<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>बरसात &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/बरसात/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "बरसात"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 16:11:57 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[ऐसी आंखें नही देखी]]></title>
<link>http://jagjitsingh.wordpress.com/?p=326</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 07:47:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsingh.wordpress.com/?p=326</guid>
<description><![CDATA[ऐसी आंखें नही देखी, ऐसा काजल नही देखा,
ऐ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसी आंखें नही देखी, ऐसा काजल नही देखा,<br />
ऐसा जलवा नही देखा, ऐसा चेहरा नही देखा,</p>
<p>जब ये दामन की हवा ने, आग जंगल में लगा दे,<br />
जब ये शहरो में जाए, रेत में फूल खिलाये,</p>
<p>ऐसी दुनिया नही देखी, ऐसा मंजर नही देखा,<br />
ऐसा आलम नही देखा, ऐसा दिलबर नही देखा,</p>
<p>उस के कंगन का खड़कना, जैसा बुल-बुल का चहकना,<br />
उस की पाजेब की छम-छम, जैसे बरसात का मौसम,</p>
<p>ऐसा सावन नही देखा, ऐसी बारिश नही देखी,<br />
ऐसी रिम-झिम नही देखी, ऐसी खवाइश नही देखी,</p>
<p>उस की बेवक्त की बाते, जैसे सर्दी की हो राते,<br />
उफ़ ये तन्हाई, ये मस्ती, जैसे तूफान में कश्ती,</p>
<p>मीठी कोयल सी है बोली, जैसे गीतों की रंगोली,<br />
सुर्ख गालों पर पसीना, जैसे फागुन का महीना,</p>
<p><i>Singer: Jagjit Singh</i></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दीप जलाओ रात को पूनम कर दो]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/28/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/</link>
<pubDate>Fri, 28 Dec 2007 09:28:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/28/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/</guid>
<description><![CDATA[दीप जलाओ रात को पूनम कर दो
मेहबूब की या]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">दीप जलाओ रात को पूनम कर दो<br />
मेहबूब की यादों से आँखें नम कर दो</font></p>
<p><font color="#000000">तमन्ना को हसरते-विसाल है<br />
ज़हर दे दो मुझे यह करम कर दो</font></p>
<p><font color="#000000">शाम की ख़ाक गिरने लगी है आसमाँ से<br />
मेरे ख़ातिर में सहरे-ग़म कर दो</font></p>
<p><font color="#000000">बर्फ़ की गरमी से आजिज़ आ चुका मैं<br />
बे-तस्कीनियों की धूप गरम कर दो</font></p>
<p><font color="#000000">चाँद के छुपने का बाइस मैं कैसे कहूँ<br />
'वफ़ा' आज बरसात का मौसम कर दो</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गिर जायेगा इस बरसात में घर]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/25/%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%98%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Tue, 25 Dec 2007 13:35:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय प्रजापति</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/25/%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%98%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[गिर जायेगा इस बरसात में घर
तुम हो उधर ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font color="#000000">गिर जायेगा इस बरसात में घर<br />
तुम हो उधर हम हैं इधर</font></p>
<p><font color="#000000">जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा<br />
जिस सिम्त दौड़ती है नज़र</font></p>
<p><font color="#000000">न तुम हो मेहरबाँ न हक़ ही है<br />
होता नहीं किसी पे दुआ का असर</font></p>
<p><font color="#000000">ख़ाली दिल में साँसें बोझ लगती हैं<br />
और मुसकुराये जाता है क़मर</font></p>
<p><font color="#000000">अपनी मरज़ी के हम मालिक़ नहीं<br />
तेरे कहे पे करते हैं सफ़र</font></p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००३</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हैदराबादी बारिश...]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/2006/07/27/%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6/</link>
<pubDate>Thu, 27 Jul 2006 07:02:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/2006/07/27/%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6/</guid>
<description><![CDATA[यों तो छिट्पुट बारिश हैदराबाद में मई क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>यों तो छिट्पुट बारिश हैदराबाद में मई के महीने से हो रही है...पर परसों रात को मौसम की पहली तेज बारिश देखी और कल रात से तो लगातार हो रही है. कल ओफ़िस से वापस घर पहुंचने में काफ़ी परेशानी हुई, भीगने का मन भी था, पर हाथ में लेपटोप था...उसे बचाने के चक्कर में दुबके रहे.</p>
<p>बारिश मेरे पीहर (बोले तो घर) के आसपास भी काफ़ी अच्छी हुई है पिछले एक सप्ताह में...... घर की बारिश में और यहां हैदराबाद की बारिश में भी बहुत फ़र्क है...वो इसलिये, कि यहां तो मई जून की गर्मी हमने महसूस ही नही की, मई में ही कई बार छींटे पड गये थे...</p>
<p> वैसे मेरा जिला, झालावाड, राजस्थान के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गिना जाता है...पर है तो राजस्थान ही...सो मई-जून में तापमान ४८ तक पहुंच जाता है...ऐसी गर्मी में जून अंत आते आते सबकी निगाहें बादलों की ओर होती हैं...बादल का कोई झुन्ड दिखा नही, कि लगा कि अब तो बरसेंगे....इसी इन्तजार के चलते बारिश का मजा भी अलग ही होता है...अब ये क्या तरीका हुआ कि आप जेठ के महीने मे ही बरस गये...फ़िर इन्तजार का मजा कहा हुआ.....और यही मजा हम हैदराबाद मे नही ले पाये...वो विसाल-ए-यार और इन्तजार वाला एक शेर याद आ रहा है...बस वही अपने साथ हुआ, और ना ही मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू यहां आती है, कंक्रीट के जंगल में कहीं मिट्टी होगी तो खुशबू आयेगी ना...</p>
<p>तो जेठ मे गर्मी, और आषाढ मे इन्तजार के बाद सावन आते आते तो बादल बरस ही जाते है...पहले हमारे यहां आठ-आठ दस-दस दिन तक झडी लगती थी, तीन और से नदियों से घिरा है हमारा गांव..सो बिल्कुल टापू बन कर रह जाता...पुलिया पर १५-२० फ़िट पानी.....हम बडे चाव से "नदी देखने" जाते...सडक, बिजली, टेलीफ़ोन, अखबार, डाक..सब बंद :)..अब पिछले ५-७ साल से वैसी बरसात हो नही रही...पता नही क्यों..</p>
<p>तो फ़िलहाल तो जो है उसका ही मजा लिया जाये...."नदी देखने " ना सही, उफ़नती हुई नालिया ही देखी जाएं...पुआ-पकौडी ना सही, इडली-सांभर का भोग लगाया जाए...बरसात में बस स्टोप पे भीगती हुई "पब्लिक" को निहारा जाए..औअर ये पोस्ट समाप्त कर्के...फ़िर से काम पर लग जाया जाए :)</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
