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	<title>पद्मनाभ-मिश्र &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/पद्मनाभ-मिश्र/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "पद्मनाभ-मिश्र"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 15:46:50 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ड्यूक’क शहर एडिनबरा]]></title>
<link>http://maithili.wordpress.com/?p=49</link>
<pubDate>Thu, 19 Jun 2008 19:32:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>maithili</dc:creator>
<guid>http://maithili.hi.wordpress.com/2008/06/19/edinburgh2/</guid>
<description><![CDATA[आई हमर एडिनबर्ग (हम एहिना उच्चारण करब) ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आई हमर एडिनबर्ग (हम एहिना उच्चारण करब) शहर मे अन्तिम दिन थीक. कुल मिला केँ चारि दिन रहबाक छल एतय. पहिल दू दिन’क वर्णन हम पहिने कऽ देने छी आ बाँकी दू दिन’क वर्णन केँ एहि भाग मे लिख रहल छी.</p>
<p><strong>वर्ल्ड इज फ्लैट आ एडिनबर्ग:</strong></p>
<p>एडिनबर्ग शहर मे आबए सँ किछु दिन पहिने हम थामस फ्रेडमेन लिखित किताब "द वर्ल्ड इज फ्लैट" पढ़ने छलहुँ. लेखक कहैत छथि जे दुनियाँ आब गोल नहि सपाट अछि. धरती केँ सपाट करबाक बहुत कारण छैक जाहि मे बर्लिन’क दीबार’क ढाहनाय (पूर्वी जर्मनी आ पश्चिमी जर्मनी के विलय), ब्रौडबैन्ड इन्टरनेट,   कम्प्यूटर साफ्टवेयर, ओपेन सोर्स, अमेरिका’क काम-काज केँ भारत मे आउटसोर्सिँग,  व्यक्तिगत कम्प्यूटर उपकरण (मोबाइल, लैप्टोप, पी.डी.ए) इत्यादि दुनियाँ मे कोनो भी दू टा अन्जान व्यक्ति के पास आनि देलक. तेँ २१वीँ शदी मे दुनियाँ सपाट भऽ गेल.<a href="http://maithili.wordpress.com/files/2008/06/dress2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-51" src="http://maithili.wordpress.com/files/2008/06/dress2.jpg" alt="" width="300" align="right" /></a></p>
<p>लागैत अछि फ्रेडमेन साहेब एडिनबर्ग शहर मे नहि घुमलाह, नहि तऽ एहेन बात कहियो ने कहि सकैत छलैथि.  एडिनबर्ग एकटा एहेन शहर अछि जाहि मे विकास बहुत भेल अछि मुदा पुरातन सभ्यता सँ कोनो छेड़-छाड़ नहि काएल गेल अछि. फ्रेडमेन सहाब भारत मे बहुत दिन धरि रहलाह आ भारत मे धोती कूर्ता सँ जीन्स टी शर्ट मे बदलैत सभ्यता पर दुनियाँ के एके शब्द मे सपाट कहि देलाह,  एडिनबर्ग मे देखलहुँ जे गली गली मे पारम्परिक परिधान’क दोकान छलैक. एतय जेन्टलमेन’क पारम्परिक परिधान मे होइत छैक स्काटलैन्ड’क रँग मे स्कर्ट, सर्ट, विशेष टाई, विशेष फर वाला टोपी पैर सँ एक फीट ऊँच जूता एकटा मफलर इत्यादि. एतुका स्थानीय लोक सँ पुछलहुँ ते पता चलल जे एतय कोनो भी पारम्परिक काज त्योहार मे, शादी विवाह’क मौका पर लोक सब इएह पारम्परिक परिधान पहिरैत अछि. दोकान सब मे जा जा केँ एतुका पारम्परिक परिधान के बिकैत देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल.  एतुका लोक कहलक जे एतुका सँस्कृति के सेहो अमेरिका सँ खतरा अछि.  ई गणना एत्तेक कम्प्लेक्स छैक जे बुझि मे नहिँ आयल जे एना अमेरिके सँ पूरे दुनियाँ के किएक खतरा छैक आ तैयो दुनियाँ सपाट किएक छैक.</p>
<p>एहि बात सँ एकटा आओर बात याद आबि गेल. बात बात मे एतुका लोक जेन्टमेन’क प्रयोग करैत छथि. आधूनिक बँग्ला भाषा मे सेहो भद्रो-पुरुष आ भद्रो महिला’क प्रयोग बारम्बार होइत छैक. एकटा बँगाली मित्र सँ विवाद भऽ गेल हम जवाब देने छलहुँ जे मिथिला मे रहय वाला प्रत्येक आदमी भद्र पुरुष होइत छथि आ प्रत्येक महिला भद्र महिला होइत अछि. तेँ हमरा लोकनि भद्र शब्द’क उपयोग नहि करैत छी. इ तऽ भेल मजाक वाला बात. असल बात ई अछि जे कलकत्ता मे अन्ग्रेज’क असर सबसँ बेसी पड़ल अछि तेँ बँग्ला भाषा मे जेन्टलमेन’क सीधे अनुवाद कए भद्रो पुरुष कए दैत छथि.</p>
<p><a href="http://maithili.wordpress.com/files/2008/06/sweater1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-53" src="http://maithili.wordpress.com/files/2008/06/sweater1.jpg" alt="" width="300" align="left" /></a>जेना पहिल भाग मे लिखने छलहुँ एडिनबर्ग शहर मे भारते जेकाँ फूटपाथ पर समान बेचल जाइत छैक. भारत जेकाँ ओतेक दोकान फूटपाथ पर नहि रहैत छैक मुदा एक दू टा दोकान कतओ ने कतओ अवश्ये भेट जायत. पहिल बेर देखलहुँ जे ठेला पर शराब बिकैत. फूटपाथ पर उनी कपड़ा बिकैत. एक जगह त पथिया मे उनी कपड़ा बिकैत छल आ हम अपन कैमरा मे ओकरा सहेज लेलहुँ जे बगल वाला फोटो मे अछि. बहुते अजीब सन लागैत अछि जखन हर जगह भीड़ मे एहेन आदमी भेटि जायत जे जवान अछि आ सिर सँ पैर धरि उनी कपड़ा सँ लदल अछि. ओहि ठाम ओही जगह पर देखऽ मे आबि जायत जे एकटा बुढ़ आदमी केवल एकटा टीशर्ट पहिरने ठाढ छथि. ई बात हम तखन कहि रहल छी जखन बाहर’क तापमान १२ डिग्री सेन्टिग्रेड छल हवा एत्तेक जोर सँ चलि रहल छल जे हम एकटा स्वेटर मे काँपि रहल छलहुँ.<br />
<br /> चूँकि स्काटलैण्ड उत्तरी ध्रूव सँ भारत के अपेक्षा बेसी निकट अछि तेँ एतय दिन राति अवधि मे अन्तर होइत छैक. एतुका स्थानीय समयानुसार साढ़े तीन बजे सूरज भगवान एगि जाति छथि, आ राति मे साढ़े नओ बजे धरि उगल रहैत छथि. एकर मतलब एतय राति केवल छओ घँटा के आ दिन अठारह घँटा के होइत अछि. मुदा ठँड’क मौसम मे ई उल्टा भऽ जाइत छैक. चूँकि राति आ दिन’क अवधि मे एत्तेक फड़क पड़ैत छैक तेँ सोचलहुँ जरूर एतुका जीवन यापन मे एकर असर पड़ना चाही. पहिने हम अपने सँ शुरु करब. राति केँ जखन साढे नओ बजे जखन हम सूतय लेल जाइत छलहुँ ते खिड़की’क पर्दा’क दोग सँ सूरज भगवान नुका छिपि खेलैत छलाह. नीक सँ सूतियो ने पाबी की साढ़े तीन बजे नूका छिपि फेर सँ शुरु भऽ जाए. एतुका लोक सब कोना मैनेज करैत छथि से भगवान जानैथि. <a href="http://maithili.wordpress.com/files/2008/06/100_1371.jpg"><img src="http://maithili.wordpress.com/files/2008/06/100_1371.jpg" alt="" width="300" align="right" /></a><br />
राति दिन’क अन्तर सँ एतुका लोक मे असर के खोज केनाय शुरु केलहुँ. सबसँ पहिने जे देखलहुँ ओ छल स्कूल मे बच्चा सबकेँ एनाय आ जेनाय. देखलहुँ एतय लगभग दस बजे बच्चा लोकनि स्कूल जैत छथि आ चारि बजे छुट्टी भऽ जाइत छैक. अचानक याद आबए लागल हमरो लोकनि तेँ एहिना पढ़लहुँ. रोज दस बजे खाना खा केँ स्कूल आ चारि बजे छूट्टी. मुदा भारत आब’क स्कूल तऽ सात-आठ बजे सँ एक-दू बजे धरि होइत छैक से अन्तर किएक. बुझि मे आयल कोलोनियल हैन्ग ओवर एखन धरि गेल नहि अछि. अन्ग्रेज लोकनि दस सँ चारि धरि स्कूल चलौलैथि आब तथाकथित दुनियाँ’क सपाट भेला’क बाद मतलब अमेरिकी कानवेन्ट स्कूल हिसाब सँ सात सँ एक बजे धरि चलैत छैक. मतलब ई जे ईग्लिश हैन्ग ओवर सँ अमेरिकन हैँगओवर. बिहार सरकार सेहो सात सँ एक बजे धरि स्कूल कऽ देने अछि.<br />
<br />एहि सँ पहिने की दिन राति के अन्तर सँ पड़ैत जीवन यापन के बाँकी असर केँ बताबी, एकटा घटना याद आबि रहल अछि. हमरा आ हमर कनियाँ मे ओतुबी अन्तर छैक जेना उत्तरी ध्रूव आ दक्षिणी ध्रूव. हम एकटा अविकसित गाम’क घटिया सन स्कूल मे पढ़ने छी तऽ हमर कनियाँ बिहार’क सबसँ नीक स्कूल मे सँ एक नोट्रेडेम एकेडमी मे पढ़ने छथि. बहुत जानल बात अछि जे हुनकर अन्ग्रेजी हमरा सँ बढ़ियाँ छन्हि. मुदा एक दिन हम कनियाँ केँ पुछि देलिअन्हि जे बताबु जे डिनर ककरा कहल जाइत छैक. कनियाँ एत्तेक छोट प्रश्न जवब देनाइ अपन प्रतिष्ठा के खिलाफ बुझैत छलीह ते जवाब आसानी सँ नहि दैत छलीह. हम चुनौती देलिअन्हि ते कहलैथि "डिनर मतलब राति’क खाना".
<div style="border-top:#5c8a64 5px solid;float:right;padding-bottom:5px;width:200px;line-height:100%;padding-top:5px;border-bottom:#5c8a64 5px solid;text-align:center;margin:12px;">
<p>हम कोनो पेशेवर लेखक नहिँ छी. बिल्कूल साधारण सन इन्टरनेट सैवी छी. ब्लोग अन्ग्रेजी मे नहि बना एकरा मैथिली मे बनेने छी. ई एकटा यात्रा वृताँत एछि एकर पहिल भाग जे हमरा हिसाब सँ बेसी बढियाँ अछि ओ <a href="http://maithili.wordpress.com/2008/06/17/edinburgh1/">  एतय क्लिक </a> केला पर भेटि सकैत अछि.  </p>
</div>
<p>हम कहलिअन्हि जे डिनर के मतलब होइत अछि <strong>दिन’क खाना </strong>. हुनका पहिने विश्वास नहि होइत छलन्हि. आक्स्फोर्ड’क डिक्शनरी निकालि केँ देखा देलिअन्हि ते विश्वास भेलन्हि. मुदा बाद मे ओहो सोच मे पड़ि गेलीह जे एना किएक. दिन’क खाना केँ तऽ लन्च कहल जाइत छैक. पहिने हमरो बुझल नहि छल. एडिनबर्ग एला सँ सब शँका दूर भऽ गेल. एतय साँझ’क साढे सात बजे डिनर के नाम पर खाना शुरु होइत छैक. जखन ई तथाकथित खाना शुरु होइत छैक सूरज भगवान ओहने चमकैत छथि जेना मार्च’क महीना मे दिन’क तीन बजे भारत मे चमकैत अछि. डिनर पूरे चौबीसो घँटा के सबसँ महत्वपूर्ण खाना होइत अछि आ सूरज उगल रहले पर खायल जायत छैक ते ओकरा दिन’क खाना कहल जाइत छैक.<br />
<br /> एहि रचना केँ हम एकटा यात्रा वृताँत’क भाँति लिखय चाहैत छलहुँ. मुदा एडिनबर्ग शहर’क बारे मे अपन अनुभव केँ लिखि तऽ एकटा किताब तैयार भऽ जायत. अपन पेशा मे अपन जरूरत के देखैत एना नहि कऽ सकैत छी. शहर बहुत घुमलहुँ मुदा एडिनबर्ग शहर सन नहि देखलहुँ. विदेश मे रहलोपरान्त भारत’क याद ताजा करैत अछि. ओएह लेफ्ट हैन्ड ड्राइव, सड़क पर चलैत लोक, घास’क पैघ पैघ मैदान, ओहि मे कैनवस’क गेन्द सँ क्रिकेट खेलाइत बच्चा, अपेक्षाकृत बेसी शुद्ध अन्ग्रेजी बाजैत लोक, अतिथि के सत्कार करैत लोक, यूनिवर्सिटी मे चहल पहल, जमि के खाना खाइत लोक. एहि रचना केँ खतम कऽ रहल छी, एहि यात्रा वृताँत के नहिँ. चाहे तऽ पूरा वर्णन करबाक लेल हमरा लग शब्द नहि अछि वा एकरा वर्णन करबाक लेल शब्द बनले नहि अछि. </p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[एक बदलैत परिभाषा]]></title>
<link>http://maithili.wordpress.com/2007/12/27/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a5%88%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 27 Dec 2007 08:07:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>maithili</dc:creator>
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<description><![CDATA[एहि आर्टिकल केँ लिखै सँ पहिने हमरा दू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://maithili.wordpress.com/files/2007/12/mith.jpg" title="mith_marr"><img src="http://maithili.wordpress.com/files/2007/12/mith.thumbnail.jpg" alt="mith_marr" /></a>एहि आर्टिकल केँ लिखै सँ पहिने हमरा दू टा चीज मोन पड़ैत अछि.  एकटा ते खट्टर काका'क तरँग मे हरिमोहन झा'क खट्टर काका'क मुँह सँ निकलल बात, "जे कोनो सँस्कृति'क विकास ककरो गुलाम नहि होइत छैक",  मिथिला'क सँस्कृति मे यदि ताकत रहतैक ते दूनियाँक कोनो ताकत एकरा मिटा नहि सकैत छैक. सँगहि यदि ई सँस्कृति केवल आडम्बर आ पाखण्ड पर आधारित छैक ते एकरा मिटबा सँ कियो नहि बचा सकैत छैक.</p>
<p>दोसर बात मोन पड़ल जे हम अपन पापा केँ प्रणाम किएक करैत छी. की केवल हाथ मिलेला सँ काज नहि चलि जायत. विदेश मे ते लोक केवल हाथे टा मिलबैत छैक ते की विदेश'क लोक अपन बाप आ माई सँ प्रेम करनाई बन्द क' दैत छैक. आ विदेशे के बात किएक, मानि लिअ हमरा अपन पापा'क प्रति ओएह श्रद्धा, ओएह प्रेम आ ओएह आदर रहय मुदा हम हुनका पैर छुबि केँ नहि हुनका सँ हाथ मिला के अभिवादन करी ते की हमर आदर हुनका लेल कम भ' जायत... इत्यादि...इत्यादि...</p>
<p>हम अपन पापा केँ पैर एहि कारण नहि छुबैत छी जे हमरा पापा'क प्रति आदर अछि वा हम हुनकर सम्मान करैत छिअन्हि. बल्कि एहि दुआरेँ कि ई हमर सँस्कृति थीक. बिना पैर छुने सेहो हम हुनकर सम्मान क' सकैत छिअन्हि मुदा बिना पैर छुबे वला सम्मान'क माप अलग होयत आ पैर छुबि केँ जे सम्मान दैत छियैक ओकर बात अलग. अतएब ई बात ते तय छैक जे कोनो भी सँस्कृतिक किछु एहेन बात होइत छैक जकरा कोनो तर्क द्वारा सिद्ध नहि कयल जा सकैत छैक. ओ स्वँय-सिद्ध होइत छैक. सँस्कृति'क एकटा आओर बात होइत छैक जे समय ओकरा उपर मे बहुत प्रयोग केने रहैत छैक कालान्तर मे ओहि मे कोनो बदलाव नहि होइत छैक. पैर छुबि केँ अपना सँ श्रेष्ठ व्यक्ति केँ अभिवादन करनाय एकर सबसँ विशेष उदाहरण थीक.</p>
<p>समय के साथ सँस्कृति मे बदलाव आबैत छैक. एक सँस्कृति टहलि केँ दोसर सँस्कृति'क लग पहुँचैत छैक, फेर ओ एक दोसर'क अवयव'क फेर बदल करैत छैक आ एहि सँ सँस्कृति मे बदलाव आबैत छैक. आ एहि बदलाव सँ  सँस्कृति'क विकास क्रमशः होइत जाइत छैक.</p>
<p>सँस्कृतिक विकास आ बदलाव सगरे भ' रहल अछि. एकर असर मैथिल'क विवाह पद्धति पर सेहो पड़ल अछि. निम्न चीज जे पहिने मैथिल'क विवाह मे नहि छल आब बहुत सामन्य भ' गेल अछि:</p>
<p>१. जयमाल: एहि विधि  मे कन्या आ वर एक दोसर केँ माला पहिराबैत छथि. वर आ कन्या दुनू परिवार'क लोक आ बराती मौजूद रहैत छैक.</p>
<p>२. जूता चोरी: पहिने ई प्रथा पूर्वी उत्तर-प्रदेश मे प्रचलित छल, जाहि मे कन्या'क बहिन मिलि वर'क जूता चोरी करैत छथि आ वापस तखने करैत छथि जखन वर'क तरफ सँ किछु गिफ्ट भेटि जाई.  आब मिथिला'क लगभग प्रत्येक कोन मे ई प्रचलित अछि.</p>
<p>आधूनिक मैथिल केँ जे सबसँ खराप लागैत छैक ओ छैक जे मैथिल'क विवाह मे कोनो नाच गाना नहि होइत छैक. आ क्रमशः आब किछु विवाह मे ई शुरु भ' गेल अछि. हमर कहब केवल एतबे अछि जे कोनो ते लक्ष्मन रेखा खीच'क चाही जकरा अपना लोकनि केँ नाँघबाक नहि चाही. नहि ते आई अपना लोकनि नाच गाना आर्केस्ट्रा के रीकमेन्ड करैत छी, काल्हि दारू शराब केँ आ परसू किछो आओर केँ.</p>
<p>एहि क्रम मे केवल मैथिले यूवक एकरा नियन्त्रित कय सकैत छथि. तेँ विवाह मे किछु नव करबा सँ पहिने एक बेर जरूर सोची जे कालान्तर मे ओकर केहेन प्रभाव पड़त.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[खट्टर काका'क तरँग- पोथी'क समीक्षा]]></title>
<link>http://maithili.wordpress.com/2007/11/06/%e0%a4%96%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%95-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%81%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%a5%e0%a5%80%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Tue, 06 Nov 2007 06:48:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>maithili</dc:creator>
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<description><![CDATA[छओ महीना पहिने के गप्प होयत. ठीक सँ याद ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://maithili.wordpress.com/files/2007/11/29210620.jpg" title="29210620.jpg"></a>छओ महीना पहिने के गप्प होयत. ठीक सँ याद नहि आबि रहल अछि. श्री राजीव रँजन लाल जी<img width="88" src="http://maithili.wordpress.com/files/2007/11/29210620.jpg" alt="29210620.jpg" height="112" /> पटना गेल छलाह पुस्तक प्रदर्शनी मे. हम हुनका फोन कय कहलिअन्हि जे "खट्टर काका'क तरँग" नेने आऊ. हुनका ई पोथी ते नहि भेटलन्हि मुदा ओहो छोडै वाला जीव नहि.  गोविन्द मित्र रोड पर कोनो किताब'क दोकान मे हुनका ई किताब भेटि गेलन्हि. आ ओ हमरा ई किताब पहुँचा देलथिन्ह.</p>
<p>आब मुख्य मुद्दा पर आयल जाए. ओना ते हम एहि किताब'क बारे मे बहुत सुनि चुकल रही, गोरखपूर'क रेलवे लाइब्रेरी मे एकर हिन्दी अनुवाद पढने छलहुँ मुदा मैथिली मे पढबाक तीव्र इच्छा छल. राजीव जी एहि एकरा साकार केलन्हि. </p>
<p>किताब'क भूमिका बहुत नीक लिखल गेल अछि. आ हरिमोहन बाबु जे दूनिया मे ह्यूमर'क सम्राट थीकाह, हमरा बुझने कनिएँ कनिएँ लेल चुकि गेलाह. जेना भूमिका मे लिखल गेल अछि जे ई पोथी पत्रिका मे प्रकाशित अनेक लेख 'क सँग्रह थीक, ओहि हिसाब सँ ते ठीक मुदा एकेटा कमी महसूस भेल. हम ई बात नहि बुझि सकलहुँ जे एहि किताब'क माध्यम सँ हरिमोहन बाबु'क की मैसेज देबय चहाइत छलाह? हुनकर उद्देश्य की छलन्हि?. की केवल मैथिल'क पोल खोलनाई वा उत्कृष्ट व्यँग वा किछ आओर? किताब पढला सँ मालूम होयत अछि जे टुकड़ा-टुकड़ा मे लिखल गेल एहि किताब कोनो विशेष उद्देश्य नहि. हमरा हिसाब सँ, मनोरँजन'क वास्ते लिखल गेल एहि किताब केँ मनोरँजन लेल केवल पढबाक चाही.</p>
<p>एहि पोथी सँ लेखक'क विद्वता'क अभाष होइत अछि. हुनका सब वेद आ पुरान'क ग्यान छलन्हि से प्रत्येक शीर्षक पढ़ला सँ बुझना जाइत अछि.  एहि किताब'क निम्न विशेषता अछि.</p>
<p>किताब'क दू टा कन्ट्रेडिक्ट्री कन्सेप्ट अछि. पहिल ई जे मैथिल सँस्कृति बहुत नीक थीक आ दोसर जे मैथिल सँस्कृति बहुते खराप. मैथिल'क सँस्कृतिक विशेषता ओ चुडा-दही-चीनी नामक चेप्टर सँ केने छथि. पुरे लेख मे ओ चुडा दही चीनी आ मैथिल'क सँस्कार'क वर्णन कयने छथि.  जेना उदाहरण'क तौर पर ओ कहैत छथि जे भोजन'क गुणे आदमी'क सँसकार होइत अछि. बङाली मिठाइ खा' केँ आलसी होइत अछि, पश्चिम'क लोक (यू.पी. आ दिल्ली) के रोटी खा खा केँ कठोर भ' जाइत अछि आ मैथिल लोकनि चुड़ा दही चीनी खा-खा केँ सरस आ कोमल भेल रहैत छथि. ओ इहो लिखने छथि जे चूकि मैथिल लोकनि अपन भोजन मे खट्टा आ मिरचाय'क प्रयोग हरदम करैत छथि तेँ दुआरे अपना मे ओ कटौझ करैत छथि. हुनकर एकटा चेप्टर चाण्यक्य पर आधारित अछि. पूरे चैप्टर मे ओ आर्गुमेन्ट देने छथि जे चाण्यक्य आओर किओ नहि एकटा मैथिल रहथि. हुनकर तर्क रहनि जे एहेन जिद्दी आ स्वाभिमानी मैथिल छोड़ि आओर किओनहि भ' सकैत छथि.</p>
<p>एतय तक त ठीक मुदा बाँकी चैप्टर मे ओ मैथिल'क सँस्कृति आ धर्म पर खिद्दान्स कयने छथि. एहि सँस्कृति'क जतेक बुराइ भ' सकैत छैक ओ ओतेक कयने छथि. हमरा बुझने हरिमोहन बाबु'क सन लेख'क यदि चाहतथि तेँ ओ चुड़ा-दही-चीनी जेकाँ आओर चैप्टर जोडि के पुरा किताबे केँ एकटा उत्कृष्ठ व्यँग बना सकैत छलथि, मुदा धर्म'क आलोचना केला सँ हुनका बेसी लोकप्रियता नहि भेटलन्हि.</p>
<p>अभिव्यक्तिक स्वतँत्रता अपना लोकनि केँ किच्छो करबाक छुट दैत अछि, मुदा एकर मतलब ई नहि जे अपना लोकनि एकटा साधारण मानव केर सँवेदना केँ बिसरि किछो लिखि दी.</p>
<p>ई त भेल पूरा किताब'क निगेटिव चीज. मुदा जे किओ साहित्य सँ प्रेम राखैत छथि आ व्यँग मे रुचि छन्हि हुनका लेल एहि किताब'क जेकाँ कोनो किताब नहिँ. देशी भाषा मे बहुत दम होइत छैक आ देशी भाषाक प्रयोग (अधिकाँश्त: देशज शब्द'क) प्रयोग सँ एहि किताब मे चारि चाँद लागि गेल अछि. एकटा उदाहरण लिअ. खट्टर काका दलान पर बैसल छलाह:- लेखक भोरे भोर महाभारत'क मन्त्र पढि आगू जाति छलाह, जाहि मे यूधिष्ठिर'क बखान छलैक. खट्टर काका कहय लगलाल: हाँ हाँ भोरे भोर कोन <strong>अगत्ती</strong> सब के नाम लैत छह.</p>
<p>कुल मिला केँ हम इएह लिखब जे हरिमोहन झा जी सन लेखक यदि चाहिथैत तेँ बिना धर्म आ सँस्कृतिक निन्दा केने चुडा-दही-चीनी केँ आगू बढबैत बहुत बढिया लिखि सकैत छलाह. तथापि,  यदि साहित्य केर दृष्टि सँ देखल जाए ते व्यँग आ ह्यूमर'क ई किताब एकटा अति विशिष्ठ उदाहरण अछि.</p>
<p align="right">---पद्मनाभ मिश्र</p>
]]></content:encoded>
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