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	<title>महादेवी-वर्मा &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/महादेवी-वर्मा/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "महादेवी-वर्मा"</description>
	<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 21:24:06 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=131</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 04:44:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=131</guid>
<description><![CDATA[तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!
तारक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!</p>
<p>तारक में छवि प्राणों में स्मृति<br />
पलकों मे नीरव पद की गति<br />
लघु उर पुलकों की संसृति<br />
भर लाई हूँ तेरी चंचल<br />
और करूँ जग में संचय क्या!</p>
<p>तेरा मुख सहास अरुणोदय<br />
परछाई रजनी विषादमय<br />
यह जागृति वह नींद स्वप्नमय;<br />
खेल-खेल, थक-थक सोने दो<br />
मै समझूँगी सृष्टि-प्रलय क्या!</p>
<p>तेरा अधर-विचुम्बित प्याला<br />
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला<br />
तेरा ही मानस मधुशाला;<br />
फिर पूछूँ क्यों मेरे साकी!<br />
देते हो मधुमय विषमय क्या!</p>
<p>रोम-रोम में नन्दन पुलकित;<br />
साँस-साँस में जीवन शत-शत<br />
स्वप्न-स्वप्न में विश्व अपरिचित-<br />
मुझमें नित बनते-मिटते प्रिय!<br />
स्वर्ग मुझे क्या, निष्क्रिय लय क्या!</p>
<p>हारूँ तो खोऊँ अपनापन,<br />
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन,<br />
जीत बनूँ तेरा ही बन्धन;<br />
भर लाऊँ सीपी में सागर<br />
प्रिय! मेरी अब हार-विजय क्या!</p>
<p>चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम,<br />
मधुर राग तू मैं स्वरसंगम,<br />
तू असीम मै सीमा का भ्रम,<br />
काया-छाया में रहस्यमय!<br />
प्रेयसि-प्रियतम का अभिनय क्या!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जाग तुझको दूर जाना!]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=130</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 04:31:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=130</guid>
<description><![CDATA[चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त बाना!<br />
जाग तुझको दूर जाना!</p>
<p>अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कंप हो ले,<br />
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्‍योम रो ले;</p>
<p>आज पी अलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,<br />
जाकर विद्युत-शिखाओ में निठूर तूफ़ान बोले!</p>
<p>पर तूझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!<br />
जाग तुझको दूर जाना!</p>
<p>बाँध लेंगे क्‍या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?<br />
पंथ की बाधा बनेंगे तितलयों के पर रंगीले?</p>
<p>विश्‍व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,<br />
क्‍या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?</p>
<p>तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!<br />
जाग तुझको दूर जाना!</p>
<p>वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,<br />
दे किसे जीवन सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?</p>
<p>सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्‍या?<br />
विश्‍व का अभिशाप क्‍या चिर नींद बनकर पास आया?</p>
<p>अमरता-सुत चाहता क्‍यों मृत्‍यु के उर में बसना?<br />
जाग तुझको दूर जाना!</p>
<p>कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,<br />
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;</p>
<p>हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,<br />
राख क्षणिक पतंग को है अमर दीपक की निशानी!</p>
<p>है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!<br />
जाग तुझको दूर जाना!</p>
<p><strong>Note</strong>: This is one of my fav poem which I read in class 11th in NCERT hindi textbook.. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब यह दीप थके]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=129</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 04:05:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=129</guid>
<description><![CDATA[जब यह दीप थके तब आना।
यह चंचल सपने भोले ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;">जब यह दीप थके तब आना।</p>
<p style="text-align:center;">यह चंचल सपने भोले है,<br />
दृग-जल पर पाले मैने, मृदु<br />
पलकों पर तोले हैं;<br />
दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों मे पहुँचाना!</p>
<p style="text-align:center;">साधें करुणा-अंक ढली है,<br />
सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर<br />
पावस की सजला बदली है;<br />
विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!</p>
<p style="text-align:center;">यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,<br />
सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,<br />
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;<br />
दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!</p>
<p style="text-align:center;">यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के<br />
चिर उज्जवल अक्षर जीवन की<br />
बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;<br />
कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!</p>
<p style="text-align:center;">लौ ने वर्ती को जाना है<br />
वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने<br />
रज का अंचल पहचाना है;<br />
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=128</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 03:24:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=128</guid>
<description><![CDATA[बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! 
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! </p>
<p>नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में,<br />
प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में,<br />
प्रलय में मेरा पता पदचिन्‍ह जीवन में,<br />
शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में<br />
कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ!<br />
बीन भी हूँ मैं... </p>
<p>नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ,<br />
शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ,<br />
फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ,<br />
एक होकर दूर तन से छाँह वह चल हूँ,<br />
दूर तुमसे हूँ अखंड सुहागिनी भी हूँ!<br />
बीन भी हूँ मैं... </p>
<p>आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के,<br />
शून्य हूँ जिसके बिछे हैं पाँवड़े पलके,<br />
पुलक हूँ जो पला है कठिन प्रस्तर में,<br />
हूँ वही प्रतिबिम्ब जो आधार के उर में,<br />
नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ!<br />
बीन भी हूँ मैं... </p>
<p>नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी<br />
त्याग का दिन भी चरम आसिक्त का तम भी,<br />
तार भी आघात भी झंकार की गति भी,<br />
पात्र भी, मधु भी, मधुप भी, मधुर विस्मृति भी,<br />
अधर भी हूँ और स्‍िमत की चांदनी भी हूँ </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पूछता क्यों शेष कितनी रात?]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 03:19:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=126</guid>
<description><![CDATA[पूछता क्यों शेष कितनी रात? 
छू नखों की क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पूछता क्यों शेष कितनी रात? </p>
<p>छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू<br />
स्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्जल-दिशा में हँस चला तू<br />
परिधि बन घेरे तुझे, वे उँगलियाँ अवदात! </p>
<p>झर गये ख्रद्योत सारे,<br />
तिमिर-वात्याचक्र में सब पिस गये अनमोल तारे;<br />
बुझ गई पवि के हृदय में काँपकर विद्युत-शिखा रे!<br />
साथ तेरा चाहती एकाकिनी बरसात! </p>
<p>व्यंग्यमय है क्षितिज-घेरा<br />
प्रश्नमय हर क्षण निठुर पूछता सा परिचय बसेरा;<br />
आज उत्तर हो सभी का ज्वालवाही श्वास तेरा!<br />
छीजता है इधर तू, उस ओर बढता प्रात! </p>
<p>प्रणय लौ की आरती ले<br />
धूम लेखा स्वर्ण-अक्षत नील-कुमकुम वारती ले<br />
मूक प्राणों में व्यथा की स्नेह-उज्जवल भारती ले<br />
मिल, अरे बढ़ रहे यदि प्रलय झंझावात। </p>
<p>कौन भय की बात।<br />
पूछता क्यों कितनी रात? </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फूल]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=125</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 03:17:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=125</guid>
<description><![CDATA[मधुरिम के मधु के अवतार
सुधा से सुषमा स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मधुरिम के मधु के अवतार<br />
सुधा से सुषमा से छविमान<br />
आंसुओं में सहमे अभिराम<br />
तारकों से हे मूक अजान!<br />
सीख कर मुस्काने की बान<br />
कहां आऎ हो कोमल प्राण!</p>
<p>स्निग्ध रजनी से लेकर हास<br />
रूप से भर कर सारे अंग<br />
नये पल्लव का घूंघट डाल<br />
अछूता ले अपना मकरंद<br />
ढूढं पाया कैसे यह देश<br />
स्वर्ग के हे मोहक संदेश!</p>
<p>रजत किरणों से नैन पखार<br />
अनोखा ले सौरभ का भार<br />
छ्लकता लेकर मधु का कोष<br />
चले आऎ एकाकी पार<br />
कहो क्या आऎ हो पथ भूल<br />
मंजु छोटे मुस्काते फूल!</p>
<p>उषा के छू आरक्त कपोल<br />
किलक पडता तेरा उन्माद<br />
देख तारों के बुझते प्राण<br />
न जाने क्या आ जाता याद<br />
हेरती है सौरभ की हाट<br />
कहो किस निर्मोही की बाट!</p>
<p>चांदनी का श्रृंगार समेट<br />
अधखुली आंखों की यह कोर<br />
लुटा अपना यौवन अनमोल<br />
ताकती किस अतीत की ओर<br />
जानते हो यह अभिनव प्यार<br />
किसी दिन होगा कारगार!</p>
<p>कौन है वह सम्मोहन राग<br />
खींच लाया तुमको सुकुमार<br />
तुम्हें भेजा जिसने इस देश<br />
कौन वह है निष्ठुर करतार<br />
हंसो पहनो कांटों के हार<br />
मधुर भोलेपन का संसार!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सब आँखों के आँसू उजले]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=123</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 03:08:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=123</guid>
<description><![CDATA[सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;">सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में सत्‍य पला!<br />
जिसने उसको ज्‍वाला सौंपी<br />
उसने इसमें मकरंद भरा,<br />
आलोक लुटाता वह घुल-घुल<br />
देता झर यह सौरभ बिखरा!<br />
दोनों संगी, पथ एक किंतु कब दीप खीला कब फूल जला?</p>
<p style="text-align:center;">वह अचल धरा को भेंट रहा<br />
शत-शत निर्झर में हो चंचल,<br />
चिर परिधि बना भू को घेरे<br />
इसका उर्मिल नित करूणा-जल<br />
कब सागर उर पाषाण हुआ, कब गिरि ने निर्मम तन बदला?</p>
<p style="text-align:center;">नभ तारक-सा खंडित पुलकित<br />
यह क्षुर-धारा को चूम रहा,<br />
वह अंगारों का मधु-रस पी<br />
केशर-किरणों-सा झुम रहा,<br />
अनमोल बना रहने को कब टूटा कंचन हीरक पिघला?</p>
<p style="text-align:center;">नीलम मरकत के संपुट दो<br />
जिमें बनता जीवन-मोती,<br />
इसमें ढलते सब रंग-रुप<br />
उसकी आभा स्‍पदन होती!<br />
जो नभ में विद्युत-मेघ बना वह रज में अंकुर हो निकला!</p>
<p style="text-align:center;">संसृति के प्रति पग में मेरी<br />
साँसों का नव अंकन चुन लो,<br />
मेरे बनने-मिटने में नित<br />
अपने साधों के क्षण गिन लो!<br />
जलते खिलते जग में घुलमिल एकाकी प्राण चला!</p>
<p style="text-align:center;">सपने सपने में सत्‍य ढला!</p>
<p><strong>Note</strong>: Class 11th mein padhi thee.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बताता जा रे अभिमानी! ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/?p=76</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 14:48:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/?p=76</guid>
<description><![CDATA[बताता जा रे अभिमानी!
कण-कण उर्वर करते ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code>बताता जा रे अभिमानी!</p>
<p>कण-कण उर्वर करते लोचन<br />
स्पन्दन भर देता सूनापन<br />
जग का धन मेरा दुख निर्धन<br />
तेरे वैभव की भिक्षुक या<br />
कहलाऊँ रानी!<br />
बताता जा रे अभिमानी!</p>
<p>दीपक-सा जलता अन्तस्तल<br />
संचित कर आँसू के बादल<br />
लिपटी है इससे प्रलयानिल,<br />
क्या यह दीप जलेगा तुझसे</p>
<p>भर हिम का पानी?<br />
बताता जा रे अभिमानी!</p>
<p>चाहा था तुझमें मिटना भर<br />
दे डाला बनना मिट-मिटकर<br />
यह अभिशाप दिया है या वर;<br />
पहली मिलन कथा हूँ या मैं</p>
<p>चिर-विरह कहानी!<br />
बताता जा रे अभिमानी!</code></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम कवि हैं या मसखरे]]></title>
<link>http://hariharjhahindi.wordpress.com/2007/11/08/110/</link>
<pubDate>Thu, 08 Nov 2007 00:21:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>Harihar Jha हरिहर झा</dc:creator>
<guid>http://hariharjhahindi.wordpress.com/2007/11/08/110/</guid>
<description><![CDATA[हम कवि हैं या मसखरे
सब को हँसाते
जनता क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हम कवि हैं या मसखरे<br />
सब को हँसाते<br />
जनता का दिल लुभाते<br />
कविता याने कि कैसी हो<br />
बहती नदी जैसी हो<br />
पहले कविता लिखी छन्द में<br />
बोले संपादक जी - अमां यार<br />
कुछ नया लिखो कि कविता संवरे<br />
क्या ये कलि और भंवरे!<br />
गये कालिदास के जमाने<br />
ये हटाओ नागफनी, लगाओ कैक्टस<br />
मैंने देखा - सिसक रही कविता<br />
दहेज की सताई सुहागिन की तरह<br />
मैं बहुत रोया<br />
शब्दों को अंग्रेजी में धोया<br />
हर पंक्ति मुझसे सवाल पूछती<br />
और बवाल मचाती<br />
अपने चेहरे पर घाव दिखाती<br />
तो चढ़ा दिये उस पर मुखौटे<br />
अब कौन नीर भरी<br />
कौन दुख की बदली<br />
ऐसी लाइन पर लाइन बदली<br />
कि ले आये सीधे<br />
रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रक का हार्न<br />
वेयर आइ वाज़ बोर्न !<br />
गलत सलत<br />
सब कुछ चलत<br />
खड़े हो गये मंच पर<br />
अध्यक्ष बोले - करो बातुनी स्त्रियों पर व्यंग्य<br />
मैं रह गया दंग<br />
आवाज आई - बोलो कुछ<br />
पत्नी की राजनीति पर, नहीं..हनीमून में आपबीती पर<br />
नहीं… नहीं… हिजड़ों की संस्कृति पर<br />
तंग आकर हमने<br />
एक जोक सुना दी - नोन वेजिटेरियन<br />
जिसके आर पार<br />
फूहड़पन का व्यापार<br />
हुई तालियों की गड़गड़ाहट<br />
मुझे घोषित किया - श्रेष्ठ कवि.. एक महाकवि<br />
मैं खुश, श्रोता खुश<br />
स्वर्ण-पदक दिया गया<br />
हँसाती चैनल ने सराहा<br />
पर भीतर से मेरा दिल कराहा<br />
शरम आई मुझे अपनी सफलता पर<br />
तीर चुभ गया<br />
काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती<br />
तो कविता की मेरे हाथों<br />
दुर्गति न होती ।</p>
<p><a href="http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/57-25-09.html">http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/57-25-09.html</a></p>
<p>For Paradox:</p>
<p><a href="http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-paradox/">http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-paradox/</a></p>
<p>OR</p>
<p><a href="http://hariharjha.wordpress.com/">http://hariharjha.wordpress.com</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%8f/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 16:07:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%8f/</guid>
<description><![CDATA[फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?
इन तलवों मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?<br />
इन तलवों में गति-परमिल है,</p>
<p>झलकों में जीवन का जल है,</p>
<p>इनसे मिल काँटे उड़ने को रोये झरने को मुसकाये!<br />
ज्वाला के बादल ने घिर नित,</p>
<p>बरसाये अभिशाप अपरिमित,</p>
<p>वरदानों में पुलके वे जब इस गीले अंचल में आये!<br />
मरु में रच प्यासों की वेला,</p>
<p>छोड़ा कोमल प्राण अकेला,</p>
<p>पर ज्वारों की तरणी ले ममता के शत सागर लहराये!<br />
घेरे लोचन बाँधे स्पन्दन,</p>
<p>रोमों से उलझाये बन्धन,</p>
<p>लघु तृण से तारों तक बिखरी ये साँसें तुम बाँध न पाये!<br />
देता रहा क्षितिज पहरा-सा,</p>
<p>तम फैला अन्तर गहरा-सा,</p>
<p>पर मैंने युग-युग से खोये सब सपने इस पार बुलाये!<br />
मेरा आहत प्राण न देखो,</p>
<p>टूटा स्वर सन्धान न लेखो,</p>
<p>लय ने बन-बन दीप जलाये मिट-मिट कर जलजात खिलाये!<br />
फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पंथ होने दो अपरिचित ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%a5-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 20:22:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
<guid>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%a5-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4/</guid>
<description><![CDATA[पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पंथ होने दो अपरिचित<br />
प्राण रहने दो अकेला!</p>
<p>और होंगे चरण हारे,<br />
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;<br />
दुखव्रती निर्माण-उन्मद<br />
यह अमरता नापते पद;<br />
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!</p>
<p>दूसरी होगी कहानी<br />
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;<br />
आज जिसपर प्यार विस्मित,<br />
मैं लगाती चल रही नित,<br />
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!</p>
<p>हास का मधु-दूत भेजो,<br />
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;<br />
ले मिलेगा उर अचंचल<br />
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,<br />
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मिटने का अधिकार ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 20:21:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[वे मुस्काते फूल नहीं
जिनको आता है मुर्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वे मुस्काते फूल नहीं<br />
जिनको आता है मुर्झाना,<br />
वे तारों के दीप नहीं<br />
जिनको भाता है बुझ जाना</p>
<p>वे सूने से नयन,नहीं<br />
जिनमें बनते आंसू मोती,<br />
वह प्राणों की सेज,नही<br />
जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती</p>
<p>वे नीलम के मेघ नहीं<br />
जिनको है घुल जाने की चाह<br />
वह अनन्त रितुराज,नहीं<br />
जिसने देखी जाने की राह</p>
<p>ऎसा तेरा लोक, वेदना<br />
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,<br />
जलना जाना नहीं नहीं<br />
जिसने जाना मिटने का स्वाद</p>
<p>क्या अमरों का लोक मिलेगा<br />
तेरी करुणा का उपहार<br />
रहने दो हे देव अरे<br />
यह मेरे मिटने क अधिकार</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं नीर भरी दुख की बदली]]></title>
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<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 19:27:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैं नीर भरी दु:ख की बदली!<br />
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,<br />
क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,<br />
नयनों में दीपक से जलते,<br />
पलकों में निर्झर्णी मचली!</p>
<p>मेरा पग पग संगीत भरा,<br />
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,<br />
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,<br />
छाया में मलय बयार पली,</p>
<p>मैं क्षितिज भ्रकुटि पर घिर धूमिल,<br />
चिंता का भार बनी अविरल,<br />
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,<br />
नव जीवन अंकुर बन निकली!</p>
<p>पथ न मलिन करता आना,<br />
पद चिन्ह न दे जाता जाना,<br />
सुधि मेरे आगम की जग में,<br />
सुख की सिहरन हो अंत खिली!</p>
<p>विस्तृत नभ का कोई कोना,<br />
मेरा न कभी अपना होना,<br />
परिचय इतना इतिहास यही<br />
उमडी कल थी मिट आज चली!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेरे दीपक]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 19:02:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[  मधुर मधुर मेरे दीपक जल!
युग युग प्रति]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>  मधुर मधुर मेरे दीपक जल!<br />
युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल;<br />
   प्रियतम का पथ आलोकित कर!</p>
<p>     सौरभ फैला विपुल धूप बन;<br />
     मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन;<br />
           दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,<br />
           तेरे जीवन का अणु गल-गल!<br />
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!</p>
<p>     सारे शीतल कोमल नूतन,<br />
     माँग रहे तुझको ज्वाला-कण;<br />
           विश्वशलभ सिर धुन कहता "मैं<br />
           हाय न जल पाया तुझमें मिल"!<br />
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!</p>
<p>     जलते नभ में देख असंख्यक;<br />
     स्नेहहीन नित कितने दीपक;<br />
           जलमय सागर का उर जलता;<br />
           विद्युत ले घिरता है बादल!<br />
विहंस-विहंस मेरे दीपक जल!</p>
<p>     द्रुम के अंग हरित कोमलतम,<br />
     ज्वाला को करते हृदयंगम;<br />
           वसुधा के जड़ अंतर में भी,<br />
           बन्दी नहीं है तापों की हलचल!<br />
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!</p>
<p>     मेरे निश्वासों से द्रुततर,<br />
     सुभग न तू बुझने का भय कर;<br />
           मैं अंचल की ओट किये हूँ,<br />
           अपनी मृदु पलकों से चंचल!<br />
सहज-सहज मेरे दीपक जल!</p>
<p>     सीमा ही लघुता का बन्धन,<br />
     है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन;<br />
           मैं दृग के अक्षय कोशों से -<br />
           तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!<br />
सजल-सजल मेरे दीपक जल!</p>
<p>     तम असीम तेरा प्रकाश चिर;<br />
     खेलेंगे नव खेल निरन्तर;<br />
           तम के अणु-अणु में विद्युत सा -<br />
           अमिट चित्र अंकित करता चल!<br />
सरल-सरल मेरे दीपक जल!</p>
<p>     तू जल जल होता जितना क्षय;<br />
     वह समीप आता छलनामय;<br />
           मधुर मिलन में मिट जाना तू -<br />
           उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल!<br />
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!</p>
<p>     प्रियतम का पथ आलोकित कर!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[व्यथा की रात ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:51:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?
ज्योत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?</p>
<p>ज्योति-शर से पूर्व का<br />
रीता अभी तूणीर भी है,<br />
कुहर-पंखों से क्षितिज<br />
रूँधे विभा का तीर भी है,<br />
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?</p>
<p>छंद-रचना-सी गगन की<br />
रंगमय उमड़े नहीं घन,<br />
विहग-सरगम में न सुन<br />
पड़ता दिवस के यान का स्वन,<br />
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।</p>
<p>रोकती पथ में पगों को<br />
साँस की जंजीर दुहरी,<br />
जागरण के द्वार पर<br />
सपने बने निस्तंद्र प्रहरी,<br />
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।</p>
<p>दीप को अब दूँ विदा, या<br />
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?<br />
दूँ बुझा, या ओट में रख<br />
दग्ध बाती को सँभालूँ ?<br />
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?<br />
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं प्रिय पहचानी नहीं ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:50:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[पथ देख बिता दी रैन
मैं प्रिय पहचानी नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पथ देख बिता दी रैन<br />
मैं प्रिय पहचानी नहीं !</p>
<p>तम ने धोया नभ-पंथ<br />
सुवासित हिमजल से;<br />
सूने आँगन में दीप<br />
जला दिये झिल-मिल से;<br />
आ प्रात बुझा गया कौन<br />
अपरिचित, जानी नहीं !<br />
मैं प्रिय पहचानी नहीं !</p>
<p>धर कनक-थाल में मेघ<br />
सुनहला पाटल सा,<br />
कर बालारूण का कलश<br />
विहग-रव मंगल सा,<br />
आया प्रिय-पथ से प्रात-<br />
सुनायी कहानी नहीं !<br />
मैं प्रिय पहचानी नहीं !</p>
<p>नव इन्द्रधनुष सा चीर<br />
महावर अंजन ले,<br />
अलि-गुंजित मीलित पंकज-<br />
-नूपुर रूनझुन ले,<br />
फिर आयी मनाने साँझ<br />
मैं बेसुध मानी नहीं !<br />
मैं प्रिय पहचानी नहीं !</p>
<p>इन श्वासों का इतिहास<br />
आँकते युग बीते;<br />
रोमों में भर भर पुलक<br />
लौटते पल रीते;<br />
यह ढुलक रही है याद<br />
नयन से पानी नहीं !<br />
मैं प्रिय पहचानी नहीं !</p>
<p>अलि कुहरा सा नभ विश्व<br />
मिटे बुद्‌बुद्‌‌‍-जल सा;<br />
यह दुख का राज्य अनन्त<br />
रहेगा निश्चल सा;<br />
हूँ प्रिय की अमर सुहागिनि<br />
पथ की निशानी नहीं !<br />
मैं प्रिय पहचानी नहीं !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौन तुम मेरे हृदय में ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%83%e0%a4%a6%e0%a4%af-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:49:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[कौन तुम मेरे हृदय में ?
कौन मेरी कसक में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
<p>कौन मेरी कसक में नित<br />
मधुरता भरता अलक्षित ?<br />
कौन प्यासे लोचनों में<br />
घुमड़ घिर झरता अपरिचित ?</p>
<p>स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा<br />
नींद के सूने निलय में !<br />
कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
<p>अनुसरण निश्वास मेरे<br />
कर रहे किसका निरन्तर ?<br />
चूमने पदचिन्ह किसके<br />
लौटते यह श्वास फिर फिर</p>
<p>कौन बन्दी कर मुझे अब<br />
बँध गया अपनी विजय में ?<br />
कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
<p>एक करूण अभाव में चिर-<br />
तृप्ति का संसार संचित<br />
एक लघु क्षण दे रहा<br />
निर्वाण के वरदान शत शत,</p>
<p>पा लिया मैंने किसे इस<br />
वेदना के मधुर क्रय में ?<br />
कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
<p>गूँजता उर में न जाने<br />
दूर के संगीत सा क्या ?<br />
आज खो निज को मुझे<br />
खोया मिला, विपरीत सा क्या</p>
<p>क्या नहा आई विरह-निशि<br />
मिलन-मधु-दिन के उदय में ?<br />
कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
<p>तिमिर-पारावार में<br />
आलोक-प्रतिमा है अकम्पित<br />
आज ज्वाला से बरसता<br />
क्यों मधुर घनसार सुरभित ?</p>
<p>सुन रहीं हूँ एक ही<br />
झंकार जीवन में, प्रलय में ?<br />
कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
<p>मूक सुख दुख कर रहे<br />
मेरा नया श्रृंगार सा क्या ?<br />
झूम गर्वित स्वर्ग देता -<br />
नत धरा को प्यार सा क्या ?</p>
<p>आज पुलकित सृष्टि क्या<br />
करने चली अभिसार लय में<br />
कौन तुम मेरे हृदय में ?</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो तुम आ जाते एक बार ]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%86-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:48:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[जो तुम आ जाते एक बार ।
कितनी करूणा कितन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो तुम आ जाते एक बार ।</p>
<p>कितनी करूणा कितने संदेश<br />
पथ में बिछ जाते बन पराग<br />
गाता प्राणों का तार तार<br />
अनुराग भरा उन्माद राग<br />
आँसू लेते वे पथ पखार<br />
जो तुम आ जाते एक बार ।</p>
<p>हंस उठते पल में आद्र नयन<br />
धुल जाता होठों से विषाद<br />
छा जाता जीवन में बसंत<br />
लुट जाता चिर संचित विराग<br />
आँखें देतीं सर्वस्व वार<br />
जो तुम आ जाते एक बार ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अश्रु यह पानी नही है]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:19:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !<br />
यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,<br />
यह न मानो अमरता से माँगने आए शरण ये,<br />
स्वाति को खोजा नहीं है औ' न सीपी को पुकारा,<br />
मेघ से माँगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा !<br />
शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती,<br />
प्राण की निधियाँ अमोलक बेचने का धन नहीं है ।<br />
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !<br />
नमन सागर को नमन विषपान की उज्ज्वल कथा को<br />
देव-दानव पर नहीं समझे कभी मानव प्रथा को,<br />
कब कहा इसने कि इसका गरल कोई अन्य पी ले,<br />
अन्य का विष माँग कहता हे स्वजन तू और जी ले ।<br />
यह स्वयं जलता रहा देने अथक आलोक सब को<br />
मनुज की छवि देखने को मृत्यु क्या दर्पण नहीं है ।<br />
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !<br />
शंख कब फूँका शलभ ने फूल झर जाते अबोले,<br />
मौन जलता दीप , धरती ने कभी क्या दान तोले?<br />
खो रहे उच्छ्‌वास भी कब मर्म गाथा खोलते हैं,<br />
साँस के दो तार ये झंकार के बिन बोलते हैं,<br />
पढ़ सभी पाए जिसे वह वर्ण-अक्षरहीन भाषा<br />
प्राणदानी के लिए वाणी यहाँ बंधन नहीं है ।<br />
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !<br />
किरण सुख की उतरती घिरतीं नहीं दुख की घटाएँ,<br />
तिमिर लहराता न बिखरी इंद्रधनुषों की छटाएँ<br />
समय ठहरा है शिला-सा क्षण कहाँ उसमें समाते,<br />
निष्पलक लोचन जहाँ सपने कभी आते न जाते,<br />
वह तुम्हारा स्वर्ग अब मेरे लिए परदेश ही है ।<br />
क्या वहाँ मेरा पहुँचना आज निर्वासन नहीं है ?<br />
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !<br />
आँसुओं के मौन में बोलो तभी मानूँ तुम्हें मैं,<br />
खिल उठे मुस्कान में परिचय, तभी जानूँ तुम्हें मैं,<br />
साँस में आहट मिले तब आज पहचानूँ तुम्हें मैं,<br />
वेदना यह झेल लो तब आज सम्मानूँ तुम्हें मैं !<br />
आज मंदिर के मुखर घड़ियाल घंटों में न बोलो<br />
अब चुनौती है पुजारी में नमन वंदन नहीं है।<br />
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आँसुओं के देश में]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:16:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[जो कहा रूक-रूक पवन ने
जो सुना झुक-झुक गग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो कहा रूक-रूक पवन ने<br />
जो सुना झुक-झुक गगन ने,<br />
साँझ जो लिखती अधूरा,<br />
प्रात रँग पाता न पूरा,<br />
आँक डाला लह दृगों ने एक सजल निमेष में!</p>
<p>अतल सागर में जली जो,<br />
मुक्त झंझा पर चली जो,<br />
जो गरजती मेघ-स्वर में,<br />
जो कसकती तड़ित्-उर में,<br />
प्यास वह पानी हुई इस पुलक के उन्मेष में!<br />
दिश नहीं प्राचीर जिसको,<br />
पथ नहीं जंजीर जिसको<br />
द्वार हर क्षण को बनाता,<br />
सिहर आता बिखर जाता,<br />
स्वप्न वह हठकर बसा इस साँस के परदेश में!<br />
मरण का उत्सव है,<br />
गीत का उत्सव का अमर है,<br />
मुखर कण का संग मेला,<br />
पर चला पंथी अकेला,<br />
मिल गया गन्तव्य, पग को कंटकों के वेष में!<br />
यह बताया झर सुमन ने,<br />
वह सुनाया मूक तृण ने,<br />
वह कहा बेसुध पिकी ने,<br />
चिर पिपासित चातकी ने,<br />
सत्य जो दिव कह न पाया था अमिट संदेश में!<br />
खोज ही चिर प्राप्ति का वर,<br />
साधना ही सिद्धि सुन्दर,<br />
रुदन में कुख की कथा हे,<br />
विरह मिलने की प्रथा हे,<br />
शलभ जलकर दीप बन जाता निशा के शेष में!<br />
आँसुओं के देश में!<br />
<strong>काव्य संग्रह <a href="http://rspandit.wordpress.com/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BE_/_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE" title="दीपशिखा / महादेवी वर्मा"><font color="#002bb8">दीपशिखा</font></a> से</strong></p>
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<title><![CDATA[अलि! मैं कण-कण को जान चली]]></title>
<link>http://rspandit.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 18:13:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>Rewa Smriti</dc:creator>
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<description><![CDATA[अलि, मैं कण-कण को जान चलीसबका क्रन्दन प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अलि, मैं कण-कण को जान चलीसबका क्रन्दन पहचान चली<br />
जो दृग में हीरक-जल भरते</p>
<p>जो चितवन इन्द्रधनुष करते</p>
<p>टूटे सपनों के मनको से</p>
<p>जो सुखे अधरों पर झरते,<br />
जिस मुक्ताहल में मेघ भरे</p>
<p>जो तारो के तृण में उतरे,</p>
<p>मै नभ के रज के रस-विष के</p>
<p>आँसू के सब रँग जान चली।<br />
जिसका मीठा-तीखा दंशन,</p>
<p>अंगों मे भरता सुख-सिहरन,</p>
<p>जो पग में चुभकर, कर देता</p>
<p>जर्जर मानस, चिर आहत मन;<br />
जो मृदु फूलो के स्पन्दन से</p>
<p>जो पैना एकाकीपन से,</p>
<p>मै उपवन निर्जन पथ के हर</p>
<p>कंटक का मृदु मत जान चली।<br />
गति का दे चिर वरदान चली।</p>
<p>जो जल में विद्युत-प्यास भरा</p>
<p>जो आतप मे जल-जल निखरा,</p>
<p>जो झरते फूलो पर देता</p>
<p>निज चन्दन-सी ममता बिखरा;<br />
जो आँसू में धुल-धुल उजला;</p>
<p>जो निष्ठुर चरणों का कुचला,</p>
<p>मैं मरु उर्वर में कसक भरे</p>
<p>अणु-अणु का कम्पन जान चली,</p>
<p>प्रति पग को कर लयवान चली।<br />
नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत</p>
<p>जग संगी अपना चिर विस्मित</p>
<p>यह शुल-फूल कर चिर नूतन</p>
<p>पथ, मेरी साधों से निर्मित,</p>
<p>इन आँखों के रस से गीली</p>
<p>रज भी है दिल से गर्वीली</p>
<p>मै सुख से चंचल दुख-बोझिल</p>
<p>क्षण-क्षण का जीवन जान चली!</p>
<p>मिटने को कर निर्माण चली!</p>
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