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	<title>भक्ती &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/भक्ती/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "भक्ती"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 13:25:41 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अब तो उपेक्षासन भी सीख लें ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/26/kautilya-ka-artshastra-ab-to-upekshaasan-bhee-seekh-len/</link>
<pubDate>Mon, 26 Nov 2007 05:22:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.शत्रु को अपने से अधिक जानकर उसके बल क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शत्रु को अपने से अधिक जानकर उसके बल के कारण उपेक्षा कर स्थिर ही रहता है उसको उपेक्षासन कहते हैं। जैसे भगवान् श्री कृष्ण ने सत्यभामा के लिए स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तब देवराज इन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति का प्रदर्शन न कर उपेक्षा की-अर्थात उनसे युद्ध नहीं किया।<br />
२.दूसरों से उपेक्षित होने से रुक्मी ने भी उपेक्षासन किया। जब कृष्ण से युद्ध करने के उपरांत रुक्मी को किसी ने सहायता नहीं दी तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।</p>
<p>कौटिल्य के इन गूढ़ रहस्यों को समझे तो उनमें बहुत सारे अर्थ निहित हैं। आज एक सभ्य समाज निर्मित हो चुका है और बाहुबल के उपयोग के अवसर बहुत कम रह गए हैं। ऐसे में उनकी नीतियों का अनुसरण और अधिक आवश्यक हो गया है। हम देखते हैं कि हमें उत्तेजित करने के लिए कई विषय उपस्थित किये जाते हैं ताकि हम अपना विवेक खो दें और दूसरे इसका लाभ उठा सकें।</p>
<p>त्योहारों के मौके पर ही देखें। उनका व्यवसायीकरण इस तरह किया गया है कि लगता है कि पैसे खर्च करना ही त्यौहार है और भक्ति, ध्यान और एकांत चिंतन का उनसे कोई संबंध नहीं है। एक से बढ़कर एक विज्ञापन टीवी और अखबारों में आते हैं-यह खरीदो, वह खरीदो और अपना त्यौहार मनाओ। लोग इनको देखकर बहक जाते हैं और अपना पैसा खर्च करते हैं। और तो और इस अवसर पर कर्जों की भी आफर होती है। जिनके पास पैसा नहीं है वह कर्ज लेकर कीमती सामान खरीदने लगते हैं-यह सोचकर के उसे चुका देंगे पर ऐसा होता नहीं है और कर्ज जिसे मर्ज भी कहा जाता है एक दिन लाइलाज हो जाता है। हम दूसरों का आकर्षण देखकर उसको अपने मन में धारण कर लेते हैं और वही हमारे तनाम का कारण बन जाता है अगर हम उनकी उपेक्षा कर अपनी मस्ती में मस्त रहें तो लगेगा की इस दुनिया में बहुत सी चीजें दिखावे के लिए संग्रहित की जातीं है उनसे कोई सुख मिलता हो यह जरूरी नहीं है और जिनके पास सब कुछ है वह भी शांति नहीं है वरना वह भगवान् के घर मत्था टेकने क्यों जाते हैं?</p>
<p>यहाँ एक बात याद रखना होगी  कि विज्ञापन में काम करने वाले अपने कार्य को ''एड केंपैन"यानि विज्ञापन अभियान या युद्ध भी कहते हैं और इसे इस तरह बनाया जाता है कि समझदार से समझदार व्यक्ति अपनी बुद्धि हार जाये। इस समय हर क्षेत्र में तमाम तरह के प्रचार युद्ध छद्म रूप से हम पर थोपे गए हैं और हम उनसे हार राहे हैं, केवल वस्तुओं को खरीदने तक ही यह प्रचार युद्ध सीमित नहीं है बल्कि अन्य विषयों -जैसे आध्यात्मिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक- पर विचार न कर केवल मीडिया द्वारा सुझाए गए विषयों पर ही सोचें, इस तरह हम पर थोपे गए हैं।</p>
<p>हम चूंकि बाजार उदारीकरण के पक्ष में हैं इसलिए उनको रोक नहीं सकते पर उनके प्रति उपेक्षासन का भाव अपनाना चाहिए। यह अब हमारे लिए चुनौती है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने जो सोच इस समाज को दिया था उसकी परवाह तत्कालीन समाज ने इसलिए नहीं की क्योंकि उस समय इसकी अधिक आवश्यकता नहीं थी, और वह अब अधिक प्रासंगिक है क्योंकि ऐसे प्रसंग आ रहे हैं जिनमें उनके नियम और सिद्धांत बहुत नये लगते हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि हमारे प्राचीन मनीषी और विद्वान कितने दूरदर्शी थे।दरअसल हमारे समाज  की वास्तविक परीक्षा का समय अब आ गया है और हमें अपने अन्दर ऐसे विचार और नियम स्थापित करना चाहिए जिससे विजय पा सकें।<br />
हमारे सामने किसी विज्ञापन में कोई वस्तु या कोई विषय होता है तो उस पर गहराई से विचार करना चाहिए, और अगर उसमें अपना और समाज का लाभ न दिखे तो उपेक्षा का भाव बरतना चाहिऐ. हमें किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति पसंद नहीं है तो उसे बुरा कहने की बजाय उपेक्षासन करना चाहिए. अगर हम उसे बुरा कहेंगे तो चार लोग उसे अच्छा भी कहेंगे-उसका विज्ञापन स्वत: होगा. हम उपेक्षा करेंगे तो हमारे चित को शांति मिलेगी.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहे:प्रेम की गली संकरी होती है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/24/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Sat, 24 Nov 2007 02:23:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं
आप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं<br />
आपु अहैं तो हरि नहीं, हरि आपुन नाहि</strong><br />
संत शिरोमणि रहीम कहते हैं की प्रेम की गली बहुत पतली होती है उसमें दूसरा व्यक्ति नहीं ठहर सकता, यदि मन में अहंकार है तो भगवान् का निवास  नहीं होगा और यदि  दृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार का अस्तित्व नहीं होगा.<br />
<strong>रहिमन घरिया  रहंट को त्यों ओछे की डीठ<br />
रीतिही सन्मुख होत है, भरी  दिखावे पीठ</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की कुएँ में लगी रहंट की छोटी-छोटी घडेईयाँ तुच्छ व्यक्ति की दृष्टि के समान होती हैं. सामने तो खाली होती किन्तु पीछे भरे हुई होतीं हैं. </p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[वह भगवान् बुद्ध की प्रतिमा से क्यों डरते हैं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/22/vah-bhagvan-buddh-kee-pratima-se-darte-kyon-hain/</link>
<pubDate>Thu, 22 Nov 2007 14:37:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[चीन की सेना ने भारतीय सीमा में घुसकर ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चीन की सेना ने भारतीय सीमा में घुसकर बुद्ध के प्रतिमा नष्ट की है ऐसी खबर अख़बार में छपी हैं। क्योंकि दोनों के बीच अभी कोई सीमांकन नहीं हुआ है इसलिए ऐसी घुसपैठ हो जाती है ऐसा सरकार का मानना है। मैं यहाँ घुसपैठ की बात नहीं कर रहा क्योंकि उसका कोई आधार प्रमाणिक नहीं है पर मैं भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड जाने की  खबरों को देखकर हैरान हो जाता हूँ। यह कोई पहली  घटना नहीं है और अफगानिस्तान के बामियान शहर में तो उनकी पहाड़ को काटकर बनायी गयी प्रतिमा को तोपों से उड़ाया गया था। अब पिछले दिनों पाकिस्तान के सीमाप्रान्त में भी भगवान बुद्ध की प्रतिमा को तोडा गया था और उसके पीछे  आतंकवादियों का हाथ माना गया था।  अब जब चीनी सेना के द्वारा इस तरह प्रतिमा तोड जाने की खबर आयी तो हैरानी हुई क्योंकि जब बामियान में बुद्ध की प्रतिमा तोडी जा रही थी तो बुद्ध धर्म का बाहुल्य होने से लोगों को यह अपेक्षा थी की चीन उसका विरोध करेगा पर उसने नहीं किया पर अब समझ में आ रहा है की लाल रंग में रंगा चीन भी उसी तरह बुद्ध के दर्शन ने भय खाता है जैसे आतंकवादी।</p>
<p>आखिर ऐसा क्यों  हो रहा है कि भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं से वह क्यों घबडा रहे हैं? भगवान बुद्ध के दर्शन से वह लोग क्यों खौफ खा रहे हैं? अगर वह ऐसा प्रचार के लिए कर रहे हैं तो इसके लिए  और भी तरीके हो सकते हैं। दरअसल बुद्ध का दर्शन कहता है कि  सब लोग समान है और किसी को हिंसा में लिप्त नहीं होना चाहिए। उन्हें अहिंसा का प्रवर्तक भी माना जाता है। जब आदमी के मन में अहिंसा का भाव आता है तो वह दुनिया भर के पाप, लोभ। लालच और चाटुकारिता की  प्रवृति से दूर हो जाता है और केवल निरंकार ईश्वर की आराधना में लग जाता है।<br />
एक समय बुद्ध धर्म अफगानिस्तान तक फैला था पर उसकी सीमा के बाहर रहने वाले मठाधीशों को यह मंजूर नहीं था। अधिकतर हमले मध्य एशिया से हुए जहाँ प्रकृति की दया भारत से कम  ही है। और इतिहासकार मानते हैं कि वहाँ की गरीबी और अशिक्षा से भरे समाज के लोगों पर राज करना आसान नहीं है इसलिए उन्हें युद्धों में व्यस्त करने के लिए वहाँ के राजाओं  ने भारत भूमि पर हमले किये। जब यहाँ शांति के पाठ पढे लोगों की ताकत देखी तो अपने लोगों को अशांति और हिंसा का पाठ पढाकर युद्ध के लिए यहाँ लाये। </p>
<p>फिर इस देश के लोग  जिनके पास अपने भगवान अनेक स्वरूपों में ह्रदय में इस क़द्र मौजूद हैं और राज्य किसी का भी हो उसके अधिपति को भगवान मानने को तैयार नहीं हुए तो उनकी मूर्तियाँ तोडी गयीं। अफगानिस्तान में बुद्ध मठों में रहने वाले भिक्षु धीरे-धीरे पलायन कर गए और आक्रमणकारी और आगे बढ़ते रहे। उन्होने इस देश पर हमले किये पर इस देश की आत्मा को नहीं जीत सके। वह मिट गए पर उनकी वर्तमान पीढियां अब भी उस काम को अंजाम दे रहीं हैं। तात्पर्य यही है कि जिसके लिए  हम कहते हैं उसे  भगवान मानो। लाल रंग  से रंगा चीन भी अपने लाल पुरुष भारत में पूजते देखना चाहता है। यह संभव नहीं है।</p>
<p>जिन लोगों की दाल नहीं गली  और  बरसों से भारत में ही प्रज्वलित धर्म की ज्योति को कोई बुझा नहीं पाया   तो वह मूर्तियों पर हमला करते हैं। सच तो यह है कि मूर्तिपूजा का विरोध दो ही कारणों से होता है एक तो अज्ञान की वजह से दूसरा अहंकार की वजह से। जो मूर्ति पूजा करते हैं वह भी जानते हैं  कि मूर्ति तो किसी प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तु से बनीं हुई है पर उसमें वह ध्यान लगाकर अपना मन साफ करने में सफल रहते हैं। मेरा मानना  है कि मूर्ति पूजा अगर शुद्ध मन से की जाये तो वह भी ध्यान जैसे लाभ देती है। </p>
<p>बात हम बुद्ध प्रतिमाओं  को तोड़ने की कर रहे हैं तो उनके विरोधी अपने मन में व्याप्त अज्ञानता  और अंहकार के वशीभूत होकर निराशा के घनघोर अंधेरों में रहते हैं। उन्हें अपने राज्य में भूखे और नंगों से बड़ा डर लगता है और कहीं वह जीवन का सत्य जानकर उनसे विमुख न हो जाएं उन्हें ऐसी प्रतिमाओं को तोड़ने के लिए उकसाते हैं। वह गरीबी और शोषित को धन और समाज में सम्मान दिलाने का भ्रम दिखाकर उसे संघर्ष के लिए  प्रेरित करते हैं और फिर अपना राज्य कायम करते हैं। फिर भी उनका मन नहीं भरता और हर पल उन्हें कोई न कोई चीज अपने लोगों के सामने एक दुश्मन की तरह रखनी पड़ती है ताकि वह उनका राज्य बनाए रखें। </p>
<p>उनका अज्ञान  और अन्धकार उन्हें हमेशा जीवन में त्रस्त किये  रहता है। उन्हें पता ही नहीं प्रतिमा टूटने से भगवान बुद्ध द्वारा खोजा गया सच टूट नहीं सकता। विश्व के लोगों के मन में जो उनकी प्रतिमा है उसे कोई तोड़ नहीं सकता। यह उनके अज्ञान का प्रतीक है और उन्हें यह अंहकार है कि उनकी प्रतिमा टूटने से लोग उनको भूल जायेंगे और वह भी नहीं होता तो भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं की और प्रतिमाओं को तोड़ने लगती हैं क्योंकि वह चाहे कुछ भी कर लें न वह खुद न उनके नकली भगवान उन जैसे नहीं बन सकते यह सच उन्हें और डरा देता है और वह और उग्र हो जाते हैं।    </p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र:व्यसनी राजा संकट का कारण ]]></title>
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<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 06:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का प्रयोग करे। चतुरंगिनी सेना को छोड़कर जहाँ कोष और मन्त्र से ही युद्ध होता वही श्रेष्ठ मन्त्र है, जिसमें कोष और मंत्री से ही शत्रु को जीता जा सकता है। * यहाँ आशय यह है कि अगर कहीं शत्रु के की सेनाओं के साथ सीधे युद्ध नहीं हो रहा पर उसकी गतिविधियां ऎसी हैं जिससे देश को क्षति हो रही हो तो वहां धन और अपने चतुर सहयोगियों की चालाकी(मन्त्र) से भी शत्रु को हराया जा सकता है३.साम, दाम, दण्ड, भेद, माया, उपेक्षा, इन्द्रजाल यह सात उपाय विजय के हैं।*यहाँ कौटिल्य का आशय यह है साम, दाम, दण्ड और भेद के अलावा माया(छल-कपट और चालाकी) उपेक्षा का भाव दिखाकर और इन्द्रजाल (हाथ की सफाई) द्वारा भी शत्रु को हराया जा सकता है।</p>
<p>2.मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है। वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करेजो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आध्यात्मिक ज्ञान के बिना विकास अधूरा ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/08/%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 03:54:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[               देश को विकास की ओर ले जाने की बात ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>               देश को विकास की ओर ले जाने की बात सभी करते है और करना चाहिऐ, पर आज तक कोई भी स्पष्ट नहीं का सका कि उसका स्वरूप क्या? क्या भौतिक साधनों के उपलब्धि ही विकास है? क्या आदमी के मानसिक विकास को कोई मतलब नही है?</p>
<p>             अगर हम विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास से करते हैं तो वह स्वाभाविक रुप से आता ही है, और साथ में विनाश भी होता है। जो आज है उसका स्वरूप भी बदलेगा-इसी बदलाव को हम विकास कहते हैं और फिर एक दिन उसका विनाश भी होता है। इतने सारे भौतिक साधन होते हुए भी पूरे विश्व में अमन चैन नहीं है। एक तरफ सरकारें विकास का ढिंढोरा पीटती हैं दूसरी तरफ आतंकवादी उन्हीं साधनों का इस्तेमाल गलत उद्देश्यों के लिए करते है उनके पास धन और अन्य साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और जैसे जैसे संचार के क्षेत्र में नये नए साधन आ रहे आम आदमी के पास इस्तेमाल के लिए बाद में पहुंचते है आतंकवादी उसे शुरू कर चुके होते हैं। इसका सीधा आशय यही है उनके पास धन और साधनों की उपलब्धता है पर विचार शक्ति नहीं है। यह विचार शक्ति तभी आदमी में आती है जब वह अपने अध्यात्म को पहचानता है। आजकल आदमी को भौतिक शिक्षा तो दीं जाती है पर अध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया जाता और वह दूसरों के लिए उपयोग की वस्तु बनकर रह जाता है।</p>
<p>          हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरू की छबि रखता है और यहां के अध्यात्म आदमी में सर्वांगीण विकास कि प्रवृति उत्पन्न करता है। हमारे महर्षियों और संतों ने अपनी तपस्या और तेज से यहाँ ऐसे बीज बो दिए हैं जो आज तक हमारे देश की छबि उज्जवल है पर अपने धर्म ग्रंथो को असांसारिक और भक्ति से ओतप्रोत मानकर उन्हें नियमित शिक्षा से दूर कर दिया गया है, यही कारण है हमारे देश के प्रतिभाशाली लोग भौतिक शिक्षा ग्रहण कर विदेश में तो ख़ूब नाम कमा रहे हैं पर देश को उसका लाभ नहीं मिल पाया वजह हर जगह अज्ञान का बोलबाला है। वह विदेशों में नाम कमा रहे हैं और यहाँ हम खुश होते हैं पर कभी यह सोचा है कि हमारे देश में रहकर वह लोग कम क्यों नहीं कर पाये?</p>
<p>            केवल भौतिक शिक्षा से सुख-समृद्धि तो आ सकती है पर शांति का केवल एक ही जरिया है और वह है अध्यात्म का विकास। इसका आशय यह है कि आदमी समय के अनुसार बड़ा होता है और अपने प्रयासों से भौतिक साधनों का निर्माण और संचय स्वाभाविक रुप से करेगा ही पर वह तब तक अध्यात्मिक विकास नहीं कर सकते जब तक उसे कोई गुरू नहीं मिलेगा। अगर हम विश्व में फैले आतंकवाद को देखें तो अधिकतर आतंकवादी भौतिक शिक्षा से परिपूर्ण है वह हवाई जहाज उड़ाने, कंप्युटर चलाने और बम बनने में भी माहिर है और कुछ तो चिकित्सा और विज्ञान में ऊंची उपाधिया प्राप्त हैं, इसके बावजूद आतंकवाद की तरफ अग्रसर हो जाते हैं उसमें उनका दोष यही होता है कि धन और धर्म के नाम पर भ्रम में डालकर उन्हें इस रास्ते पर आने को बाध्य कर दिया जाता है ।<br />
इस तरह यह जाहिर होता है कि भौतिक साधनों के विकास के साथ अध्यात्म का विकास भी जरूरी है। </p>
]]></content:encoded>
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