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	<title>प्रयास &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/प्रयास/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "प्रयास"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 23:02:13 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मन की आवाज़]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=148</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 05:11:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, 'अरे बेटा, एक बात तो सुन।' घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, 'क्या बात है माई?' बुढ़िया ने कहा, 'बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।' उस व्यक्ति ने कहा, 'माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?' यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, 'तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ' </p>
<p>वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, 'माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।' बुढ़िया ने कहा, 'न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।' घुड़सवार ने कहा, 'अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?' </p>
<p>बुढ़िया मुस्कराकर बोली, 'उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।' </p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[तीन सवाल - (अकबर-बीरबल)]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/11/29/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Thu, 29 Nov 2007 11:31:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[महाराजा अकबर, बीरबल की हाज़िरजवाबी के ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>महाराजा अकबर, बीरबल की हाज़िरजवाबी के बडे कायल थे. उनकी इस बात से दरबार के अन्य मंत्री मन ही मन बहुत जलते थे. उनमें से एक मंत्री, जो महामंत्री का पद पाने का लोभी था, ने मन ही मन एक योजना बनायी. उसे मालूम था कि जब तक बीरबल दरबार में मुख्य सलाहकार के रूप में है उसकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती. </p>
<p>एक दिन दरबार में अकबर ने बीरबल की हाज़िरजवाबी की बहुत प्रशंसा की. यह सब सुनकर उस मंत्री को बहुत गुस्सा आया. उसने महाराज से कहा कि यदि बीरबल मेरे तीन सवालों का उत्तर सही-सही दे देता है तो मैं उसकी बुद्धिमता को स्वीकार कर लुंगा और यदि नहीं तो इससे यह सिद्ध होता है की वह महाराज का चापलूस है. अकबर को मालूम था कि बीरबल उसके सवालों का जवाब जरूर दे देगा इसलिये उन्होंने उस मंत्री की बात स्वीकार कर ली.</p>
<p>उस मंत्री के तीन सवाल थे -</p>
<p>१. आकाश में कितने तारे हैं.<br />
२. धरती का केन्द्र कहाँ है.<br />
३. सारे संसार में कितने स्त्री और कितने पुरूष हैं.</p>
<p>अकबर ने फौरन बीरबल से इन सवालों के जवाब देने के लिये कहा. और शर्त रखी कि यदि वह इनका उत्तर नहीं जानता है तो मुख्य सलाहकार का पद छोडने के लिये तैयार रहे.</p>
<p>बीरबल ने कहा, "तो सुनिये महाराज".</p>
<p>पहला सवाल - बीरबल ने एक भेड मँगवायी. और कहा जितने बाल इस भेड के शरीर पर हैं आकाश में उतने ही तारे हैं. मेरे दोस्त, गिनकर तस्सली कर लो, बीरबल ने मंत्री की तरफ मुस्कुराते हुए कहा.</p>
<p>दूसरा सवाल - बीरबल ने ज़मीन पर कुछ लकीरें खिंची और कुछ हिसाब लगाया. फिर एक लोहे की छड मँगवायी गयी और उसे एक जगह गाड दिया और बीरबल ने महाराज से कहा, "महाराज बिल्कुल इसी जगह धरती का केन्द्र है, चाहे तो आप स्व्यं जाँच लें". महाराज बोले ठीक है अब तीसरे सवाल के बारे में कहो.</p>
<p>अब महाराज तीसरे सवाल का जवाब बडा मुश्किल है. क्योंकि इस दुनीया में कुछ लोग ऐसे हैं जो ना तो स्त्री की श्रेणी में आते हैं और ना ही पुरूषों की श्रेणी. उनमें से कुछ लोग तो हमारे दरबार में भी उपस्थित हैं जैसे कि ये मंत्री जी. महाराज यदि आप इनको मौत के घाट उतरवा दें तो मैं स्त्री-पुरूष की सही सही संख्या बता सकता हूँ. अब मंत्री जी सवालों का जवाब छोडकर थर-थर काँपने लगे और महाराज से बोले,"महाराज बस-बस मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया. मैं बीरबल की बुद्धिमानी को मान गया हूँ". </p>
<p>महाराज हमेशा की तरह बीरबल की तरफ पीठ करके हँसने लगे और इसी बीच वह मंत्री दरबार से खिसक लिया.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[अकबर-बीरबल की पहली मुलाकात]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/11/15/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 15 Nov 2007 09:19:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[अकबर को शिकार का बहुत शौक था. वे किसी भी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अकबर को शिकार का बहुत शौक था. वे किसी भी तरह शिकार के लिए समय निकल ही लेते थे. बाद में वे अपने समय के बहुत ही अच्छे घुड़सवार और शिकरी भी कहलाये. एक बार राजा अकबर शिकार के लिए निकले, घोडे पर सरपट दौड़ते हुए उन्हें पता ही नहीं चला और केवल कुछ सिपाहियों को छोड़ कर बाकी सेना पीछे रह गई. शाम घिर आई थी, सभी भूखे और प्यासे थे, और समझ गए थे की वो रास्ता भटक गए हैं. राजा को समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरफ़ जाएं.</p>
<p>कुछ दूर जाने पर उन्हें एक तिराहा नज़र आया. राजा बहुत खुश हुए चलो अब तो किसी तरह वे अपनी राजधानी पहुँच ही जायेंगे. लेकिन जाएं तो जायें किस तरफ़. राजा उलझन में थे. वे सभी सोच में थे किंतु कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी. तभी उन्होंने देखा कि एक लड़का उन्हें सड़क के किनारे खड़ा-खडा घूर रहा है. सैनिकों ने यह देखा तो उसे पकड़ कर राजा के सामने पेश किया. राजा ने कड़कती आवाज़ में पूछा, "ऐ लड़के, आगरा के लिए कौन सी सड़क जाती है"? लड़का मुस्कुराया और कहा, "जनाब, ये सड़क चल नहीं सकती तो ये आगरा कैसे जायेगी". महाराज जाना तो आपको ही पड़ेगा और यह कहकर वह खिलखिलाकर हंस पड़ा.</p>
<p>सभी सैनिक मौन खड़े थे, वे राजा के गुस्से से वाकिफ थे. लड़का फ़िर बोला," जनाब, लोग चलते हैं, रास्ते नहीं". यह सुनकर इस बार राजा मुस्कुराया और कहा," नहीं, तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा नाम क्या है, अकबर ने पूछा. मेरा नाम महेश दास है महाराज, लड़के ने उत्तर दिया, और आप कौन हैं? अकबर ने अपनी अंगूठी निकाल कर महेश दास को देते हुए कहा, "तुम महाराजा अकबर - हिंदुस्तान के सम्राट से बात कर रहे हो". मुझे निडर लोग पसंद हैं. तुम मेरे दरबार में आना और मुझे ये अंगूठी दिखाना. ये अंगूठी देख कर मैं तुम्हें पहचान लूंगा. अब तुम मुझे बताओ कि मैं किस रास्ते पर चलूँ ताकि मैं आगरा पहुँच जाऊं.</p>
<p>महेश दास ने सिर झुका कर आगरा का रास्ता बताया और जाते हुए हिंदुस्तान के सम्राट को देखता रहा.</p>
<p>और इस तरह अकबर भविष्य के बीरबल से मिला.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[क्षणिकाएँ - जानवर]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/24/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%81-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 07:03:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ द्वारा रचित। </p>
<p>- जानवर -<br />
(१)<br />
जानवर की कोख से<br />
जनते न देखा आदमी<br />
आदमी की नस्ल फिर क्यों<br />
जानवर होने लगी।</p>
<p>(२)<br />
गो पालतू है जानवर<br />
पर आप चौकन्ने रहें<br />
क्या पता किस वक़्त वो<br />
इन्सान बनना ठान ले।</p>
<p>(३)<br />
पड़ोसी मर गया, अब यह खबर अखबार देते हैं<br />
सोच लो किस तज़&#124; में हम ज़िन्दगी का बोझ ढोते हैं,<br />
अब तो मैं भी छोड़ता बिस्तर सुनो तस्दीक़ कर,<br />
नाम मेरा तो नहीं था कल ’निधन’ के पृष्ठ पर।</p>
<p><a href="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/K/KPSaxsena/kshanikayen.htm">साहित्य कुंज के आभार से</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गुरू का सम्मान]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/20/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 09:49:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम में कई शिष्य थे। उनमें अरूणि गुरू का सबसे प्रिय शिष्य था। आश्रम के पास खेती की बहुत ज़मीन थी। खेतों में फसल लहलहा रही थी। एक दिन शाम को एकाएक घनघोर घटा घिर आई और थोडी देर में तेज वर्षा होने लगी। उस समय ज्यादातर शिष्य उठ कर चले गए थे। अरूणि गुरूदेव के पास बैठा था। गुरू धौम्य ने कहा, अरूणि तुम खेतों की तरफ चले जाओ और मेडों की जाँच कर लो। जहाँ कहीं से पानी बह रहा हो और मेड कमजोर हो तो वहाँ मिट्टी डाल कर ठीक कर देना। अरूणि चला गया। कई जगह मेड के ऊपर से पानी बह रहा था। उसने मिट्टी डाल कर ठीक किया। एक जगह मेड में बडा छेद हो गया था। उससे पानी तजी से बह रहा था। वह उस छेद को बंद करने के लिये मिट्टी का लौदां उठा-उठा कर भरने लगा, लेकिन ज्योंही एक लौंदा रखकर दुसरा लेने आता, पहले वाला लौंदा भी बह जाता। उसका बार-बार क प्रयास बेकार जा रहा था कि उसे एक उपाय सूझा। उसने मिट्टी का एक लौंदा उठाया और छेद को बंद करके स्व्यं मेड के सहारे वहीं लेट गया, जिससे पानी बहना बंद हो गया। रात होने लगी थी। अरूणि लौट कर आश्रम नहीं आया था, जिसकी वजह से गुरू को चिंता हो रही थी। वे कुछ शिष्यों को लेकर खेत की तरफ गये। खेत के पास पहुँच कर पुकारा, अरूणि तुम कहाँ हो। वह बोला, गुरूवर मैं यहाँ हूँ। गुरूवर उस जगह गए। उन्होंने देखा कि अरूणि मेड  से चिपटा हुआ है। गुरूदेव बोले, वत्स तुम्हें इस तरह यहाँ पडे रहने की जरूरत क्या थी&#124; तुम्हें कुछ हो जाता तो ...।</p>
<p>अरूणि बोले, गुरूवर, यदि मैं अपना कर्तव्य अधूरा छोड कर चला आता तो वह गुरू का अपमान होता। जहाँ तक कुछ होने की बात है तो जब तक गुरू का आशिर्वाद शिष्य के सिर पर है तब तक शिष्य को कुछ नहीं होगा। गुरू का दर्जा तो भगवान से बडा है। इस पर महर्षि बोले, वत्स, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने आज गुरू-शिष्य के संबधों की अनूठी मिसाल कायम की है जो हमेशा के लिये जनमानस में एक मिसाल बनी रहेगी। तुमने अंतिम परीक्षा पास कर ली है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सम्पाती - धरमवीर भारती जी की एक कविता]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 05:26:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)</p>
<p>...यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की<br />
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:<br />
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-<br />
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख<br />
ताकि वे सनद रहें...<br />
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं<br />
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी</p>
<p>सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह<br />
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है<br />
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर<br />
बंद कर दिया है अब!</p>
<p>सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए<br />
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना</p>
<p>कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का<br />
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है<br />
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!<br />
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं<br />
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)</p>
<p>उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ<br />
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख<br />
क्योंकि वे सनद हैं<br />
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ</p>
<p>नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं<br />
वह मैं नहीं<br />
मेरा भाई था जटायु<br />
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से<br />
कौन है सीता?<br />
और किसको बचायें? क्यों?<br />
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे<br />
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर<br />
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं</p>
<p>...........................<br />
गुफा में शाँती है...<br />
...........................</p>
<p>कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार<br />
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है<br />
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं<br />
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं<br />
देखते नहीं ये<br />
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर<br />
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना...</p>
]]></content:encoded>
</item>

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