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	<title>मन्दिर &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/मन्दिर/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "मन्दिर"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 10:03:03 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[शिरडी के साईंबाबा का प्रसाद]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=750</link>
<pubDate>Tue, 23 Sep 2008 04:40:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ शिरडी में साईंबाबा के समाधि मन्दिर का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mnagal" size="3">शिरडी में साईंबाबा के समाधि मन्दिर का परिसर बहुत बड़ा है और वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ भी बहुत है इसी बात को ध्यान में रखकर प्रसाद वितरण के लिए एक अलग ही भवन है।</p>
<p>यह भवन समाधि मन्दिर के पास ही है जिसे आप चित्र में देख सकते है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/09/shirdi1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/09/shirdi1.jpg?w=300" alt="" title="shirdi1" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-1074" /></a></p>
<p>यहाँ लगभग 10  काउंटर है प्रसाद वितरण के लिए। कुछ काउंटरों से कूपन खरीदे जाते है और दूसरे काउंटरों पर उन कूपनों को देकर प्रसाद लिया जाता है। प्रसाद में लड्डू है जिनका मूल्य 5 रूपए है।</p>
<p>प्रसाद के रूप में दर्शन के बाद भोजन की भी व्यवस्था है। भोजन के कूपन के लिए अलग काउंटर है और इन कूपनों का मूल्य भी 5 रूपए है। इन काउंटरों पर लाइन भी लम्बी थी और यहाँ भिखारी भी बहुत नज़र आए। श्रद्धालु कूपन खरीद कर भिखारियों को दे रहे थे जिसका अर्थ होता है उन्होनें एक ग़रीब व्यक्ति को भोजन करवाया।</p>
<p>भीतर बहुत बड़ा भोजनालय है जहाँ भोजन की व्यवस्था है। </p>
<p>सवेरे 7 बजे से 10 बजे तक नाश्ते की भी व्यवस्था है। यहाँ बहुत से श्रद्धालु नाश्ता करना पसन्द करते है। नाश्ते के एक पैकेट में 5 पूड़ियाँ और सब्जी की तरह बनाए गए हरे मूँग होते है जो बहुत स्वादिष्ट होते है।</p>
<p>इसके अलावा बाहर आँगन में आइसक्रीम, श्रीखंड आदि और शिरडी के मशहूर बड़े अमरूद की दुकाने भी है।</p>
<p>वैसे मन्दिर के आस-पास अच्छे रेस्तरां है। बड़े-छोटे दोनों रेस्तरां है और ढाबे भी है। यहाँ अलग-अलग राज्यों के भोजन भी है जैसे गुजराती थाली, आन्ध्रा का भोजन, उत्तर भारतीय भोजन, महराष्ट्रीय भोजन आदि। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पोहे और साबूदाना वड़ा भी है। हमें तो पोहे और कोल्हापुरी स्पेशल सब्जी बहुत पसन्द आई।</p>
<p>और इस चटपटे स्वाद और दर्शन का मीठा आनन्द लिए हम हैदराबाद लौट आए…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साईंबाबा मन्दिर परिसर में शिरडी गाँव की झलक]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=1012</link>
<pubDate>Wed, 17 Sep 2008 04:32:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/09/17/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87-2/</guid>
<description><![CDATA[ शिरडी गाँव में ही साईंबाबा का समाधि म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">शिरडी गाँव में ही साईंबाबा का समाधि मन्दिर है पर इस मन्दिर के निर्माण में शिरडी गाँव अपने मूल रूप में नज़र नहीं आता है।</p>
<p>मन्दिर परिसर में लगे बाज़ार में घूमते-घूमते हम आगे निकल गए और एक किनारे हमारी नज़र पड़ी एक कुएँ पर जिसे आप यहाँ चित्र में देख सकते है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/09/shirdi2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/09/shirdi2.jpg?w=300" alt="" title="shirdi2" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-1018" /></a></p>
<p>माना जाता है कि यहाँ बाबा ने लक्ष्मीबाई शिंदे के सहयोग से कुँआ खुदवाया था।</p>
<p>कुएँ के पीछे छोटा पीला घर जो नज़र आ रहा है जिसमें लाल छोटी सी खिड़की है, यही लक्ष्मी बाई शिंदे का घर है। बिल्कुल उसी तरह है जैसा कि उस ज़माने में हुआ करता था। छोटा सा घर दो कमरों का। छ्त इतनी नीची कि हाथ ऊपर करो तो लगता है हाथ छत से लग जाएगें। लम्बाई चौड़ाई भी बहुत ही कम। चार लोग भीतर जाने से पूरा कमरा भर जाए। कमरों में लक्ष्मी बाई और साईंबाबा की तस्वीरें लगी है जिन पर फूलों के हार चढे है।</p>
<p>लक्ष्मी बाई के घर के बाद आगे बढते जाने पर क्रम से उन सबके घर है जो शिरडी में बाबा के साथ थे - बाईजा माँ, उस्मान और यहाँ विशेष रूप से दिखाया जाता है कुलकर्णी का घर क्योंकि पहले वो बाबा के विरोधी रहे थे। </p>
<p>बस बाज़ार के पीछे स्थित यह एक गली कहे या छोटी सी सड़क, यही एक स्थान है जो मूल रूप से शिरडी गाँव की तस्वीर दिखाता है।</p>
<p>आगे के चिट्ठे में प्रसाद की चर्चा…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साईंबाबा मन्दिर परिसर में देवी-देवता]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=983</link>
<pubDate>Mon, 15 Sep 2008 04:42:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ शिरडी में साईंबाबा के मन्दिर में सबसे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">शिरडी में साईंबाबा के मन्दिर में सबसे पहले द्वारकामाई के दर्शन किए जाते है।</p>
<p>द्वारकामाई के पहले पास ही है हनुमान जी का मन्दिर। छोटा सा मन्दिर है। भीतर हनुमान जी की मूर्ति है। मूर्ति पर सिन्दूर और तेल चढाने की सुविधा है। </p>
<p>मन्दिए के पास ही है पीपल का वृक्ष। हम जिस दिन गए उस दिन शनिवार था। शनिवार को शाम के समय पीपल के पेड़ के पास रखी छोटी सी हनुमान जी की मूर्ति और नौग्रह की मूर्तियों के पास दिया जलाया जाता है।</p>
<p>विशेष प्रकार के मिट्टी के बने छोटे-छोटे कलात्मक दिए बिक रहे थे। पाँच रूपए में एक दिया तेल और बाती के साथ खरीदकर यहाँ जलाया जा सकता है।</p>
<p>समाधि मन्दिर देखने के बाद भीतर परिसर में तीन छोटे-छोटे मन्दिर है। एक मन्दिर से दूसरे मन्दिर में जाने के लिए भीतर से रास्ता भी है। यहीं पर पूजा की सामग्री भी बिक रही थी।</p>
<p>पहला मन्दिर है प्रथम देवता गणेश जी का जिसके बाद शिवजी के मन्दिर में शिवलिंग है और उसके बाद है पार्वती जी का मन्दिर। </p>
<p>परम्परा के अनुसार शिव जी के मन्दिर के बाहर नन्दी विराजमान है।</p>
<p>पार्वती जी के मन्दिर के बाहर शेर की मूर्ति है। पार्वती का रूप है दुर्गा और शेर दुर्गा माता की सवारी है। पर यहाँ जिस शेर की मूर्ति है उसकी अलग ही कहानी है।</p>
<p>साईंबाबा के भक्तों की कहानियों में से एक कहानी यह भी है कि एक बार एक व्यक्ति एक बूढे शेर को लेकर उनके पास आया और कहने लगा कि वह उस शेर का मालिक है। उसने बताया कि अब शेर बीमार और सुस्त हो गया है। वह चाहता है कि बाबा शेर को ठीक कर दे।</p>
<p>बाबा ने कुछ पल शेर को देखा। कहते है कि कुछ क्षणों तक साईंबाबा और शेर आमने सामने आँखों में आँखें डाले रहे फिर शेर ने अपनी पूँछ तीन बार ऊपर उठाई और वहीं ढेर हो गया। इस तरह हुई शेर की मृत्यु को कहानी के अनुसार शेर की मुक्ति माना जाता है।</p>
<p>यहाँ शेर की तस्वीरें भी बिक रही थी। कुछ तस्वीरों में शेर और बाबा को आमने-सामने दिखाया गया है। यह सब भीतरी परिसर में होने से तस्वीरें नहीं ली जा सकी।</p>
<p>मन्दिर परिसर की शेष बातें अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साईंबाबा की निजि वस्तुओं का संग्रह और चढावे की बिक्री]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=953</link>
<pubDate>Wed, 10 Sep 2008 06:17:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ शिरडी के साईंबाबा मन्दिर परिसर में सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">शिरडी के साईंबाबा मन्दिर परिसर में साईंबाबा की निजि वस्तुओं का संग्रहालय भी है।</p>
<p>संग्रह की गई इन वस्तुओं में है - </p>
<p>बाबा का भिक्षा पात्र जिसमें वो शिरडी गाँव के घर-घर जाकर भिक्षा लिया करते थे। </p>
<p>वो बड़ा ताँबे का बर्तन जिसमें बाबा खिचड़ी बनाया करते थे। बताया जाता है कि इसे हाँडी कहा जाता था। बाबा भिक्षा में प्राप्त चावल और दाल इस हाँडी में डालकर लकड़ी के चूल्हे पर चढाते थे और खिचड़ी पक गई है या नहीं यह देखने के लिए चूल्हे पर चढी हाँडी में ही हाथ डालते थे और हाथ हाँडी में चलाया करते थे। बाबा की कई तस्वीरों में ऐसी तस्वीर भी बहुत जगह देखने को मिलेगी। जब खिचड़ी पक जाती थी तब सभी को पंगत (पंक्ति) में बिठा कर परोस कर खिलाया करते थे।</p>
<p>बाबा का चोला जो वो रोज़ पहना करते थे।</p>
<p>पंखा जिसे भक्त बाबा के पास झला करते थे।</p>
<p>खड़ाऊ जिसे बाबा कभी-कभार पहना करते थे।</p>
<p>चिलम भी है पर बाबा हुक्का पीते थे ऐसा शायद मैनें नहीं सुना।</p>
<p>संग्रहालय के कक्ष में बीचों-बीच वो पालकी भी रखी है जिसमें बाद के समय में बाबा की शोभायात्रा निकला करती थी। यहीं पर एक सिंहासन भी है जिसे महाराष्ट्र के किसी राजघराने से भेजा गया था जिस पर बाबा कभी नहीं बैठे।</p>
<p>संग्रहालय के पास पुस्तकालय भी है जहाँ बाबा के जीवन चरित्र और आरती, पूजा से संबंधित पुस्तकें, भजनों के आडियो-वीडियो कैसेट और बाबा की तस्वीरें बिक्री के लिए है।  </p>
<p>यहाँ एक और कक्ष है जिसमें रोज़ बाबा को चढाई जाने वाली वस्तुएँ आती है जिसमें शाल, कपड़े और रत्न होते है। सरकार की ओर से एक समिति है जो इन चीज़ों का मूल्य तय करती है और इसी मूल्य पर भक्त इन वस्तुओं को प्रसाद की तरह खरीदते है। रत्न खरीदे जाने पर उन रत्नों की शुद्धता का प्रमाणपत्र भी दिया जाता है।</p>
<p>परिसर का कुछ और विवरण अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाधि मन्दिर का भीतरी परिसर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=934</link>
<pubDate>Mon, 08 Sep 2008 05:55:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ शिरडी में साईंबाबा के समाधि मन्दिर मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">शिरडी में साईंबाबा के समाधि मन्दिर में दर्शन कर हम बाहर आए। </p>
<p>बाहर पास में ही नीम का पेड़ है। बाबा नीम के पेड़ के नीचे बैठा करते थे इसीलिए माना जाता है कि इस पेड़ के नीम का पत्ता मीठा होता है पर चख नहीं सकते क्योंकि पेड़ के चारों ओर रेलिंग लगी हुई है और सुरक्षा कर्मी भी तैनात है। पत्ते झड़ कर रेलिंग के भीतर ही रह जाते है और पेड़ इतना ऊँचा है कि डालियों तक हाथ नहीं पहुँच पाते। इसीलिए यह रहस्य ही रह गया कि नीम मीठा है या नहीं।</p>
<p>पेड़ के सामने एक अलग काउंटर है जहाँ बाबा की विभूति दी जाती है। छोटे पोलेथिन के पैकेट में विभूति होती है। एक व्यक्ति को एक ही पैकेट दिया जाता है इसीलिए जितने लोग भी दर्शन के लिए आते है सभी विभूति के लिए लाइन में लगते है। </p>
<p>विभूति के काउंटर के पीछे बड़ा कक्ष है जिसमें सत्यव्रत कथा या सत्यनारायण की कथा का आयोजन होता है। महिलाएँ कतार में बैठी थी। हर महिला के आगे एक चौकी रखी थी जिस पर पूजा सामग्री सजी थी। सामने पंडित जी बैठ कर कथा बाँच रहे थे और पूजा करा रहे थे।</p>
<p>परिसर में लगभग बीच में समाधियाँ है। एक समाधि है तात्या की जो साईंबाबा के छोटे भाई माने जाते है। इसके बाद दूसरी समाधि है म्हालसापति की जो हमेशा बाबा के साथ रहे, उसके बाद तीसरी समाधि है अब्दुल्ला की जिसकी चर्चा हम पिछले चिट्ठे में कर चुके है। </p>
<p>हर समाधि एक छोटे से कक्ष में है। बाहर पट्टिका पर उनका नाम और निधन की तिथि लिखी है। श्रद्धालु यहाँ फूल और चादर भी चढाते है।</p>
<p>समाधियों के पीछे एक कक्ष है जहाँ चढावा लिया जाता है। श्रद्धालु साईंबाबा के लिए शाल, कपड़े, रत्न आदि चढाना चाहते है। यह सभी चीज़े यहाँ जमा कर दी जाती है और जिसकी रसीद दी जाती है।</p>
<p>परिसर का शेष विवरण अगले चिट्टे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साईंबाबा का समाधि मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=905</link>
<pubDate>Sat, 06 Sep 2008 04:50:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ शिरडी के साईबाबा मन्दिर में एक बात बह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">शिरडी के साईबाबा मन्दिर में एक बात बहुत अच्छी लगी कि यहाँ सभी श्रद्धालु दर्शन के लिए एक ही कतार में प्रतीक्षा करते है।</p>
<p>दूसरे मन्दिरों में व्यवस्था है कि एक निश्चित शुल्क देकर जल्दी दर्शन किए जा सकते है, यहाँ ऐसी कोई व्यव्स्था नहीं है। बाबा के लिए सभी भक्त बराबर है।</p>
<p>यह है मन्दिर का कलश -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/09/babah1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/09/babah1.jpg?w=300" alt="" title="babah1" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-915" /></a></p>
<p>मन्दिर परिसर में अपने चप्पल-जूते, कैमरा, सेलफोन रखवा कर सुरक्षा पट्टिका से गुज़रते हुए हम कतार में खड़े हो गए। यहाँ से आगे बढकर लेंडी पार्क से होकर गुज़रते हुए सड़क पर आना पड़ता है।</p>
<p>लेंडी पार्क शिरडी में बाबा द्वारा संवारा जाता था। आज भी इसे अच्छे पार्क की तरह रखा गया है। यहाँ रंग-बिरंगे फूलों के पौधों के अलावा बड़े पत्थरों के पास जल-प्रपात का छोटा सा ख़ूबसूरत नज़ारा भी है। पता नहीं बाबा ने इसका नाम लेंडी पार्क क्यों रखा ख़ैर…</p>
<p>पार्क से निकल कर सड़क के किनारे से ही आगे बढते हुए दूसरे द्वार से प्रवेश कर मन्दिर के मुख्य परिसर में हम आ गए।</p>
<p>इस चित्र में देख सकते है सड़क के किनारे से होकर मन्दिर की ओर बढते हुए -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/09/baba11.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/09/baba11.jpg?w=300" alt="" title="baba11" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-917" /></a></p>
<p>भीतर कतार में लगभग दो घण्टे तक दर्शन के लिए प्रतीक्षा की गई पर यहाँ व्यव्स्था अच्छी है। टेलीविजन लगे है जिसमें भीतर गर्भ गृह दिखाई देता है, इस तरह लगातार बाबा के दर्शन होते रहे।  </p>
<p>सवेरे 4  बजे से रात में 10  बजे तक हर 2-3 घण्टे के बाद आरती होती है। इस तरह सुबह से रात तक कुल 5-6  बार आरती होती है। हम सवेरे 9 बजे पहुँचे और 11 बजे की आरती के समय हमारी बारी आई दर्शन करने की।</p>
<p>गर्भगृह के बड़े कक्ष में लगभग 1200  लोगों के लिए स्थान है। इतने ही लोगो को बड़े कक्ष में लेकर बाकी को रोक दिया गया। फिर हम सब को बड़े कक्ष में बैठाया गया जिसके बाद शुरू हुई आरती। बाबा की आरती सम्पन्न होने के बाद सभी को दोनों ओर से कतार में दर्शन के लिए आगे भेजा गया। </p>
<p>गर्भगृह भी बड़ा है। यहाँ दोनों ओर दीवारों पर उन सब की तस्वीरें लगी है जो शिरडी मे साईबाबा के साथ रहा करते थे - बाईजा माँ, कुलकर्णी, म्हालसापति, गणपति राव आदि। सामने तीन कमानें बनी है जिस पर चाँदी की कलाकृति में विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियाँ है। पीछे भी ऐसे ही तीन कमान है और बीच की कमान में सोने के विशाल सिंहासन पर साईबाबा की विशाल मूर्ति है। मूर्ति के ठीक सामने साईबाबा की समाधि है। </p>
<p>यहाँ दो पुरोहित है जो श्रद्धालुओं द्वारा चढाए जा रहे फूलों के हारों को बाबा के चरणों में रख रहे थे और फूलों के गुच्छों को समाधि पर चढा रहे थे। कुछ श्रद्धालु समाधि पर चढाने के लिए चादर भी ले आए, इन चादरों को यह दोनों पुरोहितों मिलकर समाधि पर चढाते रहे। दूसरी चादर आने पर पहली चादर हटा दी गई।</p>
<p>हमने पहले ही कतार में खड़े होकर टेलीविजन पर देखा कि जब फूलों का ढेर लग जाता तब कुछ समय के लिए दर्शन रोक दिए जाते और वहाँ से फूलों को हटाया जाता, झाड़न से साफ़ किया जाता फिर श्रद्धालुओं का तांता लगता। </p>
<p>दर्शन कर हम बाहर आए। बाहर परिसर में भी देखने के लिए बहुत है जिसका विवरण अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अल्ला साईं मौला साईं]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=888</link>
<pubDate>Thu, 04 Sep 2008 09:56:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिछले चिट्ठे में हमने द्वारकामाई और उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">पिछले चिट्ठे में हमने द्वारकामाई और उसके पास चावड़ी के बारे में बताया था।</p>
<p>चावड़ी के ठीक सामने है अब्दुल्ला की झोपड़ी -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/09/shirdi3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/09/shirdi3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-892" /></a></p>
<p>अब्दुल्ला साईं बाबा के भक्तों में से एक है। यह चावड़ी के सामने रहने वाले ग़रीब अब्दुल्ला की झोपड़ी है जिसे छोटे से कमरे की तरह बना दिया गया है। भीतर अब्दुल्ला की तस्वीर के साथ मक्का-मदीना और क़ुरान की आयतें लिखी तस्वीरें भी लगी है। </p>
<p>मन्दिर के प्राँगण में अब्दुल्ला की समाधि भी है। यहाँ एक सूफ़ी फ़कीर भी बैठते है जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के सिर पर झाड़न फेरते है। यहाँ श्रद्धालु समाधि पर चादर भी चढाते है। एक पट्टिका पर उनके निधन की तारिख़ लिखी है। यह मन्दिर का मुख्य भाग है इसीलिए यहाँ फोटो लेने की मनाही है।</p>
<p>चौथे प्रवेश द्वार यानि गेट नं 4  के पास चाँद खाँ की समाधि है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/09/shirdi4.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/09/shirdi4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-894" /></a></p>
<p>चाँद खाँ भी बाबा के भक्त है पर वो शिरडी गाँव के नहीं है शायद इसीलिए इनकी समाधि प्रवेश द्वार पर है। इनकी घोड़ी खो गई थी जिसे बाबा ने ढूँढ कर दिया था जिसके बाद से वो भक्त हो गए। बाबा के भक्तों की कहानियों में शायद पहली कहानी चाँद की ही है।</p>
<p>आगे का विवरण अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शिरडी के साईंबाबा]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=852</link>
<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 04:34:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/08/30/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%a1%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[ पिछले महीने हम शिरडी गए थे।
महाराष्ट्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">पिछले महीने हम शिरडी गए थे।</p>
<p>महाराष्ट्र के इस शिरडी गाँव को साईंबाबा के मन्दिर परिसर की तरह विकसित किया गया है। पूरे परिसर में दुकानें सजी थी फूल और पूजा सामग्री की। फूल दो तरह के थे - एक हार के रूप में साईंबाबा की मूर्ति के लिए और दूसरे गुच्छे के रूप में बाबा की समाधि पर चढाने के लिए। </p>
<p>परिसर में सबसे पहले द्वारकामाई के दर्शन किए जाते है। यह स्थान वास्तव में एक पुरानी मस्जिद थी। बाबा अधिकतर यहीं बैठा करते थे। </p>
<p>मस्जिद में सामने बरामदे जैसा भाग था जिसमें कोने के थोड़े से भाग में रैलिंग होती थी जिसके पीछे बाबा बैठा करते थे और सामने कुछ सीढियाँ नीचे खुले भाग में गाँववासी बैठते थे और चर्चा-परिचर्चा होती थी। इसीलिए यह जगह अधिक महत्वपूर्ण है और सबसे पहले यहीं दर्शन किए जाते है। यहाँ दर्शन के लिए बाबा की आदमकद मूर्ति है।</p>
<p>चित्र में देखिए द्वारकामाई में दर्शन के लिए भक्तों की कतार -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/08/shirdi51.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/08/shirdi51.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-866" /></a></p>
<p>इसके बिल्कुल पास में है चावड़ी। द्वारकामाई में बाबा के दर्शन के तुरन्त बाद चावड़ी में दर्शन के लिए जाया जाता है। माना जाता है कि बाबा रात के समय चावड़ी में सोते थे। इसीलिए चावड़ी में महिलाओं को जाने की मनाही है लेकिन पास में ही बाबा की मूर्ति स्थापित कर दी गई है ताकि महिलाएँ यहाँ दर्शन कर सके।</p>
<p>चित्र में आप देख सकते है महिलाओं और पुरूष के लिए अलग-अलग स्थान बताए गए है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/08/shirdi6.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/08/shirdi6.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-863" /></a></p>
<p>आगे का विवरण अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीशैलम - दक्षिण का कैलाश]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=227</link>
<pubDate>Mon, 28 Jul 2008 04:50:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/07/28/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a4%ae-%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b6/</guid>
<description><![CDATA[ मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर के बाहर क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर के बाहर कुछ देर हमने बाज़ार में चहलक़दमी की। बाज़ार बड़ा था पर वैसा ही था जैसा आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। यहाँ कुछ धर्मशालाएँ भी है। </p>
<p>कुछ दूरी पर आन्ध्रप्रदेश पर्यटन विभाग का रेस्तराँ है जहाँ अच्छा भोजन मिलता है। इसके अलावा खाने की और कोई जगह नहीं है। </p>
<p>यहाँ से हमें लौटना था। साक्षी गणपति का मन्दिर पार करते हुए हम आगे बढते गए और जिस तरह चढाई का आनन्द लिया था अब उतार का आनन्द लेने लगे।</p>
<p>अब हम बाईं ओर जिस स्थान पर रूके उसका नाम है पंचधारा। यहाँ से नीचे देखने पर नीचे सूखी नदी दिखाई दी जिसमें पेड़ों के पत्ते पड़े थे और बाईं ओर पहाड़ों से पानी बह रहा था।</p>
<p>यह देखने के लिए हम सामने से चौड़ी सीढियों से उतरने लगे जो बाद में बाईं ओर मुड़ती है। लगभग साठ-सत्तर सीढियाँ है। हम सीढियाँ उतरे। यहाँ पूर्व और दक्षिण दिशा के आपस में जुड़े पहाड़ों से पानी की पाँच धाराएँ बहती है। ये पाँचों धाराएं पास-पास बहती है। </p>
<p>जैसा कि हम जानते है कि भागीरथ की तपस्या से शिवजी की जटा से गंगा की धारा फूट पड़ी और इस तरह पूर्व दिशा से गंगा धरती पर उतर आई और सभी दिशाओं में फैल गई। इन्हीं में से पाँच दिशाओं से ये पाँच धाराएं आती है ऐसा माना जाता है। इसीलिए यह स्थान पंचधारा कहलाया। यहाँ कुछ वर्ष तक आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी।</p>
<p>जहाँ पाँच धाराएँ बह रही थी वहीं छोटी सी मन्दिरनुमा जगह है जहाँ आदि शंकराचार्या की मूर्ति है। हम सीढियाँ चढकर ऊपर आए और आगे बढे।</p>
<p>आगे कुछ दूरी पर है शिखरम। यहाँ कुछ सीढियाँ चढकर हम ऊपर गए। वैसे गाड़ी से चढाई चढने की भी सुविधा है। यहाँ पूजा की सामग्री के नाम पर एक रूपए में छोटी सी पुड़िया दी जाती है। हमने भी सबके लिए एक-एक पुड़िया ली पर हमें पता नहीं कि इसमें क्या है। </p>
<p>हम भीतर पहुँचे, लगा कैलाश पर्वत पर आ गए। पूरा स्थान ऊँचा वैसे ही बनाया गया है और ऊपर विराजमान है शिवपार्वती। बाईं ओर से सीढियाँ है थोड़ी संकरी और घुमावदार। भीड़ भी बहुत थी। ऊपर चढते गए। पता नहीं ऊपर क्या है। सबसे ऊपर पहुँचे तो लगा वाकई शिखर पर आ गए। </p>
<p>ऊपर खुली छत है जहाँ दूरबीन लगी है। दूरबीन के पास एक व्यक्ति बैठा है जो बारी-बारी से एक-एक को दूरबीन से मन्दिर का शिखर दिखा रहा है। हमनें दूरबीन से देखा मल्लिकार्जुन स्वामी मन्दिर का शिखर चमकता नज़र आया। फिर दूरबीन से हट कर देखा तो शिखर बहुत दूर कहीं धुँधला सा नज़र आ रहा था। तब हमें लगा वाकई यह श्रीशैलम की सबसे ऊँची जगह है।</p>
<p>फिर पलटे तो नन्दी विराजमान थे। अब यहाँ के पुजारी के कहने पर हमने पुड़िया खोली उसमें से काली तिल के दाने निकले जिसे नन्दी पर चढाया फिर नन्दी के दोनों सिंगों पर ऊँगलियाँ रखकर बीच से मन्दिर का शिखर देखा। नन्दी की स्थापना ऐसी की शिखर नज़र आने लगा। इसीलिए श्रीशैलम को दक्षिण का कैलाश कहा जाता है।</p>
<p>हम नीचे उतर आए। आगे बढे। लगभग पूरा रास्ता पार कर गए। यहाँ हमने देखी पाताल गंगा। कृष्णा नदी का पानी तेज़ी से बह रहा था। यह स्थान सबसे नीचा है इसीलिए यह है पाताल गंगा -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/srisai2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/srisai2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-247" /></a></p>
<p>यहाँ आस्था के नारियल चढाए जाते है पूर्वजों को पानी दिया जाता है।</p>
<p>यहाँ एक और स्थान है ईष्ट कामेश्वरी का मन्दिर जहाँ हम जा नहीं पाए। यह वास्तव में मन्दिर नहीं है। दाहिनी ओर जंगल में एक पगडंडी है जहाँ से दस किलोमीटर की दूरी पर ईष्ट कामेश्वरी की मूर्ति है। बकायदा मन्दिर जैसा नहीं है।</p>
<p>यहाँ विशेष गाड़ी में जाते है जो छोटी टैम्पो जैसी होती है। कोई और गाड़ी इस पगडंडी से गुज़र ही नहीं सकती क्योंकि दोनों ओर इतना घना जंगल है। गाड़ियों को पहले से बुक कराया जाता है। हम जिस दिन गए उस दिन एकाध गाड़ी कम थी इसीलिए हमें मिल नहीं पाई। वैसे ज्यादा नहीं कुल दो-तीन गाड़ियाँ ही चलती है। अक्सर लोग यह जगह देखने के लिए भीतर दस किलोमीटर तक जाने में संकोच ही करते है। </p>
<p>इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ सिर्फ़ माता की मूर्ति रखी है। आमतौर पर मन्दिरों में कुछ दूरी से ही चढावा चढाया जाता है पर यहाँ केवल महिलाएँ मूर्ति के माथे पर कुमकुम का टीका लगाती है और टीका लगाते समय ऐसा लगता है जैसे साक्षात किसी महिला को टीका लगाया जा रहा है।</p>
<p>लगता है जिस तरह से अमरनाथ में प्राकृतिक रूप से जिस तरह निश्चित समय पर गुफ़ा में निश्चित रूप में बर्फ़ गिरने से शिवलिंग बनता है उसी तरह घने जंगल में स्थित मूर्ति पर जब सामने से टीका लगाया जाता है तब टीका लगाने वाले की छाया और घने जंगल से जीवित स्त्री का आभास होने लगता है बाकी सब तो श्रृद्धा और विश्वास की बातें है।</p>
<p>इस तरह यह स्थान न देख पाने का मलाल लिए हम यात्रा समाप्त कर हैदराबाद लौट आए।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीशैलम - मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=238</link>
<pubDate>Fri, 25 Jul 2008 03:53:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/07/25/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%b8/</guid>
<description><![CDATA[ कृष्णा बाँध के नरीमन प्वाइंट्स पर रूक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">कृष्णा बाँध के नरीमन प्वाइंट्स पर रूक-रूक आनन्द लेते हुए हम पूरी चढाई चढकर मुख्य मंदिर के मुख्य रास्ते पर पहुँचे।</p>
<p>यहाँ बाईं ओर गणपति का छोटा सा मन्दिर है जिसे साक्षी गणपति कहते है। जैसा कि हम सब जानते है कि गणपति प्रथम देवता है और सबसे पहले गणेश पूजन ही किया जाता है। हमने भी यहाँ पूजा की।</p>
<p>सड़क पर ही छोटा सा जाली का कक्ष जैसा है जिसमें गणेश की प्रतिमा है। दर्शन के लिए लाइन सड़क पर ही लगानी है और यहीं पर पूजा की सामग्री बिकती है। लाइन ज्यादा लम्बी नहीं थी और दर्शन जल्दी हो गए। </p>
<p>इस तरह श्रीशैलम में प्रथम पूजा प्रथम देवता की सम्पन्न कर मुख्य मन्दिर के लिए आगे बढा जाता है शायद इसीलिए इसे साक्षी गणपति कहते है कि गणपति साक्षी है कि किन भक्तों ने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए चढाई पूरी की।</p>
<p>इसके थोड़ी ही दूरी पर है मुख्य मन्दिर। श्रीशैलम पर्वत पर बने इस मन्दिर में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थापित है जिसका बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा स्थान है। इसे मल्लिकार्जुन स्वामी कहते है और इस मन्दिर को मल्लिकार्जुन स्वामी का मन्दिर कहते है।  </p>
<p>श्रावण मास में इस मन्दिर में शिवजी की पूजा का बहुत महत्व है। यह है मन्दिर का मुख्य द्वार -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/srisai1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/srisai1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-246" /></a></p>
<p>यह बड़ा द्वार तो बन्द रहता है, किनारे के छोटे द्वार से भीतर प्रवेश किया जाता है। भीतर एक लम्बा गलियारा पार करने के बाद दाहिनी ओर क्लाँक रूम में हमने अपना कैमरा, सेलफोन वग़ैरह रखवाया और बाईं ओर लगी टिकट खिड़कियों पर आ गए। </p>
<p>सौ रूपए प्रति व्यक्ति से टिकट ख़रीदा और विशेष दर्शन की कतार में खड़े हो गए क्योंकि भीड़ इतनी थी कि हम भक्तों की सीधी कतार में निःशुल्क दर्शन की सोच भी न पाए। </p>
<p>वैसे इस तरह के दर्शन हमें अच्छे नहीं लगते है, लगता है जैसे भगवान से मिलने के लिए हमारे पास समय नहीं है और हम किसी तरह जल्दी से दर्शन कर औपचारिकता पूरी करना चाहते है। लेकिन भीड़ बहुत थी इसीलिए हमने सोचा अगले दिन सुबह पाँच बजे मन्दिर खुलता है, हम साढे चार बजे ही आ जाएगें पर अफ़सोस सुबह साढे चार बजे भी बहुत भीड़ थी और हमें दुबारा विशेष दर्शन का टिकट लेना पड़ा। </p>
<p>भीतर गर्भगृह में नीम अँधेरा था। हमनें ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। तीरथ लिया। इसके ठीक सामने एक और शिवलिंग स्थापित था जहाँ लोग बैठे शिवलिंग का अभिषेक कर रहे थे। पंडितजी अभिषेक करवा रहे थे। अधिकतर लोग जोड़े से बैठे थे यानि पति-पत्नी साथ-साथ। इस अभिषेक के लिए विशेष शुल्क देकर टिकट लेना पड़ता है।</p>
<p>हम गर्भगृह से बाहर निकल आए। दूसरी ओर स्थित माता के मन्दिर में हमने पूजा-अर्चना की। कुछ देर मन्दिर के विशाल प्रांगण में बैठे रहे। फिर पीछे की ओर लगे काउंटर से हमने प्रसाद लिया और मन्दिर से बाहर निकल आए। </p>
<p>आगे का विवरण अगले चिट्ठे में।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पंचेश्वर मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=374</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 04:01:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/07/02/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[ सुरेन्द्रपुरी मन्दिर में प्रवेश कर ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">सुरेन्द्रपुरी मन्दिर में प्रवेश कर हमने सामने देखें नौ ग्रह के नौ मन्दिर जिसके बाद एक कमान लगी है।</p>
<p>इस कमान के बीच में है सात अश्वों (घोड़ों) के रथ पर विराजे सूर्यदेव जिनके पीछे बनी सूर्य की आकृति धूप में सूरज की तरह दमक रही थी -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3041.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3041.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-308" /></a></p>
<p>कमान के भीतर कुछ नहीं है पर कमान के बाएँ भाग पर नीचे तेलुगु में लिखा है - सूर्यचन्द्र मुख द्वारम जिसके हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। शायद यहाँ बाद में मन्दिर बनें। इसके ठीक सामने है मुख्य मन्दिर -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr7.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr7.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-381" /></a></p>
<p>यहाँ तीन गर्भ गृह है। चित्र में जहाँ द्वार पर शिवलिंग दिखाई दे रहा है, पहले हम उसी ओर के गर्भ गृह में गए जहाँ पंचेश्वर रूप में शिवलिंग स्थापित है। पंचेश्वर रूप में शिवलिंग में चारों ओर पार्वती जी की भी आकृति होती है। इसीलिए दर्शन की भी व्यवस्था कुछ अलग है।</p>
<p>आमतौर पर गर्भ गृह में सामने कपाट होते है जहाँ से दर्शन किए जाते है और शेष तीनों ओर दीवारें होती है जिससे परिक्रमा के दौरान मूर्ति के दर्शन नहीं किए जा सकते तथा परिक्रमा पूरी कर सामने से ही फिर दर्शन किए जाते है। यहाँ दीवारों की जगह जाली लगी है। </p>
<p>सामने से शिव-पार्वती के दर्शन किए गए जिसके बाद परिक्रमा करते समय बाएँ, पीछे और दाहिनी ओर से भी जाली में से शिव-पार्वती के दर्शन किए गए। </p>
<p>फिर हम बीच के गर्भ गृह में आए और पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। मूर्ति वैसी ही है जैसी प्रवेश द्वार से भीतर आते ही परिसर में हमने देखी थी।</p>
<p>इसके बाद तीसरा और अंतिम गर्भ गृह बालाजी का है जैसा कि आप ऊपर के चित्र में देख सकते है जहाँ एक ओर शिवलिंग और दूसरी ओर बालाजी की आकृति बनी है। ठीक ऐसी ही मूर्ति गर्भ गृह में स्थापित है।</p>
<p>आन्ध्र प्रदेश में विष्णु जी के बालाजी अवतार को ही अधिक माना जाता है इसीलिए यहाँ के लगभग हर बड़े मन्दिर में बालाजी की मूर्ति होती है।</p>
<p>हम दर्शन कर बाहर आए और सुरेन्द्रपुरी से बाहर निकल आए।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नौ मन्दिर में नौ ग्रह]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=342</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/06/30/%e0%a4%a8%e0%a5%8c-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a5%8c-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9/</guid>
<description><![CDATA[ सुरेन्द्रपुरी मन्दिर परिसर में बाएँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">सुरेन्द्रपुरी मन्दिर परिसर में बाएँ कोने में मन्दिर का प्रवेश द्वार है - शेषनाग पर ब्रह्मा विष्णु महेश की मूर्तियाँ</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr3.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-344" /></a></p>
<p>प्रवेश द्वार से भीतर रंग-बिरंगे कलश नज़र आ रहे है, ये है नौ ग्रह के नौ मन्दिर -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr4.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-347" /></a></p>
<p>एक बड़े चबूतरे पर नौ छोटे मन्दिर है। हर ग्रह का एक मन्दिर यानि नौ ग्रह के नौ मन्दिर। हर मन्दिर में एक ग्रह की मूर्ति है। मूर्तियों की स्थापना अलग-अलग दिशाओं में ठीक वैसे ही है जैसे आमतौर पर मन्दिरों में होती है। यहाँ हर ग्रह की अलग-अलग परिक्रमा भी की जा सकती है और नौ ग्रह की एक साथ भी परिक्रमा की जा सकती है जैसा कि आमतौर पर करते है।</p>
<p>जिस दिशा में मूर्ति स्थापित है उसी ओर किवाड़ है। इस तरह इस बड़े चबूतरे पर इन मन्दिरों के बीच से घूमते हुए एक-एक मन्दिर में एक-एक ग्रह के दर्शन करने पड़ते है। वैसे सभी किवाड़ बन्द थे पर किवाड़ का ऊपरी आधा भाग जाली से बना होने से मूर्तियाँ हम देख पाए। लगता है दर्शनों के लिए अभी इसे अधिकृत तौर पर खोला नहीं गया है क्योंकि मन्दिर इस समय खुला था।  </p>
<p>ग्रहों के अनुसार मन्दिरों के रंग है जैसे शनि महाराज की मूर्ति जिस मन्दिर में है उस मन्दिर का रंग गहरा गुलाबी है। राहु ग्रह का मन्दिर स्लेटी रंग का है। चन्द्र ग्रह के मन्दिर सफ़ेद है।</p>
<p>मैनें ऐसी व्यवस्था पहली बार देखी। आमतौर पर मन्दिर में सभी देवी-देवताओं के दर्शन करने के बाद नौ ग्रह के दर्शन किए जाते है और यह माना जाता है कि नौ ग्रह के दर्शन के बाद फिर मन्दिर में देवी-देवता के दर्शन नहीं किए जाने चाहिए। इसीलिए मन्दिरों में अक्सर बाहरी ओर एक चबूतरे पर ही नौ ग्रह की मूर्तियाँ स्थापित की जाती है जिनके दर्शन कर परिक्रमा करने के बाद सीधे बाहर जा सकें। </p>
<p>यहाँ प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही नौ ग्रह है, लगता है यह प्रवेश द्वार अस्थायी है और बाद में इसे बाहर निकलने का द्वार रख कर मन्दिर का प्रवेश द्वार बीच में रखेगें जैसा कि मैनें पिछले चिट्ठे में बताया।</p>
<p>प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही दाहिनी ओर यानि नौ ग्रह मन्दिर के ठीक सामने दो ही दुकानें थी जहाँ पूजापा (पूजा की सामग्री) बिक रही थी। कोई बाज़ार यहाँ नज़र नहीं आया।</p>
<p>नौ ग्रह मन्दिर के बाद जैसा कि चित्र में एक कमान सी नज़र आ रही है, यहाँ विराजमान है सूर्यदेवता, पूरी जानकारी अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुरेन्द्रपुरी में त्रिशक्ति]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=309</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 04:19:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/06/27/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%95/</guid>
<description><![CDATA[ गायत्री माँ और नरसिंह भगवान की मूर्ति]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mnagal" size="3">गायत्री माँ और नरसिंह भगवान की मूर्ति के पास है त्रिशक्ति - गजलक्ष्मी,  हंसवाहिनी और शेरांवाली</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr5.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr5.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-314" /></a></p>
<p>अष्टलक्ष्मी - धन लक्ष्मी,  धान्य लक्ष्मी,  वर लक्ष्मी,  सन्तान लक्ष्मी,  गज लक्ष्मी,  विजय लक्ष्मी,  वैभव लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी में से यहाँ लक्ष्मी जी अपने गज ल्क्ष्मी रूप में है जहाँ दोनों ओर ऐरावत फूलमाला लिए उनके स्वागत में है और कमल आसन पर कलश से स्वर्ण मुद्राएँ गिर रही है।   </p>
<p>एक ओर है वीणावादिनी सरस्वती जो हाथों में वीणा लिए हंस पर विराजमान है और दूसरी ओर है शेर की सवारी कर रही माँ दुर्गा -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3050.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3050.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-297" /></a></p>
<p>देख कर ऐसा लग रहा था कि शायद बाद में इसे ही मुख्य मन्दिर का प्रवेश द्वार बनाया जाएगा -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr6.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr6.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-323" /></a></p>
<p>यहाँ तेलुगु में लिखा भी है गुड़ी दारि। तेलुगु में गुड़ी का अर्थ है मन्दिर और मार्ग को दारि कहते है। </p>
<p>यहाँ से आगे बने मन्दिर के कलश तक दीवार पर कतार में शिवलिंग को हार चढाते हाथियों की आकृतियाँ है। कलश के पास तेलुगु में बड़े अक्षरों में मन्दिर का नाम लिखा है - सुरेन्द्रपुरी पंचमुखी </p>
<p>इसी के आगे अंत में शेषनाग पर ब्रह्मा विष्णु महेश की मूर्तियाँ है जो इस समय मन्दिर में भीतर जाने का प्रवेश द्वार है जिसका विवरण अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुरेन्द्रपुरी में पंचमुखी देव]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=301</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 04:15:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/06/25/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96/</guid>
<description><![CDATA[ सुरेन्द्रपुरी में प्रवेश द्वार पर सु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">सुरेन्द्रपुरी में प्रवेश द्वार पर सुरेन्द्र देव की विशाल मूर्ति के पीछे थोड़ी ही दूरी पर है एक विशाल मूर्ति जो पंचमुखी हनुमान जी की है -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3055.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3055.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-292" /></a></p>
<p>यही मूर्ति पीछे से शिवजी के पंचेश्वर रूप की है -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3053.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3053.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-293" /></a></p>
<p>इस चित्र से यहाँ शेष रह गए छोटे पहाड़ भी देखे जा सकते है।</p>
<p>आगे बढ कर हमने देखा दाहिनी ओर (अपनी दाहिनी ओर तथा मन्दिर की बाईं ओर)  निर्माण कार्य चल रहा है। सबसे दाहिने मन्दिर के सफ़ेद कलश है जो हनुमान जी के चित्र में देखे जा सकते है। यहाँ हिमालय पर्वत पर शिवजी विराजमान है पर मन्दिर पूरा बना नहीं है। </p>
<p>इसके बाईं ओर भी एक मन्दिर का काम चालू है पर अभी स्पष्ट नहीं है कि कौन सा मन्दिर है। इसके बाईं ओर है विशाल मूर्ति शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी पंचमुखी गायत्री माँ की -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-310" /></a></p>
<p>जिसके पास ही है नरसिंह भगवान की मूर्ति जो बहुत ही आकर्षक है जैसा कि आप इस चित्र में देख रहे है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gayatr2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gayatr2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-311" /></a></p>
<p>नरसिंह भगवान की जीभ बाहर निकली है जिसके दोनों ओर है नुकीले दाँत। जीभ के भीतरी छोर पर यानि मुख के अन्दर भी एक मूर्ति है जो शायद गणेश जी की है, सामने से तो ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था और पीछे निर्माण कार्य चलने से जा नहीं पाए।</p>
<p>हम बाईं ओर आगे बढते गए और देखते गए जिसकी जानकारी अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुरेन्द्रपुरी]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=299</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 04:11:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/06/23/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[ यादगिरी गुट्टा में नरसिंह भगवान के दर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">यादगिरी गुट्टा में नरसिंह भगवान के दर्शन कर हम हैदराबाद लौटने लगे। </p>
<p>कुछ ही दूरी पर बाईं ओर दूर से नज़र आई देवताओं की विशाल मूर्तियाँ और बड़ा परिसर जहाँ अभी कुछ निर्माण कार्य चल रहा था। हमने सोचा यहाँ देखे क्या है और गाड़ी रोक दी। </p>
<p>यह है परिसर का प्रवेश द्वार जिसके दाहिने बाँए है रक्षक के रूप में मूर्तियाँ। यह है दाहिने रक्षक -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3059.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3059.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-289" /></a></p>
<p>इस बोर्ड पर तेलुगु में लिखा है - श्री कन्ची कामामोटी,  जगदगुरू श्री शंकराचार्य संस्थानम  फिर बड़े अक्षरों में है मन्दिर का नाम सुरेन्द्रपुरी पंचमुखी फिर नीचे लिखा है हनुमन्दिश्वर देवस्थानम। इसके हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। </p>
<p>रक्षक के रूप में दो मूर्तियाँ है - काल देवता और नाग देवता की।</p>
<p>और यह है बाएँ रक्षक -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3058.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3058.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-290" /></a></p>
<p>वज्रमुश्ती और गरूण जिनके हाथ मे है बोर्ड जिस पर तेलुगु में लिखा है - सुरेन्द्रपुरी</p>
<p>दाएँ और बाएँ दोनों ओर के रक्षकों के पीछे जाली के दो प्रवेश द्वार लगे है जिसके बीच में गोलाकार हरे-भरे चबूतरे पर है यह विशाल मूर्ति -</p>
<p><a href="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3057.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/100_3057.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-291" /></a></p>
<p>मूर्ति के पीछे निर्माण कार्य चल रहा है और मूर्ति के नीचे धुँधले दिखाई दे रहे काले बोर्ड पर तेलुगु में लिखा है कि वज्र विजय के बाद ऐरावत पर विराजमान है सुरेन्द्र और आस-पास नृत्य कर रहे है उर्वशी,  मेनका,  रंभा…</p>
<p>ऊपर चित्र में आप देख सकते है ऐरावत पर सिंहासन पर विराजे इन्द्र और नीचे दाएँ-बाएँ उनका स्वागत करती मूर्तियाँ है और पीछे इन्द्र के सिंहासन पर नृत्य करती आकृतियाँ है जिसमें नर्तकियाँ नृत्य कर रही है और नर्तक गले में लटके डमरू बजा रहे है। पूरा उल्लास का वातावरण नज़र आता है इस भव्य और कलात्मक मूर्ति में।</p>
<p>ऐसा है शानदार सुरेन्द्रपुरी का प्रवेश द्वार। इस इन्द्रलोक में विराजमान देवी-देवताओं को देखें अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यादगिरी गुट्टा का पुराना मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=275</link>
<pubDate>Fri, 20 Jun 2008 04:16:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/06/20/%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[ वास्तव में लक्ष्मीनारायणा स्वामी मन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">वास्तव में लक्ष्मीनारायणा स्वामी मन्दिर के गर्भ गृह में जाते ही हम आश्चर्य चकित रह गए। </p>
<p>बहुत पहले जब हम यहाँ आए थे तब एक ही मूर्ति थी जो नरसिंह अवतार का वास्तविक स्वरूप था।</p>
<p>विष्णु जी के नरसिंह अवतार के वास्तविक रूप में मुखमण्डल गुस्से में तमतमाता है, जीभ बाहर निकली होती है जिसके दोनों किनारों से नुकीले दाँत निकले होते है। दोनों हाथों के नख (नाखून)  लम्बे होते है और लगता है अपने इन हाथों को आगे बढाते हुए रोष में आगे बढ रहे है और मुख से लगता है जैसे सिंह की गर्जना निकल रही हो। </p>
<p>बिल्कुल ऐसी ही मूर्ति थी पहले जिसे देख कर लगता था जैसे अभी-अभी हिरण्य कश्यप के दरबार के स्तम्भ से निकले हो और हिरण्य कश्यप का वध करने आगे बढ रहे हो। पर अब जो मूर्ति रखी है उसमें नरसिंह भगवान प्रसन्नचित्त है और लग रहा है जैसे आशीर्वाद दे रहे है।</p>
<p>मन्दिर की सीढियाँ उतरते हुए हम यही चर्चा कर रहे थे कि हमने देखा कुछ लोग एक पुरोहित जी को घेरे खड़े है और पुरोहित जी माइक पर बोली लगा रहे है और आस-पास साड़ियाँ और दुशाले रखे है। लोग बोली लगा कर इन साड़ियों और दुशालों को प्रसाद के रूप में खरीद रहे है।</p>
<p>हमें बताया गया कि जो चढावे में वस्त्र चढाते है उनके नाम और गोत्र लिख लिए जाते है जैसा कि हमने पिछले चिट्ठे में बताया था कि हमारा नाम और गोत्र भी लिखा गया। </p>
<p>इन सभी वस्त्रों को सवेरे अभिषेक के समय भगवान के सामने रखा जाता है और अभिषेक करते समय मंत्रोच्चार के साथ सभी के नाम-गोत्र भी बोले जाते है। फिर सभी वस्त्रों को एक-एक दिन बारी से भगवान पर चढाया जाता है फिर नीलाम किया जाता है जिसे श्रृद्धालु प्रसाद की तरह खरीदते है और इन पैसों को मन्दिर के कोष में जमा किया जाता है।</p>
<p>जब हमने पुरानी मूर्ति के बारे में पूछा तो बताया गया कि पुरानी मूर्ति पुराने मन्दिर में है। फिर हम नीचे उतर आए। इस बार भी चार सौ सीढियाँ नहीं उतरी और गाड़ी से ही नीचे आए।</p>
<p>पुराना मन्दिर एक से दो बजे तक बन्द रहता है। एक बज रहा था तो हमने सोचा कि भोजन करने के बाद ही मन्दिर जाएगें।</p>
<p>मन्दिर के जिस परिसर में हमने सुबह सबसे पहले प्रवेश किया था वहीं बाईं ओर का रास्ता पुराने मन्दिर का है। जैसे ही इस रास्ते पर आए हमने ताँगें देखे। पुराने मन्दिर की ओर या तो निजि गाड़ियाँ जा रही थी या ताँगे। वैसे कुछ लोग पैदल भी जा रहे थे। रास्ता लगभग दो किलोमीटर का था।</p>
<p>हम भी ताँगे से गए -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/ygutta2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/ygutta2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-288" /></a></p>
<p>मन्दिर के पास पहुँचे तो वहाँ तांगा स्टैंड भी था। किराया तय था - प्रति व्यक्ति दस रूपए।</p>
<p>मन्दिर परिसर में दाईं ओर पहाड़ पर जाती लगभग बीस-पच्चीस सीढियाँ चढ कर हम ऊपर पहुँचे। वैसे सीढियाँ न चढ पहाड़ पर चढ कर भी ऊपर पहुँचा जा सकता है।</p>
<p>बाईं ओर कुंड है। यह कुंड और भी गन्दा है, पर एक बात है यहाँ एक मोटे लोहे के पाइप से पानी कुंड में गिर रहा था और यह गिरता पानी बहुत साफ़ था। इसका मतलब किसी साफ़ जगह से नियमित पानी सप्लाई होता है।</p>
<p>कुंड के पास ही है हनुमान जी का मन्दिर। दर्शन कर हम नीचे उतर आए। फिर आगे मुख्य मन्दिर है। यहाँ भी नरसिंह भगवान की प्रसन्नचित्त मूर्ति है जो पहाड़ी से लगी सामने है यानि गुहा के भीतर नहीं है। हमने जब पुरानी मूर्ति के बारे में पूछा तो बताया गया कि पुरानी मूर्ति इस मूर्ति के ठीक पीछे पहाड़ी से लगी है। </p>
<p>इस तरह पुरानी मूर्ति या कहे नरसिंह अवतार के वास्तविक रूप की मूर्ति हमें वहाँ देखने को नहीं मिली। हो सकता है कि यह पुरानी मूर्ति खंडित हो गई हो और दर्शन के लिए नहीं रखी गई हो शायद…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यादगिरी गुट्टा का मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=286</link>
<pubDate>Wed, 18 Jun 2008 04:08:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
<guid>http://purvaai.hi.wordpress.com/2008/06/18/%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[ यादगिरी गुट्टा में लक्ष्मीनारायणा स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">यादगिरी गुट्टा में लक्ष्मीनारायणा स्वामी मन्दिर के परिसर में पहुँच कर हम पहले कुंड के पास गए। </p>
<p>पहले मन्दिर में प्रवेश करने से पहले कुंड में स्नान किया जाता था। पुरूष और बच्चे स्नान करते थे तथा महिलाएँ अक्सर हाथ-पैर धो लिया करती थी।</p>
<p>इस बार हमने कुंड देखा तो हैरान हो गए। पानी बहुत कम था। गन्दगी बहुत थी -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/ygutta1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/ygutta1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-287" /></a></p>
<p>यहाँ तक कि कुंड के पास स्थित छोटे से हनुमान मन्दिर के पास इतनी कीचड़ और कंजाल थी कि मन्दिर के भीतर जाना तो क्या बाहर से दर्शन करने के लिए खड़े रहना भी कठिन हो गया।</p>
<p>वास्तव में कुंड में स्नान करने के बाद कुंड के किनारे स्थित हनुमान जी के छोटे से मन्दिर में दर्शन करने के बाद मुख्य मन्दिर में जाना चाहिए। </p>
<p>हम कुंड के पास गए पर पानी छूने की हिम्मत नहीं हुई। मन्दिर के बाहर कठिनाई से खड़े होकर हनुमान जी के दर्शन किए और मुख्य मन्दिर की ओर बढ गए।</p>
<p>भीड़ बहुत थी, एक तो दूसरे शनिवार की आम छुट्टी और बड़ी एकादशी। हमने सोचा सीधे लाइन में लगेंगे तो पता नहीं दर्शन होने में कितना समय लग जाए, इसीलिए हमने शीघ्र दर्शन के टिकट लेने की सोची।</p>
<p>शीघ्र दर्शन का टिकट 25  रूपए का था और यहाँ भी भीड़ थी। हमने अति शीघ्र दर्शन का 100  रूपए का टिकट लिया। यहाँ भी कतार थी और हमें आधा घण्टा कतार में खड़ा होना पड़ा। इन दो के अलावा और कोई टिकट नहीं है। </p>
<p>आधे घण्टे की प्रतीक्षा के बाद हम दर्शन के लिए भीतर पहुँचे। भीतर कक्ष बड़ा है। दोनों ओर चार-चार सुनहरे स्तम्भ है। हर स्तम्भ के शीर्ष पर बैठे हुए सिंह की आकृति में विष्णु की नरसिंह अवतार की मूर्ति है। स्तम्भों के बीच में बड़े-बड़े चित्रों में राजा हिरण्य कश्यप, प्रहलाद और होलिका की कहानी दर्शाते चित्र है। </p>
<p>एक चित्र में राजा हिरण्य कश्यप का दरबार लगा है। एक चित्र में राज दरबार में बालक प्रहलाद हाथ बाँधे खड़ा हरि जाप कर रहा है और सभी दरबारी स्तब्ध है और राजा सिंहासन से उठ खड़े है। एक चित्र में आग में प्रहलाद हाथ जोड़े हरिनाम जप रहा है, होलिका पद्मासन की मुद्रा में बैठी है। ऐसे और भी चित्र है।</p>
<p>इस तरह यह कक्ष राजा हिरण्य कश्यप के दरबार की तरह बनाया गया है जहाँ हर स्तम्भ से नरसिंह अवतार में विष्णु भगवान निकल कर दरबार की चौखट पर हिरण्य कश्यप का वध करते है।</p>
<p>यह सब देखते हुए हम पहुँचे गर्भ गृह में जो पहाड़ की गुहा है। भीतर देखा विष्णु जी का नरसिंह अवतार लेकिन मुखमण्डल प्रसन्नचित्त और बाईं ओर विराजमान है लक्ष्मी जी। दाहिनी ओर विष्णु जी के तीन और अवतारों की मूर्तियाँ है - शेषनाग की छाया में विष्णु जी,  योग रूप में विष्णु जी और माया रूप में विष्णु जी।</p>
<p>हमने दर्शन किए। चढावा पुरोहित जी को दिया तो उसमें से सफ़ेद मोतियों की माला पुरोहित जी ने हुंडी मे डाल दी और दुशाला हमें लौटाते हुए बताया कि बाहर खड़े पुरोहित जी को देकर नाम और गोत्र लिखवा देना। दूसरे पुरोहित से हमने तीरथ लिया। प्रसाद के रूप में हमें मूर्ति से उतारी गई तुलसी दल की माला दी गई। इस तरह हम गुहा से लौटने लगे। नरसिंह अवतार और लक्ष्मी जी की मूर्तियाँ कुछ इस तरह से स्थापित की गई कि बाहर निकलते हुए भी दर्शन कर सकते है।</p>
<p>इस तरह दर्शन कर हम बाहर आए। आगे का विवरण अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नरसिंह भगवान का मन्दिर -  यादगिरी गुट्टा]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=253</link>
<pubDate>Mon, 16 Jun 2008 08:17:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ आन्ध्र प्रदेश के प्रमुख मन्दिरों में ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">आन्ध्र प्रदेश के प्रमुख मन्दिरों में से एक है - यादगिरी गुट्टा</p>
<p>तेलुगु भाषा में पहाड़ी को गुट्टा कहते है। विष्णु के नरसिंह अवतार को दक्षिण में यादगिरी स्वामी कहते है। इस तरह यादगिरी गुट्टा का अर्थ हुआ पहाड़ी पर नरसिंह अवतार यानि पहाड़ी पर स्थित नरसिंह अवतार का मन्दिर जिसे लक्ष्मीनारायणा स्वामी का मन्दिर कहा जाता है और यह स्थान यादगिरी गुट्टा कहलाता है।</p>
<p>आन्ध्र प्रदेश के नलगोण्डा ज़िला में स्थित यादगिरी गुट्टा अब हैदराबाद से दो घण्टे की दूरी पर है। पहले रास्ते ठीक नहीं थे इसीलिए चार घण्टे से भी अधिक समय लग जाता था। पिछले शनिवार हम सुबह-सवेरे घर से निकले और दो घण्टे में पहुँच गए यादगिरी गुट्टा -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/guttaa1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/guttaa1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-283" /></a></p>
<p>परिसर में प्रवेश करते ही बड़ा बाज़ार है। दोनों ओर पूजा-पाठ से संबंधित सभी सामग्री है। बाईं ओर होटल और लाँज भी है। सामने हरे-भरे वृक्षों में से जो पीला गुम्बद नज़र आ रहा है वो मन्दिर का प्रवेश द्वार है जहाँ से चार सौ से भी कुछ अधिक सीढियाँ चढ कर मन्दिर जाया जाता है।</p>
<p>इस प्रवेश द्वार के ऊपर पहाड़ी नज़र आ रही है जिस पर रंगीन तीन चिन्ह गढे गए है - बीच में त्रिशूल दाईं ओर शंख बाईं ओर सुदर्शन चक्र जिसके ऊपर मन्दिर के पीले कलश नज़र आ रहे है जिसमें से बाईं ओर का सबसे ऊपर का कलश नारयणा स्वामी मन्दिर का है।</p>
<p>बहुत पहले जब हम यहाँ आए थे तो सभी श्रृद्धालु इन चार सौ सीढियाँ चढ कर ही ऊपर जाते थे। इन सीढियों पर बन्दर बहुत थे जिनकी उछलकूद से बच्चे तो ख़ुश होते है पर बड़े बहुत ही सँभल चढा उतरा करते थे। यादगिरी गुट्टा के पूरे क्षेत्र में बहुत बन्दर थे जो धीरे-धीरे कम होते गए और अब हमें केवल एक ही बन्दर नज़र आया।</p>
<p>सीढियों के बाईं ओर से जाने वाली सड़क से गाड़ी से ऊपर जाया जाता है। अब तो यहाँ गाड़ियों की कतार नज़र आई और सीढियों पर बहुत ही कम लोग नज़र आए। पहले केवल मन्दिर की ही एक बस थी जो श्रृद्धालुओं को ऊपर तक ले जाती थी बाद में बस बन्द हो गई। लोग निजि वाहनों से ऊपर जाने लगे और साथ ही टैम्पों, आँटो शुरू हुए। </p>
<p>और हाँ तांगा भी था जिस पर लोग शौकिया जाते थे। अब ऊपर जाने के लिए तांगे नहीं है। हम भी निजि गाड़ी से सड़क से ऊपर गए और सबसे पहले देखी यह कमान -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gutta21.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gutta21.jpg?w=300" alt="" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-284" /></a></p>
<p>बीचों-बीच विष्णु भगवान नरसिंह अवतार में है और उनकी बाईं जंघा पर विराजमान है लक्ष्मी -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/06/gutta22.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/06/gutta22.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-285" /></a></p>
<p>आगे बढने पर धर्मशाला है जिसमें श्रृद्धालुओं के ठहरने के लिए बहुत से कमरे है। यहाँ राज्य सरकार का गेस्ट हाउज़ भी है। यह परिसर भी बड़ा है। यहाँ भी बाज़ार है। </p>
<p>मन्दिर की चर्चा अगले चिट्ठे में…</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चामुंडेश्वरी मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=204</link>
<pubDate>Tue, 03 Jun 2008 04:10:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ मैसूर के महाराजा का महल देखने के बाद ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">मैसूर के महाराजा का महल देखने के बाद हम चल पड़े चामुंडेश्वरी मन्दिर की ओर।</p>
<p>जहाँ से चामुंडेश्वरी मन्दिर के लिए चढाई शुरू होती है वहीं से बाईं ओर निचला रास्ता ललिता महल की ओर जाता है। यह महल मैसूर की महारानी का है। अब यहाँ संग्रहालय है। </p>
<p>इसी निचले रास्ते के बाईं ओर है चन्दन के पेड़। जैसे-जैसे हम चढाई चढते गए हमें चन्दन के पेड़ों का जंगल सा नज़र आया पर बताया गया कि वास्तव में पेड़ बहुत कम हो गए है शायद इसका एक कारण तस्करी है। ख़ैर… </p>
<p>इस दाहिने रास्ते पर हमारी गाड़ी चढाव चढती जा रही थी कि हमें एक बोर्ड दिखाई दिया जिस पर लिखा था यह दक्षिण की सबसे दुर्गम पहाड़ी है।</p>
<p>आगे जाने के बाद हमने देखी दाहिनी ओर स्थापित नन्दी की विशाल प्रतिमा। बहुत सुन्दर गढी गई है यह प्रतिमा। गले पर शिव, पार्वती, गणपति, कार्तिकेय की छोटी-छोटी आकृतियाँ है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/nandi1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/nandi1.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-216" /></a></p>
<p>हमने नन्दी की पूजा की परिक्रमा की। नन्दी के पिछली ओर छोटी सी गुफ़ा है जो चित्र में भी आपको नज़र आ रही है जिसमें बैठे-बैठे भीतर जाना पड़ता है। भीतर शिवलिंग है। भीतर जगह बड़ी है। पंडितजी भी विराजते है। पूजा हुई और प्रसाद बँटा। प्रसाद लेकर हम बैठे-बैठे गुफ़ा से बाहर आए।</p>
<p>नन्दी के मुख की ओर से ऊपर जाने के लिए सीढियाँ शुरू होती है। लगभग एक हज़ार सीढियाँ चढकर चामुंडेश्वरी मन्दिर जाया जाता है पर हमने बाईं ओर का सड़क का रास्ता लिया और गाड़ी से ऊपर गए।</p>
<p>ऊपर जहाँ गाड़ी पार्क की वहाँ बाज़ार लगा था जैसा कि आमतौर पर मन्दिरों के पास होता है। यहाँ एक चीज़ हमें नई और अच्छी लगी - लकड़ी की छोटी कलात्मक कलशनुमा डिबिया जो दस रूपए में एक बेची जा रही थी। </p>
<p>बताया गया कि इस डिबिया को मन्दिर में पुजारी को देने पर पुजारी चामुंडेश्वरी देवी पर चढाया गया कुमकुम इसमें भर कर प्रसाद के रूप में देंगें। चाहे तो एक से अधिक डिबिया भी ले सकते है जिससे दूसरों को भी देवी माँ का यह प्रसाद दे सकें। </p>
<p>पूजा की सामग्री हमनें खरीदी जिसमें सफ़ेद, हल्के और गहरे गुलाबी रंग के बहुत सुन्दर और ताज़े कमल के फूल अधिक थे जिसके साथ हमनें डिबिया भी खरीदी और बढ गए मन्दिर की ओर। इक्का-दुक्का बन्दर नज़र आने लगे। जैसे-जैसे हम मन्दिर के समीप बढते गए बन्दरों की संख्या भी बढती गई।</p>
<p>बाहर से मन्दिर  -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/nandi2.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/nandi2.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-217" /></a></p>
<p>गुम्बद पर देवी के सभी रूपों की कलाकृतियाँ उकेरी गई है -</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/nandi3.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/nandi3.jpg?w=225" alt="" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-218" /></a></p>
<p>भीतर पत्थर से बने इस मन्दिर में नीम अँधेरे में माँ चामुंडेश्वरी की विशाल प्रतिमा दमक रही थी। भीड़ अधिक नहीं थी। हमने पंडितजी को डिबिया के साथ पूजा की सामग्री दी और पंडितजी ने प्रसाद के साथ डिबिया में प्रसाद रूपी कुमकुम भी भर कर दिया। हम पूजा और परिक्रमा कर बाहर आए। पिछवाड़े छोटे से मन्दिर में गणपति और शिवलिंग भी है। यहाँ भी पूजा कर हम लौट आए।</p>
<p>यहाँ से हम बाहर निकले और हमारा अगला कार्यक्रम था वृन्दावन गार्डन की सैर पर रास्ते में हमने देखी पश्चिमी वाहिनी नदी। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि यह नदी पश्चिम दिशा से निकलती है जबकि सभी नदियाँ पूर्व दिशा से निकलती है। इसीलिए यहाँ तर्पण आदि कार्य सम्पन्न होते है। यहाँ शिवजी का छोटा सा मन्दिर भी है।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रंगनाथ स्वामी का मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 03:55:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ रंगनाथ स्वामी है शेषनाग की शैय्या पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">रंगनाथ स्वामी है शेषनाग की शैय्या पर विराजे विष्णु।</p>
<p>श्रीरंगपट्टनम का यह विष्णु मन्दिर टीपू सुल्तान ने बनवाया था। मन्दिर के बाहर भरा-भरा सा बाज़ार है। पूजा की सामग्री मिल रही है जिसमें तुलसीदल की माला प्रमुख है। पूजा की सामग्री लेकर हम भीतर पहुँचे।</p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/rangan1.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/rangan1.jpg?w=224" alt="" width="224" height="300" class="aligncenter size-medium wp-image-166" /></a></p>
<p>भीतर से आज भी यह मन्दिर प्राचीन मन्दिरों में से एक नज़र आता है। पत्थरों से बना है और ऊँची छत होने से यहाँ बहुत ठंडक है और नीम अँधेरा है।</p>
<p>हमने गलियारा पार किया और देखी सामने काले पत्थर से बनी विष्णु की विशाल मूर्ति।</p>
<p>शेषनाग की शैय्या पर विष्णु दाहिनी करवट लेटे है। शान्त मुख मुद्रा। शीर्ष पर शेषनाग के सात फन है। काले पत्थर से शेषनाग का आपस में जुड़ा एक-एक फन स्पष्ट नज़र आ रहा है यहाँ तक कि मुख से निकलने वाले बाल भी साफ़ दिखाई दे रहे थे। बाई ओर से विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी की छोटी सी मूर्ति।</p>
<p>दर्शन कर हम जैसे ही परिधि से बाहर आए तो देखा दाहिनी ओर छोटी तीन मूर्तियाँ - राम, लक्ष्मण और सीता की।</p>
<p>बाहर निकलते समय द्वार पर प्रसाद बिक रहा था। हमने दस रूपए दिए तो उसने एक लिफ़ाफ़े में पाँच लड्डू रख कर हमें दिए। हमने बाहर आकर जैसे ही लिफ़ाफ़ा खोल कर लड्डू को हाथ लगाया लड्डू भरभरा कर टूट गए। हमें आश्चर्य हुआ शक्कर मिलाकर रवे से बनाए गए ये लड्डू इतनी कोमलता से कैसे उसने सहेज कर लिफ़ाफ़े में रखे कि एकदम गोल और साबुत थे और हमारे छूने भर से ही भरभरा गए… </p>
<p>यह स्वादिष्ट प्रसाद ग्रहण कर हम आगे बढ गए।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बाल गोपाल का मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 04:54:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ बैंग्लोर से हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">बैंग्लोर से हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े मैसूर की ओर। </p>
<p>जी नहीं सीधे मैसूर नहीं… जैसे कि आमतौर पर कहा जाता है बैंग्लोर-मैसूर पर वास्तव में यह कुल चार स्थान है जिनमें से एक स्थान का ऐतिहासिक महत्व बहुत है - टीपू सुल्तान का श्रीरंगपट्टनम जिससे जुड़ा एक और स्थान है मंड्यार जिसे शुगर सिटी कहते है, यहाँ शक्कर के कारख़ाने अधिक है पर और कोई विशेष पर्यटन स्थल नहीं है इसीलिए इस स्थान का नाम हाशिए पर है।</p>
<p>तो हम निकले बैंग्लोर से… रास्ते में गरमा-गरम नाश्ता किया और आगे चल पड़े। सबसे पहले पहुँचे बालगोपाल के मन्दिर। जहाँ गाड़ी रूकी लगा यह पुराना शहर है। पुराने घर और टूटी-फूटी सी खंडहरनुमा जगह नज़र आई। वहाँ पत्थर के स्तम्भ भी नज़र आए लगा यहाँ कोई इमारत थी।</p>
<p>सुबह का ही समय था सो दो-तीन महिलाएँ फूलमालाएँ बेचती नज़र आई। शायद यहाँ बहुत कम लोग आते है और आस-पास की औरतें ही फूलमालाएँ बेच लेती है। दो तरह की मालाएँ थी - एक तो सफ़ेद फूलों की माला जो सामान्य थी पर दूसरी हरी ताज़ा दमकती हुई माला तुलसी दल की थी।</p>
<p>हमें ध्यान आया कि यह कृष्ण मन्दिर है और कृष्ण जी को तुलसी चढाई जाती है। वास्तव में दक्षिण में शिव मन्दिर अधिक है और आन्ध्रपदेश में कृष्ण जी की मूर्ति पर तुलसी दल चढा दिए जाते है और तुलसीदल की मालाएँ नहीं होती।</p>
<p>यहाँ हमने दोनों तरह की मालाएँ ली और मन्दिर की ओर बढे। बहुत ही पुराने ज़माने का मन्दिर लगा पत्थर से बना हुआ जिसमें बीच-बीच में पत्थर के स्तम्भ है। </p>
<p><a href="http://purvaai.files.wordpress.com/2008/05/baalgopal.jpg"><img src="http://purvaai.wordpress.com/files/2008/05/baalgopal.jpg?w=300" alt="" width="300" height="225" class="aligncenter size-medium wp-image-164" /></a></p>
<p>हमने दर्शन किए बालगोपाल के। बहुत ही सुन्दर सलोनी मूर्ति है। बताया गया कि जिनकी संतान नहीं होती वे महिलाएँ यहाँ पूजा करती है और संतान प्राप्ति की कामना करती है। </p>
<p>वैसे दक्षिण में गोपाल के मंदिर है ही कम और बालगोपाल का मंदिर यह एक ही नजर आया. यहाँ से निकल कर हम आगे बढे रंगनाथ स्वामी मंदिर की ओर।</font> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नन्दी मन्दिर का अनूठा श्रृंगार]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 08 May 2008 04:00:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ बैंग्लोर का मशहूर लाल बाग़ देख कर बाहर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">बैंग्लोर का मशहूर लाल बाग़ देख कर बाहर निकलते-निकलते अँधेरा घिर आया था। ट्रैफ़िक भी बहुत बढ गई थी। हम पहुँचे नन्दी मन्दिर। बहुत ही व्यस्त सड़क पर है नन्दी मन्दिर। </p>
<p>यहाँ अपना सामान रखने की व्यवस्था नहीं थी हमने सोचा भीतर कैमरा और सेलफोन ले जाने नहीं देंगें इसीलिए हमने यह सब गाड़ी में ही रख दिया और हमें मन्दिर के पास उतार कर गाड़ी बहुत आगे बढ गई पार्किंग के लिए। नतीजा ये हुआ कि हम एक भी तस्वीर नहीं ले पाए जबकि हमने देखा कि कुछ लोग सेलफोन के कैमरे से परिसर में तस्वीरें ले रहे थे।</p>
<p>यहाँ तीन जगह दर्शन करने थे - पहले गणपति फिर बाल हनुमान फिर मुख्य मन्दिर में नन्दी के आकार का शिवलिंग</p>
<p>मन्दिर का परिसर है तो बड़ा और दो द्वार भी है पर बाएँ द्वार से भीतर जाते ही पूजा की सामग्री बेचते लोग बैठे है और थोड़ा आगे बढते ही सामने विराजमान है गणपति। सड़क से भी गणपति के दर्शन किए जा सकते है। </p>
<p>सड़क अधिक चौड़ी नहीं है और सड़क के दूसरी ओर से भी गणपति नज़र आ रहे थे। पर सड़क इतनी व्यस्त और मन्दिर में बढती भीड़ से हम लौटते समय भी गणपति की तस्वीर नहीं ले पाए जबकि हमारा बहुत मन था और हमने कोशिश भी बहुत की थी। आखिर मूर्ति इतनी सुन्दर जो थी। </p>
<p>बड़ी पीली मूर्ति जिसकी सूँड और दोनों हाथों पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर लगभग चार इंच के लाल,  नीला,  हरा,  जामुनी जैसे गहरे रंगों के चकते से लगे थे जो ऐसे लग रहे थे मानो रेशमी साड़ी की बार्डर के टुकड़े हो। जब दर्शन के लिए पास गए तो देखा कि यह पेन्टिंग है जिस तरह आँखों और माथे पर तिलक के लिए पेन्टिंग की जाती है वैसी ही कलाकारी थी। वास्तव में तारीफ़ उस कलाकार की। </p>
<p>दर्शन के बाद परिक्रमा के लिए बहुत बड़ा स्थान। बाईं ओर से कुछ सीढियाँ चढना और फिर चलते हुए परिक्रमा करते हुए दाहिनी ओर फिर सीढियाँ उतरते हुए परिक्रमा पूरी करना। उस स्थान की चौड़ाई इतनी कि एक साथ भीड़ की भीड़ परिक्रमा कर सकें। </p>
<p>इस तरह बाईं ओर गणपति के दर्शन के बाद हम परिसर में आगे बढे और गणपति मंदिर के लगभग पीछे देखा बाल हनुमान का मन्दिर। हमनें पहली बार देखा बाल हनुमान का मन्दिर।</p>
<p>हनुमान जी का स्मरण करने से ही हम एक ऐसी मूर्ति की कल्पना करते है जिस पर तेल चढा है और सिन्दूर पुता है। लेकिन यह तो बाल हनुमान है इसीलिए मूर्ति काले पत्थर की है।</p>
<p>छोटा सा सलोना मुखड़ा बैठे हुए बाल हनुमान का वैसे बैठे हुए दिखते नहीं है सिर्फ़ अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। मुखड़े के चारों ओर पान के बीड़ों की मालाएँ। कुल पाँच मालाएँ थी। आमतौर पर होता यह है कि मालाएँ एक के ऊपर एक या एक दूसरे में उलझी होती है पर यहाँ व्यवस्थित रूप से मुखड़े के गोलाकार कुछ दूरी बनाए रखते हुए थी। अंतिम दो मालाओं के बीच से सामने की ओर पूँछ निकली थी।   </p>
<p>यह मन्दिर परिसर का पिछला भाग था। यहाँ से दूसरी ओर यानि मन्दिर में दाहिनी ओर मुख्य मन्दिर है जो नन्दी मन्दिर है। यहाँ नन्दी के आकार में शिवलिंग है। मूर्ति के एकदम निचले भाग में देखने पर लगेगा नन्दी विराजमान है पर नज़र थोड़ा ऊपर उठाने पर शिवलिंग देख सकते है। पूरी दृष्टि में बीच में शिवलिंग और दोनों किनारों के आकार नन्दी के मुखड़े और पूँछ से लगेंगे।</p>
<p>बहुत अच्छा लगा हमें यह अनूठा नन्दी मन्दिर देखना और इसी के साथ हमारी बैंग्लोर की यात्रा समाप्त हुई। हमने रात का खाना खाया और तान कर सो गए क्योंकि दूसरे दिन सुबह जल्दी ही हमें रवाना होना था मैसूर।</font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बैंग्लोर का शिव मन्दिर]]></title>
<link>http://purvaai.wordpress.com/?p=139</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 04:11:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>anug</dc:creator>
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<description><![CDATA[ बैंग्लोर का यह शिव मन्दिर पुराना नहीं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code> <font face="Mangal" size="3">बैंग्लोर का यह शिव मन्दिर पुराना नहीं है। अभी भी लगता है यहाँ निर्माण कार्य जारी है। यह मन्दिर चौबीस घण्टे खुला रहता है।</p>
<p>व्यस्त सडक पर एक छोटी संकरी गली में आगे ब