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	<title>मनुष्यता &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/मनुष्यता/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "मनुष्यता"</description>
	<pubDate>Wed, 08 Oct 2008 07:53:16 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[हमारी विचित्रताएं]]></title>
<link>http://ulatvasi.wordpress.com/?p=8</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 12:22:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
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<description><![CDATA[ऊपर से बेहद गंभीर दिखने वाला व्यक्ति क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ऊपर से बेहद गंभीर दिखने वाला व्यक्ति कई बार ऐसे व्यवहार कर बैठता है जो उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता। हमें उसकी सरलता उसकी अगंभीरता लग सकती है। हर शख्स में कुछ न कुछ विचित्रताएं होती हैं। कोई किसी मामले में विचित्र होता है तो कोई किसी मामले में। संभव है एक पहुंचा हुआ विद्वान खाने को लेकर बच्चों जैसी ललक दिखाए या कोई वैज्ञानिक किसी पोशाक के प्रति कमजोरी दिखाए। लेकिन यही दुर्बलताएं मनुष्य को प्रामाणिक बनाती हैं।</p>
<p>ये साबित करती हैं कि किसी व्यक्ति में मनुष्यता बची हुई है, उसके ज्ञान ने उसकी सहजता नष्ट नहीं की है। कल्पना करें कि हर व्यक्ति एक जैसा व्यवहार करने लगे, हर आचरण पूर्वनिर्धारित हो। तब दुनिया बड़ी नीरस हो जाएगी। यह एक भयावह स्थिति होगी। सच पूछा जाए तो विचित्रताओं में कुछ भी विचित्र नहीं है। वही सहज है, वही वास्तविकता है। बाकी तो सब कुछ ओढ़ा गया है।<br />
<h5><a href="http://navbharattimes.com/" target="_blank"><b>संजय कुन्दन</b></a></h5>
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<title><![CDATA[आराम के खिलाफ]]></title>
<link>http://ulatvasi.wordpress.com/?p=7</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 09:49:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://ulatvasi.hi.wordpress.com/2008/03/26/aaram-ke-khilaf/</guid>
<description><![CDATA[हर आदमी चाहता  है कि उसे काम के बोझ से छ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर आदमी चाहता  है कि उसे काम के बोझ से छुटकारा मिले, वह थोड़ा निश्चिंत रहे। निश्चिंतता को लेकर भी हर आदमी की अपनी अलग-अलग कल्पना होती है। कोई सोचता है कि वह निश्चिंत होते ही खूब सोएगा। कोई घूमना चाहता है, तो कोई लिखना-पढ़ना।</p>
<p>लेकिन आदमी निश्चिंत होने को ढंग से परिभाषित नहीं कर पाता। काम के बोझ से छुटकारा मिलते ही वह ऐसे उपक्रम में लग जाता है, जो एक समय फिर बोझ में बदल जाता है। खाली बैठा हुआ एक आदमी अपने खालीपन से ही ऊब जाता है और दौड़कर अपनी व्यस्तता को गले लगा लेता है। असल में निश्चिंत होना आदमी की फितरत है ही नहीं। मानव सभ्यता को आलसियों ने यहां तक नहीं पहुंचाया। हर आदमी अगर आलसी होता और निश्चिंत बैठ गया होता, तो शायद जीवन यहां तक नहीं पहुंच पाता।</p>
<p>मनुष्यता तब पेड़ पर आराम फरमाती रह जाती। मनुष्य अपने लिए खुद ही चुनौतियां खड़ी करता है और उन्हें जीतने में जुटा रहता है। निश्चिंत तो वह थोड़े समय के लिए होना चाहता है, ताकि अगला कोई लक्ष्य सोच सके।</p>
<h5><a href="http://navbharattimes.com" target="_blank"><b>संजय कुंदन</b></a></h5>
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