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	<title>भगवान &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/भगवान/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "भगवान"</description>
	<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 21:32:29 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 06:02:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमारे घर के पास एक डेरी वाला है. वह डेरी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे घर के पास एक डेरी वाला है. वह डेरी वाला एसा है कि आधा किलो घी में अगर घी 50२ ग्राम तुल गया तो 2 ग्राम घी निकाल लेता था.</p>
<p>एक बार मैं आधा किलो घी लेने गया. उसने मुझे 90 रूपय ज्यादा दे दिये. मैंने कुछ देर सोचा और पैसे लेकर निकल लिया. मैंने मन में सोचा कि 2-2 ग्राम से तूने जितना बचाया था बच्चू अब एक ही दिन में निकल गया. मैंने घर आकर अपनी गृहल्क्षमी को कुछ नहीं बताया और घी दे दिया. उसने जैसे ही घी डब्बे में पलटा आधा घी बिखर गया. मुझे झट से "बेटा चोरी का माल मोरी में" वाली कहावत याद आ गयी. और साहब यकीन मानीये वो घी किचन की सिंक में ही गिरा था.</p>
<p>इस वाकये को कई महीने बीत गये थे. परसों शाम को मैं एग रोल लेने गया. उसने भी मुझे सत्तर रूपय ज्याद दे दिये. मैंने मन ही मन सोचा चलो बेटा आज फिर चैक करते हैं की क्या वाकई भगवान हमें देखता है. मैंने रोल पैक कराये और पैसे लेकर निकल लिया. आश्चर्य तब हुआ जब एक रोल अचानक रास्ते में ही गिर गया. घर पहुँचा, बचा हुआ रोल टेबल पर रखा, जूस निकालने के लिये अपना मनपसंद काँच का गिलास उठाया... अरे यह क्या गिलास हाथ से फिसल कर टूट गया. मैंने हिसाब लगाय करीब-करीब सत्तर में से साठ रूपय का नुकसान हो चुका था. मैं बडा आश्चर्यचकित था.</p>
<p>और अब सुनिये ये भगवान तो मेरे पीछे ही पड गया जब कल शाम को सुभिक्षा वाले ने मुझे तीस रूपय ज्याद दे दिये. मैंने अपनी धर्म-पत्नी से पूछा क्या कहती हो एक ट्राई और मारें. उन्होने मुस्कुराते हुये कहा - जी नहीं. और हमने पैसे वापस कर दिये. बाहर आकर हमारी धर्म-पत्नी जी ने कहा - वैसे एक ट्राई और मारनी चाहिये थी. बस इतना कहना था कि उन्हें एक ठोकर लगी और वह गिरते-गिरते बचीं.</p>
<p>मैं सोच में पड गया कि <strong>क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है</strong>.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भगवान बनाने वाले]]></title>
<link>http://hexperiments.wordpress.com/?p=53</link>
<pubDate>Wed, 27 Feb 2008 00:37:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>gaizabonts</dc:creator>
<guid>http://hexperiments.wordpress.com/?p=53</guid>
<description><![CDATA[भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="font-size:14px;">भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई? काहे को भगवान बनाया?</p>
<p style="font-size:14px;">अगर मैं आज यहाँ नही होता, तो मेरी जगह पे वह बैठा रहता । तुम लोग यह बात समझ नही पाओगे । वो मेरा दोस्त ही नही, मेरा सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी भी था ।</p>
<p style="font-size:14px;">आज किसी को भगवान बना ने में तुम लोग देर नही करते । सरल-सादे मनुष्य को सुविधाजनक भगवान बना देते हो । तुम भूल जाते हो के वह आखिर एक सादा मनुष्य है, पर वह स्वयं कैसे भूले अपने आप को? वह तो मनुष्य जैसा व्यवहार करता है । तब, तुम्हारी दृष्टि में वह गिर जाता है । पर किसी मिट्टी के देवता की तरह, तुम उसका विसर्जन भी नही कर सकते । तुम्हें ऐसा भगवान चाहिये जिसे तुम कोस सकते हो, गाली दे सकते हो । उसे धरती पर पटक सकते हो, आकाश में स्थापित कर सकते हो । तुम्हें नियंत्रण की सुविधा चाहिये, भगवान नही । जब चाहा बना दिया, जब चाहा गिरा दिया । मूर्ति भी तुम्हारी, <a href="http://medocuk.wordpress.com/2008/02/21/a-moment-of-weakness/" target="_blank">मूर्तितल</a> भी तुम्हारा । कटघरे में खड़ा बेचारा भला आदमी ।</p>
<p style="font-size:14px;">मैं नही तो आज वह तुम्हारा भगवान रहता । पता नही, भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कः खलु महान् ? ]]></title>
<link>http://sanskrut.wordpress.com/2007/09/29/%e0%a4%95%e0%a4%83-%e0%a4%96%e0%a4%b2%e0%a5%81-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Sat, 29 Sep 2007 09:10:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>Himanshubhai Mistry</dc:creator>
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<description><![CDATA[Composed  on  9/27/2007 11:29
कः खलु महान् ?
एकदा भक्त शिर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Composed  on  9/27/2007 11:29</p>
<p>कः खलु महान् ?</p>
<p>एकदा भक्त शिरोमणिः देवर्षिः नारदः अचिन्तयत् - “को नु खलु सर्वमहान् अस्मिन संसारे ?” इमां जिज्ञासां शमयितुं स तत्त्वज्ञानिनः महापुरुषान् उपगतः । तेषु एकः अवदत् - “भगवान् एव महतो महीयान् ।” अपरश्च भगवतः गुणगायकं भक्तमेव सर्वश्रेष्ठम् अकथयत् । अन्ये ब्रह्म-विष्णु-महेशादीन् देवान् उच्चतमान् अघोषयन् । अन्ततः नारदः सन्देहाकुलः व्यचारयत् - “कः खलु अस्य प्रश्नस्य समीचीनमुत्तरं दातुं समर्थः ? न हि कोऽपि इदृशप्रश्नान् उत्तरयितुं प्रभवति भगवन्तं विना ।” एवं निश्चित्य स सच्चिदानन्दस्य भवभयहारिणः भगवतः विष्णोः वैकुण्ठलोकम् अगच्छत्, तत्र च प्रभुं साष्टाङ्गं प्राणमत् ।</p>
<p>प्रभुः अपृच्छत्- “देवर्षे, कथं दर्शनं दत्तम् अत्रभवता ? कच्चित् कुशलं श्रीमताम् ?”<br />
नारदः निजागमनप्रयोजनं निवेदितवान् ।<br />
तस्य प्रश्नं निशम्य भगवान् च उवाच - मुनिवर, पृथिवी एव सर्वमहती यतो हि एषा सर्वेषामाश्रयः ।<br />
नारदः अवदत् - सा तु समुद्रेण परिवेष्टिता । अथ कथं सा महती भवितुम् अर्हति ?<br />
भगवान् अभाषत् - तर्हि समुद्रः एव सर्वमहान् ।<br />
नारदः अकथयत् - प्रभो, स तु अगत्स्यमुनिना चुलुकिकृतः । स महान् कथम् ?<br />
भगवान् अब्रवीत् - तर्हि अगत्स्यमुनिः महान् ।<br />
नारदः अवादीत्- नाथ, यदा स मुनिवरो ध्यानावस्थितो भवति तदा सः अस्मिन् अनन्ताकाशे खद्योतवत् स्फूरितुम् आरभते । तर्हि स महान् कथं भवितुमर्हति ?<br />
भगवान् अभणत् - अस्तु तर्हि आकाशः सर्वमहान् ।<br />
नारदः अवदत्- महाराज, विचित्रं खलु वदति भवान् । यदा भवान् वामनरुपेण अवातरत् तदा एकेनैव पादेन आकाशम् अमात् । तर्हि आकाशः महान् कथं मन्येत ?<br />
भगवान् अकथयत् - नारदमुने, युक्तमुक्तं भवता, वस्तुतः मम चरणः एव सर्वमहान् ।<br />
नारदः अब्रवीत्- प्रभो, भवतः चरणः तावत् मया हृदये धृतो वर्तते तर्हि स महान् कथम् ?<br />
एतन्निषम्य भगवान् विहस्य अवदत् - देवर्षे नारद, तर्हि भवानेव सर्वमहान् । ये सततं मच्चरणचिन्तने निमग्नाः ते एव संसारे सर्वमहान्तः ।<br />
एतद् अकर्ण्य प्रफुल्लितः अभवत् नारदः । भगवन्तं प्रणम्य च सः नारायण, नारायण इति जपन् मर्त्यलोकस्य सन्तप्तप्राणिनः निजयात्रायाः सन्देशं श्रावयितुं भूतलं प्रतिनिवृत्तः ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रामजी लगायेंगे बेडा पार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 03:50:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विश्वास धारण कर हृदय में
रामजी करेंगे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विश्वास धारण कर हृदय में<br />
रामजी करेंगे बेड़ा पार<br />
जलमार्ग हो या थल मार्ग या<br />
करना हो आकाश में<br />
बिना पंख विचरण<br />
कोई अगर बाधा होगी तो<br />
हृदय से स्मरण कर नाम का<br />
हो जाओगे उसके पार<br />
उनकी भक्ति में शक्ति अपार<br />
पर आएगा आड़े तुम्हारा अंहकार</p>
<p>तुम चाहोगे कि<br />
काम सब रामजी करें<br />
नाम तुम्हारा हो<br />
दूसरों के यकीन और भक्ति की<br />
परवाह नहीं<br />
बढाना चाहते अपना व्यापार<br />
दिखाते है लोगों को सपने<br />
लक्ष्य का पता नहीं अपने<br />
रामजी के नाम से बड़ा नामा<br />
क्या करेंगे लोगों का भला<br />
उनकी नजर में है बसता है अपना ही परिवार</p>
<p>रामजी ने कहा<br />
'मुझसे बडे हैं भक्त मेरे<br />
बिना लालच और लोभ<br />
मेरी भक्ति के भाव में पडे'<br />
ऐसे भक्तों की शक्ति अपार<br />
जिनका कुछ लोग भी करते व्यापार<br />
जो अभक्ति में देखते फ़ायदा<br />
वह भी लेते रामजी का नाम कई बार</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
सच और झूठ का पता तो रामजी जाने<br />
पर हम तो उनकी शक्ति को माने<br />
भक्त तो नाम लेते हैं<br />
अभक्त भी लगाते पुकार<br />
पर उनसे भी क्या कहें<br />
कहीं एक क्षण भी हृदय से याद किया<br />
तो हो जाएगा उनका बेड़ा पार<br />
रामजी की माया है अपरंपार<br />
अपने भक्तों के दें भक्ति<br />
और अभक्तों को माया के चक्कर में<br />
ऐसा फंसायें कि घूमें बेकार<br />
इस धरती पर ही स्वर्ग बसाने के चाह<br />
अपनी देह के अमर होने का भ्रम<br />
व्यापार ही जिनका धर्म<br />
भक्तों की भावनाओं बेखबर<br />
जिन्होंने तय कर लिया है कि<br />
अपनी दैहिक शक्ति का प्रदर्शन दिखाएँगे<br />
रामजी के अलावा उन्हें<br />
कौन समझा सकता है कि<br />
यकीन कर लो<br />
कुछ पल हृदय से भक्ति कर लो<br />
रामजी तुम्हारा भी बेड़ा पार लगाएंगे</p>
<p>----------------------</p>
]]></content:encoded>
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