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	<title>पर्यटन &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/पर्यटन/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "पर्यटन"</description>
	<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 19:24:08 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ बीबी का मकबरा]]></title>
<link>http://dilipbirute.wordpress.com/?p=69</link>
<pubDate>Fri, 06 Jun 2008 05:13:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रा.डॊ.दिलीप बिरुटे</dc:creator>
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<description><![CDATA[नमस्कार, आम्हाला आमच्या ऐतिहासिक औरं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div><span style="font-size:14pt;font-family:APS-DV-Sheweta;"><span style="color:#0000ff;">नमस्कार, आम्हाला आमच्या ऐतिहासिक औरंगाबाद शहराचं फार कौतुक. प्रत्येकाला प्रत्येकाच्या शहरात अभिमान वाटावा अशा काही कलाकृती सतत आनंद देत असतात. ताजमहालाची प्रतिकृती असलेला बीबी का मकबरा त्या पैकी एक.!!!</span></span></div>
<div></div>
<div><span style="font-size:14pt;font-family:APS-DV-Sheweta;"></span></div>
<p><span style="font-size:14pt;font-family:APS-DV-Sheweta;"><span style="color:#0000ff;"></p>
<p style="text-align:center;" align="left"><img class="aligncenter" src="http://farm3.static.flickr.com/2251/2466665425_c792bfd254.jpg" alt="बीवी का मकबरा" width="500" height="375" /></p>
<p align="left">
<p align="left">या महालात औरंगजेबाची पत्नी राबिया दुर्रानीची कबर आहे. ही कबर औरंगजेबाच्याच काळात बांधलेली आहे असे म्हणतात. परंतु ही प्रतिकृती मलिकाच्या मुलाने आजम शाहने १६७९ इ.स. मध्ये आपल्या आइच्या स्मरणार्थ बनविली आहे.  आगर्‍याचा ताजमहाल संगमरवरी दगडाचा बनलेला आहे. तर मकबरा हा पांढर्‍या मातीपासुन (प्लास्टर)  बनविलेला आहे. एका भव्य दरवाजातून प्रवेश केल्यावर प्रवेशदारात मोठा पाण्याचा हौद आहे. त्यात डोलणारी कमळांची फुले लक्ष वेधुन घेतात. त्यानंतर पुढे कारंजे आणि दोन्ही बाजूने दगडी रस्ता आहे. दोन्ही बाजुने सरुची वृक्ष लावलेली आहेत. बीबीच्या मकबर्‍याची भव्यता आणि सौंदर्य डोळ्यात साठवण्याच मोह व्हावा. मकबरा एक भव्य ओट्यावर बांधलेला आहे. मकबर्‍यात मधोमध बेगम राबियाची कबर आहे. पुर्वी थेट तिथे जाता येत होते आता तो भाग प्रवेशासाठी बंद केला आहे. कबरीच्या चारही बाजुने संगमरवरी जाळ्या बसवल्या आहेत. कबरीची रचना करतांना वरील छतांच्या खिडक्यांची  अशी रचना केलेली आहे की त्या कबरीवर दिवसा सुर्याची किरणे आणि रात्री चंद्राचा प्रकाश त्या कबरीवर पडतो. मकबर्‍याचा घुमट संगमरवरी दगडाचा बनलेला आहे. भव्य ओट्यावर चारही बाजुने दोन ताळी मिनार बांधलेले आहेत. कधी काळी मिनारावर जाता येत होते. पण लोकांनी इहलोकाची यात्रा संपवण्यासाठी या जागेची निवड केल्यामुळे हा रस्ता कायमचा बंद करण्यात आलेला आहे.</p>
<p align="left"><a title="29042008018 by Dilip Birute, on Flickr" href="http://www.flickr.com/photos/9806898@N02/2467263040/"></a></p>
<p align="center"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2337/2469154871_c0f07c4b11_m.jpg" alt="29042008042" width="240" height="180" /></p>
<p align="left">औरंगजेब व त्याची बेगम यांच्या वापरात येणार्‍या काही वस्तु भांडे, फर्निचर,वस्त्र, लाकडी फर्निचर,  या संग्रहात ठेवले आहे. पण हे संग्राहलय सुद्धा बंद करण्यात आलेले आहे.</p>
<p align="left"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2413/2467508398_ded45236ac_m.jpg" alt="29042008032" width="240" height="180" /> <img style="width:184px;height:184px;" src="http://farm3.static.flickr.com/2203/2467519276_a5c904f389_m.jpg" alt="29042008035" width="180" height="240" /> <img style="width:181px;height:187px;" src="http://farm3.static.flickr.com/2343/2469961902_d9c1c0c3c9_m.jpg" alt="29042008037" width="180" height="240" /></p>
<p align="left">आजुबाजुच्या वीट भट्ट्यांमुळे संगमरवरी वास्तु काळी पडत  आहे. त्याला रंगकाम देण्याचे काम सतत चालले असते. <a title="29042008035 by Dilip Birute, on Flickr" href="http://www.flickr.com/photos/9806898@N02/2467519276/"></a></p>
<p align="center"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2208/2463597996_0cdbc1707a_m.jpg" alt="मकाइ दरवाजा" width="240" height="180" /></p>
<p align="center">औरंगाबाद शहरात किमान सोळा किंवा अधिक दरवाजे अजुनही येणार्‍या जाणार्‍याचे स्वागत करुन  गतकाळाची आठवण देत असतात.</p>
<p style="text-align:center;" align="center"><img class="aligncenter" src="http://farm3.static.flickr.com/2243/2467263040_59c88a1173_m.jpg" alt="29042008018" width="180" height="240" /></p>
<p align="center">
<p align="center">पुरातत्व खात्याने जर इमारतींची काळजी घेतली नाही तर आजुबाजुच्या वीटभट्ट्यामुळे ही सुंदर शिल्प काळाचे पडद्याआड जातील असे मात्र राहुन राहुन वाटते.</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p></span></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चलो सेंट लूशिया द्वीप]]></title>
<link>http://mahavir.wordpress.com/2008/01/22/%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%b2%e0%a5%82%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Tue, 22 Jan 2008 20:33:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>महावीर</dc:creator>
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<description><![CDATA[चलो सेंट लूशिया  द्वीपः
महावीर शर्मा
स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a title="stlucia-skipper-iain.jpg" href="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/stlucia-skipper-iain.jpg"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/stlucia-skipper-iain.thumbnail.jpg" alt="stlucia-skipper-iain.jpg" align="left" /></a><strong>चलो सेंट लूशिया  द्वीपः</strong><br />
महावीर शर्मा</p>
<p>सन् १९९२ में नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित लेखक ' डेरिक वालकोट' ने सेंट लूशिया में ' कास्ट्रीज'स्थान पर ही जन्म लिया था। उन्हों ने कहा था कि वह नहीं चाहते थे कि पर्यटकों  के हुजूम यहां आ कर इस स्थान का प्रकृतिक सौंदर्य तहस-नहस करें। किंतु प्रकृति-प्रेमी कैसे रुक सकते थे।</p>
<p>फ्रांसीसी  और ब्रिटिश मिश्रित सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को अपनाए हुए,२७ मील लंबा और १४<br />
मील चौड़ा आम के आकार का पूर्वी कैरिबियन शृंखला और मारटीनीक्यू तथा सेंट विंसेंट और बारबेडौस<br />
के मध्य प्राकृतिक-सौंदर्य से ओत-प्रोत, १६०००० जन-संख्या का यह छोटा सा द्वीप पर्यटकों के आकर्षण<br />
का केंद्र बनता जा रहा है। हरी-भरी वादियां, मछुवाओं के गांव, अग्नि उगलती हुई ज्वालामुखी, खौलते<br />
हुए पानी के चश्मे, सफेद रेतीले समुद्री तट देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे किसी काल्पनिक-लोक में<br />
विचर रहे हों।  समुद्र के किनारों पर पहाड़ियों की चोटियां, समुद्र-तल से दो हजार फुट की ऊंचाई पर दो<br />
शंकु की आकृति के पिटन, बरसाती-जंगल, भांति भांति के सुंदर मनमोहक फूल, उन्मत्त शतावरी<br />
(आर्किड), विशाल झाड़ीदार पौदे, उष्ण-कटिबंधी लाजवाब पक्षी, सेंट लूशियाई तोते, नाना प्रकार के फलों के वृक्ष, मिनरल बाथ आदि विहंगम दृष्य पर्यटक को अन्य कैरिबियन स्थानों में नहीं मिलेंगे।</p>
<p>भाषाः  सेंट लूशिया में अनेक सभ्यताओं का प्रभाव रहा है, इसलिए अंग्रेजी, फ्रैंच, करिबियन<br />
आदि भाषाओं का विकृत तथा मिश्रित रूप मिलता है। उनकी अपनी भाषा "पटवा" कहलाती है।<br />
फ्रैंच के प्रभाव के कारण, शब्दों का उच्चारण स्पैलिंग से बहुत भिन्न हो जाता है जैसे(Gross Islet ):ग्रोस ईले, (Petit Piton ):पटीट पिटौं, (Jambe de Bois): ज़ांब  ड  बुआ आदि।</p>
<p>दर्शनीय-स्थानः</p>
<p>कास्ट्रीज : तप कर बना शहर<br />
'कास्ट्रीज' सेंट लूशिया की राजधानी है जो हरी भरी पहाड़ियों से घिरी हुई बंदरगाह के दक्षिणी तट पर<br />
स्थित है। इसका कुछ भाग दीर्घ-काल पूर्व अग्निशमित ज्वालामुखी क्रेटर में बना हुआ है। सारा नगर नया<br />
लगता है क्योंकि सन् १९४८ में इस नगर में एक भयानक आग के कारण पुराना नगर ध्वंस हो गया था।<br />
कास्ट्रीज वास्तु-कला की दृष्टि से विशेष आकर्षक नहीं लगता किंतु इसकी मार्केट पूरी वेस्ट इंडीज़ में बड़ी<br />
ही चित्ताकर्षक है। रविवार को छोड़कर, प्रत्येक दिन यह पैंठ के स्टाइल की मार्केट खुली रहती है। शुक्रवार<br />
और शनिवार को यहां की चहल-पहल और स्टालों को देखते हुए घूम घूम कर समय का पता ही नहीं चलता।<br />
स्थानीय स्त्रियां अपनी पारंपरिक वेश-भूषा में, सिर ढकने के अनोखे अंदाज में जिस पर गांठों की संख्या जो<a title="st-lucia-atlantic-coast.jpg" href="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-lucia-atlantic-coast.jpg"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-lucia-atlantic-coast.thumbnail.jpg" alt="st-lucia-atlantic-coast.jpg" align="left" /></a><br />
उनके विवाह-गठ-बंधन का द्योतक है, फल-सब्जियों की भरमार, दस्तकारी के सुंदर नमूने जैसे टोकरियां,मिट्टी से बनी हुई बड़ी कलात्मक आकर्षक वस्तुएं आदि सैलानियों को अपनी मोहकता में लिपटा सा लेते हैं।बड़ी दुकानें और स्टोर विलियम बुलेवर्ड और ब्रिज स्ट्रीट में ही मिलती हैं। कुछ स्टोर ड्यूटी-फ्री वस्तुएं भी विक्रय करते हैं। अच्छे बोन-चाइना के सैट, पर्फ्यूम, घड़ियां, शराब और शीशे की चीजें उपलब्ध हैं।</p>
<p>मोर्न फोर्चून  में १८वीं शताब्दी में फ्रेंच और ब्रिटिश के मध्य घमासान युद्ध हुआ था।  इसलिए ऐतिहासिक<br />
पृष्ठ-भूमि के कारण भी इसका महत्व माना जाता है। यहां मिलिट्री कब्रिस्तान, संग्रहालय, 'चार अपौसल्स<br />
बैट्री' जो एक पुरानी तोप है, गवर्न्मेंट  हाउस जो अब सेंट लूशिया के गवर्नर जनरल का निवास स्थान है।<br />
यहां का उद्यान दर्शनीयहै। सिंदूरी और जामनी 'बूगेनविलिया' लताएं देखते ही बनती हैं। यहां से<br />
' कास्ट्रीज' की बंदरगाह का विस्मय-जनक दृष्य देखने में बड़ा आनंद आता है।</p>
<p>'पिजन आइलैंड : नेशनल पार्क<br />
उत्तर की ओर प्रसिद्ध 'पिजन आइलैंड'(कबूतर द्वीप) है। एक समय था कि इस ४४ एकड़ भूमि में असंख्य<br />
लाल गर्दन वाले कबूतरों ने धावा बोल दिया था और इसे अपनी छावनी ही बना डाली थी। इसीलिए इसका<br />
नाम 'पिजन आइलैंड' पड़ गया। यह जगह भी प्रकृति-संपदा से सम्पन्न है। सेंट लूशिया का यह पहला<br />
नेशनल पार्क है जिसका मुख्य भाग एक सेतु मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। इसके पश्चिमी समुद्र पर दो सफेद<br />
रेतीले तट हैं। बहुत समय की बात है, “ज़ांब ड बुआ” नामक एक समुद्री दस्यु जिसकी टांग लकड़ी  की<br />
बनी हुई थी, इस जगह में छुप गया था। उसी के नाम पर यहां एक रेस्तरां भी है। यहां एक 'इंटरप्रिटेशन सैंटर'<br />
है जिसमें शिल्प-कृतियों के अतिरिक्त मिलिट्री मीडिया के द्वारा स्थानीय इतिहास की प्रदर्शनी की गई है। इसमें १००० ई. में अमेरीडियनों के कब्जे से लेकर 'सेंट युद्ध' तक का विवरण है। उस युद्ध में एडमिरल रॉडनी<br />
के जहाज़ी बेड़े ने फ्रांसीसी एडमिरल ग्रासे को सन् १७८२ में परास्त किया था।</p>
<p>राडनी बे की जवां रातें :<br />
कास्ट्रीज के उत्तर में ' राडनी बे' में मानव-कृत एक समुद्र-ताल ( लगून ) है। रात्रि के समय यहां केंद्र में<br />
'जाज़ कलब' और ' रेस्टोरेंट सेंट लूशिया ' में जाज़-संगीत और ' ब्लूज़ संगीत ' के कार्य-क्रम के कारण रात्रि-जीवन सजग रहता है।  यदि आपको 'पब' में जाकर अपनी 'मद पिपासा' बुझाने का शौक है तो आइरिश<br />
स्टाइल 'शैमरॉक पब' रात को खुला रहता है।समस्त कैरेबियन में यहां के मरीना की जल-क्रीड़ा का केंद्र<br />
बड़ा ही दिलकश है।</p>
<p>'मेरीगोल्ड बे :<br />
<a title="st-luciamarigold-bay.jpg" href="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-luciamarigold-bay.jpg"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-luciamarigold-bay.thumbnail.jpg" alt="st-luciamarigold-bay.jpg" align="left" /></a> कास्ट्रीज के दक्षिण में १३ किलो मीटर पर 'मेरीगोल्ड बे' में हर प्रकार की नौकाओं की दौड़ का मनोहारी रोमांचकारी दृष्य देख कर दर्शक भाव-भोर हो जाता है। किनारे पर ताड़ के वृक्षों की शृंखलाओं का ना भूलने वाला नज़ारा मानस-पटल पर छा जाता है। निस्संदेह, पिकनिक के लिए यह स्थान उपयुक्त है।<br />
खाड़ी के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने के लिए २४ घंटे नाव उपलब्ध रहती है।<br />
फिल्म-निर्माताओं के लिए यह मनोहारी स्थान लोक-प्रिय रहा है। सिने-अभिनेत्री 'सोफिया लारेन' की<br />
प्रसिद्ध फिल्म 'फायर पावर' के कई दृष्यों की शूटिंग इसी जगह पर की गई थी। सन् १९६७ में बनी हुई<br />
फिल्म ' डॉक्टर डूलिटिल ' की भी शूटिंग यहां  हुई थी। 'मेरीगोल्ड बीच होटल' का एक भाग<br />
' डूलिटिल ' के नाम पर रखा गया है जहां शनिवार को रात के समय ' स्टील बैंड ' के संगीत के साथ<br />
खाने का प्रबंध भी होता है।</p>
<p>सेंट लूशिया की दूसरी बड़ी बस्ती और सब से पुराना नगर 'सूफ्रीअर' है। यह दो शंकु के आकार की दो<br />
चट्टानों के लिए प्रसिद्ध है जो ' पेटिट पिटन '(पिटौन) और ग्रास पिटन' कहलाती हैं। इनकी ऊंचाई<a title="Direct link to file" href="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-luciachop-pitons.jpg"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-luciachop-pitons.thumbnail.jpg" alt="st-luciachop-pitons.jpg" width="171" height="113" align="right" /></a><br />
७३८ मीटर ६९६ मीटर हैं। दीर्घकाल पहले यहां एक ज्वालामुखी पहाड़ में भयानकविस्फोट हुआ था।उसके लावा और पत्थरों से यह दो पिटन इस आकार में स्वतः ही निर्मित हो गये थे। अब  इन पर वनस्पति का राज है जन्हें मीलों की दूरी से देखा जा सकता है। इनके निचले भाग पर समुद्र की लहरोंसे टकराने का संगीत अनोखा समां बना देता है। ग्रॉस पिटन पर आप चढ़ सकते हैं किंतु वन-विभाग से स्वीकृति लेनी आवश्यक है या आपके साथ गाईड अथवा ऐसा व्यक्ति साथ होना चाहिए जिसे इस विषय में पर्याप्त जानकारी हो।</p>
<p>ड्राइव-इन-वोलकेनो :<br />
' माउंट सूफ्रीअर' एक सजीव ज्वालामुखी है जहां हर समय आग सजग रहती है। यहां  कभी भी<br />
विस्फोट की संभावना रहती है परंतु आपको घबराने की जरूरत नहीं है। इसमें आग की गरिमा से<br />
<a title="st-lucia-drive-in-volcano.jpg" href="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-lucia-drive-in-volcano.jpg"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-lucia-drive-in-volcano.thumbnail.jpg" alt="st-lucia-drive-in-volcano.jpg" align="left" /></a> कीचड़ सी उबलती रहती है। ज्वालामुखी तक कार द्वारा जा सकते हैं जिसे ' ड्राइव-इन-वोलकेनो '<br />
की संज्ञा दी गई है। ज्वालामुखी-विपर (क्रेटर) में गंधक की गंध आती रहती है। कार द्वारा आप इस मिलियनों वर्षों पुराने विलक्षण क्रेटर को देखकर किसी जादू-नगरी का सा अनुभव करेंगे। गंधक के झरने और भाप से भरे हुए ताल के बीच चलकर कौतुहल होता है। इसका शुल्क २. ६० डालर है जिसमें गाइड सम्मलित है। समय सुबह ९ बजे से सांय ५ बजे तक निश्चित है।</p>
<p>अद्वितीय आकर्षण :<br />
समीप ही ' डायमंड बाटनिकल गार्डंस ' में ' डायमंड मिनरल बाथ ' स्थित है। यहां ' वाटरफाल ' इस द्वीप<br />
का अद्वितीय आकर्षण है। यह जलप्रपात पीले रंग से काला, फिर हरा और फिर स्लेटी रंग में दिन में कई<br />
बार बदलता रहता है। 'बाथ' सन् १७८४ में सोलहवें लूई राजा की आज्ञा से बनवाए गए थे। इनका तापमान<br />
४० डिग्री सेंटिग्रेड रहता है। साढ़े पांच डालर में आप 'बाथ' में स्नान करके स्वास्थ्य-लाभ उठा सकते हैं।</p>
<p>अन्य जानकारीः<br />
सेंट लूशिया जाने से पहले स्वदेश में ही पूरे द्वीप का टूर का ट्रेवल-एजेंसी द्वारा प्रबंध करने से दौड़-धूप<br />
और समय बच जाता है। वैसे वहां पहुंचकर अपनी इचछानुसार भी अपने ढंग से द्वीप का भ्रमण करना<br />
कठिन नहीं है।<br />
दूर देशों से आए हुए विमान प्रायः ' ह्युआनोरा इंटर्नेशनल एयरपोर्ट ' पर उतरते हैं जो कास्ट्रीज से<a title="st-lucia-map.gif" href="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-lucia-map.gif"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/01/st-lucia-map.thumbnail.gif" alt="st-lucia-map.gif" align="right" /></a><br />
दक्षिण दिशा में ७२ किलोमीटर की दूरी पर है और टैक्सी या हैलिकॉप्टर  द्वारा जाया जाता है।<br />
टैक्सी में चार व्यक्तियों का किराया लगभग ६५ डालर और हैलिकॉप्टर का १०० डालर प्रतिव्यक्ति है।हैलिकॉप्टर के लिए ७५८/४५३-६९५० पर टेलिफोन करके बुक कर सकते हैं। वहां के लोग औरटैक्सी ड्राइवर बहुत ही अच्छी तरह बात करते हैं और सहायता करने में अपना गर्व अनुभव करते हैं।वही टैक्सी-ड्राइवर गाइड का काम भी करता है। आप पूरे दिन का टूर १३२ डालर में या आधे दिन काटूर भी ले सकते हैं।</p>
<p>'बस' से भी सफर कर सकते हैं। कास्ट्रीज से 'सूफरिरे' या ' वीयू ' आदि स्थानों के लिए 'मिनी बस'<br />
जिसे वहां 'लूशियन लव' कहते हैं, द्वारा यात्रा की जा सकती है पर इनमें बहुत भीड़ होती है। साथ ही<br />
मार्केट के दुकानदारों का बेचने का माल भी ठूंस कर भर लिया जाता है। यह 'बस' कास्ट्रीज में मार्केट के<br />
पास ब्रिज स्ट्रीट से मिलती है।<br />
कुछ टूर जिनमें तटीय भ्रमण, नौका-विहार, कैंपिंग, फ़िशिंग, गोल्फ, घुड़सवारी, स्कूबा डाइविंग, टेनिस<br />
और जल-क्रीड़ा आदि सम्मलित हैं, कास्ट्रीज से बुक किए जा सकते हैं। हैलीकाप्टर द्वारा ऊपर से<br />
विहंगम-दृष्य का आनंद कुछ और ही है। ऊपर से पूरे द्वीप के विभिन्न स्थानों, वनों, समुद्र, ज्वालामुखी,<br />
पहाड़ आदि की हवाई-सैर का विलक्षण अनुभव होता है।</p>
<p>'रौडनी बे' में 'राज़मताज़' नामक एक भारतीय रेस्तराँ भी है। वहीं 'कपोंस' नाम का<br />
इटालियन और ' दि चार्ट हाऊस' तथा 'दि लाईम' अमेरिकन और कैरिनबियन स्टाईल<br />
का 'दि मार्टर एंड पेसल' रेस्तराँ हैं। कैरिबियन स्टाईल के 'सुफ़रीरे' में भी 'कमीला',<br />
'दशीने''लाईफ़ लाईन' आदि रेस्तराँ हैं।</p>
<p>सेंट लूशिया में पांच सितारे की अधिक आकांक्षा ना करें। अच्छे स्तर और साधारण होटल<br />
हर जगह मिल जाते हैं। यदि बच्चों के साथ जारहे हो और तीन सितारा गवारा हो तो 'सेंट<br />
लूशिया बाई स्प्लैश’ आदि ठीक हैं। 'अंसे चेसटानेट', 'जलूसली हिल्टन रिसोर्ट' आदि तीन<br />
सितारे स्तर के होटल हैं।</p>
<p>बैंक सोमवार से बृहस्पतिवारसुबह ८ बजे से दोपहर १२ बजे तक खुलते हैं। ए.टी.एम.<br />
मशीनें बैंकों, शापिंग मौल, ट्रांसपोर्टेशन सैंटर में मिलती हैं।</p>
<p>एयरपोर्ट में कस्टम से गुजरते हुए बहुत सतर्क रहें। यदि जरा सा भी किसी प्रकार का संदेह<br />
हो जाए तो बहुत परेशानी का सामना पड़ता है। सब जगह अपनी आवश्यक और मूल्यवान<br />
वस्तुओं की निगरानी रखना ठीक रहता है।</p>
<p>यदि होटल में फैक्स की सुविधा ना हो तो 'कास्ट्रीज' में 'केबल एंड वायरलैस' बिल्डिंग में<br />
कोशिश कीजिए। पीने के लिए पानी ठीक है पर फिर भी बोतल का पानी अधिक सुरक्षित है।<br />
सेंट लूशिया की भाषा साधारणतया अंगरेजी और फ्रैंच मिश्रित है। वहां की मुद्रा 'ईस्ट<br />
कैरिबियन डालर' है। यदि आवश्यकता हो तो आपातकाल में पुलिस को ९९९ पर या<br />
एमज्बुलेंस को ९११ पर फोन कर सकते हो।</p>
<p>महावीर शर्मा<br />
<a href="http://kontactr.com/user/mahavir"><img src="http://mahavir.wordpress.com/files/2008/02/email-button-2thumbnail.thumbnail.jpg" alt="" /></a></p>
<p><a href="http://www.copyscape.com/"><img src="http://banners.copyscape.com/images/cs-gy-234x16.gif" border="0" alt="Page copy protected against web site content infringement by Copyscape" width="234" height="16" /></a></p>
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<title><![CDATA[देवगिरी किल्ला: दौलतींचे शहर ( दौलताबाद)]]></title>
<link>http://dilipbirute.wordpress.com/2007/12/16/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 13:45:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रा.डॊ.दिलीप बिरुटे</dc:creator>
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<description><![CDATA[नमस्कार मिसळपाव,उपक्रम,किंवा माझे शब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:14pt;font-family:APS-DV-Sheweta;"><font color="#0000ff">नमस्कार मिसळपाव,उपक्रम,किंवा माझे शब्द या मराठी संकेतस्थळांवर लेणी स्थापत्याबद्दल काही लेखन टाकावे.  या उद्देशाने एक दिवस  वेरूळ लेण्यावर पोहचलो. पण, तिथे हा <a href="http://farm3.static.flickr.com/2318/2085527297_94a5d58644.jpg">फलक </a>पाहिला. जरासा  नाराज झालो.</p>
<table class="image" style="width:1%;float:left;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2276/2085531393_f1d8e33d29_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007078" /></a></p>
<div style="text-align:center;">देवगिरीचा किल्ला   </div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>आणि मग दौलतींचे शहर म्हणून विख्यात असलेल्या दौलताबादला भेट द्यावी, असा विचार केला. खरे तर अनेकदा हा किल्ला चढलोय पण, वयपरत्वे जाणीवाही बदलत जातात असे म्हणतात  आणि तोच वृत्तांत आपणासाठी  इथे टंकत आहे. इतिहास आमचा कच्चा असल्यामुळे, काही  चुकीचे लिहिले असेल तर ते आपण तपासून घ्यावे.   या शहराने आणि किल्ल्याने अनेक वंशाचे उत्थान पाहिले. यादव, खीलजी, मोगलवंश हे त्यापैकी आहेत,  असे म्हणतात. </p>
<p>महाराष्ट्रात जे काही भुईकोट किल्ले आहेत त्यापैकी हा एक.  युद्धपद्धती आणि युद्धकलेतील गरजांच्या फेरबदलांना अनुसरुन या किल्ल्याची रचना आणि बांधणीही वेळोवेळी होत गेली असावी. याचसाठी दौलताबादचा किल्ला सैन्यवास्तुकलेतील प्रगतीचे प्रतीक म्हणून गणला जातो. </p>
<p>ह्या किल्ल्याचा नकाशा, भिंती आणि प्रवेशद्वाराची रचना अशी योजनाबद्ध रीतीने करण्यात आलेली आहे की, शत्रूच्या हल्ल्यापासून किल्ला सुरक्षित राखता येईल असे  वळणा-वळणाचे अरुंद रस्ते शत्रुसैन्याच्या सहज प्रवेशाला थोपवून धरतात. तर उंच,उंच भिंती किल्लेबंदी करणा-या उरतात. संपूर्ण किल्ला चहूकडून जलमय कालव्यांनी वेढलेला आहे. किल्ल्याची उंची गाठण्यासाठी डोंगर पोखरुन तयार करण्यात आलेल्या दूर्गम, अतिसुरक्षित असे अंधारे बोगदे  ओलांडावे लागतात. किल्ल्याच्या या रचनेमुळे लक्षात येते की, शत्रुची दिशाभुल करण्यासाठी आणि त्याला फसवण्यासाठी अशी रचना केलेली असावी. </p>
<p>किल्ल्याच्या एका बाजूला दहा कि,मी. भिंत पसरलेली आहे. किल्ल्यात प्रवेश करतांना एक महादरवाजा आहे, या दरवाजावर हत्तींचा हल्ला थोपवण्यासाठी टोकदार खिळे ठोकण्यात आलेली आहेत. यातून प्रवेश केल्यावर प्रत्येक गल्लीत पहारेक-यांच्या कोठड्या बांधण्यात</p>
<table class="image" style="width:1%;float:right;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2071/2085536051_fa40941702_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007081" /></a></p>
<div style="text-align:center;">किल्ल्यामधे प्रवेश करतांना अनेक मोठे दरवाजे पार करावे लागतात. </div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>आलेल्या आहेत. या कोठड्यामधे काही जूनी वापरण्याजोगी अवजारे ठेवण्यात आली</p>
<table class="image" style="width:1%;float:left;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2259/2085587915_a2ae42ae1c_m.jpg" width="180" height="240" alt="20112007253" /></a></p>
<div style="text-align:center;">चांद मिनार</div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>आहेत. इथेच हत्ती हौद आहे. तसेच जैन मंदिरही आहे. पुढे त्याची तोडफोड करुन येथे मशिद उभारलेली आहे, आणि नंतर त्याचीही तोडफोड करुन तेथे आता एका भारतमातेचे मंदिर उभारण्यात आलेले आहे. हे बद्ल स्वातंत्र्यानंतर झाले असावेत. </p>
<p>चांद मीनार. या मंदिरातून म्हणजे रस्त्याच्या डाव्या बाजूला हे मंदिर आहे तर उजव्या बाजूला चांद मिनार आहे. दोनशे दहा फूट उंचीचा एक गोलाकृती मीनार येथे आहे. आता तो प्रवेशासाठी बंद करण्यात आलेला आहे.चांदमीनाराच्या पुढे कालाकोट प्रवेशाद्वारानजिक हेमांडपंथी मंदिराचे भग्नावशेष  सापडतात.पण आता या किल्यावरुन ते हटवण्याचे काम चालू आहे, पुरातत्वे विभागाला त्याच्याशी काही घेणे नाही. अशा अविर्भावात ते सर्व रस्त्याच्या कडेला पडून आहेत.  </p>
<table class="image" style="width:1%;float:left;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2005/2085557619_b8088a2814_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007118" /></a></p>
<div style="text-align:center;">चीनी महल</div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>भिंतीचा तिसरा भक्कम भाग कालाकोटचे प्रवेशद्वार, पुढे एका डोंगरावर आहे, यावर पोचण्यासाठी पाय-या बांधण्यात आलेल्या आहेत. इथे तीन दरवाजे समकोन स्थितीत आहेत. शत्रुसैनिकावर समोरुन आणि मागच्या बाजूस हल्ला करता यावा या उद्देशाने तशी रचना असावी असे वाटते. याच्या वरती उंचावर एका महालाचे अवशेष असून  या महालाला चीनी महल म्हटल्या जती. यातील सजावटीसाठी चीनी टाइल्स वापरण्यात आल्या होत्या. औरंगजेबाने गोलकोंडाचा अंतिम राजा सुल्तान आबूल हुसैन तानाशाह आणि विजापुरचा अंतिम शासक सुल्तान सिकंदर यांना इथेच कैदेत ठेवलेले होते. </p>
<p>रंग महाल येथुन डावीकडे एक लहानश्या प्रवेशद्वारातून आत गेल्यावर रंगमहालाचे भग्नावशेष सापडतात विभिन्न खोल्या  आणि महालाच्या</p>
<table class="image" style="width:1%;float:right;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2386/2085575611_f6f63561e6_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007237" /></a></p>
<div style="text-align:center;">रंग महाल</div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p> सुनियोजित  बांधणीव्यतिरिक्त यातील खांब आणि खणामधील लाकडांवर केलेलं  नक्षीकाम पर्यटकांना गतवैभावाची आठवण करुन देतात.(इथेही आता प्रवेश करु देत नाही. पाच रुपयाची लाच देऊन इथे प्रवेश करता येतो.लोकांना याची उत्सुकता असत नाही. आणि लोक इथे प्रवेशाचा हट्टही करत नाही. कारण तिथे पाहण्यासारखे काय  आहे, असे म्हण्तात.)</p>
<p>मेंढा तोफ या तोफेचे मुळ नाव शिकन तोफ होती असे म्हणतात.  पण तिच्या आकारावरुन तिला<a href="http://farm3.static.flickr.com/2396/2085557511_7a84fc9739_o.jpg"> मेंढा</a> तोफ असे आता नाव प्रचलीत आहे. या तोफेवर दोन उल्लेख आहे, संपूर्ण खिताबासहीत एक औरंगजेबाचा आणि दुसरा तोफ निर्मात्याचे नाव मुहमद-हुसेन अमल-ए-अरब असे लिहिलेलं आहे. असे मार्गदर्शकाराने सांगितले.  बुरुजाच्या मध्यभागी तोफेचे तोंड फिरवण्याची व्यवस्था आहे.जेणेकरुन दुर-दुर मारा करण्यात यावा. </p>
<table class="image" style="width:1%;float:left;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2005/2085557795_568029b1fb_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007120" /></a></p>
<div style="text-align:center;">किल्ल्यावर प्रवेश करण्यासाठी  यादवकालीन मार्ग </div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>दरी महालाच्या सभोवताली डोंगर पोखरुन केलेली दरी दिसते ते साधारणतः पन्नास</p>
<table class="image" style="width:1%;float:right;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2076/2086341596_586e07a806_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007121" /></a></p>
<div style="text-align:center;">किल्ल्यावर प्रवेशासाठी आधुनिक लोखंडी पूल.</div>
<td></tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p> ते शंभर फूट खोल असावी.  इथे या किल्ल्यात वरच्या बाजुला प्रवेश करण्यासाठी एकमेव रस्ता आहे. आणि सर्व बाजूंनी दरी आहे. आता किल्ल्यात प्रवेश करण्यासाठी एक आधुनिक पुल लोखंडाचा पर्यटकांसाठी केलेला आहे. आणि जुना पुल काहिसा विटा आणि दगडाचा वापर करुन बांधलेला आहे. हाच पुल पुर्वी पर्यायी रस्ता म्हणून वापरण्यात येत होता. दरीतील पाण्याची पातळी उभयबाजूंवरील बंधा-यावरुन नियंत्रीत करण्यात येत असे. धोक्याचे प्रसंगी शत्रुसैन्याला थोपवून धरण्यासाठी कोणत्याही एका धरणातून पाणी दरीत सोडण्यात येत असे आणि दुसरे धरण बंद करण्यात येई. त्यामुळे पाण्याची पातळी वाढत असे. या प्रकारे धोक्याच्या वेळेस हा पूल पाण्याखाली जात असे. आणि जो आधुनिक पूल दिसतो त्याचा उपयोग क्वचित प्रसंगी करतही असतील असे वाटते. म्हणून या किल्ल्यावर हल्ला करणे केवळ अशक्य असे वाटते. अर्थात फितुरीमुळे या किल्ल्याची वाट लागली हे सांगण्याची काही गरज नाही.</p>
<table class="image" style="width:1%;float:right;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2290/2085558673_76938ea7c9_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007129" /></a></p>
<div style="text-align:center;"></div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p> या डोंगरावर किल्ल्याच्या सुरक्षिततेसाठी, आणि शत्रुची दिशाभुल करण्यासाठी जागोजागी इथे वाटा आहेत. भुयारी मार्ग आहेत. इथे पुल ओलांडला की, काही अंधारे रस्ते ओलांडावे लागतात. इथे माणूस हरवल्यासारखा अनुभव येतो प्रत्येकाला हा किल्ला ओलांडून जाण्यासाठी या अंधा-या पाय-या ओलांडाव्याच लागतात. आणि यालाच समांतर असा एक पर्यायी रस्ता इथे आहे, ज्याच्यातुन इथे मार्गदर्शन करणारे, किल्ला अजिक्य कसा राहिला. शत्रुवर उकळते तेल टाकण्याच्या जागा कोणत्या,  शत्रुने प्रवेश केल्यावर तो जर चुकीच्या मार्गाने गेला तर सरळ दरीतच कसा जाईल. गुप्त कोठड्या, धुर सोडून शत्रुला अडवण्याची पद्धत, भुयारातुन लहान-सहान चाके सरकवून त्याचा फासासारखा वापर हे सर्व अद्भुत आहे, ते मात्र मार्गदर्शकाकडूनच पाहिले आणि ऐकले पाहिजे. हेच या किल्ल्यात पाहण्यासारखे वाटते.  अजूनही इथे  धोकादायक रस्ते, या अंधा-या गुहेत आहेत. मार्गदर्शकाशिवाय या रस्त्याने प्रवेश करु नये. किंवा मार्गदर्शकाचा उपयोग घ्यायचा नसेल तर सोप्या मार्गाने जावे, तो पार करतांनाही अंधा-या रस्त्याचा वापर करावा लागतो. भिंतीचा आधार घेत-घेत हा रस्ता विना-मार्गदर्शकाशिवाय अनेक पर्यटक  हा रस्ता सहज   पार करतात.</p>
<p>डोंगराळ वाटेवरच पाय-याची रांग लागली की तिथे एक <a href="http://farm3.static.flickr.com/2067/2086358414_7d5d2759e4_o.jpg">गणपतीचे </a>मंदिर आहे, तेव्हा केव्हापासून आहे, हे कोणासही निश्चित सांगता येत नाही.</p>
<table class="image" style="width:1%;float:left;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2151/2085565257_f4f1faca85_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007166" /></a></p>
<div style="text-align:center;">बारादरी (बारा दरवाजांचे निवासस्थान )</div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>बारादरी दमलेले पर्यटक जेव्हा पाय-यावरुन वर पोहचतात तेव्हा इथला बारादरीतले भव्य महालाच्या दर्शनाने जराशी विश्रांती घेतल्यावर सुखावतो. बारा कमाणी असलेली ही इमारत आहे,  इथे अष्ट्कोणी खोल्या आणि या खोल्यांची छत घुमटाकृती आहेत. त्यालगतच्या खोलीत लोखंडी खिडक्या आहेत. प्रत्येक दारावर एक खिडकी असून त्यातून मनोरम देखावे बघता येतात.  बारादरीचे बांधकाम दगड-चुन्याने केलेले दिसते. चुन्याच्या थराचे डिझाईन मोहक आहे.  इथे एक पाणी विक्रेता आहे एक रुपयात एक ग्लास विकून  पर्यटंकाची तहान तो भागवतो.इथून पुढे गेले की, पुढे शिखर बुरुज आहे.  शिखराकडे कडे जातांना डोंगर पोखरुन एक गुहा इथे दिसते.</p>
<table class="image" style="width:1%;float:right;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2239/2086357396_92571d4ff1_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007220" /></a></p>
<div style="text-align:center;">जनार्धन स्वामी (किल्लेदार)इथे निवास करत असत </div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>एकनाथांचे गुरु आणि या किल्ल्याचे किल्लेदार जनार्धनस्वामी इथे निवास करीत असे म्हणतात. राजकारण आणि युद्धानी त्रासलेल्या सामान्य जनतेस ते उपदेश, मार्गदर्शन करीत. किल्लेदार असुनही त्यांनी धार्मिक जीवनाची कास धरली संसारात अटकलेल्यांना  आणि अध्यात्माची कास धरणा-यां  सर्व धर्मियांना ही एक हक्काची जागा तेव्हा वाटत असावी. </p>
<p>याच गुहेत दोन भाग आहेत. एकीकडे अखंड प्रवाह असलेली जलधारा इथे आहे, मोतीटाका हे जलाशयाचे नाव.  प्रत्येक रुतुत इथे पाणी साठलेले असते आणि याच साठविलेल्या पाण्यातुन येणा-या पर्यटकांची तहान एक-एक रुपयात बारादरीत ती मिटवीली जाते.  पर्यटकांना माहित नसल्यामुळे धुर्त पाणी  विक्रेता ते पाणी इथुनच आणून विकतो. सहजपणे, हाताने पाणी घेऊन पीता येणारी जलधारा याच गुहेत आहे. </p>
<table class="image" style="width:1%;float:left;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2019/2085569583_8eb0c69312_m.jpg" width="240" height="180" alt="20112007199" /></p>
<div style="text-align:center;">किल्ल्यावरील सर्वात उंच भाग </div>
<p></a></td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>शिखरावर येईपर्यंत तीन-चार वेळेस बसत-उठत एकदाचा शिखरावर पोहचलो.  श्वासोश्वासाची गती वाढलेली होती. थकून गेलो होतो. या पेक्षा वेरुळलेणी पाहणे परवडले असते असे शिखरावर आल्यावर वाटत होते आणि तेव्हाच   या उंच जागेवरुन शहरातील आणि आजूबाजूचा डोंगरांचा परिसर नजरेत बसल्यावर  येण्याचा थकवा आणि आलेला कंटाळ्याचा विचार दुर निघून गेला. चारही बाजूने उंच उंच दिसणारे डोंगर अत्यंत सुंदर दिसते .बाला हिसार  हा शिखरावरील सर्वात उंच भाग आणि इथेच  <a href="http://farm3.static.flickr.com/2069/2086356258_a860d16419_o.jpg">श्री दुर्गा </a>नावाची तोफ</p>
<table class="image" style="width:1%;float:right;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2158/2085570859_3732398841_m.jpg" width="180" height="240" alt="20112007209" /></a></p>
<div style="text-align:center;">शिखरावरील  दुर्गा तोफ</div>
</td>
<p>&#60;/tr</p>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
<p>  आहे. किल्ल्याचा सर्वात उंच भाग हा आहे. इथेच विजयी द्ध्वज लावण्याची व्यवस्था आहे, थकलेला पर्यटक इथे कितीतरी वेळ नुसता बसून असतो.</p>
<p>           अतिशय सुरक्षीत असलेला यादवांच्या किल्ला केवळ फितुरीमुळे सत्तांतर झाले.त्या किल्ल्याचे  केवळ आता भग्नावशेष शिल्लक राहिले,  ज्यांच्या काळात बोली भाषेला प्रमाणभाषेचा दर्जा  मिळाला, ज्यांच्या  भरभराटीच्या काळात समृद्ध  शेती जीवनाने  काळ बहरलेला.  होता. यादवांचे प्रशासन, त्यांच्या छत्रछायेत साहित्य आणि कलेने चमोत्कर्ष गाठलेला होता. इतिहासात उल्लेख केलेल्या लुटीचा  येणारा उल्लेख... सहाशे मण सोने,सात मण मोती,दोन मण हिरेमाणकं आणि लक्षावधी रुपये, लुटले गेले. यादवांच्या पराभवानंतर झालेली प्रचंड लुटमार, अग्निकांड, आणि विनाशतांडवामुळे देवगिरीचे सौंदर्य पार कोमेजुन गेले. या आणि इतर इतिहासाच्या आठवणीने आम्ही किल्ला केव्हा उतरलो ते कळलेच नाही. </p>
<div style="text-align:center;"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2294/2085573985_aac58dcbab.jpg" width="500" height="375" alt="20112007223" /></a></p>
<div style="text-align:center;">बारादरीवरुन घेतलेले छायाचित्रे</div>
</td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
</div>
<div style="text-align:center;">
<table class="image" style="width:1%;border:1px solid #ccc;margin:0.1em;">
<tr>
<td><img src="http://farm3.static.flickr.com/2058/2085573127_9160c6778d.jpg" width="500" height="375" alt="20112007214" /></p>
<div style="text-align:center;">किल्ल्यावरुन दिसणारी तटबंदी
</div>
<p></a> </td>
</tr>
<tr>
<td class="caption"></td>
</tr>
</table>
</div>
<p>देवगिरी किल्ला : दौल्ताबाद. ता. जि. औरंगाबाद महाराष्ट्र ( औरंगाबादपासून १० कि. मी. अंतर )</font></span></p>
]]></content:encoded>
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