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	<title>पुस्तकें &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "पुस्तकें"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 10:16:54 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[राजनीति के ’पिंजर’ में फंसा लोकतंत्र]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/14/pinjar/</link>
<pubDate>Tue, 14 Aug 2007 12:06:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[अमृता प्रीतम का उपन्यास ’पिंजर’ मैंन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><img border="0" align="left" width="193" src="http://farm2.static.flickr.com/1427/1115344598_16e0c1c38b_o.jpg" height="227" /></font><font size="3">अमृता प्रीतम का उपन्यास ’पिंजर’ मैंने  तब  पढ़ा था पहली बार जब में स्कूल में ही था। उसके बाद जाने कितनी ही बार पढ़ लिया। आज जब हम आजादी की सालगिरह मना रहे हैं तो मन कहता है कि इस उपन्यास के बारे में कुछ लिखूं। बंटवारे की पृष्टभूमी पर लिखे गये इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। आप ने यदि यह उपन्यास नहीं पढ़ा और यदि इन्सानी दुखों से आपके हृदय पर सिलवटें पड़ती हैं तो इस उपन्यास को जरूर पढ़ें। यह उपन्यास आपके अस्तिस्व और आपकी सोच पर एक गहरा असर जरूर छोड़ कर जायेगा। जब मैंने पढ़ा तो कच्ची उम्र थी मेरी। उपन्यास का असर और भी गहरा हुआ।</font></p>
<p align="left"><font size="3">पिंजर कहानी है बंटवारे से पूर्व के हिंन्दुस्तान के पंजाब के एक गांव कि लड़की पूरो के दुखों की। हालांकि उपन्यास पूरी तरह पूरो की कहानी कहता है मगर साथ ही आपको उस समय की राजनैतिक हलचलों के कारण हो रहे घटनाक्रम के प्रभावों से बेचैन कर देता है। पूरे उपन्यास में अमृता जी ने कहीं भी कोई राजनैतिक बयान नहीं दिया, कहीं कोई पात्र कोई राजनैतिक वाक्य नहीं बोलता, मगर जैसे जैसे आप कहानी को पढ़ते जाते हैं, आपके अंदर एक गुस्सा उत्पन्न होता जाता है। आप जैसे जैसे पूरो के दुखों को पढ़ते हैं आप के अंदर वो गुस्सा धधकने लगता है, आप नफरत करने लगते हैं दुनिया भर के उन जिन्नाओं और नैहरूओं से जो अपनी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण जमीनों, देशों, समाजों और लोगों में बंटवारे करवाते हैं।</font></p>
<p align="left"><font size="3">दुख की बात यह है की आज भी हमारे राजनेता यही कर रहे हैं। आपने मेरी  कई पोस्टों में यह महसूस किया होगा कि मेरे मन में सभी राजनीतीबाजों के लिये एक नफरत हमेशा से रही है। यह बात सही है कि हमारा लोकतंत्र एक मजबूत लोकतंत्र है मगर हमारे राजनेता अभी भी जाति, धर्म और वर्गों के नाम पर हमें बांट रहे हैं। जातियों और धर्म के नाम पर चुनावों में टिकट दिये जाते हैं और जातियों और धर्मों के नाम पर ही चुनाव जीते जाते हैं। क्या  हमारे बुजुर्गों ने इसी जातियों, धर्मों, वर्गों और भाषाओं में बंटे हुए लोकतंत्र का सपना देखा था?</font><font size="3"> </font><font size="3"> </font></p>
<p align="left"><font size="3">अफसोस तो यह है कि सत्ता के लिये नफरत की यह कहानियां  अभी भी दोहरायी जाती हैं। कभी दिल्ली में  तो कभी गुजरात में ।</font></p>
<p align="left">इसी उपन्यास से एक अंश:</p>
<p align="left">(साफ न पढ़ पा रहे हों तो इमेज पर क्लिक करें)</p>
<p align="left"><font size="3"><a href="http://farm2.static.flickr.com/1343/1115321370_a710506423_o.jpg"><img border="0" width="645" src="http://farm2.static.flickr.com/1343/1115321370_a710506423_o.jpg" height="744" /></a></font></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left"><font size="3"><a target="_blank" href="http://farm2.static.flickr.com/1234/1115322058_d28c786d0d_o.jpg"><img border="0" width="684" src="http://farm2.static.flickr.com/1234/1115322058_d28c786d0d_o.jpg" height="1077" /></a></font></p>
<p align="left"><a target="_blank" href="http://farm2.static.flickr.com/1175/1114565617_8e31fda902_o.jpg"><img border="0" width="734" src="http://farm2.static.flickr.com/1175/1114565617_8e31fda902_o.jpg" height="1010" /></a></p>
<p>इसे भी पढ़ें</p>
<p><a rel="bookmark" href="http://aaina2.wordpress.com/2007/04/13/warisshah/"><font size="3" color="#444444">वारिस शाह नूं - अमृता प्रीतम</font></a></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[मंटो की कहानी - टोबा टेक सिंह]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/manto-toba-tek-singh/</link>
<pubDate>Wed, 08 Aug 2007 13:36:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/manto-toba-tek-singh/</guid>
<description><![CDATA[बंटवारे के दो तीन साल बाद पाकिस्तान और]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">बंटवारे के दो तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि इखलाकी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसल्‌मान पागल, हिंदुस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हें पकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागल-ख़ानों में हैं उन्हे हिंदुस्तान के हवाले कर दिया जाए।</font><font size="3">मालूम नहीं यह बात माक़ूल थी या ग़ैर-माक़ूल , बहर-हाल दानिश-मन्‌दों के फ़ैस्‌ले के मुताबिक़ इधर उधर ऊंची सतह की कान्फ्रेंसे हुईं , और बाल-आख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुक़र्‌रर हो गया। अच्छी तर्‌ह छान-बीन की गई। वह मुसल्‌मान पागल जिन के लवाहिक़ीन हिंदुस्तान में ही में थे, वहीं रह्‌ने दिए गए थे, जो बाक़ी थे उन को सर्‌हद पर रवाना कर दिया गया।_ यहां पाकिस्‌तान में चूंकि क़रीब क़रीब तमाम हिंदू सिख जा चुके थे, इस लिए किसी को रखने रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू सिख पागल थे, सब के सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।<br />
उधर का मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहोर के पागल-ख़ाने में जब उस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिल्‌चस्‌प चिह-मी-गूइयां होन लगीं। एक मुसल्‌मान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बा-क़ाइदगी के साथ " ज़मीन्‌दार " पढ़्‌ता था उस से जब उस के एक दोस्‌त ने पूछा " मोल्‌बी साब , यह पाकिस्‌तन क्‌या होता है",उस ने बड़े ग़ोर-ओ-फ़िक्‌र के बाद जवाब दिया," हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बन हैं।"</font><font size="3">यह जवाब सुन कर उस का दोस्त मुत्‌मईन हो गया।</font><font size="3">उसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा "सरदार-जी हमें हिंदुस्तान क्‌यूं भेजा जा रहा है --- हमें तो वहां की बोली नहीं आती?"</font><font size="3">दूसरा मुस्कुराया " मुझे तो हिंदुस्तोड़ो की बोली आती है --- हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिर्‌ते हैं।"</font><font size="3">एक दिन नहाते नहाते एक मुसल्‌मान पागल ने " पाकिस्तान जिंदाबाद " का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया ।<br />
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे। उन में अक्सरियत ऐसे क़ातिलों की थी जिन के रिश्तेदारों ने अफ़्‌सरों को दे दिला कर पागल-ख़ाने भिज्‌वा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जाएं। यह कुछ कुछ समझ्‌ते थे कि हिंदुस्तान क्यूं तक़्‌सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है? लेकिन सही वाक़िआत से यह भी बे-ख़बर थे। अख़बारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उन की गुफ़्‌तगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उन को सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आद्मी मुहम्मद अली जिन्ना है जिस को काइदे आजम कह्‌ते हैं। उस ने मुसल्‌मानों के लिए एक `इलाहिदा मुल्क बनाया है जिस का नाम पाकिस्‌तान है। यह कहां है , उस का मह्‌ल्‌ल-ए वुक़ू` क्या है। उस के मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जान्‌ते थे। यही वजह है कि पागल-ख़ाने में वह सब पागल जिन का दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था इस मख़्‌मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में? अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है? अगर वह पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अरसा पह्‌ले यहीं रह्‌ते हुए भी हिंदुस्तान में थे।<br />
एक पागल तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान, और हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़ियादा पागल हो गया। झाड़ू देते देते एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टह्‌नी पर बैठ कर दो घंटे मुसल्सल तक़्‌रीर कर्‌ता रहा जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। डराया धमकाया गया तो उस ने कहा --- " मैं हिंदुस्तान में रह्‌ना चाहता हूं न पाकिस्तान में --- मैं इस दरख़्‌त ही पर रहूंगा।"</font><font size="3">बड़ी मुश्किलों के बाद जब उस का दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू सिख दोस्तों से गले मिल मिल कर रोने लगा, इस ख्याल से उस का दिल भर आया था कि वह उसे छोड़ कर हिंदुस्तान चले जाएंगे।</p>
<p>एक एम एस सी पास रेडियो इन्जीनियर में जो मुसल्मान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रह्‌ता था यह तबदीली नमूदार हुई कि उस ने तमाम कप्‌ड़े उतार कर दफ़`अदार के हवाले कर दिए और नन्‌ग धड़न्‌ग सारे बाग़ में चलना फिरना शुरू` कर दिया।</p>
<p>चन्‌योट के एक मोटे मुसल्मान पागल ने जो मुस्लिम लीग का सर-गर्म कार्कुन रह चुका था और दिन में पन्द्रह सोलह मर्तबा नहाया करता था यक-लख़्‌त यह आदत तर्क कर दी। उस का नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उस ने एक दिन अपने जंगले में एलान कर दिया कि वह काइदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना है। उस की देखा देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंघ बन गया। क़रीब था कि उस जंगले में ख़ून ख़राबा हो जाए मगर दोनों को ख़तर्‌नाक पागल क़रार दे कर `अलाहिदा `अलाहिदा बंद कर दिया गया।<br />
लाहोर का एक नौजवान हिंदू वकील था जो मुहब्बत में ना-काम हो कर पागल हो गया था। जब उस ने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसी शह्‌र की एक हिन्दू लड़्‌की से उसे मुहब्बत हो गई थी। गो उस ने उस वकील को ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस को नहीं भूला था। चुनांचे उन तमाम हिन्दू और मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था जिन्हों ने मिल मिला कर हिंदुस्तान के दो टुक्‌ड़े कर दिए। --- उस की मह्‌बूबा हिंदुस्तानी बन गई और वह पाकिस्तानी।</p>
<p>जब तबादले की बात शुरू` हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे। उस को हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा। उस हिंदुस्तान में जहां उस की मह्‌बूबा रह्‌ती है। मगर वह लाहोर छोड़्‌ना नहीं चाह्‌ता था। इस लिए कि उस का ख्याल था कि अमृतसर में उस की प्रेक्टिस नहीं चलेगी।</p>
<p>यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इन्डियन पागल थे। उन को जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद कर के अन्ग्रेज़ चले गए हैं तो उन को बहुत सदमा हुआ&#124; वह छुप छुप कर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्‌तगू करते रह्‌ते कि पागल-ख़ाने में उन की हैसियत किस क़िस्म की होगी। यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा। ब्रेकफ़ास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए बलडी इन्डियन चपाटी तो ज़ह्‌र मार नहीं करना पड़ेगी?<br />
एक सिख था जिस को पागल-ख़ाने में दाख़िल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक़्त उस की ज़बान से यह `अजीब-ओ-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुन्‌ने में आते थे _ " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी लालटेन।" दिन को सोता था न रात को। पहरेदारों का यह कह्‌ना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्‌से में वह एक लह्‌ज़े के लिए भी नहीं सोया। लेटता भी नहीं था। अलबत्ता कभी कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।</p>
<p>हर वक़्‌त खड़े रह्‌ने से उस के पांव सूज गए थे। पिंडलियां भी फूल गई थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद लेट कर आराम नहीं कर्‌ता था। हिंदुस्तान , पाकिस्तान और पागलों के तबादिले के मुत्तालिक जब कभी पागल-ख़ाने में गुफ़्‌तगू होती थी तो वह ग़ोर से सुन्‌ता था। कोई उस से पूछ्‌ता कि उस का क्या ख़ियाल है तो वह बड़ी सन्जीदगी से जवाब देता" ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट।"</p>
<p>लेकिन बाद में " आफ़ दी पाकिस्तान गवर्न्मन्ट" की जगह " आफ़ दी टोबा टेक सिंघ गवर्न्मन्ट" ने ले ली और उस ने दूसरे पागलों से पूछ्‌ना शुरू किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है जहां का वह रह्‌ने वाला है। लेकिन किसी को भी मालूम नहीं था कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझावों में गिरिफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पह्‌ले हिंदुस्तान में होता था पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहोर जो अब पाकिस्तान में है कल हिंदुस्तान में चला जाए। या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए। और यह भी कौन सीने पर हाथ रख कर कह सकता था कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब ही हो जाएं।</p>
<p>इस सिख पागल के केस छिदरे हो के बहुत मुख़्तसर रह गए थे&#124; चूंकि बहुत कम नहाता था इस लिए दाढ़ी और सर के बाल आपस में जम गए थे। जिन के बाइस उस की शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी। मगर आद्‌मी बे-ज़रर था। पन्द्रह बरसों में उस ने कभी किसी से झगड़ा फ़साद नहीं किया था। पागल-ख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे वह उस के मुत्तलिक इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उस की कई ज़मीनें थीं। अच्छा खाता पीता ज़मीन-दार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया। उस के रिश्तेदार लोहे की मोटी मोटी ज़न्जीरों में उसे बांध कर लाए और पागल-ख़ाने में दाख़िल करा गए।</p>
<p>महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उस की ख़ैर ख़ैरियत दर्याफ़्त कर के चले जाते थे। एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा। पर जब पाकिस्तान , हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उन का आना बन्द हो गया।</p>
<p>उस का नाम बिशन सिंघ था मगर सब उसे टोबा टेक सिंघ कह्‌ते थे। उस को इतना मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है , महीना कौन सा है , या कितने साल बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उस के अज़ीज़-ओ-अक़ारिब उस से मिलने के लिए आते थे तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वह दफादार से कह्‌ता कि उस की मुलाक़ात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता , बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और सर में तेल लगा कर कंघा करता , अपने कपड़े जो वह कभी इसतेमाल नहीं करता था निकलवा के पहनता और यूं सज बन कर मिलने वालों के पास जाता। वह उस से कुछ पूछ्ते तो वह ख़ामोश रह्‌ता या कभी कभार " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनकस दी बे ध्याना दी मूंग दी दाल आफ़ दी लाल्टेन " कह देता।<br />
उस की एक लड़्‌की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गई थी। बिशन सिंघ उस को पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देख कर रोती थी , जवान हुई तब भी उस की आंखों से आंसू बह्‌ते थे।</p>
<p>पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू` हुआ तो उस ने दूसरे पागलों से पूछ्‌ना शुरू` किया कि टोबा टेक सिंघ कहां है? जब इत्‌मीनान-बख़्‌श जवाब न मिला तो उस की कुरेद दिन-बदिन बढ़्‌ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी। पह्‌ले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं , पर अब जैसे उस के दिल की आवाज़ भी बन्द हो गई थी जो उसे उन की आमद की ख़बर दे दिया करती थी।</p>
<p>उस की बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएं जो उस से हम-दर्दी का इज़हार करते थे और उस के लिए फल , मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह अगर उन से पूछ्‌ता कि टोबह टेक सिंघ कहां है तो वह यक़ीनन उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। क्योंकि उस का ख्याल था कि वह टोबा टेक सिंघ ही से आते हैं जहां उस की ज़मीनें हैं।<br />
पागल-ख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को ख़ुदा कह्‌ता था। उस से जब एक रोज़ बिशन सिंघ ने पूछा कि टोबा टेक सिंघ पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में , तो उस ने हस्‌ब-ए `आदत क़ह्‌क़हा लगाया और कहा "वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इस लिए कि हम ने अभी तक हुक्म नहीं दिया। "</p>
<p>बिशन सिंघ ने इस ख़ुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वह हुक्‌म दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो मगर वह बहुत मसरूफ़ था इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे। एक दिन तन्ग आ कर वह उस पर बरस पड़ा "ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ वाहे गूरू जी दा ख़ालसा ऐंड वाहे गूरू जी की फ़तह --- जो बोले सो निहाल , सत सरी अकाल।"</p>
<p>उस का शायद यह मतलब था कि तुम मुसल्मानों के ख़ुदा हो --- सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते ।</p>
<p>तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंघ का एक मुसल्मान जो उस का दोस्त था मुलाक़ात के लिए आया। पह्‌ले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंघ ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका " यह तुम से मिलने आया है --- तुम्हारा दोस्त फ़ज़ल दीन है। "</p>
<p>बिशन सिंघ ने फ़ज़ल दीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फ़ज़ल दीन ने आगे बढ़ कर उस के कन्धे पर हाथ रखा"मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुम से मिलूं लेकिन फ़ुरसत ही न मिली, तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे, मुझ से जितनी मदद हो सकी , मैं ने की, तुम्‌हारी बेटी रूप कौर . . . . "</p>
<p>वह कुछ कह्‌ते कह्‌ते रुक गया। बिशन सिंघ कुछ याद करने लगा " बेटी रूप कौर " _</p>
<p>फ़ज़ल दीन ने रुक रुक कर कहा " हां . . . . वह . . . . वह भी ठीक ठाक है --- उन के साथ ही चली गई थी। "<br />
बिशन सिंघ ख़ामोश रहा। फ़ज़ल दीन ने कह्‌ना शुरू` किया_ " उंहों ने मुझ से कहा था कि तुम्हारी ख़ैर ख़ैरियत पूछ्ता रहूं --- अब मैं ने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो --- भाई बल्बेसर सिंघ और भाई वधावा सिंघ से मेरा सलाम कह्‌ना --- और बहन अमरित कौर से भी . . . . भाई बल्बेसर से कह्‌ना, फ़ज़ल दीन राज़ी खुशी है --- वह भूरी भैंसें जो वह छोड़ गए थे, उन में से एक ने कट्‌टा दिया है --- दूस्‌री के कट्‌टी हुई थी पर वह छह दिन की हो के मर गई . . . . और . . . . मेरी लाइक़ जो ख़िद्‌मत हो , कहना , मैं हर वक़्त तैयार हूं . . . . और यह तुम्‌हारे लिए थोड़े से मरूंडे लाया हूं। "</p>
<p>बिशन सिंघ ने मरूंडों की पोटली ले कर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़ल दीन से पूछा "टोबा टेक सिंघ कहां है ?"</p>
<p>फ़ज़ल दीन ने क़द्रे हैरत से कहा " कहां है? --- वहीं है जहां था "</p>
<p>बिशन सिंघ ने फिर पूछा " पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? "</p>
<p>" हिंदुस्तान में --- नहीं नहीं पाकिस्तान में " फ़ज़ल दीन बोखला सा गया।</p>
<p>बिशन सिंघ बड़्‌बड़ाता हुआ चला गया _ " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्‌स दी बे ध्‌याना दी मुंग दी दाल आफ़ दी आफ़ दी पाकिस्तान ऐंड हिंदुस्तान आफ़ दी दूर फिटे मुंह ! "<br />
तबादले के तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फ़हरिस्तें पहुंच गई थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।<br />
।</p>
<p>सख़्त सर्दियां थीं जब लाहोर के पागल-ख़ाने से हिन्‌दू सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई मुत्तलिक अफ़सर भी हमराह थे। वाघा के बार्डर पर तरफ़ैन के सुपरिंटेडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तिदाई कारवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू` हो गया जो रात भर जारी रहा।</p>
<p>पागलों को लारियों से निकालना और दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रज़ा-मन्द होते थे, उन को संभालना मुश्‌किल हो जाता था, क्योंकि इधर उधर भाग उठते थे , जो नन्गे थे उन को कप्‌ड़े पनाए जाते तो वह फाड़ कर अपने तन से जुदा कर देते। कोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है, _ आपस में लड़ झगड़ रहे हैं, _ रो रहे हैं , बिलख रहे हैं, कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी, पागल औरतों का शोर-ओ-ग़ौग़ा अलग था और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे ।<br />
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक़ में नहीं थी। इसलिए कि उन की समझ में नहीं आता था कि उंहें अपनी जगह से उखाड़ कर कहां फेंका जा रहा है। वह चन्द जो कुछ सोच समझ सकते थे " पाकिस्तान जिंदाबाद" और " पाकिस्तान मुर्दाबाद" के नारे लगा रहे थे। दो तीन मर्तबा फ़साद होते होते बचा , क्योंकि बाज़ मुसल्मानों ओर सिखों को यह नारे सुन कर तेश आ गया था।</p>
<p>बिशन सिंघ की बारी आई और वाघा के उस पार मुत्तलिक अफ़सर उस का नाम रिजिस्टर में दरज करने लगा तो उस ने पूछा " टोबा टेक सिंघ कहां है? --- पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में ? "</p>
<p>मुत्तलिक अफ़सर हंसा " पाकिस्तान में "</p>
<p>यह सुन कर बिशन सिंघ उछल कर एक तरफ़ हटा और दौड़ कर अपने बाक़ी मांदह साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे , मगर उस ने चलने से इन्कार कर दिया "टोबा टेक सिंघ यहां है --- " और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा _ " ऊपड़ दी गुड़ गुड़ दी एनक्स दी बे ध्याना दी मुंग दी दाल आफ़ टोबा टेक सिंघ ऐंड पाकिस्तान "<br />
उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेक सिंघ हिंदुस्तान में चला गया है,अगर नहीं गया तो उसे फ़ौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वह न माना। जब उस को ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दर्मियान में एक जगह इस अन्दाज़ में अपनि सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त वहां से नहीं हिला सकेगी।</p>
<p>आदमी चूंकि बे-ज़रर था इस लिए उस से मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई , उस को वहीं खड़ा रह्‌ने दिया गया और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।</p>
<p>सूरज निकलने से पहले साकत-ओ-सामत बिशन सिंघ के हल्क़ से एक फ़लक-शिगाफ़ चीख़ निकली। इधर उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और देखा कि वह आद्‌मी जो पन्द्रह बरस तक दिन रात अप्‌नी टांगों पर खड़ा रहा , औंधे मुंह लेटा है। उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान! दर्मियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिस का कोइ नाम नहीं था। टोबह टेक सिंघ पड़ा था।</p>
<p>इसे भी पढ़ें<br />
<a rel="bookmark" target="_blank" href="http://aaina2.wordpress.com/2007/08/08/khol-do/"><font size="3" color="#444444">मंटो की कहानी - “खोल दो”</font></a></p>
<p></font></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अमृता प्रीतम की कुछ कवितायें]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2007/03/13/amritapritam/</link>
<pubDate>Tue, 13 Mar 2007 15:35:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2007/03/13/amritapritam/</guid>
<description><![CDATA[एक मुलाकात
मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><strong>एक मुलाकात</strong></font></p>
<p align="left"><font size="3">मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी<br />
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था......</font><font size="3">फिर समुन्द्र को खुदा जाने<br />
क्या ख्याल आया<br />
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी<br />
मेरे हाथों में थमाई<br />
और हंस कर कुछ दूर हो गया</font><font size="3"> </font></p>
<p><font size="3">हैरान थी....<br />
पर उसका चमत्कार ले लिया<br />
पता था कि इस प्रकार की घटना<br />
कभी सदियों में होती है.....</p>
<p>लाखों ख्याल आये<br />
माथे में झिलमिलाये</p>
<p>पर खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर<br />
अब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?</p>
<p>मेरे शहर की हर गली संकरी<br />
मेरे शहर की हर छत नीची<br />
मेरे शहर की हर दीवार चुगली</p>
<p>सोचा कि अगर तू कहीं मिले<br />
तो समुन्द्र की तरह<br />
इसे छाती पर रख कर<br />
हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे</p>
<p>और नीची छतों<br />
और संकरी गलियों<br />
के शहर में बस सकते थे....</p>
<p>पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती<br />
और अपनी आग का मैंने<br />
आप ही घूंट पिया</p>
<p>मैं अकेला किनारा<br />
किनारे को गिरा दिया<br />
और जब दिन ढलने को था<br />
समुन्द्र का तूफान<br />
समुन्द्र को लौटा दिया....</p>
<p>अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है<br />
तूं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल<br />
मैं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल<br />
सिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है.....</p>
<p><strong>याद</strong></p>
<p>आज सूरज ने कुछ घबरा कर<br />
रोशनी की एक खिड़की खोली<br />
बादल की एक खिड़की बंद की<br />
और अंधेरे की सीढियां उतर गया....</p>
<p>आसमान की भवों पर<br />
जाने क्यों पसीना आ गया<br />
सितारों के बटन खोल कर<br />
उसने चांद का कुर्ता उतार दिया....</p>
<p>मैं दिल के एक कोने में बैठी हूं<br />
तुम्हारी याद इस तरह आयी<br />
जैसे गीली लकड़ी में से<br />
गहरा और काला धूंआ उठता है....</p>
<p>साथ हजारों ख्याल आये<br />
जैसे कोई सूखी लकड़ी<br />
सुर्ख आग की आहें भरे,<br />
दोनों लकड़ियां अभी बुझाई हैं</p>
<p>वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए<br />
कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये<br />
वक्त का हाथ जब समेटने लगा<br />
पोरों पर छाले पड़ गये....</p>
<p>तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी<br />
और जिन्दगी की हन्डिया टूट गयी<br />
इतिहास का मेहमान<br />
मेरे चौके से भूखा उठ गया....</p>
<p><strong>हादसा</strong></p>
<p>बरसों की आरी हंस रही थी<br />
घटनाओं के दांत नुकीले थे<br />
अकस्मात एक पाया टूट गया<br />
आसमान की चौकी पर से<br />
शीशे का सूरज फिसल गया</p>
<p>आंखों में ककड़ छितरा गये<br />
और नजर जख्मी हो गयी<br />
कुछ दिखायी नहीं देता<br />
दुनिया शायद अब भी बसती है</p>
<p><strong>आत्ममिलन</strong></p>
<p>मेरी सेज हाजिर है<br />
पर जूते और कमीज की तरह<br />
तू अपना बदन भी उतार दे<br />
उधर मूढ़े पर रख दे<br />
कोई खास बात नहीं<br />
बस अपने अपने देश का रिवाज है......</p>
<p><strong>शहर</strong></p>
<p>मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है<br />
सड़कें - बेतुकी दलीलों सी...<br />
और गलियां इस तरह<br />
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता<br />
कोई उधर</p>
<p>हर मकान एक मुट्ठी सा भिंचा हुआ<br />
दीवारें-किचकिचाती सी<br />
और नालियां, ज्यों मूंह से झाग बहती है</p>
<p>यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी<br />
जो उसे देख कर यह और गरमाती<br />
और हर द्वार के मूंह से<br />
फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये<br />
गालियों की तरह निकलते<br />
और घंटियां हार्न एक दूसरे पर झपटते</p>
<p>जो भी बच्चा इस शहर में जनमता<br />
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?<br />
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता<br />
बहस से निकलता, बहस में मिलता...</p>
<p>शंख घंटों के सांस सूखते<br />
रात आती, फिर टपकती और चली जाती</p>
<p>पर नींद में भी बहस खतम न होती<br />
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है....</p>
<p>भारतीय़ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित अमृता प्रीतम चुनी हुई कवितायें से साभार</p>
<p>इसे भी पढ़ें</p>
<p></font>
</p>
<p align="left"><font size="3"><strong><a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/04/13/warisshah/">वारिस शाह नूं</a></strong></font></p>
<p align="left"><font size="3"><a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/03/amrita/"><font color="#da1071">अमृता प्रीतम की एक कविता</font></a></font></p>
<p align="left"><font size="3"><a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/11/25/shiv"><font color="#003366">“बिरह” का सुलतान - शिव कुमार बटालवी</font></a></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA["बिरह" का सुलतान - शिव कुमार बटालवी]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/11/25/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4/</link>
<pubDate>Sat, 25 Nov 2006 18:25:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
<guid>http://aaina2.wordpress.com/2006/11/25/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4/</guid>
<description><![CDATA[
बिरह का सुलतान - शिव कुमार बटालवी (ਸ਼ਿਵ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/11/pshive2.gif" title="pshive2.gif"><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/11/pshive2.gif" alt="pshive2.gif" /></a></p>
<p><font size="3">बिरह का सुलतान - शिव कुमार बटालवी (ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ)</font><font size="3"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shiv_Kumar_Batalvi">शिव कुमार बटालवी</a> पंजाबी के ऐसे आधुनिक कवि हैं जिनके गीतों में पंजाब के लोकगीतों का आनंद भी हैं।<br />
शिव का जन्म 23 जुलाई 1936 को शकरगढ़, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार बटाला में आ गया। ढेरों गीत और कवितायें लिखने वाले शिव कुमार बटालवी को 1965 में अपने काव्य नाटक "लूणा " के लिये साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। शिव के गीतों में प्यार है, दर्द है, सब से बड़ी बात है कि उन्होंने पंजाबी को अपने गीतों से समृद्ध किया। उन्हे बिरह का सुल्तान कहा जाता है। पंजाबी अपने इस कवि से बहुत प्यार करते हैं। पंजाब में कवितायें लोक गीत बन जाती है और कवि पढ़े चाहे जायें या नहीं मगर सुने बहुत जाते हैं। जैसे वारिस शाह की 'हीर' गायी और सुनी जाती है। शिव के गीत भी पंजाब में बहुत लोकप्रिय है, इस का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके गीतों को लगभग सभी पंजाबी गायकों ने तो गाया ही, <a href="http://www.apnaorg.com/music/shive/index2.php3">महेन्द्र कपूर</a> और <a href="http://www.apnaorg.com/music/shiv4/">नुसरत फतह अली खान साहब</a> ने भी गाया। <a href="http://www.apnaorg.com/music/shive/index1.php3">जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह</a> द्वारा गाये शिव के गीतों की एलबम मेरी सबसे प्रिय एलबम है। (आप इनके गाये शिव के गीतों को सुनने के लिये इन लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं)</font></p>
<p><font size="3"><strong>असां ते जोबण रुते मरना<br />
टुर जाणा असां भरे भराये,</strong></font></p>
<p><font size="3"><strong>एह मेरा गीत किसे ना गाणा<br />
एह मेरा गीत मैं आपे गा के<br />
भलके ही मर जाणा.</strong></font></p>
<p><font size="3">तथा</font></p>
<p><font size="3"><strong>यारणया रब करके मैंणूं<br />
पैण बिरहों दे कीड़े वे,<br />
नैंना दे दो संदले बूहे<br />
जाण सदा लई भीड़े वे.</strong></font></p>
<p><font size="3">लिखने वाले शिव का देहान्त मात्र 36 वर्ष की उम्र में मई 7,1973 को हो गया।</font></p>
<p><font size="3">शिव कुमार बटालवी के कुछ गीत यहां दे रहा हूं, मुझ में इतनी क्षमता नहीं कि इनका हिंदी अनुवाद कर सकूं(कुछ शब्दों के अर्थ अंत में देने की कोशिश की है), मगर देवनागरी में टाईप किया है उन लोगों के लिये जो पंजाबी को समझ सकते हैं मगर गुरमुखी में पढ़ नहीं सकते।</font></p>
<p><font size="3"><strong>मैं इक शिकरा यार बनाया.</strong></font></p>
<p><font size="3">माये नी माये<br />
मैं इक शिकरा यार बनाया.<br />
ओदे सिर ते कलगी<br />
ओदे पैरीं झांजर<br />
ते ओ चोग चुगेंदा आया.</font></p>
<p><font size="3">इक ओदे रूप दी धुप तिखेरी<br />
दुजा महकां दा तिरहाया<br />
तीजा ओदा रंग गुलाबी<br />
किसे गोरी मां दा जाया.</font></p>
<p><font size="3">इश्के दा इक पलंग नवारी,<br />
असां चानन्नियां विच डाया<br />
तन दी चादर हो गई मैली<br />
उस पैर जां पलंगे पाया.</font></p>
<p><font size="3">दुखण मेरे नैनां दे कोये<br />
विच हाड़ हंजुआं दा आईया<br />
सारी रात गई विच सोचां<br />
उस ए कि जुल्म कमाया.</font></p>
<p><font size="3">सुबह सवेरे लै नी वटणा<br />
असां मल मल ओस नव्हाया<br />
देही दे विचों निकलण चींगां<br />
ते साडा हाथ गया कुम्हलाया.</font></p>
<p><font size="3">चूरी कुट्टां तां ओ खांदा नाही<br />
ओन्हुं दिल दा मांस खवाया<br />
इक उडारी ऐसी मारी<br />
ओ मुड़ वतनी ना आया.</font></p>
<p><font size="3">ओ माये नीं<br />
मैं इक शिकरा यार बनाया<br />
ओदे सिर ते कलगी<br />
ओदे पैरीं झांजर<br />
ते ओ चोग चुगेंदा आया.</font></p>
<p><font size="3"><strong>उधारा गीत</strong></font></p>
<p><font size="3">सांनूं प्रभ जी,<br />
इक अद गीत उधारा होर देयो.<br />
साडी बुझदी जांदी आग्ग,<br />
अंगारा होर देयो.</font></p>
<p><font size="3">मैं निक्की उम्रे<br />
सारा दर्द हंडा बैठा,<br />
साडी जोबन रुत लई,<br />
दर्द कुंआरा होर देयो.</font></p>
<p><font size="3"><strong>उम्रां दे सरवर</strong></font></p>
<p><font size="3">उम्रां दे सरवर<br />
साहां दे पाणी<br />
गीता वे चुंज भरीं.</font></p>
<p><font size="3">भलके ना रहने<br />
पीड़ा दे चानन<br />
हावां दे हंस सरीं<br />
गीता वे चुंज भरीं.</font></p>
<p><font size="3">गीता वे उम्रां दे सरवर छलिये<br />
पल्छिन भर सुक जांदे<br />
साहवां दे पानी पी लै वे अड़िया<br />
अनचाहियां फिट जांदे<br />
भलके न सानूं दईं वे उलमड़ा<br />
भलके न रोस करीं<br />
गीता वे चुंज भरीं.</font></p>
<p><font size="3">हावां दे हंस<br />
सुनींदे वे लोभी<br />
दिल मरदा तां गांदे<br />
इह बिरहों रुत हंजू चुकदे<br />
चुकदे ते उड जांदे<br />
ऐसे उडदे मार उडारी<br />
मुड़ ना आण घरीं<br />
गीता वे चुंज भरीं.</font></p>
<p><font size="3">गीता वे चुंज भरें तां मैं तेरी<br />
सोने चुंज मढ़ावां<br />
मैं चंदरी तेरी बरदी थींवां<br />
नाल थीए परछांवां<br />
हाड़ाई वे ना तूं तिरहाया<br />
मेरे वांग मरीं<br />
गीता वे चुंज भरीं.</font></p>
<p><font size="3"><strong>माये नी माये</strong></font></p>
<p><font size="3">माये नी माये<br />
मेरे गीतां दे नैणा विच<br />
बिरहों दी रड़क पवे<br />
अद्दी अद्दी राती उठ<br />
रोण मोये मितरां नूं<br />
माये सानूं नींद न पवे.</font></p>
<p><font size="3">भें भें सुगंधियां च<br />
बणा फेहे चानन्नी दे<br />
तांवी साडी पीड़ न सवे<br />
कोसे कोसे साहां दी में<br />
करां जे टकोर माये<br />
सगों साहणु खाण नूं पवे.</font></p>
<p><font size="3">आपे नि मैं बालड़ी<br />
मैं हाले आप मत्तां जोगी<br />
मात्त केड़ा एस नूं दवे<br />
आख सूं नि माये इहनूं<br />
रोवे बुल चिथ के नी<br />
जग किते सुन न लवे.</font></p>
<p><font size="3">आख माय्रे अद्दी अद्दी<br />
रातीं मोये मित्रां दे<br />
उच्ची उच्ची नां ना लवे<br />
मते साडे मोयां पिछे<br />
जग ए सड़िकरा नी<br />
गीतां नुं वी चंदरा कवे.</font></p>
<p><font size="3"><strong>की पुछदे ओ हाल </strong></font></p>
<p><font size="3">की पुछदे ओ हाल फकीरां दा<br />
साडा नदियों विछड़े नीरां दा<br />
साडा हंज दी जूने आयां दा<br />
साडा दिल जलयां दिल्गीरां दा.</font></p>
<p><font size="3">साणूं लखां दा तन लभ गया<br />
पर इक दा मन वी न मिलया<br />
क्या लिखया किसे मुकद्दर सी<br />
हथां दियां चार लकीरां दा.</font></p>
<p><font size="3">तकदीर तां अपनी सौंकण सी<br />
तदबीरां साथों ना होईयां<br />
ना झंग छुटिया, न काण पाटे<br />
झुंड लांघ गिया इंज हीरां दा.</font></p>
<p><font size="3">मेरे गीत वी लोक सुणींदे ने<br />
नाले काफिर आख सदींदे ने<br />
मैं दर्द नूं काबा कह बैठा<br />
रब नां रख बैठा पीड़ां दा.</font></p>
<p><font size="3">शिकरा = बाज<br />
तिखेरी = तीखी<br />
तिरहाया = सराबोर<br />
अड़िया = दोस्त<br />
जाया = जन्मा<br />
हाड़ हंजुआं दा = आंसुंओं की बाढ़<br />
चींगां = चिंगारियां<br />
चूरी = घी और रोटी से बनने वाला<br />
हंडा = व्यतीत, खर्च<br />
सरवर = सरोवर<br />
साहां = सांसें<br />
चुंज = चोंच<br />
भलके = सुबह सुबह<br />
हावां = आहें<br />
उलमड़ा = उलाहना<br />
हंजू = आंसू<br />
घरीं = घर<br />
चंदरी = तुच्छ<br />
बरदी थींवा = नौकर बन जाऊं<br />
नाल थीए परछांवां = परछाई बन जाऊं<br />
तिरहाया = प्यासा<br />
वांग = तरह<br />
भें भें = भिगो भिगो कर<br />
बणा फेहे = बांधूं फाहे</font></p>
<p><font size="3">चानन्नी = चांदनी</font></p>
<p><font size="3">तांवी = तो भी<br />
कोसे कोसे साहां = गर्म सांसे<br />
बालड़ी = बालिका<br />
मत्तां = समझदारी<br />
रोवे बुल चिथ के = होंठ दबा कर रोये<br />
सड़िकरा = जलन करने वाला<br />
हंज = आंसू<br />
सौंकण = सौतन</font></p>
<p><font size="3"><strong>ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ.</strong></font></p>
<p><font size="3">ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ<br />
ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ<br />
ਓਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਕਲਗੀ<br />
ਓਦੇ ਪੈਰੀਂ ਝਾਂਜਰ<br />
ਤੇ ਓ ਚੋਗ ਚੁਗੇਂਦਾ ਆਯਾ.<br />
ਇਕ ਓਦੇ ਰੂਪ ਦੀ ਧੁਪ ਤਿਖੇਰੀ<br />
ਦੁਜਾ ਮਹਕਾਂ ਦਾ ਤਿਰਹਾਯਾ<br />
ਤੀਜਾ ਓਦਾ ਰਂਗ ਗੁਲਾਬੀ<br />
ਕਿਸੇ ਗੋਰੀ ਮਾਂ ਦਾ ਜਾਯਾ.<br />
ਇਸ਼੍ਕੇ ਦਾ ਇਕ ਪਲਂਗ ਨਵਾਰੀ,<br />
ਅਸਾਂ ਚਾਨੰਨਿਯਾਂ ਵਿਚ ਡਾਯਾ<br />
ਤਨ ਦੀ ਚਾਦਰ ਹੋ ਗਈ ਮੈਲੀ<br />
ਉਸ ਪੈਰ ਜਾਂ ਪਲਂਗੇ ਪਾਯਾ.<br />
ਦੁਖਣ ਮੇਰੇ ਨੈਨਾਂ ਦੇ ਕੋਯੇ<br />
ਵਿਚ ਹਾਡ਼੍ਅ ਹਂਜੁਆਂ ਦਾ ਆਈਯਾ<br />
ਸਾਰੀ ਰਾਤ ਗਈ ਵਿਚ ਸੋਚਾਂ<br />
ਉਸ ਏ ਕਿ ਜੁਲ੍ਮ ਕਮਾਯਾ.<br />
ਸੁਬਹ ਸਵੇਰੇ ਲੈ ਨੀ ਵਟਣਾ<br />
ਅਸਾਂ ਮਲ ਮਲ ਓਸ ਨਵ੍ਹਾਯਾ<br />
ਦੇਹੀ ਦੇ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲਣ ਚੀਂਗਾਂ<br />
ਤੇ ਸਾਡਾ ਹਾਥ ਗਯਾ ਕੁਮ੍ਹਲਾਯਾ.<br />
ਚੂਰੀ ਕੁੱਟਾਂ ਤਾਂ ਓ ਖਾਂਦਾ ਨਾਹੀ<br />
ਓਨ੍ਹੁਂ ਦਿਲ ਦਾ ਮਾਂਸ ਖਵਾਯਾ<br />
ਇਕ ਉਡਾਰੀ ਐਸੀ ਮਾਰੀ<br />
ਓ ਮੁਡ਼੍ਅ ਵਤਨੀ ਨਾ ਆਯਾ.<br />
ਓ ਮਾਯੇ ਨੀਂ<br />
ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ<br />
ਓਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਕਲਗੀ<br />
ਓਦੇ ਪੈਰੀਂ ਝਾਂਜਰ<br />
ਤੇ ਓ ਚੋਗ ਚੁਗੇਂਦਾ ਆਯਾ.</font></p>
<p><font size="3"><strong><br />
ਉਧਾਰਾ ਗੀਤ</strong></font></p>
<p><font size="3">ਸਾਂਨੂਂ ਪ੍ਰਭ ਜੀ,<br />
ਇਕ ਅਦ ਗੀਤ ਅਧਾਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.<br />
ਸਾਡੀ ਬੁਝਦੀ ਜਾਂਦੀ ਆੱਗ,<br />
ਅਂਗਾਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.<br />
ਮੈਂ ਨਿੱਕੀ ਉਮ੍ਰੇ<br />
ਸਾਰਾ ਦਰ੍ਦ ਹਂਡਾ ਬੈਠਾ,<br />
ਸਾਡੀ ਜੋਬਨ ਰੁਤ ਲਈ,<br />
ਦਰ੍ਦ ਕੁਂਆਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.</font></p>
<p><font size="3"><strong>ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ</strong></font></p>
<p><font size="3">ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ<br />
ਸਾਹਾਂ ਦੇ ਪਾਣੀ<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.<br />
ਭਲਕੇ ਨਾ ਰਹਨੇ<br />
ਪੀਡ਼੍ਆ ਦੇ ਚਾਨਨ<br />
ਹਾਵਾਂ ਦੇ ਹਂਸ ਸਰੀਂ<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ ਛਲਿਯੇ<br />
ਪਲ੍ਛਿਨ ਭਰ ਸੁਕ ਜਾਂਦੇ<br />
ਸਾਹਵਾਂ ਦੇ ਪਾਨੀ ਪੀ ਲੈ ਵੇ ਅਡ਼੍ਇਯਾ<br />
ਅਨਚਾਹਿਯਾਂ ਫਿਟ ਜਾਂਦੇ<br />
ਭਲਕੇ ਨ ਸਾਨੂਂ ਦਈਂ ਵੇ ਉਲਮਡਾ<br />
ਭਲਕੇ ਨ ਰੋਸ ਕਰੀਂ<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.<br />
ਹਾਵਾਂ ਦੇ ਹਂਸ<br />
ਸੁਨੀਂਦੇ ਵੇ ਲੋਭੀ<br />
ਦਿਲ ਮਰਦਾ ਤਾਂ ਗਾਂਦੇ<br />
ਇਹ ਬਿਰਹੋਂ ਰੁਤ ਹਂਜੂ ਚੁਕਦੇ<br />
ਚੁਕਦੇ ਤੇ ਉਡ ਜਾਂਦੇ<br />
ਐਸੇ ਉਡਦੇ ਮਾਰ ਉਡਾਰੀ<br />
ਮੁਡ਼੍ਅ ਨਾ ਆਣ ਘਰੀਂ<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੇਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਤੇਰੀ<br />
ਸੋਨੇ ਚੁਂਜ ਮਢ਼੍ਆਵਾਂ<br />
ਮੈਂ ਚਂਦਰੀ ਤੇਰੀ ਬਰਦੀ ਥੀਂਵਾਂ<br />
ਨਾਲ ਥੀਏ ਪਰਛਾਂਵਾਂ<br />
ਹਾਡ਼੍ਆਈ ਵੇ ਨਾ ਤੂਂ ਤਿਰਹਾਯਾ<br />
ਮੇਰੇ ਵਾਂਗ ਮਰੀਂ<br />
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.</font></p>
<p><font size="3"><strong>ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ</strong></font></p>
<p><font size="3">ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ<br />
ਮੇਰੇ ਗੀਤਾਂ ਦੇ ਨੈਣਾ ਵਿਚ<br />
ਬਿਰਹੋਂ ਦੀ ਰਡ਼੍ਅਕ ਪਵੇ<br />
ਅੱਦੀ ਅੱਦੀ ਰਾਤੀ ਉਠ<br />
ਰੋਣ ਮੋਯੇ ਮਿਤਰਾਂ ਨੂਂ<br />
ਮਾਯੇ ਸਾਨੂਂ ਨੀਂਦ ਨ ਪਵੇ.<br />
ਭੇਂ ਭੇਂ ਸੁਗਂਧਿਯਾਂ ਚ<br />
ਬਣਾ ਫੇਹੇ ਚਾਨੰਨੀ ਦੇ<br />
ਤਾਂਵੀ ਸਾਡੀ ਪੀਡ਼੍ਅ ਨ ਸਵੇ<br />
ਕੋਸੇ ਕੋਸੇ ਸਾਹਾਂ ਦੀ ਮੇਂ<br />
ਕਰਾਂ ਜੇ ਟਕੋਰ ਮਾਯੇ<br />
ਸਗੋਂ ਸਾਹਣੁ ਖਾਣ ਨੂਂ ਪਵੇ.<br />
ਆਪੇ ਨਿ ਮੈਂ ਬਾਲਡ਼੍ਈ<br />
ਮੈਂ ਹਾਲੇ ਆਪ ਮੱਤਾਂ ਜੋਗੀ<br />
ਮਾੱਤ ਕੇਡ਼੍ਆ ਏਸ ਨੂਂ ਦਵੇ<br />
ਆਖ ਸੂਂ ਨਿ ਮਾਯੇ ਇਹਨੂਂ<br />
ਰੋਵੇ ਬੁਲ ਚਿਥ ਕੇ ਨੀ<br />
ਜਗ ਕਿਤੇ ਸੁਨ ਨ ਲਵੇ.<br />
ਆਖ ਮਾਯ੍ਰੇ ਅੱਦੀ ਅੱਦੀ<br />
ਰਾਤੀਂ ਮੋਯੇ ਮਿਤ੍ਰਾਂ ਦੇ<br />
ਉੱਚੀ ਉੱਚੀ ਨਾਂ ਨਾ ਲਵੇ<br />
ਮਤੇ ਸਾਡੇ ਮੋਯਾਂ ਪਿਛੇ<br />
ਜਗ ਏ ਸਡ਼੍ਇਕਰਾ ਨੀ<br />
ਗੀਤਾਂ ਨੁਂ ਵੀ ਚਂਦਰਾ ਕਵੇ.</font></p>
<p><font size="3"><strong>ਕੀ ਪੁਛਦੇ ਓ ਹਾਲ </strong></font></p>
<p><font size="3">ਕੀ ਪੁਛਦੇ ਓ ਹਾਲ ਫਕੀਰਾਂ ਦਾ<br />
ਸਾਡਾ ਨਦਿਯੋਂ ਵਿਛਡ਼੍ਏ ਨੀਰਾਂ ਦਾ<br />
ਸਾਡਾ ਹਂਜ ਦੀ ਜੂਨੇ ਆਯਾਂ ਦਾ<br />
ਸਾਡਾ ਦਿਲ ਜਲਯਾਂ ਦਿਲ੍ਗੀਰਾਂ ਦਾ.<br />
ਸਾਣੂਂ ਲਖਾਂ ਦਾ ਤਨ ਲਭ ਗਯਾ<br />
ਪਰ ਇਕ ਦਾ ਮਨ ਵੀ ਨ ਮਿਲਯਾ<br />
ਕ੍ਯਾ ਲਿਖਯਾ ਕਿਸੇ ਮੁਕੱਦਰ ਸੀ<br />
ਹਥਾਂ ਦਿਯਾਂ ਚਾਰ ਲਕੀਰਾਂ ਦਾ.<br />
ਤਕਦੀਰ ਤਾਂ ਅਪਨੀ ਸੌਂਕਣ ਸੀ<br />
ਤਦਬੀਰਾਂ ਸਾਥੋਂ ਨਾ ਹੋਈਯਾਂ<br />
ਨਾ ਝਂਗ ਛੁਟਿਯਾ, ਨ ਕਾਣ ਪਾਟੇ<br />
ਝੁਂਡ ਲਾਂਘ ਗਿਯਾ ਇਂਜ ਹੀਰਾਂ ਦਾ.<br />
ਮੇਰੇ ਗੀਤ ਵੀ ਲੋਕ ਸੁਣੀਂਦੇ ਨੇ<br />
ਨਾਲੇ ਕਾਫਿਰ ਆਖ ਸਦੀਂਦੇ ਨੇ<br />
ਮੈਂ ਦਰ੍ਦ ਨੂਂ ਕਾਬਾ ਕਹ ਬੈਠਾ<br />
ਰਬ ਨਾਂ ਰਖ ਬੈਠਾ ਪੀਡਾਂ ਦਾ.</font></p>
<p><font size="3"><strong>इसे भी पढ़ें</strong></font></p>
<p><font size="3"><a href="http://aaina2.wordpress.com/2006/12/03/amrita/">अमृता प्रीतम की एक कविता</a></font></p>
<hr />
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<title><![CDATA[मैं, नीरज दीवान और पुस्तक मेला - भई वाह]]></title>
<link>http://aaina2.wordpress.com/2006/09/17/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%9c-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%ae%e0%a5/</link>
<pubDate>Sun, 17 Sep 2006 16:25:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
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<description><![CDATA[
आप इसे ब्लागर मीट कहें या कुछ और। आज का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3">
<p align="left">आप इसे ब्लागर मीट कहें या कुछ और। आज का दिन बिताया मैंने और <a target="_blank" href="http://neerajdiwan.wordpress.com/">कीबोर्ड के सिपाही नीरज दीवान</a> ने  पुस्तकों के मेले में।</p>
<p align="left">दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तकों का मेला शुरू हुआ है, पहले के दिनों में जब मेरा ऑफिस क्नाट प्लेस में होता था तो इस प्रकार के मौके कभी नहीं छोड़ता था और ऑफिस से हाफ डे लेकर जरूर पंहुच जाया करता था मगर पिछले कुछ सालों से यह सब छूट सा गया था। इस बार पुस्तक मेला शुरू हुआ तो मन में वहां जाने के लिये बेचैनी होने लगी। कल पूरा दिन काम की व्यस्तता के बीच बीच सोचता रहा कि घर जाकर नीरज दीवान को फोन करके आज इतवार के लिये पुस्तक मेले में चलने का कार्यक्रम बनाते हैं। घर आया तो आते ही बिटिया ने बताया कि नीरज अंकल का संदेश गुगल चैट पर आया था। शायद जब बिटिया ने कंप्यूटर चलाया तो गुगल चैट ऑटो लागईन हो गया था। देखा तो मुझे भी ओनलाईन मिल गये और झट से मैंने पुस्तक मेले में चलने का निमंत्रण दे दिया। एकदम से उनके मुहं से निकला "वाह"। जैसे उन्हें भी मन की मुराद मिल गई हो और आज एक बजे प्रगति मैदान के गेट न० सात पर मिलने का कार्यक्रम तय हो गया।</p>
<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/09/bookfare.JPG" alt="bookfare.JPG" /></p>
<p align="left">दिल्ली का प्रगति मैदान कई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और इस प्रकार के मेलों के लिय बहुत ही बेहतरीन जगह है। हर वर्ष यहां नवंबर में अंतराष्ट्रीय व्यापार मेला लगता है। इस बार नवंबर से पहले ही यहां मेट्रो भी जाने लगेगी। बड़े बड़े वातानुकूलित हॉल और अंदर सैंकड़ों प्रकाशकों की हजारों लाखों किताबें।  देश भर के प्रकाशकों के सभी बड़े बड़े नाम उपस्थित थे। हिंदी साहित्य, विज्ञान, बाल साहित्य, अंग्रेजी उपन्यास, प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी के लिये पुस्तकें, धार्मिक, प्रबंधन, योग, ओशो और जीवन में सफलता दिलाने वाली पुस्तकें। यूं लगा कि ज्ञान के मंदिर में ही पंहुच गये।<br />
<img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/09/image_0471.JPG" alt="image_0471.JPG" /><br />
तीन घंटे तक पुस्तकों के सागर में गोते लगाते रहे और अपनी समझ से कुछ मोती भी अपने अपने लिये चुन लिये। मुझे याद था एक बार मेरे एक पोस्ट <a target="_blank" href="http://aaina2.wordpress.com/2006/06/28/krishna/#comments">"<font size="3">कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२" </font></a><font size="3">पर <a target="_blank" href="http://chittha.kaulonline.com/">रमन कौल जी</a> ने इच्छा जताई थी कि  भीष्म साहनी की  कहानी  “ओ हरामज़ादे” अगर किसी को मिले तो नेट पर डाल दे।   वह किताब भी राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर मिल गई और मैंने फट खरीद ली। तो अगर आपको यह कहानी पढ़नी है तो मेरी अगली पोस्ट का इंतजार करें।</font></p>
<p><img src="http://aaina2.wordpress.com/files/2006/09/image_0501.JPG" alt="image_0501.JPG" />
</p>
<p align="left">पुस्तकों के हॉल से बाहर आकर हम लॉन में घास पर बैठ गये और सारी पुस्तकों को प्लास्टिक के थैलों से निकाल वहीं घास पर रख दिया जिस से अपनी अपनी पुस्तकें चुन सकें। अब शुरू हुईं हमारी बातें जो कि चिट्ठाकारी से शुरू हुईं और जिंदगी के निजी अनुभवों पर पंहुच गईं। निर्मल हृदय नीरज निर्मल घास पर पड़ीं किताबों की तरह खुलते चले गये। बातों बातों में दो घंटे और कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। इस प्रकार दो ब्लागरों की पुस्तकों के साथ भेंट समाप्त हुई।</p>
<p align="left">अंत में आज खरीदी गई भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक से अमृता प्रीतम की एक कविता:</p>
<p align="center"><strong>अम्बर की एक पाक सुराही</strong></p>
<p align="center"><strong>बादल का इक जाम उठाये</strong></p>
<p align="center"><strong>घूंट चांदनी पी है हमने</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p align="center"><strong>हमने आज यह दुनिया बेची</strong></p>
<p align="center"><strong>और एक दीन खरीद के लाये</strong></p>
<p align="center"><strong>बात कुफ्र की की है हमने</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p align="center"><strong>सपनों का एक थान बुना था</strong></p>
<p align="center"><strong>गज़ एक कपड़ा फाड़ लिया</strong></p>
<p align="center"><strong>और उम्र की चोली सी है हमने</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p align="center"><strong>कैसे इसका कर्ज चुकाऊं</strong></p>
<p align="center"><strong>मांग के अपनी मौत के हाथों</strong></p>
<p align="center"><strong>यह जो जिंदगी ली है हमने।</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p></font></p>
]]></content:encoded>
</item>

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