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	<title>नूर &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/नूर/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "नूर"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 13:35:17 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[धुँधलियाँ]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=970</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 18:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=970</guid>
<description><![CDATA[धुँधलियाँ-धुँधलियाँ
तेरी यादों की धु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">धुँधलियाँ-धुँधलियाँ<br />
तेरी यादों की धुँधलियाँ<br />
छायी हैं ज़हन पर<br />
तेरी बातों की बदलियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">नज़दीकियाँ नज़दीकियाँ<br />
तेरी मुझसे नज़दीकियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">अहसास हो क़रीबी का<br />
मिज़ाज हो ख़ुशनसीबी का<br />
बदले हैं रंग फ़िज़ाओं ने<br />
नूर हो माह रकाबी का</span></p>
<p><span style="color:#000000;">धुँधलियाँ धुँधलियाँ<br />
तेरी यादों की धुँधलियाँ<br />
छायी हैं ज़हन पर<br />
तेरी बातों की बदलियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">बिजलियाँ बिजलियाँ<br />
तेरे रूप की बिजलियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">जिस्म रेशमी आग का<br />
चिकने मखमली आफ़ताब का<br />
ख़ुशरू पे बैठी हैं मुस्कियाँ<br />
उतरा है रंग हिजाब का</span></p>
<p><span style="color:#000000;">धुँधलियाँ धुँधलियाँ<br />
तेरी यादों की धुँधलियाँ<br />
छायी हैं ज़हन पर<br />
तेरी बातों की बदलियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तब्दीलियाँ तब्दीलियाँ<br />
मुझमें इतनी तब्दीलियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">भूल गया सारी मजबूरियाँ<br />
दूर हो गयीं सब दूरियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">तब्दीलियाँ तब्दीलियाँ<br />
मुझमें इतनी तब्दीलियाँ<br />
छायी हैं ज़हन पर<br />
तेरी बातों की बदलियाँ</span></p>
<p><span style="color:#000000;">नज़दीकियाँ नज़दीकियाँ<br />
तेरी मुझसे नज़दीकियाँ</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=954</link>
<pubDate>Mon, 31 Mar 2008 11:45:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=954</guid>
<description><![CDATA[ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया<br />
सरे-राह मैं अपनी मंज़िल पा गया<br />
चराग़ों का नूर हो, चश्मे-बद्दूर हो<br />
तुम्हें देखकर दिल अँधेरों से दूर आ गया</font></p>
<p><font color="#000000">ख़ुशियों के दीप जल उठे, ग़म सारे बुझ गये<br />
पतझड़ उतरा, गुल शाख़-शाख़ खिल गये<br />
इक-इक धड़कन में नाम तुम्हारा है<br />
तुम्हारी मोहब्बत का जादू मुझपे छा गया</font></p>
<p><font color="#000000">ख़ुशबू-ख़ुशबू मैंने तुमको पाया सनम<br />
मोहब्बत में तेरी ख़ुद को मिटाया सनम<br />
तेरी पहली नज़र से क़त्ल हुआ था मैं<br />
लहू के हर क़तरे में तेरा प्यार समा गया</font></p>
<p><font color="#000000">राज़ दिल के सभी आँखों से बयाँ कर दो<br />
राहे-मुहब्बत मेरी तुम आसाँ कर दो<br />
नहीं कोई अरमाँ तेरी चाहत के सिवा<br />
बस तेरा ही चेहरा दिलो-दिमाग़ पे छा गया</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००४</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आँखों में आँसू नहीं आते]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=945</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 09:52:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=945</guid>
<description><![CDATA[आँखों में आँसू नहीं आते
क्योंकि मैं जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">आँखों में आँसू नहीं आते<br />
क्योंकि मैं जानता हूँ<br />
तुम लौटकर आओगी ज़रूर<br />
यह दिल तन्हा कहाँ है<br />
इसमें यादें हैं तुम्हारी<br />
तुम रहो कितने भी दूर</font></p>
<p><font color="#000000">देखता हूँ तुम्हें<br />
जब भी आँखें मूँद लेता हूँ<br />
और कोई कहाँ है इनमें हुज़ूर<br />
तुमसे प्यार किया है<br />
यह दिल का सौदा है तुम्हीं से<br />
क्यों न रहूँ थोड़ा मग़रूर</font></p>
<p><font color="#000000">पास आने के दिन आ गये<br />
धड़कनों में बेक़रारी है<br />
दिल में सुरूर ही सुरूर<br />
वादियों में चले मौसम हरे<br />
डालियों पर फूल गुलाबी हैं<br />
निगाह में भर गया है नूर</font></p>
<p><font color="#000000">जादू-सा है फ़िज़ाओं में<br />
खिल रहे हैं ख़्याल हर-सू<br />
क्यों न आये तुम्हारा मज़कूर<br />
दिल बहलता नहीं बातों से<br />
यह कैसा सिलसिला है<br />
चैन आये गर आये वह हूर</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहली नज़र का पहला प्यार]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=859</link>
<pubDate>Thu, 28 Feb 2008 12:07:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=859</guid>
<description><![CDATA[पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना
म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना<br />
मेरा दिल यह बेचारा हो गया आशिक़ाना<br />
आँखों में बेताबी है, चैन कहाँ है<br />
डरता हूँ कहीं कोई बन जाये ना अफ़साना</font></p>
<p><font color="#000000">फूल हँसें हैं सारे, दिल धड़का है<br />
ठण्डी साँसों में जैसे शोला भड़का है<br />
उसका चेहरा चाँद है, नूर है<br />
लड़की नहीं वह इक हूर है<br />
थाम के दिल मैं राहों में खड़ा हूँ कि<br />
हो जाऊँ उसके तीरे-नज़र का निशाना</font></p>
<p><font color="#000000">पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना<br />
अब मैं दिल में उसके बनाऊँगा आशियाना<br />
वह मेरी अब इक मंज़िल है<br />
उसकी बाँहो के सिवा कहाँ कोई मेरा ठिकाना</font></p>
<p><font color="#000000">उसको देखकर जी नहीं भरता है<br />
कैसे जताये उसे उस पर मरता है<br />
भोली-भाली वह सबसे जुदा है<br />
सबसे निराली उसकी अदा है<br />
आये वह कभी जो मेरी दुनिया में तो<br />
छोड़ दूँ उसके लिए मैं यह सारा ज़माना</font></p>
<p><font color="#000000">पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना<br />
मेरा दिल यह बेचारा हो गया आशिक़ाना</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: ०८ मई २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ज़िंदगी सियाह है ज़रा तुम नूर थाम लो]]></title>
<link>http://rohitler.wordpress.com/2008/02/20/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a5%9b%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a5%82/</link>
<pubDate>Wed, 20 Feb 2008 06:39:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rohit Jain</dc:creator>
<guid>http://rohitler.wordpress.com/2008/02/20/%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a5%9b%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a5%82/</guid>
<description><![CDATA[ज़िंदगी सियाह है ज़रा तुम नूर थाम लो
भरी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ज़िंदगी सियाह है ज़रा तुम नूर थाम लो<br />
भरी तन्हाई में मुझे कुछ दूर थाम लो</p>
<p>तुम्हारे नाम से मुझको ज़माना जाने है<br />
हो न जाऊं कहीं मै मग़रूर थाम लो</p>
<p>जो दिलों को दिलों से करता है अलग<br />
तुम ज़माने का वो इक दस्तूर थाम लो</p>
<p>मै तो गुमराह हूं तुम भी खो जाओगे<br />
कोई राह तुम तो मशहूर थाम लो</p>
<p>मै तन्हा ही रहा कहता हूं इसलिये<br />
हमसफ़र मेरे हमदम  ज़रूर थाम लो</p>
<p>जो है हासिल नहीं उस की क्यों आरज़ू<br />
चोट खाओगे ये अपना फ़ितूर थाम लो</p>
<p>रोहित जैन<br />
07-12-2007<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ सुबह-शाम]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=750</link>
<pubDate>Tue, 12 Feb 2008 09:50:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=750</guid>
<description><![CDATA[जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम<br />
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम</font></p>
<p><font color="#000000">वह रंगीन शाम थी शाम वह गुमनाम थी<br />
नज़रों में नज़ारों में वह वफ़ा बेनाम थी<br />
हूर थी वह किसी चिराग़ का नूर थी<br />
किसी किनारे से जैसे कोई कश्ती दूर थी<br />
देखा जब हमने नज़रें थम ही गयीं<br />
हमें जैसे मंज़िलों की राहें मिल ही गयीं</font></p>
<p><font color="#000000">जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम<br />
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम</font></p>
<p><font color="#000000">महफ़िल हसीन थी या ख़ूबसूरत समा था<br />
उस पल के लिए जाने दिल मैं कहाँ था<br />
आँखों की गहरी झील जिसकी नहीं तफ़सील<br />
तोड़ दी पतंग किसी ने जब हमने दी ढील<br />
उसका चेहरा जैसे शाम की गहराई में सवेरा<br />
वह सवेरा जिसने किया मेरे दिल में बसेरा</font></p>
<p><font color="#000000">जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम<br />
मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जैसे ज़िन्दगी वीरान है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=744</link>
<pubDate>Mon, 11 Feb 2008 13:14:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/?p=744</guid>
<description><![CDATA[जैसे ज़िन्दगी वीरान है
जैसे ज़िन्दगी बे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">जैसे ज़िन्दगी वीरान है<br />
जैसे ज़िन्दगी बेनाम है<br />
तू मेरी बाँहों से दूर है<br />
तू निगाहों का नूर है, मेरे लिए</font></p>
<p><font color="#000000">जैसे चलती है धड़कन<br />
जैसे होती है कम्पन<br />
जैसे आती है यह सुबह<br />
जैसे जाती है हर शाम, मेरे लिए</font></p>
<p><font color="#000000">घड़ी-घड़ी तेरा इन्तिज़ार<br />
घड़ी-घड़ी मैं तेरा राहदार<br />
साँसें ढूँढ़ती हैं तेरी ख़ुशबू<br />
आँखें ढूँढ़ती हैं तेरा ख़ाब, मेरे लिए</font></p>
<p><font color="#000000">आ जाओ तुम या फिर<br />
आने दो अपने पास मुझे<br />
यह दूरियाँ सिमटने दो<br />
यह डोरियाँ उलझने दो, मेरे लिए</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ऐनक उतार के]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2008/02/05/%e0%a4%90%e0%a4%a8%e0%a4%95-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Mon, 04 Feb 2008 19:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2008/02/05/%e0%a4%90%e0%a4%a8%e0%a4%95-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[ऐनक उतार के ख़ुद को आइने में
कभी देखा ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">ऐनक उतार के ख़ुद को आइने में<br />
कभी देखा होता<br />
कि इक नूर का टुकड़ा हो<br />
मेरे ख़ाबों में चुभता है जो</font><br />
--x--<br />
<font color="#000000">ऐनक उतार के कभी<br />
ख़ुद को आइने में देखा होता<br />
कि इक नूर की बूँद हो<br />
मेरी आँखों में भर आयी है जो</font><br />
--x--<br />
<font color="#000000">ऐनक उतार के ख़ुद को कभी<br />
आइने में देखा होता<br />
इक नूर आँखों में उतर जाता<br />
तुझे मालूम हो जाता<br />
कितना हुस्न है तेरे पास</font><br />
--x--<br />
<font color="#000000">ऐनक उतार के ख़ुद को कभी<br />
आइने में देखा होता<br />
तो तुम्हें मालूम होता<br />
क्यों आजकल रात में<br />
चाँद फीका रहता है</font><br />
--x--<br />
<font color="#000000">ऐनक उतार के ख़ुद को कभी<br />
आइने में देखा होता<br />
तो तुम्हें मालूम होता<br />
हुस्न-निसार हो तुम</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह लड़की कौन थी?]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b2%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 12:10:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b2%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[कल की रात बहुत हसीन थी
आँखों में उतर आय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#000000;">कल की रात बहुत हसीन थी<br />
आँखों में उतर आये थे<br />
महके हुए ख़्वाब...<br />
पहले तो हम चराग़ों के नूर में<br />
बैठे हुए बातें कर रहे थे,<br />
फिर किसी रस्म के मौक़े पर<br />
चहल-पहल थी घर में...<br />
और वह झिलमिलाते सितारों वाले लिबास में<br />
सजी सँवरी मुझसे नज़रें मिला रही थी<br />
जिधर भी जाता<br />
मुझे आगे वो दिख ही जाती<br />
मुझे देखती और मुस्कुराती,<br />
और अदा के साथ मेरे आगे चलती रहती...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">जब मैं छत पे था<br />
अचानक मेरे पीछे से आयी<br />
अपने हाथों से मेरी आँखें मूँद के बोली -<br />
मेरी उँगलियों के झरोखों से<br />
देखों तो ज़रा वो चाँद<br />
कितना हसीन नज़र आता है<br />
उसकी नर्म बाँहों का मेरे काँधे पर स्पर्श<br />
मुझे मेरे जागने के बाद भी<br />
बिस्तर पे मिल रहा था<br />
कितना हसीन था ये ख़्वाब और वो पल<br />
और वो सुबह जब यह ख़्वाब देखा था...</span></p>
<p><span style="color:#000000;">मगर इक बात जो है,<br />
वह लड़की कौन थी...</span></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
