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	<title>बेताल-पच्चीसी &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/बेताल-पच्चीसी/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "बेताल-पच्चीसी"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 10:09:27 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: पच्चीसवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp26/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:20:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[योगी राजा को और मुर्दे को देखकर बहुत प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">योगी राजा को और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। बोला, ‘‘हे राजन्! तुमने </span><span>  </span>यह कठिन काम करके मेरे साथ बड़ा उपकार किया है। तुम सचमुच सारे राजाओं में श्रेष्ठ हो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>इतना कहकर उसने मुर्दे को उसके कंधे से उतार लिया और उसे स्नान कराकर फूलों की मालाओं से सजाकर रख दिया। फिर मंत्र-बल से बेताल का आवाहन करके उसकी पूजा की। पूजा के बाद उसने राजा से कहा, ‘‘हे राजन्! तुम शीश झुकाकर इसे प्रणाम करो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा को बेताल की बात याद आ गयी। उसने कहा, ‘‘मैं राजा हूँ, मैंने कभी किसी को सिर नहीं झुकाया। आप पहले सिर झुकाकर बता दीजिए।’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>योगी ने जैसे ही सिर झुकाया, राजा ने तलवार से उसका सिर काट दिया। बेताल बड़ा खुश हुआ। बोला, ‘‘राजन्, यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था। अब तुम बनोगे। मैंने तुम्हें बहुत हैरान किया है। तुम जो चाहो सो माँग लो।’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, ‘‘अगर आप मुझसे खुश हैं तो मेरी प्रार्थना है कि आपने जो चौबीस कहानियाँ सुनायीं, वे, और पच्चीसवीं यह, सारे संसार में प्रसिद्ध हो जायें और लोग इन्हें आदर से पढ़े।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>बेताल ने कहा, ‘‘ऐसा ही होगा। ये कथाएँ ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से मशहूर होंगी और जो इन्हें पढ़ेंगे, उनके पाप दूर हो जायेंगे।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>यह कहकर बेताल चला गया। उसके जाने के बाद शिवाजी ने प्रकट होकर कहा, ‘‘राजन्, तुमने अच्छा किया, जो इस दुष्ट साधु को मार डाला। अब तुम जल्दी ही सातों द्वीपों और पाताल-सहित सारी पृथ्वी पर राज्य स्थापित करोगे।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद शिवाजी अन्तर्धान हो गये। काम पूरे करके राजा श्मशान से नगर में आ गया। कुछ ही दिनों में वह सारी पृथ्वी का राजा बन गया और बहुत समय तक आनन्द से राज्य करते हुए अन्त में भगवान में समा गया।<span style="font-size:10pt;"><font face="Times New Roman"> </font></span><!-- 		 --></p>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: चौबीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp25/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:19:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था। उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चलकर भीलों की नगरी में पहुँचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयीं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अन्त में वह मारा गया। भील चले गये।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजाव को मरा देखकर बड़ी दु:खी हुईं। वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची। उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का साहूकार अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, ‘‘अगर ये स्त्रियाँ मिल जों तो जायें जिससे चाहा, विवाह कर लेना।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>लड़के ने कहा, ‘‘छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी, उससे मैं विवाह कर लूँगा। आप बड़ी से कर लें।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था, पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दीं। साहूकार ने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे, पुत्री के पैर बड़े। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया, लड़के ने रानी से हुई और इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू। उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्! बताइए, माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड़ा। उसने बहुत सोचा, पर जवाब न सूझ पड़ा। इसलिए वह चुपचाप चलता रहा।<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>                  </span>बेताल यह देखकर बोला, ‘‘राजन्, कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे धीरज और पराक्रम से खुश हूँ। मैं अब इस मुर्दे से निकला जाता हूँ। तुम इसे योगी के पास ले जाओ। जब वह तुम्हें इस मुर्दे को सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले आप करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर बतावे तो तुम उसका सिर काट लेना। उसका बलिदान करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे। सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>इतना कहकर बेताल चला गया और राजा मूर्दे को लेकर योगी के पास आया।<span style="font-size:10pt;font-family:Georgia;"> </span></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसवीं: तेईसवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp24/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[कलिंग देश में शोभावती एक नगर है। उसमें]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कलिंग देश में शोभावती एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था। जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएँ सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े माँ-बाप बड़े दु:खी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर श्मशान में पहुँचे तो रोने-पीटने <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">की आवाज़ सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब ज़ोर से रोया, फिर खूब हँसा, फिर योग-बल से अपना शरीर छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>वह लड़का वही तपस्या करने लगा।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हँसा?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>राजा ने कहा, ‘‘इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके माँ-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हँसा इसलिए कि वह नये शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकेगा।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर उसे लाया तो रास्ते में बेताल ने कहा, ‘‘हे राजन्, मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि बिना जरा-सा भी हैरान हुए तुम मेरे सवालों का जवाब देते रहे हो और बार-बार आने-जाने की परेशानी उठाते रहे हो। आज मैं तुमसे एक बहुत भारी सवाल करूँगा। सोचकर उत्तर देना।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span>इसके बाद बेताल ने यह कहानी सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                  </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                                                </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: बाईसवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp23/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:16:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[ कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता था। उसके नगर में एक ब्राह्मण था, जिसके चार बेटे थे। लड़कों के सयाने होने पर ब्राह्मण मर गया और ब्राह्मणी उसके साथ सती हो गयी। उनके रिश्तेदारों ने उनका धन छीन लिया। वे चारों भाई नाना के यहाँ चले गये। लेकिन कुछ दिन बाद वहाँ भी उनके साथ बुरा व्यवहार होने लगा। तब सबने मिलकर सोचा कि कोई विद्या सीखनी चाहिए। यह सोच करके चारों चार दिशाओं में चल दिये।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>कुछ समय बाद वे विद्या सीखकर मिले। एक ने कहा, ‘‘मैंने ऐसी विद्या सीखी है कि मैं मरे हुए प्राणी की हड्डियों पर मांस चढ़ा सकता हूँ।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘मैं उसके खाल और बाल पैदा कर सकता हूँ।’’ तीसरे ने कहा, ‘‘मैं उसके सारे अंग बना सकता हूँ।’’ चौथा बोला, ‘‘मैं उसमें जान डाल सकता हूँ।’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>फिर वे अपनी विद्या की परीक्षा लेने जंगल में गये। वहाँ उन्हें एक मरे शेर की हड्डियाँ मिलीं। उन्होंने उसे बिना पहचाने ही उठा लिया। एक ने माँस डाला, दूसरे ने खाल और बाल पैदा किये, तीसरे ने सारे अंग बनाये और चौथे ने उसमें प्राण डाल दिये। शेर जीवित हो उठा और सबको खा गया।</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>यह कथा सुनाकर बेताल बोला, ‘‘हे राजा, बताओ कि उन चारों में शेर बनाने का अपराध किसने किया?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, ‘‘जिसने प्राण डाले उसने, क्योंकि बाकी तीन को यह पता ही नहीं था कि वे शेर बना रहे हैं। इसलिए उनका कोई दोष नहीं है।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर फिर उसे लाया। रास्ते में बेताल ने एक नयी कहानी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: इक्कीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp22/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:15:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[विशाला नाम की नगरी में पदमनाभ नाम का र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विशाला नाम की नगरी में पदमनाभ नाम का राजा राज करता था। उसी नगर में अर्थदत्त नाम का एक साहूकार रहता था। अर्थदत्त के अनंगमंजरी नाम की एक सुन्दर कन्या थी। उसका विवाह साहूकार ने एक धनी साहूकार के पुत्र मणिवर्मा के साथ कर दिया। मणिवर्मा पत्नी को बहुत चाहता था, पर पत्नी उसे प्यार नहीं करती थी। एक बार मणिवर्मा कहीं गया। पीछे अनंगमंजरी की राजपुरोहित के लड़के कमलाकर पर निगाह पड़ी तो वह उसे चाहने लगी। पुरोहित का लड़का भी लड़की को चाहने लगा। अनंगमंजरी ने महल के बाग़ मे जाकर चंडीदेवी को प्रणाम कर कहा, ‘‘यदि मुझे इस जन्म में कमलाकर पति के रूप में न मिले तो अगले जन्म में मिले।’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>यह कहकर वह अशोक के पेड़ से दुपट्टे की फाँसी बनाकर मरने को तैयार हो गयी। तभी उसकी सखी आ गयी और उसे यह वचन देकर ले गयी कि कमलाकर से मिला देगी। दासी सबेरे कमलाकर के यहाँ गयी और दोनों के बगीचे में मिलने का प्रबन्ध कर आयी। कमलाकर आया और उसने अनंगमंजरी को देखा। वह बेताब होकर मिलने के लिए दौड़ा। मारे खुशी के अनंगमंजरी के हृदय की गति रुक गयी और वह मर गयी। उसे मरा देखकर कमलाकर का भी दिल फट गया और वह भी मर गया। उसी समय मणिवर्मा आ गया और अपनी स्त्री को पराये आदमी के साथ मरा देखकर बड़ा दु:खी हुआ। वह स्त्री को इतना चाहता था कि उसका वियोग न सहने से उसके भी प्राण निकल गये। चारों ओर हाहाकार मच गया। चंडीदेवी प्रकट हुई और उसने सबको जीवित कर दिया।</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्, यह बताओ कि इन तीनों में सबसे ज्यादा राग में अंधा कौन था?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, ‘‘मेरे विचार में मणिवर्मा था, क्योकि वह अपनी पत्नी को पराये आदमी को प्यार करते देखकर भी शोक से मर गया। अनंगमंजरी और कमलाकर तो अचानक मिलने की खुशी से मरे। उसमें अचरज की कोई बात नहीं थी।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा का यह जवाब सुनकरव बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वापस जाकर उसे लाना पड़ा। रास्ते में बेताल ने फिर एक कहानी कही।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: बीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp21/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:13:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमते वह रास्ता भूल गया और अकेला रह गया। थक कर वह एक पेड़ की छाया में लेटा कि उसे एक ऋषि-कन्या दिखाई दी। उसे देखकर राजा उस पर मोहित हो गया। थोड़ी देर में ऋषि स्वयं आ गये। ऋषि ने पूछा, ‘‘तुम यहाँ कैसे आये हो?’’ राजा ने कहा, ‘‘मैं शिकार खेलने आया हूँ। ऋषि बोले, ‘‘बेटा, तुम क्यों जीवों को मारकर पाप कमाते हो?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने वादा किया कि मैं अब कभी शिकार नहीं खेलूँगा। खुश होकर ऋषि ने कहा, ‘‘तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने ऋषि-कन्या माँगी और ऋषि ने खुश होकर दोनों का विवाह कर दिया। राजा जब उसे लेकर चला तो रास्ते में एक भयंकर राक्षस मिला। बोला, ‘‘मैं तुम्हारी रानी को खाऊँगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाय तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा सक अपने को दे और उसके माता-पिता उसे मारते समय उसके हाथ-पैर पकड़ें।’’ डर के मारे राजा ने उसकी बात मान ली। वह अपने नगर को लौटा और अपने दीवान को सब हाल कह सुनाया। दीवान ने कहा, ‘‘आप परेशान न हों, मैं उपाय करता हूँ।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद दीवान ने सात बरस के बालक की सोने की<span>  </span>मूर्ति बनवायी और उसे कीमती गहने पहनाकर नगर-नगर और गाँव-गाँव घुमवाया। यह कहलवा दिया कि जो कोई सात बरस का ब्राह्मण का बालक अपने को बलिदान के लिए देगा और बलिदान के समय उसके माँ-बाप उसके हाथ-पैर पकड़ेंगे, उसी को यह मूर्ति और सौ गाँव मिलेंगे।<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>यह ख़बर सुनकर एक ब्राह्मण-बालक राजी हो गया, उसने माँ-बाप से कहा, ‘‘आपको बहुत-से पुत्र मिल जायेंगे। मेरे शरीर से राजा की भलाई होगी और आपकी गरीबी मिट जायेगी।’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>माँ-बाप ने मना किया, पर बालक ने हठ करके उन्हें राजी कर लिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>माँ-बाप बालक को लेकर राजा के पास गये। राजा उन्हें लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के सामने माँ-बाप ने बालक के हाथ-पैर पकड़े और राजा उसे तलवार से मारने को हुआ। उसी समय बालक बड़े ज़ोर से हँस पड़ा।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘हे राजन्, यह बताओ कि वह बालक क्यों हँसा?’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>राजा ने फौरन उत्तर दिया, ‘‘इसलिए कि डर के समय हर आदमी रक्षा के लिए अपने माँ-बाप को पुकारता है। माता-पिता न हों तो पीड़ितों की मदद राजा करता है। राजा न कर सके तो आदमी देवता को याद करता है। पर यहाँ तो कोई भी बालक के साथ न था। माँ-बाप हाथ पकड़े हुए थे, राजा तलवार लिये खड़ा था और राक्षस भक्षक हो रहा था। ब्राह्मण का लड़का परोपकार के लिए अपना शरीर दे रहा था। इसी हर्ष से और अचरज से वह हँसा।’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनकर बेताल अन्तर्धान हो गया और राजा लौटकर फिर उसे ले आया। रास्ते में बेताल ने फिर कहानी शुरू कर दी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: उन्नीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp20/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:12:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[वक्रोलक नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वक्रोलक नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का राजा राज करता था। उसके कोई सन्तान न थी। उसी समय में एक दूसरी नगरी में धनपाल नाम का एक साहूकार रहता था। उसकी स्त्री का नाम हिरण्यवती था और उसके धनवती नाम की एक पुत्री थी। जब धनवती बड़ी हुई तो धनपाल मर गया और उसके नाते-रिश्तेदारों ने उसका धन ले लिया। हिरण्यवती अपनी लड़की को लेकर रात के समय नगर छोड़कर चल दी। रास्ते में उसे एक चोर सूली पर लटकता हुआ मिला। वह मरा नहीं था। उसने हिरण्यवती को देखकर अपना परिचय दिया और कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक हज़ार अशर्फियाँ दूँगा। तुम अपनी लड़की का ब्याह मेरे साथ कर दो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>हिरण्यवती ने कहा, ‘‘तुम तो मरने वाले हो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>चोर बोला, ‘‘मेरे कोई पुत्र नहीं है और निपूते की परलोक में सदगति नहीं होती। अगर मेरी आज्ञा से और किसी से भी इसके पुत्र पैदा हो जायेगा तो मुझे सदगति मिल जायेगी।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>हिरण्यवती ने लोभ के वश होकर उसकी बात मान ली और धनवती का ब्याह उसके साथ कर दिया। चोर बोला, ‘‘इस बड़ के पेड़ के नीचे अशर्फियाँ गड़ी हैं, सो ले लेना और मेरे प्राण निकलने पर मेरा क्रिया-कर्म करके तुम अपनी बेटी के साथ अपने नगर में चली जाना।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर चोर मर गया। हिरण्यवती ने ज़मीन खोदकर अशर्फियाँ निकालीं, चोर का क्रिया-कर्म किया और अपने नगर में लौट आयी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>उसी नगर में वसुदत्त नाम का एक गुरु था, जिसके मनस्वामी नाम का शिष्य था। वह शिष्य एक वेश्या से प्रेम करता था। वेश्या उससे पाँच सौ अशर्फियाँ माँगती थी। वह कहाँ से लाकर देता! संयोग से धनवती ने मनस्वामी को देखा और वह उसे चाहने लगी। उसने अपनी दासी को उसके पास भेजा। मनस्वामी ने कहा कि मुझे पाँच सौ अशर्फियाँ मिल जायें <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">तो मैं एक रात धनवती के साथ रह सकता हूँ।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>हिरण्यवती राजी हो गयी। उसने मनस्वामी को पाँच सौ अशर्फियाँ दे दीं। बाद में धनवती के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसी रात शिवाजी ने सपने में उन्हें दर्शन देकर कहा, ‘‘तुम इस बालक को हजार अशर्फियों के साथ राजा के महल के दरवाज़े पर रख आओ।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>माँ-बेटी ने ऐसा ही किया। उधर शिवाजी ने राजा को सपने में दर्शन देकर कहा, ‘‘तुम्हारे द्वार पर किसी ने धन के साथ लड़का रख दिया है, उसे ग्रहण करो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने अपने नौकरों को भेजकर बालक और अशर्फियों को मँगा लिया। बालक का नाम उसने चन्द्रप्रभ रखा। जब वह लड़का बड़ा हुआ तो उसे गद्दी सौंपकर राजा काशी चला गया और कुछ दिन बाद मर गया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>पिता के ऋण से उऋण होने के लिए चन्द्रप्रभ तीर्थ करने निकला। जब वह घूमते हुए गयाकूप पहुँचा और पिण्डदान किया तो उसमें से तीन हाथ एक साथ निकले। चन्द्रप्रभ ने चकित होकर ब्राह्मणों से पूछा कि किसको पिण्ड दूँ? उन्होंने कहा, ‘‘लोहे की कीलवालाव चोर का हाथ है, पवित्रीवाला ब्राह्मण का है और अंगूठीवाला राजा का। आप तय करो कि किसको देना है?’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्, तुम बताओ कि उसे किसको पिण्ड देना चाहिए?’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, ‘‘चोर को; क्योंकि उसी का वह पुत्र था। मनस्वामी उसका पिता इसलिए नहीं हो सकता कि वह तो एक रात के लिए पैसे से ख़रीदा हुआ था। राजा भी उसका पिता नहीं हो सकता, क्योंकि उसे बालक को पालने के लिए धन मिल गया था। इसलिए चोर ही पिण्ड का अधिकारी है।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहाँ जाकर उसे लाना पड़ा। रास्ते में फिर उसने एक कहानी सूनायी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: अठारहवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp19/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:11:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[उज्जैन नगरी में महासेन नाम का राजा राज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उज्जैन नगरी में महासेन नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में वासुदेव शर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके गुणाकर नाम का बेटा था। गुणाकर बड़ा जुआरी था। वह अपने पिता का सारा धन जुए में हार गया। ब्राह्मण ने उसे घर से निकाल दिया। वह दूसरे नगर में पहुँचा। वहाँ उसे एक योगी मिला। उसे हैरान देखकर उसने कारण पूछा तो उसने सब बता दिया। योगी ने कहा, ‘‘लो, पहले कुछ खा लो।’’ गुणाकर ने जवाब दिया, ‘‘मैं ब्राह्मण का बेटा हूँ। आपकी भिक्षा कैसे खा सकता हूँ?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>    </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">इतना सुनकर योगी ने सिद्धि को याद किया। वह आयी। योगी ने उससे आवभगत करने को कहा। सिद्धि ने एक सोने का महल बनवाया और गुणाकार उसमें रात को अच्छी तरह से रहा। सबेरे उठते ही उसने देखा कि महल आदि कुछ भी नहीं है। उसने योगी से कहा, ‘‘महाराज, उस स्त्री के बिना अब मैं नहीं रह सकता।’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>योगी ने कहा, ‘‘वह तुम्हें एक विद्या प्राप्त करने से मिलेगी और वह विद्या जल के अन्दर खड़े होकर मत्रं जपने से मिलेगी। लेकिन जब वह लड़की तुम्हें मेर सिद्धि से मिल सकती है तो तुम विद्या प्राप्त करके क्या करोगे?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>गुणाकर ने कहा, ‘‘नहीं, मैं स्वयं वैसा करूँगा।’’ योगी बोला, ‘‘कहीं ऐसा न हो कि तुम विद्या प्राप्त न कर पाओ और मेरी सिद्धि भी नष्ट हो जाय!’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>पर गुणाकर न माना। योगी ने उसे नदी के किनारे ले जाकर मंत्र बता दिये और कहा कि जब तु जप करते हुए माया से मोहित होगे तो मैं तुम पर अपनी विद्या का प्रयोग करूँगा। उस समय तुम अग्नि में प्रवेश कर जाना।’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>गुणाकर जप करने लगा। जब वह माया से एकदम मोहित हो गया तो देखता क्या है कि वह किसी ब्राह्मण के बेटे के रूप में पैदा हुआ है। उसका ब्याह हो गया, उसके बाल-बच्चे भी हो गये। वह अपने जन्म की बात भूल गया। तभी योगी ने अपनी विद्या का प्रयोग किया। गुणाकर मायारहित होकर अग्नि में प्रवेश करने को तैयार हुआ। उसी समय उसने देखा कि उसे मरताव देख उसके माँ-बाप और दूसरे लोग रो रहे हैं और उसे आग में जाने से रोक रहे हैं। गुणाकार ने सोचा कि मेरे मरने पर ये सब भी मर जायेंगे और पता नहीं कि योगी की बात सच हो या न हो।</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इस तरह सोचता हुआ वह आग में घुसा तो आग ठंडी हो गयी और माया भी शान्त हो गयी। गुणाकर चकित होकर योगी के पास आया और उसे सारा हाल बता दिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>योगी ने कहा, ‘‘मालूम होता है कि तुम्हारे करने में कोई कसर रह गयी।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>योगी ने स्वयं सिद्धि की याद की, पर वह नहीं आयी। इस तरह योगी और गुणाकर दोनों की विद्या नष्ट हो गयी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतनी कथा कहकर बेताल ने पूछा, ‘‘राजन्, यह बताओ कि दोनों की विद्या क्यों नष्ट हो गयी?’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Times New Roman"> </font></span><span style="font-size:10pt;"></span><span><font face="Times New Roman">                </font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">राजा बोला, ‘‘इसका जवाब साफ़ है। निर्मल और शुद्ध संकल्प करने से ही सिद्धि प्राप्त होती है। गुणाकर के दिल में शंका हुई कि पता नहीं, योगी की बात सच होगी या नहीं। योगी की विद्या इसलिए नष्ट हुई कि उसने अपात्र को विद्या दी।’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा का उत्तर सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा वहाँ गया और उसे लेकर चला तो उसने यह कहानी सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span> </span></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: सत्रहवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp18/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:10:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[चन्द्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चन्द्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्मादिनी। जब वह बड़ी हुई तो रत्नदत्त ने राजा के पास जाकर कहा कि आप चाहें तो उसे ब्याह कर लीजिए। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देख आने को कहा। उन्होंने उन्मादिनी को देखा तो उसके रुप पर मुग्ध हो गयीं, लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि राजा उसके वश में हो जायेगा, आकर कह दिया कि वह तो कुलक्षिणी है राजा ने सेठ से इन्कार कर दिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद सेठ ने राजा के सेनापति बलभद्र से उसका विवाह कर दिया। वे दोनों अच्छी तरह से रहने लगे।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। उस समय उन्मादिनी अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की उस पर निगाह पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया। मालूम हुआ कि वह सेठ की लड़की है। राजा ने सोचा कि हो-न-हो, जिन दासियों को मैंने <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">देखने भेजा था, उन्होंने छल किया है। राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच-सच कह दी। इतने में सेनापति वहाँ आ गया। उसे राजा की बैचेनी मालूम हुई। उसने कहा, ‘‘स्वामी उन्मादिनी को आप ले लीजिए।’’ राजा ने गुस्सा होकर कहा, ‘‘क्या मैं अधर्मी हूँ, जो पराई स्त्री को ले लूँ?’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा को इतनी व्याकुलता हुई कि वह कुछ दिन में मर गया। सेनापति ने अपने गुरु को सब हाल सुनाकर पूछा कि अब मैं क्या करूँ? गुरु ने कहा, ‘‘सेवक का धर्म है कि स्वामी के लिए जान दे दे।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा की चिता तैयार हुई। सेनापति वहाँ गया और उसमें कूद पड़ा। जब उन्मादिनी को यह बात मालूम हुई तो वह पति के साथ जल जाना धर्म समझकर चिता के पास पहुँची और उसमें जाकर भस्म हो गयी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल ने पूछा, ‘‘राजन्, बताओ, सेनापति और राजा में कौन अधिक साहसी था?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, ‘‘राजा अधिक साहसी था; क्योंकि उसने राजधर्म पर दृढ़ रहने के लिए उन्मादिनी को उसके पति के कहने पर भी स्वीकार नहीं किया और अपने प्राणों को त्याग दिया। सेनापति कुलीन सेवक था। अपने स्वामी की भलाई में उसका प्राण देना अचरज की बात नहीं। असली काम तो राजा ने<span style="font-size:10pt;"><font face="Times New Roman"> </font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">किया कि प्राण छोड़कर भी राजधर्म नहीं छोड़ा।’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा का यह उत्तर सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे पुन: पकड़कर लाया और तब उसने यह कहानी सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>    </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: सोलहवीं कहानी]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp17/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:08:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, जिसमें जीमूतकेतु नामक राजा राज करता था। उसके एक लड़का था, जिसका नाम जीमूतवाहन था। बाप-बेटे दोनों भले थे। धर्म-कर्म मे लगे रहते थे। इससे प्रजा के लोग बहुत स्वच्छन्द हो गये और एक दिन उन्होंने राजा के महल को घेर लिया। राजकुमार ने यह देखा तो पिता से कहा कि आप चिन्ता न करें। मैं सबको मार भगाऊँगा। राजा बोला, ‘‘नहीं, ऐसा मत करो। युधिष्ठिर भी महाभारत करके पछताये थे।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद राजा अपने गोत्र के लोगों को राज्य सौंप राजकुमार के साथ मलयाचल पर जाकर मढ़ी बनाकर रहने लगा। वहाँ जीमूतवाहन की एक ऋषि के बेटे से दोस्ती हो गयी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">एक दिन दोनों पर्वत पर भवानी के मन्दिर में गये तो दैवयोग से उन्हें मलयकेतु राजा की पुत्री मिली। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गये। जब कन्या के पिता को मालूम हुआ तो उसने अपनी बेटी उसे ब्याह दी।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">एक रोज़ की बात है कि जीमूतवाहन को पहाड़ पर एक सफ़ेद ढेर दिखाई दिया। पूछा तो मालूम हुआ कि पाताल से बहुत-से नाग आते हैं, जिन्हें गरुड़ खा लेता है। यह ढेर उन्हीं की हड्डियों का है। उसे देखकर जीमूतवाहन आगे बढ़ गया। कुछ दूर जाने पर उसे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। पास गया तो देखा कि एक बुढ़िया रो रही है। कारण पूछा तो उसने बताया कि आज उसके बेटे शंखचूड़ नाग की बारी है। उसे गरुड़ आकर खा जायेगा। जीमूतवाहन ने कहा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">माँ, तुम चिन्ता न करो, मैं उसकी जगह चला जाऊँगा।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> बुढ़िया ने बहुत समझाया, पर वह न माना।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद गरुड़ आया और उसे चोंच में पकड़कर उड़ा ले गया। संयोग से राजकुमार का बाजूबंद गिर पड़ा, जिस पर राजा का नाम खुदा था। उस पर खून लगा था। राजकुमार ने उसे देखा। वह मूर्च्छित हो गयी। होश आने पर उसने राजा और रानी को सब हाल सुनाया। वे बड़े दु:खी हुए और जीमूतवाहन <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">जीमूतवाहन</span><span>   </span><strong>ने</strong><span>  </span><strong>देखा, एक बुढ़िया</strong><span>  </span><strong>रो</strong><span>  </span><strong>रही</strong><span>  </span><strong>है।</strong><span>को खोजने निकले। तभी उन्हें शंखचूड़ मिला। उसने गरुड़ को पुकार कर कहा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">हे गरुड़! तू इसे छोड़ दे। बारी तो मेरी थी।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">गरुड़ ने राजकुमार से पूछा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">हे गरुड़! तू इसे छोड़ दे। बारी तो मेरी थी।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> गरुड़ ने राजकुमार से पूछा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">तू अपनी जान क्यों दे रहा है?</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> उसने कहा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">उत्तम पुरुष को हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>यह सुनकर गरुड़ बहुत खुश हुआ उसने राजकुमार से वर माँगने को कहा। जीमूतवाहन <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">ने अनुरोध किया कि सब साँपों को जिला दो। गरुड़ ने ऐसा ही किया। फिर उसने कहा, ‘‘तुझे अपना राज्य भी मिल जायेगा।’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद वे लोग अपने नगर को लौट आये। लोगों ने राजा को फिर गद्दी पर बिठा दिया।<span>     </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘हे राजन् यह बताओ, इसमें सबसे बड़ा काम किसने किया?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा ‘‘शंखचूड़ ने?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>बेताल ने पूछा, ‘‘कैसे?’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>राजा बोला, ‘‘जीमूतवाहन जाति का क्षत्री था। प्राण देने का उसे अभ्यास था। लेकिन बड़ा काम तो शंखचूड़ ने किया, जो अभ्यास न होते हुए भी जीमूतवाहन को बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो गया।’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे लाया तो उसने फिर एक कहानी सुनायी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: पंद्रहवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp16/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:03:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर मे यशके]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर मे यशकेतु नामक राजा राज करता था। उसके चन्द्रप्रभा नाम की रानी और शशिप्रभा नाम की लड़की थी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>जब राजकुमारी बड़ी हुई तो एक दिन वसन्त उत्सव देखने बाग़ में गयी। वहाँ एक ब्राह्मण का लड़का आया हुआ था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और प्रेम करने लगे। इसी बीच एक पागल हाथी वहाँ दौड़ता हुआ आया। ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी को उठाकर <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">दूर ले गया और हाथी से बचा दिया। शशिप्रभा महल में चली गयी; पर ब्राह्मण के लड़के के लिए व्याकुल रहने लगी।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>उधर ब्राह्मण के लड़के की भी बुरी दशा थी। वह एक सिद्धगुरू के पास पहुँचा और अपनी इच्छा बतायी। उसने एक योग-गुटिका अपने मुहँ में रखकर ब्राह्मण का रूप बना लिया और एक गुटिका ब्राह्मण के लड़के के मुहँ में रखकर उसे सुन्दर लड़की बना दिया। राजा के पास जाकर कहा, ‘‘मेरा एक ही बेटा है। उसके लिए मैं इस लड़की को लाया था; पर लड़का न जाने कहाँ चला गया। आप इसे यहाँ रख ले। मैं लड़के को ढूँढ़ने जाता हूँ। मिल जाने पर इसे ले जाऊँगा।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span> </span><span>           </span>सिद्धगुरु चला गया और लड़की के भेस में ब्राह्मण का लड़का राजकुमार के पास रहने लगा। धीरे-धीरे दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। एक दिन राजकुमारी ने कहा, ‘‘मेरा दिल बड़ा दुखी रहता है। एक ब्राह्मण के लड़के ने पागल हाथी से मरे प्राण बचाये थे। मेरा मन उसी े रमा है।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनकर उसने गुटिका मुहँ से निकाल ली और ब्राह्मण-कुमार बन गया। राजकुमार उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुई। तबसे वह रात को रोज़ गुटिका निकालकर लड़का बन जाता, दिन में लड़की बना रहता। दोनों ने चुपचाप विवाह कर लिया।<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>कुछ दिन बाद राजा के साले की कन्या मृगांकदत्ता का विवाह दीवान के बेटे के साथ होना तय हुआ। राजकुमारी अपने कन्या-रूपधार ब्राह्मणकुमार के साथ वहाँ गयी। संयोग से दीवान का पुत्र उस बनावटी कन्या पर रीझ गया। विवाह होने पर वह मृगांकदत्ता को घर तो ले गया; लेकिन उसका हृदय उस कन्या के लिए व्याकुल रहने लगा उसकी यह दशा देखकर दीवान बहुत हैरान हुआ। उसने राजा को समाचार भेजा। राजा आया। उसके सामने सवाल थ कि धरोहर के रूप में रखी हुई कन्या को वह कैसे दे दे? दूसरी ओर यह मुश्किल कि न दे तो दीवान का लड़का मर जाय।</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>बहुत सोच-विचार के बाद राजा ने दोनों का विवाह कर दिया। बनावटी कन्या ने यह शर्त रखी कि चूँकि वह दूसरे के लिए लायी गयी थी, इसलिए उसका यह पति छ: महीने तक यात्रा करेगा, तब वह उससे बात करेगी। दीवान के लड़के ने यह शर्त मान ली।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>विवाह के बाद वह उसे मृगांकदत्ता के पास छोड़ तीर्थ-यात्रा चला गया। उसके जाने पर दोनों आनन्द से रहने लगे। ब्राह्मणकुमार रात में आदमी बन जाता और दिन में कन्या बना रहता।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>जब छ: महीने बीतने को आये तो वह एक दिन मृगांकदत्ता को लेकर भाग आया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>उधर सिद्धगुरु एक दिन अपने मित्र शशि को युवा पुत्र बनाकर राजा के पास लाया और उस कन्या को माँगा। शाप के डर के मारे राजा ने कहा, ‘‘वह कन्या तो जाने कहाँ चली गयी। आप मेरी कन्या से इसका विवाह कर दें।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>वह राजी हो गया और राजकुमारी का विवाह शशि के साथ कर दिया। घर आने पर ब्राह्मणकुमार ने कहा, ‘‘यह राजकुमारी मेरी स्त्री है। मैंने इससे गंधर्व-रीति से विवाह किया है।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>शशि ने कहा, ‘‘यह मेरी स्त्री है, क्योंकि मैंने सबके सामने विधि-पूर्वक ब्याह किया है।’’<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>            </span>बेताल ने कहा, ‘‘मेरी राय में वह शशि की पत्नी है, क्योंकि राजा ने सबके सामने विधिपूर्वक विवाह किया था। ब्राह्मणकुमार ने तो चोरी से ब्याह किया था। चोरी की चीज़ पर चोर का अधिकार नहीं होता।’’</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनना था कि बेताल गायब हो गया और राजा को जाकर फिर उसे लाना पड़ा। रास्ते में बेताल ने फिर एक कहानी सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                        </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                                                          </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: चौदहवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp14-2/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:02:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक साहूकार था, जिसके रत्नवती नाम की एक लड़की थी। वह सुन्दर थी। वह पुरुष के भेस में रहा करती थी और किसी से भी ब्याह नहीं करना चाहती थी। उसका पिता बड़ा दु:खी था।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>इसी बीच नगर में खूब चोरियाँ होने लगी। प्रजा दु:खी हो गयी। कोशिश करने पर भी जब चोर पकड़ में न आया तो राजा स्वयं उसे पकड़ने के लिए निकला। एक दिन रात को जब राजा भेष बदलक घूम रहा था तो उसे परकोटे के पास एक आदमी दिखाई दिया। राजा चुपचाप उसके पीछे चल दिया। चोर ने कहा, ‘‘तब तो तुम मेरे साथी हो। आओ, मेरे घर चलो।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>दोनो घर पहुँचे। उसे बिठलाकर चोर किसी काम के लिए चला गया। इसी बीच उसकी दासी आयी और बोली, ‘‘तुम यहाँ क्यों आये हो? चोर तुम्हें मार डालेगा। भाग जाओ।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने फौज लेकर चोर का घर घेर लिया। जब चोर ने ये देखा तो वह लड़ने के लिए तैयार हो गया। दोनों में खूब लड़ाई हुई। अन्त में चोर हार गया। राजा उसे पकड़कर राजधानी में लाया और से सूली पर लटकाने का हुक्म दे दिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>संयोग से रत्नवती ने उसे देखा तो वह उस पर मोहित हो गयी। पिता से बोली, ‘‘मैं इसके साथ ब्याह करूँगी, नहीं तो मर जाऊँगी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>पर राजा ने उसकी बात न मानी और चोर सूली पर लटका दिया। सूली पर लटकने से पहले चोर पहले तो बहुत रोया, फिर खूब हँसा। रत्नवती वहाँ पहुँच गयी और चोर के सिर को लेकर सती होने को चिता में बैठ गयी। उसी समय देवी ने आकाशवाणी की, ‘‘मैं तेरी पतिभक्ति से प्रसन्न हूँ। जो चाहे सो माँग।’’<span style="font-size:10pt;"></span><span><font face="Times New Roman">        </font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">रत्नवती ने कहा, ‘‘मेरे पिता के कोई पुत्र नहीं है। सो वर दीजिए, कि उनसे सौ पुत्र हों।’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>    </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>    </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>   </span><span>                                                                                       </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>देवी प्रकट होकर बोलीं, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">यही होगा। और कुछ माँगो।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>वह बोली, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मेरे पति जीवित हो जायें।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>देवी ने उसे जीवित कर दिया। दोनों का विवाह हो गया। राजा को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने चोर को अपना सेनापति बना लिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span><strong>देवी प्रकट हुई</strong><strong><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span></strong><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने पूछा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">हे राजन्, यह बताओ कि सूली पर लटकने से पहले चोर क्यों तो ज़ोर-ज़ोर से रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">गया?</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">रोया तो इसलिए कि वह राजा रत्नदत्त का कुछ भी भला न कर सकेगा। हँसा इसलिए कि रत्नवती बड़े-बड़े राजाओं और धनिकों को छोड़कर उस पर मुग्ध होकर मरने को तैयार हो गयी। स्त्री के मन की गति को कोई नहीं समझ सकता।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनकर बेताल गायब हो गया और पेड़ पर जा लटका। राजा फिर वहाँ गया और उसे लेकर चला तो रास्ते में उसने यह कथा कही।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: तेरहवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp14/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 07:00:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके हरिदास नाम का पुत्र था। हरिदास की बड़ी सुन्दर पत्नी थी। नाम था लावण्यवती। एक दिन वे महल के ऊपर छत पर सो रहे थे कि आध रात के समय एक गंधर्व-कुमार आकाश में घूमता हुआ उधर से निकला। वह लावण्यवती के रूप पर मुग्ध होकर उसे उड़ाकर ले गया। जागने पर हरिदास ने देखा कि उसकी स्त्री नही है तो उसे बड़ा दुख हुआ और वह मरने के लिए तैयार हो गया। लोगों के समझाने पर वह मान तो गया; लेकिन यह सोचकर कि तीरथ करने से शायद पाप दूर हो जाय और स्त्री मिल जाय, वह घर से निकल पड़ा।<span style="font-size:10pt;"><font face="Arial Unicode MS"><span>      </span>चलते-चलते वह किसी गाँव में एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। उसे भूखा देख ब्राह्मणी ने उसे कटोरा भरकर खीर दे दी और तालाब के किनारे बैठकर खाने को कहा। हरिदास खीर लेकर एक पेड़ के नीचे आया और कटोरा वहाँ रखकर तालाब मे हाथ-मुहँ धोने गया। इसी बीच एक बाज किसी साँप को लेकर उसी पेड़ पर आ बैठा ओर जब वह उसे खाने लगा तो साँप के मुहँ से ज़हर टपककर कटोरे में गिर गया। हरिदास को कुछ पता न था। वह खीर को खा गया। ज़हर का असर होने पर वह तड़पने लगा और दौड़ा-दौड़ा ब्राह्मणी के पास आकर बोला, ‘‘तूने मुझे जहर दे दिया है।’’ इतना कहने के बाद हरिदास मर गया।</font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>पति ने यह देखा तो ब्राह्मणी को ब्रह्मघातिनी कहकर घर से निकाल दिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्! बताओ कि साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन है?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>राजा ने कहा, ‘‘कोई नहीं। साँप तो इसलिए नहीं कि शत्रु के वश में था। बाज इसलिए नहीं कि वह भूखा था। जो उसे मिल गया, उसी को वह खाने लगा। ब्राह्मणी इसलिए नहीं कि उसने अपना धर्म समझकर उसे खीर दी थी और अच्छी दी थी। जो इन तीनों में से किसी को दोषी कहेगा, वह स्वयं दोषी होगा।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहाँ जाकर उसे लाना <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">पड़ा। बेताल ने चलते-चलते चौदहवीं कहानी सनायी।</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: बारहवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp13/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 06:59:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[किसी ज़माने में अंगदेश मे यशकेतु नाम क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>किसी ज़माने में अंगदेश मे यशकेतु नाम का राजा था। उसके दीर्घदर्शी नाम का बड़ा ही चतुर दीवान था। राजा बड़ा विलासी था। राज्य का सारा बोझ दीवान पर डालकर वह भोग में पड़ गया। दीवान को बहुत दु:ख हुआ। उसने देखा कि राजा के साथ सब जगह उसकी निन्दा होती है। इसलिए वह तीरथ का बहाना करके चल पड़ा। चलते-चलते रास्ते में उसे एक शिव-मन्दिर मिला। उसी सम निछिदत्त नाम का एक सौदागर वहाँ आया और दीवान के पूछने पर उसने बताया कि वह सुवर्णद्वीप में व्यापार करने जा रहा है। दीवान भी उसके साथ हो लिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>दोनों जहाज़ पर चढ़कर सुवर्णद्वीप पहुँचे और वहाँ व्यापार करके धन कमाकर लौटे। रास्ते में समुद्र में एक दीवान को एक कृल्पवृक्ष दिखाई दिया। उसकी मोटी-मोटी शाखाओं पर रत्नों से जुड़ा एक पलंग बिछा था। उस पर एक रूपवती कन्या बैठी वीण बजा रही थी। थोड़ी देर बाद वह ग़ायब हो गयी। पेड़ भी नहीं रहा। दीवान बड़ा चकित हुआ।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span><span> </span>दीवान ने अपने नगर में लौटकर सारा हाल कह सुनाया। सुनकर राजा उस सुन्दरी को पाने के लिए बैचेन हो उठा और राज्य का सारा काम दीवान पर सौंपकर तपस्वी का भे बनाकर वहीं पहुँचा। पहुँचने पर उसे वही कल्पवृक्ष और वीणा बजाती कन्या दिखाई दी। उसने राजा से पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’ राजा ने अपना परिचय दे दिया। कन्या बोली, ‘‘मैं राजा मृगांकसेन की कन्या हूँ। मृगांकवती मेरा नाम है। मेरे पिता मुझे छोड़कर न जाने कहाँ चले गये।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>राजा ने उसके साथ विवाह कर लिया। कन्या ने यह शर्त रखी कि वह हर महीने के शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की चतुर्दशी और अष्टमी को कहां जाया करेगी और राजा उसे <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">रोकेगा नहीं। राजा ने यह शर्त मान ली।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी आयी तो राजा से पूछकर मृगांकवती वहाँ से चली। राजा भी चुपचाप पीछे-पीछे चल दियां अचानक राजा ने देखा कि एक राक्षस निकला और उसने मृगांकवती को निगल लिया। राजा को बड़ा गुस्सा आया और उसने राक्षस का सिर काट डाला। मृगांकवती उसके पेट से जीवित निकल आयी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने उससे पूछा कि यह क्या माजरा है तो उसने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span>महाराज, मेरे पिता मेरे बिना भोजन नहीं करते थे। मैं अष्टमी और चतुदर्शी के दिन शिव पूजा यहाँ करने आती थी। एक दिन पूजा में मुझे बहुत देर हो गयी। पिता को भूखा रहना पड़ा। देर से जब मैं घर लौटी तो </span><span>       </span><strong>राजा ने राक्षस का सिर काट दिया<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span></strong><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">उन्होंने गुस्से में मुझे शाप दे दिया कि अष्टमी और चतुर्दशी के दिन जब मैं पूजन के लिए आया करूँगी तो एक राक्षस मुझे निगल जाया करेगा और मैं उसका पेट चीरकर निकला करूँगी। जब मैंने उनसे शाप छुड़ाने के लिए बहुत अनुनय की तो वह बोले, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">जब अंगदेश का राजा तेरा पति बनेगा और तुझे राक्षस से निगली जाते देखेगा तो वह राक्षस को मार देगा। तब तेरे शाप का अन्त होगा।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span><span> </span>इसके बाद उसे लेकर नगर में आया। दीवान ने यह देखा तो उसका हृदय फट गया। और वह मर गया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल ने पूछा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">हे राजन्! यह बताओ कि स्वामी की इतनी खुशी के समय दीवान का हृदय फट गया?</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">इसलिए कि उसने सोचा कि राजा फिर स्त्री के चक्कर में पड़ गया और राज्य की दुर्दशा होगी।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा ने वहाँ जाकर फिर उसे साथ लिया तो रास्ते में बेताल ने तेरहवीं कहानी सुनायी।</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: ग्यारहवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp12/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 06:57:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[गौड़ देश में वर्धमान नाम का एक नगर था, ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="2">गौड़ देश में वर्धमान नाम का एक नगर था, जिसमें गुणशेखर नाम का राजा राज करता था। उसके अभयचन्द्र नाम का दीवान था। उस दीवान के समझाने से राजा ने अपने राज्य में शिव और विष्णु की पूजा, गोदान, भूदान, पिण्डदान आदि सब बन् कर दिये। नगर में डोंडी पिटवा दी कि जो कोई ये काम करेगा, उसका सबकुछ छीनकर उसे नगर से निकाल दिया जायेगा। एक दिन दीवान ने कहा, ‘‘महाराज, अगर कोई किसी को दु:ख पहुँचाता है और उसके प्राण लेता है तो पाप से उसका जन्म-मरण नहीं छूटता। वह बार बार जन्म लेता और मरता है। इससे मनुष्य का जन्म पाकर धर्म बढ़ाना चाहिए। आदमी को हाथी से लेकर चींटी तक सबकी रक्षा करनी चाहिए। जो लोग दूसरों के दु:ख को नहीं समझते और उन्हें सताते हैं, उनकी इस पृथ्वी पर उम्र घटती जाती है और वे लूले-लँगड़े, काने, बौने होकर जन्म लेते हैं।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span></font><span>            </span>राजा ने कहा ‘‘ठीक है।’’ अब दीवान जैसे कहता, राजा वैसे ही करता। दैवयोग से एक दिन राजा मर गया। उसकी जगह उसका बेटा धर्मराज गद्दी पर बैठा। एक दिन उसने किसी बात पर नाराज होकर दीवान को नगर से बाहर निकलवा दिया।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>कुछ दिन बाद, एक बार वसन्त ऋतु में वह इन्दुलेखा, तारावली और मृगांकवती, इन तीनों रानियों को लेकर बाग़ में गया। वहाँ जब उसने इन्दुलेखा के बाल पकड़े तो उसके कान में लगा हुआ कमल उसकी जाँघ पर गिर गया। कमल के गिरते ही उसकी जाँघ में घाव हो गया और वह बेहोश हो गयी। बहुत इलाज हुआ, तब वह ठीक हुई। इसके बाद एक दिन की बात कि तारावली ऊपर खुले में सो रही थी। चांद निकला। जैसे ही उसकी चाँदनी तारावली के शरीर पर पड़ी, फफोले उठ आये। कई दिन के इलाज के बाद उसे आराम हुआ। इसके बाद एक दिन किसी के घर में मूसलों से धान कूटने की आवाज हुई। सुनते ही मृगांकवती के हाथों में छाले पड़ गये। इलाज हुआ, तब जाकर ठीक हुए।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतनी कथा सुनाकर बेताल ने पूछा, ‘‘महाराज, बताइए, उन तीनों में सबसे ज्यादा<span style="font-size:10pt;"><font face="Times New Roman"> </font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">कोमल कौन थी?’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>राजा ने कहा, ‘‘मृगांकवती, क्योंकि पहली दो के घाव और छाले कमल और चाँदनी के छूने से हुए थे। तीसरी ने मूसल को छुआ भी नहीं और छाले पड़ गये। वही सबसे अधिक सुकुमार हुई।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>      </span>राजा के इतना कहते ही बेताल नौ-दो ग्यारह हो गया। राजा बेचारा फिर मसान में गया और जब वह उसे लेकर चला तो उसने बारहवीं कहानी सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span> </span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: दसवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp11/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 06:54:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[मदनपुर नगर में वीरवर नाम का राजा राज क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मदनपुर नगर में वीरवर नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में एक वैश्य था, जिसका नाम हिरण्यदत्त था। उसके मदनसेना नाम की एक कन्या थी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>एक दिन मदनसेना अपनी सखियों के साथ बाग़ में गयी। वहाँ संयोग से सोमदत्त नामक सेठ का लड़का धर्मदत्त अपने मित्र के साथ आया हुआ था। वह मदनसेना को देखते ही उससे प्रेम करने लगा। घर लौटकर वह सारी रात उसके लिए बैचेन रहा। अगले दिन वह फिर बाग़ में गया। मदनसेना वहाँ अकेली बैठी थी। उसके पास जाकर उसने कहा, ‘‘तुम मुझसे प्यार नहीं करोगी तो मैं प्राण दे दूँगा।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>मदनसेना ने जवाब दिया, ‘‘आज से पाँचवे दिन मेरी शादी होनेवाली है। मैं तुम्हारी नहीं हो सकती।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>वह बोला, ‘‘मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>मदनसेना डर गयी। बोली, ‘‘अच्छी बात है। मेरा ब्याह हो जाने दो। मैं अपने पति के पास जाने से पहले तुमसे ज़रूर मिलूँगी।’’<span style="font-size:10pt;"></span><span><font face="Times New Roman">                </font></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">वचन देक मदनसेना डर गयी। उसका विवाह हो गया और वह जब अपने पति के पास गयी तो उदास होकर बोल, ‘‘आप मुझ पर विश्वास करें और मुझे अभय दान दें तो एक बात कहूँ।’’ पति ने विश्वास दिलाया तो उसने सारी बात कह सुनायी। सुनकर पति ने सोचा कि यह बिना जाये मानेगी तो है नहीं, रोकना बेकार है। उसने जाने की आज्ञा दे दी।</span><span>      </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मदनसेना अच्छे-अच्छे कपड़े और गहने पहन कर चली। रास्ते में उसे एक चोर मिला। उसने उसका आँचल पकड़ लिया। मदनसेना ने कहा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">तुम मुझे छोड़ दो। मेरे गहने लेना चाहते हो तो लो।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>चोर बोला, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मैं तो तुम्हें चाहता हूँ।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            रास्ते में उसे एक चोर मिला</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मदनसेना ने उसे सारा हाल कहा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">पहले मैं वहां हो आऊँ, तब तुम्हारे पास आऊँगी।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">चोर ने उसे छोड़ दिया।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>मदनसेना धर्मदत्त के पास पहुँची। उसे देखकर वह बड़ा खुश हुआ और उसने पूछा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">तुम अपने पति से बचकर कैसे आयी हो?</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>मदनसेना ने सारी बात सच-सच कह दी। धर्मदत्त पर उसका बड़ा गहरा असर पड़ा। उसने उसे छोड़ दिया। फिर वह चोर के पास आयी। चोर सब कुछ जानकर ब़ड़ा प्रभावित हुआ और वह उसे घर पर छोड़ गया। इस प्रकार मदनसेना सबसे बचकर पति के पास आ गयी। पति ने सारा हाल कह सुना तो बहुत प्रसन्न हुआ और उसके साथ आनन्द से रहने लगा।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल बोला, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">हे राजा! बताओ, पति, धर्मदत्त और चोर, इनमें से कौन अधिक त्यागी है?</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                                                                                                                             </span>राजा ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">चोर। मदनसेना का पति तो उसे दूसरे आदमी पर रुझान होने से त्याग देता है। धर्मदत्त उसे इसलिए छोड़ता है कि उसका मन बदल गया था, फिर उसे यह डर भी रहा होगा कि कहीं उसका पति उसे राजा से कहकर दण्ड न दिलवा दे। लेकिन चोर का किसी को पता न था, फिर भी उसने उसे छोड़ दिया। इसलिए वह उन दोनों से अधिक</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">त्यागी था।’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा जब उसे लेकर चला तो उसने ग्यारहवीं कथा सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>                                                        </span></p>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: नवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp10/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 06:52:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[चम्पापुर नाम का एक नगर था, जिसमें चम्प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="2">चम्पापुर नाम का एक नगर था, जिसमें चम्पकेश्वर नाम का राजा राज करता था। उसके सुलोचना नाम की रानी थी और त्रिभुवनसुन्दरी नाम की लड़की। राजकुमारी यथा नाम तथा गुण थी। जब वह बड़ी हुई तो उसका रूप और निखर गया। राजा और रानी को उसके विवाह की चिन्ता हुई। चारों ओर इसकी खबर फैल गयी। बहुत-से राजाओं ने अपनी-अपनी तस्वीरें बनवाकर भेंजी, पर राजकुमारी ने किसी को भी पसन्द न किया। राजा ने कहा, ‘‘बेटी, कहो तो स्वयम्वर करूँ?’’ लेकिन वह राजी नहीं हुई। आख़िर राजा ने तय किया कि वह उसका विवाह उस आदमी के साथ करेगा, जो रूप, बल और ज्ञान, इन तीनों में बढ़ा-चढ़ा होगा।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span></font><span>            </span>एक दिन राजा के पास चार देश के चार वर आये। एक ने कहा, ‘‘मैं एक कपड़ा बनाकर पाँच लाख में बेचता हूँ, एक लाख देवता को चढ़ाता हूँ, एक लाख अपने अंग लगाता हूँ, एक लाख स्त्री के लिए रखता हूँ और एक लाख से अपने खाने-पीने का ख़र्च चलाता हूँ। इस विद्या को और कोई नहीं जानता।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>दूसरा बोला, ‘‘मैं जल-थल के पशुओं की भाषा जानता हूँ।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>तीसरे ने कहा, ‘‘मैं इतना शास्त्र पढ़ा हूँ कि मेरा कोई मुकाबला नहीं कर सकता।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>चौथे ने कहा, ‘‘मैं शब्दवेधी तीर चलाना जानता हूँ।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>चारों की बातें सुनकर राजा सोच में पड़ गया। वे सुन्दरता में भी एक-से-एक बढ़कर <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">थे। उसने राजकुमारी को बुलाकर उनके गुण और रूप का वर्णन किया, पर वह चुप रही।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्, तुम बताओ कि राजकुमारी किसको मिलनी चाहिए?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा बोला, ‘‘जो कपड़ा बनाकर बेचता है, वह शूद्र है। जो पशुओं की भाषा जानता है, वह ज्ञानी है। जो शास्त्र पढ़ा है, ब्राह्मण है; पर जो शब्दवेधी तीर चलाना जानता है, वह राजकुमारी का सजातीय है और उसके योग्य है। राजकुमारी उसी को मिलनी चाहिए।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा के इतना कहते ही बेताल गायब हो गया। राजा बेचारा वापस लौटा और उसे लेकर चला तो उसने दसवीं कहानी सुनायी।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>  </span></p>
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</item>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी: आठवीं कहानी ]]></title>
<link>http://hsonline.wordpress.com/2006/10/12/bp9/</link>
<pubDate>Thu, 12 Oct 2006 06:50:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>hsonline</dc:creator>
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<description><![CDATA[अंग देश के एक गाँव मे एक धनी ब्राह्मण र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंग देश के एक गाँव मे एक धनी ब्राह्मण रहता था। उसके तीन पुत्र थे। एक बार ब्राह्मण ने एक यज्ञ करना चाहा। उसके लिए एक कछुए की जरूरत हुई। उसने तीनों भाइयों को कछुआ लाने को कहा। वे तीनों समुद्र पर पहुँचे। वहाँ उन्हें एक कछुआ मिल गया। बड़े ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मैं भोजनचंग हूँ, इसलिए कछुए को नहीं छुऊँगा।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> मझला बोला, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मैं नारीचंग हूँ, मैं नहीं ले जाऊँगा।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> सबसे छोटा बोल, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मैं शैयाचंग हूँ, सो मैं नहीं ले जाऊँगा।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>वे तीनों इस बहस में पड़ गये कि उनमें कौन बढ़कर है। जब वे आपस में इसका फैसला न कर सके तो राजा के पास पहुँचे। राजा ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">आप लोग रुकें। मैं तीनों की अलग-अलग जाँच करूँगा।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद राजा ने बढ़िया भोजन तैयार कराया और तीनों खाने बैठे। सबसे बड़े ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">मैं खाना नहीं खाऊँगा। इसमें मुर्दे की गन्ध आती है।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> वह उठकर चला। राजा ने पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह भोजन श्मशान के पास के खेत का बना था। राजा ने कहा, </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">तुम सचमुच भोजनचंग हो, तुम्हें भोजन की पहचान है।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>रात के समय राजा ने एक सुन्दर वेश्या को मझले भाई के पास भेजा। ज्योंही वह वहाँ पहुँची कि मझले भाई ने कहा, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">इसे हटाओ यहाँ से। इसके शरीर से बकरी का दूध की गंध आती है।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने यह सुनकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह वेश्या बचपन में बकरी के दूध पर पली थी। राजा बड़ा खुश हुआ और बोला, <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">‘‘</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">तुम सचमुच नारीचंग हो।</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">’’</span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इसके बाद उसने तीसरे भाई को सोने के लिए सात गद्दों का पलंग दिया। जैसे ही वह उस पर लेटा कि एकदम चीखकर उठ बैठा। लोगों ने देखा, उसकी पीठ पर एक लाल रेखा खींची थी। राजा को ख़बर मिली तो उसने बिछौने को दिखवाया। सात गद्दों के नीचे<span>  </span>उसमें <span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';">एक बाल निकला। उसी से उसकी पीठ पर लाल लकीर हो गयी थीं। </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा को बड़ा अचरज हुआ उसने तीनों को एक-एक लाख अशर्फियाँ दीं। अब वे तीनों कछुए को ले जाना भूल गये, वहीं आनन्द से रहने लगे।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘हे राजा! तुम बताओ, उन तीनों में से बढ़कर कौन था?’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>राजा ने कहा, ‘‘मेरे विचार से सबसे बढ़कर शैयाचंग था, क्योंकि उसकी पीठ पर बाल का निशान दिखाई दिया और ढूँढ़ने पर बिस्तर में बाल पाया भी गया। बाकी दो के<span>  </span>बारे में तो यह कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी से पूछकर जान लिया होगा।’’<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>            </span>इतना सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा लौटकर वहाँ गया और उसे लेकर लौटा तो उसने नवीं कहानी कही।<span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"> </span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS';"></span><span>        </span></p>
]]></content:enc