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	<title>फ्रांस &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/फ्रांस/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "फ्रांस"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 15:53:10 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[फ्रांस प्रवास ३- पेरिस की इक ठंडी शाम]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/12/18/paris-ki-ek-thandi-shaam/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 06:58:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.hi.wordpress.com/2007/12/18/paris-ki-ek-thandi-shaam/</guid>
<description><![CDATA[भाग १- काँच की सडकें
भाग २- परदेस में खा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/11/04/france-1/" target="_blank">भाग १- काँच की सडकें</a><br />
<a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/11/25/france-2/" target="_blank">भाग २- परदेस में खाना-पीना</a><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/12/effile.jpg" title="effile.jpg"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/12/effile.jpg" alt="effile.jpg" align="right" border="2" height="304" width="233" /></a><a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/11/25/france-2/" target="_blank"><br />
</a></p>
<p>कार्यक्रम इतना टाइट था, कि पेरिस घूमने के लिये लौटते वक्त मात्र शुक्रवार की दोपहर और शाम मेरे पास थी...शनिवार दिन में ११-१२ बजे वापसी थी। क्या देखें, क्या छोडें..और क्या खरीदें। मेरे साथ वन्दना जी और सुरीता जी थे जो फ्रांस में मेरी मुँह और कान थे (Interpreter को हिन्दी में क्या कहेंगे?) । ये लोग पेरिस के चप्पे चप्पे से वाकिफ थे सो इन्ही से मदद की गुहार लगाई गई। दो संभावनाएं थी या तो पूरा समय टेक्सी करके घूमा जाय..या एक जगह से दूसरी जगह मेट्रो में बदल बदल कर सफर किया जाये । अनुभवी जनों ने कहा कि मेट्रो से घूमेंगे तो थोडा <em>अडवेन्चरस </em>भी रहेगा और सस्ता भी। टेक्सी अगर कहीं ट्रेफिक वगैरह में फंस गई तो खडे ही रह जाओगे..कहीं जा नही पाओगे..और यहां की टेक्सी का मीटर जो घूमता है...देखते हीं चक्कर आने लगते हैं।</p>
<p>यहां के सबसे खास बात यह है कि आपको जगह जगह निः शुल्क नक्शे , जानकरी , पुस्तक आदि मिल जाते हैं सो परेशानी नही होती। उसके अलावा मेट्रो आदि स्टेशनों, मार्गों में दिशा निर्देश बहुत सपष्ट हैं। चूंकि मेट्रो में पहले नही बैठे थे पहले, तो ये अपने आपमें रोमांचक था। सो होटल से नक्शा उठाया गया..एक शहर का और एक मेट्रो का। सीमित समय में क्या क्या देखा जा सकता था और किन किन रास्तों से ताकि समय का अधिकाधिक उपयोग हो सके। चूंकि अपनी जानकारी बिल्कुल शून्य थी..हम कुछ नही बोले, सिवाय इसके कि एफिल टावर जरूर देखना है, इसके अलावा क्या दिखा सकें आपकी मर्जी। मेट्रो का नक्शा देख कर लगा कि बहुत जटिल सिस्टम है..लेकिन एक बार गौर किया और २ बार अलग अलग मेट्रो में बैठने के बाद इतना सरल लगने लगा कि आप एक नक्शा और जेब में पैसे देकर कहें भी छोड दीजिये,  बिना किसी से कुछ भी पूंछे भी आराम से घूम सकते हैं।<br />
<a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/12/sacred-heart.jpg" title="sacred-heart.jpg"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/12/sacred-heart.jpg" alt="sacred-heart.jpg" align="left" border="2" height="193" width="254" /></a><br />
सबसे पहला पडाव था Sacré-Cœur Basilica (Basilica of the Sacred Heart)। ये एक पुरातन चर्च है जो कि एक पहाडी पर स्थित है। ऊपर चढने पर पूरा शहर दिखाई देता है। यह काफी पुराना इलाका है, आसपास छोटी छोटी गलियां हैं जहां कई बार, कैफ़े हाउस, रेस्त्रां इत्यादि हैं।  इनमें कि रिनेंसा के समय चित्रकार, कवि, दार्श्निक इत्यादि बैठा करते थे। अभी भी फुटपाथ पर लाइन से चित्रकार बैठे रहते हैं..यहां घंटा-दो घंटा बैठिये, अपना पोर्ट्रेट बनावाइय। अपना फोटू बनवायें इतना समय नही था...सो थोडा घूमते फिरते, दुकाने टापते हुए फिर बढे मेट्रो स्टेशन की और...।</p>
<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/12/arc-de-triomphe.jpg" title="arc-de-triomphe.jpg"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/12/arc-de-triomphe.jpg" alt="arc-de-triomphe.jpg" align="right" border="2" height="309" vspace="2" width="239" /></a></p>
<p>अगली मंजिल थी Arc de Triomphe. हिन्दी में कहें तो विजय द्वार। यह अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में नेपोलियन युद्ध के समय शहीद हुए सैनिकों की याद में बनवाया गया था (दिखने में यह काफी कुछ अपने इंडिया गेट जैसा लगता है, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिकों की याद में बना है)। यहाँ से एक सडक शुरू होती है - Champs-Élysées । .इसे दुनिया की फैशन स्ट्रीट भी कह कते हैं...लम्बी-चौडी सडक..दोनों और बडे बडे ब्रान्ड्स के कपडों, गहनों और घडियों के शोरूम, सिनेमाघर, काफी हाउस इत्यादि। जेब में माल हो तो खरीदारी करने के लिये काफी कुछ। हमने बस बाहर से कीमतें देखीं। चूंकि ठंड बहुत थी...और बादल घिरे हुए थे..मेक्डानाल्ड्स में जाकर एक काफी पी..जो बिल्कुल भी अच्छी नही लगी। .रात को इस सडक बहुत अच्छी रोशनी होती है। यहाँ से एफिल टावर बहुत दूर नही है और समय होता तो पूरी सडक नापी जा सकती थी और 'काफी कुछ' देखा जा सकता था।<br />
खैर...यहाँ से फिर मेट्रो में सवार हुए और पहुँचे एफिल टावर। एफिल टावर बोले तो फ्रांस का ट्रेड मार्क। ठीक वैसे ही जैसे भारत का ताजमहल। १८८९ में बना यह शिखर, अपने समय में दुनिया का बसे लम्बा मानव निर्मित ढांचा था। इसकी कुल लम्बाई ३२४ मीटर है। टिकट लेकर आप टावर में कुछ ऊपर तक चढ भी सकते हैं...मध्य भाग में एक रेस्त्रां भी है, और अंधेरा होने के बाद जब रोशनी होती है तो पूरा टावर जगमगा उठता है। किंतु चूंकि हमें खरीदारी भी करनी थी (दुकानें यहां १० बजे बन्द हो जाती हैं) और सुबह निकलना भी था, सो ज्यादा देरे नही रुके और फिर मेट्रो पकडी अपने होटल की ओर।</p>
<p>इति श्री पेरिस यात्रा समाप्तम.....</p>
<p><em><strong>चलते चलते: </strong></em><br />
इन दिनों चिट्ठा-संसार में 'खिचडी' बनाम 'स्पेशल डाइट' पर चर्चा चल रही है। दरअसल खिचडी बनाने में बहुत आसान होती है..अपन जैसा अनाडी भी आराम से बना सकता है- नमकीन, मीठी, तीखी, फीकी कैसी भी बना लीजिये..ना ज्यादा मेहनत..ना ज्यादा कुशलता और काबिलियत। जल्दी बन जाती है और हाँ, पचने में भी आसान होती है। इसीलिये ये अपने को रास आती है। वैसे एक बात और है..'बुफे सिस्टम' में हमने देखा है...छः तरह के पकवान एक थाली में जब आते हैं और जब गुलाबजामुन की चाशनी रायते से गठबंधन करती है...तो लोग कहते हैं..'अरे ये तो <strong>खिचडी </strong>हो गया'  (बोले तो..खिचडी की भी कई श्रेणियां हो सकती हैं)  :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ्रांस प्रवास २-परदेस में खाना पीना ]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/25/france-2/</link>
<pubDate>Sun, 25 Nov 2007 09:38:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.hi.wordpress.com/2007/11/25/france-2/</guid>
<description><![CDATA[भाग १ से आगे 
एक ना &#8216;पीने&#8217; वाले शाका]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/2007/11/04/france-1/" title="part 1" target="_blank">भाग १ से आगे </a></p>
<p>एक ना 'पीने' वाले शाकाहारी को परदेस में क्या दिक्कत हो सकती है, कोई मुझसे पूंछे। हालांकि जाने के पहले ही वहां ई-मेल द्वारा बता दिया था कि में <em>विथाउट-एग-और-फिश </em>वाला शाकाहारी हूं..पर कोई सुने तब ना। सो खाने की टेबल पर जब वहां वेटर को बताया जाता तो चेहरे पर ऐसे भावा आते मानो कोई अजूबा देख लिया हो। पेरिस में भारतीय होटल मिल जाते हैं, पर मैं चूंकि पेरिस से ३०-४० किमी बाहर था...वहां कुछ उपलब्ध नही था। तो अपना आसरा थी ब्रेड, उस पर मक्खन, नमक और कालीमिर्च। कालीमिर्च भी ऐसी कि कोई तीखापन नही..गनीमत है कि नमक खारा था। साथ में उबले हुई आलू, गोभी, पालक, बीन्स, गाजर आदि आदि। १-२ बार चावल भी मिले।  हाँ जूस और फ्रूट खूब लिये..दिन में ३-४ सेब , २-३ गिलास जूस डकार जाते थे।</p>
<p align="center"><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/dsc02611.jpg" title="dsc02611.jpg"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/dsc02611.jpg" alt="dsc02611.jpg" align="middle" border="2" height="328" width="435" /></a></p>
<p align="center"><strong>( तले हुए आलू, उबली गोभी और पत्ता गोभी :( )</strong></p>
<p>चूंकि मैं वहां ज्यादा खाता नही था सो साथी प्रतिभागी अफसोस जताते थे और <em>'वेरी-सारी'</em> भी कहते थे, पर कोई चारा ना था और वैसे भी, मानसिक रूप से मैं ऐसी किसी परिस्थिति के लिये तैयार था। तो एक दिन हमारे लिये विशेष रूप से भारतीय खाना मंगवाया गया। तंदूरी रोटी, पुलाव, पालक पनीर, दाल, अचार, समोसे आदि आदि। साधु-साधु करते हुए खाया। :)<br />
भोजन करने का फ्रेंच तरीका भी बताते चलें।(और भी कई चीजों के फ्रेंच तरीके होते हैं;) )। खाने के साथ पीने को जरूर होना। अक्सर रेड वाइन। अब हमें ना पीने का खामियाजा अपने कालेज में तो भुगतना पडता था...यहां भी वही हाल। हां उन्हे देख देख अपने पीने वाले मित्रों की जरूर याद आतीं। फ्रेंच भोजन के तीन चार चरण होते हैं। सबसे पहले शुरुआत होती है, स्टार्टर से। इसमें होते थे कुछ सलाद,उनके ऊपर क्रीम और कुछ ऐसी चीजें जिनका मैं नाम नही जानता (अधिकतर अंडे युक्त)। मैने सोंचा..सलाद बचा कर रख लिया जाये, जब भोजन आयेगा तो उसके साथ खायेंगे..तो बताया गया कि जब तक ये प्लेट तुम्हारे सामने से हट नही जाती..अगले प्लेट नही आयेगी, याने पहले स्टार्टर खत्म कर लें फिर खाना मिलेगा। खाना भी प्लेट में एक ही बार परोसा जाता है। मतलब एक बार में प्लेट में जो आ गया, सो आ गया..ना ज्यादा न कम। इसके अलावा, यहां खाने-पीने की हर चीज डिब्बाबंद होती है ...चीनी, जैम, शहद, मक्खन सब चीजों की एक-एक खुराक के बराबर छोटे छोटे पैकेट। दही, छाछ, जूस आदि के साथ भी ऐसा ही।ऐसा नही होगा कि भगोनी में दही रख दें और कटोरी में अपने हिसाब से ले लें।</p>
<p>*************************************************</p>
<p>यहाँ से जाते समय, मुम्बई से एयर इंडिया की उडान मात्र १० घंटे देरी से थी, सो सुबह के ७ बजे की जगह यहां से निकले शाम के ५ बजे। हालाँकि एयर इंडिया वालों ने होटल उपलब्ध करवाया था सो हाँ खास दिक्कत नही थी पर दूसरे छोर जहाँ हम दिन के १:३० बजे अपेक्षित थे, वहाँ हम पहुँचे राते के ११ बजे। परदेस में नन्ही सी जान, एक दम अकेली..और रात के ११ बजे..हाय दय्या। पूंछो ना कैसे मैने रैन बिताई।<br />
खैर रात को किसी तरह गंतव्य पहुँचे, अपना कमरा मिला और सो लिये। सुबह जब अन्य लोगों से मिले, जो मिलता, मेरी देरी की वजह पूंछता। व्हिच एयरलाइन्स? एयर इंडिय? ओह्ह्ह। ये ओह्ह और नाक भौं सिकोडना इतना खला कि बस।लेकिन मन मसोस कर रह गये।<br />
लेकिन मजा आया लौटते में। वापसी में जब टेक्सी पकडी, तो टेक्सी चालक कम्बोडिया का था। योरोप में किसी एशियाई से मिले, तो ऐसा लगा मद्रास में कोई राजस्थानी मिल गया :)।खैर रस्ते में वो भी पूंछ बैठा..व्हिच एयरलाइन्स। एयरइंडिया। देन इट्स ओके। एयर फ्रांस इस ओन स्ट्राइक सिन्स २-३ डेज़। अब खुश होने की बारी अपनी थी। एयरपोर्ट पहुँचा तो देखा..एयर फ्रांस की ८०% उडानें निरस्त। कुछ हिन्दुस्तानी मिले, जो एक दिन पहले निकलने वाले थे, पर उस हडताल की वजह से नही निकल पाये, और उनक टिकट एयरइंडिया में ट्रांसफर करवाया या था। साथ मिल कर दम भर एयर फ्रांस को गरियाये। और हाँ, अपनी एयर इंडिया..एक दम राइट टाइम थी उस दिन।दिल खुश कर दित्ता। (फ्रांस में आजकल हडतालों का मौसम चल रहा है, शायद वहाँ की सरकारी नीतियों की वजह से। अभी हाल ही में मेट्रो हडताल पर थी, और अन्य नागरिक सुविधाएं भी।)</p>
<p>*************************************************<br />
फ्रांस निवासी रिचड से मेरी मुलाकात २००२ में बैंगलोर में हुई थी, मात्र १ महीने के लिये। हम लोग एक ही इंस्टिट्यूट पर जाते थे। उसके बाद कभी कभार याहू मेसेन्जर पर हाय हलो होती रही। पेरिस आने का प्लान बना तो मैने उसे एक आफलाइन डाला..अपने आने की खबर देते हुए। समय की कमी के चलते हम वहाँ मिल तो नही पाये, पर फोन पर बतियाये। अंग्रेजी में बात करते करते अचानक वो पूंछ बैठा "तुम्हे हिन्दी आती है?"। मैं भौंचक। मैं बोला.."तुम्हे हिन्दी आती है?" बोला हाँ..मैं तो बैंगलोर समय भी थोडी बहुत बोलता था। और हिन्दी फिल्में भी खूब देखता हूँ..और मेरी बीवी पाकिस्तानी है। खालिस फ्रांसिसी बंदे के मुह से अपनी भाषा सुनकर बहुत अच्छा लगा । हिन्दी फिल्मों के मसाले को हम कितना भी गाली दे लें लेकिन दुनिया भर में बालिवुड ने अपनी एक पहचान तो कायम कर ही रखी है, और कई जगह अपना इंडिया इन्ही की वजह से पहचाना जाता है।</p>
<p>पेरिस शहर में क्या कुछ देख सके, वो अगली बार।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ्रांस प्रवास १ - काँच की सडकें! ]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2007/11/04/france-1/</link>
<pubDate>Sun, 04 Nov 2007 18:39:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.hi.wordpress.com/2007/11/04/france-1/</guid>
<description><![CDATA[छुटपन में अपने दोस्तों के बीच की गपबाज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/rd.jpg" title="पेरिस की सडकें"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/rd.jpg" alt="पेरिस की सडकें" align="right" border="2" height="150" hspace="2" vspace="2" width="200" /></a>छुटपन में अपने दोस्तों के बीच की गपबाजी में एक बात बारबार सुनी थी..."पेरिस की सडकें कांच की होती हैं"। बहुत रोमांच हुआ करता था उस समय, कैसी होती होगी कांच की सडक, कैसे तो लोग चलते होंगे उन पर..चलते क्या होंगे...फिसलते होंगे...और गाडियां..क्या सरपट दौडती होंगी। एक और बात जो शायद सामान्य ज्ञान की किताब में भी था, कि "किस देश में मच्छर नही होते?"...फ्रांस। फ्रांस जाने का कार्यक्रम बनते समय जो बात सबसे पहले ध्यान में आई वो बचपन के ये किस्से थे। भई कांच की सडकें तो नही देखन मिलीं..हाँ जो थीं वो एकदम सपाट और साफ सुथरी थी। और मच्छर ..एक मच्छर तो मैने बरामद कर ही लिया वहां। फोटो लेने वाला था कि उड गया..लेकिन दिल को पता नही क्यों..अजीब से खुशी हुई। वैसे अगर बचपन में आ जाता तो कितना निराश होतामेरा बाल मन...जो मच्छर नही होना था, वो मिला, और कांच की सडक..नही मिली :) &#124;</p>
<p>(<strong>चित्र</strong>- Champs-Élysées - पेरिस की सबसे मंहगी सडक। इसके दोनो ओर मंहगे शोरूम, केफे, सिनेमाघर, फैशन हाउसेस आदि  हैं। पृष्ठभूमि में Arc De Triomphe दिख रहा है। हिन्दी में विजय द्वार। इंडिया गेट का फ्रेंच संस्करण कह सकते हैं।)<br />
******</p>
<p>हवाईअड्डे से अपने गंतव्य तक कैसे पहुँचूंगा, इसकी बडी चिंता थी। अपने यहाँ मेहमानों को पिक अप उपलब्ध करवाते हैं ताकि कोई दिक्कत नही हो। लेकिन मुझे बताया गया था कि ऐसी कोई सुविधा वहां नही रहेगी। हवाई अड्डे से टेक्सी लेने का और निकल लेने का। पते का प्रिंट साथ लेकर चलने का और टेक्सी वाले को थमा देने का। मैने पूंछा..भाव-ताव। बिना किराये पर बहस कियें टेक्सी में कैसे बैठ जायेंगे :)। खैर, एयर इंडिया कि कृपा से विमान ८ घंटे लेट। सो जहाँ दिन के २ बजे मुझे मुझे पहुँच जाना था, पहुँचा रात १०:३० बजे। और चिंता हुई। अंजान शहर और भाषा भी नही आती। हवाई अड्डे से टेक्सी पकडी, टेक्सी वाला कुछ बोला तो बिना कुछ कहे प्रिंट उसे थमा दिया। रापचिक टेक्सी...जी. पी. एस. लगी हुई। मेरा गंतव्य शायद पेरिस के बाहर था..करीब एक घंटे की ड्राइव के बाद जिस जगह पहुँचना था उस उपनगर में तो पहुँच गये, लेकिन अपना वांछिता पता ना मिला। पहले तो गलती से एक घुडसाल में घुस गये, फिर बहुत देर गोल गोल चक्कर काटते रहे..ड्राइवर कुछ कहे फ्रेंच मिश्रित अंग्रेजी में और मैं कुछ कहूं अंग्रेजी में।अब अगर अपने देस में हों तो नुक्कड पर उतर कर किसी भी दुकान पे पूंछ लो, पर वहां ना दुकान, ना आदमी।  बहुत देर बाद दिमाग की बिजली चमकी और मैने उसे अपने गंतव्य पर फोन करके पूंछने को कहा, जिसका कि नम्बर मेरे पास था। आखिरकार किसी तरह सही ठिकाने पहुंचे।<br />
*******<br />
<a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/kat.jpg" title="केटरीना"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/kat.jpg" alt="केटरीना-मुम्बई में" align="left" border="2" height="150" hspace="2" vspace="2" width="200" /></a> एक यूरो करीबन पचपन रुपये का होता है। ये अच्छे से याद था, पर लोगों भूल जाने की सलाह देकर भेजा था। चेतावनी मिली कि वहां कुछ भी ५५ से गुणा करके मत देखना नही तो जीना मुश्किल हो जायेगा। पर ऐसा कैसे हो सकता था। जब टेक्सी वाले को ७० यूरो चुकाये गये, तो मुझे हैदराबाद-मुम्बई-हैदाराबाद का हवाई किराया नजर आ रहा था...किसी तरह खुद को संभाला ;) &#124; पर बताया गया कि टेक्सी वाला लाया एकदम सही था।बिना किसी चीटिंग के।</p>
<p>(<strong>चित्र </strong>- केटरीना कैफ- मुम्बई हवाई अड्डे पर)</p>
<p>********<br />
अंग्रेजी और फ्रेंच की प्रतिद्वंदिता तो सब जानते हैं। आज जो स्थान दुनिया में अंग्रेजी का है, वो किसी समय फ्रेंच का हुआ करता था। लेकिन आज भी फ्रंसिसियों का अपनी भाषा के प्रति प्रेम लाजवाब है। बिना जरूरत कोई भी अंग्रेजी में बात नही करता। किसी शब्द को लेकर एक प्रतिभागी से बात हो रही थी जो अंग्रेजी और फ्रेंच में एक जैसा है। बातों बातों में मैने कहा <em>"ओह दिस वर्ड कम्स फ़्रोम इंगलिश ओनली"</em>..तुरंत प्रतिवाद हुआ..<em>"नो नो..ईत गोज़ फ्राम फ्रेंच टू इंगलिश"</em> (हालांकि दोनो लेटिन से आती हैं)।</p>
<p>********<br />
जहां ठहराया गया था वहां शाम ५ बजे बाद वायरलेस इंटरनेट बन्द हो जाता था, सो लेपटाप बेकार और सर्फिंग के लिये वहां रखे हुए कम्प्यूटर्स की शरण में जाना होता। वहां सारे <em>एपल मेक</em>  (Apple Mach)लगे हुए। यहां तक तो ठीक, पर सब फ्रेंच में और की बोर्ड भी फ्रेंच वर्ज़न। अब एक तो आज तक एपल पे काम नही किया। वो तो फिर भी किसी तरह RnD करके चला लूं..पर फ्रेंच..? बहुत नाइंसाफी है। एक मेल लिखने में आधा घंट लग जाता। और हिन्दी तो पढ ही नही पाया..यूनिकोड में भी। भोमियो की उपियोगिता उसी दिन समझ में आई।<br />
********<br />
<a href="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/mum-ap.jpg" title="मुम्बई हवाई अड्डा"><img src="http://saptrang.wordpress.com/files/2007/11/mum-ap.jpg" alt="मुम्बई हवाई अड्डा" align="right" border="2" height="150" hspace="2" vspace="2" width="200" /></a>निकलते समय मुंबई एयरपोर्ट पर रातगुजारी काफी सही रही। पुरानी दिल्ली के रेल्वे स्टेशन जैसी भीड...बैठने को कोई जगह नही..ट्राली पर सामान रखो और पसर जाओ। पहले तो खबर आई कि आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम आने वाली है। अपन केमरा लेकर एकदम तैयार। T20 हार कर आई थी उस शाम को टीम और वो हार और शायद सीरिज के बीच हुआ "बंदर विवाद" खिलाडियों के चेहरों पर दिख रह था। सब के मुह सूजे हुए है थे। जैसे ही टीम बस आई..अच्छी खासी हलचल मच गई। हालांकि टी. वी. पर जिन चेहरों को देखते ही पहचान जाते हैं असलियत में उन्हे देखकर पहचानने में दिक्कत हुई। खैर जब तक ये निकले, बिना किसी चेतावनी के केटरीना आ गईं। भई अपनी तो शाम बन गई। फोटो तो लिये ही, ये भी पडताल की गई कि ये वाकई में खूबसूरत हैं या सिर्फ परदे पर दिखती हैं :)। (अगर आप कहीं जायें और लोग धडाधड आपकी तस्वीरें उतारना शुरू कर दें आपके चारों तरफ खडे हो जायें तो कितना असहज हो जाता है। ये शायद प्रसिद्ध होने की कीमत है। आप इत्मीनान से (अपनी) नाक में अंगुली भी नही डाल सकते...)</p>
<p><strong>चित्र</strong>- मुम्बई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, रात को २ बजे। बैठने को पर्याप्त जगह तक नही।</p>
<p><em>खाने-पीने को लेकर इतना कुछ लिखना है, कि पूरी पोस्ट बन सकती है..सो वो अगली बार।</em></p>
]]></content:encoded>
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