बुद्धि और संस्कार पर चर्चा छिड़ी। दरबारियों का कहना था कि संस्कार बुद्धि से आते है, पर वह युवक उनसे सहमत नहीं था। उसका कहना था कि सारे संस्कार वंशानुगत होते हैं। जब कोई मतैक्य नहीं हुआ तो विक्रम ने एक हल सोचा। उन्होंने नगर से दूर हटकर जंगल में एक महल बनवाया तथा महल में गूंगी और बहरी नौकरानियाँ नियुक्त कीं। एक-एक करके चार नवजात शिशुओं को उस महल में उन नौकरानियों की देखरेख में छोड़ दिया गया। उनमें से एक उनका, एक महामंत्री का, एक कोतवाल का तथा एक ब्राह्मण का पुत्र था। बारह वर्ष पश्चात् जब वे चारों दरबार में पेश किए गए तो विक्रम ने बारी-बारी से उनसे पूछा- "कुशल तो है?" चारों ने अलग-अलग जवाब दिए। राजा के पुत्र ने "सब कुशल है" कहा जबकि महामंत्री के पुत्र ने संसार को नश्वर बताते हुए कहा "आने वाले को जाना है तो कुशलता कैसी?" कोतवाल के पुत्र ने कहा कि चोर चोरी करते है और बदनामी निरपराध की होती है।  </p>
<p>ऐसी हालत में कुशलता की सोचना बेमानी है। सबसे अन्त में ब्राह्मण पुत्र का जवाब था कि आयु जब दिन-ब-दिन घटती जाती है तो कुशलता कैसी। चारों के जवाबों को सुनकर उस युवक की बातों की सच्चाई सामने आ गई। राजा का पुत्र निश्चिन्त भाव से सब कुछ कुशल मानता था और मंत्री के पुत्र ने तर्कपूर्ण उत्तर दिया। इसी तरह कोतवाल के पुत्र ने न्याय व्यवस्था की चर्चा की, जबकि ब्राह्मण पुत्र ने दार्शनिक उत्तर दिया। सब वंशानुगत संस्कारों के कारण हुआ। सबका पालन पोषण एक वातावरण में हुआ, लेकिन सबके विचारों में अपने संस्कारों के अनुसार भिन्नता आ गई। सभी दरबारियों ने मान लिया कि उस युवक का मानना बिल्कुल सही है।<br />
सौजन्य : <a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/snbts022.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[गुरू का सम्मान]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/20/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 09:49:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम में कई शिष्य थे। उनमें अरूणि गुरू का सबसे प्रिय शिष्य था। आश्रम के पास खेती की बहुत ज़मीन थी। खेतों में फसल लहलहा रही थी। एक दिन शाम को एकाएक घनघोर घटा घिर आई और थोडी देर में तेज वर्षा होने लगी। उस समय ज्यादातर शिष्य उठ कर चले गए थे। अरूणि गुरूदेव के पास बैठा था। गुरू धौम्य ने कहा, अरूणि तुम खेतों की तरफ चले जाओ और मेडों की जाँच कर लो। जहाँ कहीं से पानी बह रहा हो और मेड कमजोर हो तो वहाँ मिट्टी डाल कर ठीक कर देना। अरूणि चला गया। कई जगह मेड के ऊपर से पानी बह रहा था। उसने मिट्टी डाल कर ठीक किया। एक जगह मेड में बडा छेद हो गया था। उससे पानी तजी से बह रहा था। वह उस छेद को बंद करने के लिये मिट्टी का लौदां उठा-उठा कर भरने लगा, लेकिन ज्योंही एक लौंदा रखकर दुसरा लेने आता, पहले वाला लौंदा भी बह जाता। उसका बार-बार क प्रयास बेकार जा रहा था कि उसे एक उपाय सूझा। उसने मिट्टी का एक लौंदा उठाया और छेद को बंद करके स्व्यं मेड के सहारे वहीं लेट गया, जिससे पानी बहना बंद हो गया। रात होने लगी थी। अरूणि लौट कर आश्रम नहीं आया था, जिसकी वजह से गुरू को चिंता हो रही थी। वे कुछ शिष्यों को लेकर खेत की तरफ गये। खेत के पास पहुँच कर पुकारा, अरूणि तुम कहाँ हो। वह बोला, गुरूवर मैं यहाँ हूँ। गुरूवर उस जगह गए। उन्होंने देखा कि अरूणि मेड  से चिपटा हुआ है। गुरूदेव बोले, वत्स तुम्हें इस तरह यहाँ पडे रहने की जरूरत क्या थी&#124; तुम्हें कुछ हो जाता तो ...।</p>
<p>अरूणि बोले, गुरूवर, यदि मैं अपना कर्तव्य अधूरा छोड कर चला आता तो वह गुरू का अपमान होता। जहाँ तक कुछ होने की बात है तो जब तक गुरू का आशिर्वाद शिष्य के सिर पर है तब तक शिष्य को कुछ नहीं होगा। गुरू का दर्जा तो भगवान से बडा है। इस पर महर्षि बोले, वत्स, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने आज गुरू-शिष्य के संबधों की अनूठी मिसाल कायम की है जो हमेशा के लिये जनमानस में एक मिसाल बनी रहेगी। तुमने अंतिम परीक्षा पास कर ली है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[सम्पाती - धरमवीर भारती जी की एक कविता]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 05:26:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)</p>
<p>...यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की<br />
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:<br />
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-<br />
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख<br />
ताकि वे सनद रहें...<br />
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं<br />
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी</p>
<p>सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह<br />
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है<br />
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर<br />
बंद कर दिया है अब!</p>
<p>सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए<br />
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना</p>
<p>कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का<br />
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है<br />
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!<br />
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं<br />
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)</p>
<p>उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ<br />
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख<br />
क्योंकि वे सनद हैं<br />
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ</p>
<p>नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं<br />
वह मैं नहीं<br />
मेरा भाई था जटायु<br />
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से<br />
कौन है सीता?<br />
और किसको बचायें? क्यों?<br />
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे<br />
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर<br />
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं</p>
<p>...........................<br />
गुफा में शाँती है...<br />
...........................</p>
<p>कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार<br />
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है<br />
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं<br />
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं<br />
देखते नहीं ये<br />
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर<br />
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना...</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समस्या]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 04:12:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी सम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी समस्या दूर कर सकते हैं। सभी लोग जल्दी से जल्दी अपनी समस्या फकीर को बताकर उपाय जानना चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि हर कोई बोलने लगा और किसी को कुछ समझ में नहीं आया। अचानक फकीर चिल्लाए. 'खामोश'। सब चुप हो गए। फकीर ने कहा, "मैं सबकी समस्या दूर कर दूंगा। एक साथ बोलने के बजाय सब लोग एक-एक कागज पर अपनी समस्या लिख लाएं और मुझे दें।</p>
<p>कुछ ही देर में फकीर के सामने कागजों का ढेर लग गया। फकीर ने कागजों को एक टोकरी में रखा और सबसे गोला बनाकर बैठ ने को कहा। गोले के बीच में टोकरी रख दी।<br />
एक आदमी की तरफ इशारा करके कहा, "यहाँ से शुरू करके सब बारी-बारी से आएंगे और एक-एक कागज़ उठा लेंगें।" ध्यान रहे किसी को अपना कागज़ नहीं उठाना है। लोग एक-एक कर आए कागज उठा-उठा कर अपनी-अपनी जगह बैठ गए। फकीर ने कहा,"अब इस कागज़ में लिखी किसी दूसरे की समस्या पढो। अगर चाहो तो मैं तुम्हारी समस्या दूर कर दूँगा पर उसके बदले कागज़ पर लिखी समस्या तुम्हारी हो जाएगी। तुम्हें लगता है कि तुम्हारी समस्या बडी है तो उसे दूर करवाकर कागज़ पर लिखी दूसरे की छोटी-सी समस्या अपना लो। चाहो तो आपस में कागज़ बदल लो। जब तय कर लो कि अपनी समस्या के बदले कौन सी समस्या लोगे तब मेरे पास आ जाना।</p>
<p>लोगों ने जब कागज़ पर लिखी समस्या पढी तो वे घबरा गए। लोग एक दूसरे से कागज़ बदल-बदल कर पढ रहे और बार-बार उन्हें लगता कि उनकी समस्या तो जैसी है वैसी है, पर इस नई समस्या का सामना वे कैसे कर पाएंगे। कुछ देर में हर किसी को समझ में आ गया कि उनकी समस्या जैसी भी है उनके अपने जीवन का हिस्सा है और वे उसी का सामना कर सकते हैं। एक-एक कर के लोग चुपचाप वहाँ से चले गये।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बीसवीं पुतली - ज्ञानवती]]></title>
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<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 08:08:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[बीसवीं पुतली ज्ञानवती ने जो कथा सुनाई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बीसवीं पुतली ज्ञानवती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य सच्चे ज्ञान के बहुत बड़े पारखी थे तथा ज्ञानियों की बहुत कद्र करते थे। उन्होंने अपने दरबार में चुन-चुन कर विद्वानों, पंडितों, लेखकों और कलाकारों को जगह दे रखी थी तथा उनके अनुभव और ज्ञान का भरपूर सम्मान करते थे। एक दिन वे वन में किसी कारण विचरण कर रहे थे तो उनके कानों में दो आदमियों की बातचीत का कुछ अंश पड़ा। उनकी समझ में आ गया कि उनमें से एक ज्योतिषी है तथा उन्होंने चंदन का टीका लगाया और अन्तध्र्यान हो गए। ज्योतिषी अपने दोस्त को बोला- "मैंने ज्योतिष का पूरा ज्ञान अर्जित कर लिया है और अब मैं तुम्हारे भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सब कुछ स्पष्ट बता सकता हूँ।" </p>
<p>दूसरा उसकी बातों में कोई रुचि न लेता हुआ बोला- "तुम मेरे भूत और वर्तमान से पूरी तरह परिचित हो इसलिए सब कुछ बता सकते हो और अपने भविष्य के बारे में जानने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। अच्छा होता तुम अपना ज्ञान अपने तक ही सीमित रखते।" मगर ज्योतिषी रुकने वाला नहीं था। वह बोला- "इन बिखरी हुई हड्डियों को देख रहे है। मैं इन हड्डियों को देखते हुए बता सकता हूँ कि ये हड्डियाँ किस जानवर की हैं तथा जानवर के साथ क्या-क्या बीता।" लेकिन उसके दोस्त ने फिर भी उसकी बातों में अपनी रुचि नहीं जताई। तभी ज्योतिषी की नज़र ज़मीन पर पड़ी पद चिन्हों पर गई। उसने कहा- "ये पद चिन्ह किसी राजा के हैं और सत्यता की जाँच तुम खुद कर सकते हो। ज्योतिष के अनुसार राजा के पाँवों में ही प्राकृतिक रुप से कमल का चिन्ह होता है जो यहाँ स्पष्ट नज़र आ रहा है।"  </p>
<p>उसके दोस्त ने सोचा कि सत्यता की जाँच कर ही ली जाए, अन्यथा यह ज्योतिषी बोलता ही रहेगा। पद चिन्हों का अनुसरण करते-करते वे जंगल में अन्दर आते गए। जहाँ पद चिन्ह समाप्त होते थे वहाँ कुल्हाड़ी लिए एक लकड़हारा खड़ा था तथा कुल्हाड़ी से एक पेड़ काट रहा था। ज्योतिषी ने उसे अपने पाँव दिखाने को कहा। लकड़हारे ने अपने पाँव दिखाए तो उसका दिमाग चकरा गया। लकड़हारे के पाँवों पर प्राकृतिक रुप से कमल के चिन्ह थे। ज्योतिषी ने जब उससे उसका असली परिचय पूछा तो वह लकड़हारा बोला कि उसका जन्म ही एक लकड़हारे के घर हुआ है तथा वह कई पुश्तों से यही काम कर रहा है। ज्योतिषी सोच रहा था कि वह राजकुल का है तथा किसी परिस्थितिवश लकड़हारे का काम कर रहा है।  </p>
<p>अब उसका विश्वास अपने ज्योतिष ज्ञान से उठने लगा। उसका दोस्त उसका उपहास करने लगा तो वह चिढ़कर बोला- "चलो चलकर राजा विक्रमादित्य के पाँव देखते हैं। अगर उनके पाँवों पर कमल चिन्ह नहीं हुआ तो मैं समूचे ज्योतिष शास्र को झूठा समझूंगा और मान लूंगा कि मेरा ज्योतिष अध्ययन बेकार चला गया।" वे लकड़हारे को छोड़ उज्जैन नगरी को चल पड़े। काफी चलने के बाद राजमहल पहुँचे। राजकमल पहुँच कर उन्होंने विक्रमादित्य से मिलने की इच्छा जताई। जब विक्रम सामने आए तो उन्होंने उनसे अपना पैर दिखाने की प्रार्थना की। विक्रम का पैर देखकर ज्योतिषी सन्न रह गया। उनके पाँव भी साधारण मनुष्यों के पाँव जैसे थे। उन पर वैसी ही आड़ी-तिरछी रेखाएँ थीं। कोई कमल चिन्ह नहीं था। ज्योतिषी को अपने ज्योतिष ज्ञान पर नही, बल्कि पूरे ज्योतिष शास्र पर संदेह होने लगा। वह राजा से बोला- "ज्योतिष शास्र कहता है कि कमलचिन्ह जिसके पाँवों में मौजूद हों वह व्यक्ति राजा होगा ही मगर यह सरासर असत्य है।  </p>
<p>जिसके पाँवों पर मैनें ये चिन्ह देखे वह पुश्तैनी लकड़हारा है। दूर-दूर तक उसका सम्बन्ध किसी राजघराने से नहीं है। पेट भरने के लिए जी तोड़ मेहनत करता है तथा हर सुख-सुविधा से वंचित है। दूसरी ओर आप जैसा चक्रवत्तीं सम्राट है जिसके भाग्य में भोग करने वाली हर चीज़ है। जिसकी कीर्कित्त दूर-दूर तक फैली हुई है। आपको राजाओं का राजा कहा जाता है मगर आपके पाँवों में ऐसा कोई चिन्ह मौजूद नहीं है।" राजा को हँसी आ गई और उन्होंने पूछा- "क्या आपका विश्वास अपने ज्ञान तथा विद्या पर से उठ गया?" ज्योतिषी ने जवाब दिया- "बिल्कुल। मुझे अब रत्ती भर भी विश्वास नहीं रहा।" उसने राजा से नम्रतापूर्वक विदा लेते हुए अपने मित्र से चलने का इशारा किया। जब वह चलने को हुआ तो राजा ने उसे रुकने को कहा।  </p>
<p>दोनों ठिठक कर रुक गए। विक्रम ने एक चाकू मंगवाया तथा पैरों के तलवों को खुरचने लगे। खुरचने पर तलवों की चमड़ी उतर गई और अन्दर से कमल के चिन्ह स्पष्ट हो गए। ज्योतिषी को हतप्रभ देख विक्रम ने कहा- "हे ज्योतिषी महाराज, आपके ज्ञान में कोई कमी नहीं है। लेकिन आपका ज्ञान तब तक अधूरा रहेगा, जब तक आप अपने ज्ञान की डींगें हाँकेंगे और जब-तब उसकी जाँच करते रहेंगे। मैंने आपकी बातें सुन लीं थीं और मैं ही जंगल में लकड़हारे के वेश में आपसे मिला था। मैंने आपकी विद्वता की जाँच के लिए अपने पाँवों पर खाल चढ़ा ली थी, ताकि कमल की आकृति ढँक जाए। आपने सब कमल की आकृति नहीं देखी तो आपका विश्वास ही अपनी विद्या से उठ गया। यह अच्छी बात नहीं हैं।"</p>
<p>ज्योतिषी समझ गया राजा क्या कहना चाहते हैं। उसने तय कर लिया कि वह सच्चे ज्ञान की जाँच के भौंडे तरीकों से बचेगा तथा बड़बोलेपन से परहेज करेगा।</p>
<p><a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/snbts020.htm"><strong>सौजन्य</strong> : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
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<title><![CDATA[रुपरेखा - उन्नीसवीं पुतली]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/09/24/%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%89%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Mon, 24 Sep 2007 08:21:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[रुपरेखा नामक उन्नीसवीं पुतली ने जो कथ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रुपरेखा</strong> नामक उन्नीसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-</p>
<p>राजा विक्रमादित्य के दरबार में लोग अपनी समस्याएँ लेकर न्याय के लिए तो आते ही थे कभी-कभी उन प्रश्नों को लेकर भी उपस्थित होते थे जिनका कोई समाधान उन्हें नहीं सूझता था। विक्रम उन प्रश्नों का ऐसा सटीक हल निकालते थे कि प्रश्नकर्त्ता पूर्ण सन्तुष्ट हो जाता था। ऐसे ही एक टेढ़े प्रश्न को लेकर एक दिन दो तपस्वी दरबार में आए और उन्होंने विक्रम को अपने प्रश्न का उत्तर देने की विनती की। उनमें से एक का मानना था कि मनुष्य का मन ही उसके सारे क्रिया-कलाप पर नियंत्रण रखता है और मनुष्य कभी भी अपने मन के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता है। दूसरा उसके मत से सहमत नहीं था। उसका कहना था कि मनुष्य का ज्ञान उसके सारे क्रिया-कलाप नियंत्रित करता है। मन भी ज्ञान का दास है और वह भी ज्ञान द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने को बाध्य है।</p>
<p>राजा विक्रमादित्य ने उनके विवाद के विषय को गौर से सुना पर तुरन्त उस विषय पर अपना कोई निर्णय नहीं दे पाए। उन्होंने उन दोनों तपस्वियों को कुछ समय बाद आने को कहा। जब वे चले गए तो विक्रम उनके प्रश्न के बारे में सोचने लगे जो सचमुच ही बहुत टेढ़ा था। उन्होंने एक पल सोचा कि मनुष्य का मन सचमुच बहुत चंचल होता है और उसके वशीभूत होकर मनुष्य सांसारिक वासना के अधीन हो जाता है। मगर दूसरे ही पल उन्हें ज्ञान की याद आई। उन्हें लगा कि ज्ञान सचमुच मनुष्य को मन का कहा करने से पहले विचार कर लेने को कहता है और किसी निर्णय के लिए प्रेरित करता है।</p>
<p>विक्रम ऐसे उलझे सवालों का जवाब सामान्य लोगों की ज़िन्दगी में खोजते थे, इसलिए वे साधारण नागरिक का वेश बदलकर अपने राज्य में निकल पड़े। उन्हें कई दिनों तक ऐसी कोई बात देखने को नहीं मिली जो प्रश्न को हल करने में सहायता करती। एक दिन उनकी नज़र एक ऐसे नौजवान पर पड़ी जिसके कपड़ों और भावों में उसकी विपन्नता झलकती थी। वह एक पेड़ के नीचे थककर आराम कर रहा था। बगल में एक बैलगाड़ी खड़ी थी जिसकी वह कोचवानी करता था।  </p>
<p>राजा ने उसके निकट जाकर देखा तो वे उसे एक झलक में ही पहचान गए. वह उनके अभिन्न मित्र सेठ गोपाल दास का छोटा बेटा था। सेठ गोपाल दास बहुत बड़े व्यापारी थे और उन्होंने व्यापार से बहुत धन कमाया था। उनके बेटे की यह दुर्दशा देखकर उनकी जिज्ञासा बढ़ गई। उसकी बदहाली का कारण जानने को उत्सुक हो गये। उन्होंने उससे पूछा कि उसकी यह दशा कैसे हुई जबकि मरते समय गोपाल दास ने अपना सारा धन और व्यापार अपने दोनों पुत्रों में समान रुप से बाँट दिया था। एक के हिस्से का धन इतना था कि दो पुश्तों तक आराम से ज़िन्दगी गुज़ारी जा सकती थी। विक्रम ने फिर उसके भाई के बारे में भी जानने की जिज्ञासा प्रकट की।  </p>
<p>युवक समझ गया कि पूछने वाला सचमुच उसके परिवार के बारे में सारी जानकारी रखता है। उसने विक्रम को अपने और अपने भाई के बारे में सब कुछ बता दिया। उसने बताया कि जब उसके पिता ने उसके और उसके भाई के बीच सब कुछ बाँट दिया तो उसके भाई ने अपने हिस्से के धन का उपयोग बड़े ही समझदारी से किया। उसने अपनी ज़रुरतों को सीमित रखकर सारा धन व्यापार में लगा दिया और दिन-रात मेहनत करके अपने व्यापार को कई गुणा बढ़ा लिया। अपने बुद्धिमान और संयमी भाई से उसने कोई प्रेरणा नहीं ली और अपने हिस्से में मिले अपार धन को देखकर घमण्ड से चूर हो गए। शराबखोरी, रंडीबाजी जुआ खेलना समेत सारी बुरी आदतें डाल लीं। ये सारी आदतें उसके धन के भण्डार के तेज़ी से खोखला करने लगीं। बड़े भाई ने समय रहते उसे चेत जाने को कहा, लेकिन उसकी बातें उसे विष समान प्रतीत हुईं।  </p>
<p>ये बुरी आदतें उसे बहुत तेज़ी से बरबादी की तरफ ले गईं और एक वर्ष के अन्दर वह कंगाल हो गया। वह अपने नगर के एक सम्पन्न और प्रतिष्ठित सेठ का पुत्र था, इसलिए उसकी बदहाली का सब उपहास करने लगे। इधर भूखों मरने की नौबत, उधर शर्म से मुँह छुपाने की जगह नही। उसका जीना दूभर हो गया। अपने नगर में मजदूर की हैसियत से गुज़ारा करना उसे असंभव लगा तो वहाँ से दूर चला आया। मेहनत-मजदूरी करके अब अपना पेट भरता है तथा अपने भविष्य के लिए भी कुछ करने की सोचता है। धन जब उसके पास प्रचुर मात्रा में था तो मन की चंचलता पर वह अंकुश नहीं लगा सका। धन बरबाद हो जाने पर उसे सद्बुद्धि आई और ठोकरें खाने के बाद अपनी भूल का एहसास हुआ। जब राजा ने पूछा क्या वह धन आने पर फिर से मन का कहा करेगा तो उसने कहा कि ज़माने की ठोकरों ने उसे सच्चा ज्ञान दे दिया है और अब उस ज्ञान के बल पर वह अपने मन को वश में रख सकता है।</p>
<p>विक्रम ने तब जाकर उसे अपना असली परिचय दिया तथा उसे कई स्वर्ण मुद्राएँ देकर होशियारी से व्यापार करने की सलाह दी। उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि लग्न शीलता उसे फिर पहले वाली समृद्धि वापस दिला देगी। उससे विदा लेकर वे अपने महल लौट आए क्योंकि अब उनके पास उन तपस्विओं के विवाद का समाधान था। कुछ समय बाद उनके दरबार में वे दोनों तपस्वी समाधान की इच्छा लिए हाज़िर हुए। विक्रम ने उन्हें कहा कि मनुष्य के शरीर पर उसका मन बार-बार नियंत्रण करने की चेष्टा करता है पर ज्ञान के बल पर विवेकशील मनुष्य मन को अपने पर हावी नहीं होने देता है।  </p>
<p>मन और ज्ञान में अन्योनाश्रय सम्बन्ध है तथा दोनों का अपना-अपना महत्व है। जो पूरी तरह अपने मन के वश में हो जाता है उसका सर्वनाश अवश्यम्भावी है। मन अगर रथ है तो ज्ञान सारथि। बिना सारथि रथ अधूरा है। उन्होंने सेठ पुत्र के साथ जो कुछ घटा था उन्हें विस्तारपूर्वक बताया तो उनके मन में कोई संशय नहीं रहा। उन तपस्वियों ने उन्हें एक चमत्कारी खड़िया दिया जिससे बनाई गई तस्वीरें रात में सजीव हो सकती थीं और उनका वार्त्तालाप भी सुना जा सकता था।</p>
<p>विक्रम ने कुछ तस्वीरें बनाकर खड़िया की सत्यता जानने की कोशिश की तो सचमुच खड़िया में वह गुण था। अब राजा तस्वीरे बना-बना कर अपना मन बहलाने लगे। अपनी रानियों की उन्हें बिल्कुल सुधि नहीं रही। जब रानियाँ कई दिनों के बाद उनके पास आईं तो राजा को खड़िया ने चित्र बनाते हुए देखआ। रानियों ने आकर उनका ध्यान बँटाया तो राजा को हँसी आ गई और उन्होंने कहा वे भी मन के आधीन हो गए थे। अब उन्हें अपने कर्त्तव्य का ज्ञान हो चुका है।</p>
<p>सौजन्य : <a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/snbts019.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
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