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	<title>महादेव-देसाई &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/महादेव-देसाई/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "महादेव-देसाई"</description>
	<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 17:47:35 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[महादेव देसाई (२) : प्रभाकर माचवे]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=365</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 14:33:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.hi.wordpress.com/2008/08/11/mahadev-desai_prabhakar_machve/</guid>
<description><![CDATA[पिछला भाग । महादेव देसाई का एक सुन्दर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/08/10/mahadev_desai_prabhakar_machve/" target="_blank">पिछला भाग</a> । महादेव देसाई का एक सुन्दर वर्णन ' हसीदे एदीब ' की ' इनसाइड इण्डिया' ( भारत में ) नामक पुस्तक में ' रघुवर तुमको मेरी लाज ' नाम के चौथे अध्याय में मिलता है । जब वे महात्माजी से बातें कर रहीं थीं , महादेव देसाई नोट ले रहे थे । उन्हीं के शब्दों में - " वे निरंतर नोट लेते रहते हैं । मेरी महात्माजी से जो बातें हुईं , वे तो मैं आगे दूँगी ही । मगर यह उनका सेक्रेटरी ऐसा है कि वह किसी का भी ध्यान आकर्षित किए बिना नहीं रह सकता । यद्यपि वह अत्यन्त नम्र और अपने -आपको कुछ नहीं माननेवाला है । महादेव का गांधीजी के आंदोलन से अपर कोई अस्तित्व नहीं है । महादेव देसाई ऊँचे , इकहरे तीस - पैंतीस बरस के हैं । उनके चेहरे के नक्श दुरुस्त हैं , और होठ पतले हैं ;  आँखें ऐसी हैं कि वे किसी रहस्यमयी दीप्ति से चमकती रहती हैं । यह रहस्यभरी झलक ( जो कि बहुत गहरी है )  होते हुए भी , वह अत्यन्त व्यवस्थित काम करनेवाले व्यक्ति हैं । अगर वे व्यवस्थित न हों  तो इतना सब काम कर ही नहीं सकते । यद्यपि उनका स्वभाव तेज , भावकतापूर्ण है ; फिर भी उनका अपनी वासनाओं पर संयम है । महात्माजी के प्रति जो श्रद्धा -भक्ति उन्हें है , वह धार्मिक है ; सोलह वर्षों से वे गांधी के साथ रहे हैं , उनसे एकात्म होकर ।  बचपन से बहुत तंग गलियों से गुजरता हुआ यह जवान आदमी आज वैराग्य की कठिनतम सीढ़ी पर चढ़ आया है । वह ' हरिजन ' का संपादन करता है । साथ ही सेक्रेटरी का सब काम करता है , जिसमें सफाई , बर्तन- धोना वगैरह सब आ जाता है । निरंतर योरोप , सुदूरपूर्व ,  अमरीका सभी ओर से गांधीजी प्रश्नों की झड़ी लग रही है , और उसमें भी अपने मन की समतोलता को बनाये रखना असाधारण बुद्धिमत्ता का काम है । इसमें अक्ल्पनीय आत्मानुशासन की आवश्यकता होती है। "  आगे चलकर इसी पुस्तक में एदीब ने महादेव भाई गांधीजी के आस-पास तकिये कैसे लगाते हैं , वे विदेशियों को आश्रमवासियों से कैसे परिचित करा देते हैं आदि वर्णन दिया है । ' अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान ' पर महादेव भाई की लिखी हुई पुस्तक का अवतरण भी दिया है । प्रार्थना का अर्थ विदेशियों को अंग्रेजी तर्जुमा कर समझाना महादेव भाई का खास काम था । एक बार लुई फिशर  (गांधी के प्रसिद्ध जीवनीकार - अफ़लातून) जब आश्रम में थे , 'बच्चू' बापू की लकड़ी लेकर इधर-उधर घूम रहा था । फिशर ने समझा , यह भी प्रार्थना का कोई भाग है । इसलिए गंभीरता-पूर्वक इस क्रिया का अर्थ उन्होंने महादेव भाई से पूछा । उन्होंने जब बताया कि यह सहज खेल है , दोनों ही खूब हँसे । विदेशी वार्त्ताहर , जो सेवाग्राम में आते थे वे , महादेव भाई की सादगी देखकर चकरा जाते थे । वे समझते थे कि महात्मा गांधी का सेक्रेटरी कोई बहुत शानवाला आदमी होगा ।  एक बार तो एक विदेशी संवाददाता को जब मैंने - " महादेव भाई ये हैं " कहकर बताया , उसे विश्वास नहीं हुआ । उसने दुबारा पूछा - " क्या ये ही हैं ? "</p>
<p>    महादेव भाई के घर में ताजी-से-ताजी विदेशी किताबें, समाचारपत्र और एक 'एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका ' देखकर मुझे बहुत सुख होता था । मैंने अक्सर देखा है कि 'हरिजन' सम्बन्धी किसी लेख को वे बापू को सुना रहे हैं ; बापू दोपहर की झपकी में कुछ सो-से गये हैं । महादेव चुप हो गये हैं ; परंतु पंखा झलते जा रहे हैं । उन्होंने गांधीजी के प्रति सेवक-भक्ति को अपने-आप में रमा लिया था ।</p>
<p>    एक बार महादेव भाई ग्वालियर-राज्य सार्वजनिक सभा के अध्यक्ष बनकर 'मुरार' गये। रियासतों में जाने की उनकी इच्छा नहीं थी । परंतु बापू का आग्रह था , टाल नहीं सके । मगर जब एक बार जाने का निश्चय किया , ग्वालियर-राज्य की पूरी-की-पूरी जानकारी उन्होंने विजयवर्गीय (जो उन्होंने बुलाने आये थे)  और मुझसे और अन्य स्रोतों से ग्रहण की । इस प्रकार महादेव भाई जब कभी कोई काम हाथ में लेते , उसमें अपना प्राण-पन लगा देते । तत्त्व तक पहुंचने की उनकी यह वृत्ति , काश , आज के नौजवानों में होती ! आगाखाँ महल से उनका शरीर बाहर नहीं आ पाया ; परंतु उनकी आत्मा की सुगंध आज भी हमारे बीच में महक रही है । आज 'सेवाग्राम' में उनकी सूनी कुटी देखकर 'जुहु' में गांधीजी की रुग्ण आँखों में जो एक अथाह सूनापन छाया था , वह मुझे रह-रहकर याद आ जाता है और मैं सोचता हूँ कि महादेव को खोकर गांधी जी ने , हरिजन ने , सेवाग्राम ने , हमने , सभी ने क्या-कुछ खोया है - एक ऐसी क्षति जो कभी पूरी नहीं हो सकती ! !</p>
[caption id="" align="alignleft" width="460" caption="बापू और महादेव"]<a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/0/05/Gandhi_Mahadev_Sevagram.jpg/460px-Gandhi_Mahadev_Sevagram.jpg"><img src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/0/05/Gandhi_Mahadev_Sevagram.jpg/460px-Gandhi_Mahadev_Sevagram.jpg" alt="बापू और महादेव" width="460" height="600" /></a>[/caption]
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/09/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Tue, 09 Oct 2007 09:45:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://kashivishvavidyalay.hi.wordpress.com/2007/10/09/journalismpublic-servicemahadev-desai/</guid>
<description><![CDATA[
    साहित्य की परिभाषा और परिधि में आन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p align="left"><font size="3" color="#808000" face="Arial Unicode MS">    साहित्य की परिभाषा और परिधि में आने लायक पत्रकारीय लेखन को हासिल करने के लिए हमें क्या करना होगा ? चिरंजीवी साहित्य लिखने का अधिकार तो गिने-चुने लोगों को है । रस्किन जिसे  कुछ कमतर आँकते हुए  'सुवाच्य लेखन' की कोटि के रूप में परिभाषित करते हैं उसके अन्तर्गत हमारा पत्रकारीय लेखन कैसे आ सकता है ? -मैं इसकी चर्चा करना चाहता हूँ । सुवाच्य लेखन की कोटि में आने की जरूरी शर्त है कि वह लेखन बोधप्रद हो , आनन्दप्रद हो तथा सामान्य तौर पर लोकहितकारी हो : उसके अंग तथा उपांग लोकहितकी परम दृष्टि से तैयार किए गये हों । <strong><em>आधुनिक समाचारपत्र औद्योगिक कारखानों की भाँति पश्चिम की पैदाइश हैं । हमारे देश के कारखाने जैसे पश्चिम के कारखानों के प्रारम्भिक काल का अनुकरण कर रहे हैं , उसी प्रकार हमारे देशी भाषाओं के अखबार देशी अंग्रेजी अखबारों के ब्लॉटिंग पेपर ( सोख़्ता ) जैसे हैं तथा हमारे अंग्रेजी अखबार ज्यादातर पश्चात्य पत्रों का अनुकरण हैं । अनुकरण अच्छे और सबल हों तब कोई अड़चन नहीं होती, क्योंकि जिस कला को सीखा ही है दूसरों से , उसमें अनुकरण तो अनिवार्य होगा । हमारे अखबारों में  मौलिकता हो अथवा अनुकरण, यदि वे जनहितसाधक हो जाँएं तो भी काफ़ी है, ऐसा मुझे लगता है । </em></strong>जैसे यन्त्रों का सदुपयोग और दुरपयोग दोनो है , वैसे ही अखबारों के भी सदुपयोग और दुरपयोग हैं ,कारण अखबार यन्त्र की भाँति एक महाशक्ति हैं । लॉर्ड रोज़बरी ने अखबारों की उपमा नियाग्रा के प्रपात से की है तथा इस उपमा की जानकारी के बिना गांधीजीने स्वतंत्र रूप से कहा था : <strong>" अखबार में भारी ताकत है । परन्तु जैसे निरंकुश जल-प्रपात गाँव के गाँव डुबो देता है,फसलें नष्ट कर देता है , वैसे ही निरंकुश कलम का प्रपात भी नाश करता है । यह अंकुश यदि बाहर से थोपा गया हो तब वह निरंकुशता से भी जहरीला हो जाता है ।भीतरी अंकुश ही लाभदायी हो सकता है । यदि यह विचार-क्रम सच होता तब दुनिया के कितने अख़बार इस कसौटी पर खरे उतरते ? और जो बेकार हैं ,उन्हें बन्द कौन करेगा ? कौन किसे बेकार मानेगा ? काम के और बेकाम दोनों तरह के अखबार साथ साथ चलते रहेंगे । मनुष्य उनमें से खुद की पसन्दगी कर ले । "</strong></font></p>
</blockquote>
<p align="left">        <font color="#808000">इस प्रकार समाचारपत्र दुधारी तलवार जैसे हो सकते हैं क्योंकि उनके दो पक्ष हैं । अख़बार धन्धा बन सकते हैं ,ऐसा हुआ भी है,यह हम जानते हैं । दूसरी तरफ़ अख़बार नगर पालिका की तरह, जल -कल विभाग की तरह, डाक विभाग की तरह लोकसेवा का अमूल्य साधन बन सकते हैं ।जब अख़बार कमाई का साधनमात्र बनता है तब बन्टाधार हो जाता है,जब अपना खर्च किसी तरह निकालने के पश्चात पत्रकार अखबार को सेवा का साधन बना लेता है तब वह लोकजीवन का आवश्यक अंग बन जाता है ।</font></p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be">पत्रकारिता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be">व्यावसायिकता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8%20%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%20%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%97">लोकजीवन आवश्यक अंग</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalism">journalism</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/newspapers">newspapers</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/professionalism">professionalism</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/public%20service">public service</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a></p>
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