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	<title>माँ &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/माँ/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "माँ"</description>
	<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 09:42:39 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[देवी स्तुति]]></title>
<link>http://pasand.wordpress.com/?p=487</link>
<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 16:03:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
<guid>http://pasand.hi.wordpress.com/2008/10/07/prayer/</guid>
<description><![CDATA[
जय जननी,  जय शक्तिदायिनी,  नवदुर्गा मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://pasand.files.wordpress.com/2008/10/durga-maan.jpg"><img class="alignnone size-medium wp-image-488" title="माँ" src="http://pasand.wordpress.com/files/2008/10/durga-maan.jpg?w=300" alt="" width="300" height="187" /></a></p>
<p>जय जननी,  जय शक्तिदायिनी,  नवदुर्गा माँ!</p>
<p>१<br />
जय अपर्णा!<br />
हिमालय तनया,<br />
शैलपुत्री माँ!</p>
<p>२<br />
जय भवानी,<br />
जय ब्रह्मचारिणी ,<br />
जय कल्याणी।</p>
<p>३<br />
जय शीतला,<br />
जै आह्लादकारिणी,<br />
चंद्रघण्टा माँ।</p>
<p>४<br />
जै महोदरी,<br />
त्रिविध ताप गर्भा,<br />
कूष्माण्डा माँ।</p>
<p>५<br />
जय भगवती,<br />
सनत्कुमार जाया,<br />
स्कंदमाता माँ।</p>
<p>६<br />
जै महामाई,<br />
देव कार्यसिद्धिनी,<br />
कात्यायनी माँ।</p>
<p>७<br />
जै रौद्रमुखी,<br />
जै कालमहाकाली,<br />
कालरात्री माँ।</p>
<p>८<br />
जै महातपा,<br />
जै चिति चित्तरुपा,<br />
महागौरी माँ।</p>
<p>९<br />
जय कल्याणी,<br />
जय मोक्षदायिनी,<br />
सिद्धिदात्री माँ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[व्यर्थ की बातों से मुँह मोड़  लें ]]></title>
<link>http://pasand.wordpress.com/?p=480</link>
<pubDate>Sun, 05 Oct 2008 14:42:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
<guid>http://pasand.hi.wordpress.com/2008/10/05/woman-empowement/</guid>
<description><![CDATA[बचपन में ही मोना ने ज़िंदगी का फलसफ़ा सम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बचपन में ही मोना ने ज़िंदगी का फलसफ़ा समझ लिया था। पिता शराबी थे। उसने उन्हें कभी बिना नशे के नहीं देखा और न हीं उन्होंने कभी उससे प्यार से बात की। हमेशा डांट कर ही बोलते। मोना उनसे कतराती थी। माँ बहुत प्यार से बोलती थी। पर जब भी मोना माँ से किसी चीज़ या खिलौने दिलाने की कहती तो माँ पापा से पैसे मांगती और पापा झिड़ककर मना कर देते।<br />
माँ सारे दिन घर का काम करती रात को पिता से मार खाती। दादी-बाबा भी माँ की कमियाँ निकालते और पिता तो बस पूरे ज़ल्लाद! आए दिन माँ को लात-घूंसे मारकर घर से धक्का दे देते जा निकल यहाँ से। मोना ज़ोर से रोती तो उसके भी चार-छः पड़ जाते। बेचारी माँ कुछ देर में लौट आती। जाए तो जाए कहाँ?<br />
मोना माँ से कहती - ’आप आ क्यों जाती हो? चलो हम दोनों अलग रहेंगे। फिर पापा आपको कैसे पीटेंगे? मोना को देखकर माँ कहती पैसे कहाँ से आएँगे और कौन शरण देगा। सब भूखे-भेड़िए हैं।</p>
<p>'तो माँ के पास न तो पैसे और न घर तभी उसे पापा से पिटना पड़ता है और पापा रोब जमाते हैं क्योंकि पैसे कमाकर जो लाते हैं।' मोना ने सोचा।<br />
मोना ने मन ही मन ठान लिया कि वह पढ़-लिख कर कुछ बनेगी ताकि अपना जीवन माँ की तरह आश्रित रहकर और पिटकर न गुज़ारे। उसने खुद कमाकर अपने पैसे बनाने की सोची ताकि न तो किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े और अपनी मर्ज़ी से अपना पैसा खर्च कर सके।<br />
वह जीजान से पढ़ी और पढ़कर एक बड़े दफ्तर में ऊँचे पद पर नौकरी करने लगी। उसके पिता जो बूढ़े हो चले थे उस पर आश्रित हो गए। उसने उनकी शराब छुड़ायी और ठीक से रहने के लिए प्रयत्न किए और सफलता हासिंल की।<br />
माँ उसे देखकर बड़ी खुश होती थी उसने अपनी बेटी को अपनी राह खुद चुनने की इज़ाज़त दी। उसको पता था कि मोना एक सुलझी हुई युवती है।<br />
मोना का आत्मविश्वास देखते ही बनता था। वह आग में तपकर निकले कुंदन के समान थी। उसमें घमंड बिलकुल भी न था। पर स्त्री शोषण को देखकर वह बौखला जाती थी। उसने स्त्रियों के लिए कुछ करने की ठानी। उसने देखा कि स्त्री अनपढ़ होने के कारण ज़्यादा शोषित होती है। न तो वह रुढ़ियों को तोड़ने की सोच पाती है और न समाज का सामना कर पाती है। इसलिए अपने घर के पास वाले स्कूल में शाम को गृहणियों को पढ़ाना और समझाना शुरु किया। वहा उनको शब्द-ज्ञान से लेकर दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले विज्ञान-संबंधी बातें भी बताती, कानून और स्व-रोज़गार का ज्ञान भी देती। स्त्रियाँ उससे प्रभावित होने लगीं और बदलाव झलकने लगे।<br />
मोना ने अपने जीवन का ध्येय ही स्त्री की दशा सुधारना बना लिया। पर यह काम इतना आसान न था। उस पर अनेक लांछन लगाए जाते। उसे बुरा भला कहा जाता।जब वह पढ़ाकर निकलती तो स्त्रियाँ उसे सुना कर कहतीं-</p>
<p>’उफ़! इस लड़की के तेवर तो देखो, पता नहीं कौन सी पढ़ाई-लिखाई कर ली है। अरे उम्र निकल गयी तो पूरी ज़िंदगी घर में सड़ेगी। कौन पूछेगा फिर? ये निठल्ली औरतों की मंडली किसी काम न आएगी। बड़ी चली है दूसरों को सिखाने, कुछ अपनी भी तो सोच!<br />
मोना ने कोई जबाब नहीं दिया और चुपचाप निकल गयी। क्या घर-परिवार बसाकर ही औरत का जीवन सफल होता है? माँ को क्या मिला? पूरा जीवन पिस-पिसकर निकाल दिया। मैं तो किसी ऐसे बंधन को स्वीकार न करुंगी जहाँ स्त्री सिर्फ गूंगी होकर जीए। क्या उसका अस्तित्त्व नहीं है? बोलती रहो मुझे तो बदलाव लाना है। क्यों विवाह को बंधन स्वीकरुँ? क्यों न स्त्री-पुरुष की सहभागिता समझाऊँ?? बंधन क्यों? स्त्री कोई क़ैदी है? या कोई सेविका? वह बराबरी से क्यों न रहे? अपने ही घर में आश्रित क्यों रहे? पर ऐसा तब ही हो पाएगा जब वह अपनी स्वयं की सोच को विस्तार देगी।<br />
अपने जीवन को खुद बदलाव देगी। व्यर्थ की बातों से मुँह मोड़ लेगी। मुझे तो यही बदलाव देखना है।</p>
<p>( दी हुई स्थिति पर लिखी हुई कहानी)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[माँ]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/?p=161</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 10:57:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.hi.wordpress.com/2008/05/11/maa/</guid>
<description><![CDATA[जो भी जॉब के लिए घर से दूर हैं शायद उन स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो भी जॉब के लिए घर से दूर हैं शायद उन सब के दिल में यही जज्बात होंगे &#124; <br />
ये चार लाईने मैं अपनी माँ के लिए लिखा हूँ, वैसे माँ को याद करने को लिए कोई दिन नहीं होता है माँ तो हमेशा हमारे दिल में रहती हैं  हैं लेकिन आज Mother's Day के बहाने जरुर इन भावनाओ को यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ  </p>
<p>कभी-कभी खुद अपनी तरक्की से भी हो जाता नाराज हूँ मैं<br />
इसी भाग दौड़ में खुद अपनों से दूर हो गया आज हूँ मैं<br />
जिस आंचल के साये में रह के किसी लायक बन पाया<br />
उस माँ से ही मिलने को चन्द छुट्टी का मोहताज हूँ मैं<br />
...................................... Shubhashish</p>
<p> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोहब्बत तेरी याद है]]></title>
<link>http://vinayprajapati.wordpress.com/2008/01/14/mohabbat-terii-yaad-hai/</link>
<pubDate>Mon, 14 Jan 2008 09:19:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>विनय</dc:creator>
<guid>http://vinayprajapati.hi.wordpress.com/2008/01/14/mohabbat-terii-yaad-hai/</guid>
<description><![CDATA[मोहब्बत तेरी याद है
तेरी हर बात याद है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोहब्बत तेरी याद है<br />
तेरी हर बात याद है<br />
साथ तू नहीं तो क्या<br />
साथ तेरी याद है</p>
<p>मैं कहाँ था गर तू न होती<br />
तू ज़िन्दगी के चराग़ की बात है<br />
कल से आज तक का सफ़र<br />
जो तय किया है मैंने<br />
वो तेरी मोहब्बत की सौग़ात है</p>
<p>माँ तू हर पल मेरे पास है...<br />
माँ तू हर पल मेरे पास है...</p>
<p>तेरे आँचल की छाँव<br />
आज भी मेरे साथ है<br />
तेरी हर डाँट हर मार<br />
आज भी मुझे याद है<br />
तेरी वो नाराज़गी तेरा दुलार<br />
आज भी मुझे याद</p>
<p>माँ तू हर क़दम मेरे साथ है...<br />
माँ तू हर क़दम मेरे साथ है...</p>
<p>मोहब्बत तेरी याद है<br />
तेरी हर बात याद है<br />
साथ तू नहीं तो क्या<br />
साथ तेरी याद है</p>
<p>सलामत रहे तू हमेशा<br />
ख़ुदा से मेरी फ़रियाद है<br />
पाया जितना दुनिया में<br />
सब तुझ पर निसार है</p>
<p>मैं कहाँ था गर तू न होती<br />
तू ज़िन्दगी के चराग़ की बात है<br />
मोहब्बत तेरी याद है<br />
माँ तू हर पल की नमाज़ है</p>
<p>माँ तू हर पल मेरे पास है...<br />
माँ तू हर क़दम मेरे साथ है...</p>
<hr />शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’<br />
लेखन वर्ष: २००१-२००२</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[माँ सुनाओ मुझे वो कहानी]]></title>
<link>http://jagjitsingh.wordpress.com/2007/11/17/maa-sunao-mujhe-woh-kahani/</link>
<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 13:53:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsingh.hi.wordpress.com/2007/11/17/maa-sunao-mujhe-woh-kahani/</guid>
<description><![CDATA[माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमे राजा न ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,<br />
जिसमे राजा न हो न हो रानी,</p>
<p>जो हमारी तुम्हारी कथा हो,<br />
जो सभी के ह्रदय की गाथा हो,<br />
गंध जिसमे हो अपनी धारा की,<br />
बात जिसमे न हो अप्सरा की,<br />
हो न परियां जहाँ आसमानी,</p>
<p>वो कहानी को हँसना सिखा दे,<br />
पेट की भूख को भी मिटा दे,<br />
जिसमे सच की भरी चांदनी हो,<br />
जिसमे उम्मीद की रौशनी  हो,<br />
जिसमे न हो कहानी पुरानी,</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल, वह और...........]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/31/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 31 Aug 2007 02:29:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2007/08/31/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[मोबाइल की बेटरी में खराबी की
खबर ने उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोबाइल की बेटरी में खराबी की<br />
खबर ने उसे हिला दिया<br />
क्योंकि उसने अपनी गर्ल फ़्रेंड को दिये थे<br />
उसी कंपनी की मोबाइल प्रेजेंट जिनकी बेट्री<br />
के फ़ट्ने की खबर ने देश में भूचाल ला दिया<br />
मिलता था वह जिन   गर्लफ्रैंडस  से<br />
अलग दिन और अलग जगह पर<br />
बेटरी फटने के भय  ने<br />
सबको एक ही दिन और ऐक ही समय <br />
उसकी होस्टल  के कमरे की  छत के नीचे <br />
आपस में मिलवा  दिया<br />
 <br />
उसने सबको एक ही कंपनी के<br />
मोबाइल तोहफ़े में दिये थे<br />
जिनकी बेटरी  फटने के चर्चे<br />
टीवी चैनलों ने किये थे<br />
भय से काँपती सब उसके रूम में पहुँची<br />
अपने मोबाइल की बेटरी<br />
बदलवाने का आग्रह लेकर  <br />
 पर जो देखा वहां का मंजर<br />
वह  गुस्से में सब भूल  गयीं  और मिलकर<br />
उसे छठी का दूध याद दिला  दिया<br />
जिसे जो मिला उसके सिर पर मार दिया<br />
 <br />
 <br />
 वह पिटा-कूटा अपने कमरे में  पडा था<br />
ऐक दोस्त ने आकर उसे उठाया<br />
वजह पूछी पर वह कुछ नहीं बता रहा था<br />
बस ऐक ही बात रोते हुए  दोहरा रहा था<br />
‘मोबाइल वालों तुमने यह क्या किया<br />
बेटरी फट जाने देते<br />
पहले ही प्रचार क्यों किया<br />
जिस कंपनी के मोबाइल खरीद्कर लव में<br />
हो गया था हिट उसने ही आज पिटवा दिया<br />
--------------------------------<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रेमियों के माँ-बाप कब सुधरेंगे ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/25/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%b8%e0%a5%81/</link>
<pubDate>Sat, 25 Aug 2007 03:03:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2007/08/25/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%b8%e0%a5%81/</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी ने प्रेमिका से कहा
&#8216;मेरे मान-]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रेमी ने प्रेमिका से कहा<br />
'मेरे मान-बाप नहीं है<br />
बिना दहेज़ के मेरा विवाह<br />
करने को तैयार<br />
उनकी मर्जी के बिना<br />
अगर मैंने बढ़ाया कदम तो<br />
वह मुझ संपत्ति से बेदखल कर देंगे<br />
मेरा-तुम्हारा साथ बस इतना ही था<br />
अब फिर कभी नहीं मिलेंगे'<br />
प्रेमी ने खेला था चालाकी से अपना दाव<br />
प्रेमिका को पहले आया ताव<br />
फिर संभलकर प्रसन्नता से बोली<br />
'बहुत अच्छा हुआ<br />
मेरी तरफ से उनको धन्यवाद देना<br />
मेरी चिंता बिल्कुल न करना<br />
कन्याओं के भ्रूण गिराने से चली जो हवा<br />
उससे पड़ गया है लड़कियों का अकाल<br />
समझदार माँ-बाप अब बेटे की शादी में<br />
अब नहीं मांगते पैसा और माल<br />
मेरे लिए परिवारवालों के पास<br />
बिना दहेज़ के मेरा हाथ मांगने वाले<br />
रिश्तों की झड़ी लगी थी<br />
तुम्हारे साथ जिंदगी गुजरने के लिए तो<br />
बस मैं अकेली अड़ी थी<br />
आज से हम अपने रास्ते अलग कर लेंगे'</p>
<p>अपनी चाल नाकाम होते देखकर<br />
प्रेमी घबडाया और बोला<br />
'अभी जल्दी न करना<br />
मैं अपने माता-पिता को<br />
मनाने के प्रयास जारी रखूंगा<br />
कभी न कभी तो हामी भरेंगे '</p>
<p>प्रेमिका ने कहा<br />
'उमर निकल जायेगी तुम्हारी<br />
माँ-बाप को मनाते<br />
तुम जैसे कई बैठे हैं अपनी जवानी गंवाके<br />
मैं अब इन्तजार नहीं कर सकती<br />
विदेशों से आये हैं मेरे लिए रिश्ते<br />
सोचती हूँ जाकर माँ-बाप की बात मान लूं<br />
अच्छा तो मैं अब चलती हूँ<br />
किस्मत में रहा तो फिर कभी मिलेंगे'</p>
<p>प्रेमिका चली गयी<br />
प्रेमी पीछे से चिल्लाता रहा<br />
पर वह अनसुना कर गयी<br />
प्रेमी बोला'लड़को को तो सब<br />
सुधरने के लिए कहते हैं<br />
पर अपने मुहँ से दहेज़ मांग कर<br />
अपने लड़के की जवानी बरबाद<br />
करने वाले प्रेमियों के माँ-बाप कब सुधरेंगे'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जननी]]></title>
<link>http://pasand.wordpress.com/2006/05/13/%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sat, 13 May 2006 07:36:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
<guid>http://pasand.hi.wordpress.com/2006/05/13/mother-2/</guid>
<description><![CDATA[तुम! मां हो
मेरा पूरा जहां हो।
संसार मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तुम! मां हो<br />
मेरा पूरा जहां हो।<br />
संसार में आए हैं तुमसे,<br />
तुमने ही परिचय कराए हैं सबसे।<br />
तुम्हारी पूजा करना अभिमान है,<br />
तुम्हारी सेवा करना शान है।<br />
बस चाहती हूं एक बात<br />
ना बीते बिन तुम्हारे एक भी रात।<br />
बिन तुम्हारे होंगे सारे सुख फींके,<br />
साथ तुम्हारे हैं सारे दिन नीके।<br />
तुम तो मेरा आधार हो,<br />
उठाती सारा भार हो,<br />
ना माथे पर आयी रेखा,<br />
ना कभी कोई अवसाद देखा,<br />
कैसे बयां करूं अपनी भावना,<br />
हो नहीं सकती बिन तुम्हारे कोई आराधना।<br />
जब भी होती हूँ उदास,<br />
होता है तुम्हारे प्यार का अहसास।<br />
नहीं होती कम कभी हिम्मत,<br />
तुम देती हो मुझे सदा आत्मबल।<br />
क्या क्या ना सहा तुमने हमारे लिए,<br />
सारे कष्ट उठाए हैं ताकि हम जीएं।<br />
तुम तो दिये का तेल हो<br />
जो जलने से कभी रूकता नहीं,<br />
तुम तो एक ऎसी बेल हो<br />
जो गिरकर कभी मरती नहीं।<br />
हमसे कभी रूठी नहीं<br />
मुंह कभी मोड़ी नहीं,<br />
करती हो सबकुछ अर्पण,<br />
जीवन तुम्हारा है एक दर्पण।</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
