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	<title>पुस्तक-चर्चा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/पुस्तक-चर्चा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "पुस्तक-चर्चा"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 12:50:39 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[किताबें...इन दिनों]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/01/03/books-january-2008/</link>
<pubDate>Thu, 03 Jan 2008 17:13:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[दिसम्बर में हैदराबाद में एक पुस्तक मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिसम्बर में हैदराबाद में एक पुस्तक मेला लगा था, जिसकी कि खबर मुझे मेले के आखिरी दिन लगी। किस्मत से उस दिन शनिवार था सो घूमते फिरते पहुँचे और करीब ३-४ घंटे वहाँ बिताये। अधिकांश अंग्रेजी पुस्तकों के स्टाल, कुछ तेलुगु, एक-दो उर्दू पुस्तकों के स्टाल। और से २-३ स्टाल हिन्दी प्रकाशकों के भी। हैदराबाद में हिन्दी किताबों की दुकानें पिछले एक साल से ढूंढ रहा हूँ (या ढूंढने की सोंच रहा हूँ), लेकिन सफल नही हुआ...लेकिन इन स्टालों के मिलने से पुस्तक मेले में आना सार्थक रहा। ४ किताबें खरीदीं-<br />
<b>अमृतलाल नागर</b> की <b>नाच्यो बहुत गोपाल</b><br />
<b>विष्णु प्रभाकर</b> की लिखी शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की जीवनी <b>आवारा मसीहा</b><br />
<b>शरद जोशी</b> का व्यंग्य संग्रह <b>यत्र-तत्र-सर्वत्र</b><br />
और बहुत दिन से <b>ओशो </b>को पढने का सोंच रहा था सो एक पुस्तक <b>कोंपलें फूंट पडी</b></p>
<p>नाच्यो बहुत गोपाल तुरंत ही पढ ली थी। तत्कालीन समाज में हरिजन और महिलाओं की स्थिति पर केन्द्रित यह उपन्यास पढके मन एक अजीब सी बैचेनी से भर गया। इसे वितृष्णा कहूं, या सहानुभूति पता नही, मुझे खुद भी नही मालूम। समाज के दो सबसे उपेक्षित तबकों...एक तो महिला और ऊपर से हरिजन पर लिखा गया यह उपन्यास बहुत गहरे तक जाता है। हालांकि अब परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं और जिस काल खंड में यह उपन्यास लिखा गया है, तब में और आज में महिलाओं की और हरिजनों की स्थिति में बहुत अन्तर आया है।</p>
<p>आवारा मसीहा शरतचन्द्र की जीवनी है। अभी करीब सौ पन्ने पढे हैं। स्कूल समय में शरत चन्द्र के कई उपन्यास पढे थे, अब काफी समय हो गया, लेकिन इस उपन्यास को पढ कर कह सकते हैं कि उनके अधिकतर चरित्र उनकी ही जिन्दगी से निकले थे। यह बात भी सोंचने में आती है क्या अधिकतर महान लोग अपने शुरुआती दिनों में थोडे सनकी, थोडे विद्रोही होते हैं?</p>
<p>यत्र तत्र सर्वत्र और कोंपलें फूट पडीं अभी शुरू होने की राह देख रहे हैं। जो पुस्तकें मैने मांगी और नही मिल पाईं, वो थीं <b>श्रीलाल शुक्ल </b>की <b>राग दरबारी,</b> <b>कमलेश्वर</b> की <b>कितने पाकिस्तान </b>और <b>गिरिराज किशोर</b> की <b>पहला गिरमिटिया</b> । उसी समय रांची से एक सहकर्मी का फोन आ गया और उन्होने <b>डा राही मासूम रजा</b> के किसी गजल संग्रह की मांग की। लेकिन वो भी नही मिला। हालाँकि दोनो प्रकाशकों ने अपने पते दिये, ये पुस्तकें दुकान पर उपलब्ध हैं बताया, और दुकान पर जरूर आने को बोला, और किस्मत से ये दुकानें मेरे घर के एक किलोमीटर के दायरे में स्थित हैं। (देखते हैं कब जाना होता है।)</p>
<p>20-21 दिसम्बर को घर जाते समय नागपुर स्टेशन पर सुबह १० बजे नींद खुली। हाथ पैर सीधे करने उतरा और जब वापस चढा तो <b>मनोहर श्याम जोशी</b> का उपन्यास <b>क्याप </b>अपने हाथ में था जो रात को मथुरा पहुँचने से पहले निपटा दिया गया। जोशी जी का इससे पहले मैने <b>कसप </b>पढा था, पिछले साल, लगभग इन्ही दिनों। पता नही यह उनके अन्य उपन्यासों में भी है या नही...जोशी जी का नायक बहुत कन्फ्यूज्ड होता है..और नायिका एकदम सालिड, दृढ निश्चयी। कसप में पहाडी हिन्दी से मेरा पहला परिचय हुआ <i>रहा</i>.. और वो मुझे बहुत अच्छी लगी <i>रही </i>।पर क्याप में यह इतनी प्रयुक्त नही हुई <i>बल</i>।</p>
<p>घर से लौटते वक्त भोपाल रेलवे स्टेशन से <b>सुरेन्द्र मोहन पाठक</b> के तीन उपन्यास उठाये। ये भी सिर्फ स्टेशनों पर मिल पाते हैं और पिछले ५-६ महीने स्टेशन पर कोई काम न पडने की वजह से ३ नये उपन्यास बिन पढे हो गये थे। एक ट्रेन में और दो अगली रात को निपटा दिये गये।</p>
<p>हैदराबाद लौटा तो घर में मित्र रामा की लाई हुई <b>Amitabh Bagachi</b> की <b>Above Avarage</b> और <b>Anurag Mathur </b>की <b>The  Inscrutable American</b> बरामद हुईं। Above Avarage,  "Five Point Someone " वाली श्रेणी की किताब है..अपने स्कूल-कालेज के दिनों की याद दिलाती है। सो ये भी शुरू कर दी।  Five Point Someone, अपनी पी.जी. कक्षाओं में पीछे की कुर्सियों (BackBenches) पर बैठ कर निपटाई गई थी।</p>
<p>इस बीच और अभी कल आफिस का नियमित पुस्तक सप्लायर <b>Thomas L. Friedman</b> की <b>The World is Flat</b> दे गया। (यह बन्दा अंग्रेजी की अधिकतर पुस्तकों के प्रिंट मूल्य पर २०-२५% तक छूट देता है, और घर बैठे...(बोले तो आफिस बैठे) पुस्तकें डिलीवर करता है)। The World is Flat  बदलती दुनिया की बदलती अर्थव्यवस्था, वैश्वीकरण और उसके प्रभावों पर है..अभी पचासेक पेज पढे हैं और शुरुआती पृष्ठ पढते समय मुझे कई जगह एल्विन टाफ्लर(<b>Elvin Tofler</b>) की फ़्यूचर शाक (<b>Future Shock</b>)  याद आई।</p>
<p><b>William Dalrymple </b>की <b>The Last Mughal, George Orwel </b>की <b>1984, </b>और <span class="hotLink"></span><b><span class="hotLink">Robert T Kiyosaki</span> </b>की <b>Rich Dad Poor Dad</b> (जिसे पढने की सलाह और सोफ़्ट कापी समीर लाल जी से प्राप्त हुई), पिछले करीब ३-४ महीने से थोडा थोडा पढ कर खत्म होने की राह देख रही हैं।</p>
<p>पढने को इतना सारा मसाला। नये साल में एक ब्लागर बन्दे को और क्या चाहिये?.....सिवाय थोडे खाली समय के, जो मिलता नही, चुराना पडता है! :)</p>
<p>आप सबको साल-२००८ के लिये शुभकामनाएं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शांताराम - पुस्तक चर्चा]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/10/06/shantaram-gregory-david-roberts/</link>
<pubDate>Sat, 06 Oct 2007 16:25:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/10/06/shantaram-gregory-david-roberts/</guid>
<description><![CDATA[ग्रेगरी डेविड राबर्ट्स (Gregory David Roberts) की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ग्रेगरी डेविड राबर्ट्स (Gregory David Roberts)</strong> की <strong>'शांताराम' (Shantaram)</strong> २००३ में प्रकाशित हुई थी। बिना किसी प्रचार-प्रसार के ही यह किताब बहुत जल्द लोकप्रिय हुई और आज का 'द हिन्दू' देखता हूं तो अभी भी <em>बेस्ट सेलर्स</em> की सूची में जगह बनाये हुए है। और हाँ, पुस्तक पर इसी नाम से एक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shantaram_%28film%29" target="_blank">फिल्म </a>भी बन रही है, जिसमें केन्द्रीय भूमिका हालिवुड अभिनेता जानी डेप (Johnny Depp) कर रहे हैं।</p>
<p>शांताराम मुम्बई में बाहर से आने वाले सैलानियों से शुरू होती हुई आपको कई जगह ले जाती है..मसलन मुम्बई की झोपडपट्टी, महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव, मुम्बई की आर्थर रोड जेल,गोवा ,  मुम्बई का माफिया तंत्र....और फिर वाया पाकिस्तान होती हुई अफगानिस्तान। अफगानिस्तान से हम वापस मुम्बई आते हैं, और यहाँ कहानी की परिणीति होती है।</p>
<p>मुख्य पात्र <strong>लिन </strong>आस्ट्रेलिया से भागा हुआ एक अपराधी है जो अपनी भगौडी जिन्दगी के एक पडाव के दौरान मुम्बई पहुँचता है, और यहाँ उसे कई दिलचस्प लोग, और अच्छे दोस्त मिलते हैं। जैसा कि मुम्बई पर लिखी हर किताब या हर फिल्म कहती है, कि ये शहर अपको अपनी और खींचता है, लिन के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है। कुछ दिन एक होटल में रहने के बाद, वो एक स्लम में रहने लगता है और वहां एक क्लिनिक चलाता है (कहानी का यह हिस्सा <strong>डोमिनिक लेपायर (Dominique Lappire)</strong> की <strong>सिटी आफ जाय (City of Joy)</strong> से काफी मेल खाता है)। उसे प्रभाकर मिलता है, जिसकी सच्चाई और निश्छलता उसे लिन का सबसे अच्छा मित्र बना देती है,  उसे कार्ला मिलती है जिससे वो मुहब्बत करने लगता है पर जिसके जादूई व्यक्तित्त्व को वो अंत तक नही समझ पाता । उसका परिचय मुम्बई के माफिया डान अब्दुल कादर खान से होता है जिसमें वो अपने पिता को देखता है और उसके लिये काम करने लगता है। इसी बीच कुछ स्थानीय लोगों से दुश्मनी के चलते उसे काफी समय मुम्बई की आर्थर रोड जेल में बिताना पडता है। इससे आगे कहानी अफगानिस्तान पहुँचती है जहाँ वो अब्दुल कादर खान, जो कि एक अफगान है, के साथ दुश्मनों से लडने जाता है। कहानी का केनवास बहुत वृहद है, और हो सकता है कहीं कहीं आपको ये बेवजह फैलती सी लगे।</p>
<p>किताब का मुख्य आकर्षण जो शुरू से आखिर तक बांधे रखता है,<strong> वो है मानवीय रिश्तों का तानाबाना जो लेखक ने इतनी खूबसूरती से बुना है, कि कई जगहों पर आप पात्रों को अपने सामने खडा पाते हैं। </strong>मैने पहुत कम फिक्शन ऐसे पढे हैं जिनमें <strong>चरित्र चित्रण इतना सालिड हो, जिसके पात्र इतना प्रभावित करते हों और जिसके संवाद दिल को ऐसे छू लें कि आप उन्हे अलग से लिख कर रखें। </strong>मेरी राय: एक जरूर पढा जाने लायक उपन्यास। कुछेक बेहतरीन सवादों की नजीरें पेश हैं :</p>
<p>A lot of the bad stuff in the world wasn't really that bad, until someone tried to change it. (p. 97)</p>
<p>Sometime you have to surrender before you win. (p. 115)</p>
<p>When the wish and the fear are exactly the same, we call the dream a nightmare. (p 151)</p>
<p>The worst thing about corruption as a system of governance is that it works well (p 186)</p>
<p>The justice is not only the way we punish those who do wrong. It is also the way we try to save them (p 229)</p>
<p>Poverty and pride are devoted blood brothers until one, always and inevitably, kills the other (230)</p>
<p>People always hurt us with their trust.... The surest way to hurt someone you like, is to put all your trust in him (306)</p>
<p>Mistakes are like bad loves. The more you learn from them, the more you wish they had never happened.</p>
<p>पुस्तक के आवरण के अनुसार, शांताराम, लेखक ग्रेगरी डेविड राबर्ट्स के जीवन की हकीकत पर आधारित है (यानि सच्ची कहानी है)। यह पुस्तक लेखक ने तीन बार जेल में लिखी, (दो बार जेल गार्ड्स के हाथ पड जाने के पर नष्ट कर दी गई।..विकिपीडिया पर किताब की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shantaram_%28novel%29" target="_blank">लिंक </a>भी यही कहती है। अगर यह सच है, तो वाकई लेखक की अदम्य इच्छाशक्ति का परिचय है। लेकिन जो बात मुझे खटकती है वो ये कि अगर किताब की सारी बातें सच हैं तो लेख को अभी जेल में ही होना चहिये लेकिन उनकी <a href="http://www.shantaram.com/" target="_blank">आफिशियल वेबसाइट </a>के अनुसार तो वो अच्छे से घूमफिर रहे हैं। क्या कोई इस बारे में बता सकता है कि ये कहानी वाकई उनकी जिन्दगी पर आधारित है, अथवा कल्पना ही है?<br />
<em><br />
चलते चलते:</em></p>
<p><em>दो महीने से ऊपर हो गया शांताराम पढें...तुरंत लिखना चाहा था, लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि नही लिख पाया। जैसा कि ऊपर लिखा, इतना बडा केनवास है किताब का, कि मुझे पक्का पता था कि अगर टाल दिया तो बाद में लिखना मुश्किल होगा। और वाकई, तरीके से लिखना बहुत मुश्किल हो रहा है..इसलिये जो कुछ कच्चा पक्का बन पाया है, हाजिर है।  </em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[माइकल क्रिचटान की कुछ पुस्तकें और कूछ इधर उधर की]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/08/05/michale-crichton-ki-pustakem-aur-idhar-udhar-ki/</link>
<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 12:53:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[जरा सोंचिये, कैसा लगेगा अगर कोई आपसे क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जरा सोंचिये, कैसा लगेगा अगर कोई आपसे कहे , कि आपके शरीर में एक विशेष जीन (Gene) मौजूद है, लेकिन...आप का उस पर कोई अधिकार नही। वो इसलिये, कि कोई बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी अथवा अनुसंधानकर्ता उस जीन को पेटेन्ट करा चुके हैं। जब आपको ये पता चले कि उस जीन पर आपका स्वामित्त्व तो है ही नही...और तो और, वो कम्पनी आपसे वो जीन छीन सकती है, चूंकि वो जीन उसकी संपत्ती है और आप चोरी का माल अपने शरीर में लिये चल रहे हैं(!!!) और आपसे ही नही..आपके बच्चों, पोतों से भी। जरा सोंचिये, आप किसी ब्लड बैंक को अपना रक्त दान करते हैं....और कोई सिरफिरा वैज्ञानिक आपके रक्त को चिम्पांजी से क्रास करवा के कपि-मानव को जन्म दे देता है। वो आपकी संतान होगी या नही? उसके अधिकार, समाज में स्थान क्या होंगे? चूंकि Humon Genome पूरा पढा चुका है, तो ये जानकर कितना अजीब लगता है कि संसार की सभी प्रजातियों में बमुश्किल हजार-पाँच सौ genes का ही फर्क है?</p>
<p>ऐसे ही कुछ सवाल खडे करती है <strong>माइकल क्रिचटान (Michael Crichton) </strong>के नई विज्ञान फंतांसी <strong>"नेक्स्ट" (Next)</strong>। बायोटेक्नालाजी के क्षेत्र में जिस रफ्तार से परिवर्तन और खोजें हो रही हैं..और उनको लेकर जो कानूनी एवं सामाजिक दांवपेंच पैदा हो रहे हैं/हो सकते हैं...उन पर भी ये पुस्तक एक नजर डालती है। विषय नया था इसलिये पढना बनता था, लेकिन क्रिचटान के पुराने उपन्यासों की तुलना में इसने मुझे बहुत निराश किया। गति, रहस्य , रोमांच, कहानी का फैलाव और फिर उसे समेटना....किसी भी दृष्टि से मुझे उपन्यास पसंद नही आया, या ये कहें कि क्रिचटान के लेवल का नही था, सिवाय विषय की नवीनता के। कहानी में ३-४ प्लाट एक साथ चलते हैं...एक बडी बायोटेक कंपनी और उसके द्वारा छल से पेटेंट कराई हुई जीन, जीन के मालिक का दूसरी कंपनी के साथ मिलना और इस सिलसिले में अपनी बेटी और पोते की जान खतरे में डालना, एक बोलने वाला तोता और कपि-मानव आदि आदि। अंत में उनका घालमेल करके उन्हे एक जगह पर लाकर समेटने की कोशिश की गई है..पर उपन्यास की रफ्तार बहुत धीमी है। अगर इस क्षेत्र में रुचि रखते हैं तो पढें अन्यथा छोडा भी जा सकता है।</p>
<p>*********************</p>
<p>Michael Crichton का पिछला उपन्यास था <strong>"स्टेट आफ फीयर" (State of Fear)</strong> । यह उपन्यास जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की पृष्ठभूमि पर आधारित था, और मैने ऐसा फिक्शन पहली बार पढा था, जिसमें लेखक ने हर तर्क के रेफ़ेरेन्स तक दिये थे, बाकायदा जर्नल्स , शोध पत्रों और पुस्तकों के। संयोग से उपन्यास जब पढा था उस समय जलवायु परिवर्तन मेरे पी. जी. कोर्स में एक क्रेडिट कोर्स का इलेक्टिव था जो मैने लिया था। कक्षा की पढाई, और उपन्यास द्वारा जलवायु परिवर्तन के हौवे की धज्जी उडाई (बकायदा वैज्ञानिक शोधों के पत्रों के रेफेरेन्सेज देकर), एक समय में हो रहे थे..और मैने इस उपन्यास का भरपूर आनंद लिया था। एक तेज रफ्तार, <em>Out of the box thinking</em> वाला उपन्यास, अगर कभी हाथ लगे तो जरूर पढियेगा....पढने के बाद ऐसा लगने लगता है...कि जो हो रहा है, सब प्रकृति के द्वार किये जा रहे सतत परिवर्तन का एक हिस्सा है...और जलवायु परिवर्तन एक हौवा ही है।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन की ही बात चली, तो एक फिल्म <strong><a href="http://www.thedayaftertomorrow.com/" target="_blank">Day After Tomorrow</a></strong> भी मैने लगभग इसी समय देखी थी। उपन्यास के ठीक उलट ,निर्देशक Ronald Emmerich ये फिल्म वो भयावह दृश्य सामने लाती है, जिसके बारे में सिर्फ किताबों में पढा है...और सोंचा है, कि जब वो होगा, तो कैसे होगा। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप किस तरह से अचानक समुद्र का जलस्तर बढ जायेगा, तटीय इलाके डूब जायेंगे। फिल्म बताती है, कि इसके फलस्वरूप एक नये हिमयुग की शुरुआत होगी, भारी जानमाल की हानि तो होगी, लेकिन पृथ्वी का काफी हिस्सा बर्फ में दब जायेगा। फिल्म के नायक Dennis Quaid की एक पंक्ति मुझे बहुत आशांवित करती है, <em>"मानव जाति पिछले हिमयुग को पार कर गयी थी, और परिस्थितियों के अनुसार ढल कर इस हिमयुग को भी पार कर लेगी"</em>। कभी मौका लगे , तो ये फिल्म भी जरूर देखियेगा। (हालांकि फिल्म के <em>कान्सेप्ट </em>की जम कर <a href="http://sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?f=/c/a/2004/06/01/DDGUP6TQKR1.DTL" target="_blank">आलोचना </a>हुई थी, चूंकि ये वैज्ञानिक धरातल पर कहीं सही नही बैठता, पर साहब...वैज्ञानिक धरातल पर तो आजतक ी मौसम का पूर्वानुमान भी ठीक नही बैठा..... )</p>
<p>*********************</p>
<p>Michael Crichton के ही एक अन्य उपन्यास (शायद <strong>जुरासिक पार्क</strong> या <strong>लास्ट वर्ल्ड</strong>) के प्राक्कथन में वो कहते हैं कि पृथ्वी के बनने से अबतक पैदा हुई जीव जंतुओं की प्रजातियों (species) में से ९९% विलुप्त (extinct) हो चुकी हैं, और मात्र १ % बची हैं...संसार में हर रोज हजारों species विलुप्त होती हैं..और कई जन्म लेती हैं..ये चक्र चलता ही रहता है। ये कथन कितना सही है ये तो नही मालूम...लेकिन ये जानता हूँ कि अपने वातावरण से जिसने जितना सामन्जस्य बिठा लिया, वो उतना ही ज्यादा जियेगा। शायद इसी को परिस्थितियों के अनुसार ढलना, परिवर्तन और बदलाव को समझना कहते हैं। मेरे खयाल में मानव प्रजाति की यही खूबी उसे पृथ्वी पर इतना लंबा टिका सकी है।</p>
<p>*********************<br />
नब्बे के दशक में, जब हम बच्चे/किशोर थे, एक बात हम दोस्तों में बहुत चर्चा का विषय हुआ करती थी..वो ये कि सन २००० में दुनिया खत्म हो जायेगी, प्रलय आ जायेगी..आदि आदि। नास्त्रेदमस की भविष्य़वाणियां नुमां किताबें भी खूब पढी थीं..अक्सर सोंचा करते थे कि प्रलय आयेगी तो क्या होगा? अफसोस ऐसा कुछ हुआ नही...। पर अब मैं ऐसा नही सोंचता (मैं बडा हो गया हूँ..<em>बार्नवीटा </em>भी नही पीता :) )।</p>
<p>समझ में काफी फर्क आया है। ये तो अब भी लगता है, कि परिवर्तन जिस गति से हो रहा है, किसी दिन जोर का झटका, धीरे से जरूर लगेगा, समुद्री जलस्तर या तापमान में अचानक कमी-बेसी, प्राकृतिक विपदा कुछ भी..लेकिन मुझे इतना विश्वास है कि मानव जाति इन सबसे पार पा जायेगी..और अगली पीढी फिर एक नया गीत गुनगुनायेगी । हो सकता है प्रकृति अपना संतुलन बनाये रखने के लिये कोई कडा कदम उठाये और हम और आप में से कई ना रहें ...लेकिन जितने बचेंगे...वो काफी होंगे जिंदगी की मशाल को आगे वालों के हाथ में देने के लिये। शायद वो लोग इससे सबक भी लेंगे और २-४ हजार साल तक फिर धरती पर अमन चैन रहे (इंसान के होते हुए अमन चैन वैसे विरोधाभास है), लेकिन मनुष्य का समय के साथ खुद को बदल लेने का जज्बा उसे लम्बी रेस का घोडा बनाता है, इसमें कोई शक नही।</p>
<p>*********************</p>
<p>किताबों की बात हुई, तो ये भी जोड ही दें कि हैरी पुत्तर (V 7.0) भी पढ ही लिये मैने पिछले दिनों..&#124; आशानुरूप, हैरी भी एक <em>हार्क्रक्स </em>निकला (बोले तो राक्षस की जान का एक हिस्सा कई <em>तोतों </em>के अलावा हैरी के अन्दर भी था), और कोई मुख्य पात्र मरा नही..सब कुछ ठीक ठाक निपट गया। हाँ ये जरूर सरप्राइज रहा कि JKR ने कहानी १९ साल आगे ले जाकर छोडी...हैरी,हरमाइनी, और रोन के बच्चों के पास। अब इसका अगला भाग आता ये या नही देखना है, वैसे ऐसी कोई घोषणा  या खंडन हुआ नही अब तक, किताब के प्रकाशित होने के बाद से।</p>
<p>*********************<br />
चलते चलते, आप सबको दोस्ती का दिन बहुत बहुत मुबारक। बात बहुत दूर तक निकल आयी....फिलहाल आप अपनी जीन्स(Genes वाली जीन्स, Jeans नही) बचा कर रखिये...या ऐसे करें कि वक्ती तौर पर ब्लागिंग की, या दोस्ती की ही, Genes सबको Inject करें  :). ..बहुत जरूरत है आजकल दुनिया को।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[१ करोड पाउण्ड की सुरक्षा धरी रह गयी!]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/07/18/harry-potter-leaked/</link>
<pubDate>Wed, 18 Jul 2007 12:03:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/07/18/harry-potter-leaked/</guid>
<description><![CDATA[एल्लो&#8230;इतना हल्ला कर रहे थे हैरी भैया]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एल्लो...इतना हल्ला कर रहे थे हैरी भैया की नई किताब का। पूरा माहौल बना कर तैयार किया हुआ है २१ जुलाई के लिये..कि किताब रिलीज होगी, पढेंगे, ये होगा, वो होगा, हैरी बचेगा..मर जायेगा ..पता नही क्या क्या। हैरी पाटर श्रॄंखला की आखिरी किताब Harry Potter and the Deathly Hallows अपने समय की सबसे ज्यादा प्रतीक्षित पुस्तक है(शायद सबसे ज्यादा Hyped भी).. और <a href="http://www.rediff.com/movies/2007/jul/18harry.htm" target="_blank">खबर </a>मिली है कि किताब <em>लीक </em>हो गई है, और इसका का <em>नरम संस्करण</em> (बोले तो Soft Copy) अंतरजाल पर मौजूद है। और आज नही...कई दिन पहले से।</p>
<p><a href="http://www.rediff.com/movies/2007/jul/16harry.htm" target="_blank">१ करोड पाउण्ड</a> खर्च किये गये थे किताब की सुरक्षा पर, कि कहीं <em>लीक </em>ना हो जाये। और ये हश्र हुआ इतनी भारी सुरक्षा का। दर्जनों सुरक्षा कर्मी, सेटेलाइट ट्रेकिंग सिस्टम और कई कानूनी दांव पैंच लगाये गये थे। २ लाख प्रतियों का अग्रिम आदेश है प्रकाशकों के पास, और २१ तारीख को किताब की होम डिलिवरी के लिये काफी इन्तजाम भी किये गये बताते हैं। तमाम तरह के कयास लगाये जा रहे <strike>हैं</strike> थे किताब के Climax को लेकर..पर ये क्या..सब धरा रह गया।</p>
<p>फिर वही सवाल, कि क्या इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी में किसी भी प्रकार की <em>पाइरेसी</em>(संगीत, फिल्म, किताबें आदि) से बचना लगभग नामुम्किन हो चुका है? हालांकि किताब हाथ में लेकर पढने में जो मजा है (बिस्तर पर लेट कर या कुर्सी पर अधलेटे होकर), वो अनुभव e-book कतई नही दे सकती। किताब के पन्नों की खुश्बू का एक अलग ही मजा, एक नशा होता है। पर, जब किताब ९७५/- रुपये की हो, तो फिर <em>ये-क्यों-लें-वो-ना-लें?</em> वाली बात दिमाग में आ जाती है और पाइरेसी, नैतिकता ताक पर धरे रह जाते हैं। तो किताब की बिक्री पर असर तो जरूर पडेगा..पर मुझे लगता है ज्यादा नही (भई २ लाख प्रतियां तो पहले ही बिक गईं)।</p>
<p>पर जो तरीके से पैसे देकर २१  तारीख को किताब का इंतजार कर रहा है, उसका क्या? उसे तो जरूर बुरा लगेगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिन्दी का हैरी...]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/07/14/hindi-ka-harry/</link>
<pubDate>Sat, 14 Jul 2007 19:01:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2007/07/14/hindi-ka-harry/</guid>
<description><![CDATA[इस मौसम में, जब हैरी पाटर श्रृंखला की प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस मौसम में, जब हैरी पाटर श्रृंखला की पाँचवी फिल्म सिनेमाघरों में पहुँच गई है और (संभवतः)आखिरी पुस्तक २१ जुलाई को निकलने वाली है, आप चाहकर भी हैरीमय होने से नही बच सकते। और अगर मेरी तरह उसे पसंद भी करते हों तो बात ही क्या है। चाहे इसे <em>मार्केटिंग और मीडिया मेनेजमेन्ट</em> कहिये या भेडचाल, इस बात को नही नकारा जा सकता कि हैरी पोटर श्रृंखला ने किताबों की दुनिया में नये आयाम स्थापित किये हैं। इस श्रृंखला के भावनात्मक पक्षों पर पर एक बेहद सुरुचिपूर्ण आलेख <a href="http://pahalu.blogspot.com/2007/07/blog-post_6928.html">चंद्रभूषण </a>ने लिखा है।</p>
<p>नई किताब और हो हल्ले के बीच, एक बात जो दब गई...या मीडिया ने जिसे ज्यादा ध्यान देने योग्य नही समझा वो ये कि श्रृंखला की पाँचवी पुस्तक का हिन्दी रूपांतरण पाँच जुलाई को बाजार में आया, भोपाल के मंजुल प्रकाशन के जरिये। मुझे इसकी जानकारी आज के '<em>इकानामिक टाइम्स</em>' (Thanks to media :) ) के जरिये लगी जिसने इस <a href="http://economictimes.indiatimes.com/How_Harrys_magic_changed_the_mkt_in_India/articleshow/2202462.cms">खबर </a>को अपने मुखपृष्ठ पर जगह दी है। Harry Potter and Order of Phoenix का हिन्दी पुस्तक रूपांतरण है <strong>'हैरी पाटर और मायापंछी का समूह'</strong> (हिंदी फिल्म का नाम <strong>'हैरी पाटर और फिनिक्स की फौज'</strong>)।</p>
<p>साहित्यिक बात से परे, जिस बात को लेख मे प्रमुखता दी गई है, वो है इस किताब का मूल्य...जो कि ३५० रुपये है। किसी हिन्दी पुस्तक के लिये ये दाम बहुत ज्यादा माना जा रहा <strike>था </strike>है (हिन्दी पढने वालों के बाजार को देखते हुए)..पर सच्चाई ये है कि पुस्तक के पहले संस्करण की सभी पाँच हजार प्रतियां पिछले १० दिनों में बिक गई हैं। साहबान, ये है हिन्दी का बाजार। आप फिर इसे मीडिया/मार्केटिंग/हाइप कह सकते हैं... हो सकता है कि ये सच भी हो, लेकिन ये भी सच है कि ३५० रुपये की किताब (हिन्दी किताब) लोगों ने हाथों हाथ खरीदी। (पहली ३ किताबें २००/- के नीचे थीं..चौथी २५०/-)। इसके अलावा मंजुल प्रकाशन का कहना है कि वे अब तक इस श्रृंखला की १,००,००० से ज्यादा पुस्तकें बेंच चुकें है (हिन्दी रूपांतर)...। हालांकि अंग्रेजी संस्करण की तुलना में ये संख्या कुछ भी नही, लेकिन जब हम सिर्फ हिन्दी किताबों के परिपेक्ष्य में देखें तो ये वाकई अच्छी संख्या है।(इसके आलावा मलयालम, गुजराती और मराठी संस्करण भी उपलब्ध हैं)। मांग को देखते हुए छठी पुस्तक (Harry Potter and the Half-Blood Prince) का हिन्दी रूपांतरण अगस्त में एवं सातवीं(Harry Potter and Deathly Hollows) का हिन्दी रूपाण्तर दिसम्बर में बाजार में उपलब्ध होगा।</p>
<p>क्या ये वाकई इस बात का द्योतक है कि हाँ, हिन्दी पुस्तकों को पढने वाले बडी तादाद में मौजूद हैं...एक बडा बाजार है हिन्दी का। क्या हिन्दी को एक बडे स्तर पर मार्केटिंग की जरूरत है? (भई जब हिन्दी फिल्में और टेलीविजन इतना <em>हिट </em>है तो किताबें क्यों नही? आखिर सप्ताहांत पर एक फिल्म सपरिवार देखने का खर्च कम से कम ५०० रुपये है बडे शहरों मे आज की तारीख में)। या ये सिर्फ विदेशों में <em>हिट </em>एक नायक की सफलता से उपजे क्षणिक हो-हल्ले और भावनात्मक उबाल का परिणाम है। पहली हैरी पोटर जब आई थी...तब इसे सिर्फ बच्चों की किताब माना जा रहा था, लेकिन आज इसके अन्य आयु वर्ग के चाहने वालों की भी कमी नही।</p>
<p>सके अलावा, क्या भारत में इस तरह की पुस्तकें लिखी जा रही हैं जो बच्चों/युवाओं/आम जनता के एक बडे वर्ग को अपनी और आकर्षित कर सकें। अंग्रेजी में चेतन भगत की <strong>Five Point Someone</strong> दो-तीन साल पहले युवाओं में काफी लोकप्रिय रही। युवाओं ने इसे हाथोंहाथ लिया। किताब की कहानी शायद कईयों को अपनी कहानी लगी और किताब अच्छी चली( देखादेखी बाद में ऐसी कई पुस्तकें आई पर उन्हे वो सफलता नही मिली)। क्या हिन्दी में भी ऐसी पुस्तकें आती हैं। <strong>यदि हाँ, तो वो कहाँ बिकती हैं? उनके बारे में जानकारी कहाँ से प्राप्त की जा सकती है? रेल्वे स्टेशनों पर मौजूद ए. एच. व्हीलर्स के अलावा और कहाँ पर आप अच्छी हिन्दी पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं?</strong> मैने सदा से सुना है कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास <strong>चन्द्रकांता </strong>को पढने और समझने के लिये उस जमाने में कई लोगों ने हिन्दी सीखी थी एवं ये उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुआ था। मोटे तौर पर देखें तो जादू-टोने के मामले में हैरी पोटर बच्चों के चन्द्रकांता जैसा दिखता है, हालंकि इसका(हैरी का) भावनात्मक पक्ष अत्यंत सशक्त है (चन्द्रकांता मैने पढा नही, सिर्फ टी.वी. धारावाहिक देखा है)।</p>
<p>क्या हिन्दी को <em>हिट </em>करने के लिये कोई फिर चन्द्रकांता लिखी जायेगी? हैरी पोटर ना सही, <em>हरी पुत्तर</em> सही...</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चार किताबें]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/04/14/four-books/</link>
<pubDate>Sat, 14 Apr 2007 11:29:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले दिनों में मैने दो किताबें पढी है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले दिनों में मैने दो किताबें पढी हैं, तीसरी पढ रहा हूं और चौथी शुरू करने वाला हूँ (ये सोंच कर खुश मत होइये कि मुझे नौकरी से निकाल दिया गया है और मेरे पास करने को और कुछ नही है, नौकरी बढिया चल रही है... :) )। चारों किताबें भारत के इतिहास पर नजर डालती हैं, कोई थोडा आगे, कोई थोडा पीछे, अपने अपने नजरिये से, पर दिमाग में इतनी गड्डमगड्ड हो गई हैं, कि मैं चाह कर भी उनके बारे में अलग अलग नही लिख पा रहा।</p>
<p>पहली किताब है, <strong>क्रिस्टोफर क्रेमर (Christopher Kremmer)</strong>  की <strong>'इनहेलिंग दि महात्मा' (Inhaling the Mahatma)</strong>। किताब लेखक के भारत में बिताये कुछ सालों का वर्णन है। आस्ट्रेलियाई लेखक क्रेमर जब जुलाई १९९० में पहली बार अखबार सिडनी हेराल्ड के लिये भारत आये, उस समय भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। अपने तीन साल के प्रवास में उन्होने भारत को, आजादी के बाद के सबसे बडे संक्रमण काल से गुजरते हुए देखा। वी. पी सिंह का मंडल के सहारे उत्थान और पतन, राजीव गांधी की हत्या, कांग्रेस की मिली जुली सरकार, बाबरी मस्जिद विधवंस, मुम्बई धमाके आदि कुछ प्रमुख घटनाएं रहीं, जिन्हे उन्होने अपने अखबार के लिये कवर किया (बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के प्रत्यक्ष साक्षी रहे)।</p>
<p>अपने अगले प्रवास , १९९७ से २००१ में वे भारत को काफी तेज गति से भागते और बदलते हुए देखते हैं, कांग्रेस का सबसे बुरा समय, सोनिया गांधी का राजनीति में प्रवेश, बी जे पी की सरकार, तेजी से खुलता बाजार और..गुजरात दंगे । उन्हे आश्चर्य होता है (जैसा कि हर विदेशी को होता है) कि कैसे, भारत और यहां का आम आदमी, इतने कोलाहल, हो हल्ले, दंगे, भीड भडक्के के बावजूद अपनी गति से चलता रहता है, कैसे भारतीय समाज बुरे से बुरे घाव को जल्द ही भुला कर वक्त से आगे बढ जाता है, नये निर्माण के लिये ।</p>
<p>थोडा वर्णन २००४-०५ का है, जो खास तौर पर आइ. टी. , काल सेंटर अर्थव्यवस्था और बदलाव पर नजर डालता है । इन सबके साथ है, इलाहबाद और बनारस के घाट, किनारे और आध्यात्म जिसके माध्यम से लेखक भारतीय संस्कति और जनमानस को समझने की कोशिश करता है। धर्म, ईश्वर, गंगा, मोक्ष, भीड, पंडे आदि आदि ।इसके अलावा,  दिल्ली में ही वो अपनी भावी पत्नि से मिलते हैं, और अपने ससुराल में मिली कुछ की पुरानी डायरियों के माध्यम से दिल्ली का कुछ इतिहास जानने समझने की कोशिश करते हैं ।</p>
<p>अगली जो किताब मैने पढी है, वो है '<strong>सिटी आफ जिन्स' (City of Djinns),</strong> स्काटिश लेखक <strong>विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple)</strong> द्वारा । क्रिस्टोफर क्रेमर जहाँ दिल्ली के इतिहास को छूकर निकल जाते हैं, वहीं डालरिम्पल उसमें अन्दर तक घुस जाते हैं । यह किताब लेखक के दिल्ली में १९८९-९० के दौरान एक साल किये शोध का नतीजा है। कहते हैं, जिस जिसने भी दिल्ली में नया शहर बनवाया, वो वहां ज्यादा राज नही कर पाया। सन १९११ में जब अंग्रेज अपना झंडा कलकता से दिल्ली ले गये और नई दिल्ली बसाई तो भी यही बात कही गयी थी जो ३६ साल बाद सच साबित हुई।</p>
<p>मैं कभी दिल्ली में रहा नही हूँ, इसलिये किताब में बताये गई कई जगहों से अपने आप को जोड नही पाया, लेकिन फिर भी मुहम्मद बिन तुगलक से होते हुए मुगल काल, शाहजहाँ, औरंगजेब और मुगल घराने की आपसी लडाइयां, लालकिला और बिटिश साम्राज्य के शुरुआती दौर और नई दिल्ली पर काफी अच्छा और शोधपरक लिखा है। भारत की पुरातात्विक धरोहर (तुगलक से लेकर मुगल और अंग्रेजों द्वारा बनवाये गये भी) की दुर्दशा की बात किताब में बार बार सामने आती है। इस मामले में विलियम डालरिम्पल की सराहना करनी होगे कि उन्होने काफी जगहों पर जाकर पुरानी चीजों को देखा और ढूंढने की कोशिश की । (रेल्वे के एक दफ्तर के तहखाने से, वो लालकिले की और जाती सुरंग ढूंढ निकालते हैं जो की बंद कर दी गयी है)।<br />
मैं काफी कुछ भूल रहा हूँ क्योंकि तारीखें और लोग बहुत कान-फ्यूज कर रहे हैं और इसके बारे में विस्तार से लिखने के लिये किताब को दोबारा पढूंगा।</p>
<p>तीसरी किताब, जो अभी चल रही है, <strong>एम. जे. अकबर (M J Akbar)</strong> की <strong>'ब्लड ब्रदर्स' (Blood Brothers) </strong>है । अभी एक-तिहाई पढी है । पुस्तक के कवर से पता चलता है कि ये एशियन एज के संस्थापक और संपादक अकबर की तीन पीढियों की कहानी है। अभी मैं उनके दादा प्रयाग के बारे में पढ रहा हूँ, जिन्हे एक बंगाल में कलकत्ता के पास, एक मुस्लिम परिवार बचाता और अपनाता है, जब वे भूख से दम तोडने वाले होते हैं। ये वाकया १८५७ के आसपास का है। प्रयाग बडा होकर रहमतुल्लाह बन जाता है और इलाके में मान सम्मान और धन अर्जित करता हैं। साथ साथ  में उस दौर के हिन्दू मुस्लिम संबंधों की अच्छी पडताल है । यह पैरा काफी कुछ कह जाता है -</p>
<p>"......,as a result of the 1871 census, people learnt for the first time that the Muslims were in majority in Bengal..........Till 1871, Bengal's social conficts were largely between the powerful and powerless: rich and poor; landlord and peasent. European Sahib, Anglo India, Hindu Baboo, Muslim पeasent and Bihari labour formed shifting pattrens of co-exixtance. After the cesus, rift lines sharpened between Hindus and Muslims as they gardually acquired another layor of identity"</p>
<p>इस पुस्तक पर भी विस्तार से पूरी पढने के बाद ।</p>
<p>इसके बाद अगली पुस्तक जो नम्बर पर है, वो है <strong>विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple)</strong> की ही, <strong>'द लास्ट मुगल' (The Last Mughal )</strong>। ये पिछले साल की काफी चर्चित पुस्तकों में से एक है और काफी समय से इसे पढने का मन था। पुस्तक शायद १८५७ की क्रांति , मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजों के आगमन पर है। शायद इसे पढने के बाद सिटी आफ जिन्स में अधूरी रही कुछ बातें पूरी हो जायें।</p>
<p>बहुत दिन पहले शायद फुरसतिया जी के लिखा था कि अगर किसी काम को करने में आलस्य आ रहे हैं , तो सबको बता दीजिये कि मुझे वो काम करना है.....इससे आपकी जिम्मेदारी (और अपेक्षाएं) बढ जायेगी। मुझे इन किताबों के बारे में विस्तार से लिखने में आलस्य आ रहा था, आप सबको बता दिया है... अब तो करना ही है  :) (नौकरी अभी भी सही सलामत ही है.. :D )</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मिली कुछ किताबें...]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/02/27/got-some-hindi-books/</link>
<pubDate>Tue, 27 Feb 2007 12:07:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले काफी समय से मेरा हिन्दी पुस्तके]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले काफी समय से मेरा हिन्दी पुस्तकें पढना काफी कम होता जा रहा है । जब तक कालेज में थे,  कालेज लाइब्रेरी में काफी साहित्य था हिन्दी में और कभी कभार पढते भी  थी..पर उस अनुपात में नही जिसमें अंग्रेजी की पुस्तकें ।और खरीदी तो बिल्कुल भी नही ।एक कारण अनुपलब्धता भी है..अधिकांश जगहों पर आपको हिन्दी पुस्तकें ना के बराबर मिलेंगी, अखबारों में बामुश्किल किसी किताब का जिक्र/समीक्षा होती है । इंडिया टुडे/आउट्लुक वगैरा में जरूर नियमित समीक्षाएं छपती हैं पर उनमें से अधिकतर इतनी साहित्यिक होती हैं कि बस ।</p>
<p>सो काफी दिनों से में हिन्दी पुस्तकें पढने और खरीदने की सोंच रहा था । एक कारण विभिन्न चिट्ठों पर हिन्दी की कई पुस्तकों का जिक्र भी रहा...जिस भी पुस्तक का जिक्र होता...लगता, कि अरे ये तो पढी ही नही है । हिन्दी चिट्ठे पढने के बाद ही लगा कि मैने कितने कम हिन्दी लेखकों को पढा है । प्रेमचन्द, शरतचन्द्र आदि तो स्कूल में पढ लिये थे पर उनके बाद कुच्छ नही । (सिवाय सुरेन्द्र मोहन पाठक के जिन्हे इन्जिनीयरिंग के समय खूब पढा :)  )</p>
<p>सो इस बार गुजरात निकलते वक्त सोंचा हुआ था कि स्टेशन पर किसी बुक स्टाल से पुस्तकें जरूर लेनी है । अहमदाबाद के लिये निकलते समय रायपुर स्टेशन पर बहुत देर किताब की दुकान पर खडे रहने के बाद मनोहर श्याम जोशी की 'कसप' खरीदी । २४ घण्टॆ बाद अहमदाबाद उतरते समय किताब २० पृष्ठ और बाकी थी । वो भी अगले १-२ दिन में खत्म कर दिये । अगले २० दिन काफी व्यस्त रहे सो कुछ पता ही नही चला और एक बार फिर अपने आप को हैदराबाद में पाया । लग रहा था कि फिर थोडा इन्तजार करना पडेगा ।</p>
<p>लेकिन कहते हैं ना जहां चाह वहाँ राह।</p>
<p>हैदराबाद में हर रविवार को <a href="http://www.hyderabad-india.net/areas/abids.html" target="_blank"><em>अबिड्स </em></a>में पटरी(फुट्पाथ) पर पुरानी किताबों का बाजार लगता है, ठीक ठीक वैसा ही जैसा दरियागंज में लगता है । अधिकतर नई बेस्ट्सेलर्स के पायरेटेड संस्करण, भारी तादाद में पुराने अंग्रेजी उपन्यास..(इतना <em>पल्प</em>...२० रुपये में किताबों के सजिल्द संस्करण..पर ना कभी किताब का नाम सुना होगा ना लेखक का) , बच्चों की किताबें..पुरानी पत्रिकाएं..काफी कुछ मिल जाता है ।हर १-२ रविवार छोड कर, मुझे कुछ घन्टे यहाँ वक्त बिताने में काफी मजा आता है...चाहे अपने काम की किताब मिले या ना मिले अथवा कुछ खरीदी हो ना हो लेकिन सिर्फ घूमने, किताबों को उलटने पलटने में ही काफी अच्छा वक्त गुजर जाता है । पर हिन्दी पुस्तकें यहाँ भी नदारद ...कई बार तलाश किया किया पर सिवाय रानू /राजभारती के पुराने सामाजिक उपन्यासों के सिवा कुछ नही मिलता ।</p>
<p>पिछले के पिछले रविवार कुछ हाथ आया..एक दुकान से गुजर रहा था कि कुछ किताबों पर नजर पडी, देखा ...भीष्म साहनी, अचार्य चतुरसेन जैसे कुछ नाम लिखे हुए थे । रुका तो देखा उसके पास अधिकतर हिन्दी और उर्दू की पुस्तकें थीं । अगला आधा घंटा अपना वहीं बीता..और जब चले वापस तो ये १० किताबें अपने हाथ में थी</p>
<p>खामोशी के आंचल में - अमृता प्रीतम<br />
वैशाली की नगरवधू - आचार्य चतुरसेन<br />
बगुला के पंख - आचार्य चतुरसेन<br />
श्री कांत - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय<br />
शेष प्रश्न -  शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय<br />
दो व्यंग नाटक - शरद जोशी<br />
सुरंगमा - शिवानी<br />
प्रेरक प्रसंग (दो भाग) - गीताप्रेस<br />
वांड्चू एवं अन्य कहानियां - भीष्म साहनी</p>
<p>और जरा सोंचिये, कितने दाम चुकाये हमने इन किताबों के...? मात्र १००/- रुपये !!! अपना तो संडे वसूल हो गया भई...आजकल इन्हे ही पढ रहा हूं, अगला एक महीना बडे आराम से कटेगा । :)</p>
<p>पर किस्मत का ताला यहीं बन्द नही होता ना अपना, कूछ दिन पहले ओर्कुट पे घूमते हुए <a href="http://www.orkut.com/Community.aspx?cmm=23370962" target="_blank">हिन्दी ई-पुस्तक</a> समूह से ई-स्निप्स की <a href="http://www.esnips.com/web/hindisahitya" target="_blank">ये कडी</a> हाथ लग गयी , जिसके बारे में बाद में रवि रतलामी जी ने <a href="http://rachanakar.blogspot.com/2007/02/hindi-sahitya-e-book.html" target="_blank">रचनाकार</a> पर लिख ही दिया है , अतः और कुछ लिखने की जरूरत नही है । यहाँ भी छोटा मोटा खजाना ही रखा है । बस अगर आप कम्प्यूटर में आँख गडाये पढ सकते हों तो निश्चय ही मस्त जगह है ।</p>
<p>पुनश्च: - सागर जी, आपका दिया <a href="http://nahar.wordpress.com/2007/02/24/fivequistions/">पर्चा </a>हल करने में थोडी देर लगेगी, पर जल्द ही हाजिर होंगे जवाब लेकर :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अवलोकन २००६]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/12/21/avlokan/</link>
<pubDate>Thu, 21 Dec 2006 05:45:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[पता नही इस बार बीतते हुए साल का तरीके स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पता नही इस बार बीतते हुए साल का तरीके से अवलोकन कर पाऊंगा या नही, पर जो सबसे सरल काम कर सकता हूँ...साल में पढी गई पुस्तकों की सूची तो बना ही ली जाए...</p>
<p><strong>२००६ में पढी गई पुस्तकें</strong></p>
<p>The Afghan - Fredrick Forsyth<br />
Fist of God - Fredrick Forsyth<br />
The Match - Romesh Gunashekhara<br />
Mediocore but Arrogant - Abhijit Bhaduri<br />
Timeline - Michael Crichton<br />
Airframe - Michael Crichton<br />
One night at the call center - Chetan Bhagat<br />
Making of an MBA: snapshots from hell- Peter Robinson<br />
The department of Denials -Anurag Mathur<br />
The Old Man and His God - Sudha Murthy</p>
<p><strong>आधी पढी पुस्तकें</strong><br />
Third Wave- Alvin Toffler<br />
Human Zoo - Desmond Morris<br />
Everybody Loves a Good Draught - P Sainath<br />
Jurrasic Park - Michael Crichton<br />
राग दरबारी - श्री लाल शुक्ल (ब्लागर साथियों के सहयोग से)</p>
<p>पिछले साल के मुकाबले इस साल गिनती थोडी कम रही, कारण नौकरी । कालेज का समय अच्छा था...खूब वक्त निकाल लेते थे पढने के लिये ।इसी चक्कर मे ये पाँच पुस्तकें पिछले २-३ महीने से आधी-पौनी पढ पाया हूं</p>
<p>हाँ एक काम जो अच्छा शुरू किया है, नियमित रूप से किताबें खरीदने लगा हूँ, और यह भी निश्चय किया है कि पाइरेटेड पुस्तकें नही खरीदूंगा :).</p>
<p>बाकी का अवलोकन देखते हैं...कर पाते हैं या नही</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[द अफ़गान- फ्रेड्रिक फोरसिथ : The Afghan-Frederic Forsyth]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/18/the_afghan/</link>
<pubDate>Mon, 18 Sep 2006 06:15:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/09/18/the_afghan/</guid>
<description><![CDATA[द्वितीय विश्व युद्ध के काफ़ी बाद तक विभ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>द्वितीय विश्व युद्ध के काफ़ी बाद तक विभिन्न अंग्रेजी(अमेरिकन व ब्रिटिश दोनों) रोमांचक उपन्यासों का आधार द्वितीय विश्व युद्ध पर आधारित कहानियाँ ही होती थी, कि किस प्रकार मित्र देशों के सैनिकों ने किसी पहत्वपूर्ण चौकी पर कब्जा किया या कोई महत्वपूर्ण ओपरेशन कामयाब किया या दुश्म की कोई भारी चाल असफ़ल कर दी जो अन्यथा युद्ध के परिणामों पर असर डाल सकती थी ।<br />
फ़िर वक्त आया शीत युद्ध का, विश्व दो धडों में बंट गया था अब अंग्रेजी में छपने वाले हर दूसरे तीसरे उपन्यास की कहानी रशिया (सोवियत संघ),क्रेमलिन और अंग्रेज जासूसों के इर्दगिर्द घूमने लगी चाहे तो इनके बीच में कोई कोई प्रेम कहानी भी घुसा दी जा सकती थी।<br />
अब तो शीत युद्ध भी खतम हो गया...सोवियत संघ के हो गये टुकडे..तो अब जमाना आया है अफ़गानिस्तान एवम इराक युद्ध,अलकायदा और इस्लामी आतंकवाद का । अफ़गानिस्तान-इराक, जेहाद, तालिबान, ९/११ ये सब लेखकों के लिये नया मसाला है ।<br />
इस फार्मूले को आप हालीवुड फ़िल्मों पर भी ज्यों की त्यों लागू कर सकते हैं, भई, पटकथा लेखक भी उपन्यास लेखक से कम थोडे ही होता है । ये बात एक और जगह लागू होती है...उसके बारे में पोस्ट के अंत में ।</p>
<p>तो जैसा के नाम से ही जाहिर है, मशहूर ब्रिटिश लेखक <strong>फ्रेड्रिक फ़ोरसिथ (Frederick Forsyth)</strong> का नवीनतम उपन्यास '<strong>द अफ़गान</strong>' (<strong>The Afghan</strong>) अफ़गानिस्तान की ही पृष्ठभूमि पर आधारित है...उपन्यास की कहानी कुछ इस तरह से है ।</p>
<p>ब्रिटिश जासूसी संस्था SIS (Secret Intelligence Service) को पाकिस्तान में एक कमांडो ओपरेशन से मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि अलकायदा ९/११ से भी बडा और भयानक हमला करने की तैयारी में है..हमला कहां कब कैसे होगा इस बारे में कुछ भी जानकारी नही मिल पाती...ये जानकारी बडे भैया..चौधरी CIA (Central Intelligence Agency)..अमरीका वालों को भी बताई जाती है।<br />
योजना ये बनाई जाती है, कि अलकायदा में पश्चिम का एक जासूस भेजा जाये..इस काम के लिये चुना जाता है ब्रिटिश माइक मार्टिन को...जो पहले भी विभिन्न ओपरेशन्स के तहत अफ़गानिस्तान एवं अन्य देशों में कमांडो कार्यवाही का हिस्सा रह चुका है, जो कभी इराक में पला बढा था और धारा प्रवाह अरबी बोल सकता है । अमरीका के पास एक अफ़गान इज्मत खान भी है, जिसे पाँच साल पहले अफ़गानिस्तान में पकडा गया था..किन्तु जिसने कभी मुँह नही खोला, किंतु ये बात एजेंसियों को शर्तिया तौर पर मालूम है कि इज्मत खान का आतांकवादियों में बडा नाम है और वो एक बार बिन लादेन से मिल भी चुका है...इज्मत खान की माफ़ी एवं रिहाई का झूठा नाटक करके उसकी जगह मार्टिन को भेज दिया जाता है..ताकि वो उस हमले को नाकाम कर सके जिसकी भनक तो इन जासूसी एजेन्सियों को है, पर जिसके बारे में वो कुछ नही जानते ।</p>
<p>माइक मार्टिन पर आगे क्या बीतती है,इज्मत खान का क्या होता है, वो हमला कौन सा है जो ९/११ से भी भयावह हो सकता है और क्या माइक मार्टिन उसे नाकाम कर पायेगा(आपको क्या लगता है, उपन्यास का हीरो कभी नाकाम होता है ?:))ये सब तो आप उपन्यास में ही पढें...यहाँ ज्यादा कुछ लिखना उचित नही होगा ।</p>
<p>अब उपन्यास के बरे में मेरी राय... फ़्रेड्रिक फ़ोरसिथ अंग्रेजी रोमांचक (Thriller) एवं राजनीतिक उपन्यासों के अग्रणी लेखक माने जाते हैं..वैसे इससे पहले मैने इनका मात्र एक ही उपन्यास पढा था, <strong>The Devil's Alternative</strong>...और ये वाकई बहुत तेजरफ़्तार और रोमांचक उपन्यास था...मुझे बहुत अच्छा लगा था । लेकिन इस उपन्यास(The Afghan) से मुझे बहुत निराशा हुई । कहानी का प्लाट और खाका तो फ़ोरसिथ ने बडा अच्छा तैयार किया है किन्तु उस रफ़्तार और रोमांच को वे कायम नही कर पाये। पहली बात तो ये कि सब कुछ अपने आप होता चला जाता है, हीरो को अपनी हीरोगिरी दिखाने का मौका ही नही मिलता, लगता है कि बस भागभरोसे गाडी खिंचती जा रही है और अंत तो एकदम फ़ुसकी सा हो गया ।अभी अभी पढ रहे थे..और ये क्या..अरे कहानी खत्म भी हो गई !!!..मिशन ओवर एंड आउट...कुल मिला कर उपन्यास फ़ोरसिथ की प्रतिष्ठा के अनुरूप नही था । पिछले काफ़ी हफ़्तों से ये उपन्यास Thrillers की बेस्ट्सेलर सूची में सबसे ऊपर चल रहा है,शायद लेखक के नाम की वजह से, लेकिन मुझे तो इससे निराशा ही हुई।</p>
<p>एक बात जिस पर इस उपन्यास में बहुत जोर डाला गया वो ये, कि ९/११ के बाद अमरीका एवं ब्रिटेन की जासूसी एजेन्सियों के काम करने में भारी बदलाव आया है और किसी को भी कोई भी सूचना मिलने पर वो तुरन्त सभी विभागों में बांटी जाती है (९/११ की एक वजह इन एजेन्सियों में आपसी तालमेल की कमी भी माना जाता है.. )<br />
एक बात कहनी होगी, रीयल लाइफ़ में अमरीका/ब्रिटेन चाहे कितने भी दिन अफ़गानिस्तान में नाकामियों का मुँह देखत रहें, ओसामा बिन लादेन के बारे में जानकारी प्राप्त करने में असफ़ल रहें...ये काम इनके किसी उपन्यास लेखक को सोंप दीजिये या किसी फ़िल्म के पटकथा लेखक को...वो इसे चुटकियों में करवा देंगे..अपने हीरो से</p>
<p>और अब पहले पैरा में की गई बात। हथियार निर्मात्री कंपनियों पर भी वो बात एकदम सटीक लागू होती है...प्रथम विश्व युद्ध, द्वितिय विश्व युद्ध, फ़िर शीतयुद्ध में तो हथियारों की दौड और होड अपने चरम पर पहुँच गई...गोला बारूद असला, राइफ़ल-मशीन गनें, जहाज, फ़ाइटर प्लेन और पनडुब्बियाँ और तरह तरह के जासूसी उपकरण....क्या क्या नही है । मेरा मानना है कि जब शीतयुद्ध के खात्मे(१९९८९-९०)से लेकर ९/११ तक इन कंपनियों का धंधा बडा मंदा चला होगा...बिक्री एकदम बैठ गई होगी..और फ़िर तभी शुरू हो गई 'आतंकवाद के खिलाफ़ जंग'..और तब से अब तक क्या हो रहा है ये तो हम सब देख ही रहे हैं ।<br />
वैसे क्या आपको मालूम है कि हमारे देश का भी बजट का एक बडा हिस्सा रक्षा पर खर्च होता है..जिसमें सैन्य रख रखाव के अलावा उक्त वस्तुओं की बडी खरीद भी शामिल है..??? (२००५-०६ में भारत का रक्षा बजट ८३,००० करोड रुपये था। ये पिछले वर्ष के मुकाबले ७.८ % ज्यादा था, और भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का २.३७ प्रतिशत था । )</p>
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