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	<title>फ्लाईओवर &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/फ्लाईओवर/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "फ्लाईओवर"</description>
	<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 18:22:35 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA["मैडम जी..कहाँ थी आप?"]]></title>
<link>http://hansteraho.wordpress.com/2007/12/06/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a1%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 02:02:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>राजीव् तनेजा</dc:creator>
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<description><![CDATA[&#8220;मैडम जी..कहाँ थी आप?&#8221;
***राजीव तनेजा***]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"मैडम जी..कहाँ थी आप?"</p>
<p>***राजीव तनेजा***<br />
"अब क्या मुँह लेकर अपना हाल ब्याँ करे ये राजीव?"</p>
<p>"मैँ खुद ही तो तारीफों के पुल बाँधा करता था उनके"...</p>
<p>"हाँ!..उन्हीं के"....</p>
<p>"जिनकी वजह से तो आज मेरा ये हाल है"...</p>
<p>"आज अगर मेरा काम-धन्धा...मेरा घरबार...</p>
<p>सब टूट की कगार पर है तो सिर्फ उन्हीं के कारण"<br />
"दोराहे पे खडा आज मैँ सोच रहा हूँ कि किस ओर जाऊँ?"...</p>
<p>"इस ओर...या फिर उस ओर"...</p>
<p>"जाऊँ तो जाऊँ कहाँ...बता है दिल...कहाँ है मेरी मंज़िल?"</p>
<p>"कौन ऐसा नहीं होगा जो...मेरा मज़ाक...</p>
<p>मेरी खिल्ली नहीं उडाएगा?"....<br />
"सब के सब यही कहेंगे कि बडा अपना 'टीन-टब्बर' सब उखाड ले गया था पानीपत कि..</p>
<p>अब तो वहीं सैट होना है"...</p>
<p>"वही मेरी कॉशी...वही मेरा मक्का"<br />
"आ गए मज़े?"...</p>
<p>"ले लिए वडेवें?"...</p>
<p>"हर जगह अपनी ही चलाता था"...</p>
<p>"अब पता चला बच्चू को कि मंडी में आलू क्या भाव बिकता है?"जैसे ताने बारम्बार मेरे कानों के पर्दों को बेंध ना डालेंगे?"<br />
"उनका भी क्या कसूर?"<br />
"मैँ खुद ही जो छाती ठोंक बडे-बडॆ दावे करता था कि...</p>
<p>'मेरी दिल्ली मेरी शान'...</p>
<p>'दिल्ली पैरिस बन के रहेगी'...<br />
"माँ दा सिरर बन्न के रहेगी"...</p>
<p>"ढेढ साल में तो कुछ हुआ नहीं"....</p>
<p>"अब वैसे भी वक्त ही कितना बचा है मैडम जी के पास?"</p>
<p>"खेल सर पे तैयार खडे हैँ होने को और मैडम जी अभी 'फ्लाईओवर' भी पूरे नहीं बनवा पाई हैँ"...<br />
"पिछले ढेढ साल में और अब में कितना फर्क पड गया है?"...<br />
"टट्टू जितना भी नहीं"<br />
"दावे तो लम्बे चौडे कर रही है मैडम जी खुद और उनका लाव लश्कर भी लेकिन ...</p>
<p>हालात तो अभी भी जस के तस ही हैँ"...<br />
"वही आँखे मूंद!..बेतरतीब दौडती भीड"....</p>
<p>"वही हमेशा!..दुर्घटनाएँ करती  बेलगाम ब्लू लाईन बसें"....</p>
<p>"वही उनकी!..रोज़ाना की अन्धी भागमभाग"...</p>
<p>"वही उनकी!..लफूंडरछाप दादागिरी"...<br />
"कुछ भी तो नहीं बदला है"<br />
"वही सरे आम!..अवाम को ठगते-एंठते ऑटो-टैक्सी वाले"...</p>
<p>"वही केंचुए की चाल!..रेंगता ट्रैफिक"</p>
<p>"वही बिजली के!..लम्बे-लम्बे कट"..</p>
<p>और वही जम्बो जैट के माफिक!..बिजली के तेज़ दौडते मीटर"<br />
"कुछ बदला भी है कहीं?"...<br />
"हाँ!..बदला है अगर कुछ...तो वो है आम आदमी का मायूस चेहरा"...</p>
<p>"हाँ!..मायूस कहना ही सही रहेगा"...<br />
"इनके मायूसियत लिए मासूम चेहरे के पीछे ज़रा ठीक से  झांक कर तो देखो मैडम जी"</p>
<p>"कैसे मर-मर जीने की चाह में जिए चले जा रहे हैँ ये"</p>
<p>"लेकिन पराई पीड आप क्या जानो?"...</p>
<p>"आपका क्या है?"..</p>
<p>"कौन सा आपको भाग कर बस या गाडी पकडनी है?"...</p>
<p>"कौन सा आपको बिजली,पानी और मोबाईल के बिल भरने हैँ?"...<br />
"कौन सा आपके मकान,दुकान या फैक्ट्री पे हथोडा बजाया जा रहा है?"<br />
"कौन सा आपकी दुकान या बिल्डिंग को 'सील'लग रही है?"...<br />
"दिल्ली 'पैरिस' बने ना बने लेकिन इतना तो सच है ...कि आपके घर ....</p>
<p>ऊप्स!...घर कहाँ हुए करते हैँ आपके?"...</p>
<p>"सॉरी!..घर तो हम जैसे मामूली लोगों के होते हैँ"...</p>
<p>"आप लोग तो बँगलो में रहा करते हैँ"...<br />
"हैँ ना!...?"...<br />
"आपके बँगले बनेंगे...ज़रूर बनेंगे लेकिन हम लोगों की जेबों के दम पर"..<br />
"यही सच है ना?"...<br />
"पैरिस क्या...फ्राँस क्या...और लंदन क्या...</p>
<p>दुनिया के हर देश...हर शहर..हर मोहल्ले की पॉश कालोनियों में बनेंगे"</p>
<p>"और!...वो भी एक से एक टॉप लोकेशन पर"<br />
"हाँ!...हमीं लोगों की जेबों की कीमत पर"मेरा ऊँचा स्वर मायूस हो चला था<br />
"पता नहीं कैसे पाई-पाई जोड कर हमने अपना ये छोटा सा आशियाना बनाया"..</p>
<p>"सालों साल एडियाँ रगड-रगड कर अपना रोज़गार जमाया"...</p>
<p>"जब कुछ खाने कमाने लायक हुए तो मैडम जी कहती हैँ कि...</p>
<p>"चलो!..भागो यहाँ से"...</p>
<p>"टॉट का पैबन्द हो तुम दिल्ली के नाम पर"..</p>
<p>"धब्बा हो दिल्ली की शान में"<br />
"सील कर देंगे हम तुम्हारी ये दुकाने. ..ये फैक्ट्रियाँ"...</p>
<p>"तोड देंगे तुम्हारे ये फ्लैट..ये मकान"...</p>
<p>"नाजायज़ कब्ज़ा जमा रखा है तुमने"...<br />
"अरे!...काहे का नाजायज़ कब्ज़ा?"..</p>
<p>"पूरे गिन के करारे-करारे नोट खर्चा किए थे हमने"<br />
"पता भी है तुम्हें कि कितने सालों से?"...</p>
<p>"क्या-क्या जतन करके...कहाँ-कहाँ अँगूठा टेक के पैसा इकट्ठा कर हमने ये छोटा सा दो कमरों का मकान खरीदा और...</p>
<p>अब आप ये कहने चली हैँ कि ये ग्राम सभा की सरकारी ज़मीन है...या फिर एक्वायर की हुई ज़मीन है"...<br />
"हमें कुछ नहीं पता कि ग्राम सभा क्या होती है और एक्वायर किस बिमारी का नाम है?"<br />
"हमें तो बस इतना पता है कि ये दुकान..ये मकान हमारा है"<br />
"चलो माना कि आप सच ही कह रही होंगी सोलह आने कि ये ग्राम सभा की ज़मीन है...</p>
<p>माने सरकारी ज़मीन लेकिन...</p>
<p>तब आपके मातहत कहाँ गए हुए थे जब पैस ए ले-ले यहाँ खेतों में धडाधड कलोनियाँ बसाई जा रही थी?"</p>
<p>"तब क्यों नहीं रोका था हमें?"</p>
<p>"तब क्यों नहीं अन्दर किए थे कॉलोनाईज़र और प्रापर्टी डीलर?"</p>
<p>"वो भी तो पैसे ले कर इधर-उधर हो गए थे"मैँ खुद से बातेँ करता हुआ बोला<br />
"उस वक्त तो पाँच हज़ार रुपए पर 'शटर' के हिसाब से...</p>
<p>नकद गिन के धरवा लिए थे सरकारी बाबुओं ने चिनाई चालू होने से पहले ही कि...<br />
"हाँ!...दल दो हमारे सीने पे दाल"..</p>
<p>"हम पत्थर दिल हैँ"...</p>
<p>"हमें कोई फर्क नहीं पडता"..<br />
"ठीक उनके दफतर के सामने ही तो निकाली थी तीन दुकाने मैंने"...</p>
<p>"कोई रोकने वाला...कोई टोकने वाला नहीं था...</p>
<p>नोटों भरा जूता जो मार चुका था पहले ही" ..<br />
"ये तो बाद में पता चला कि सालों ने पैसे भी डकार लिए और पीठ पीछे कंप्लेंट कर छुरा भी भौँक डाला सीने में"...</p>
<p>"सालों!..को अपनी कुर्सी जो प्यारी थी"</p>
<p>"सो!...बेदाग बचाने को सारी कसरतें की जा रही थी"...</p>
<p>"ऊपर दफतर में खिला-पिला के मेरे केस की फाईल दबवा दी कि कुछ भी हो साल दो साल ऊपर उभरने तक ना देना"...</p>
<p>"बाद में अपने आप निबटता रहेगा खुद ही"..</p>
<p>"वाह!...क्या सही तरीका छांटा है पट्ठों ने"...</p>
<p>"जेब की जेब भरी रही और कुर्सी की कुर्सी बची रही"<br />
"कहने को तो जनता के सेवक हैँ"...</p>
<p>"सेवा करना इनका धर्म है...तनख्वाह मिलती है इन्हें इसकी"..<br />
"अजी छोडो ये सब!...काहे के जनता-जनार्दन के सेवक?"...<br />
"सेवा-पानी तो उल्टे अपनी ये करवाते हैँ हमसे"</p>
<p>"लानत है ऐसे जीवन पर"...</p>
<p>"इनकी सेवा भी करो और इनका पानी भी भरो"<br />
"मैडम जी!...आपका डिपार्टमैंट कहता है कि सिर्फ दिल्ली जल बोर्ड का पानी ही पिएँ"..</p>
<p>"अरे!...पहले ठीक से घर-घर पहुँचाओ तो सही इसे"...</p>
<p>"फिर हम ना पिएँ तो कहना"<br />
"वैसे एक बात बताएँगी आप सच्ची-सच्ची?"</p>
<p>"आपने कभी खुद भी पी के देखा है इसे?"....</p>
<p>"कैसे सडाँध मारता है ना कई बार?"<br />
"है ना?"...<br />
"इसका मटमैला रंग देख तो उबकाई भी आने से मना कर देती है"..<br />
"ठीक है!...माना कि आप सिर्फ और सिर्फ फिल्टरड पानी ही इस्तेमाल करती हैँ....</p>
<p>नहाने के लिए भी और *&#38;ं%$# के लिए भी"...<br />
"किसी से सुना तो ये भी है कि आपके कुत्ते तक भी बिज़लरी के अलावा दूजा सूँघते तक नहीं हैँ"...</p>
<p>"अल्सेशियन जो ठहरे"</p>
<p>"अरे!...हमें उनसे भी गया गुज़रा तो ना बनाएँ आप"</p>
<p>"प्लीज़!..विनती है हमारी आपसे कि...</p>
<p>ढंग से बाल्टी दो बाल्टी पीने का पानी ही म्यस्सर करवा दिया करें"<br />
"तब कहाँ गई थी मैडम जी आप?"</p>
<p>"जब पुलिस वाले बीट आफिसर  बारम्बार मोटर साईकिल पे चक्कर काट काट अपना हिस्सा ले जा रहे थे और...</p>
<p>बाद में चौकी इंचार्ज को भेज दिया था कि जाओ तुम भी कर आओ मुँह मीठा"..</p>
<p>"हो जाएगी तुम्हारी भी दाढ गीली"<br />
"आप कहती हैँ कि हमने अवैध कंस्ट्रक्शन की हुई है तो...</p>
<p>आप ये बताएं कि किसने नहीं किया है ये तथाकथित अवैध निर्माण?"</p>
<p>"क्या आप नेताओं के निर्माण दूध के धुले हैँ?"</p>
<p>"कुछ अनैतिक नहीं है उनमें?"</p>
<p>"क्या आपको ज़रूरत हो सकती है अतिरिक्त स्पेस की...हमें नहीं?"</p>
<p>"क्या आपकी ज़रूरतें जायज़ हो सकती हैँ...हमारी नहीं?"<br />
"अच्छा किया जो आपने बुल्डोज़र चला हमारा आशियाँ मटियामेट कर दिया...ध्वस्त कर दिया लेकिन...</p>
<p>क्या आपके अपने अवैध निर्माणों की तरफ आप ही के बुल्डोज़र ने निगाह करना भी गवारा समझा?"</p>
<p>"उचित समझा?"<br />
"नहीं ना!...?...<br />
"किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव ...जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है"</p>
<p>"रेत के ढेर पे तुम भी खडे हो और हम भी पडे हैँ"...</p>
<p>"ना तुम सही हो...ना हम ही सही हैँ"<br />
"अरे!..हमारा दिल देखो....हमारा जिगरा देखो"...</p>
<p>"आपने हथोडा बजाया"...</p>
<p>"कोई बात नहीं"...</p>
<p>आपने सील लगाई"...</p>
<p>"कोई बात नहीं"</p>
<p>"लेकिन इतना तो ज़रूर पूछना चाहूँगा आपसे कि...</p>
<p>अगर हमारे यहाँ से हथोडों की धमाधम आवाज़ें हमारे दिल ओ दिमाग को बेंधे जा रही थी तो</p>
<p>कम से कम आपके वहाँ से हथोडी की महीन सी ...बारीक सी आवाज़ भी हमें तसल्ली दे जाती कि ..</p>
<p>कानून सबके वास्ते एक है"...<br />
"हम चुपचाप संतोष कर अपने रोते हुए दिल को शांत कर लेते कि...</p>
<p>"कोई छोटा...कोई बडा नहीं है कानून की नज़र में"</p>
<p>"वो सबको एक आँख से देखता है"</p>
<p>"लेकिन अफ्सोस!...जो हुआ...जैसा हुआ...</p>
<p>उस से तो लगता है कि इससे तो अच्छा था कि कानून की एक आँख भी ना ही होती"...</p>
<p>"यूँ भेदभाव तो नहीं कर पाता वो"..<br />
"कहने को हम लोकतंत्र में जी रहे हैँ"..</p>
<p>"अगर ये भ्रम मात्र है हमारा तो प्लीज़...इसे भ्रम ही रहने दें"</p>
<p>"करो ना यूँ ज़मीनोदाज़ हमारे आशियाँ...जवाब तुम्हें ऊपर भी देना है"<br />
"तब कहाँ चली जाती हैँ मैडम जी आप?...</p>
<p>जब चौक पे खडे हो ड्यूटी बजाने के बजाए आपके ट्रैफिक हवलदार झाडियों के पीछे छुप...</p>
<p>पहले तो आम आदमी को कानून तोडने के लिए प्रेरित करते हैँ और फिर...</p>
<p>चालान से सरकारी खजाना भरने से पहले अपनी जेब भरने को बाध्य करते हैँ"...<br />
"ठीक है!...माना कि खर्चे बहुत हैँ सरकार के...कोई सीधे-सीधे दे के राज़ी नहीं है लेकिन...</p>
<p>ये कहाँ का इंसाफ है कि सीधे तरीके से जब घी ना निकले तो सरकार भी अपनी उँगलियाँ टेढी कर ले?"<br />
"चालान तो आपने वही रखा सौ रुपए का ही लेकिन...टैक्स के नाम पर पाँच सौ का फटका अलग से लगा दिया"...</p>
<p>"वाह री शीला!...देख लिया तेरा इंसाफ"</p>
<p>"ज़ोर का झटका...सचमुच बडी ज़ोर से लगा दिया ना?"...<br />
"आप कहती हैँ कि इससे तो गाडे-घोडे वालों को ही फर्क पडेगा...आम आदमी को नहीं"...</p>
<p>"ये तो बताओ मैडम जी कि ये फालतू का खर्चा कहाँ से ओटेंगे वो बेचारे?"<br />
"किराए बढा दिए जाएँगे...आटा...दाल-चावल...कपडा-लत्ता सब मँहगा हो जाएगा"</p>
<p>"कुछ खबर भी है आपको?"<br />
"एक तो पहले से ही बढे हुए कम्पीटीशन से कमाई में कमी...</p>
<p>ऊपर से सीलिंग और मँहगाई की मार"...<br />
"वाह मैडम जी...देखा तेरा पलटवार"</p>
<p>"अरे!...अगर खर्चे ही पूरे करने हैँ तो अपने मातहतों की जेबें...उनके बैंक एकाउंट...</p>
<p>उनके बँगले...उनकी जायदादें आदि...सब खंगाल मारो"...</p>
<p>"गारैंटी है कि उम्मीद से दुगना क्या...चौगुना क्या और सौ गुना भी मिल जाए तो कम होगा"</p>
<p>"क्यों ठिठक के रुक क्यों गयी आप?"...</p>
<p>"अपनों के लपेटे में आने का डर सता रहा होगा?"<br />
"ये कहाँ की भलमनसत है कि उन्हें बक्श..आम आदमी को चौ तरफी मार मारें आप?"<br />
"एक तरफ सीलिंग का डंडा"...</p>
<p>"मँहगाई की मार".. .</p>
<p>"हर समय घरोंदो के टूटने-बिखरने का सताता डर"<br />
"आप ही के मुँह से सुना है कि आप दिल्ली को इंटरनैशनल लैवल का बनाने जा रही हैँ"...</p>
<p>"आप कहती हैँ कि मैट्रो दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बन रही है लेकिन...</p>
<p> फिर भी आम जनता बसों में बाहर तक लटकी क्योँ नज़र आ रही है?"<br />
"आप कहती हैँ कि मॉल रातोंरात ऊँचे पे ऊँचे हुए जा रहे रहे हैँ लेकिन...</p>
<p> फिर भी छोटे अनाअथोराईज़्ड कॉलोनियों में बाज़ार अभी भी भीड से क्योँ अटे पडे हैँ?...क्योँ भरे पडे हैँ?"..<br />
"आप कहती हैँ कि सडकों की लम्बाई-चौडाई बढ रही है लेकिन...</p>
<p>फिर भी रेहडी-पटरी वाले अभी भी जस के तस सडकों पे कब्ज़ा जमाए क्योँ जमे खडे हैँ?"<br />
"आप कहती हैँ कि फ्लाईओवर बन रहे हैँ ..बनते चले जा रहे है लेकिन...</p>
<p>फिर भी सडको से जाम क्योँ खुलने का नाम नहीं ले रहे हैँ?"<br />
"कहने को...लिखने...बहुत कुछ है बाकी है ए राजीव लेकिन...</p>
<p>बोल बोल के...सोच सोच के थक चुके मेरे विचारों ने...</p>
<p>मेरा साथ छोड नींद का दामन थामने का ऐलान कर दिया है ...</p>
<p>सो बाकी की अगली बार उगल देंगे"....</p>
<p>"फिलहाल चलता हूँ....लौट के जल्दी ही मिलता हूँ"...</p>
<p>"जय हिन्द"...</p>
<p>"मेरी दिल्ली मेरी शान"<br />
***राजीव तनेजा***</p>
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